Saturday, April 18, 2020

लघु कथा हमारे मित्र मम्मा मैं अभी आधे घंटे में दोस्त से मिलकर आता हूं


कहते राकेश ने पानी की बाॅटल उठाई और जाने लगा।अरे पानी क्यो ले जा रहा है।मम्मा गर्मी के दिन हैं ना पानी साथ हो



तो अच्छा कहते राकेश बाहर चला आया था।मां भी सोचने लगी उम्र में आये बेटे से भला कैसा विवाद करना आज पन्द्रह


दिन हो गये थे।राकेश ठीक समय पर पूरी बाॅटल भर बाहर चला जाता था।समय पर घर लौट आता था।मां अपने मन के

प्रश्नो के हल स्वयं पाने की सोच से जैसे राकेश घर के बाहर निकला चुपके से मां भी पीछे चल पड़ी ।घर से दस मिनट



दूरी पर शनि मंदिर था ।मां ने देखा राकेश वही रूक गया था।मंदिर के बाहर बूढे कुछ बच्चे महिलाऐ कतार से बैठे हुए थे।



राकेश उन्हें प्रेम से पानी दे रहा था।हंसते हुए उनसे बाते भी कर रहा था। थोडे समय बाद उसका एक मित्र वहाँ पहुँचा



उसके हाथ में भी पानी का पीप था।मैं कुछ हटकर खड़ी थी अब सामने आ गई थी।मुझे देखते ही राकेश ने सहज भाव से

कहा मम्मा आज आप इस समय दर्शन करने चली आई।देखो ये मेरा दोस्त प्रवीण है और ये सभी हमारे मित्र हैं।मां ने सुना


वहाँ बैठे सभी लोग इन बच्चो की प्रशंसा कर रहे थे। मम्मा एक दिन ये बाबा पानी की गुहार लगाते बेहोश हो गये थे मैंने


देखा दौड कर उन्हे जल पिलाया छाँव मे लिटाया।ठीक होते इन्होने बेटा कहा पता नहीं मन मे एक योजना बना ली हम


मित्रो ने गर्मी के मौसम तक हर घंटे एक एक दोस्त आकर इन्हे ठंडा शुध्द जल लाकर देगा।देखो मां ये सभी हमारे मित्र हो

गये है।इन्हें नव जीवन देने का भी इरादा हैं। अब मां राकेश के निर्विकार चेहरे को देख अपने सोच को धिक्कार रही थी।



 अमिता मराठे इन्दौर स्व सुखाय
मोहब्बत आंखों से आंखें मिली थी, जब तुम मुस्कुराई थी ,


दिल में तूफान मचा था , जब करीब आई थी,


 जिंदगी भर साथ रहने , विवाह के बंधन में बंध गए , बाहों में भर लिया तुझे


 , और तू शरमाई थी ।



मोहब्बत नि. शब्द है , उसका कोई मोल नहीं , प्रेम समर्पण है,त्याग है, उसमें कोई स्वार्थ नहीं , प्रेम संस्कार है ,



 प्रेम एक विचार है , यथार्थ की अनुभूति है , होता उसका व्यापार नहीं ।



 श्रीमती शोभा रानी तिवारी, 619 आकर्षण अपार्टमेंट ,

खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश, मोबाइल 89894 09210
*"मोहब्बत"* *दिल्लगी उसकी मुझको भाती नहीं है* ।


 *उसके बिना नींद मुझको आती नहीं है* । *


वो धड़कनों में मेरी समा गई है ऐसे* , *कि नज़रों से इक पल भी जाती नहीं है* ।


 *'मोहब्बत' मैं उससे करता हूँ बेपनाह* , *सांसें भी बिन उसके अब आती नहीं है* ।


 *नहीं रह सकूँगा मैं बिन उसके जहां में* , *कहाँ है वो क्यूँ अब तक आती नहीं है* ।


 *हर रोज़ भेजता हूँ मैं दिल की बातें* , *हवाओं से क्या वो पैग़ाम पाती नहीं है* ।

 *ये इश्क़ का कैसा बुख़ार है 'हमसफ़र'*, *दवा इसपे कोई क्यूँ काम आती नहीं है* । -


- *सुरेन्द्र सिंह राजपूत 'हमसफ़र'* *


देवास मध्यप्रदेश*
कभी तुम इजहार करते नही , कभी आहें भरते नही ,


 मगर आंखों से यूं देखना मोहब्बत नही तो और क्या है।



बने हमसफ़र जबसे तुम हो मेरे , हाथों में हाथ ले सदा हम चले।



मेरे आँसू देखकर उदास हो जाना मोहब्बत नही तो और क्या है राहों में जो आई कठिनाइयां ,


 साथ रही अपनी परछाइयां। खामोशी से समर्पण अपना जताना , मोहब्बत नही है तो और क्या है।



 अचला गुप्ता इंदौर
मयखाना हुआ मोहब्बत का असर कुछ यूं हुआ बेखुदी का समां चारों ओर हुआ ।


जिधर देखती हूँ वो ही दिखे ये मेरी निगाहों का कुसुर हुआ ।


जब से मिली मोहब्बत की पनाहें हर लम्हा खुशी से शायराना हुआ ।


मन के सुरूर का क्या कहें दुनिया का हर नजारा रंगीन हुआ।


दिल में ऐसे मचलने लगी तरंगें हर कतरा बस एक समुंदर हुआ।


ऐसा कमाल इस मोहब्बत ने किया मन खुद से ही बेगाना हुआ।

तरसते हैं नयन उन्हें देखने को हर जर्रा जर्रा उनका अक्स हुआ।

जब से दिल को मिली सौगात हर जाम जाने कैसे मयखाना हुआ। |||||



 नीति अग्निहोत्री इन्दौर म मप्र
जिंदगी की किताब.


.* विधा : कविता घर पर बैठे थक गए है


, तो यादों कुछ ताजा करे। और जिंदगी की किताब के, कुछ पन्नो को खोलकर देखे।


 और दिल की आवाज को, धर्य से सुन कर ले। क्योकि मन बहुत चंचल है जो इंसान को भटकाता है।।


 राह सही होते हुए भी, दिमाग को उलझता है। और मनुष्य के हृदय में, विकारों को जन्म देता है।


और उससे अच्छे बुरे की, सोच को दूर करता है। पर ज्ञानवान विवेकवान तर्कवान मनुष्य, अपने लक्ष्य तक पहुंचता है।।



 जिंदगी को जीना और पढ़ना, किसी के लिए आसान नहीं। लक्ष्य बिना जीने वालो के, जीवन का कोई मोल नहीं। कितने


लोग इस तरह से, अपनी जिंदगी को जीते है। पर जीवन की ऊंचाइयों पर, लक्ष्य वाले ही पहुँचते है।। जय जिनेन्द्र देव की


संजय जैन (मुम्बई) 
--बेखुद


 मेरी अपने जब तुमसे  प्यार किया जब तुम कुछ समझते ही नहीं थे मुझे,

 तुम्हारा अल्लहड़पन ना समझी या बेगानापन, पता नहीं क्या था, पर मेने तुमसे बहुत प्यार


किया,तुम्हे इजहार भी किया, वो भी वक्त जब तुम्हारे पास न पैसा था ,न पद न प्रतिष्ठा ही थी,


 तुम मेरी मोहब्बत को समझ ही न सके या समझना ही न चाहा, जब एक औरत किसी से प्यार करती हैं, तो उस पर

दिलों जान से करती है। मैंने भी तो वही किया । पर तुम मुझे व मेरी मोहब्बत को न समझ सके,। तुम मुझे ऐसे ही

छोड़कर चले गए कहा पता नहीं, क्योंकि तुम्हारे पास वो प्यार करने वाला दिल ही नहीं था। जो किसी की मोहब्बत को

समझ सकता , या कोई मजबूरी भी हो सकती हो , पर बताते तो, मैं भी जानना चाहती थी तुम्हारी मजबूरी या बेवफाई।


 और आज जब मेरे पास एक प्यारा परिवार पद व प्रतिष्ठा सब कुछ है , तो तुम आ गए मुझसे प्यार जताने


, मना करने पर मुझे बरबाद व बदनाम करने, पर अब तो मैं तुम्हारी परवाह ही नहीं करती हूं,


क्योंकि अब तुम मेरा बिगाड़ ही क्या

 सकते हो, जब तुम मेरी मोहब्बत को न समझ सके , अब अपनी बेवफाई व बेखुदी को तो समझो , कम से कम ।🙏💐




 नीलू सक्सेना देवास🙏💐

Wednesday, April 15, 2020

कविता


---लॉक डाउन ...


 जब से खुद ने मांजे बर्तन बर्तन हुएं चमकीले ऐसा लगता है


जैसे मैंने कल ही नए खरीदे कर रही हूं

जो अब मैंने खुद ही झाड़ू पोछा घर मेंरा चमक रहा दमके जैसे हीरा जो काम भी भूल रही थी

 धीरे धीरे करती आज देखा तो महीने भर में आ गईं मुझमें वापस फुर्ती भला हुआ ये

लॉक डाउन ने हमको कुछ तो सिखाया बाइयों पर हम निर्भर हो गए थे

हम तो पूरे पूरे बिन उनके काम नही चलता था आज समझ में आया काम अगर करतें रहते

तो कभी कष्ट ना होता कितना ही काम पड़े वो सब खुद से होता घर में रहने लगें अब हम लोग सारें।

*मंगला श्रीवास्तव इंदौर स्वरचित 
लघुकथा----

 कृष्ण की सीख---


 महाभारत के युद्ध का अंत हो गया था।

द्रोपदी का प्रतिशोध पूर्ण हुआ परन्तु फिर भी द्रोपदी व्यथित थी।

संपूर्ण वंश का नाश हो चुका था। कौरवों के साथ पांड़व वंश में भी पांड़वों और उत्तरा के गर्भ के अलावा कोई नहीं बचा।

द्रोपदी आज व्यथित सी वर्षों बाद बालों को संवार रही थी, इतने में कृष्ण ने कक्ष में प्रवेश किया।

 द्रोपदी ने दुखी होकर कहा-- हे कृष्ण ये कैसा समय है?

