Sunday, March 31, 2019

Abhi abhi
अर्चना श्रीवास्तव
"रुई का गद्दा बेच कर
मैंने इक दरी खरीद ली,
ख्वाहिशों को कुछ कम किया मैंने
और ख़ुशी खरीद ली ।

सबने ख़रीदा सोना
मैने इक सुई खरीद ली,
सपनो को बुनने जितनी
डोरी ख़रीद ली ।

मेरी एक खवाहिश मुझसे
मेरे दोस्त ने खरीद ली,
फिर उसकी हंसी से मैंने
अपनी कुछ और ख़ुशी खरीद ली ।

इस ज़माने से सौदा कर
एक ज़िन्दगी खरीद ली,
दिनों को बेचा और
शामें खरीद ली ।

शौक-ए-ज़िन्दगी कमतर से
और कुछ कम किये,
फ़िर सस्ते में ही
"सुकून-ए-ज़िंदगी" खरीद ली ।
मुस्कुराया करो
जब भी करो बात
मुस्कुराया करो

जैसे भी रहो,
खिलखिलाया करो

जो भी हो दर्द,
सह जाया  करो

ज्यादा हो दर्द तो
अपनों से कह जाया करो

जीवन एक नदी है,
तैरते जाया करो

ऊँच नीच होगी राह में,
बढ़ते जाया करो

अपनापन यहाँ महसूस हो तो
चले आया करो ।

बहुत सुंदर है यह संसार,
सुंदर और बनाया करो

इसलिए,जब भी करो बात यारों
😊मुस्कुराया करो"

सभी दोस्तों को समर्पित 🌹💐
गुड़ी पडवां
गुड़ी पडवां पर हर साल सजाती हो एक गुडीया
जो घर की मुंडेर पर रख दी जाती है अच्छे कपड़े लत्ते पहनाकर बढ़िया
क्यों न इस नए साल में हम सजाये एक ऐसी गुड़िया
जो सन्देश देती रहे नवचेतन्मयी
बतिया
जो शिक्षित हो शिक्षा का संदेश दे
स्वस्थ रहकर ऐसे संसार की रचनाकार बने
जंहा खुशालीभर हँसता मुस्कुराता जहांन हो
वो गुड़ी स्वावलम्बन की दुनिया मे अपने पैर जमाकर
खड़ी रहे आत्म विश्वासु बनकर
वो आत्म विश्वासु के साथ संस्कारों की बेल थामे
नित ऊंचाइयों को छूती रहे
जिसमे संस्कृति की महक के
रंग बिरंगे फूल महके
सखियों,क्यों न हम भी जुट जाएं,इस हिन्दू नव वर्ष गुड़ी पडवां के शुभ दिन
सजायें सच्ची मुच्ची की नव चेतनामयी रानी गुड़ी
भारत देश बढ़ेगा,राष्ट्र फलेगा,
यही भावना लिए,आओ बनाएं हर और से सशक्त ,चेतन्मयी गुड़ी,
जो कभी न झुके झूठ और फरेब की दुनिया मे
खड़ी रहे हर मोर्चे पर सत्य के लिए सदा अडिग।
गुड़ी पडवां पर होगा सार्थक गुड़ी बनाना, गुड़ी सजाना
जब हर बिटिया,बन्नो ,हो जाएगी सशक्त कड़ी।
 👭🚶‍♀💃🙆🧚‍♀🧙‍♀👩‍🎨👩‍⚖👩‍🌾गुड़ी पडवां पर अनन्त अनन्त शुभ कामनाएँ और बधाईयां🌹🌹🙏🙏
स्व रचित:प्रभा जैन।6 अप्रैल 2019

Saturday, March 30, 2019

फागुन की चौपाल 

होली उत्सव प्रीत का ,
 यह रंगों  का बाजार ,
निशदिन फागुन प्रीत  ,
के नये पढ़ाये  पाठ ।
अखियों ही अखियों ,
हुऐं रंगों के संकेत  ,
रह रह कर महके
रात भर कस्तूरी के खेत ।
 प्रीत महावर की तरह ,
 इसके न्यारे  है रंग ,
बतियाती पायल हँसे ,
हँसे  ऐड़ियाँ  संग ।
 रंगों  वाले  आईने ,
 भूलें  सभी  गुमान  ,
जो भीगें वो  जानता ,
फागुन  की  मुस्कान ।
दोहे  ठुमरी  सखियां ,
फाग  अभंग  ख्याल ,
मोसम  करता रतजगा ,
फागुन की चौपाल  ।
   
   मनोरमा जोशी 118/बीएच विजयनगर ।🙏🏻
श्री दशा माता व्रत विशेष
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
व्रत महत्व
🔸🔹🔸
चैत्र कृष्ण की दशमी के दिन महिलाएं दशामाता का व्रत करती हैं। दशमाता व्रत मुख्यरूप से सुहागिन महिलायें घर की दशा ठीक होने के लिए किया जाता है।
माना जाता है कि जब मनुष्य की दशा ठीक होती है तब उसके सभी  कार्य अनुकूल होते हैं, किंतु जब यह प्रतिकूल होती है तब मनुष्य को बहुत परेशानी होती इसी परेशानियों से निजात पाने के लिए इस व्रत को करने की मान्यता है।

दशा माता पूजन विधि:
🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸
इसमें दीवार पर स्वास्तिक बनाये एवं मेहंदी अथवा सिंदूर से वही दस बिंदिया अंगुली से बना दें। पूजा सामग्री में रोली, मौली , सुपारी, चावल, दीप, नैवेद्य, धुप, अगरबत्ती लें। इस दिन महिलाएं कच्चे सूत का डोरा लाकर डोरे की कहानी कहती हैं।
इसके लिये सूत का बना श्वेत धागा लें और उसमे गांठ लगा लें तत्पश्चात उसे हल्दी में रंग लें। इस धागे को दशा माता की बेल कहते है। इसकी पूजा भी साथ में ही करें ।
और डोरे में 10 गांठ लगाकर गले में बांध लें। इसे फिर पुरे साल कभी न उतारे। अगले वर्ष जब पुनः पूजा करें तो इसे उतारकर नए धागे की पूजा करके धारण करें।

महिलाए पीपल की पूजा कर 10 बार पीपल की परिक्रमा करते हुए उस पर सूत लपेटती हैं नियमानुसार दशा माता की पूजा  एवं अर्चना करने से दशा माता की कृपा प्राप्त होती है। घर में सुख शांति व समृद्धि आती है। इस दिन कच्चे सूत का 10 तार का डोरा से भी पीपल की पूजा करती हैं।

सुहागिन महिलाएं इस डोरे की पूजा के बाद पूजनस्थल पर नल-दमयंती की कथा सुनती हैं। इसके बाद महिलाएं अपने घरों पर हल्दी और कुमकुम के छापे लगाती हैं। 
इस दिन में एक ही बार अन्न ग्रहण करती हैं। जिसमें एक ही प्रकार के अन्न के प्रयोग का विधान है।  भोजन में नमक का प्रयोग पूर्ण रूप से वर्जित माना जाता है। इस दिन प्रयोग किए जाने वाले अन्न में गेहूं का प्रयोग विशेष तौर पर किया जाता है। इस दिन घर की साफ-सफाई के लिए झाडू खरीदने का विधान है। दशमाता व्रत जीवनभर किया जाता है। इस व्रत का उद्यापन नहीं किया जाता है। 

पूजा के लिए शुभ समय
🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸
इस दिन 14:04 से रात्रि 03:22 तक भद्रा और दशमी तिथि एक साथ समाप्त हो रहे है जिस के कारण सभी भक्तों में इस व्रत की पूजा को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। लेकिन यहाँ भद्रा का वास पाताल लोक में होने के कारण यह शुभ फल देने वाली रहेगी अतः इस अवधि में भी पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा।

शुभ चौघड़िया  :- सुबह 7:39 से 09:09 तक शुभ का चौघड़िया इसके बाद 12:09 से 4:39 तक क्रमशः चर, लाभ और अमृत के चौघड़िए में भी पूजन करना शुभ रहेगा।

दशा माता व्रत कथा
🔸🔸🔹🔹🔸🔸
दशामाता व्रत की प्रामाणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा नल और दमयंती रानी सुखपूर्वक राज्य करते थे। उनके दो पुत्र थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी और संपन्न थी। एक दिन की बात है कि उस दिन होली दसा थी। एक ब्राह्मणी राजमहल में आई और रानी से कहा- दशा का डोरा ले लो। बीच में दासी बोली- हां रानी साहिबा, आज के दिन सभी सुहागिन महिलाएं दशा माता की पूजन और व्रत करती हैं तथा इस डोरे की पूजा करके गले में बांधती हैं जिससे अपने घर में सुख-समृद्धि आती है। अत: रानी ने ब्राह्मणी से डोरा ले लिया और विधि अनुसार पूजन करके गले में बांध दिया।
कुछ दिनों के बाद राजा नल ने दमयंती के गले में डोरा बंधा हुआ देखा। राजा ने पूछा- इतने सोने के गहने पहनने के बाद भी आपने यह डोरा क्यों पहना? रानी कुछ कहती, इसके पहले ही राजा ने डोरे को तोड़कर जमीन पर फेंक दिया। रानी ने उस डोरे को जमीन से उठा लिया और राजा से कहा- यह तो दशामाता का डोरा था, आपने उनका अपमान करके अच्छा नहीं किया।

