r
बच्पन की अठखेलियाँ करती शरारते ।मे तीसरी कक्षा मे पढ़ती थी उन दिनों मे ओर मेरी सहेली ओटले पर बेठकर गप्पे लड़ाते थे ।
पडो़स मे दो मुसलमान परिवार रहता था वह शाम को जब बुरखा ओढ़ कर निकलती तब हम पीछे से उनका बुरखा खीच कर गली मे छिप जाते ,संयोग वश एक रोज मे भागने लगी मेरा पेर फिसला और मे गिर गई ।
सामने से डाःसाःने देख लिया जब मेघर पर गई तब माँ ने पूछा क्या हुआ केसे गिरी तब मे कुछ बोलती उससे पहले मेरी सहेली ने माँ को सच बता दिया और पट्टी कराने ले गये तब
डासाः ने कहा पहले पट्टी फिर धूलम पट्टी
मनोरमा जोशी

No comments:
Post a Comment