Thursday, November 14, 2019

छोटा सा बच्चा पिता बना
पापा को डाँटते बोला
पापा मत खाओ गुटका
नुक़सान करे ये दिल का
नहीं रोकना कहने से
आज जनम दिन चाचा का
बाल दिवस है पापा
कुछ गिफ़्ट करो इस दिन का
उपहार मेरा उत्तम होगा
कर दो त्याग तबांखू  का
जीरो बिमारी लाइफ़ जियो
जूस लस्सी पानी खूब पियो
आज आपका बना मैं डॉक्टर
अवसर बाल दिवस का पाकर
जैसा पापा आप करोगे
हम बच्चे अनुसरण करेंगे
चलो मनायें चौदह नवम्बर
बच्चे बनो बच्चों में जाकर

...........,,,,🌺🌷🌷🌷🌷🌷
🌹🌹🌹कुसुम सोगानी🌺🌺

बाल दिवस की सभी बच्चों की मातायें पिताओं को बधाई🌹🌹

दौड़


लघु कथा
( दौड़)
मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि जल्दी उठा करो, स्कूल  हमेशा समय पर पहुँचना चाहिए। मैंने लगभग खींचते हुए अपनी छह साल की बेटी को उठाया ओर साथ ही उसे तैयार करते हुए, समय की पाबंदी पर बोले भी जा रही थी।
 जब उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तुम सुन भी रही हो। उसने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए कहा,
"आप तो कहती थी कि बचपन के दिन बहुत सुहाने होते है,
पर मुझे तो लगता है कि बचपन स्कूल ओर कोचिंग के बीच भागने को कहते है। "
अपनी बात कहकर उसने अपना बैग लिया ओर स्कूल के लिए निकल गई ओर मैं बेबसी से उसकी तरफ देख रही थी,
 ओर सोच रही थी कि सच में आज बच्चे अपना बचपन कहा जी पा रहे है, जहाँ देखो वहाँ एक दौड़ है, चाहे परीक्षा में अच्छे अंक लाने 
की हो या टी. वी के किसी रियलटी शो में भाग लेने से लेकर उसे जीतने तक। आजकल बच्चों की ज़िन्दगी भी दौड़ जैसी हो गई है।
आदिति  भदोरिया
बचपन __________
 फूलों सा कोमल है बचपन , उस पर ना अत्याचार करो , कच्ची कलियों को खिलने दो , उस पर ना प्रहार करो ।
बच्चों के मुस्कुराहट के आगे, फीका है धन और दौलत , घर की रौनक घर की खुशियां, बच्चों के बदौलत , मस्ती में मस्त रहने दो , बचपन का नाम व्यापार करो। प्यारी बहना का भाई , मां बाप का राज दुलारा है, मनमोहना ,कृष्ण -कन्हैया , सबकी आंखों का तारा है, जीवन उनका उद्देश्य पूर्ण हो , इस पर सुविचार करो । बच्चे दिल की धड़कन है, बच्चे देश की शान है, जिस घर में बच्चे नहीं , वह घर रेगिस्तान है , धर्म जाति से ऊपर उठकर, जी भर कर उनको प्यार करो। बीत गया सुनहरा पल बचपन का, वह यादगार बन जाएगा , संगी साथी छूट जाएंगे , बचपन लौट कर ना आएगा, बगिया को सींचो स्नेह जल से, उनका तुम सत्कार करो। श्रीमती शोभा रानी तिवारी 619 अक्षत अपार्टमेंट, खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश, मोबाइल 89894 09210
f
मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि जल्दी उठा करो, स्कूल हमेशा समय पर पहुँचना चाहिए। मैंने लगभग खींचते हुए अपनी छह साल की बेटी को उठाया ओर साथ ही उसे तैयार करते हुए, समय की पाबंदी पर बोले भी जा रही थी। जब उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तुम सुन भी रही हो। उसने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "आप तो कहती थी कि बचपन के दिन बहुत सुहाने होते है, पर मुझे तो लगता है कि बचपन स्कूल ओर कोचिंग के बीच भागने को कहते है। " अपनी बात कहकर उसने अपना बैग लिया ओर स्कूल के लिए निकल गई ओर मैं बेबसी से उसकी


बीता बचपन

*
" बीता बचपन आ गया पचपन "*
बगीचे में बैठे ठंडी हवाओं का झोंका लेते हुए,
गुनगुनी धूप में बचपन का पिटारा निकाला था।
सुहानी यादों को संजोये तस्वीरों को सांझा करते हुए,
फिर से निहारते नई पीढ़ी में समेटे उकेर लिया था।
खट्टी मीठी बातों के संग गुदगुदाती यादें ताजा करते हुए,
भाई बहनों संग दिन महीनों सालों तक सम्हालते हुए गुजारा था।
शिकवे शिकायतों का दौर गुनगुनाते हुए,
बीते हुए लम्हों में रंगीन पड़ावों का सफर सुहाना था।
सुनहरी यादों के सहारे हसीन लम्हों को लिए हुए,
ना जाने क्यों बचपन के खेल खिलौनें घरौंदे अच्छे लगते थे।
अब परिपक्व हो दोस्ती यारी सुहाने पलों का तराना लिए हुए,
बीता बचपन आ गया पचपन पाँव जरा सा लड़खड़ाया था।
यादें ताजा सुहानी लड़कपन की फरियाद करते हुए,
काश.! फिर से लौट आये बचपन जैसे अभी पचपन में बच्चों का जमाना था।
तू - तू ,मैं -मैं हो जाती कुछ पलों में अलग होते हुए,
फिर मम्मी पापा ने आकर प्रेम से समझाया करते थे।
होली ,दीवाली, रक्षाबन्धन पर भाई बहनों के संग लिए हुए,
भले ही गिनती में एक या दो नही पाँच भाई बहनों का संग निराला था।
कमी किसी चीजों की नहीं भरपूर आनंद सहयोग लिए हुए,
आदर्श परिवार पूरा परिवार भंडार गृह का खजाना था।
बचपन की वो सुहानी यादें ताजा आधी उम्र लिए हुए,
काश...! अब फिर से लौट आये बचपन जैसे पचपन से बचपन की ओर चले थे ..
   *शशिकला व्यास*

व्यक्ति

व्यक्ति
एक लघुकथा
एक बार एक व्यक्ति अपने तीन बच्चो को लेकर डबल डेकर बस से यात्रा कर रहा था।बस कुछ खाली थी।वह व्यक्ति बस की खिडकी के पास विचार मग्न गंभीर अवस्था मे बैठा था।
तीनो बच्चे खाली बस का पूरा पूरा आनन्द उठा रहे थे।एक सीट से दूसरी सीट पर बन्दर के भाँति उछलकूद करने मे मस्त थे।
दूसरे यात्री पहले तो उनकी मौज के दर्शक बने रहे ।अंत मे परेशान होकर उस व्यक्ति की ओर देखने लगे ।जो ऐसा बैठा था मानो उसका कोई संबंध ही न हो ।उन यात्रियो ने उस व्यक्ति के पास जाकर बोला महाशय आपके बच्चे बस मे धम चौकडी मचा रहे है और आप निश्चिन्त बैठे है ।वह व्यक्ति हडबडाकर देखने लगा,स्थिति को समझकर शर्मिन्दा हुआ और बोला
       माफ कीजिए हम लोग अभी ही केइएम अस्पताल से आ रहे है।गंभीर बीमारी के कारण बच्चो की माँ का देहावसान हो गया है।मै इसी विचार मे हू कि इन निष्पाप को इस घटना को कैसे बताऊं।
        यह सुनते ही बस मे वातावरण बदल गया।एक पारसी युवती ने पर्स मे से बिस्किट का पैकेट निकाला और बच्चो को देने लगी ।सभी यथा शक्ति सहयोग का हाथ बढ़ाया ।अब वे बच्चे शैतान नही लग रहे थे, ना ही वह व्यक्ति बेजवाबदार।

अमिता मराठे
इन्दौर
स्व रचित रचना

नन्हे तारे




*मेरे बालनाटक संग्रह रंग मंच के नन्हे तारे से एक नाटक*
*उम्र* 7,8 साल


*गणपति बप्पा मोरया*


 पात्र परिचय


( देवू शेखर  पूजा  पिंकी  कॉलोनी में रहने वाले 8   9  साल के बच्चे  अभि भैया)


 पहला दृश्य.


(गणेश उत्सव का समय है बच्चों ने मिल जुल कर जोर शोर से सजावट की है। कॉलोनी में एक और टेबल को सजाकर छोटा सा स्टेज बनाया है।फूल माला आरती नारियल सब थाली में सजा हुआ रखा है।

बच्चे गणेश जी बैठा रहे हैं कंधे पर गणपति बप्पा को जय कारे के साथ लेकर आते हैं)

देवू--- (कांधे पर गणपति जी की मूर्ति रखे हुए हैं)

         गणपति बप्पा

बच्चे -------मोरया ....।

देवू--------अगले बरस तू

बच्चे------ जल्दी आ।

शेखर------जय ..गणेश ...

बच्चे -------जय गणेश।

 पूजा------ 1234

बच्चे --------गणेश जी की जय जयकार

पिंकी ------;गणपति बप्पा

 बच्चे --------मोरिया।

अभि भैया----(स्टेज के पास खड़े हैं)

                  लाओ लाओ यहां रखो गणपति जी को. पहले इनकी पूजा करेंगे फिर स्थापना करेंगे।
बच्चे ---------खुशी से जय गणेश जय गणेश

अभि भैया----- आओ पिंकी यह लो तुम आरती करो।

 शेखर --------नहीं भैया मैं आरती करूंगा।

अभिभैया------अच्छा आओ (आरती की थाली उठाकर शेखर आरती करता है। सब आरती गाते हैं जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा)

 अभि भैया-------हां तो दोस्तों आज से 10 दिनों तक गणपति जी हमारे मेहमान हैं हमें इनकी सेवा स्वागत-सत्कार अच्छी तरह करना है।

पूजा -------अरे भैया भोग तो लगाइए।देखो मैंने मोदक ला कर रखे हैं उधर कटोरी में

देवू--------ललचाते हुए वाह मोदक।

पूजा ---------गणपति जी के लिए है तुम्हारे लिए नहीं (

सब हंसते हैं)

 देवू--------- प्रसाद तो मिलेगा ना

अभिभैया------हां मिलेगा। और जिम्मेदारी भी ।रोज तिलक करना,पूजा करना, माला फूल लेकर आना , रात को गणपति जी को सुलाना।

शेखर ---------अरे भैया यह सब काम मैं करुंगा ।

पिंकी ----------भैया म्यूजिक सिस्टम लगाइए न।

 अभिभैया ---------शाम को लगा दूंगा गणपति जी को उनके ही भजन सुनायेंगे।

 पूजा ----------(हंसते हुए) कितना अच्छा लग रहा है कितनी रौनक है कितनी सुंदर सजावट है. देखो लग ही नहीं रहा कि यह सब हमने किया है ।

