Tuesday, April 30, 2019

भोपाल के साहित्यिक समुद्र में शुभसँकल्प समूह का मंथन

शुभ संकल्प समूह द्वारा भोपाल में साहित्यक सगोष्ठि आआयोजित
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शुभ संकल्प समूह द्वारा भोपाल के जैन होटल राजहंस में लघु कथा संगोष्ठी का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि डॉ प्रीति खरे प्रवीण, डॉ अनुपमा श्रीवास्तव अनुश्री, श्रीमती कांता राय, डॉ अर्चना श्रीवास्तव, इंदौर कार्यक्रम का शुभारंभ किया सरस्वती वंदना हंसा व्यास और डा स्वाति सिंह ने किया कार्यक्रम में 22 साहित्यकारों को सम्मानित किया गया जिसमें प्रमुख निम्न है डॉअर्चना मुखर्जी, डॉ प्रीति खरे प्रवीण, अनुपमा श्रीवास्तव अनुश्री, श्रीमती कांता रॉय डॉ कीर्ति श्रीवास्तव, डॉ अर्चना श्रीवास्तव, श्रीमती अंतिमा, वूमेन प्रेस क्लब इंदौर,डॉ हंसा व्यास, श्रीमती मीनाक्षी गुरु, श्रीमती नम्रता शरण सोना, श्रीमती निहारिका निगम डॉ कुमकुम गुप्ता, साधना श्रीवास्तव, श्रीमती कृष्णा श्रीवास्तव, श्रीमती रक्षा श्रीवास्तव, डॉ स्वाति सिंह को सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर एक लघु कथा प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया इस जिसमें निर्धारित 3 मिनट के अंदर वक्ताओं को अपनी कहानी प्रस्तुत करनी थी।  डा कीर्ति श्रीवास्तव, डॉ अर्चना मुखर्जी, श्रीमती अंतिमा नेअंतिम निर्णय देकर विजेताओं की सूची प्रस्तुत की। इसमें प्रथम पुरस्कार इंदौर की कथाकार डॉक्टर स्वाति सिंह, द्वितीय पुरस्कार शाहिस्ता खान भोपाल तथा तृतीय पुरस्कार भोपाल की नम्रता शरण सोना को प्राप्त हुआ।  कहानी प्रतियोगिता में प्रमुख डॉ कुमकुम गुप्ता भोपाल ,मालती बसंत भोपाल ,शाईस्ता खान भोपाल,आरती शर्मा  भोपाल ,प्रतिभा अंश ,राजश्री रावत ,सुनीता मिश्रा भोपाल ,नीहारिका निगम  भोपाल,साधना श्रीवास्तव विदिशा, मधुलिका सक्सेना भोपाल ,शशिकला व्यास भोपाल ,चारुमित्रा इंदौर ,बिंदु नागर इंदौर ,अर्चना श्रीवास्तव इंदौर रेखा सक्सेना इंदौर नम्रता सरन भोपाल आदि ने अपनी रचनाये प्रस्तुत कीसभी कथाकारो ने विभिन्न पहलुओं पर अपनी कथा प्रस्तुत की।
प्रेस क्लब की आरती शर्मा ने वर्तमान राजनीति को लेकर तत्काल एक कथा मंच पर प्रस्तुति की। इस अवसर पर विभिन्न कथाकारों ने अपनी कहानियों का वाचन किया। कार्यक्रम के अतिथि श्रीमती कांता रॉय ने कहा कि आजकल लघु कथाओं को लेकर काफी सरगर्मी चल रही है और लघु कथा के शोध में इस बात का महत्व रखा जाता है कि कथानक क्या है। उन्होंने लघुकथा की समीक्षा के लिए कथाकारों कोआमंत्रित किया गया। श्रीमती अनूपमा श्रीवास्तव ने कहा कि लघुकथा मेरा विषय नहीं है पर मुझे लघु कथा सुनना और पढ़ना अच्छा लगता है आज के इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी में हम नई नई विधाओं का जहां प्रयोग कर रहे हैं  वहाँ प्रगति का एक रास्ता खुलता है ।महिलाओं को इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए । अनुपमा श्रीवास्तव अनुश्री, डॉ प्रीति खरे प्रवीण ने कहा कि आजकल जहां बच्चे टीवी के सामने कार्टून फिल्में देखना पसंद करते हैं वहां उन्हें बाल साहित्य द्वारा इलेक्ट्रॉन दुनिया से मुक्त कराया जा सकता है आज बाल साहित्य की बहुत अधिक जरूरत है वरना वर्तमान की पीढ़ी जो गर्त के रास्ते पर जा रही है जहां से उन्हें निकलना बड़ा मुश्किल! होगा। डॉअर्चना श्रीवास्तव ने कहा कि किसी भी संस्था को चलाने के लिए लक्ष्य और हौसले की जरूरत होती है आपका हौसला है तो कामयाबी  दूर नहीं।  कार्यक्रम आयोजक डॉ सुनीता श्रीवास्तव ने शुभ संकल्पों का लक्ष्य बताते हुए गतिविधियों की जानकारी दी उन्होंने कहा इंदौर के बाद  भोपाल में यह उन का प्रथम प्रयास है जहां वह भोपाल के साहित्यकारों को देख एक आशा की किरण भी जागती है कि हम अपने संकल्प को पूरा करेंगे। कार्यक्रम का संचालन डॉ स्वाति सिंह इंदौर एवं नम्रता शरण सोना, भोपाल ने किया।
आभार प्रदर्शन डॉ सुनीता श्रीवास्तव ने किया।