जब रात्रि में राजा सो रहे थे, तब दशामाता स्वप्न में बुढ़िया के रूप में आई और राजा से कहा- हे राजा, तेरी अच्छी दशा जा रही है और बुरी दशा आ रही है। तूने मेरा अपमान करने अच्छा नहीं किया। ऐसा कहकर बुढ़िया (दशा माता) अंतर्ध्यान हो गई।
अब जैसे-तैसे दिन बीतते गए, वैसे-वैसे कुछ ही दिनों में राजा के ठाठ-बाट, हाथी-घोड़े, लाव-लश्कर, धन-धान्य, सुख-शांति सब कुछ नष्ट होने लगे। अब तो भूखे मरने का समय तक आ गया। एक दिन राजा ने दमयंती से कहा- तुम अपने दोनों बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाओ। रानी ने कहा- मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। जिस प्रकार आप रहेंगे, उसी प्रकार मैं भी आपके साथ रहूंगी। तब राजा ने कहा- अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में चलें। वहां जो भी काम मिल जाएगा, वही काम कर लेंगे। इस प्रकार नल-दमयंती अपने देश को छोड़कर चल दिए।
चलते-चलते रास्ते में भील राजा का महल दिखाई दिया। वहां राजा ने अपने दोनों बच्चों को अमानत के तौर पर छोड़ दिया। आगे चले तो रास्ते में राजा के मित्र का गांव आया। राजा ने रानी से कहा- चलो, हमारे मित्र के घर चलें। मित्र के घर पहुंचने पर उनका खूब आदर-सत्कार हुआ और पकवान बनाकर भोजन कराया। मित्र ने अपने शयन कक्ष में सुलाया। उसी कमरे में मोर की आकृति की खूंटी पर मित्र की पत्नी का हीरों जड़ा कीमती हार टंगा था। मध्यरात्रि में रानी की नींद खुली तो उन्होंने देखा कि वह बेजान खूंटी हार को निगल रही है। यह देखकर रानी ने तुरंत राजा को जगाकर दिखाया और दोनों ने विचार किया कि सुबह होने पर मित्र के पूछने पर क्या जवाब देंगे? अत: यहां से इसी समय चले जाना चाहिए। राजा-रानी दोनों रात्रि को ही वहां से चल दिए।
सुबह होने पर मित्र की पत्नी ने खूंटी पर अपना हार देखा। हार वहां नहीं था। तब उसने अपने पति से कहा- तुम्हारे मित्र कैसे हैं, जो मेरा हार चुराकर रात्रि में ही भाग गए हैं। मित्र ने अपनी पत्नी को समझाया कि मेरा मित्र कदापि ऐसा नहीं कर सकता, धीरज रखो, कृपया उसे चोर मत कहो।
आगे चलने पर राजा नल की बहन का गांव आया। राजा ने बहन के घर खबर पहुंचाई कि तुम्हारे भाई-भौजाई आए हुए हैं। खबर देने वाले से बहन ने पूछा- उनके हाल-चाल कैसे हैं? वह बोला- दोनों अकेले हैं, पैदल ही आए हैं तथा वे दुखी हाल में हैं। इतनी बात सुनकर बहन थाली में कांदा-रोटी रखकर भैया-भाभी से मिलने आई। राजा ने तो अपने हिस्से का खा लिया, परंतु रानी ने जमीन में गाड़ दिया।
चलते-चलते एक नदी मिली। राजा ने नदी में से मछलियां निकालकर रानी से कहा- तुम इन मछलियों को भुंजो, मैं गांव में से परोसा लेकर आता हूं। गांव का नगर सेठ सभी लोगों को भोजन करा रहा था। राजा गांव में गया और परोसा लेकर वहां से चला तो रास्ते में चील ने झपट्टा मारा तो सारा भोजन नीचे गिर गया। राजा ने सोचा कि रानी विचार करेगी कि राजा तो भोजन करके आ गया और मेरे लिए कुछ भी नहीं लाया। उधर रानी मछलियां भूंजने लगीं तो दुर्भाग्य से सभी मछलियां जीवित होकर नदी में चली गईं। रानी उदास होकर सोचने लगी कि राजा पूछेंगे और सोचेंगे कि सारी मछलियां खुद खा गईं। जब राजा आए तो मन ही मन समझ गए और वहां से आगे चल दिए।
चलते-चलते रानी के मायके का गांव आया। राजा ने कहा- तुम अपने मायके चली जाओ, वहां दासी का कोई भी काम कर लेना। मैं इसी गांव में कहीं नौकर हो जाऊंगा। इस प्रकार रानी महल में दासी का काम करने लगी और राजा तेली के घाने पर काम करने लगा। दोनों को काम करते बहुत दिन हो गए। जब होली दसा का दिन आया, तब सभी रानियों ने सिर धोकर स्नान किया। दासी ने भी स्नान किया। दासी ने रानियों का सिर गूंथा तो राजमाता ने कहा- मैं भी तेरा सिर गूंथ दूं। ऐसा कहकर राजमाता जब दासी का सिर गूंथ ही रही थी, तब उन्होंने दासी के सिर में पद्म देखा। यह देखकर राजमाता की आंखें भर आईं और उनकी आंखों से आंसू की बूंदें गिरीं। आंसू जब दासी की पीठ पर गिरे तो दासी ने पूछा- आप क्यों रो रही हैं? राजमाता ने कहा- तेरे जैसी मेरी भी बेटी है जिसके सिर में भी पद्म था, तेरे सिर में भी पद्म है। यह देखकर मुझे उसकी याद आ गई। तब दासी ने कहा- मैं ही आपकी बेटी हूं। दशा माता के कोप से मेरे बुरे दिन चल रहे है इसलिए यहां चली आई। माता ने कहा- बेटी, तूने यह बात हमसे क्यों छिपाई? दासी ने कहा- मां, मैं सब कुछ बता देती तो मेरे बुरे दिन नहीं कटते। आज मैं दशा माता का व्रत करूंगी तथा उनसे गलती की क्षमा-याचना करूंगी।
अब तो राजमाता ने बेटी से पूछा- हमारे जमाई राजा कहां हैं? बेटी बोली- वे इसी गांव में किसी तेली के घर काम कर रहे हैं। अब गांव में उनकी खोज कराई गई और उन्हें महल में लेकर आए। जमाई राजा को स्नान कराया, नए वस्त्र पहनाए और पकवान बनवाकर उन्हें भोजन कराया गया।
अब दशामाता के आशीर्वाद से राजा नल और दमयंती के अच्छे दिन लौट आए। कुछ दिन वहीं बिताने के बाद अपने राज्य जाने को कहा। दमयंती के पिता ने खूब सारा धन, लाव-लश्कर, हाथी-घोड़े आदि देकर बेटी-जमाई को बिदा किया।
रास्ते में वही जगह आई, जहां रानी में मछलियों को भूना था और राजा के हाथ से चील के झपट्टा मारने से भोजन जमीन पर आ गिरा था। तब राजा ने कहा- तुमने सोचा होगा कि मैंने अकेले भोजन कर लिया होगा, परंतु चील ने झपट्टा मारकर गिरा दिया था। अब रानी ने कहा- आपने सोचा होगा कि मैंने मछलियां भूनकर अकेले खा ली होंगी, परंतु वे तो जीवित होकर नदी में चली गई थीं।
चलते-चलते अब राजा की बहन का गांव आया। राजा ने बहन के यहां खबर भेजी। खबर देने वाले से पूछा कि उनके हालचाल कैसे हैं? उसने बताया कि वे बहुत अच्छी दशा में हैं। उनके साथ हाथी-घोड़े लाव-लश्कर हैं। यह सुनकर राजा की बहन मोतियों की थाल सजाकर लाई। तभी दमयंती ने धरती माता से प्रार्थना की और कहा- मां आज मेरी अमानत मुझे वापस दे दो। यह कहकर उस जगह को खोदा, जहां कांदा-रोटी गाड़ दिया था। खोदने पर रोटी तो सोने की और कांदा चांदी का हो गया। ये दोनों चीजें बहन की थाली में डाल दी और आगे चलने की तैयारी करने लगे।
वहां से चलकर राजा अपने मित्र के घर पहुंचे। मित्र ने उनका पहले के समान ही खूब आदर-सत्कार और सम्मान किया। रात्रि विश्राम के लिए उन्हें उसी शयन कक्ष में सुलाया। मोरनी वाली खूंटी के हार निगल जाने वाली बात से नींद नहीं आई। आधी रात के समय वही मोरनी वाली खूंटी हार उगलने लगी तो राजा ने अपने मित्र को जगाया तथा रानी ने मित्र की पत्नी को जगाकर दिखाया। आपका हार तो इसने निगल लिया था। आपने सोचा होगा कि हार हमने चुराया है।
दूसरे दिन प्रात:काल नित्य कर्म से निपटकर वहां से वे चल दिए। वे भील राजा के यहां पहुंचे और अपने पुत्रों को मांगा तो भील राजा ने देने से मना कर दिया। गांव के लोगों ने उन बच्चों को वापस दिलाया। नल-दमयंती अपने बच्चों को लेकर अपनी राजधानी के निकट पहुंचे, तो नगरवासियों ने लाव-लश्कर के साथ उन्हें आते हुए देखा।
सभी ने बहुत प्रसन्न होकर उनका स्वागत किया तथा गाजे-बाजे के साथ उन्हें महल पहुंचाया। राजा का पहले जैसा ठाठ-बाट हो गया। राजा नल-दमयंती पर दशा माता ने पहले कोप किया, ऐसी किसी पर मत करना और बाद में जैसी कृपा करी, वैसी सब पर करना।
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Friday, March 29, 2019

🙏

🙏🙏🙏🙏 ८--८--८-७--वर्ण तूने कहा मेने सुना। मेने कहा तूने सुना। बात अगर देश की। पेट में पचाईये। तू ज्यादा है देशद्रोही। में हूं ज्यादा देशभक्त। उलझे हो सवालों में। देश को बचाइये। शत्रु को दूर करना। देश में जीना मरना। फिर कैसी तकरार। थोड़ा तो लजाइये। हर कोई कर्जदार। देश पर वफादार। अपना यह देश हैं। जय से गजाइये। 🙏🙏🙏 माया(नारायणी) स्वरचित

Thursday, March 28, 2019

ऑडिशन प्रतिभाशाली बच्चों कि लिए

Professor kook  बच्चों की ऑनलाइन web सिरीज़ के लिए इंदौर के प्रतिभाशाली बच्चों का ऑडिशन ३१ मार्च को HUNARSFOX ACADEMY में लिया जा रहा है ,  जो भी ऑडिशन में भाग लेना चाहते है ३० तारीख़ तक 7000667543 पर सम्पर्क करें! 
Professor kook अब आएगा मज़ा!