संपूर्ण वंश का विनाश? अब पांड़वों को राज्य मिला भी तो यह श्मशान हो चुका है।

कृष्ण ने कहा-- हे सखी , द्रोपदी इसमें तुम्हारा भी योगदान है।

सृष्टि में हर युद्ध औरत और सत्ता के लिये हुआ है।
तुमने कर्ण को स्वयंवर में चुना होता तो तुम आज कर्ण की ब्याहता होती।

पांच पतियों की पत्नी नहीं। ना भरी सभा में तुम्हारी लाज पर छींटे होते।

कर्ण अपनी पत्नी की रक्षा करना जानता है।

वो पत्नी के सम्मान के लिये जान की बाजी लगा देता।

ना तुम बाल खोलकर दुःशासन के रक्त से उसे धोने का प्रण करती तो ये युद्ध ना होता।

तुम कौरवों की खिल्ली नहीं उड़ाती और अंधा ना कहती तो तुम्हारे चीरहरण का प्रयास कौरव कभी नहीं करते।

 स्त्री को हमेशा मितभाषी, धैर्यवान और दूरदृष्टि होना चाहिये।

तुम बुद्धिमती और सुंदर हो परन्तु धरती की तरहा विशाल ह्दय और गहरी नहीं।

इसी कारण आज तुम्हे ये दुख द्रवित कर रहा है। भविष्य में तुम हर नारी के लिये उदाहरण रहोगी।

सम्मान पाने के लिये सम्मान देना पड़ता है। कृष्ण की बात सुनकर द्रोपदी की आंखों से पश्चाताप के अश्रु ब हने लगे ।


सुष'राजनिधि'

नमन मंच तुम बिन नयन अधिर अविराम एकटक निहारे


तेरी राह मुरारी दर्शन दो हे!


कृपानिधान हम पर आई विपदा भारी कष्ट निवारो रोग भगाओ


इस महामारी से हमको तारो सकल जगत है प्रलयन्कारी राह दिखाओ हे!

त्रिपुरारी ...

हम सब की बस यही कामना पहले जैसा जीवन कर दो


इस कारावास से मुक्ति दे दो तुम बिन ना कोई ठौर हमारो हम पर कृपा करो हे!

मुरारीll

 * नंदिनी पीयूष शर्मा देवास
सुंदर सा भवन सुंदर सा भवन, सुंदर उपवन आराम से सबका,


घर रहना मुझे दोष ना देना, जग वालों हो जाऊँ अगर मैं दीवाना ।

सुंदर ....


 ये काम कमानी पॅल्मेट तेरी परदों की झालर फहराती ,


 गेट पर सिंदूरी गण मूरत हाॅल में वेंटीलेटर उजियारे ,

 साया जब सबका मिल जाए आबाद हो घर का हर कोना ।

सुंदर ...

 घर भी सुंदर दर भी सुंदर सब सुंदरता की मूरत हैं ,

 किसी अतिथी यह नहीं होगी हमें इसकी बहुत जरूरत है ,


 पहले भी बहुत हम तरसे हैं घर अब ना हमें तू तरसाना ।

सुंदर .... *


सौ.राधिका इंगळे देवास 
जब से लाकडाऊन हुआ मुझ जैसी कई मां को बहाना मिल गया की अपनी बड़ी होती बिटीया को घर में , घर का ही व्यंजन बनाना सिखाया जाए , ।

 क्यों की वैसे तो हम जैसे मध्यम घर परिवार की बहू बेटियां सभी कार्य कुशल पूर्वक कर लेती है‌। फिर भी अभी कि इस पिढी को ZOOMETO.. UBAR EAT. , SWEEGY ,

 ने एक फोन पर सब उपलब्ध करवा कर‌ ,आलसी बना दिया था , पर अब कुछ खाने की चाह में सब बनाना सिख रही ,

पहले मैं बोलती थी तो अरे मम्मा मार्केट में सब मिलता है , अब तो मार्केट भी बंद ,जब मैं कुछ बनाने बैठती और बुलाती की आकर सिख लो, तो बोलती, U Tube पर सब है देख कर बना लेंगे, अब अगर ऐसे समय में NET भी बंद हो जाए

तो फिर कौन सा U Tube , । !!! इसलिए घर‌ मे रहकर घर में बनने वाले हर व्यंजन को सिखना अब तो अनिवार्य हो

गया है । और शायद ये मेरे जैसी सभी महिलाओं के साथ हो रहा है , । अगर हमको खुद सभी स्वादिष्ट व्यंजन बनना

आता है तो ऐसे समय में भी किसी पर आश्रित ना होकर खुद भी खाए और औरौ को भी खिला सकते हैं ।।

 इस कोरोना से जहां किसी के लिए नुकसान है तो किसी को फायदा , पर्यावरण, नदीयां सब साफ़ हो गए ।‌.

 कम सामान‌ में गुजारा, मन जैसे शांत हो गया , ।


*बिन्दु मेहता.....🙏🏻🙏🏻
*चाय सिर्फ़ चाय ही नहीं होती...*
जब कोई पूछता है "चाय पियेंगे" तो बस नहीं पूछता वो तुमसे दूध, चीनी और चायपत्ती को उबालकर बनी हुई एक कप चाय के लिए।वो पूछता हैं... क्या आप बांटना चाहेंगे कुछ चीनी सी मीठी यादें कुछ चायपत्ती सी कड़वी दुःख भरी बातें..!

वो पूछता है.. क्या आप चाहेंगे बाँटना मुझसे अपने कुछ अनुभव, मुझसे कुछ आशाएं कुछ नयी उम्मीदें..?

 उस एक प्याली चाय के साथ वो बाँटना चाहता है अपनी जिंदगी के वो पल तुमसे जो अनकही है अबतक दास्ताँ जो अनसुनी है अबतक


 वो कहना चाहता है.. तुमसे तमाम किस्से जो सुना नहीं पाया अपनों को कभी.

एक प्याली चाय के साथ को अपने उन टूटे और खत्म हुए ख्वाबों को एक बार और जी लेना चाहता है।

वो उस गर्म चाय की प्याली के साथ उठते हुए धुओँ के साथ कुछ पल को अपनी सारी फ़िक्र उड़ा देना चाहता

 इस दो कप चाय के साथ शायद इतनी बातें दो अजनबी कर लेते हैं जितनी तो अपनों के बीच भी नहीं हो पाती।🌹

 तो बस जब पूछे कोई अगली बार तुमसे *"चाय पियेंगे..?"*

 तो हाँ कहकर बाँट लेना उसके साथ अपनी चीनी सी मीठी यादें और चायपत्ती सी कड़वी दुखभरी बातें..!!

 *चाय सिर्फ़ चाय ही नहीं होती...!


प्रस्तुती -सविता


आज प्रस्तुत  हैं  कविता सक्सेना की रचना --
डा अम्बेडकर जयंती पर शुभसंकल्प का ऑनलाइन गीत ,गजल कार्यक्रम संपन्न
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लाक डाऊन के तले घर के अन्दर बेठे-ठाए रचनाकारो के लिय शुभसंकल्प समूह द्वारा ओनलाईन शेर,शायरी ,गीत ,गजल का कार्यक्रम संपन्न्ं हुआ विषय था "स्वर्ग नर्क" यह कार्यक्रम दोपहर 3 बजे से सरस्वती वंदना से प्रारम्भ हुआ तो देर रात तक चलता रहा। शुभसंकल्प समूह की निर्देशक डा सुनीता श्रीवास्तव ने बताया की इंदौर के आलावा बहार के रचनाकारो ने भी इस कार्यक्रम में गर्मजोशी से हिस्सा लिया।प्रतिभागियो में शारदा मिश्रा ने कहा - "स्वर्ग नर्क कुछ भी नही , शब्दो का मायाजाल। सुख मिल जाए स्वर्ग हैं दुख हैं नर्क समान" अचला गुप्ता ने बया किया- "स्वर्ग वही ,जिस घर में होता बुजुर्ग मात पिता का सम्मान" पूनम शर्मा ने कुछ इस तरह से बोला - "मेरी नजर मे स्वर्ग और नर्क इसी दुनिया में हैं क्योकी जो देखा नही इन आखो से.." शोभा तिवारी ने कहा- "मातभूमि तुमको नमन वंदे मातरम् देश की धडकने हैं..." अनुराधा विसावाडिया - " हो महामारी की फेलना या लम्बी बिमारी की लाचारी यही नर्क हैं...." मनोरमा जोशीने कहा- "स्वर्ग और नर्क कर्मो की है माया नगरी.." उषा गुप्ता - "स्वर्गनर्क ढूढे बंदा दोनो हाथ और आखे ऊपर करके, तेरे कर्मो पर टिका है ये.." प्रभा जैन - "सुख मानो तो स्वर्ग हैं बस लेते आना चाहिय.." वंदना अर्गल- "अछ्छे कर्मो से ही होती पह्चान स्वर्ग की.." रीता जैन- सबसे बड़ी सौगात हैं जीवन नदा हैं जो जीवन से हारे,," कुंदन पाटिल- जीवन मेरा उपभोगतवादी कर्म मेरे नर्क के द्वार चाह मन में स्वर्ग प्राप्ति.." बीना सिंग- कभी यह सोचा भी नही था मंजर तबाही का भी होगा सोचा भी नही था .." शारदा गुप्ता- तू क्यो नही आया रे नदी का वीरा .." मनी टेगो-- "सब निकले हैं स्वर्ग की तलाश में कोई कसर नही छोडी अपने प्रयास में.." राजेश - "लोग उलझे हैं तमाम रिश्तो मे बेफिजूल खुद को प्त नही...के खुद से वास्ता क्या हैं " सुरेन्द्र सिंग राजपूत - बोलना और प्रतिक्रिया करना जरुरी है लेकिन सयम और सभ्यता का दामन.." सुनीता सक्सेना - "मेरा क्या हैं जिंदगी जीरो से शुरू हुई हो जीरो पे खत्म हो जाऊगी.." सरला मेहता - "आसा नही सफर जिन्दगी का ख्बाब जन्नत के आने लगे हैं." ममता बड़जात्या - "रोज रोज जलते है फिर भी खाक न हुय अजीब हैं कुछ ख्बाब भी राख नही हुय" मनी टेगो- सब निकले हैं स्वर्ग की तलाश मे कोई कसर नही छोडी अपने प्रयास में.. इस कार्यकम में शारदा गुप्ता,मन्जू गुप्ता मुबई , रिता जैन ,प्रभा जैन ,अचला गुप्ता ,पूनम शर्मा ,मनोरमा जोशी,सुषमा शुक्ला , वन्दना अर्गल देवास,अनुराधा विसावाडिया ,कुंदन पाटिल देवास ,सुरेखा भारती ,शोभा तिवारी,ममता बड़जात्या ,हिमानी भट्ट ,राजेश ,बीना सिंग जयपुर,सरला मेहता ,मनी टेगो,श्वेता बडजात्या,सत्यप्रका ठ ाकुर ,मानवेंद्र नारायणि माया ,मनीष तिवारी ,सरला मेहता ने वाचन किया ,कार्यक्रम का संचालन सत्य प्रकाश ठाकुर ने किया,चिन्मय श्रीवास्तव ने आभार माना, निर्देशन संकल्प ने किया।
डा अम्बेडकर जयंती पर
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 शुभसंकल्प का ऑनलाइन
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 गीत ,गजल कार्यक्रम संपन्न
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"उजाले अपनी यादो के
हमारे पास
रहने दो,ना जाने किस गली मे
                            जिंदगी  की शाम  हो जए"
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 लाक डाऊन के तले घर के अन्दर बेठे-ठाए रचनाकारो के लिय शुभसंकल्प समूह द्वारा ओनलाईन शेर,शायरी ,गीत ,गजल का कार्यक्रम संपन्न्ं हुआ विषय था "स्वर्ग नर्क" यह कार्यक्रम दोपहर 3 बजे से सरस्वती वंदना से प्रारम्भ हुआ तो देर रात तक चलता रहा।