Tuesday, April 23, 2019

धनुषाकार पिरामिड

विश्व पुस्तक दिवस 
धनुषाकार पिरामिड
हां
विश्व
पुस्तक ह
दिवस है
ये अभिमान
अनुकरणीय
करते अभिनंदन
शत शत नमन
जीवंत ज्वलंत
ज्ञान पूरित
वंदनीय
किताबें
सभी
हैं

है
पुंज
पुस्तकें
प्रासंगिक
ऐतिहासिक
रोचक कथाएं
अंतरिक्ष का ज्ञान
ज्ञानी का अभिज्ञान
प्रेरक प्रसंग
यात्रा वृत्तांत
संस्मरण
निबंध
लेख
हैं

डां अंजुल कंसल"कनुप्रिया"

Monday, April 22, 2019

पुस्तक दास्तां0

विश्व पुस्तक दिवस की शुभकामनायें 💐💐👏👏✍📕📚📗📘📕

बहुत झेलती एकाकी पन
या अवसाद दुखित दर्द मन
गर,तुम न होती ,
नहीं चाहती यदि तुमको
तुम संग नेह नहीं लगाती
मैं सूनापन झेल न पाती
मैं संसार असार समझती
गर तुम न होती....

कुछ पल ऐसे होते हैं जो
मन के साथ टहलते हैं
तब कोई नही सुहाता है
बस प्रिय ही स्मृत होता है
उस क्षण की सखी मित्र मेरी
पुस्तक को मेरा वंदन है
शत शत नमन अभिनंदन है
तुम मेरा सहारा
मेरा अभिज्ञान
मेरी पहिचान
मेरा आगाज
पुस्तक मेरा अभिमान हो
जीने का अंदाज हो
✍📙📕📗📘
स्वरचित :- कुसुम सोगानी

चित्र पर आधारित लघुकथा

आचला गुप्ता
पार्वती आज बेहद उदास है।अपने एकलौते बेटे को पढ़ने के लिए शहर भेजा ताकि वह इस गांव की तरक्की के लिए भी कुछ कर सके।लेकिन वह अपनी पत्नी के साथ वहीं बस गया।पार्वती को आज भी उम्मीद है कि एक दिन बेटा आएगा और उसे साथ ले जाएगा ।गांव की आबोहवा उसे नहीं खींच पाई पर मां की ममता तो अटल और विशाल है ,जो अपनी संतान की हर गलती को भुला देती है।पार्वती अब सिर्फ उम्मीद पर ही जी रही है और पथराई आंखों से राह तक रही है।