अभि भैया------ चलो चलो यह प्रसाद लो। एक बार जोर का जयकारा लगाओ, और घर चलो शाम को मिलते हैं।


दूसरा दृश्य


(शाम का समय है बच्चे गणपति जी के पास हंस गा रहे हैं म्यूजिक सिस्टम लग चुका है गणपति जी के गाने बज रहे हैं चारों तरफ रोशनी झिलमिल आ रही है)

 देवू--------(गाने के साथ साथ गुन गुनाता है) देवा हो देवा गणपति देवा ।
पूजा ----------तुमसे बढ़कर कौन  तुमसे बढ़कर कौन..
 पिंकी---------- और तुम्हारे भक्तजनों में ....
शेखर –--------हमसे बढ़कर कौन।
                ( सबखिलखिलाते हैं)
 अभि भैया---------- क्यों कैसा रहा
बच्चे --------------मजा आ गया भैया।
 अभि भैया-------- चलो आरती का समय हो गया है।
 शेखर -----------भैया मैं करूंगा।
 पिंकी----------- नही। तूने सुबह की थी अब देवू करेगा।
देवू------------हां मैं करूंगा आरती।
 अभि भैया ----------अच्छा तो कर ले आजा जल्दी ।यह आरती जला।
शेखर ------------मैंने कहा ना मैं ही करुंगा आरती।
 पूजा ---------नहीं शेखर देवू करेगा
देवू----------यह तो गलत है  शेखर । तू ही आरती करे तू ही माला पहनाए तू ही प्रसाद बांटे।
शेखर ----------हां मैं ही करूंगा यह सब क्या तुम जानते नहीं गणेश जी पर मेरा अधिकार सबसे ज्यादा है।
अभिभैया ---------यह कैसी बातें कर रहे हो शेखर

शेखर---------तो पूछ लो इन्हीं लोगों से आज मुझ पर गुस्सा दिखा रहे हैं ,गणेश जी खरीदते समय कैसे विनती कर रहे थे ,भूल गए क्या।
अभिभैया--------- विनती.... मतलब ।
पिंकी ----------- वह क्या है भैया गणपति जी की मूर्तियां बड़ी महंगी-महंगी थी और हमारा चंदा कम हुआ था।
पूजा ------------तो शेखर ने ज्यादा पैसे मिला दिए थे।
 देवू-----------तब हमें क्या पता था कि यह ऐसा करेगा।
 शेखर---------ए देवू   । यह मत भूल अगर मैं पैसे नहीं मिलाता तो तुम लोग गणपति जी भी नहीं रख पाते।
देवू---------चल जा जा उलझ मत मुझसे ।
अभि भैया--------एक मिनिट । बंद करो यह फालतू बातें और शेखर तुम यह क्या कर रहे हो?
 शेखर ----------सच ही कह रहा हूं मैंने ज्यादा पैसे मिलाएं हैं तो हर चीज मैं पहले करूंगा।
देवू--------(गुस्से में) तो तू रख अपने गणपति अपने पास मैं जाता हूं ।वह चला जाता है ।
अभि भैया--------अरे देवू..... । शेखर रोको उसे....।
 शेखर --------------मैं क्यों रोकूँ। जाता है तो जाए चलो हम आरती करते हैं।
 पिंकी ------------तू ही कर।  मैं भी जा रही हूं
पूजा-------( पैर पटकते हुए ) और मैं भी । अब कर अकेले ही सब कुछ।
शेखर ----------अरे जाओ जाओ इतना गुस्सा किसे बताते हो ।
अभि भैया ----------शेखर तुझे तो मैं बाद में देखूंगा पहले उन्हें मनाता हूं।
शेखर ---------मैं अकेला ही अच्छा हूँ।


तीसरा दृश्य


(गणपति जी के पास उदासी छाई है शेखर अकेला बैठा है उसके साथ कोई नहीं है )

शेखर---------(मन ही मन)

                    जिसे नहीं आना मत आओ मैं तो आरती करूंगा भगवान की आरती की तैयारी करके आरती करता है फिर जोर से जयकारा लगाता है गणपति ....बब्बा ........।
पीछे कोई भी नहीं रहता जो बोले मोरिया ।वह पलट कर देखता है फिर स्वयं ही धीरे से कहता है मोरया।
 शेखर --------पता नहीं कब तक गुस्सा रहेंगे यह सब।( चहल कदमी करते हुए)
 ऐसे अकेले अकेले तो बिल्कुल भी मजा नहीं आ रहा ।(2 दिन ऐसे ही बीत जाते हैं.)
 अभि भैया-------(तीसरे दिन )अरे शेखर क्या हालचाल हैं ।और तुम्हारे गणपति जी इतने उदास क्यों दिख रहे हैं।
शेखर ---------मुझे बुखार है अभि भैया दवाई खा कर आया हूं।
अभि भैया ----------क्या....? बुखार । दिखाना तो अरे हां तुम तो गरम हो। फिर यहां क्यों बैठे हो। आराम करो ।
शेखर ----------गणपति जी को अकेला कैसे छोड़ दूं।
 अभि भैया---------अब तुमने ही तो सबसे लड़ाई की है ।
शेखर ----------मैं शर्मिंदा हूं भैया। पर कैसे मनाऊं सबको कोई नहीं मानेगा।
 अभिभैया-------तुम्हें गलती का एहसास हुआ यही बहुत है ।चलो रात को आरती हम दोनों साथ में करेंगे।
 शेखर ---------(खुश होकर) सच भैया।
 अभि भैया---------अभीचलो आराम करो।



 चौथा दृश्य


(अभी भैया और शेखर भगवान को फूल माला पहनाते हैं आरती करते हैं शेखर बुझे मनसे आरती करता है फिर धीरे से जयकारा लगाता है बोलो गणपति महाराज की.....  )
 बच्चे ----------(पीछे आकर खड़े हो जाते हैं और जोर से जोर से चिल्लाते हैं जय......)

 शेखर चौंक कर  पलटता है। खुशी से उसके आंसू निकल आते हैं पूरी हिम्मत के साथ फिर जयकारा लगाता हैं गणपति बब्बा.......
 बच्चे ------------मोरया......।

( शेखर सबसे गले मिलता है )
शेखर -----------तुम लोग.....। तुम्हें भैया लेकर आए ना
पूजा -------------अब तुम बेवकूफ हो तो हम थोड़े ही है ।
पिंकी ------------भइया ने बताया तुम बीमार हो तो हम अपने आप को रोक नहीं पाए।
शेखर------------ सच तुम लोग सच्चे मित्र हो।
 देवू-------------और तू तू.. बेवकूफ मित्र। है ना
 शेखर--------(उसे  गले लगते हुए ) सच।
अभिभैया---------- लो भाई प्रसाद लो सब ।
गणपति बब्बा .........
बच्चे ----------मोरया......।
 पूजा -----------एक दो तीन चार
बच्चे----------गणपति जी की जय जयकार।
(तभी गाना बज उठता है देवा हो देवा.......।
बच्चे झूमते हैं)
पर्दा गिरता है।

प्रतिमा अखिलेश

दौड़


लघु कथा

( दौड़)

मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि जल्दी उठा करो, स्कूल  हमेशा समय पर पहुँचना चाहिए। मैंने लगभग खींचते हुए अपनी छह साल की बेटी को उठाया ओर साथ ही उसे तैयार करते हुए, समय की पाबंदी पर बोले भी जा रही थी। जब उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तुम सुन भी रही हो। उसने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "आप तो कहती थी कि बचपन के दिन बहुत सुहाने होते है, पर मुझे तो लगता है कि बचपन स्कूल ओर कोचिंग के बीच भागने को कहते है। "
अपनी बात कहकर उसने अपना बैग लिया ओर स्कूल के लिए निकल गई ओर मैं बेबसी से उसकी तरफ देख रही थी,  ओर सोच रही थी कि सच में आज बच्चे अपना बचपन कहा जी पा रहे है, जहाँ देखो वहाँ एक दौड़ है, चाहे परीक्षा में अच्छे अंक लाने
की हो या टी. वी के किसी रियलटी शो में भाग लेने से लेकर उसे जीतने तक। आजकल बच्चों की ज़िन्दगी भी दौड़ जैसी हो गई है।
*आदिती भदोरिया 

बाल दिवस

चाचा नेहरू प्यारे थे ।

भारत माँ के दुलारे थे ।
देश के पहले प्रधानमंत्री थे।

लाल गुलाब उन्हें प्यारा था ।
बच्चों से प्यार जताते थे ।

बच्चे सदा उन्हें चाहते थे ।
भारत माँ का लाल यह

सबसे ही था न्यारा।
भारत माँ का नाम बढाया ।

यह ऐसा लाल चमन का

चारूमित्रा नागर

भोली मुस्कान



भोली सी जिनकी मुस्कान,
थोड़े से हैं जो शैतान ,
हर घर के आंगन की रौनक ,
ये बच्चे है पुष्प समान।
खुशियों की खुशबू फैलाते ,
घर आंगन में उधम मचाते ,
शैतानी कर चुपके से ,दादी के आंचल में छुप जाते।
गुस्सा खूब दिखाती है माँ,
मन ही मन मुस्काती रहतीं ।
मेरा लाल है मेरा कान्हा ,सखियों
से वह कहती रहतीं।
दादाजी का प्यार बरसता ,
पापा बुनते सपने कल के।
दीदी की आंखों मे ममता ,प्यार
के मोती हर पल झलके।
ये भविष्य हैं ,भावी पीढ़ी है
इनको हम सब सम्भालें।
संस्कार इन्हें उत्तम हम देकर
एक अच्छा इंसान बना लें।

अचला गुप्ता
इंदौर

हम बच्चे



क्या हुआ जो बच्चे हैं
मन के तो हम सच्चे हैं
बात की अपनी पक्के हैं
देश के लिए मर - मिट जाएँगे ।।

माँ के हम सपूत हैं
दुश्मन के लिए भूत हैं
ईश्वर के हम दूत हैं
काम शांति के कर जाएँगे ।।

देश हमारा प्यारा है
सब देशों से न्यारा है
पढ़-लिखकर महान बनेंगे
नाम देश का कर जाएँगे ।।

शहीदों ने इसे ख़ून से सींचा है
हम इसके फूल ये हमारा बाग़ीचा है
हम बच्चे इसकी लक्ष्मण रेखा हैं
रक्षा में इसकी बिछ जाएँगे ।।

मुश्किल से आज़ादी पाई है
वीरों ने अपनी जान गवांई है
हिंदु- मुस्लिम- सिक्ख- ईसाई
देश पर बलीहारी जाएँगे ।।