Wednesday, March 27, 2019

श्रीमती की डायटिंग

नम्रता सरन सोन
*हास्य कविता*

*श्रीमती की डायटिंग*

फ़ैसला कर ही लिया पत्नी ने
पतिदेव को दिखा  देंगे
हम भी धुन के पक्के हैं...
साबित करके दिखा देंगे....
बोल दिया उनको
अब एकसूत्रीय कार्यक्रम
वज़न घटाना है....
दिनभर पानी पीना है
और सिर्फ़ हवा खाना है....
पतिदेव दहशत मे हैं
अब कौन पहाड़ टूटेगा...
न जाने किन शर्तों पर
श्रीमती का अनशन टूटेगा....
अगले ही दिन
गृहसंसद मे अगले दिन
पारित हुआ आदेश
न हम कुछ खाऐंगे न ही कुछ बनाएंगे....
इतना कॉपरेट तो करना होगा
तब ही छरहरी बीवी पाओगे....
श्रीमान समझ गए
अब रोज़ ऐसे बम फ़ूटेंगे
कभी प्लेट  कभी कटोरे
कभी गिलास टूटेंगे....
भूखी बिल्ली हुई ख़तरनाक
कभी भी कर देगी चढ़ाई...
डायटिंग पर है देवीजी
बात बात पर करे लड़ाई....
क्या करें कुछ समझ न आए
कैसे अनशन खत्म करवाएं
दो दिन से हम भूखे हैं...
कल तक कहीं मर न जाएं...
जुटा के हिम्मत बोले पतिदेवा
देखो प्रिये तुम जैसी हो अच्छी हो
थोड़ी हेल्दी हो पर मन की सच्ची हो...
देखो चेहरा कितना उतर गया है
वो हँसता मुख किधर गया है....
चलो रबड़ी लाया हूँ जल्दी से खा लो
दुबले पतले होने की बेकार ज़िद मत पालो....
रबड़ी देख श्रीमती जी का रंग कुछ बदला
वो शर्माईं नज़रें घूमाई रबडी का पत्ता पकड़ा....
गटक गई एक साँस मे बोली दो दिन से भूखी हूँ..
हवा पानी खा खाकर देखो कितनी सूखी हूँ...
देखो जी अब कभी न मोटा कहना..
वरना मेरे साथ भूखा तुम्हें भी पड़ेगा रहना...
श्रीमान जी सोच रहे मन ही मन
मेरी तौबा जो अब ऐसी ग़लती कर जाऊंगा..
बीवी झटके या न झटके मैं भूखा मर जाऊंगा.....

इंतजार

इंतजार
अचला गुप्ता
सरला को गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार रहता ।आठ दस दिनों के लिए मायके जाकर मां ,बाबूजी के साथ रहने का सुख मिल जाता।पर इन दिनों बाबूजी के खराब स्वास्थ्य और मां की कमजोरी के कारण भाई उन्हें अपने साथ लिवा गया था।भाभी भी उनकी अच्छी तरह देखभाल कर रही थी।
सरला ने सोचा कि भाई को अपने आने की पूर्वसूचना दे दूं।मोबाइल पर भाई की आवाज में कुछ बदलाव महसूस हुआ ' अरे दीदी अभी तो बाबूजी ठीक हैं ।आप अगले महीने आएं तो बेहतर होगा'। सरला कुछ कहने ही जा रही थी कि भाभी की आवाज सुनाई दी ' देखो जी ,मैं आपके मां ,बाबूजी की सेवा तो कर लूंगी पर आपके खानदान का ठेका नही ले रखा है ' ।
सरला के चेहरे का रंग उदासी के कारण उड़ने लगा।वह धम से फर्श पर बैठ गयी।
मां ,बाबूजी से मिलने के लिए अब उसे भाई ,भाभी की सहमति का इंतजार करना होगा

खाली पेट

कुसुम शर्मा
*खाली पेट -* (लघुकथा)

लगभग दस साल का बालक राधा का गेट बजा रहा है।
राधा ने बाहर आकर पूंछा
"क्या है ? "
"आंटी जी क्या मैं आपका गार्डन साफ कर दूं ?"
"नहीं, हमें नहीं करवाना।"
हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा।"
द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा ?"
"पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।"
" ओह !! अच्छे से काम करना।"
"लगता है, बेचारा भूखा है।पहले खाना दे देती हूँ। राधा बुदबुदायी।"
"ऐ
लड़के ! पहले खाना खा ले, फिर काम करना।
"नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना।"
"ठीक है ! कहकर राधा अपने काम में लग गयी।"
एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।"
"अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए।यहाॅं बैठ, मैं खाना लाती हूँ।"
जैसे ही राधा ने उसे खाना दिया वह जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा।"
"भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले।जरूरत होगी तो और दे दूंगी।"
"नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है।सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है,पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं खाना है।"
राधा रो पड़ी..
और अपने हाथों से मासुम को उसकी दुसरी माँ बनकर खाना खिलाया..
फिर... उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई .. और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी ..
और कह आयी .. बहन आप बहुत अमीर हो ..
जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम अपने बच्चो को भी नहीं दे पाते ..
खुद्धारी की ...

संध्या पचोरिया
*कमाल है ना ??*

वो बचपन में खुली छत पर सब के साथ सोते थे, पर फ़ोटो लेना याद नही रहा।

ना पानीपुरी की फ़ोटो ली, ना वो बर्फ गोला और आम चूसने की रिकॉर्डिंग की।

बिना AC की train में जो आलू की सब्जी और पराठे, पानी की सुराही,  उनकी भी कहाँ तस्वीरे ली हमने।

पर हां... एक एक पल की detail  याद है l

क्यूँकि शायद... उस वक़्त तस्वीरें दिल पे बनती थी, कैमरों में नही।

वोह पल कितना अच्छा था, घडी सिर्फ पापा के पास थी... आैर वक्त सारे परिवार के पास...
☺😊

Tuesday, March 26, 2019

💐
ममता बडजात्या
फागुन आता देखकर, उपवन हुआ निहाल,
अपने तन पर लेपता, केसर और गुलाल।