चित्र पर आधारित लघुकथा

नम्रता सरन सोना
का करें... इतै मेघ भी न बरसे...ना ही फसल भई...पेड़ भी नंगे धरें हैं... घर में नाज का दाना नही... सो चोका बासन का करें... खाली ठीकरे लटका दिए साखों पर. .और बैठ गए खटिया पे...ऊपरवारे से करने को गुहार... दाता मेघ दे, पानी दे, दाना दे, खुसहाली दे....
मन ही मन करजिया बुदबुदा रही थी....
फिर हौले से बोली..."जी तो करत है...ठीकरों की जगा (जगह) काहे खुदई न लटक जाऊं.."
धरा ताक रही थी आसमान को....
*नम्रता सरन "सोना"*

चित्र पर आधारित लघुकथा

शशिकला व्यास
*उम्मीद का दामन*
अबके बरस पानी कम बरसने के कारण फसल अच्छी नहीं हुई है और धरती माँ ने इस साल जो कृपा की है उसी अनाज को मंडी में बेचकर जो पैसे मिलेंगे उसी पैसों से सारे घर की जिम्मेदारियां निभानी होगी इसी *विचार मंथन* में रामप्यारी आस लगाये *उम्मीद का दामन* थामें बैठी हुई है।
*🌾🎋🌾🎋🌾🎋🌾🎋🌾 *शशिकला व्यास*
       *भोपाल*

चित्र पर आधारित लघुकथा

विश्व पृथवी दिवस की सभी स्वजनों को हार्दिक शुभकामनाएं ।
विरही मन से सोच रही क्या करू ?
न दाना न पानी ,हांडी भी खाली बिन पानी सब सून
अंगना के पेड़ की डाली  पर बासन लटके हे प्रभु भर दे इसी आस से बैठी खाट पर सपने बुन रही है
आस का दीपक जल जाये ।
Mnorma जोशी

Saturday, April 20, 2019

इतवारी कविता


ज्योति देशम
उत्पल बैनर्जी की कविता - दुर्दिनों में
वाचन स्वरुप - ज्योति देशम
प्रदर्शन - बुरा पैट
विडिओ एडिटिंग - कृष्णपाल

https://youtu.be/JaBUU2sBl0w

"ये जो दोपहर है न रात में देखने को ये दिन में कोई निकलता नहीं।"
"तो तुम रोज़ निकल जाओगे न?"
"हाँ, लेकिन बीच में अमावस आ जाता है।"
"अब ये अमावस कहाँ से बीच में आ गया? हमें तो वीडियो पूर्णिमा पर बनाना है।"
"हाँ वो तो है, लेकिन कहाँ?"
"एक काम करते हैं शीलनाथ बाबा की धूनी पर चलते हैं, इसके पीछे एक खँड़ नुमा जगह भी होती है।"
"हम्म्म्म ठीक है।"

कामों में उलझे रहे हम, पूर्णिमा कब आई कब निकल गई पता ही नहीं गया। 
"अरे यार! आज पूर्णिमा है और हमे ध्यान ही नहीं है।"
"क्यों पूर्णिमा को क्या करना है?"
"फिर भूल गए? वीडियो बनाना है।"
"अरे हाँ! मेरा तो ध्यान से ही उतर गया। इसी तरह अभी भी तीन-चार दिन तो दोपहर लगभग पूरी हो चुकी है, कल आखिरी हैं।"
"कल नहीं हो पायेगा मुझे एक बर्थडे पार्टी में जाना है?
"जानिए मुझे शादी में जाना है।"

इस तरह ये पूर्णिमा भी बिना वीडियो बनवाये ही गुज़र गई।

"रिकॉर्डिंग की हुई कितनी कविताएँ बची हैं हमारे पास?"
"तुम देखो तुम्हारे पास है?"
"मैं मैं कंप्यूटर पर देखती हूँ आप जो बच गए हैं उनका नाम लिखते हैं।"
"हम्म्म्म।"
"गिनो कितनी बची हैं?"
"छ: ..."
"बस! (अब पूर्णिमा पर वीडियो नहीं बनाया गया तो ये कविता इतवारी कविता में नहीं आ पाएगी।"
"एक काम करता हूँ उत्पल भाई को बोलता हूँ कि अपना कोई वीडियो बना कर भेज दे।"
"लेकिन बहुत से वीडियो ऐसे हो गए हैं। थोड़ा अलग हो जाएगा तो अच्छा लगेगा।"
"हाँ वो तो सही है लेकिन इमरजेंसी में अब क्या करें?"
"ठीक है।"