स्वरचित
उषा गुप्ता
इंदौर

बाल मन


बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
जिसमें खिल नहीं पाता बचपन
क्या होती माँ की लोरियाँ
क्या होती गर्म रोटियां
क्या होती रिश्तों की गर्मियां
नहीं जानता जो उपवन
क्या होता गुड्डेगुड़ियों का ब्याह
साथी संग दौड़ा नहीं जो बीच राह
गुल्ली डंडा और पतंग मांझा
क्या होता मस्तियों से रिश्ता साँझा
खेल मैदान है आसमान
गेंद  बन जाती चाँद समान
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
 जहाँ  गुजरती  सांसे किसी नुक्कड़ पर
चाय की केतली की भाप पर
छोटू छोटू की आवाज पर
बारूद के ढेर पर, तगारी की रेत पर
 कचरे में खजाने की खोज पर
सपनें बुनता उधेड़ता कोरा मन
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
 जिसमें बाली उमर बिन सिंदूर बनती दुल्हन
काँच  टूट बिखरता दिखती न चुभन
सुबह में है साँझ की थकन
खेल है  चाकू,छुरी  और गन
पटाखों का तमंचा दूर गगन
धुँआ धुँआ हो रहा चमन
 किसको दिखता बुझता सुलगता मन
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
जिसमें सजा जीवन का झूठा श्रृंगार
 माया का अंबार ग़ुम बापू का दुलार
 माँ नहीं मोबाईल है पास
कैसे बनें मीठे अहसास
किताबों में नहीं परियों की कहानी
जीवन में नहीं जीवन की रवानी
इस बालदिवस :-
बचपन को मिल जाता बचपन
सच कर लेता वो सुन्दर सपन

काव्य कृति :-
डॉ.संगीता भारुका

सार्थकता बाल दिवस

🎊  बाल दिवस,मनाना सार्थक।
🎊प्रभा जैन,,
चाचा नेहरू के जन्मदिवस को,आओ हम सब मिल  मनाएं आज,,,,,खुशियां बांटे जिसने सबके दिलों पर किया राज
बच्चों में वे खुश रहते थे,प्यारे बच्चे भी उनसे खुश रहते थे,,
कोट में टँके लाल गुलाब की खुशबू से,बच्चा 2 हो जाता सराबोर,,
आओ हम सब मिल मनाये,जन्मदिन उनका आज
बच्चों में खुशियाँ बांटे ,और बढ़ाएं शिक्षा और संस्कार
तभी देश को और मिलेंगे,नेहरू गांधी और सरदार
आओ हमसब हिलमिल इन प्यारों के संग खुशियां बांटे,और देश के बाल को दे संस्कार
जो भोली मुस्कान से हिलमिलकर रहे भाईचारे के संग
बिना स्वार्थ के सेवा संस्कारों से  देश को उन्नत करे जग,,,
ईमानदारी,प्यार ,की मिठास पूर्ण,ख़िलादें इन सब को केक
तभी तो चाचा नेहरू का हैप्पी बर्थ डे हो जाएगा सार्थक,,,,🎊🥁💐
खबर दर्पण,14 नवम्बर 2019     


             
                              खामोश सिसकता बचपन
                                        ----------------------------------------
                                          (बाल दिवस पर विशेष रिपोर्ट)
                                  * डा . सुनीता श्रीवास्तव (विषेश  प्रतिनिधि)
स्वतंत्र भारत ने पंडित जवाहरलाल नेहरु  के जन्मदिन को बालदिवस का रुप भले ही दिया हो पर मानवीय स्तर  पर  वह बच्चों  के साथ न्याय करने मे अक्षम रहा है ,कारण कोई भी हो पर  यह एक कडवा सच हैं  कि  खामोश बचपन अब सिसक  रहा हैं  ।सर्वेक्षण के  आधार  पर  साबित होता हैं  कि  तमाम भौतिक  सुख सुविधाओं  के वावजूद आज बचपन पीडित हैं  हर क्षेत्र में  ।रिपोर्ट के आधार प्रतिमा  अकेले इंदौर  शहर में  एक साल में  478 रिपोर्ट दर्ज हुई जिसमे से 467 पर  कोई एक्शन  ही नही हुआ क्योकी शिकायतकर्ता  खुद ने आगे बड़ने से इन्कार कर  दिया ।जब पुलिस  की फाइल  से कुछ लोगो से पूछताछ  की तो निम्न बिंदू सामने आये--
1-अभी एक्शन लने पर  धमकी मिल रही हैं  बेहतर हैं  हम चुप हो जाए क्योकी कोई साथ तो देगा नही बस कागजी कार्यवाही  चलती रहेगी जो होना था वो हो चुका।
2-सामने वाले ने सक्षम अधिकारी  को खिलापिला दिया।
3-बार बार कचहरी के चक्कर में  लगाने पड  रहे हैं  समय नही हैं ।
4-कोई सुनने वाला नही है  ।
5-सबूत ही खत्म कर  दिये
यह तो वो कारण हैं  जो बच्चों  के साथ गल्त  हादसो के बाद पता चलने पर  किये  गये  पर  कई  किस्से तो बच्चे  खुद ही नही बताते है  और उनमें  89%स्वयं  परिवार के लोग ही जिम्मेदार  होते है  जो एक दुखद पहलू  हैं  ।
इंदौर  शहर में  इस समय 59 बालअनाथ आश्रम चल रहे है जो मान्य हैं  पर वहा भी अन्दरूनी हालत  सही नही हैं ,कहने के लिय कई  सामाजिक संस्था उनको आर्थिक सुविधाएं प्रदान करती हैं  पर  उनका सही उपयोग नही होता हैं  अभी हाल की ही बात हैं  इंदौर की एक प्रसिध्द  बालाश्रम  में  पित्रपक्ष में  कुछ दान  स्वरुप फल आदी लेकर जाना हुआ बातचीत अधिकारियो से चल रही थी तभी एक परिवार के लोग अपने पिताश्री के श्राद्ध में  कुछ कीमती सामान  आकर दे गये ,उनके जाने के बाद वो सामान तुरंत संचालक के घर पहुँचा दिया गया जब पुछा तो कहा गया एसा उनको करने का निर्देशन है  वरना सेवानिवृत्त  कर  दिये जाते है  मन कडवाहट  से भर  गया और लगा अपना सामान झुग्गी-झोपड़ी मे ही दे दो तो बेहतर है ।
नन्ही नन्ही बच्चियों के साथ परिवार के लोग ही उनका शोषण करते हैं  जिसका ग्राफ बडा हैं ,पर  आजकल लड़के  लोग भी हवस  का शिकार  हो रहे है  इंदौर के प्रसिध्द  उधोगपति द्वारा संचालित बालाश्रम  में जब महाराष्ट्र  से आये तीन भागे बच्चे  पकडा गए  तो उनका यही कहना  था की वार्ड्न  पुरुष उनको रात में  परेशान  करता था ।
इंदौर की एक बालाश्रम  में  तो  कुछ बच्चे  बड़े लोगो की  नाजायज निशानी हैं  सबसे मजे की बात यहा के कर्मचारी  भी इतने नालायक हो गए  है  कि  खुलेआम  सौदा  करते  है  इसका एक दूसरा  पहलू  चोकाने वाला भी था जब साथ के एक रिपोर्टे जो ट्रेनर था  उसे बालाश्रम  के एक कर्मचारी  ने कहा - यह तो आपका बच्चा  है उस बच्चे  के नाक नकक्ष  भी मिला दिये,(मतलब आप कदम रखे तो सम्हलकर)
यह हम भारतीयो का आधुनिक  समाज का मन है ।
निसन्देह यह एक गम्भीर मामला है  जो पेचिदा हैं  जिसे  धेर्य  के साथ समाज के हर पहलू से मनन करना होगा ।
                                                                                                               समाचार  दर्पण,14 नवम्बर 


                     
       खमोश सिसकता बचपन
        -------------------------------------------------


(बाल दिवस पर  विशेष  रिपोर्ट )
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*डा. सुनीता श्रीवास्तव (विशेष प्रतिनिधी)
                                           
स्वतंत्र भारत ने पंडित जवाहरलाल नेहरु  के जन्मदिन को बालदिवस का रुप भले ही दिया हो पर मानवीय स्तर  पर  वह बच्चों  के साथ न्याय करने मे अक्षम रहा है ,कारण कोई भी हो पर  यह एक कडवा सच हैं  कि  खामोश बचपन अब सिसक  रहा हैं  ।सर्वेक्षण के  आधार  पर  साबित होता हैं  कि  तमाम भौतिक  सुख सुविधाओं  के वावजूद आज बचपन पीडित हैं  हर क्षेत्र में ।पर्ट के आधार प्रतिमा  अकेले इंदौर  शहर में  एक साल में  478 रिपोर्ट दर्ज हुई जिसमे से 467 पर  कोई एक्शन  ही नही हुआ क्योकी शिकायतकर्ता  खुद ने आगे बड़ने से इन्कार कर  दिया ।जब पुलिस  की फाइल  से कुछ लोगो से पूछताछ  की तो निम्न बिंदू सामने आये--
1-अभी एक्शन लने पर  धमकी मिल रही हैं  बेहतर हैं  हम चुप हो जाए क्योकी कोई साथ तो देगा नही बस कागजी कार्यवाही  चलती रहेगी जो होना था वो हो चुका।
2-सामने वाले ने सक्षम अधिकारी  को खिलापिला दिया।
3-बार बार कचहरी के चक्कर में  लगाने पड  रहे हैं  समय नही हैं ।
4-कोई सुनने वाला नही है  ।
5-सबूत ही खत्म कर  दिये
यह तो वो कारण हैं  जो बच्चों  के साथ गल्त  हादसो के बाद पता चलने पर  किये  गये  पर  कई  किस्से तो बच्चे  खुद ही नही बताते है  और उनमें  89%स्वयं  परिवार के लोग ही जिम्मेदार  होते है  जो एक दुखद पहलू  हैं  ।
इंदौर  शहर में  इस समय 59 बालअनाथ आश्रम चल रहे है जो मान्य हैं  पर वहा भी अन्दरूनी हालत  सही नही हैं ,कहने के लिय कई  सामाजिक संस्था उनको आर्थिक सुविधाएं प्रदान करती हैं  पर  उनका सही उपयोग नही होता हैं  अभी हाल की ही बात हैं  इंदौर की एक प्रसिध्द  बालाश्रम  में  पित्रपक्ष में  कुछ दान  स्वरुप फल आदी लेकर जाना हुआ बातचीत अधिकारियो से चल रही थी तभी एक परिवार के लोग अपने पिताश्री के श्राद्ध में  कुछ कीमती सामान  आकर दे गये ,उनके जाने के बाद वो सामान तुरंत संचालक के घर पहुँचा दिया गया जब पुछा तो कहा गया एसा उनको करने का निर्देशन है  वरना सेवानिवृत्त  कर  दिये जाते है  मन कडवाहट  से भर  गया और लगा अपना सामान झुग्गी-झोपड़ी मे ही दे दो तो बेहतर है ।
नन्ही नन्ही बच्चियों के साथ परिवार के लोग ही उनका शोषण करते हैं  जिसका ग्राफ बडा हैं ,पर  आजकल लड़के  लोग भी हवस  का शिकार  हो रहे है  इंदौर के प्रसिध्द  उधोगपति द्वारा संचालित बालाश्रम  में जब महाराष्ट्र  से आये तीन भागे बच्चे  पकडा गए  तो उनका यही कहना  था की वार्ड्न  पुरुष उनको रात में  परेशान  करता था ।
इंदौर की एक बालाश्रम  में  तो  कुछ बच्चे  बड़े लोगो की  नाजायज निशानी हैं  सबसे मजे की बात यहा के कर्मचारी  भी इतने नालायक हो गए  है  कि  खुलेआम  सौदा  करते  है  इसका एक दूसरा  पहलू  चोकाने वाला भी था जब साथ के एक रिपोर्टे जो ट्रेनर था  उसे बालाश्रम  के एक कर्मचारी  ने कहा - यह तो आपका बच्चा  है उस बच्चे  के नाक नकक्ष  भी मिला दिये,(मतलब आप कदम रखे तो सम्हलकर)
यह हम भारतीयो का आधुनिक  समाज का मन है ।
निसन्देह यह एक गम्भीर मामला है  जो पेचिदा हैं  जिसे  धेर्य  के साथ समाज के हर पहलू से मनन करना होगा ।