तन हो गया पलाश-सा, मन महुए का फूल,
फिर फगवा की धूम है, फिर रंगों की धूल।

मादक महुआ मंजरी, महका मंद समीर,
भँवरे झूमे फूल पर, मन हो गया अधीर।

ढोल मंजीरे बज रहे, उड़े अबीर गुलाल,
रंगों ने ऊधम किया, बहकी सबकी चाल।

कोयल कूके कान्हड़ा, भँवरे भैरव राग,
गली-गली में गूँजता, एक ताल में फाग।

नैनों की पिचकारियाँ, भावों के हैं रंग,
नटखट फागुन कर रहा, अंतरमन को तंग।

रंगों की बारिश हुई, आँधी चली गुलाल,
मन भर होली खेलिए, मन न रहे मलाल।

उजली-उजली रात में, किसने गाया फाग,
चाँद छुपाता फिर रहा, अपने तन के दाग।

नेह-आस-विश्वास से, हुए कलुष सब दूर,
भीगे तन-मन-आत्मा, होली का दस्तूर।

*होली की हार्दिक शुभकामनाएँ*।🙏🌹🌹🙏🏻
💥🔆 सुप्रभात 💥🔆
सुनीता सक्सेना

*पिता की ममता*

शहर के एक अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बग़ीचे में तेज़ धूप और गर्मी की परवाह किये बिना, बड़ी लग्न से पेड़ - पौधों की काट छाँट में लगा था कि तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज़ सुनाई दी, "गंगादास! तुझे प्रधानाचार्या जी तुरंत बुला रही हैं।"
     गंगादास को आख़िरी के पांँच शब्दों में काफ़ी तेज़ी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्त्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वज़ह से प्रधानाचार्या जी ने उसे तुरंत ही बुलाया है।
      शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ़ किया और  चल दिया, द्रुत गति से प्रधानाचार्या के कार्यालय की ओर।
       उसे प्रधानाचार्या महोदया के कार्यालय की दूरी मीलों की लग रही थी जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी हृदयगति बढ़ गई थी।  सोच रहा था कि उससे क्या ग़लत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्या महोदया ने  तुरंत ही अपने कार्यालय में आने को कहा।
      वह एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था। पता नहीं क्या ग़लती हो गयी। वह इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्या के कार्यालय पहुँचा......
       "मैडम, क्या मैं अंदर आ जाऊँ? आपने मुझे बुलाया था।"
       "हाँ। आओ और यह देखो" प्रधानाचार्या महोदया की आवाज़ में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी।
       "पढ़ो इसे" प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।
       "मैं, मैं, मैडम! मैं तो इंग्लिश पढ़ना नहीं जानता मैडम!" गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया।
     *"मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो।* मैं आपका और विद्यालय का पहले से ही बहुत ऋणी हूँ। क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ने की इज़ाज़त दी। मुझे कृपया एक और मौक़ा दें मेरी कोई ग़लती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंँगा।" गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था।
      उसे प्रधानाचार्या ने टोका "तुम बिना वज़ह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो, मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका को बुलाती हूँ।"
      वे पल जब तक उसकी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुँची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई ग़लती हो गयी, कहीं मैडम उसे विद्यालय से निकाल तो नहीं रहीं। उसकी चिंता और बढ़ गयी थी।
      कक्षा-अध्यापिका के पहुँचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा, "हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी। अब ये मैडम इस पेपर में जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हें सुनाएँगी, ग़ौर से सुनो।"
      कक्षा-अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया, "आज मातृ दिवस था और आज मैंने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा। तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।"
      उसके बाद कक्षा- अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।
      "मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गाँव जहाँ शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी अभाव है। चिकित्सक के अभाव में कितनी ही माँयें दम तोड़ देती हैं बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थीं। उन्होंने मुझे छुआ भी नहीं कि चल बसीं। मेरे पिता ही वे पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाक़ी की नज़र में तो मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया। मेरे दादा - दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लायें ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी
एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वज़ह से मेरे दादा - दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सब कुछ, ज़मीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और इसी विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी ज़रूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।"
    "आज मुझे समझ आता है कि वे क्यों हर उस चीज़ को जो मुझे पसंद थी ये कह कर खाने से मना कर देते थे कि वह उन्हें पसंद नहीं है, क्योंकि वह आख़िरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग के महत्त्व पता चला।"
     "मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख - सुविधाओं का ध्यान रखा और मेरे विद्यालय ने उनको यह सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जो मुझे यहाँ निःशुल्क पढ़ने की अनुमति मिली। उस दिन मेरे पिता की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था।"
     "यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी हैं।"
       "यदि दयाभाव, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ हैं।"
      "यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर हैं।"
      "यदि संक्षेप में कहूँ कि प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है तो मेरे पिताजी उस पहचान पर खरे उतरते हैं और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ हैं।"
      आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामनाएँ दूँगी और कहूँगी कि आप संसार के सबसे अच्छे पालक हैं। बहुत गर्व से कहूँगी कि ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली हैं, मेरे पिता हैं।"
     "मैं जानती हूँ कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊँगी। क्योंकि मुझे माँ पर लेख लिखना था और मैंने पिता पर लिखा,पर यह बहुत ही छोटी सी क़ीमत होगी उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया। धन्यवाद"।
      आख़िरी शब्द पढ़ते - पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।
      इस शांति में केवल गंगादास के सिसकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। बग़ीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज़ को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दों ने उस कमीज़ को पिता के आँसुओं से गीला कर दिया था। वह केवल हाथ जोड़ कर वहाँ खड़ा था। 
      उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।
      प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, "गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए है। यह लेख मेरे अब तक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े ज़ोर - शोर से मना रहे हैं। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। यह सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है। यह सिद्ध करता है कि आपको एक औरत होना आवश्यक नहीं है एक पालक बनने के लिए। साथ ही यह अनुशंषा करता है उस विश्वाश का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया। हमें गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का पिता है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। गंगादास हमें गर्व है कि आप एक माली हैं और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बग़ीचे के फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा ख़ुशबूदार बनाकर रखा जिसकी ख़ुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेंगे?"
      रो पड़ा गंगादास और दौड़ कर बिटिया की कक्षा के बाहर से आँसू भरी आँखों से निहारता रहा , अपनी प्यारी बिटिया को।

*संसार की समस्त प्यारी - प्यारी बेटियों के पालकों को समर्पित*

*सदैव प्रसन्न रहिये*
*जो प्राप्त है-पर्याप्त है*

*कृपया इसे कहानी को सभी से सांझा (share) करें*
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Monday, March 25, 2019

रजनी सिन्हा
‼*"बहुत ही प्यारी कविता"*‼

*ऐ   "सुख"  तू  कहाँ   मिलता    है*
*क्या   तेरा   कोई   पक्का   पता  है*‼

*क्यों   बन   बैठा   है    अन्जाना*
*आखिर   क्या   है   तेरा   ठिकाना।*‼

*कहाँ   कहाँ     ढूंढा   तुझको*
*पर   तू  न   कहीं  मिला  मुझको*‼

*ढूंढा   ऊँचे   मकानों   में*‼
*बड़ी  बड़ी   दुकानों   में*‼

*स्वादिष्ट   पकवानों   में*‼
*चोटी   के   धनवानों   में*‼

*वो   भी   तुझको   ही   ढूंढ   रहे   थे*‼
*बल्कि   मुझको   ही   पूछ   रहे   थे*‼

*क्या   आपको   कुछ   पता    है*
*ये  सुख  आखिर  कहाँ  रहता   है?*⁉

*मेरे   पास   तो   "दुःख"  का   पता   था*‼
*जो   सुबह   शाम   अक्सर   मिलता  था*‼

*परेशान   होके   शिकायत     लिखवाई*‼
*पर   ये   कोशिश   भी   काम  न  आई*‼

*उम्र   अब   ढलान    पे    है*‼
*हौसला  अब  थकान    पे     है*‼

*हाँ   उसकी   तस्वीर   है   मेरे   पास*‼
*अब   भी   बची   हुई   है    आस*‼

*मैं   भी   हार    नही    मानूंगा*‼
*सुख   के   रहस्य   को    जानूंगा*‼

*बचपन    में    मिला    करता    था*‼
*मेरे    साथ   रहा    करता    था*‼

*पर   जबसे    मैं    बड़ा   हो    गया*‼
*मेरा   सुख   मुझसे   जुदा   हो  गया।*‼

*मैं   फिर   भी   नही   हुआ    हताश*‼
*जारी   रखी    उसकी    तलाश*‼

*एक   दिन   जब   आवाज   ये    आई*‼
*क्या    मुझको    ढूंढ   रहा  है   भाई*‼

*मैं   तेरे   अन्दर   छुपा    हुआ     हूँ*‼
*तेरे   ही   घर   में   बसा    हुआ    हूँ*‼

*मेरा  नहीं  है   कुछ   भी    "मोल"*‼
*सिक्कों   में   मुझको   न   तोल*‼

*मैं  बच्चों   की    मुस्कानों    में    हूँ*‼

*पत्नी  के  साथ    चाय   पीने   में*‼
*"परिवार"    के  संग   जीने    में*‼

*माँ   बाप   के   आशीर्वाद    में*‼
*रसोई   घर   के  पकवानों   में*‼

*बच्चों   की   सफलता   में    हूँ*‼
*माँ की   निश्छल  ममता  में  हूँ*‼

*हर   पल   तेरे   संग    रहता   हूँ*‼
*और   अक्सर   तुझसे   कहता   हूँ*‼

*मैं   तो   हूँ   बस   एक    "अहसास"*‼
*बंद कर   दे   तू   मेरी    तलाश*‼

*जो   मिला   उसी   में   कर   "संतोष"*‼
*आज  को   जी   ले   कल  की न सोच*‼

*कल  के   लिए   आज   को  न   खोना*‼

*मेरे   लिए   कभी   दुखी    न   होना*‼
*मेरे लिए  कभी  दुखी  न   होना*

🙏 अच्छी लगे तो मित्रों को शेयर जरूर कीजिए !धन्यवाद!
प्रिय सखियों
स्वजनों को
रंग पंचमी की हार्दिक शुभकामना व बधाई 💐💐🌺🌺
मेरे भावों की शब्द होली
.......,....,.👇......,.......,

रंग ढूँढती हूँ रसोई में
दाल की बटलोई में
आटे की रोटी लोई में
दही दूध घी मलाई में
नींबू अमचूर खटाई में
पूरन पोली की भराई मे
श्री खंड की मथाई में
दाल बाटी की महकाई में
सलाद चटनी की बँटाई में

कहीं मिर्च का रंग लाल
कहीं हरा पीलाहै
दूध दही मक्खन सफ़ेद है
तो केशर रंग केसरिया
गुलाबी टमाटर
हल्दी का पीला है
कितने रंग गिनाऊँ
थाली में रंग पंचमी का मेला है
सब रंगो को पेट में जो ठेला है
होली का रेलम पेला है
कितना मन संतप्त मेरा
रसोई रंगो से मन खेला है


जब खेल ली रसोई होली

अपनों की क़िस्सा गोई में
गमले में सब्ज़ी बोई में
मन रंग भर गयाहै
मैने अंतरंग रंग लिया है
———/-/————
...कुसुम सोगानी....