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शुभसंकल्प समूह की निर्देशक डा सुनीता श्रीवास्तव ने बताया की इंदौर के आलावा बहार के रचनाकारो ने भी इस कार्यक्रम में गर्मजोशी से हिस्सा लिया।प्रतिभागियो में शारदा मिश्रा ने कहा - "स्वर्ग नर्क कुछ भी नही , शब्दो का मायाजाल। सुख मिल जाए स्वर्ग हैं दुख हैं नर्क समान" अचला गुप्ता ने बया किया- "स्वर्ग वही ,जिस घर में होता बुजुर्ग मात पिता का सम्मान" पूनम शर्मा ने कुछ इस तरह से बोला - "मेरी नजर मे स्वर्ग और नर्क इसी दुनिया में हैं क्योकी जो देखा नही इन आखो से.." शोभा तिवारी ने कहा- "मातभूमि तुमको नमन वंदे मातरम् देश की धडकने हैं..." अनुराधा विसावाडिया - " हो महामारी की फेलना या लम्बी बिमारी की लाचारी यही नर्क हैं...." मनोरमा जोशीने कहा- "स्वर्ग और नर्क कर्मो की है माया नगरी.." उषा गुप्ता - "स्वर्गनर्क ढूढे बंदा दोनो हाथ और आखे ऊपर करके, तेरे कर्मो पर टिका है ये.." प्रभा जैन - "सुख मानो तो स्वर्ग हैं बस लेते आना चाहिय.." वंदना अर्गल- "अछ्छे कर्मो से ही होती पह्चान स्वर्ग की.." रीता जैन- सबसे बड़ी सौगात हैं जीवन नदा हैं जो जीवन से हारे,," कुंदन पाटिल- जीवन मेरा उपभोगतवादी कर्म मेरे नर्क के द्वार चाह मन में स्वर्ग प्राप्ति.." बीना सिंग- कभी यह सोचा भी नही था मंजर तबाही का भी होगा सोचा भी नही था .." शारदा गुप्ता- तू क्यो नही आया रे नदी का वीरा .." मनी टेगो-- "सब निकले हैं स्वर्ग की तलाश में कोई कसर नही छोडी अपने प्रयास में.." राजेश - "लोग उलझे हैं तमाम रिश्तो मे बेफिजूल खुद को प्त नही...के खुद से वास्ता क्या हैं " सुरेन्द्र सिंग राजपूत - बोलना और प्रतिक्रिया करना जरुरी है लेकिन सयम और सभ्यता का दामन.." सुनीता सक्सेना - "मेरा क्या हैं जिंदगी जीरो से शुरू हुई हो जीरो पे खत्म हो जाऊगी.." सरला मेहता - "आसा नही सफर जिन्दगी का ख्बाब जन्नत के आने लगे हैं." ममता बड़जात्या - "रोज रोज जलते है फिर भी खाक न हुय अजीब हैं कुछ ख्बाब भी राख नही हुय" मनी टेगो- सब निकले हैं स्वर्ग की तलाश मे कोई कसर नही छोडी अपने प्रयास में.. इस कार्यकम में शारदा गुप्ता,मन्जू गुप्ता मुबई , रिता जैन ,प्रभा जैन ,अचला गुप्ता ,पूनम शर्मा ,मनोरमा जोशी,सुषमा शुक्ला , वन्दना अर्गल देवास,अनुराधा विसावाडिया ,कुंदन पाटिल देवास ,सुरेखा भारती ,शोभा तिवारी,ममता बड़जात्या ,हिमानी भट्ट ,राजेश ,बीना सिंग जयपुर,सरला मेहता ,मनी टेगो,श्वेता बडजात्या,सत्यप्रका ठ ाकुर ,मानवेंद्र नारायणि माया ,मनीष तिवारी ,सरला मेहता ने वाचन किया ,कार्यक्रम का संचालन सत्य प्रकाश ठाकुर ने किया,चिन्मय श्रीवास्तव ने आभार माना, निर्देशन संकल्प ने किया।













_ लाक डाऊन के तले घर के अन्दर बेठे-ठाए रचनाकारो के लिय शुभसंकल्प समूह द्वारा ओनलाईन शेर,शायरी ,गीत ,गजल का कार्यक्रम संपन्न्ं हुआ विषय था "स्वर्ग नर्क" यह कार्यक्रम दोपहर 3 बजे से सरस्वती वंदना से प्रारम्भ हुआ तो देर रात तक चलता रहा। शुभसंकल्प समूह की निर्देशक डा सुनीता श्रीवास्तव ने बताया की इंदौर के आलावा बहार के रचनाकारो ने भी इस कार्यक्रम में गर्मजोशी से हिस्सा लिया।प्रतिभागियो में शारदा मिश्रा ने कहा - "स्वर्ग नर्क कुछ भी नही , शब्दो का मायाजाल। सुख मिल जाए स्वर्ग हैं दुख हैं नर्क समान" अचला गुप्ता ने बया किया- "स्वर्ग वही ,जिस घर में होता बुजुर्ग मात पिता का सम्मान" पूनम शर्मा ने कुछ इस तरह से बोला - "मेरी नजर मे स्वर्ग और नर्क इसी दुनिया में हैं क्योकी जो देखा नही इन आखो से.." शोभा तिवारी ने कहा- "मातभूमि तुमको नमन वंदे मातरम् देश की धडकने हैं..." अनुराधा विसावाडिया - " हो महामारी की फेलना या लम्बी बिमारी की लाचारी यही नर्क हैं...." मनोरमा जोशीने कहा- "स्वर्ग और नर्क कर्मो की है माया नगरी.." उषा गुप्ता - "स्वर्गनर्क ढूढे बंदा दोनो हाथ और आखे ऊपर करके, तेरे कर्मो पर टिका है ये.." प्रभा जैन - "सुख मानो तो स्वर्ग हैं बस लेते आना चाहिय.." वंदना अर्गल- "अछ्छे कर्मो से ही होती पह्चान स्वर्ग की.." रीता जैन- सबसे बड़ी सौगात हैं जीवन नदा हैं जो जीवन से हारे,," कुंदन पाटिल- जीवन मेरा उपभोगतवादी कर्म मेरे नर्क के द्वार चाह मन में स्वर्ग प्राप्ति.." बीना सिंग- कभी यह सोचा भी नही था मंजर तबाही का भी होगा सोचा भी नही था .." शारदा गुप्ता- तू क्यो नही आया रे नदी का वीरा .." मनी टेगो-- "सब निकले हैं स्वर्ग की तलाश में कोई कसर नही छोडी अपने प्रयास में.." राजेश - "लोग उलझे हैं तमाम रिश्तो मे बेफिजूल खुद को प्त नही...के खुद से वास्ता क्या हैं " सुरेन्द्र सिंग राजपूत - बोलना और प्रतिक्रिया करना जरुरी है लेकिन सयम और सभ्यता का दामन.." सुनीता सक्सेना - "मेरा क्या हैं जिंदगी जीरो से शुरू हुई हो जीरो पे खत्म हो जाऊगी.." सरला मेहता - "आसा नही सफर जिन्दगी का ख्बाब जन्नत के आने लगे हैं." ममता बड़जात्या - "रोज रोज जलते है फिर भी खाक न हुय अजीब हैं कुछ ख्बाब भी राख नही हुय" मनी टेगो- सब निकले हैं स्वर्ग की तलाश मे कोई कसर नही छोडी अपने प्रयास में.. इस कार्यकम में शारदा गुप्ता,मन्जू गुप्ता मुबई , रिता जैन ,प्रभा जैन ,अचला गुप्ता ,पूनम शर्मा ,मनोरमा जोशी,सुषमा शुक्ला , वन्दना अर्गल देवास,अनुराधा विसावाडिया ,कुंदन पाटिल देवास ,सुरेखा भारती ,शोभा तिवारी,ममता बड़जात्या ,हिमानी भट्ट ,राजेश ,बीना सिंग जयपुर,सरला मेहता ,मनी टेगो,श्वेता बडजात्या,सत्यप्रका ठ ाकुर ,मानवेंद्र नारायणि माया ,मनीष तिवारी ,सरला मेहता ने वाचन किया ,कार्यक्रम का संचालन सत्य प्रकाश ठाकुर ने किया,चिन्मय श्रीवास्तव ने आभार माना, निर्देशन संकल्प ने किया।