Monday, October 21, 2019

बचपन की यादे

🧡🧡🧡🧡माँ की वो रसोई🧡🧡🧡🧡 मेरी माँ की वो रसोई.. जिसको हम किचन नहीं चौका कहते थे माँ बनाती थी खाना और हम उसके आस पास रहते थे माँ ने उस 4x4 के कोने को बड़े सलिखे से सजाया था कुछ पत्थर और कुछ तख्ते जुगाड़ कर एक मॉडुलर किचेन बनाया था माँ की उस रसोई में खाने के साथ प्यार भी पकता था कोई नहीं जाता था दर से खाली वो चूल्हा सबका पेट भरता था
 माँ कभी भी बिन नहाये रसोई में ना जाती थी कितनी भी सर्दी हो गहरी माँ सबसे पहले उठ जाती थी जो भी पकता था रसोई में माँ भगवान् का भोग लगाती थी फिर कही जाकर हमारी बारी आती थी उस सादे खाने में प्रसाद सा स्वाद होता था पकता था जो भी बहुत ज्यादा, उसमें प्यार होता था पहली रोटी गाय की दूसरी कुत्ते के नाम की बनती थी कंही कोई औचक आ गया द्वारे ये सोच कुछ रोटियाँ बेनाम भी पकतीं थीं रसोई के उन चद डिब्बोँ और थैलों में ना जाने कितनी जगह होती थी भरे रहते थे सारे डिब्बे चाहे कोई भी मंदी होती थी कुछ डिब्बे चौके के महमानों के आने पर ही खुलते थे और हम सारे के सारे रोज उन डिब्बों के इर्द गिर्द ही मिलते थे हर त्यौहार करता था इन्तेजार 
हर बात कुछ ख़ास होती थी कभी मठ्ठी कभी गुंजिया कभी घेबर की मिठास होती थी माँ सबको गर्म गर्म खिलाकर खुद सारा काम कर आखिर में अक्सर खाती थी सबको परोसती थी ताज़ा खाना वो उसके हिस्से अक्सर बासी रोटी ही आती थी बहुत कुछ बदला माँ के उस चौके में चूल्हा स्टोव और फिर गैस आ गयी ढिबरी लालटेन हट गयीं सारी और फिर रोशन करने वाली टूब लाइट आ गयी #नहीं बदला तो माँ के हाथों का वो
अनमोल स्वाद जो अब भी उतना ही बेहिसाब होता है कोई नहीं दूर तक मुकाबले में उस स्वाद के वो संसार में सबसे अनोखा और लाजवाब होता है अब भी अक्सर माँ का वो पुराना चौका बहुत याद आता है
अजीब सा सुकूं भरा एहसास होता है मुँह और आँख दोनों में पानी आ जाता है!! मेरी माँ की वो रसोई.. जिसको हम किचन नहीं चौका कहते थे माँ बनाती थी खाना और हम उसके आस पास रहते थे.
उषा  गुप्ता


रोशनी

लक्ष्मी महारानी " पिताजी , मेरे दोस्तों के घर दिवाली पर चाइनीज बल्बों की लड़ियाँ और प्लास्टिक की कंदीलों से जगमगा रहे हैं ।
हमारा घर कब जगमाएगा ? " " हाँ , बेटे उमेश ! विदेशी चीज चाइनीज लड़ियों के बदले हम आज ही घर को स्वदेशी इको फ्रेंडली मिट्टी के दीपक और कंदील से रोशन करेंगे , क्योंकि मिट्टी के दीये कुम्हार की कमाई और जीवनयापन का साधन है ।उसे हम रोजगार देंगे ।
पर्यावरण संरक्षण करेंगे और हमारी सरकार ने देश को प्लास्टिक से मुक्त करना ।" " ठीक है पिताजी । यह कदम हमें खुद ही उठाना । जब हम बदलेंगे तभी समाज बदलेगा ।" " चलो हम परंपारिक रंग - बिरंगी पतंगी कागजों , बांस की खपंचियो से कंदील बनाते हैं ।
 यह हुनर मैंने तुम्हारे दादा जी से सीखा था और अब तुम .. । " बातों ही बातों में कितनी बड़ी सुंदर कंदील बना दी ।" " चलो , इसे हम बॉलकोनी में टाँग के दीपक जलाएँ ।
" अरे वाह पिताजी ! ,घोर काली अमा की रात दीपक , कंदीलों की रोशनी से महारानी लग रही है । ऐसा लग रहा है आसमान के तारे जमीन पर उतर आए हो । " " हाँ बेटे , दीपक अँधेरे को दूर भगाता है । इसलिए कहीं भी अँधेरा नहीं रहना चाहिए । लक्ष्मी भी उसी घर आती है ।
जहाँ स्वच्छता , प्रेम , मैत्री का उजास होता है । तुम्हारी बहन , दादी और माँ ने तो सारे दीपक जलाके सारा घर रोशन कर दिया ।
" डॉ . मंजु गुप्ता वाशी , नवी मुंबई ।

Sunday, October 20, 2019

कराओके क्लब द्वारा गीत -संगीत का आयोजन संपन्न

कराओके क्लब   द्वारा स्वर लहरी
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कल रिमझिम  बरसती बारिश के साथ केरयो  संगीत  क्लब  के सभी साथियों  ने अपने अन्तर्मन के गायक  को मंच पर लाकर क्ष्रोताओ को देर रात तक बाधे  रखा ।

सर्वप्रथम  ब्रजेश-रश्मि  श्रीवास्तव  ने कार्यक्रम  का श्रीगणेश कर  गायकी  के चेह्तो को मंच देने का सुखद अवसर दिया
इस अवसर पर  प्रथम जी सुजाता जी रीटा  जी,अर्चना जी,प्रभाजी,डा  राजेन्द्र जी,डा  अमित जी,सुयेश जी,डा पूनम,लावण्या जी,दिव्या जी,संजय जी ,डा प्रदीप जी,संजय जी ,ब्रजेश जी प्राणम जीआर्यन ,उपेन्दर जीआदी सभी गायको  ने मधुर धुनो को छेड़ वातावरण  को संगीतमय  आनन्द मे तरंगित होने के लिय मजबूर  कर  दिया।
सबसे बड़ी खूबी कार्यक्रम  की यह थी की हर गायक  मंच पर  अपनी प्रस्तुति  देते समय गायन में  आत्मसात  हो जाता था जहा स्वर उतार चढ़व,गले की मीठास गौण  हो जाती हैं  और खुदबखुद  पब्लिक  थिरकने  लगती हैं ।
आशा की जाती है  कि  यही प्रयास  रहा तो गायकी के  क्षेत्र  के कराओके क्लब हुनरस  को  कामयाबी दिलाने मे मील  का पत्थर साबित होगा।
" मुनिया का जवाब नहीं " परिवार की सबसे छोटी लाड़ली बेटी नीरजा का जन्मदिन आनेवाला है,,,घर में जोर शोर से तैयारियों का दौर चल रहा है।
आवश्यक सामान की सूची बनाने बैठी माँ अनुभा एक एक वस्तु का नाम गिना रही है ताकि कुछ छूट ना जाए, " मोमबत्तियां गुब्बारे डिस्पोजेबल प्लेट्स,,," नीरजा बीच में ही टोक देती है, " ना बाबा ना,हम ऐसे गिलास व प्लेट्स नहीं लाएंगे,हमारी मेंम कहती हैं ,ये पर्यावरण को नुक्सान पंहुचाते हैं।
"अनुभा हाथ जोड़ते हुए समझाती है," अच्छा बेबी,हमारे स्टील वाले ,,अब तो ठीक।" नीरजा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "और हां पानी भी बर्बाद नहीं करेंगे,पीने को आधा ग्लास ही भरेंगे।
वो नीना मेरी फ्रेंड अपना आरो वाला पानी साथ लाती है।मम्मा हमारा तो फिल्टर ही ठीक है।
मेम कहती है आरो से पानी बर्बाद होता है। चलो पार्टी भी छत पर ही करेंगे,मेरी कई फ्रेंड्स को ए सी की आदत है।
भैया ए सी तो खराब गैस छोड़ता है,पापा कह रहे था ना ।
" इसी बीच दादी ने खांसते हुए याद दिलाया," और मुनिया रानी,रिटर्न गिफ्ट में क्या दोगी? " पोती झट से बोल पड़ी,"आपके वो नन्हें नन्हें पौधे किस दिन काम आएँगे? पता भी है आपको पेड़ों का महत्व। जितने ज्यादा पेड़ उतनी ही बारिश ,ऐसा ही हमारी बुक में लिखा है ।
यह कहते हुए मुनिया चहक उठी," फिर तो नाना के गांव वाली नदी लबालब भर जाएगी।छुट्टियों में खूब छपाके मारेंगे,मामा से तैरना भी सीख जाएगें।" दादी ने शाबाशी दी," अरे वाह, मेरी मुनिया रानी का तो कोई जवाब नहीं।"
सरला मेहता मौलिक

दीपलक्ष्मी

आज का विषय लघुकथा शीर्षक
 *दीपलक्षमी* 
 शगुन पर शगुन आ रहे थे। मिठाई के अम्बार लग गये। 
क़जरदोजी जरी रेशम की साड़ी में समधन समाहित हो गई। रिश्तेदारी में डंका बजा,बहू बहुत बड़े घर से आई है। बहू के पिता की बहुत आन बान शान है।
 हमारा बेटा कुछ ऐसा ही है जो पसंद करता है,वह नगीना ही होता है।
-- प्रशंसा के खूब कशीदे कढ़े गये।
 आओ बहू आज पहला दीप तुम धरो,तुम घर की लक्षमी हो। इस घर की कुलवधु लक्षमी हो। पूजन करने के लिए बैठने का रिवाज है,बहू कहां यह सब करती। हाथ में सुनहरी बटुआ झुलाते हुए बोली__ अम्माजी यह सब आपका काम है,आज तो दीपावली की रात है हमारे दोस्त प्रतिक्षा कर रहे हैं,आज तो सारी रात हम बाहर रहेंगे। 'दीपक की लौ सदा धीरे धीरे जलती रहती है। 
बिजली अक्सर गुल हो जाया करती है'। अम्मा को पता चल गया था कि ______ 'चमक दमक की लक्षमी से लक्षमी प्रसन्न नहीं होगी'। 'मां लक्षमी को दीपक की मंद लौ ही भाती है"।और अम्मा ने सारे दीप प्रज्जवलित कर दिये।
 प्रस्तुति__ 🙏माया बदेका १९--१०--२०१०