 आई रंगपंचमी

आई  रंगपंचमी रंग  लाई रंगपंचमी ।
खुशियों का खजाना भर लाई पंचमी।।

होली पर जो भूल गये रंग खेलन को ।
 हाथ पिचकारी दिला लाई रंगपंचमी ।।

रूठ गए जो अबीर गुलाल  के  ढेर।
रंगों की महक भर लाई रंगपंचमी ।।

नफरत के  जहाँ जहाँ  कांटे उग रहे।
प्रेम के  फूल खिला लाई रंगपंचमी ।।

होली पर जो मित्र सूखे  बच गए हैं ।
उन्हें  रंग में डुबा लाई   रंगपंचमी ।।

रंग में न भीगे तो कैसी खेली होली।
भर पिचकारी रंग उड़ाए रंगपंचमी ।।

हुआ  धमाल  तो खूब उड़ेगा गुलाल।
होली की  धूम मचा लाई रंगपंचमी ।।

नगाड़े बजे निकली युवाओं  की टोली
 नाचें- गाए बरसाने की आई रंगपंचमी ।।

आशा  जाकड़
9754969496
🙏 *अद्भुत  विचारधारा* 🙏

हाल ही में हुई देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अम्बानी के घर की शादी की बात आज हर कोई कर रहा है।
जबकि भारत में हुई एक और शादी की, एक और कहानी मौजूद है,जिसकी कोई चर्चा नहीं है।
🙏मल्टी नेशनल कम्पनी विप्रो के मालिक अज़ीम प्रेमजी के दो बेटों की शादी की।
पहले आपको बताये के अज़ीम प्रेम जी कौन है?
अज़ीम प्रेम जी वो शख्स है जिनके दादा जी को पाकिस्तान गोवर्नमेंट पाकिस्तान में रहने के लिए वहाँ के होम मिनिस्टर का पद देने को तैयार थी लेकिन देशप्रेम के चलते उन्होंने वो पैग़ाम ठुकरा दिया।
अज़ीम प्रेम जी वो शख्स है जिसके पास दुनिया भर के मुस्लिम्स में सबसे ज़्यादा पैसा है सऊदी अरब के बादशाह के बाद। यानी के वो दुनिया के दूसरे सबसे अमीर मुस्लिम व्यक्ति है।
अज़ीम प्रेम जी की कुल जायजाद 15.6 अरब डॉलर की है और वो लगभग 8 अरब डॉलर दान में दे चुके है।
अज़ीम प्रेम जी वो व्यक्ति है जिन्होंने कुछ साल पहले अरब देशो द्वारा दिया गया बेस्ट मुस्लिम बिज़नेस पर्सन ऑफ द वर्ल्ड का पुरस्कार सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया था कि वो बेस्ट मुस्लिम पर्सन का था। उनका कहना था कि वो अगर उनको बेस्ट इंडियन पर्सन बुलाया जाता तो ज़्यादा अच्छा था।
अज़ीम प्रेम जी वो व्यक्ति है जिनके नाम मे प्रेम लगाने से मुस्लिम मौलवियों को आपत्ति होती है। उनके नमाज़ न पढ़ने से उनको आपत्ति है, वो कट्टरपंथी नही है इस बात से भी आपत्ति है। अज़ीम प्रेम जी मस्जिदों को दान नही देते है इस बात से भी आपत्ति होती है। क्यों के अज़ीम प्रेम जी अपने प्रॉफिट से 10% हिस्सा शिक्षा के लिए दान देते है।
आइये अब बात करते है उनके बेटो की हाल ही सम्पन्न हुई शादियों की..
अज़ीम प्रेमजी आज भारत के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति हैं। उन्होंने अपने बेटों की शादी में ₹ 20 करोड़ सिर्फ इस शर्त पर खर्च किए कि दुनिया के जाने माने शीर्ष के टेक्नोक्रेट और प्रशासक शादी में भाग लें !
 उन्होंने और उनकी पत्नी ने शादी के कार्ड में अनुरोध किया कि, 🙏"कृपया दुल्हनों के लिए उपहार में कुछ धन दान करें जिससे लड़कियों के लिए स्कूल बनाये जा सकें !"🙏
जितना धन दान में आया उतना ही प्रेमजी ने अपनी तरफ से मिला कर लड़कियों के स्कूल के लिए दान कर दिया,जो लगभग 250 स्कूलों के लिये पर्याप्त हो गया ।
बताया जाता है इस तरह कुल ₹ 400 करोड़ की राशि दान में एकत्र हो गयी।
उच्चतम उपहार एचसीएल के शिव नाडर की तरफ से ₹ 45 करोड़ का प्राप्त हुआ ।
अम्बानी की शादी की चर्चा तो बहुत हुई,लेकिन क्या इस शादी की चर्चा देश में होना ज़रूरी नहीं था ?
आप बतायें...✍
*ऐसे महान व्यक्ति को सलाम!*

रँगपंचमी का धमाल

रंग पंचमी का धमाल

रंग पंचमी तूने किया कमाल
नर नारी कर गई लालम लाल।

पिचकारी भर भर लाई
रंग बिरंगे गुब्बारे लाई,
सड़क पर भीड भारी
मस्ती में गैर उडाई ।

झांझ मजीरे खूब बजाई
थाप दे थाप पर नाची,
खूब थिरकी खूब फिरकी
मस्ती हुडदंग मचाती आई।

ईर्ष्या को जला आई
नफरत को मिटा आई,
स्नेह प्यार की डोर थामी
गलबहियां प्यार की डाली।

घर मुहल्ले शोर मचाई
गली गली किया धमाल,
रंग पंचमी तूने किया कमाल
नर नारी कर गई लालमलाल।

डा अंजुल कंसल"कनुप्रिया"

होली विदा

Swati sing

विदाई ली रही रंगो की होली

समेटे जा रही हंसी और ठिठोली

ऐ होली तू छोड़ जा

निशा रंगो के

दे जा सौगात रंगों की

आये जब बरस बाद तू

तो मन वैसा ही हो बजरंगी

तरंग मन में हर रंग मन में

भर जाए नवरंग जीवन में

की धरती हरी हो

हरी हो भरी हो

और नीला आसमान

केसरिया साधु मन हो

पीले खेत और

रंग बिरंग बिरंगे फूलों का हो बागवान

हर गाल गुलाबी

और मन में हो कामयाबी

बस ऐसा सजा हुआ मन

में हो अगला होली का मिलन
प्रिय सखियों
स्वजनों को
रंग पंचमी
.......,....,.👇......,.......,

रंग ढूँढती हूँ रसोई में
दाल की बटलोई में
आटे की रोटी लोई में
दही दूध घी मलाई में
नींबू अमचूर खटाई में
पूरन पोली की भराई मे
श्री खंड की मथाई में
दाल बाटी की महकाई में
सलाद चटनी की बँटाई में

कहीं मिर्च का रंग लाल
कहीं हरा पीलाहै
दूध दही मक्खन सफ़ेद है
तो केशर रंग केसरिया
गुलाबी टमाटर
हल्दी का पीला है
कितने रंग गिनाऊँ
थाली में रंग पंचमी का मेला है
सब रंगो को पेट में जो ठेला है
होली का रेलम पेला है
कितना मन संतप्त मेरा
रसोई रंगो

गौरया

एक पेड़ था
बोगनवेलिया....
काग़ज़ी फूलों का...
कोई खुशबू नही.....
बिना देखरेख के बढ़ता रहता..
पर कितना सुंदर लगता था...
उस घने पेड़ में
गौरैया का घोंसला था...
सुबह सुबह पेड़ भर जाता था
चिड़ियों से.....
उस पर टांग दिया था
एक छिका ....
जिसमें रख दिया करते थे
दाना और पानी....
चीं-चीं ची-चीं चिड़ियों की
भर देती थी,
उन क़ाग़जी फ़ूलों मे जान...
आने लगती थी भीनी भीनी खुशबू....
सारा दिन चहलपहल रहती
कितना सुंदर दृश्य होता था....
फिर एक दिन
घर ले आए कार....
और उजड़ गया आशियाना....
बिखर गया आबदाना....
चहचहाहट गुम हुई
कार की भर्राहट सुनाई देती है....
भीनी भीनी खुशबू नही
धूल धुंए की धुंध दिखाई देती है....
बिजली के तार पर बैठी
अपने घोंसले और दानापानी को
खोजती सजल आँखों से
वह गौरैया दिखाई देती है......

*नम्रता सरन "सोना"*

सजल आँखे गौरया की

एक पेड़ था
बोगनवेलिया....
काग़ज़ी फूलों का...
कोई खुशबू नही.....
बिना देखरेख के बढ़ता रहता..
पर कितना सुंदर लगता था...
उस घने पेड़ में
गौरैया का घोंसला था...
सुबह सुबह पेड़ भर जाता था
चिड़ियों से.....
उस पर टांग दिया था
एक छिका ....
जिसमें रख दिया करते थे
दाना और पानी....
चीं-चीं ची-चीं चिड़ियों की

भर देती थी,
उन क़ाग़जी फ़ूलों मे जान...
आने लगती थी भीनी भीनी खुशबू....
सारा दिन चहलपहल रहती
कितना सुंदर दृश्य होता था....
फिर एक दिन
घर ले आए कार....
और उजड़ गया आशियाना....
बिखर गया आबदाना....
चहचहाहट गुम हुई
कार की भर्राहट सुनाई देती है....
भीनी भीनी खुशबू नही
धूल धुंए की धुंध दिखाई देती है....
बिजली के तार पर बैठी
अपने घोंसले और दानापानी को
खोजती सजल आँखों से
वह गौरैया दिखाई देती है......

*नम्रता सरन "सोना"*

रँगपंचमी

प्रिय सखियों
स्वजनों को
h
रंग पंचमी की हार्दिक शुभकामना व बधाई 💐💐🌺🌺
मेरे भावों की शब्द होली
.......,....,.👇......,.......,

रंग ढूँढती हूँ रसोई में
दाल की बटलोई में
आटे की रोटी लोई में
दही दूध घी मलाई में
नींबू अमचूर खटाई में
पूरन पोली की भराई मे
श्री खंड की मथाई में
दाल बाटी की महकाई में
सलाद चटनी की बँटाई में

कहीं मिर्च का रंग लाल
कहीं हरा पीलाहै
दूध दही मक्खन सफ़ेद है
तो केशर रंग केसरिया
गुलाबी टमाटर
हल्दी का पीला है
कितने रंग गिनाऊँ
थाली में रंग पंचमी का मेला है
सब रंगो को पेट में जो ठेला है
होली का रेलम पेला है
कितना मन संतप्त मेरा
रसोई रंगो से मन खेला है


जब खेल ली रसोई होली

अपनों की क़िस्सा गोई में
गमले में सब्ज़ी बोई में
मन रंग भर गयाहै
मैने अंतरंग रंग लिया है
———/-/————
...कुसुम सोगानी....