Monday, April 13, 2020

बड़ी बहन

*पूजनीय दीदी* हर बार माँ यह शब्द जरूर बोलती. "वो बचपन से ही बड़ी नटखट स्वभाव की है, पर तुम तो बड़ी हो - छोटी बाई - भैय्या को तुम्हे ही संभालना है". इसी उलाहने को सुनते हुए, और बड़े ही प्यार से छोटे बहन भाइयों को अपने नाज़ुक हांथों से संभालते हुए देखते ही देखते हम सब कब बड़े हो गए, पता ही नहीं चला. छोटे से गाँव में पढ़ाई की कोई सुविधा न होने के कारण दादी ने शहर में पढ़ने की सलाह दे डाली. पिताजी से कहा, "देख बाबू, बच्चों को पढ़ाना आज के समय में बहुत जरूरी है, लड़कियों को अगर पढ़ाएगा नहीं तो अच्छे घर में कैसे ब्याही जाएँगी?" पिताजी को भी अम्मा की बातें जम गयी और तैयारी शुरू हो गयी शहर जाने की. गाँव से रोड तक बैलगाड़ी और फिर बस से आगे का सफर. कितना सुहाना लग रहा था अपने छोटे भाई बहनों के साथ शहर का वो सफर. शहर के बारे में केवल इतना ही मालुम था कि बहुत अच्छी जगह होती है और वहां बहुत सारे अच्छे अच्छे लोग मिलते हैं. बस स्टैंड से तांगे में बैठ कर आगे चले और तांगे की सवारी एक बड़े से मकान के आगे रुक गयी. देखा, सामने दरवाजे पर चाचाजी और चाचीजी खड़े हो कर हमारा इंतजार कर रहे थे. छोटी भाई बहन को गोदी में ले कर घर के अंदर आ गए. कहाँ गाँव की वो खुली खुली हवा, बाग़ बगीचा, कुँआ बावड़ी, वो बरगद का पेड़, जिसकी जटाओं से लटक कर सारे बच्चे खेलते रहते थे और कहाँ यह शहर का छोटा सा एक कमरे का घर, जिसमे भरा था, कोयले की सिगड़ी का धुआं और घुटन? सहमें हुए सभी भाई बहन एक दुसरे को आस भरी नज़रों से देख रहे थे. अगले दिन सुबह सवेरे ही पिताजी ने सभी बच्चों को नहला धुला कर साफ़ कपडे पहना दिए तो लगा जैसे आज कोई त्यौहार है, पर यह क्या? वो तो स्कूल ले कर आ गए. दादी के कहे हुए शब्द कानों में गूंजने लगे "मोडी स्कूल जाएगी तो पता चलेगा, यहाँ तो खूब मौज कर ले, जब पढ़ना पडेगा तब मालुम पड़ेगा" ऐसा लग रहा था कि अब वो समय आ गया. पिताजी ने एक साथ तीनो भाई बहनो का दाखिला करवा दिया और शुरू हो गयी पढाई। स्कूल में बहनजी तो एक ही थी और सर ज्यादा थे. स्कूल में मास्टरों की डाँट और घर में चाची का अनुशासन, घर में पढ़ाई भी करो और छोटे भाई बहनों का ख्याल भी रखो. हर बात में सुनना की तू तो बड़ी है और बड़ी जैसी ही रहो. गाँव में भी नन्नू मन्नू इनको बड़ी बाई ही कहते थे. देखते ही देखते समय भी इतनी जल्दी बदला, पढ़ाई अभी चल ही रही थी फिर अम्मा ने पिताजी के कान में बात डाल दी कि "बाबू अपनी बाई बड़ी हो गई है, अब जल्दी से इसका ब्याव करना है. और भी छोटी चार मोड़ियाँ हैं, उन सब के लाने भी तो सोचना है". पिताजी भी सोचने लगे की अम्मा सही तो कह रही हैं, उन्हें अम्मा की बात जँच गयी. उस रात पिताजी रात भर सोये नहीं और पूरी रात करवट रहे. मैंने पूछा "पिताजी क्या हुआ? आप चिंतित दिख रहे हैं." लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. पिताजी ने हमे कभी महसूस नहीं होने दिया की हम पांच लडकियां हैं. जितना भाइयों को स्नेह करते थे, उससे कहीं ज्यादा ही हम बहनो का ध्यान रखते थे. एक अच्छे मित्र की तरह हर बात में सलाह लेना और मन की बात सहजता से सुनना। अपनी कहना घर बाहर की बातों के अलावा घर गृहस्थी और व्यवहार की बातें समझाते। हमने उन्हें कभी क्रोध करते हुए नहीं देखा, हमेशा उन्हें धीर वीर गंभीर ही देखा था. सभी का ध्यान रखते और अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए देखा है. बड़ी से बड़ी समस्यों को चुटकियों में सुलझाना उनके बाएं हाथ का खेल था. धार्मिक प्रवर्ती, वेदों के ज्ञाता, दानवीर, औऱ धर्मवीर भी रहे और इसीलिए वे हमारे आदर्श रहे. काफी ढूँढ़ते ढूँढ़ते आखिर एक रिश्ता उन्हें अपनी पसंद का मिल गया, और बड़ी धूमधाम से शादी की तैयारी हुई. विदाई की रस्मे चल रही थी, सभी की आँखों से अश्रुधारा बाह रही थी. जिज्जी, जिन्होंने सभी को अपनी ममता के धागे से एक सूत्र में पिरो रखा था, आज हम सब से दूर जा रही थी. अब कौन हमारे ड्रेस के कपडे सियेगा? कौन खाना बना कर खिलायेगा? अंदर बाहर का काम जिज्जी ने ऐसा संभाला था. रोना रुक नहीं रहा था. पिताजी ने नववधू के रूप में सजी हुई जिज्जी के सर पर हाथ फेरा और कहा, बेटी तुम बड़ी हो, वहां परिवार की जिम्मेदारी अच्छे से संभालना ससुराल में पहुँचते ही सभी घर में खुश थे. सुन्दर सुशिल पढ़ी लिखी बहु जो घर में आयी थी. जीजाजी भी डॉक्टर होते हुए भी अनेकों प्रतिभाओं के धनी थे. कहते है ना, प्रतिभायें अपनी पहचान स्वयं बना लेती है. उनका हौसला और इच्छाशक्ति उन्हें शीर्ष शिखर तक ले जाने का कार्य करते हैं और कई तरह की संघर्षों और अड़चनों के बावजूद सफलता प्राप्त करते हैं तो उन्हें समाज के लिए एक उदहारण बन जाते है. साधारण से दिखने वाले व्यक्ति जब असाधारण सफलता पाते है तो कोई सोच भी नहीं सकता की अपने जीवन कितना खटे हैं. कितना संघर्ष किया है. उनके संघर्षों की बुनियाद के पीछे कितनी मेहनत है. अपने हौसलों के दम पर वे निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं. प्रयास करते हैं और इस तरह एक दिन वे सफलता के शिखर को छू ही लेते हैं. ऐसे ही स्नेही और श्रद्धेय हमारे जीजाजी रहे हैं. जीवन में अगर संघर्ष न हो, चुनौतियाँ ना हो तो मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वग्रहीत विकास

नहीं हो पाता। जिज्जी ने भी अपनी बराबरी से साथ दिया. परिस्थितियों से झूझते हुए कठिनाइयों से लड़ते हुए यदि हिम्मत न हारी जाये तो सफलता रुपी मंजिल जरूर मिलतीं है. जिज्जी आपने चुनौतियों से लड़ते हुए संगर्ष करते हुए अपना जीवन विकसित किया है. इसीलिए तो कहते हैं संघर्ष जीवन को निखारते हैं, संवारते हैं और तराशते हैं. और गढ़ कर ऐसा बना देते है जिसकी प्रशंसा करते हुए जबान थकती नहीं. संघर्ष हमे जीवन का अनुभव करवाते हैं. सतत सक्रिय बनाते हैं. और हमे जीना सिखाते हैं. संघर्ष का दामन थाम कर न केवल हम आगे बढ़ते हैं बल्कि जीवन जीने की सही अंदाज को, आनंद को अनुभव कर पाते है. परिवार की बड़ी माँ बहन सहेली हर रूप में छोटे बड़ों को संभाला, हर दम अपने चुलबाले हंसमुख स्वाभाव से मन मोहित करने वाली जिज्जी अंदर से कितने गहरे हृदय वाली हैं. जिस तरह नदी के प्रवाह के सतत संपर्क में रहने से पत्थर के आकार में धीरे धीरे परिवर्तन हो जाता है और वह कभी इतनी सुन्दर आकृति प्राप्त कर लेता है की शालिग्राम के रूप वह पूजनीय हो जाता है. कुछ ऐसा ही व्यक्तित्व जीवन भर के संघर्ष और उतार-चढ़ाव के फल स्वरूप आप का निखरा है. जैसे समुद्री जहाजों को प्रकाश स्तम्भ राह दिखाता है, वैसा ही आप हम सब के जीवन में एक प्रकाशस्तम्भ या दिशा-दर्शक का प्रतिरूप है. आदरणीय जिज्जी, आप हम सब की पूजनीय है. वंदनीय है, और आज आपके जन्मदिवस पर यही कामना है कि प्रथम पूज्य श्री महागणपति , परबह्म परमेश्वर विष्णु , देवाधिदेव महादेव , जगत्जननी माँ भगवती , महामाया महालक्ष्मी , वीणापाणी माँ सरस्वती की अद्भुत कृपा आप पर सदैव बनी रहे, आप सुख समृद्धिवान हों , कीर्तिवान हों , यशवान हों , आयुष्मान हों , स्वस्थ्य रहें , आपके जीवन का हर पल खुशियों से भरपूर रहे , जीवन के प्रत्येक क्षण आप प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे , आपकी कीर्ति की पताका निरंतर फहराती रहे आपकी सदैव जय हो .......... स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्र भक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु..!!! जीवेम शरदः शतम ! बृयाम शरदः शतम! शृणुयाम शरदः शतम! नंदाम शरदः शतम! मोदाम शरदः शतम! कुर्वन्नेव कर्माणि जीजीविशेम शतम समा!!!" भावार्थ ;- "आप सदैव आनंद से, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें | विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें | ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे| आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे| आप शतायुषी हो,

श्रीमती सुनीता  सक्सेनस

Sunday, April 12, 2020

घोर आतंक कैसा ये आतंक मचा , असहनीय आत्मघाती ।


 हर दिशा से रूदन , की आवाज आती । जर्जरित अवसाद से , प्रत्येक छाती ।


कामनाओं की पिपासा , हैं सताती , यह दशा दयनीय मानव , को रूलाती


। हम बनायें सुखद पथ , नव जिन्दगी का , शांन्ति पा जाये मनुज , उस राह चलकर । गूँज जायेगी गिरा , संदेश बनकर ,


थम जायेगा कहर , संदेश सुनकर ।

* मनोरमा जोशी ।🙏🏻
महात्मा बुध की अर्धांगिनी का नाम ,, यशोधरा था!! महावीर स्वामी की अर्धांगिनी का नाम,, यशोदा था!! नरेंद्र मोदी की

अर्धांगिनी का नाम,, जशोदाबेन है !! क्या यह संजोग है,, या चमत्कार!! क्या कलयुग में आया है कोई अवतार!!!


 अब तो मच्छर भी , इंसानों को काटने से पहले, घबरा जाते हैं!! बेचारे


बेमौत भूखे ही,, मर जाते हैं!! इंसानों को दया आती है,, तब वह मच्छरों को, अपनी नेगेटिव रिपोर्ट, मेडिकल की दिखाते


हैं!! तब कहीं जाकर के मच्छर,, इंसानों का खून पी पाते है अब सावन


कभी,, मुस्कुरा कर नहीं बरसेगा!! पतझड़ भी ,, आने के लिए तरसेंगा!! मोहब्बत के फूल अब,, मुरझाने लगे हैं !! आग

दिलों में लगाते,, और गुनगुनाने लगे हैं!!

*सत्यप्रकाश  ठाकुर









अभिशप्त जीवन..... शायद गरीबी से बड़ा, कोई अभिशाप नही..... वह गरीब भिखारन, पैबन्दों से अपने शरीर को,


निरंतर ढांकने का, असफल प्रयास करती... डर जाती वह सर्द रातों में, भेड़ियों की आंखों में, चमक देख ... अधनंगे बदन

को, कहां कैसे छुपाए..., वो तो पसर ही जाता, रात के सन्नाटों में, गली- मुहल्ले चौराहों पर, प्रशिक्षित शिकारी की तरह,


भेड़िए अतएव करते, वार पर वार उस वक्त तक, जब तक बुझ न जाती, उसके देह की आग... वो फिर से खड़ी हो


उठती, अपनी गरीबी के तमाशे पर, दो आँसू बहाकर, अपने बिखरे शरीर को, समेटने लगती जैसे, कुछ हुआ ही ना हो...