Saturday, October 19, 2019

बीता बचपन

*" बीता बचपन आ गया पचपन "*
बगीचे में बैठे ठंडी हवाओं का झोंका लेते हुए,
गुनगुनी धूप में बचपन का पिटारा निकाला था।
सुहानी यादों को संजोये तस्वीरों को सांझा करते हुए,
फिर से निहारते नई पीढ़ी में समेटे उकेर लिया था।
खट्टी मीठी बातों के संग गुदगुदाती यादें ताजा करते हुए,
भाई बहनों संग दिन महीनों सालों तक सम्हालते हुए गुजारा था।
शिकवे शिकायतों का दौर गुनगुनाते हुए,
बीते हुए लम्हों में रंगीन पड़ावों का सफर सुहाना था।
सुनहरी यादों के सहारे हसीन लम्हों को लिए हुए,
ना जाने क्यों बचपन के खेल खिलौनें घरौंदे अच्छे लगते थे।
अब परिपक्व हो दोस्ती यारी सुहाने पलों का तराना लिए हुए,
बीता बचपन आ गया पचपन पाँव जरा सा लड़खड़ाया था।
यादें ताजा सुहानी लड़कपन की फरियाद करते हुए,
काश.! फिर से लौट आये बचपन जैसे अभी पचपन में बच्चों का जमाना था।
तू - तू ,मैं -मैं हो जाती कुछ पलों में अलग होते हुए,
फिर मम्मी पापा ने आकर प्रेम से समझाया करते थे।
होली ,दीवाली, रक्षाबन्धन पर भाई बहनों के संग लिए हुए,
भले ही गिनती में एक या दो नही पाँच भाई बहनों का संग निराला था।
कमी किसी चीजों की नहीं भरपूर आनंद सहयोग लिए हुए,
आदर्श परिवार पूरा परिवार भंडार गृह का खजाना था।
बचपन की वो सुहानी यादें ताजा आधी उम्र लिए हुए,
काश...! अब फिर से लौट आये बचपन जैसे पचपन से बचपन की ओर चले थे ..
   *शशिकला व्यास*
अचला  गुप्ता
करवाचौथ लाल रंग में सजी सुहागन ,
तन पर जेवर खूब सजे।
आभा चेहरे की दमके और मन मे प्रीत मृदंग बजे।
निर्जल व्रत कर सात जन्म का साथ मांगती माता से।
छलनी से हर जन्म उन्हें ही देखूं ,कहे विधाता से। बहुरानी पर प्यार उमड़ता , सासूमाँ मुस्काती है।
पुत्रवधु की छवि देख वह वारी वारी जाती है।
पूजा की थाली ,सजाती गीत मधुर सब गातीं है। यही संस्कृति हर रिश्ते की महत्ता हमे बताती है।
 सदा सुहागिन रहे तू नारी सिंदूर सजा हो माथे पर । चौथ माता से यही प्रार्थना करते हैं सब झुका के सर।
 अचला गुप्ता इन्दौर
सुधा चोहान 
करवा चौथ प्रीत का पुनि प्यार का पुनि नेह का आधार हो *। प्यार हो बस प्यार हो बस तुम ही मेरा प्यार हो । करवा चौथ पर तुम नेह की मूरत लगे। राह तकती चाॅद का खुद चाॅद सी सूरत लगे अन्न जल का त्याग कर मैं तुझमें बस खो गयी। भूलकर सारा जहाँ बस तेरी ही हो गई । सच कहूँ तो खुद से ज्यादा तुम मेरी दरकार हो । प्यार हो बस प्यार हो बस तुम ही मेरा प्यार हो । हो सुखी मेरे ही सुख से और दुख से हो दुखी । चाॅद से ज्यादा सलोने तुम मेरे सरताज हो तुम ही साॅसे तुम ही धडकन तुम ही मेरे प्राण हो । तुम प्रणय सात्विक हो मेरे तुम मेरा निर्वाण हो । तुम समर्पण त्याग का तुम सत्य सा संसार हो । प्यार हो बस प्यार हो "राज"तुम ही मेरा प्यार हो ।
 डॉ सुधा चौहान "राज"
शशिकला व्यास
"राधिका सी प्रतिबिंब लगत चाँद" 🌙🌕🌙🌕🌙🌕🌙🌕ये चाँद जरा ठहर जा तेरा मुखड़ा निहार लेती हूँ शरद पूनम की चाँदनी में स्वप्न लोक की दुनिया बना लेती हूँ। चंचल मन सा प्रतिबिंब बनाकर कुछ पल यूँ ही गुजार लेती हूँ। प्रकृति में सुगंधित फूलों से मकरंद चुरा लेती हूं। चन्द्र किरण से उजली शीतलता लिए मृगतृष्णा में खो जाती हूँ। ममता की तरुण लपेटे चाँदनी में बहती नदियों सा बह जाती हूँ।
अमृत कलश के समान बूंदो की धारा में निर्मल हो जाती हूँ। मोती सी चमक ज्योति प्रकाश लिए मल्लिका बन जाती हूँ। दर्पण में प्रतिबिंब बन चाँदनी सी निखर जाती हूँ। प्रकृति का यह रूप मनोहारी प्रभु मूरत में बस जाती हूँ। प्यारी सी राधिका कृष्ण की मूरत संग छबि में ही खो जाती हूँ। *शशिकला व्यास* 🌙🌕🌙🌕🌙🌕🌙🌕
कुसुम सोगनी 
हमें न चांद की परवाह थी
 ना चाँदनी की बात की - अमृत जो छलका होगा चखने की सौगात थी 
ऐ चाँद तुम इतराओ न तुमसे ज़्यादा ख़ूबसूरत मिलन की कायनात सी एक न बीते सी घड़ी थी
 लूट लेने का सबब था -मरने जीने की किसको पड़ी थी होश था बैखौफ सा वो आयी न फिर ऐसी रात थी अब याद करके होगा क्या चाँद तुमको दी मात थी..
*कुसुम सोगानी*
मंगला  श्रीवास्तव 
☀ 👩👸👩👸👩 ☀ " सुहागन दे करवा , ,...... सुहागन ले करवा.........." सुबह सवेरे उठ के....... करवा माता धयाये....... नहा धो कर वसत्र पहन ले..... जो पिया को भाये....... सुहागन ले करवा..... सुहागन दे करवा...... चूड़ी बिंदी लिपस्टिक लगा कर... हो जाऔ तैयार..... करवाचौथ मनाऔ......... और पाऔ पति का प्यार........ सुहागन दे करवा......... सुहागन ले करवा........ सोने का तेरा दीवला...... चाँदी की तेरी बाती..... सौभाग्य तू पाये......... प्यार बढ़े दिन राती........ सुहागन दे करवा....... सुहागन ले करवा....... व्रत रख के कहानी सुनके... चाँद को देवे अरक....... करवा माता कृपा करे..... करदे घर को स्वरग............ सुहागन दे करवा....... सुहागन ले करवा.......,, ☀ 👩👸👩👸👩 ☀ इस गीत को हर सुहागन से शेयर करें और सौ गुना फ़ल पायें .... धन्यवाद....
मंगला  श्रीवास्तव 
चाँद पर नहीं करता है कोई विवाद न हिन्दू कहे है यह मेरा चाँदवाद नहीं लड़े अब कोई भी मुसलमान है देख इसे ईद पूजे कहीं चौथ चाँद। ऐसे ही दिलों में समा लेते राम नहीं होता बाबरी बखान का नाम न होती जिरही संवादी तारीखें अयोध्या है भगवान राम का धाम ।
डॉ मंजु गुप्ता
चारुमित्रा नागर 
प्यार भरा करवाचौथ मेरा b p बहुत कम हो जाता हैं । करवाचौथ पर तो पानी भी नही पीना हाथ पैर जैसे हडताल कर रहे थे । चक्कर आने लगे मे खाना बना रही थी , बाटी ओवन मे डाल कर मे लेट गई भुख प्यास के कारण नींद लग गई भुल गई कि बाटी ओवन मे रखी है । पति जी ने जूस बनाया मुझे जगाया मे घबरा कर उठ बैठी अरे बाटी रखी थी इन्होंने मुझे मजबूर करके जूस पिलाया किचन मे जाकर देखा बाटी सब डिब्बे मे रख दी किचन साफ मेने पूछा आपने ये सब किया मुझे उठा देते इनका जवाब था ।की तुम मेरी उम्र के लिए भुखी प्यासी रह सकती हो तो मे इतना तो कर सकता हूँ मेरे लिए करवा चौथ का सबसे अच्छा तोफा था ये
चारूमित्रा नागर