Friday, March 22, 2019

*

*काव्यफाग उत्सव में गीत/गज़ल और कविताओं से संजेगी की महफील*


*संस्था काव्य सागर की काव्यगोष्ठी 24 मार्च रविवार को*

इंदौर। संस्था काव्य सागर इंदौर की नियमित काव्य गोष्ठी  24 मार्च रविवार दोपहर 3 बजे पाटीदार कोचिंग संस्थान सेठी गेट सुदामा नगर इंदौर पर आयोजित की जायेगी। काव्यपाठ में कवि फाग उत्सव से ओतप्रोत रंग-बिरंगी काव्य रचना का पाठ करेंगे। संस्था सचिव जयनारायण पाटीदार कुंवर ने बताया की इस फाग-काव्य उत्सव आयोजन में शहर के नामी गिरामी साहित्यकार सम्मिलित होकर काव्यपाठ करेंगे। अशोक द्विवेदी अग्रज, राज सांधेलियां राज, बालकराम शाद, हरिश साथी, रशीद अहमद शेख, दिनेश शर्मा, मनोहर लाल सोनी बाबा, सुनिल मुसाफिर, मनोहर लाल मधुर, जितेंद्र राज,  सुनिल रघुवंशी सिपाही, धर्मेंद्र अम्बर, राहुल मिश्रा इलाहाबादी, राहुल बजरंगी, शुभम शनि, अशोक हंसमुख, शोभा रानी तिवारी, अलका जैन इत्यादि। इसके अवाला कई प्रसिद्ध साहित्यकार आयोजन की गरिमा बढ़ायेंगे। संस्था अध्यक्ष बृज मोहन शर्मा बृज ने बताया कि आयोजन सभी के लिए खुला है। शहर और आसपास के सभी साहित्यिकार तथा सुधी श्रौता इस काव्यपाठ गोष्ठी में सादर आमंत्रित है।
जितेंद्र शिवहरे ने यह जानकारी दी।

जितेंद्र शिवहरे
177 इंदिरा एकता नगर पुर्व रिंग रोड मुसाखेड़ी इंदौर मध्यप्रदेश मोबाइल फोन नंबर 7746842533
Jshivhare2015@gmail.com

Wednesday, March 20, 2019

होली

होली की रचनाओं के कुछ अंश

भ्रष्ट नीतियां भ्रष्ट आचरण आज जला दो होली में
मिटें द्वेष नफरत के बाने आज जला दो होली में
कमर तोड़ दी आग लगा दी जिसने गरीब की खोली में
महंगाई की टांगें खींचो और जला दो होली में
2-
होली में दिल का हाल बेहाल हो चला है
कि मारो रंग पिचकारी दिलअधीर हो चला है
नफरत की होली जल गई दिल कबीर हो चला है
मारो रंग पिचकारी दिल फकीर हो चला है
               अवनि

अलाउद्दीन चिराग


जब डॉक्टर ने ये बताया था ना , बधाई हो बेटी हुई है । मैंने लड्डू बांट दिए थे पूरे अस्पताल में क्योंकि मुझे शिखा ( पत्नी) जैसी बेटी ही चाहिए थी ।जब चलती थी ना  तो उसके छोटे छोटे पैरों की  पायल की गूंज पूरे घर में दौड़ जाती थी ।मुझे याद है उसने पहली बार जब पापा बोला था। कितना खुश था मैं । मैंने उसे अपने गोद में उठा लिया  घंटों में उससे बोलता रहा , बेटा पापा बोलो , पा.....पा ,पा......पा और वो गर्दन मटकाने लगती । मैं उसकी हर नादानी पर बहुत हंसता ।

जब वो पांचवी में थी उसने पापा के ऊपर निबंध लिखा । उसने लिखा मेरे पापा हीरो है ।जो उसने अपने शब्दों में लिखा था , दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जो पापा मेरे लिए नहीं ला सकते और ऐसा कोई काम नहीं जिसे पापा नहीं कर सकते । मेरे पापा अलादीन के चिराग हैं ।मैंने न जाने कितनी बार उस निबंध को पढ़ा । जब भी मैं उसे पढ़ता तो मुझे एक सफल पिता की झलक उसमें दिखती
अपनी मां की चुन्नी ओढ़कर अक्सर मुझे खाना बनाकर खिलाती ।
 धीरे धीरे मेरी  प्लास्टिक की गुड़िया दादी अम्मा बन गई  ।मैं उसमें अपनी मां की छवि देखता  ।हर बात पर मुझे डांटना ।,"पापा आप ऐसे क्यों करते हो ?पापा आप ऐसे क्यों नहीं करते ? इतने सवाल उसके  हर सवाल को मजाक में उड़ा दिया करता । जब कभी सफाई करती पोछा लगाती है मैं उसकी पोचे के अंदर अगर चप्पल पहन कर आ जाता तो मानो मेरी मां ही मुझे डांट रही हो
  गुस्से में  पापा मैंने पोछा  लगाया  है ।
मैं बोल देता बेटा मुझे नजर नहीं आया था।
 पापा आप रोज ऐसे ही करते हो ।
अच्छा  , अच्छा अब नहीं करुंगा ।
मैंने उससे कहा था । तुम आर्ट ले लो कॉलेज में उसने कहा नहीं मुझे साइंस  पढ़नी  है । साइंस की सुविधा हमारे शहर में नहीं थी  ,दूसरे शहर मैंने उसे पढ़ने के लिए भेजा ।सचमुच जिस दिन वो जा रही थी ना मैं  रोया था । शिखा ने मुझे समझाया ," अभी तो बेटी कॉलेज जा रही है । आप अभी से इतना रो रहे हैं ।जिस दिन ससुराल जाएगी उस दिन कितना रोयेंगे  ?"

अब कॉलेज भी पूरा हुआ । तलाश एक अच्छे लड़के की जो मेरी बेटी को मेरी तरह खुश रख सके। उसके लिए मैं कोई भी कीमत देने के लिए तैयार था ।अच्छे से अच्छा घर ,अच्छे से अच्छा परिवार मैं उसके लिए देखना चाहता था । मैंने एक आलीशान घर में उसका रिश्ता तय किया ।जहां किसी चीज की कोई कमी नहीं थी ।मुझे लगा कि मेरी बेटियां सुख से रहेगी । क्या हुआ जो मैं अपनी सारी FD तुड़वा दूंगा ।क्या हुआ जो मैंने अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचा कर नहीं  रखा है । उसे भी मैं उसकी झोली में डाल दूंगा लेकिन उसके लिए तो खुशियां खरीद लूंगा ना ।और मैंने खरीद लीं उसके लिए खुशियां ।शादी वाले दिन जब वो गहना जेवरों से लदी हुई थी तो मैं सारे दुख भूल गया था कि मैंने अपने लिए एक पाई भी नहीं छोड़ी है ।

उसकी विदाई के समय मैं बहुत रोया  , बहुत ज्यादा  ।उसकी गाड़ी जब बारात घर से निकली तो बाहर  मैं घंटों खड़ा होकर रोया ।मुझे नहीं पता था मेरी चिड़िया 1 दिन ऐसे उड़ जाएगी मेरे घोसले से ।उसकी भी आंखें जहां तक गाड़ी मुड़ी  मेरे ऊपर ही टिकी  थीं । मैंने संभाल लिया खुद को आखिर यही नियम है । बेटी को एक दिन अपने घर जाना ही है।

  उसके जाने के बाद भी उसको भूलना नामुमकिन था ।जब भी चप्पल पहनकर अंदर आता ना तो मुझे गुड़िया याद आती । जब भी अपनी प्रेस के  कपड़े ढूंढता तो मुझे गुड़िया याद आती । जब भी एक कप चाय पीने का मन होता तो मुझे गुड़िया याद आती ।जब भी  शिखा मुझे डांटती तो मुझे गुड़िया याद आती , कैसे मैं हंसकर कह दिया करता था देखो गुड़िया तुम्हारी मम्मी मुझे डांट रही है । जब भी मैं कुछ भारी समान बाजार से लेकर आता तो मुझे गुड़िया है याद आती , कैसे वो गेट पर आते ही मेरा सामान मेरे हाथ से ले लिया करती । जब भी बाजार में रखे हुए अंगूर  देखता  तो मुझे गुड़िया याद आती क्योंकि उसे अंगूर   बहुत पसंद थे । फिर अपने आपको समझाता पागल हो गया है क्या रामेश्वर ? तूने अपनी जीवन भर की कमाई क्या इसलिए खर्च की है कि तेरी बेटी अंगूर के लिए तरसे ।उसे किस बात की कमी। हर मौके पर मुझे उसकी याद आती शायद वो भी मुझे इतना ही याद करती होगी ।

 हां दिखाती नहीं है ।  जब घर आती , तो मैं छुपकर उसे संतुष्टि से 5 , 10 मिनट पहले देखता था । उसका चेहरा पढ़ता । वो खुश तो है ना । उसकी मुस्कुराहट में जैसे मैं उसकी यादों  को भुला देना चाहता था , पर न जाने क्यों ? उसे देख कर लगता है बहुत कमजोर हो गई है । कई बार मैंने उससे पूछा , अपने पास प्यार  से बिठाकर बेटा कुछ कमजोर लग रही हो तो उसने बनावटी हंसी हंसते हुए कहा ," पापा ये तो फैशन है जो जितना पतला होगा उतना ही ज्यादा सुंदर दिखेगा ।"

