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| *Shobha tiwari |
औरत हूँ पत्थर दिल नही
पर पेट की आग बुझाने के लिए
पत्थर तोड़ती हूँ
पेड़ पर झूला बना
बच्चे को सुला देती हूँ
जब वह रोता है तो
पत्थरों का झुनझुना बजा देती हूँ।
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जीवन के निराले रँग
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जीवन के है रंग निराले
पडती धूप हाथ में छाले
कुलदीपक तप रहा धूप में
पड़े हुऐ रोटी के लाले
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| *Pramila sexana |
बस कैसे बच्चाे को पाले?
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नन्ही के सपने
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नन्ही बिटिया के सपनों को
बुनती हूँ मैं हर पल हरदम ।
पेट की खातिर ,ममता पीठ पर रख के भूलूं दुनिया के गम।
गिट्टी ,पत्थर पर ही मेरी
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मजदूरी दिनरात मैं करती,
जीवन मेरा यहीं बसा है।
हाथों के छालों और पैरों की
जलन है नियति हमारी।
हम भी इन भवनों में रहेंगे ,
आएगी अपनी भी बारी।
*अचला गुप्ता
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लक्ष्य
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मजदूरी कौन नहीं करता है
कोई तन से करता है
कोई मन से करता है
कोई धन के लिए करता है
राहे जरूर अलग है
पर लक्ष्य तो ही है मेहनत
और लगन की गई मेहनत
में सफलता जरूर मिलती
*सीमा मिश्रा
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