Sunday, May 12, 2019

लघुकथा केले,तीर्थ यात्रा


कृष्णा श्रीवास्तव
रुपल ने मधुकर को आवाज लगाते हुए कहा अ टूर तीर्थ जी सुनते हो जरा फल की दुकान से बीस रूपय के केले लै लेना थोड़े जादा पके हुए हौ तो भी चलेगा मधुकर ने कहा अच्छा
मधुकर ने केले खरीद कर रुपल को दे दिये
घर पहुचने पर कुछ समय पश्चात मधुकर ने रुपल से कहा केल कहाँ रख दिये वडी भूख लगी है
रुपल वह केले तो मैंने गाय को खिला दिये वे चारी वडी भूखी लग रही थी मधुकर ने गुस्से से रुपल को देखा
अगले ही दिन मधुकर को पता चला कि कमपनी ने मधुकर का पँमोशन हो गया है और कमपनी ने उसका बैतन बढा कर एक लाख बीस हजार रुपये कर दिया है
मधुकर ने जब यह बात रुपल को बताई तो रुपल आत्मग्लानि से भर गया

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लघुकथा
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तीर्थ यात्रा
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रमेश ने मां को आवाज लगाई मां मैं ने तुम्हारी तीर्थ यात्रा का सारा इतंजाम कर दिया है
आट़ो वाले को भी समझा दिया है वह तुम्हे ट्रेन में बिठा देगा मैं तुम्हारी बहू को छोडऩे उसके मायके जा रहा हूं पडोस मे खेल रही शुभी ने देखा वह भागती हुई आई और चारू से बोली दादीमाँ कहीं जा रही हो किया चारू ने बताया हां विटिया तीर्थ यात्रा पर जा रही हूं तभी शुभी भागती हुई घर के अनदर गई और दहीचीनी दादी को खिलाती हुई बोली दादी किसी अच्छे काम के लिए जाने से पहले दही चीनी खा कर जाना चाहिए यह सुनकर दादी की आखौ मैं आसूं और ओढो पर ढेर सारे आशीर्वाद थे ।
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कृष्णा श्रीवास्तव
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