और कमजोर और उदास और गंभीर वो दिन पर दिन होती चली गई और फैशन का मुखौटा पहना कितनी आसानी से उसने मुझे पागल बना दिया । मैं कैसे नहीं देख पाया उसके दर्द को ।आज मेरी गुड़िया मेरे सामने वाले कमरे में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है । उसने अपने बाप से पैसा मांगने की बजाय खुद को फांसी लगाना ज्यादा बेहतर समझा । यहां तक कि अपने करीबी दोस्त को भी मना कर दिया , उसके पापा तक ये बात ना पहुंचे की ससुराल में वो कैसे रहती है ? क्यों नहीं आई वो मेरे पास । वो जो हर चीज के लिए मेरे पास आती थी । उसने क्यों नहीं कहा , पापा मुझे इस नर्क से निकाल लो ।मैं उसे कभी नहीं रहने देता वहां । चाहे मैं खुद बिक जाता , पर मैं उसे वहां से निकाल लेता । क्या करूंगा मैं उसके लिए अब लड़कर जब वो  नहीं रहेगी ? मैं हर बड़ी से बड़ी लड़ाई लड़ता उसके लिए उसने क्यों नहीं समझा मुझे इस लायक । पुलिस के फोन से पहले काश उसका फोन आया होता ,"पापा अब मैं इस घुटन में नहीं जी सकती " तो मैं उसे समझाता बेटा मैं हूं ना । जब तक मैं हूं , तब तक दुनिया में कोई ऐसा दुख नहीं है जो तुम्हें छू सके । वो क्यों भूल गई कि उसके पापा अलादीन के चिराग हैं!
सोनी श्रीवास्तव

Tuesday, March 19, 2019

साहित्यक प्रतियोगिता

अनुराधा विश्ववाड़
कामायनी जयशंकर प्रसाद की अंतिम कृति है |यह 15 सर्ग का महाकावय है |
जयशंकर प्रसाद जी ने कहा -नारी  तुम केवल शरदधा हो |वर्तमान युग की बात करे तो नारी ने जो साहस का परिचय दिया है वह सराहनीय है |संकल्प  कर लेने वाली हर नारी पुरुष पर भारी है |
विग्यापनों में नारी की स्थिति विचारणीय है |

साहित्यिक प्रतियोगिता5

कामायनी जयशंकर प्रसाद की अंतिम कृति है |यह 15 सर्ग का महाकावय है |
आनीला जगत
जयशंकर प्रसाद जी ने कहा -नारी  तुम केवल शरदधा हो |वर्तमान युग की बात करे तो नारी ने जो साहस का परिचय दिया है वह सराहनीय है |संकल्प  कर लेने वाली हर नारी पुरुष पर भारी है |
विग्यापनों में नारी कामायनी जयशंकर प्रसाद की अंतिम कृति है |यह 15 सर्ग का महाकावय है |
जयशंकर प्रसाद जी ने कहा -नारी  तुम केवल श्रद्धा हो

साहित्यक प्रतियोगिता

स्वाति सिंग
कायस्थ पीने के लिए प्रसिद्ध है

फिर भी बराबर प्रश्न होते रहे, आप पीते नहीं तो आपको मदिरा पर लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है?
 तब श्री हरिवंश राय बच्चन कहते हैं प्रश्न दो भोला था, पर था ईमानदार। एक दिन ध्यान आया कि कायस्थों के कुल में जन्मा हूँ, जो पीने के लिए प्रसिद्ध हैं, या थे। चन्द बरदाई के रासों का छप्पय याद भी आया। सोचने लगा, क्या पूर्वजों का किया हुआ मधुपान मुझपर कोई संस्कार ना छोड़ गया होगा! भोले-भाले लोगों को बहलाने के लिए एक रुबाई लिखी

साहित्य प्रतियोगिता

सुषमा दुबे
उर का छाला...
लाल सुरा की धार लपट-सी
कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको
कह देना उर का छाला,
 इसदर्द नशा है इस मदिरा का
विगत स्मृतियाँ साकी हैं;
पीड़ा में आनंद जिसे हो,
आए मेरी मधुशाला

अंगूर लताएँ ...
बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला
मस्जिद-मन्दिर...
मुसलमान और हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!
साकी बालाएँ...
यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।

ठोकर खाकर...
ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।

बहलाता प्याला...
यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।

महल ढहे...
कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!

सुखदस्मृति है...
यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।

मेरे साकी में...
मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।

सदा उठाया है...
बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।
तर्पण-अर्पण करना...
पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे

साहित्यक प्रतियोगिता

रुपाली तवर: लेखक :08
               जयशंकर प्रसाद
मूल शीर्षक          
'कामायनी'
मुख्य पात्र
               मनु और श्रद्धा

प्रकार
     

        रूपाली तवर:

तुम कौन हो? संसृति-जलनिधि,
तीर-तरंगों से फेंकी मणि एक। 
कर रहे निर्जन का शांतिकाल,
प्रभा की धारा से अभिषेक?

अमधुर विश्रांत और एकांत,
जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
एक करुणामय सुंदर मौन,
और चंचल मन का आलस्य। 
🙏🏻💐💐💐💐💐🙏🏻

Monday, March 18, 2019

साहित्य प्रतियोगिता

श्री गुलजार जी की मूल रचना

मानवेंद्र नारायणी माया 
 तूझ से नाराज़ नहीं ज़िन्दगी

हैरान हूँ मैं
तेरे मासूम सवालों से
परेशान हूँ मैं

जीने के लिए सोचा ही नहीं
दर्द संभालने होंगे
मुस्कुराये तो मुस्कुराने के
क़र्ज़ उतारने होंगे
मुस्कुराऊं कभी तो लगता है
जैसे होंठों पे क़र्ज़ रखा है
वंदना अर्गल
तुझसे..भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी .
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ..

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी .
भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी ..

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता .
माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता ..

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता .
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयौ प्रकट श्रीकंता ..

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै .
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ..

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै .
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ..

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा .
कीजे सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ..

सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा .
यह चरित जे गावहि हरिपद पावहि ते न परहिं भवकूपा ..

स्त्री का मन

संग्रह श्रीमती शांता पारिख
आखिर एक स्त्री चाहती क्या है?
विगत सवा सौ सालों में मनोविज्ञान भी इस प्रश्न का उत्तर नही दे सका—आखिर एक स्त्री चाहती क्या है?—ओशो ने एक छोटी-सी कहानी के माध्यम से हंसाते हुए समझा दिया--

“पुराने समय की बात है। एक विद्वान को फांसी लगनी थी।

राजा ने कहाः बताओ कि आखिर औरत चाहती क्या है? जान बख्श देंगे, यदि सही उत्तर मिल जाये।

विद्वान ने कहाः हुजूर, मोहलत मिले तो पता कर के बता सकता हूँ।

एक साल की मोहलत मिल गई। बहुत घूमा, कहीं से भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। आखिर में किसी ने कहा कि दूर एक चुड़ैल रहती है, वही बता सकती है।

चुड़ैल ने कहा कि एक शर्त है। यदि तुम मुझसे शादी कर लो तो जवाब बताउंगी।

उसने सोच-विचार किया। जान बचाने के लिए शादी की सहमति दे दी।

शादी होने के बाद चुड़ैल ने कहाः चूंकि तुमने मेरी बात मान ली है, तो मैंने तुम्हें खुश करने के लिए फैसला किया है कि 12 घंटे मैं चुड़ैल और 12 घन्टे खूबसूरत परी बनके रहूंगी। अब तुम ये बताओ कि दिन में चुड़ैल रहूँ या रात को?

विद्वान वाकई में बुद्धिमान था। उसने सोचा यदि वह दिन में चुड़ैल हुई तो दिन नहीं कटेगा, रात में हुई तो रात नहीं कटेगी। अंततः वह बोलाः जब तुम्हारा दिल करे परी बन जाना, जब दिल करे चुड़ैल बन जाना।

यह बात सुनकर चुड़ैल ने प्रसन्न होकर कहाः चूंकि तुमने मुझे अपनी मर्ज़ी से जीने की छूट दी है, इसलिये मैं 24 घंटे, हमेशा ही परी बन के रहूंगी।

यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है।

स्त्री अपनी मर्जी का करना चाहती है। यदि स्त्री को अपनी मर्ज़ी का करने देंगे तो वो परी बनी रहेगी वरना चुड़ैल हो जाएगी।

यही बात पुरुष पर लागू होती है। अपनी स्वतंत्रता से जियेगा तो देवता, वरना राक्षस बन जाएगा। अतः मुद्दा स्त्री या पुरुष का नहीं है। संक्षेप में सारे जीवन का सारसूत्र है--मुक्ति में आनंद, दिव्यता, सौंदर्य है, और बंधन में है दुख, संताप, कुरूपता।"

किवाड़

*किवाड़*

मंगला सक्सेना
क्या आपको पता है ?
कि किवाड़ की जो जोड़ी होती है,
उसका एक पल्ला स्त्री और,
 दूसरा पल्ला पुरुष होता है।

ये घर की चौखट से जुड़े - जड़े रहते हैं।
हर आगत के स्वागत में खड़े रहते हैं।।
खुद को ये घर का सदस्य मानते हैं।
भीतर बाहर के हर रहस्य जानते हैं।।

एक रात उनके बीच था संवाद।
चोरों को लाख - लाख धन्यवाद।।
वर्ना घर के लोग हमारी ,
एक भी चलने नहीं देते।
हम रात को आपस में मिल तो जाते हैं,
हमें ये मिलने भी नहीं देते।।

घर की चौखट से साथ हम जुड़े हैं,
अगर जुड़े जड़े नहीं होते।
तो किसी दिन तेज आंधी -तूफान आता,
तो तुम कहीं पड़ी होतीं,
हम कहीं और पड़े होते।।

चौखट से जो भी एकबार उखड़ा है।
वो वापस कभी भी नहीं जुड़ा है।।

इस घर में यह जो झरोखे ,
और खिड़कियाँ हैं।
यह सब हमारे लड़के,
 और लड़कियाँ हैं।।
तब ही तो,
इन्हें बिल्कुल खुला छोड़ देते हैं।
पूरे घर में जीवन रचा बसा रहे,
इसलिये ये आती जाती हवा को,
खेल ही खेल में ,
घर की तरफ मोड़ देते हैं।।

हम घर की सच्चाई छिपाते हैं।
घर की शोभा को बढ़ाते हैं।।
रहे भले कुछ भी खास नहीं ,
पर उससे ज्यादा बतलाते हैं।
इसीलिये घर में जब भी,
 कोई शुभ काम होता है।
सब से पहले हमीं को,
 रँगवाते पुतवाते हैं।।