राधिका सी प्रतिबिंब लगता चांद

शशिकला  व्यास 
"राधिका सी प्रतिबिंब लगत चाँद"
🌙🌕🌙🌕🌙🌕🌙🌕ये चाँद जरा ठहर जा तेरा मुखड़ा निहार लेती हूँ शरद पूनम की चाँदनी में स्वप्न लोक की दुनिया बना लेती हूँ। चंचल मन सा प्रतिबिंब बनाकर कुछ पल यूँ ही गुजार लेती हूँ। प्रकृति में सुगंधित फूलों से मकरंद चुरा लेती हूं। चन्द्र किरण से उजली शीतलता लिए मृगतृष्णा में खो जाती हूँ। ममता की तरुण लपेटे चाँदनी में बहती नदियों सा बह जाती हूँ। अमृत कलश के समान बूंदो की धारा में निर्मल हो जाती हूँ। मोती सी चमक ज्योति प्रकाश लिए मल्लिका बन जाती हूँ। दर्पण में प्रतिबिंब बन चाँदनी सी निखर जाती हूँ। प्रकृति का यह रूप मनोहारी प्रभु मूरत में बस जाती हूँ। प्यारी सी राधिका कृष्ण की मूरत संग छबि में ही खो जाती हूँ।
*शशिकला व्यास* 🌙🌕🌙🌕🌙🌕🌙🌕
आदिती भदोरिया
नीले नीले आकाश से , सपनों की इक बूँद गिरी । सपनों की इस बूँद ने, दिल को यूँ आनन्दित किया। आनन्द के अहसास को , मैंने 'अमित'है नाम दिया। नाम नहीं जीवन का सत्य है यह, जो कुछ है, बस यही है यह। आओ,ओर अनुभव करो, धड़कन की थिरकती आवाज़ो को। जिसके अभिभूत घन- घन से, मैंने जीवन के सरगम का गान किया। पुलकित हुई इस छुअन से मैं, और आँखों का है, साथ लिया। नीर बरसती आँखों से, मैंने इस आनन्द को जीया। बस जाओ मेरी इन आँखों में, मैंने तो बस तुम्हें है जीया। हाँ तुम थे, तुम हो ओर तुम रहोगे सदा, इस विश्वास को कुमकुम से सीया। माथे पर बनी लकीरों को, लाल रंग से यूँ है सिया। तेरे विश्वास को कंगन सा पहने, मैंने 'अमित'है है नाम दिया।
 स्वरचित, अदिति सिंह भदौरिया।
करवा चौथ का चाँद "चन्दा की शादी है,चांदी की रातें हैं तुमसे कुछ कहने को अधरों पर बातें हैं।" आज कई अधर आतुर हैं, अपने चाँद से कुछ कहने के लिए। आज कई चौदहवीं के चाँद निर्जल व्रत कर सुदूर चाँद से मांगती हैं कि उनके जीवन का चाँद बीती शरद पूर्णिमा के पूर्ण चंद्र के मानिंद ताउम्र प्रेम की अमृतवर्षा सतत करता रहे। यूँ तो समस्त चांदों की चाँदनियों अपने अपने चादों की करीब हैं। परंतु उनका क्या जिनके चाँद सरहद पर तैनात हो दूज का चाँद बने हुए हैं। हे आसमानी चाँद , वहां जाना और पंहुचाना संदेश उन समस्त प्रियतमाओं का जो तस्वीर देख या मोबाइल पर चैट कर जल ग्रहण करेगीं। हे , करवा माता,,,गौरा माता, रक्षा करना उन सभी जांबाजों की ,,,कि अगली करवा चौथ वे अपने चांदों के साथ मना सके।
सरला मेहता
करवाचौथ लाल रंग में सजी सुहागन , तन पर जेवर खूब सजे। आभा चेहरे की दमके और मन मे प्रीत मृदंग बजे। निर्जल व्रत कर सात जन्म का साथ मांगती माता से। छलनी से हर जन्म उन्हें ही देखूं ,कहे विधाता से। बहुरानी पर प्यार उमड़ता , सासूमाँ मुस्काती है। पुत्रवधु की छवि देख वह वारी वारी जाती है। पूजा की थाली ,सजाती गीत मधुर सब गातीं है। यही संस्कृति हर रिश्ते की महत्ता हमे बताती है। सदा सुहागिन रहे तू नारी सिंदूर सजा हो माथे पर । चौथ माता से यही प्रार्थना करते हैं सब झुका के सर।
 अचला गुप्ता इन्दौर

Friday, October 18, 2019

नीले नीले आकाश से , सपनों की इक बूँद गिरी । सपनों की इस बूँद ने, दिल को यूँ आनन्दित किया। आनन्द के अहसास को , मैंने 'अमित'है नाम दिया। नाम नहीं जीवन का सत्य है यह, जो कुछ है, बस यही है यह। आओ,ओर अनुभव करो, धड़कन की थिरकती आवाज़ो को। जिसके अभिभूत घन- घन से, मैंने जीवन के सरगम का गान किया। पुलकित हुई इस छुअन से मैं, और आँखों का है, साथ लिया। नीर बरसती आँखों से, मैंने इस आनन्द को जीया। बस जाओ मेरी इन आँखों में, मैंने तो बस तुम्हें है जीया। हाँ तुम थे, तुम हो ओर तुम रहोगे सदा, इस विश्वास को कुमकुम से सीया। माथे पर बनी लकीरों को, लाल रंग से यूँ है सिया। तेरे विश्वास को कंगन सा पहने, मैंने 'अमित'है है नाम दिया। स्वरचित, अदिति सिंह भदौरिया। [18/10, 11:46] Sushma Viyas: कान्हा-राधिका की करवाचौथ---- राधिका तुम कौन भाग लेकर आई कान्हा ने कर कमलों से प्रेम अमृत पिवाई तुम बड़भाग ज्यों श्यामरस अधर लगाई सांवरे के मन मंदिर में तुम ही तुम हो समाई ज्यों ही तो ब्रह्माण्ड़ में चहूं ओर राधे श्याम राधे श्याम की गूंज दे सुनाई 
 सुष'राजनिधि'

सजना और करवा चौथ


करवा चौथ, चाँद सा सजना मेरा ,जिसकी आभा से मैं चांदनी चमकी शीतल शीतल प्यार की किरणें प्रस्फुटित होती ,जिसके दिख जाने से मेरा रोम रोम खिल जाता,, पिया तुम जग में रहो सदा ,इस चंदा की तरह चमकते और मेरी मांग का सिंदूर रहे सदा दमकते। आज के करवा चौथ पर शुभ भावना मैं भाती हम तुम दोनों जन्मों जन्म मिलते रहे हर दम चाहे चंदा बादलों में छिप जाए,चाहे दिख जाए तुम तो हर दम रहो मेरे आँचल में छिप छिप के।
* प्रभा जैनकरवा चौथ, चाँद सा सजना मेरा ,जिसकी आभा से मैं चांदनी चमकी शीतल शीतल प्यार की किरणें प्रस्फुटित होती ,जिसके दिख जाने से मेरा रोम रोम खिल जाता,, पिया तुम जग में रहो सदा ,इस चंदा की तरह चमकते और मेरी मांग का सिंदूर रहे सदा दमकते। आज के करवा चौथ पर शुभ भावना मैं भाती हम तुम दोनों जन्मों जन्म मिलते रहे हर दम चाहे चंदाकरवा चौथ, चाँद सा सजना मेरा ,जिसकी आभा से मैं चांदनी चमकी शीतल शीतल प्यार की किरणें प्रस्फुटित होती ,जिसके दिख जाने से मेरा रोम रोम खिल जाता,, पिया तुम जग में रहो सदा ,इस चंदा की तरह चमकते और मेरी मांग का सिंदूर रहे सदा दमकते। आज के करवा चौथ पर शुभ भावना मैं भाती हम तुम दोनों जन्मों जन्म मिलते रहे हर दम चाहे चंदा बादलों में छिप जाए,चाहे दिख जाए तुम तो हर दम रहो मेरे आँचल में छिप छिप के। प्रभा जैन बादलों में छिप जाए,चाहे दिख जाए तुम तो हर दम रहो मेरे आँचल में छिप छिप के।
*प्रभा जैन

Sunday, October 13, 2019

शब्द और राग समूह🙏🌹🌹🙏 दिनांक 12/10/19 वार शनिवार चित्र आधारित रचना🙏🌹🌹🙏 वो प्रथम स्पर्श था माँ का जब हाथों में मुझको लिया होगा। प्यार से मुझको जब उन्होंने छुआ होगा। सहलाया होगा मेरे गालों को जब माँ ने हाथों से हौले से झुलाया भी होगा माँ ने। आँचल में अपने छुपा कर रखा होगा मुझे सीने से लगाकर दूध पिलाया होगा मुझे। पैरों पर लिटाकर मुझको अपने नर्म हाथों से की होगी मालिश जो मेरी थपकियां देकर फिर सुलाया होगा मुझे। ओ प्यारी माँ तेरे उस निश्छल प्यार का कोई मोल नही जो में चुका पाऊँगी कभी। आज मैं भी बनी हूँ माँ तब जाना कितना कष्ट होता है माँ बनने में। माँ बनना कोई आंसन बात नही कितनी बार मैने जाने अनजाने में दिल दुखया है तेरा । पर अब वापस तो आओ माँ फिर कभी तुम्हारा दिल नही दुखाउंगी। करुँगी मैं सेवा तुम्हारी अपने हाथों से तुम्हारें प्यार का थोड़ा सा तो कर्ज चुकाउंगी। मैं भी करुँगी मालिश तुम्हारी जैसे बचपन में तुमने की थी मेरी में भी तुमको अपने हाथों से सहलाउंगी। कितना थक जाती होगी तुम हमको सम्हालतें सम्हालतें । एक बार फिर आ जाओ माँ अब में तुमको समहलूंगी।🙏🌹🌹🙏 मंगला श्रीवास्तव इंदौर स्वरचित मौलिक रचना। 🙏🙏🌹🌹🙏🙏

Wednesday, October 2, 2019

Writer Club 
गांधी का परिणाम गांधीजी आते थे बच्चों से प्यार करते थे दुनिया को आजादी देने में कामयाब थे गांधी जी का आज एक सपना पूरा हो गया है स्वच्छता अभियान को भारत में लाने का भारत में गांधीजी कहते थे बुरा मत सुनो बुरा मत सुनो बुरा मत सुनो का अर्थ होता है कि अगर आपको कहे कोई आपको कहे तुम बुरा बनो तो उससे बिल्कुल मत सुनो इसी का अर्थ होता है बुरा मत सुनो अब बुरा मत देखो का अर्थ होता है कि जैसे कमल में जैसे मतलब कमल में नहीं आपने देखा होगा आज कल कितनी बारिश हो रही है बारिश के कारण की चर्बी हो जाता है उसकी जड़ में कमल खिलता है नीचे से ऊपर वह कमल खिलता है तो हमें नीचे से ऊपर होना चाहिए इसका अर्थ होता है बुरा मत देखो तुलसी का अर्थ होता है पूरा मत बोलो

