Wednesday, May 1, 2019

*Shobha tiwari
मैं मजदूर हूँ
औरत हूँ  पत्थर दिल नही
पर पेट की आग बुझाने के लिए
पत्थर तोड़ती हूँ
पेड़ पर झूला बना
बच्चे को सुला देती हूँ
जब वह रोता है तो
पत्थरों का झुनझुना बजा देती हूँ।
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जीवन के निराले रँग
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जीवन के है रंग निराले
पडती धूप हाथ में छाले
कुलदीपक तप रहा धूप में
पड़े हुऐ रोटी के लाले
*Pramila sexana
 मई जून कुछ पता नहीं है
बस कैसे बच्चाे को पाले?

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नन्ही के सपने
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नन्ही  बिटिया  के सपनों को
बुनती हूँ मैं  हर पल हरदम ।
पेट की खातिर ,ममता पीठ पर रख के भूलूं दुनिया के गम।
गिट्टी ,पत्थर  पर ही मेरी




उम्मीदों का महल सजा है।
मजदूरी दिनरात मैं करती,
जीवन मेरा यहीं बसा है।
हाथों के छालों और पैरों की
जलन है नियति हमारी।
हम भी इन भवनों में रहेंगे ,
आएगी अपनी भी बारी।


*अचला गुप्ता
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 लक्ष्य
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मजदूरी कौन नहीं करता है
कोई तन से करता है
कोई मन से करता है
कोई धन के लिए करता है
राहे जरूर अलग है
पर लक्ष्य तो ही है मेहनत
और लगन की गई मेहनत
में सफलता जरूर मिलती
*सीमा मिश्रा
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