*प्रतिभा श्रीवास्तव अंश मौलिक स्वरचित भोपाल मध्यप्रदेश
अभिशप्त जीवन..... शायद गरीबी से बड़ा, कोई अभिशाप नही..... वह गरीब भिखारन, पैबन्दों से अपने शरीर को,

निरंतर ढांकने का, असफल प्रयास करती... डर जाती वह सर्द रातों में, भेड़ियों की आंखों में, चमक देख ... अधनंगे बदन

 को, कहां कैसे छुपाए..., वो तो पसर ही जाता, रात के सन्नाटों में, गली- मुहल्ले चौराहों पर, प्रशिक्षित शिकारी की तरह,


भेड़िए अतएव करते, वार पर वार उस वक्त तक, जब तक बुझ न जाती, उसके देह की आग... वो फिर से खड़ी हो


उठती, अपनी गरीबी के तमाशे पर, दो आँसू बहाकर, अपने बिखरे शरीर को, समेटने लगती जैसे, कुछ हुआ ही ना हो...


*प्रतिभा श्रीवास्तव अंश मौलिक स्वरचित भोपाल मध्यप्रदेश
मीरा जैन उज्जैन(मध्यप्रदेश)

 कर्त्तव्य शंभू पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ विनती करने लगा- ‘साहब जी! मेरी ट्रक खराब हो गई थी इसलिए समय

पर मैं अपने शहर नहीं पहुंच पाया। प्लीज जाने दीजिए साहब जी।’

 पुलिस वाले की कड़कदार आवाज गूंजी- ‘साहब जी के बच्चे!

एक बार कहने पर तुझे समझ में नहीं आ रहा कि आगे नहीं जा सकता।

‘कोरोना’ की वजह से सीमाएं सील कर दी गई है।कर्फ्यू की सी स्थिति है।

 १ इंच भी गाड़ी आगे बढ़ाई तो एक घुमाकर दूंगा,समझे सब समझ आ जाएगा।

’ पुलिसवाला तो फटकार लगाकर चला गया,किंतु शंभू की भूख से कुलबुलाती आँतें…सारे ढाबे व रेस्टोरेंट बंद…पुलिस

का खौफ,रात को १० बजे अब वह जाए तो कहां जाए,साथ में क्लीनर वह भी भूखा।

 अब क्या होगा ? यही सोच आँखें नम होने लगी,तभी पुलिस वाले को बाइक पर अपनी ओर आता देख शंभू की घिग्गी
बंध गई। फिर कोई नई मुसीबत…।

 शंभू की शंका सच निकली।

बाइक उसके समीप आकर ही रुकी।

पुलिसवाला उतरा,डिक्की खोली और उसमें से अपना टिफिन निकाल शंभू की ओर यह कहते हुए बढ़ा दिया- ‘लो इसे

खा लेना,मैं घर जाकर खा लूंगा।

’ शंभू की आँखों से आँसूओं की अविरल धारा बह निकली।

 वह पुलिस वाले को नमन कर इतना ही कह पाया- ‘साहब जी! देशभक्त फरिश्ते हैं आप। ‘ इस पर पुलिस वाले ने कहा-

‘वह मेरा ऑफिशियल कर्त्तव्य था,और यह मेरा व्यक्तिगत कर्त्तव्य ही नहीं,सामाजिक दायित्व भी है।’
😢भूख और गरीबी😢स्वरचित,,प्रभा जैन🙏🏻

 नङ्गे भूखे ,पिचका पेट,नाक बहती बच्चे जब जब

ये हड्डी पसली,चौराहों पर हाथ पसारे


दिखते दिल रोता,मन मे आता,क्यों देता रोल प्रभु ऐसे क्या गुनाह उनका,जो भूखे ही पत्थर पर सोते एक और ऊंची इमारतों में,भूख नहीं फिर भी ठूँस ठूँस खाते,या फेंकते हैं और ये बेचारे भूखे पेट

,दरदर भटकते हैं उन धनवानों को नमन कर प्रभा का कहना,इंसानियत हो तो आपमें जो शान में बर्बाद कर रहे तुम,रोज

सिर्फ एक भूखे को भरपेट खिला देना दिल छोटा होतो काम देकर भी रोजी का अवसर दे,रोटी दिला देना।

🙏🏻 प्रभु स्वरूप प्रसाद चढ़ाके, मिलेगी दुआएं दिलसे ये जन्म तो सफल होगा,अगलाभी इन भूखे गरीबसे🙏🏻,,,🙏🏻

*प्रभा जैन इंदौर
गरीब का दिल कमला बहुत ही गरीब थी |

वह तथा उसका पति मजदूरी करते थे |

 घर बनाने का काम करते थे |

ईंट, गारा उठा उठा कर सुबह से शाम हो जाती थी |
 घर में चार बच्चे इंतजार करते रहते थे |
आज वे दोनों किसी के घर मजदूरी करने आए, देखा कि उस घर में मां नहीं है |

बहुत ही प्रेम से पूछा, तुम्हारी मां कहां है? बच्चों ने कहा -वो अब इस दुनिया में नहीं है |

 यह सुनकर कमला बहुत ही दुखी हो गई |
 और कहा -बेटा मैं खाना बना दूं कया? तुम सब भूखे होगे |

 यह सुनकर उन बच्चों को अपनी मां याद आ गई |
 बात खाना बनाने की नहींं पर उस औरत के प्रेम पूर्ण दुलार की थी |
 यह बात आज भी प्रासंगिक है |फटे कपडे. ,बिखरे बाल, कल का पता नहीं |परंतु दिल ममता से भरा | प्रेम के दो बोल जादू कर सकते हैं |यह उस महिला ने सिखा दिया | एैसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को सीतल करे आपहू सीतल होय |


 द्वारा -आराधना विसावाडिया इंदौर |
। शुभ संकल्प 12 अप्रैल 2020 वार - रविवार शीर्षक - भूख और गरीबी भूख तो भूख होती है ना गरीबी देखती है ना


अमीरी सभी को लगती है भूख तो भूख होती है ।


 हाँ,यह अलग बात है कि अमीर शानदार टेबल पर बैठ मजे ले ले कर खाता है


 वही गरीब बेचारा सुबह से शाम तक कड़ी धूप में पसीना बहाकर घर लौटता है कुछ रुपयों के साथ जिससे तेल आटा


नमक आदि खरीदा जाता है गिली लकड़ियाँ सुलगा के कच्चा -पका खाना बनाया जाता है तब उन्हें रोटी नसीब होती है

 भूख तो भूख होती है साहब गरीब अमीर सबको लगती है।

*स्वरचित उषा गुप्ता इंदौर
*सच्ची खुशी* यूं तो गरीबी और भूख का चोली दामन का साथ है,लेकिन इस देश की बदकिस्मती ये ये किसी को नजर नहीं आती है आज कितने ही किसान भूख ओर गरीबी से बेहाल होकर शहर आने पर मजबूर होते हैं एक किसान भूख ओर गरीबी से तंग आकर गांव से शहर की ओर पलायन करता है,यहां भी समुचित सुविधा ना मिल पाने की स्थिति में वो एक जगह चौकीदारी का काम पकड़ लेता है,आखिर में उसे अपने परिवार का पेट तो भरना है , जैसे तैसे उसका काम चल रहा था वो और उसका परिवार मजदूरी का काम उसी जगह पर करने लगा, आज के जो हालत है उनके चलते ना उसको मजदूरी मिल रही है,ओर जो नगरनिगम से को मदद मिलनी चाहिए वो भी नहीं मिल पा रही है, मेरे बेटे का इसी माह जन्मदिन था,उसने कहा मम्मी आप जो मेरे जन्मदिन पर गिफ्ट देने वाली हो वो मेरे को नहीं चाहिए आप वो पैसे चौकीदार भैया को दे दें,उनका पूरा परिवार का पेट भरेगा महीने भर...मेरे पास सभी तो कुछ है,उसकी संवेदना देखकर मेरा दिल भर आया,मैने कहा मै वैसे ही उसकी मदद कर देती हूं, उसने कहा मम्मी आप मेरी बात मान लीजिए,आप ज्यादा मात्रा में खाना बनायेगा ,मैने उसके कहे अनुसार अच्छे पकवान ओर पैसे उसको दे दिए,बेटे ने चौकीदार के घर जाकर जब ये सब सामान दिया तो उन लोगों की आंखें खुशी से भर आई, घर आकर उसने मेरे को सब बात बताई और कहने लगा मम्मी आप उनकी मदद तो कर देती पर मेरे को उन सभी की खुशी देखने में जो आंनद की प्राप्ति हुई है वो नहीं हो पाती....ये जन्मदिन मेरे को हमेशा याद रहेगा..... बच्चे की संवेनशीलता देखकर दिल गदगद हो गया मेरा....

*पूनम शर्मा
एक बार अपनी एक प्रिय सहेली के घर जाना हुआ।

यूं तो वे बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की है और दयालु भी।

अपने घर काम करने वालों से उनका व्यवहार भी ठीक दिखाई देता है।


जब मैं पहुंची तब देखा ,उनकी सहायिका चटाई पर बैठी खाना खा रही थी।

 मुझे देखते ही उन्होंने गर्वित शब्दों में बताया ,बेचारी गरीब है सुबह से खाना नही खाई थी।फिर धीरे से मुझे बताने लगीं

,वो क्या है न कि फ्रिज में 3 दिन पुराना आटा गूंथा हुआ रखा था।

मैंने सोचा फेंकने से अच्छा इसी को रोटी बना कर खिला देती हूं।बेचारी खुश भी हो जाएगी और दुआ भी देगी। और मैं

हतप्रभ सोच रही थी ,कि गरीब कौन है ,वो सहायिका या वो स्वयं ....