Aryan shrivastava 
"ॐ" *महात्मा गाँधी को अपना आदर्श बनाएं* 150 वी गाँधी जयन्ती के उपलक्ष्य में हमारे पूज्य महात्मा गांधी जी को शत-शत नमन।हमारे राष्ट्र पिता गाँधी जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन को देश और समाज के लिये समर्पित किया।यह तो हम सभी जानते है।सर्वप्रथम आज के परिपेक्ष्य में सर्वाधिक जरूरत है, गाँधी के मूल सिद्धान्तों में से एक सिद्धान्त सत्य की हमारे समाज मे हमें यह बात देखने को मिलती हैं। कि हम हर वर्ष अपने महापुरुषों की जयन्तियों का आयोजन कर बड़ी-बडी बाते करते हैं।साथ में उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प भी लेते हैं।स्कूल कॉलेज में चौराहे पर उनकी प्रतिमा पर हार फूल चढ़कर किसी नेता से चार शब्द सुनकर कार्यक्रम समाप्त कर अपने घर चले जाते है।लेकिन क्या बस इतना ही काफी है।गांघी जी के विचार आज की पीढ़ी के लिए उतने ही प्रासंगिक और अनुकरणीय है।जितने की पहले थे।उन्होंने हमें सत्य,अहिंसा ,स्वालम्बन आदि की शिक्षा दी। आज के वर्तमान युवा पाश्चात्य विचारों की ओर तेजी से अग्रसर होते जा रहे हैं। आज के युवाओं को उनके किसी भी काम में हस्तक्षेप पसंद नहीं है। ऐसी परिस्थिति में गांधी जी के विचारों की आज के युवा पीढ़ी को सर्वाधिक आवश्यकता है। सत्य और अहिंसा ही गांधीजी के दो अस्त्र हैं। जिन्हें शिक्षा में सबसे बड़ी नैतिकता माना गया है।आज के परिपेक्ष्य में देखे तो गांधी जी के फ़ोटो को हम हर कॉलेज या प्राध्यापकों के कक्ष में या सरकारी कार्यालय में लगे हुए देखे जाते हैं। लेकिन इन सब से जागृति नहीं आएगी। हमें हमारे महापुरुषों के चित्रों को नहीं बल्कि उनके चरित्र और सिद्धांतों को स्कूलो की हर क्लास में ब्लैक बोर्ड के दोनों और लिखना लिख कर रखना होगा। इसे हर कॉलेज स्कूलों में अनिवार्य करना होगा। ताकि 40 विद्यार्थियों की क्लास में यदि 4 बच्चे भी उनके सिद्धांतों को उनके चरित्र को अपनाते हैं। तो हम ए�� "ॐ" *महात्मा गाँधी को अपना आदर्श बनाएं* 150 वी गाँधी जयन्ती के उपलक्ष्य में हमारे पूज्य महात्मा गांधी जी को शत-शत नमन।हमारे राष्ट्र पिता गाँधी जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन को देश और समाज के लिये समर्पित किया।यह तो हम सभी जानते है।सर्वप्रथम आज के परिपेक्ष्य में सर्वाधिक जरूरत है, गाँधी के मूल सिद्धान्तों में से एक सिद्धान्त सत्य की हमारे समाज मे हमें यह बात देखने को मिलती हैं। कि हम हर वर्ष अपने महापुरुषों की जयन्तियों का आयोजन कर बड़ी-बडी बाते करते हैं।साथ में उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प भी लेते हैं।स्कूल कॉलेज में चौराहे पर उनकी प्रतिमा पर हार फूल चढ़कर किसी नेता से चार शब्द सुनकर कार्यक्रम समाप्त कर अपने घर चले जाते है।लेकिन क्या बस इतना ही काफी है।गांघी जी के विचार आज की पीढ़ी के लिए उतने ही प्रासंगिक और अनुकरणीय है।जितने की पहले थे।उन्होंने हमें सत्य,अहिंसा ,स्वालम्बन आदि की शिक्षा दी। आज के वर्तमान युवा पाश्चात्य विचारों की ओर तेजी से अग्रसर होते जा रहे हैं। आज के युवाओं को उनके किसी भी काम में हस्तक्षेप पसंद नहीं है। ऐसी परिस्थिति में गांधी जी के विचारों की आज के युवा पीढ़ी को सर्वाधिक आवश्यकता है। सत्य और अहिंसा ही गांधीजी के दो अस्त्र हैं। जिन्हें शिक्षा में सबसे बड़ी नैतिकता माना गया है।आज के परिपेक्ष्य में देखे तो गांधी जी के फ़ोटो को हम हर कॉलेज या प्राध्यापकों के कक्ष में या सरकारी कार्यालय में लगे हुए देखे जाते हैं। लेकिन इन सब से जागृति नहीं आएगी। हमें हमारे महापुरुषों के चित्रों को नहीं बल्कि उनके चरित्र और सिद्धांतों को स्कूलो की हर क्लास में ब्लैक बोर्ड के दोनों और लिखना लिख कर रखना होगा। इसे हर कॉलेज स्कूलों में अनिवार्य करना होगा। ताकि 40 विद्यार्थियों की क्लास में यदि 4 बच्चे भी उनके सिद्धांतों को उनके चरित्र को अपनाते हैं। तो हम एक नव भारत का निर्माण अति आसानी से कर सकते हैं। आज के परिपेक्ष्य में युवाओं को गांधी जी के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार कर सामाजिक परिवर्तन एवं राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान देना चाहिए। गांधी जी के ग्रंथों को पढ़कर अपने जीवन को सार्थक बनाएं। आज के माता- पिता अपने बच्चों को थोड़ा तो गांधीवादी जरुर बनाएं। और एक सबल राष्ट्र बनाने में अपना योगदान अवश्य दे।
 वंदना पुणतांबेकर इंदौर
गाँधी जी मेरे लिए हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को केवल भारत मे ही नहीं पूरी दुनिया मे , परिचय की जरुरत नहीं लगभग सभी उनके बारे मे जानते है । व एक एसे इन्सान थे , जिन्होंने बिना हथ्यार उठाये अँग्रेज़ो को हरा कर भारत को आजादी दिलाई थी । महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर काठियावाड़ गुजरात मे हुआ था ।जो भारत के पहले राष्ट्रपिता चुने गए थे , उनका जन्मदिन 2 अक्टूबर को आज भी मनाया जाता हैं । महात्मा गांधी जी के बारे मे बताना चाहूंगी जो आपकी मदद जरूर करें गे और जिससे आप का जीवन सफल बन सकता हैं । उन्होंने सदा अहिंसा और सत्य का पालन किया था । महात्मा गांधी का पुरा जीवन हमारे लिए यादगार है, जिन्दगी तो सबको मिलती हैं ,और एक दिन सब को मरना हैं भी है। लेकिन आपसे कहुगी की अगर हमें जिन्दगी मिलती हैं ।तो उसे एसे जियो जिससे आपके मरने पर आपको सारी दुनिया याद करें ,कुछ ऐसा करके मरो जिससे आपका नाम सब याद करें । आपको ये जिंदगी अपने परिवार के लिए या खुद के लिए मेहनत करने के लिए नहीं मिली हैं ।इसे यू ही बर्बाद मत करो इसमें आपको सब से अलग करना पडेगा ,जिससे दुनिया बापू की तरह याद करें जो आदमी समय बजाता हैं वह उसमे धन बचाता हैं आदमी की पहचान उसके पहननवे और कपडों से नहीं उसके गुण और चरित्र से होती हैं प्रसन्नता ही एक मात्र एऐसी चीज हैं जिसे आप ओरो मे बाटेंगे तो उसका कुछ हिस्सा तो आपके हिस्से मे जरूर आये गा सच एक पेंड हैं । और हमे हमेशा सच बोलना और सच के पथ पर चलना चाहिए बापू यही सिखा गये
 चारूमित्रा नागर
गाँधी जी मेरी नजर में सात्विक पवित्र और आत्मिक शुध्दता के प्रतीक हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को जानना हमारे लिए बहुत ही सरल होते हुए भी उनके आचरण को अपने जीवन में उतारना उतना ही कठिन है। गाँधी जी के सत्याग्रह और आन्दोलन उनके जीवन में किये गये प्रयोग थे। जन जन का भरोसा दिखावे से नही जीता जा सकता। उसके लिए जीवन में सत्य , अहिंसा और सदाचार के आचरण की जरुरत होती है। जिधर चल पडे दो पग उधर चल पडे हजारों डग। ये उस सादगी के साथ खडे जन थे। जिनका विश्वास गाँधी जी के विचारों में शामिल था। अहिंसक महात्मा के विचार ही सबके लिए प्रेरणा थे। ब्रिटिश हुकुमत उनकी सात्विक विचारों की ताकत को कुचल पाने में असफल रही। उनकी आजादी वर्ग जाति सम्प्रदाय धर्म से बहुत बहुत ऊपर थी। व्यक्तिगत लाभ लोभ उनकी राष्ट्रीयता के बोध को कभी अपने जाल में नही फंसा सके। इसी कारण गाँधी जी सर्वमान्य राष्ट्र पिता बने रहेंगे। पद और राजनीतिक लोकप्रिय छवि की तुच्छता उन्हें कभी मोहित नही कर सके।
 डा.विनीता रघुवंशी प्राध्यापक हिन्दी शासकीय महाविद्यालय, टिमरनी (जिला हरदा)
भारत सरकार , राज्य  और गांधीवादी संस्थाएँ  गांधी जी की १५०  वीं जयंती जोर  - शोर से मना रही हैं ।जो देश - विश्व में पूरे साल गांधी से संबंधित  विविध कार्यक्रम आयोजित  कर रही हैं  . राष्ट्रपति महात्मा  गांधी का चरित्र राष्ट्र चरित्र  है .   गांधी एक विचार नहीं है . बल्कि गतिशील संस्था , एक संस्कृति है . एक विश्वास , संकल्प है . मानवता  का विश्वविद्यालय है . नैतिक , मानवीय मूल्यों से इंसान का निर्माण नहीं हुआ तो वह देश कभी भी उन्नति , विकास नहीं कर सकता है . गांधी की राजनीति आध्यात्म से जुड़ी थी . जो पारदर्शी थी . आज की राजनीति ठीक  इसके विपरीत भ्रष्टाचार , झूठ , दागी मंत्रियों से लिप्त है .    गांधी जी के व्यक्तित्व , आदर्शों का प्रभाव भारतीयों के साथ विदेशियों पर  भी पड़ा था  .  गांधी जी के दर्शन , अहिंसावादी नीतियों , प्रवृतियों , शिक्षा , सामूहिकता का गवाह साबरमती का आश्रम है .  जहाँ भारतीय संस्कृति बसी  और गांधी मूल्यों की रूह भी बसी है  . जहाँ स्वाबलंबन के संग चरखा संस्कृति को बढ़ावा दिया . जो खादी तक ही सीमित नहीं था  बल्कि दिनचर्या में आने वाली स्वदेशी वस्तुओं का उत्पाद किया जाता था . उस जमाने में छुआछूत को हेय  से देखा जाता था . गांधी जी ने छुआछूत   मिटाने का काम इसी आश्रम से शुरू किया . गांधी जी  की बहन ने अस्पृश्यता का  विरोध किया तो उसी को वहाँ से निकाल दिया .
डॉ मंजु गुप्ता वाशी 
*"गांधी जी मेरी नजर में"* 150 वी जयंती पर परम पूज्य बापूजी को शत शत नमन ...! ! ! गांधी जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रथम सूत्रधार है जो कठिन परिश्रम व संघर्षों के बाद हम सभी देशवासियों को गुलामी की बंधन से मुक्त करवाकर आजादी दिलवाई है। सत्याग्रह आंदोलन ,दांडी यात्रा, नमक कानून व्यवस्था में भी एकजुट होकर संपूर्ण विश्व जगत को प्रभावित किया है और इसी आत्मबलिदान से सत्य अहिंसा से आज की युवा पीढ़ियों में भी जागरूकता अभियान पैदा हो गई है जिससे देश में ही नहीं वरन पूरे विश्व में भी संदेशों द्वारा प्रचार प्रसार किया जा रहा है । *"गांधीजी का महामन्त्र'* *"करो या मरो"* इस महामन्त्र से नरेन्द्र मोदी सरकार ने भी *"स्वच्छ भारत अभियान"* के तहत विभिन्न क्षेत्रों में यह अभियान चलाया गया है और अब 29 अगस्त से *"स्वस्थ भारत अभियान"* लागू किया गया है जिसमें सभी देशवासियों से अपील की गई है कि अपने शरीर को हमेशा स्वस्थ रखने के लिए कुछ नियमों का पालन करना होगा। *"अहिंसा परमोधर्मः"* इस सिंद्धांत पर चलना बेहद साहसिक कार्य है उनकी तरह से दृढ़ विश्वास ,आत्मविश्वास, अडिग रहने के लिए बहुत प्रयासों की जरूरत है। गांधी जी की प्रतिमा को देखते हुए मन में ही एक अनोखी छबि बन जाती है गांधीजी के शरीर पर सफेद रंग की धोती, आँखों में गोल चश्मा पहने हुए , कमर में घडी लटकी हुई , एक हाथ में लाठी लिए सरपट तेज रफ्तार गति से चलना ,फर्राटेदार बुलंद आवाज ,अन्य और बहुत सी बातों का हर अंदाज निराला था। गांधी जी का *"सादा जीवन उच्च विचार"* रखते हुए जीवन शैली अपनाते हुए सारी दुनिया से बगावत कर उच्च शिखर की बुलंदियों को छू लिया और आजादी का झंडा फहराने में माहिर हुए देशवासियों को गुलामी के बंधन से आजादी देकर देश को ही नहीं वरन पूरे विश्व को हिलाकर रख दिया था। वर्तमान स्थिति में सतत उन्नति की ओर अग्रसर देश के युवा पीढ़ियों में भी गांधी जी के सपनों को उजागर करने हेतु योगदान देने का सतत प्रयास जारी है। गांधी जी के संदेशों को अमल करते हुए देशवासियों सहित विभिन्न क्षेत्रों में उन सभी स्वत्रंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए शत शत नमन ....! ! 🙏🙏जय हिन्द जय भारत वन्देमातरम 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳 ***शशिकला व्यास*** भोपाल मध्यप्रदेश
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'भारत' यह नाम मन में आते ही याद आते है ज़हन में आते है संघर्ष के वो दिन जो हमारी पीढ़ी ने देखे तो नहीं पर सुने है अपने दादा जी एवं पिता जी से, सुने ही नमन करने को मन करता है उन महान आत्माओं को जिन्होंने भारत माता के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया । कालांतर से ही ऐसे महान लोगों की लम्बी सूची है जो हमें महसूस कराती है कि हमारी मातृभूमि ने कितने महान सपूत दिए है और ऐसे ही एक महान् सपूत हुए 'गांधी जी' हमारे राष्ट्रपिता जिनका पूरा नाम मोहनदास कर्मचंद गांधी है। भारत की आजादी के लिए जहां कई वीरों ने अपने जीवन का बलिदान किया वहीं गांधी जी ने (अहिंसा) एक नया पाठ पढ़ाया। आज मैं सोचती हूँ कि क्या इतना आसान होता है, हिंसा ओर अन्याय के बीच अपमान का घूँट पीकर मुस्कुराना ओर परायों को भी अपना समझना। हर 2 अक्तूबर को हम उनके जीवन को याद करते है पर उसपर चलते नहीं है, हम उनपर दूसरों के द्वारा लिखे गए कटाक्ष पढ़ते है, जो उनकी कुछ नीतियों से नाराज़ है पर उनकी सही नीतियों को अपनाते नहीं है। हम क्यों यह नहीं सोचते कि आज़ादी के हवन में हमारे वीरों ने जो बलिदान दिया वैसा ही कठिन बलिदान 'गांधी 'जी ने झूठ ओर हिंसा को त्याग करके दिया। मेरी नज़र में 'गांधी जी' एक सोच है बदलाव की ओर ले जाते हुए सही रास्ते की, 'गांधी जी ' एक रास्ते की जो ऐसी मंजिल पर ले जाए, जहाँ पहुँच कर एक ऐसे लोकतंत्र का निर्माण हो जो सर्वधर्म, समानता पूर्ण ,साक्षर राष्ट्र हो ।
( गांधी मेरी निगाहों में) भारत' यह नाम मन में आते ही ज़हन में आते है संघर्ष के वो दिन जो हमारी पीढ़ी ने देखे तो नहीं पर सुने है अपने दादा जी एवं पिता जी से, सुनते ही नमन करने को मन करता है उन महान आत्माओं को जिन्होंने भारत माता के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया । कालांतर से ही ऐसे महान लोगों की लम्बी सूची है जो हमें महसूस कराती है कि हमारी मातृभूमि ने कितने महान सपूत दिए है और ऐसे ही एक महान् सपूत हुए 'गांधी जी' हमारे राष्ट्रपिता जिनका पूरा नाम मोहनदास कर्मचंद गांधी है। भारत की आजादी के लिए जहां कई वीरों ने अपने जीवन का बलिदान किया वहीं गांधी जी ने (अहिंसा) एक नया पाठ पढ़ाया। आज मैं सोचती हूँ कि क्या इतना आसान होता है, हिंसा ओर अन्याय के बीच अपमान का घूँट पीकर मुस्कुराना ओर परायों को भी अपना समझना। हर 2 अक्तूबर को हम उनके जीवन को याद करते है पर उसपर चलते नहीं है, हम उनपर दूसरों के द्वारा लिखे गए कटाक्ष पढ़ते है, जो उनकी कुछ नीतियों से नाराज़ है पर उनकी सही नीतियों को अपनाते नहीं है। हम क्यों यह नहीं सोचते कि आज़ादी के हवन में हमारे वीरों ने जो बलिदान दिया वैसा ही कठिन बलिदान 'गांधी 'जी ने झूठ ओर हिंसा को त्याग करके दिया। मेरी नज़र में 'गांधी जी' एक सोच है बदलाव की ओर ले जाते हुए सही रास्ते की, 'गांधी जी ' एक रास्ते की जो ऐसी मंजिल पर ले जाए, जहाँ पहुँच कर एक ऐसे लोकतंत्र का निर्माण हो जो सर्वधर्म, समानता पूर्ण ,साक्षर राष्ट्र हो ।
 स्वरचित, अदिति सिंह भदौरिया।
महात्मा गांधी ________________
खादी पहन कर दी आजादी, स्वदेशी मंत्र लाया , पहले बापू फिर महात्मा ,राष्ट्रपिता कहलाया । अपना सर्वस्व किया समर्पित , देश के लिए , सत्य अहिंसा के बल पर, देश आजाद करवाया । ऊंच-नीच का भेद मिटाकर, सबको गले लगाया , दया प्रेम अपना कर ,मानवता का पाठ पढ़ाया , वर्ण व्यवस्था तोड़ कर, दी धर्म की परिभाषा , आजादी के दीवानों में विश्वास जगाया । असंख्य वीरों ने दी कुर्बानी तब आजादी पाई , मुफ्त में नहीं मिली ,हमने इसकी कीमत चुकाई, हंसकर फांसी पर झूले ,सीने में गोली खाई , तब तीन रंग की विजय पताका गगन में है लहराई । देश में आतंक मिटा समाजवाद लाएं, सत्य राह पर खुद चलें, औरों को चलना सिखलाएं, विश्व बंधुता के आंगन में , शांति का पैगाम दें, हर हाथों को काम देकर, आत्मनिर्भर बनाएं। गांधी जी के सपनों को साकार करें , आओ नव भारत का निर्माण करें,। श्रीमती शोभा रानी तिवारी , 619 अक्षत अपार्टमेंट , खातीवाला टैंक इंदौर मध्य 