पहले नहीं थी,
डोर बेल बजाने की प्रवृति।
हमने जीवित रखा था जीवन मूल्य,
संस्कार और अपनी संस्कृति।।

बड़े बाबू जी जब भी आते थे,
कुछ अलग सी साँकल बजाते थे।
आ गये हैं बाबूजी,
सब के सब घर के जान जाते थे ।।
बहुयें अपने हाथ का,
 हर काम छोड़ देती थी।
उनके आने की आहट पा,
आदर में घूँघट ओढ़ लेती थी।।

अब तो कॉलोनी के किसी भी घर में,
किवाड़ रहे ही नहीं दो पल्ले के।
घर नहीं अब फ्लैट हैं ,
गेट हैं इक पल्ले के।।
खुलते हैं सिर्फ एक झटके से।
पूरा घर दिखता बेखटके से।।

दो पल्ले के किवाड़ में,
एक पल्ले की आड़ में ,
घर की बेटी या नव वधु,
किसी भी आगन्तुक को ,
जो वो पूछता बता देती थीं।
अपना चेहरा व शरीर छिपा लेती थीं।।

अब तो धड़ल्ले से खुलता है ,
एक पल्ले का किवाड़।
न कोई पर्दा न कोई आड़।।
गंदी नजर ,बुरी नीयत, बुरे संस्कार,
सब एक साथ भीतर आते हैं ।
फिर कभी बाहर नहीं जाते हैं।।

कितना बड़ा आ गया है बदलाव?
अच्छे भाव का अभाव।
 स्पष्ट दिखता है कुप्रभाव।।

सब हुआ चुपचाप,
बिन किसी हल्ले गुल्ले के।
बदल किये किवाड़,
हर घर के मुहल्ले के।।

अब घरों में दो पल्ले के ,
किवाड़ कोई नहीं लगवाता।
एक पल्ली ही अब,
हर घर की शोभा है बढ़ाता।।

अपनों में नहीं रहा वो अपनापन।
एकाकी सोच हर एक की है ,
एकाकी मन है व स्वार्थी जन।।
अपने आप में हर कोई ,
रहना चाहता है मस्त,
 बिल्कुल ही इकलल्ला।
इसलिये ही हर घर के किवाड़ में,
दिखता है सिर्फ़ एक ही पल्ला!!
    *( अज्ञात )*

रंग रँगीली होली

" रंग-रंगीली होली आई "     

रंग-रंगीली होली आई , खुशियों भरा त्यौहार लाई ।
हो रही ग्रीष्म ऋतु की आहट , शीत ऋतु की बिदाई ।।

ली मौसम ने अंगडाई , इंद्रधनुषी किरणें छाई ।
मत बोलो कड़वी बोली , सब खेलो मिल कर होली ।।

जल रही संग होली के नफरत की ये चिंगारी ।
आओ भर दें रंग उन दिलों में , बे-रंग हो गई ज़िदगीं जिनकी ।।

सम्भल जाओ नापाक कायरों , अब है हमारी बारी ।
यादगार कर देगें फागुन , ये दहाड़ है माँ के शेरों की ।।

रंग-रंगीली होली आई ,,,, ,,,,,,
आओ भर दें रंग उन दिलों में ,
बे-रंग हो गई ज़िदगीं जिनकी ।।


                           " मीनू मांणक "

छुटका बचपन

छुटका बचपन----

चुन्नू ,मुन्नू, पिंकू , टींकू
सपनों की दुनियां को देखो
सितारों और फूलों की दुनियां

कितनी भाती , मनभावन  तितलियां
आओ आओ हम भी पंख पसारें

उड़ते जायें परी से बांह फैलाये
हाथी आये, टैड़ी बियर भी,
बादल ऊपर नाचे छोटा सा खरगोश भी
नीली, गुलाबी होसुंदर दुनियां हमारी
सपनों को देंखे सोते हम मीठी लागे ये भी।

कितना प्यारा कमरा सजा है
मां पापा ने हमको दिया है
करना अब सच हमको सपने
पढ लिखकर नाचे गायें बने खूब बड़े।
    सुषमा व्यास 'राजनिधि'
    कहानीकार, कवियीत्री

नन्हों की दुनिया

नन्हों की दुनिया    (बालगीत)

पप्पू गप्पू चुनिया मुनिया
देखो नन्हे मुन्नों की दुनिया,
पापा ने कमरा बनवाया
मम्मी ने खूब सजाया।

कमरे का रंग गुलाबी
मन को भाए रोशनी,
बिस्तर सजा सुंदर है
नर्म रेशमी चादर है।

परियों का है प्यारा देश
नीला -नीला आकाश,
सितारे टिम-टिम करते
बादलों को देखें काश।

चलो पंखों से उड जाएं
चांद सितारे छू आएं,
खरगोश धूम मचाए
टैडी हाथी मौज मनाएं।

सुबह सवेरे जल्दी उठें
मम्मी पापा को प्रणाम करें,
मेहनत कर खूब पढें
अच्छे इंसान हम बन जाएं।

डां अंजुल कंसल"कनुप्रिया"

रूठे घर के कहकहे

जब से मकान बने हैं
घरों के कहकहे रूठ गए हैं
इस अंधी दौड़ में
सारे अपने पीछे छूट गए हैं
होली दिवाली पर पहले लोग मिलते भी थे
मोबाईल पर फौरवर्ड कर अब सब
उस ज़हमत से भी
बरी हो गए हैं

एक वक़्त था,
जब रसोई में से सुगंधें आती थीं
चाची ताई बुआ दादी
मिलकर अचार बनाती थीं
अब तो बस ऑर्डर करने के लिए
होटलों का नम्बर ढूंढ़ते नए हैं
अड़ोस पड़ोस की कटोरी की जगह
टेक अवे वाले खड़े हो गए हैं

एक ही कमरे में गद्दे डाल कर
सब मटरगश्ती करते थे
कैरम लूडो की बाज़ियाँ होती थीं
अन्ताक्षरी में नए सुर निकलते थे
अब दीवारों को ताँकते हैं
गुमसुम पड़े रहते हैं
अपने अपने कमरे के, अब चोंचले बड़े होते हैं

शादी ब्याह में हज़ारों रस्में होती थीं
हर तरफ़ गुलज़ार ख़ुशियाँ होती थीं
देवरों और सालियों के लफड़े बड़े होते थे
एक शादी में अगली शादी के बीज पड़े होते थे
अब तो नाते रिश्तेदार ही ख़त्म हो गए हैं
जब से दस्तखत से रिश्ते जुड़ गए हैं

घूमने के लिए चिड़ियाघर ही सही
पूरा परिवार साथ जाता था
लड्डू मठरी पूरी सब्ज़ी में
पिकनिक का मज़ा आता था
अब वैकैशन होती हैं
सिंगापुर मलेशिया से नीचे बात नहीं होती है
फ़ोटो खिंचते हैं, पर सारी सेल्फ़ी ही होती हैं

बड़े बूढे़ जब गुज़रते थे
तो दुःख में भी परिवार साथ होता था
बिना हल्दी छौंक के खाने में
आशीर्वाद और स्वाद,
दोनों का अंबार होता था
अब मातमपुर्सी फ़ोन पर होती है
गुज़रने की ख़बर अख़बारों से मिलती है

हाँ! हम मोर्डन हो गए हैं
चाँद से आगे निकल पड़े हैं
१०० करोड़ की आबादी में भी
हम सब अकेले खड़े हैं
कोई हमदर्द नहीं है,
सिर्फ़ मतलब तक के हैं
प्यार अपनापन रिस चुका है
अब हम जेब में,
सिर्फ़ ग़ुरूर रखते हैं

ऐसा ही रहा तो जल्द ही हम रोबोट बन जाएँगे
आँसु हँसी शर्म लिहाज़,
कुछ भी महसूस नहीं कर पाएँगे
चार कंधों के लिए भी कोई मौजूद नहीं होगा
मरेगा बाद में,
पहले ख़ुद के लिए इंसान
एक क़ब्र खोद रहा होगा

क्यो रूठे हो तुम।मुझसे

*
बनी* रेबिट तुम प्यारे से
क्यों रूठे रूठे हो मुझसे
नहीं हूँ तुमसे ज्यादा दूर
तुम मेरे नयनों के नूर

देखो  गोलू हाथी है
गोल सी मच्छर दानी है
चांद सितारे लटक रहे
तितली के हैं रंग  बिखरे

ग़ुब्बारों की है दुनिया
नरम गरम गादी तकिया
मेरा बचपन लौट आया
संग खिलौने ले आया

लकड़ी की काठी का घोडा
मन  मेरा शिशु पन में दौड़ा
इस बाल पने में रहने दो
भगवन बचपन को जीने दो

तारों के संग हँसने दो
चंदा सा चम चम कर दो
नरम नरम कंबल ओढ़ा के
निंदिया रानी आने दो

~~~~**~~~**~~~**~~

रचयिता:-
कुसुम सोगानी - लेखिका
साहित्यकार

जीवन निखार

हरियाँ हरियाँ बाग मे ,
हरा खिलाऊ तुमको पान।
यहीं  बिड़ला है सांक्षी  ,
रखना मेरा मान समान ।
लाल लाल रंग खिले अधर और हरा भरा संसार ,
तुम मेरे जीवन मे लाना निखार ।
जीवन संगिनी के रुप मे
दिनकर बनकर तुझे मेरे
संग चलना है।
सपनों की कोयल सुघर
हिंड़ोले झूलेगी ।
आशा बगियाँ फूलेगी ।
यहीं भाव से करता हूँ स्वीकार ।
     मनोरमा जोशी
स्वरचित ।🙏🏻

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