* अचला गुप्ता इंदौर
वाह ससुर जी बहु जुही आफिस से आ सासु माँ आभा जी से चहकती हुई कहती है," माँ आपकी भाकरवड़ी सबको


बहुत

पसंद आई।आपके हाथों में तो कमाल है।

 " कमरदर्द से कराहती आभा रात के खाने के लिए सब्जियां बनाने में जुट जाती है।

वो तो भला हो रनिया का कि दोनों वक्त रोटियां सेक देती है। बहु भी सीखना चाहती है।परंतु जब सब कुछ तैयार ही

जाता है तो कौन मेहनत कर शेखर जी से पत्नी की हालत देखी नहीं जाती।

एक दिन खाने की मेज़ पर ऐलान कर देते हैं, " कल से पूरा खाना रनिया ही बनाएगी। " अगले दिन बहु को खाना


बिलकुल रास नहीं आता और वह कहती है," मम्मी के हाथ बनी सब्ज़ियों का तो जवाब नहीं।


" शेखर बहु को समझाइश देने का मौका नहीं चूकते, " अरे बेटा, छुट्टी वाले दिनों में सीख लो अपनी मम्मी से और रनिया


को भी सिखादो।मम्मी को अब आराम की जरूरत है।" जुही सकुचाते हुए बोली, " जी पापा।"

*

Friday, April 10, 2020

 🙏पूज्य बाबूजी, सादर नमन ।


 बाबूजी हम सब यहाँ सकुशल हैं और हमारी कुशलता में ही तुम्हारा सुकून है, यह जानती हूँ मैं ।

 अभी यहाँ पर कोरोना नामक महामारी ने तांडव मचा कर रखा है 21 दिन के लाॅकडाउन में सब घर में बंद है ।

 कभी-कभी एक अनजाना- सा भय लगता है , जाने क्या हो? सभी लोग मानसिक अवसाद से घिरे हुए हैं।

आज तुम हमारे साथ होते , तो कितनी हिम्मत देते। एक वट वृक्ष की तरह अपनी बड़ी-बड़ी शाखाओं से हम पर स्नेह की

छाया करते । तुम तो जानते हो, मैं बहुत जल्दी डर जाती हूँ । तुम्हारा लाड़ कितनी हिम्मत देता था मुझे ।

याद है न भूकंप के समय कितना डर गई थी मैं ।

सब मेरा मजाक उड़ाते थे, पर तुम मेरी मनःस्थिति को समझ कर कितना प्यार से सहलाते थे मुझे।

आज तुम्हारी कमी को सबसे ज्यादा शायद मैं ही महसूस कर रही हूँ ।

 भैया की जब से बायपास सर्जरी हुई है, तब से चिंता बनी रहती है ; और फिर इस खतरनाक महामारी के समय तो चिंता स्वाभाविक है न !

 तुम्हारे रहते शायद हम बेफिक्र रहते । बाबूजी तुम हमेशा मुझसे यही कहते थे न !

कि दो-चार दिन चिट्ठी लिख दिया करो ; समाचार मिलते रहते हैं । पर क्या करूँ आजकल चिट्ठी लिखना छूट ही गया है।

एक पुरानी अधूरी चिट्ठी आज मेरे हाथ लगी जिसे मैने शुरू तो किया था, पूरा नहीं कर पाई थी ।

 बहुत अफसोस होता है कि तुम्हें, चिट्ठी की प्रतीक्षा ही कराती रही ।

आज बहुत कुछ लिखने का मन हो रहा बहुत सारी बातें तुम्हें बताना चाहती हूँ ; पर आँखें डबडबा रही हैं, शब्द धुंधले पड़ रहे हैं, ठीक से दिख नहीं रहा ।

 तुम्हारी बहुत याद आती है, बाबूजी ! अगली चिट्ठी जल्दी लिखूँगी ।

 पर बाबूजी इस चिट्ठी को मैं किस पते पर भेजूँ , तुम्हारा पता तो --- आशा है तुम्हारी आत्मा मेरी इस भावना को समझ लेगी, क्योंकि कहते हैं न कि मृत्यु के बाद भी माता-पिता की आत्मा अपने बच्चों के आसपास ही होती है----।

 होती है न बाबूजी ! -


*तुम्हारी लाड़ली वंदना ।

बचपन जीने का नाम है बेटी

डा  शारदा गुप्ता

“ बचपन जीने का नाम है बेटी “ 

 कितनी रातें जागी थी मैं तुझे सुलाने में कितने सपने बुने थे मैंने लोरियाँ गाने में वो तेरा 

मुँह में अँगूठा लेना और आँचल को मेरे पकड़ कर खिंचना सोई ममता जगाती है बेटी ।

बचपन जीने का ——- वो तेरा आँगन में कूदना फाँदना दो चोटी बाँध कर स्कूल जाना अल्हड़ पण से मेरे गले बाँहें 

डालना और शिकायतों के पुलिंदे से मेरी झोली भरना सोए अरमा जगाती है बेटी। 

बचपन—— यौवन को दहलीज़ पर खड़ा देख अपनों से आँखे चुराना तेरा सखियों को हमराज़ बनाना तेरा और छोटी 


बहन को आँखे दिखाना तेरा मन के सागर को आंदोलित करती है बेटी। बचपन जीने ———

*डा  शारदा गुप्ता
समय का सदुपयोग किया , बच्चों संग पारिवारिक आनंद लिया , बालापन के खेल पुराने , बच्चों का मन बहलाने , अष्टा चंगा खेला । भूख लगी फिर बीच बीच मे खायें मूमफली छोड़ और, आम केला । अति आनंद अनुभूति हुयी , खूब लगाआनंदित पल का मेला ।
गौरंया । तुम फिर से लौट आ जाओ गौरंया , तुम बिन दिल का आंगन सूना है , महका तो चहका दो गौरंया । रोज सुबह तुम चू चू करती, मीठे गीतों से मन बहलाती, सबेरा होने का एहसास कराती , फुदक फुदक कर आती थी । मुझे याद है माँ सकोरे , दाना पानी रखती थी , तुम संग सखी के झुम झुम कर खाती थी । आंगन मे पेड़ जाम का, छत की मुंडेर का कोना सूना सूना , रासायनिक खाद और कांकरेट के घर ने , तुम्हारा आशियाना तोड़ा , तभी से तुम रुठ कर चली गयीं , फिर से आशियानें को बसायगें , तुम फिर से लौट आओ गौरंया ,लौट आऔ । मनोरमा जोशी ।
नारी जीवन। सहे जुल्म जिसने सदियों से अब तक, उनको उबारो यह जी चाहता है । करते रहे आदिशक्ति की पूजा मगर मातृशक्ति कुण्ढित रही है। हुआ मान जिनका नहीं भूलकर भी, वही आज व्याकुल विवश हो रही है । तड़फती तिरस्कृत है आज ममता, उसे अपनाने को जी चाहता है । दुर्गा लक्ष्मी अहिल्या सीता सावित्री मीरा अनसुईया गार्गी मैयत्री सारंगा पन्ना न जाने कोन सी हैऐसी ललना, करें संरक्षण दें उच्च शिक्षा दिलाने प्रतिष्ठा को जी चाहता है । पाया जन्म जिसनें शैशव मे खेले, भूल अहसास उसका ये क्या कर रहे हो ? पलती हुई गर्भ मे है जो मातृ शक्ति, शिक्षित कृतघ्न बन क्यों वध कर रहे हो ? लुप्त हो जायगी मानव जाति इससे, यह एहसास कराने को , जी चाहता है सहे जुल्म जिसने सदियों से अब तक उनको उबारो ये जी चाहता है । .... 🙏🏻
फागुन की चौपाल होली उत्सव प्रीत का , यह रंगों का बाजार , निशदिन फागुन प्रीत , के नये पढ़ाये पाठ । अखियों ही अखियों , हुऐं रंगों के संकेत , रह रह कर महके रात भर कस्तूरी के खेत । प्रीत महावर की तरह , इसके न्यारे है रंग , बतियाती पायल हँसे , हँसे ऐड़ियाँ संग । रंगों वाले आईने , भूलें सभी गुमान , जो भीगें वो जानता , फागुन की मुस्कान । दोहे ठुमरी सखियां , फाग अभंग ख्याल , मोसम करता रतजगा , फागुन की चौपाल । मनोरमा जोशी 118/बीएच विजयनगर ।🙏🏻
शीर्षक मन की पीर । विधा कविता । आज मे किसको सुनाऊँ , व्यथित मन की पीर । नयन अपलक जागते हैं, बहुरि भरते नीर । वेदना के शूल चुभते , मन पटल पर भाव भरते , कोन जो आकुल हर्दय को, आ बँधावे धीर ,बहुरि भरते नीर। याद मुझको हैं सताती , विरह की ज्वाला जलाती , कब मिलन कैसे मिलन हो , श्वास श्वास अधीर , दूर बसते प्रिय हमारे, मन पखेरु जारे जारे , सरस प्रिय के बिना , अब एक पल गंभीर , बहुरि भरते नीर । मनोरमा जोशी ।
🙏🏻मोबाइल🙏🏻,
,स्वरचित प्रभा जैन इंदौर,,, मोबाइल जो है एक ऐसा खिलौना,सभी के मन को लगता सलोना जाने कहीं भी तुम चलोना, मैं भी संग ,साथी बन रहुना नवेली दुल्हन सा मैं संग रहुना,हाथों ही हाथों में साथ चलुना, जब भी चाहो तुम गीत संगीत,फोटू और संगे साथी का मिलना,बटन दबातेही मिल जाये चल चित्र सा चलना वो मेरी बैंक भी है,आफिस भी है,और सहेली दोस्ती परिवारके एल्बम भी है। एकपल भी वो रूठ जाए,टूट जाये तो,निकल जाए जान मेरी ऐसे मेरे दिल का टुकड़ा ,सब का मुखड़ा मेरी जान को ,,मैं करती हूं बेहद प्यार,,,,बेहद प्यार🥰🌹😘😍
भगवान (kundumeghna2003@gmail.com)

 देव न इतने दूर रहो तुम, मेरे तन का आसन ले लो । यूं जग को अपनाओगे तुम, मेरे मन का आंगन ले लो ..। मन का दीप जलाया मैने, आशाओं के फूल चढ़ाए । कर सोलह श्रृंगार सजी मैं , पर, प्रियतम तुम इधर न आए। मेरे अंजन तुम्हें बुलाते , इन नयनों का सावन ले लो । सांस में याद लिए जो फिरती , मेरे गीत तुम्हीं को अर्पित । जो कुछ मेरी झोली मे है , सब कुछ तुमको किया समर्पित। तेरा दिया तुम्हें लौटाऊं , मेरा मौन समर्पण ले लो । नयनों मे मोहक रूप बसाए, लौ से जलने मे ही सुख है । धूप - छांह की आंख मिचौली , तुमको पाने मे ही सुख है । आंच बहुत सी सह ली मैंने , अब, मेरे मन का कंचन ले लो
। मेघना रॉय वाराणसी।