Monday, September 30, 2019

गांधी जी मेरी नज़र में




    *गांधी मेरी निगाह में*
     *=============*
महात्मा गांधी जी का विचार आते ही मन श्रद्धा से भर जाता है।
केवल गांधीजी ही हैं, जो राम,कृष्ण, बुद्ध के पश्चात समस्त मानवीय गुणों से परिपूर्ण थे।
आजादी के दिनों में कई नेता ऐसे भी थे जिनके विचार गांधीजी से नहीं मिलते थे परंतु इसके बावजूद भी वे गांधीजी का सम्मान करते थे।
उनकी आत्मिक शक्ति के बल पर ही गांधीजी विश्व पटल पर छाए रहे। वे एक उच्च सिद्धांत वादी नेता और सत्य के अनुयायी थे। मेरी निगाह में वह ऐसे नेता थे जिन्होंने जन-जन के मन को छुआ था।
                🙏🏻
*श्रीमती प्रमिला सक्सेना*
*ब्यावरा, जिला : राजगढ़ (म.प्र)*

गांधी मेरी नज़र में



गांधीजी की १५० वी जयंति पर सभी को शुभकामनाएँ । मेरी नज़र में गांधी वो अजूबा शख़्सियत है जो कल्पना से परे और अविश्वसनीय होते हुए भी मौजूद है। कैसे कोई सीधा- सादा सा इंसान जिसके पास हथियार के नाम पर बस सत्याग्रह और अहिंसा थे, वह मज़बूत  अंग्रेज़ी सरकार और उसके सिस्टम से टकरा जाता है। न बंदूक़ , न तलवार, न अस्त्र, न शस्त्र पर फिर भी जिसका लोहा अंग्रेज़ मान चुके थे। उनकी हर एक गतिविधि से वे थरथरा जाते थे। २०० सालों तक भारत पर अपना क़ब्ज़ा जमाए रखने वाले निरंकुश, अन्यायी और आततायी ब्रिटिश साम्राज्य का तख्ता हमारे गांधी ने हिला कर रख दिया था।
हिंसा से त्रस्त इस दुनिया में आज हर कोई गांधी की ओर निहार रहा है। वे न केवल भारत के लिए वरन पूरे विश्व के लिए अपरिहार्य बन गए हैं। मेरी नज़र में उनके द्वारा किए गए सत्य- सत्याग्रह - अहिंसा के प्रयोग आज भी उतने ही महत्वपूर्ण और विचारणीय हैं। अगर हमने उनके सिद्धांतों को नहीं अपनाया तो विश्व निश्चित रूप से मौत की कगार पर खड़ा होगा और भावी पीढ़ी को शायद ही विश्वास हो पाएगा कि काया से दुर्बल दिखने वाला पर विचारों में सख़्त और अहिंसा एवम् सत्याग्रह की सहायता से देश को आज़ादी की ओर ले जाने वाला हाड़- माँस से बना ऐसा कोई इंसान भी इस धरती पर पैदा हुआ था।
इसलिए चाहे चार सौ साल बीत जाए पर गांधी अपनी ख़ूबियों के कारण हमेशा अजर- अमर रहेंगे। ख़ुद पर विश्वास, अपनी क्षमता को पहचानना, अपनी ज़िम्मेदारी को निभाना, विरोध को सहन करना, सत्य- अहिंसा का दामन न छोड़ना और ये यक़ीन ख़ुद पर हो कि एक अकेला भी क्रांति ला सकता है- ये ख़ूबियाँ हमें भी अपनाना चाहिए तभी गांधी का नज़रिया साकार हो पाएगा।
उषा गुप्ता
इंदौर

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