*श्रमिक माँ*
हथेलियों में हथौड़ा रखकर,
पत्थर तोड़ कर सम्मान से जीती हूँ ।
कोमल ह्रदय से लिए नवशिशु को पीठ पर ढोती हूँ।
उनसे पूछे कौन हो तुम .....? ? ?
कहती है पापी पेट की खातिर मेहनत मजदूरी कर ये हक ले लेती हूँ ।
दो पैसे कमाने के लिए परिवार की पेट की आग बुझाती हूँ ।
नारी शक्ति का सम्मान लिए स्वाभिमान से जीती हूँ।
माथे पे सिकन पसीने की बूंदों से तपती धूप सह लेती हूँ।
मेहनत कश मजदूरी करके *"श्रमिक माँ"* खुश हो लेती हूँ।
स्वरचित मौलिक 📝
*शशिकला व्यास*
*भोपाल मध्यप्रदेश*

Nice 👌👌👌
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteबहुत खूब
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