Thursday, April 9, 2020

खौफ भाग दौड़ की जिंदगी में ठहराव सा आ गया, ऐसा लग रहा जैसे नया युग आ गया। गली चौबारा शांत सा दिलों पे तूफ़ान सा आ गया, रह रहकर इंसान भय पे अपने पर आ गया। न किसी की निंदा न कोई पर चिंता, दूरियां बना रहा मानव घर को बनाकर पिंजरा। सोना, चांदी, धन कोई काम नहीं आ रहा , थोड़े में गुजारा करने की हुनर सा आ रहा। अनहोनी आशंका से घिरता हुआ मन , अब जीवन पाने कि आस में मर रहा है इंसान। खूबसूरत जिंदगी के सपनों के झरोंखे ने प्रकृति ने भी क्या खूब नजारे दिखाए है। मित्रा शर्मा महू
*बेवफाई* विधा : गीत आवाज़ देकर मुझे मत बुलाओ। में किसी और कि अब हो चुकी हूँ। पहले में तुम पर बहुत मरती थी। पर तुम किसी और पर तब मरते थे।। मेरी सांसो में तब तुम बसते थे। पर तुम्हारी सांसो में तब कोई और बसता था। पर अब में किसी और कि सांसो में बसती हूँ। तुम्हे मिली है तुम्हरी, बेफाई की सजा ये। तभी तो छोड़ दिया है, तुम्हारी मेहबूबा ने।। आवाज़ देकर मुझे मत बुलाओ.....।। जब में एक जिंदा, लास बन गई हूँ। तब तुम भी एक, लास बनके आये हो। अब दोनों की जिंदगी, में मोहब्बत कहाँ है। हमने ने तो नारी धर्म, का निर्वाह कर दिया है। माता पिता की खातिर, अपने को अर्पण कर दिया है।। आवाज़ देकर मुझे मत बुलाओ.......।। जय जिनेन्द्र देव की संजय जैन (मुम्बई) 09/04/2020
प्रेम, एसा चाहिए। उपजे, चहु और। बाकि कुछ ना.मिले। तो भी, सुखी रहे संसार। एक ही पलता रहा, मन मे यह बीज। नेकी के फूल खिले, यही रहे चीज। पानी, अमृत धार है, रखना इसे संभाल। चाहे, लाज, का हो या पीने का ताल। ममता का मन भर गया, इस लोक जगत मे। शायद तब से ही आया, विष विषेला अहित मे। समझो तो समझ मति, ना समझो तो अल्प मति। बाकि समझ के समझा दो, बन जाती है। विशुद्ध मति सुना सुना सा जग लगे, कह ना सके मन की बात। भौर भ ई कोयल बोली, फिर भी सकुन की ना हुई जीत। । सदगुणी, संस्कार को लेकर जग मे चलता जो। लंका मे विभीषण जैसा दिखता जग मे वो। सीख वहां के दीजिए, जिसको यह प्यारी आना वरना मत माथा खपाना, उन पर ना वारी जाना। लंका मे रावण रहा, नेक लेकर कर्म। भूल से, कर बैठा पाप, हुआ वहां अधर्म। सीता तो सीता रही, चली ना ऊसकी एक। वरना वह.भी साथ मे रहती नही अनेक।। सौतन सौतन क्यो करे, यह रही यहां की रीत। संख्या नर की कम थी, लडकियो से प्रीत। बाजीगर तू आज बन जाए, थोडा करे मनन। पर मन तेरा भागता, मृग सा करे विचरण। बैठे बैठे देख रहा होता तमाशा यार। बुद्धिमान सब चुप हुए, मुरख करता वार। जाकी रही भावना जैसी ,वैसा हुआ संसार। छोडी पुरानी रीति नीति, रोता अब यहां नर। आओ आज मनाते है ,मेरा अवतरण दिवस। शायद फिर मिले ना मिले, कब निकले सांस श्रीमती ममता वैरागी तिरला धार

✨✨✨✨✨✨ जरूरी नही तुम नद हमी से मिलो पर सोच समझ के किसी से मिलो जिस को दूरियों की कद्र हो नजदीक से भी उसी से मिलो अंधेरे की कदर हो जाएगी तुम्हे फुर्सत में कभी रोशनी से मिलो वजूद ना खो दो समंदर से मिलके नदी हो तो बस नदी से मिलो बराबरी में कद नापेंगे हम , पहले आसमाँ से उतर के जमीं से मिलो अतीत से फिर कभी मिलाएंगे तुम्हे खेर अभी सार की शायरी से मिलो

 *~गौरव गर्गसार*
*चुप्पी* अक्सर चूप-चूप रहा करतीं थीं, अपनी दिल की बातें कभी भी ना कहतीं थीं! शर्म और लाज के परदों में हमैशा छुप कर रहतीं थीं, कहतीं थीं कहनें का हक़ नहीं था उसे! शादी से पहले उसके पिता, और शादी के बाद पति ही मुख्य निर्णय करता थें! शादी के पहले का पता नहीं, मगर पिताजी को अक्सर अपने दिल की बातें कह दिया करतीं थीं माँ! वो मेरी पाठशाला से पीकनीक जाने की बातें चली, मेरा बहुत मन था जाने का मगर ना कह दिया माँ ने! मैं भी रूठी रहीं सप्ताह भर उससे, सभी कार्य करतीं थीं मगर बात नहीं करतीं थीं! पिताजी ने सबको मनाया और मुझे भेज दिया था! अब तक मैं माँ से नाराज़ थीं, मगर वो कुछ नहीं बोलीं! मैं जाने को तैयार हो गई, तब भी कुछ नहीं बोलीं! बाद में वापस आई तब तोहफ़ा तो था, मगर दिया नहीं मैने उसे! सबकुछ जानती थीं वह, फिर भी कुछ नहीं बोलीं वो! फिर जन्मदिन की पार्टी करनी थीं सहेलियों संग, तब भी ना कह दिया उसने! मगर फिर पिताजी ने सबको मनाया, और मुझे मेरी खुशी मिल गई! बाहर जाकर पढ़ने जाने की बातें चली, तब भी लड़की हैं क्या करेगी बाहर जाकर ऐसा कहकर ना कह दिया! हर बार ना कहतीं रहीं, मगर सदा अपनी ना में भी हां छुपाकर बैठी रहीं! मेरे सामने ना कहतीं, पूरे परिवार के सामने भी ना कहतीं थीं! अकेले में पिताजी को, अटुट विश्वास का दिलासा दें हां करवाती रहीं! लोगों ने सवाल उठाएं कैसी माँ हैं, सब सहती रहीं कभी सच्चाई ज़ाहिर न होने दिया! मेरी नफ़रत सहतीं रहीं, परिवार की मर्यादा का पालन करतीं रहीं! पिताजी के मान को बढ़ाती रहीं, अपने हर ना में हां छुपाती रहीं!

 ©दीपशीखा अग्रवाल!
आज अंजनी नंदन राम दुलारे हम सब के प्यारे वीर बंजरंग बलि की जंयती पर सभी को मंगल कामनाएं । बजरंग बली का मेने अपने जीवन मे साक्षात चमत्कार देखा ,एक बार बस का एक्सीडेंट हुआ उसमें मेरे मामाजी जो हनुमानजी के परम भक्त थे उनका पाठ किये बिना वो पानी भी ग्रहण नहीं करते थे । पूरी बस मे सबको भयंकर चोट लगी बहुत लोग मारे गये,आशचर्य की एक मात्र वह थे बाल भी बांका नहीं हुआ ,सबने कहा आप भाग्यशाली है ,तब वह बोले मेरे समक्ष मेरे हनुमानजी खडे़ थे ,उन्हीं ने मेरी रक्षा की , तभी से मेरे मन मे प्रेरणा जागृत हुईं भक्ति मे अनंत शक्ति है । हे बजरंग बली मेरी मातृभूमि और समूचे विश्व को मुक्ति दिलाये ,विश्व को महाशक्ति बनाये ,संकट मिटाये । काज किये बड़ देवन के तुम वीर महाप्रभु देखि बिचारों कोन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसे नहीं, जात है टारो, बेगि हरो हनुमान महा प्रभु, जो संकट आयो है हमारो । यही प्रार्थना हम सब करते है ।🙏🏻🌹
लालच कहानी

एक कुत्ता एक रोटी लेकर जारहा था। आगे चला तो एक नदी आई किनारे किनारे वो जा रहा था । तभी उसको अपनी परछाई पानी मे दिखाई दी , उसे लगा एक और कुत्ता रोटी लेकर जा रहा है। उसके मन मे विचार आया की अगर मे ये रोटी उससे छीन लू तो रोटी हो जायेगी यही सोच कर उसने जैसे ही मुँह खोला उसकी रोटी पानी मे गिर गई ।उसने लालच किया तो उसकी एक रोटी भी चली गई इसलिए लालच नहीं करना चाहिए।लालच बहुत बुरा होता है, आध्यानागर उम्र 9 वर्ष
" खुश रहने का राज" ये बात उन दिनों की है जब मेरे पति का तबादला इंदौर से जबलपुर हो गया था,यहां में बेहद संजे सवरे अपने घर से किराए के मकान में शिफ्ट हो गई थी क्योंकि सरकारी आवास मिलने में थोड़ा समय लगने वाला था,एक तो नई जगह और मन के मुताबिक मकान (वहां के लोग उसको बंगला कहते थे) न मिलने के कारण में तनाव में रहती थी,वैसे भी मै परिवर्तन को आसानी से अपना नहीं पाती हूं,ये मेरी बहुत खराब बात है, तभी मैंने घर का काम करने के लिए एक बाई को रखा ,वो बहुत खुश मिजाज थी, मै सोचती थी घर में इसके सब ठीक ठाक होगा ये कुछ अन्य आमदनी हो जाए इसीलिए काम करती होगी,वो मेरे से अक्सर पुरानी पत्रिका और समाचार पत्र के जाया करती थी, एक दिन उत्सुकता वश मैंने उससे पूछा तुम्हारे पति क्या करते हैं तो उसने बताया की वो ५-६ साल से लकवा ग्रस्त होने के कारण बिस्तर पर हैं , में आपके घर आने से पहले उनको नाश्ता,दवा और मालिश कर के आती हूं,मेरे दो छोटे बच्चे हैं जो सरकारी स्कूल में जाते हैं, पुरानी पत्रिका में अपने पति के लिए ही लेकर जाती हूं ताकि उनका दिल लगा रहे, ये सब सुनकर मेरे को दुःख और आश्चर्य हुआ फिर तुम इतना खुश कैसे रह लेती हो भला?? तब वह बोली मैडम ये जीवन भी एक बोझ की तरह होता है,जब भी और जितना भी हम परेशानी वाली बातों को याद करते रहगें तो दुःख का बोझ उतना ज्यादा भारी होता जाता है, और हम जीवन से बहुत ज्यादा उम्मीद बांध लेते हैं जब वो पूरी नहीं हो पाती हैं तो हम दुखी हो जाते हैं ,मैने जीवन से ज्यादा उम्मीदें नहीं बांधी है जो भगवान् करेंगे वो अच्छा ही होगा, यही मेरे खुश रहने का कारण है ... मै मौन हो गई थी उसकी बातें सुनकर ,उसने सच ही तो कहा था.
कविता
 चीन की उमंग देख दंग जग संग में। कोरोना की जंग देख पूरा जग संग में।। शत्रु अदृश्य है लड़ रहे जंग हैं। मन में उमंग है कोरोना भी दंग है।। शंखनाद सिटी से करतल थाली से। कोरोना बीमारी से रण है महामारी से।। 6 तारीख को शंखनाद दीप ज्वलंत थे। जमाती भारतवक्ष पर सबसे बड़े कलंक थे।। कलंकी कलंक लिए भारत को कलंकी दिए। दिल्ली में कोरोना लिए भारत को कलंकित किए।। दिल्ली में मौलाना साद मस्जिद मरघटों के काज। जमाती बाँटते कोरोना दाग इनके बैकपुट पै लगाओ आग।। भारतीय कोरोना से जंग करते मस्जिद में कोरोना श्वान साद पलते। भारतीयता का दम्भ भरते भारत को कलंकित करते।। देशविद्रोही मौलाना को चौराहे पर टांग दो। सीस में छिद्र कर सूप पाक भेज दो।। ये नही कहता मैं सभी मुस्लिम दागदार। ये भी कह देता हूँ मैं ऐसे भी हैं वफादार।। भारत जिन पर गर्व करता गर्व का गुमान करता। शान से अभिमान करता सभी का कल्याण करता।। चीन है संवेदनहीन व्याकुल हुई सब मानव मीन। अब भी न सुधरा चीन विश्व होगा मानवहीन।। जीवन हुआ अस्त व्यस्त चीन फिर भी है मस्त। पूरा विश्व त्रासदी से त्रस्त चीनी मस्ती में मस्त।। सत्य नारायण स्वरचित कविता

हनुमान जयंती पर विशेष----

 बात उन दिनों की है, शायद जब हमें ज्ञान भी न आया होगा...... मेरी माँ हनुमान जी को अपना भाई मान लिया था।वो अपने जीवन के सुख दुःख की वार्ता हनुमान जी से किया करती.... और न जाने कबसे राखी और भाई दूज पर थाल उनके भी सजने लगे।सबसे पहले थाल उनकी ही सजती ,पूरा परिवार हम चारों भाई-बहन व पिताजी वहां इकट्ठे होते माँ तिलक लगाती मैं शंख बजाती भाई घंटा बजाता.... मानो लगता हनुमान जी साक्षात आसन पर विराजमान हो गए हो।कोई भी मुश्किल आए माँ कहती... अपने हनुमान मामा जी से कह दो वो सही कर देंगें ,और तब से ये क्रम आज भी जारी है. और आप को विश्वास नहीं होगा संकटमोचन वो संकट हर लेते हैं। हम वाराणसी से हैं तो हमारे यहाँ आज के दिन हनुमत ध्वजा यात्रा प्रभातफेरी सा निकलती है जिसमें नगर के सभी पुरुष ,स्त्री भाग लेते हैं.... येपरिक्रमा संकटमोचन मंदिर मे आकर समाप्त होती है.।आज भी हमारे परिवार मे बच्चों के दिवस का प्रारंभ हनुमान चालीसा से ही होता है। आपको जान के आश्चर्य होगा कि हनुमानजी अमर है और ऐसी मान्यता है कि आज भी राम चरित मानस का अखण्ड पाठ जहाँ भी होता है हनुमानजी वहाँ अवश्य उपस्थित होते हैं। जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीश तिहुँ लोक उजागर. जय श्री राम

मेघना रौय
*हनुमाना जयंती पर विशेष-* बात उन दिनों की है, जब गर्मियों की छुट्टी में माँ हमको व्यस्त रखने के अलावा धर्म और

संस्कार की शिक्षा भी देना चाहतीं थीं ।

चूंकि छुट्टियों में हम बच्चे सुबह देर से सोकर उठते और बहुत आराम तलब हो जाते ।इसलिए माँ ने एक युक्ति अपनाई -

रोज सुबह दस बजे सुन्दर काण्ड का पाठ शुरू किया और सबको स्नान करके उपस्थित रहने की शर्त रख दी।

 एक दो दिन तो हमने आनाकानी की पर माँ के मुख से सुंदर काण्ड के सस्वर मधुर पाठ ने रुचि बढ़ा दी, यूँ भी हनुमान

जी के अशोक वाटिका वाले करतब बड़े लुभावन हैं । बस क्या था हम चारों बहनें भी दस बजे नहा धोकर तैयार हो कर

पाठ में शामिल होने लगीं । एक घंटे तक पाठ चलता । दो महीने की छुट्टी में रोज सुन्दर काण्ड करने से एक तो घर का

वातावरण बहुत सात्विक हो गया दूसरा, हम सबको सुन्दर काण्ड कंठस्थ हो गया । तीसरा और महत्वपूर्ण उद्देश्य , हम

बच्चों ने समय का सदुपयोग और नियोजन सीख लिया । 11 बजे पाठ समाप्त होने के बाद एक घंटे में भोजन तैयार हो

 जाता, और 12 बजे सब एक साथ भोजन करने बैठते , जिसका अपना अलग मजा था। सुन्दर काण्ड पाठ के दौरान

रोज एक आश्चर्यजनक बात होती थी, हमारे देव स्थान के पास खुला आंगन था ज्यों ही पाठ शुरू करने की तैयारी पूरी

होती, एक काला कुत्ता खिड़की के पास आकर बैठ जाता और एक घंटे, जब तक पाठ चलता वह वहीं बैठा रहता आरती

होने के बाद चुपचाप चला जाता। ऐसा सतत दो महीने तक चला । पता नहीं किस रूप में आकर वह रोज पाठ सुनने

चला आता था । हमें भी ऐसा लगा जैसे हनुमान जी का पाठ करना सार्थक हुआ । शायद हनुमान जी के नाम श्रवण से

उस उस मूक प्राणी श्वान के भी रोग और पीड़ा दूर हो गए हों । क्योंकि *नासे रोग हरैं सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत

बीरा ।।*

*वंदना  दुबे 
समूह सदस्यों को नमस्कार एवं हनुमान जयंती की शुभकामनाएं🙏🏻🙏🏻💐 "संकट मोचन हनुमान जी और बचपन के

 एहसास'" विषय पर मेरे बचपन की याद👇🏻 शाम को हम सब भी बहन अपने दोस्तों और सहेलियों के साथ मोहल्ले की

सड़क पर खेलते थे महू से आने वाली रेल से पापा 6:45 पर ऑफिस से घर आते थे। उनका आने का वक़्त होता,रेल की
सीटी सुनाई देती और हम सब घर की और भागते ।हाथ-पाँव धोकर सब बैठ जाते,पापा भी ये सब करके हनुमानजी को

दीपक लगते और प्रतिदिन दादी सबको प्रार्थना करवाती थी।जिसमे गणपति स्तोत्र, सरस्वती मंत्र,गुरु आराधना, शिव

महिम्नः स्तोत्र,रामरक्षास्तोत्र, नर्मदाष्टक,हनुमान चालीसा,जैन धर्म की प्रार्थना मेरी भावनाएँ और भजन सिखाते थे।जब

डर लगे तो हनुमानजी को याद करना ।हनुमान चालीसा बोलना जिससे डर भाग जाता है इस तरह भगवान में आस्था के

बीज संस्कारों के माध्यम से बोए गए थे।कोई काम नहीं हो पा रहा हो जो अपनी शक्ति से अधिक हो तो "जय राम लला

जय जनक लली जय जय लक्ष्मण बजरंगबली।" बोलो तुरन्त होगा- ऐसा दादी बोलती थी।दादी की किसी सहेली ने कहा

-"हनुमान चालीसा का पाठ महिलायें और कन्याएँ नही करती ।"दादी ने सहेली से कहा- "कौन कन्याएँ ?मेरे लिए सब

समान ही हैं औऱ कलयुग में भगवान के नाम स्मरण से ही मुक्ति होगी ये हम पढ़ चुके है ये नही लिखा कि कन्या और

महिला को मुक्ति का अधिकार नहीं और हनुमानजी ने भी नहीं कहा कि मेरा नाम मत लेना। बल्कि हनुमान चालीसा में

लिखा है कि-जो शत बार पाठ कर कोई छूटहि बंदी माह सुख होई।"दादी की सहेली इतनी प्रभावित हुई कि जब हम

हनुमान चालीसा का पाठ करते तो वो भी आकर याद करने लगी और कंठस्थ किया।बचपन मे इस घटना से मैं इतनी

प्रभावित हुई कि अब तक कई बार एक बैठक में 100 पाठ कर चुकी हुँ।वर्तमान की सबसे बड़ी त्रासदी कोरेना के बंधन

से हमारे देश को मुक्त कराने के संकल्प से भी 100 पाठ मंगलवार को कर दिए हैं। हनुमान जी से आस्था और विश्वास के
साथ प्रार्थना है कि सबकी रक्षा करे और सबको भयमुक्त करे।🙏🏻🙏🏻🙏🏻💐

* माधुरी व्यास"नवपमा"💐
आज अंजनी नंदन राम दुलारे हम सब के प्यारे वीर बंजरंग बलि की जंयती पर सभी को मंगल कामनाएं ।

 बजरंग बली का मेने अपने जीवन मे साक्षात चमत्कार देखा ,एक बार बस का एक्सीडेंट हुआ उसमें मेरे मामाजी जो हनुमानजी के परम भक्त थे उनका पाठ किये बिना वो पानी भी ग्रहण नहीं करते थे ।

पूरी बस मे सबको भयंकर चोट लगी बहुत लोग मारे गये,आशचर्य की एक मात्र वह थे बाल भी बांका नहीं हुआ ,सबने

कहा आप भाग्यशाली है ,तब वह बोले मेरे समक्ष मेरे हनुमानजी खडे़ थे ,उन्हीं ने मेरी रक्षा की , तभी से मेरे मन मे प्रेरणा

जागृत हुईं भक्ति मे अनंत शक्ति है ।

 हे बजरंग बली मेरी मातृभूमि और समूचे विश्व को मुक्ति दिलाये ,विश्व को महाशक्ति बनाये ,संकट मिटाये ।

 काज किये बड़ देवन के तुम वीर महाप्रभु देखि बिचारों कोन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसे नहीं, जात है टारो, बेगि


हरो हनुमान महा प्रभु, जो संकट आयो है हमारो ।

यही प्रार्थना हम सब करते है ।🙏🏻🌹

*मनोरमा जोशी 
जीवन में मैं बहुत संकट में पड़ गई थी मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था 

तब मैंने हनुमान की की भक्ति की लगातार रोज साल हर सुन्दर कांड का पाठ किया 


और सारी परिस्थितियां मेरे अनुकूल हो गई आज भी मेरा नित्य का पाठ हनुमान चालीसा से ही प्रारंभ होता है।


 "जय हनुमान ज्ञान गुण सागर" सभी को हनुमान जयंती की मंगल शुभकामनाएं🚩🚩🚩🙏

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