"उत्पल भाई को शायद समय नहीं मिल पाया। हफ़्ता हो गया उन्होंने वीडियो नहीं भेजा या शायद कभी काम की अधिकता के कारण व्यक्ति भूल भी जाता है। जैसे पिछले कितने महीनों से हम पूर्णिमा भूल रहे हैं।"

"अरे देखो चाँद कितना बड़ा और पूरा है। आज पूर्णिमा क्या है?"
"हनुमान जयंती कल है यानी पूर्णिमा भी कल है।"
"तुम्हें अभी तक कोई काम नहीं है, कहीं जाना है?"
"नहीं।"
"तो अभी तक वीडियो बना रहे हैं।"
"शैलनाथ बाबा की धूनी चलेगी?"
"नहीं, यहीं गोली मार देंगे।"
"कैसे?"
"आप ये शिला ओढ़ो और जैसा मैं कहूँ वैसा करते जाओ।"

(जैसा मैंने कहा कलाकार ने बिलकुल वैसा तो नहीं किया क्योंकि वह भी रोकने वाला, ऑर कलाकारी तो दिखानी ही थी।)

* पहले चार पँक्तियाँ गुलज़ार साहब की और बाकी सब इस नाचीज़ की।

: देश देशुम

घी का दीपक

"घी का दीपक"

पिंकी तिवारी
"भैया बीस रुपये का देसी घी देना।" एक वृद्ध महिला की आवाज़ ने गोविन्द भाई का ध्यान खींचा जो अब तक अपनी दुकानदारी में व्यस्त थे।

रोज़ की तरह आज भी उनकी दुकान पर बहुत भीड़ थी । इतने में उनकी दुकान का नौकर बोला "सेठ जी बीस रूपए के हिसाब से कितना घी दूँ इनको ?" गोविन्द भाई कुछ कह पाते इसके पहले ही एक चमचमाती सफ़ेद कार गोविन्द भाई की दुकान पर आकर रुकी और सेठ घनश्यामदासजी दुकान पर आकर खड़े हो गए। "जय श्री कृष्णा सेठ जी। "  क्या बात है आज आप स्वयं आये हैं, नौकर-चाकर छुट्टी पर गए हैं क्या या फिर आज कुछ विशेष है ? कहिये क्या सेवा करूँ आपकी?" गोविन्द भाई ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में पूछा । सेठजी बोले "कुछ विशेष तो नहीं पर हाँ, आपने सही कहा - नौकर-चाकर छुट्टी पर गए हैं ।"

इतने में नौकर अंदर से पानी का गिलास ले आया - "ये लीजिये सेठजी, जलपान ।" सेठजी बोले अरे बस, रहने दो और हाँ, मैं ज़रा जल्दी में हूँ ।", "आज ग्यारस का दिन है और सेठानीजी को तुलसाजी को दीपक लगाना है, इसलिए घी लेने आना पड़ा, जल्दी से पांच किलो डालडा घी पैक कर दो।"

"क्या? डालडा घी?" नौकर ने आश्चर्य से पूछा । "अरे हाँ, डालडा घी ही बोला मैंने, भगवान् को ही तो लगाना है। वैसे भी भगवान तो भाव के भूखे होते हैं, उनकी लिए तो सब बराबर, क्या देसी और क्या डालडा । क्यों सही कहा न गोविन्द भाई?" गोविन्द भाई ने जल्दी से नौकर को घी पैक करने को कहा ।

"गोविन्द भाई । इन मांजी को बीस रुपये के हिसाब से कितना घी पैक करूँ?" तभी दूसरे नौकर की आवाज़ आई । अब गोविन्द भाई झुंझलाते हुए वृद्धा से पूछने लगे "आपको बीस रूपए का घी किसलिए चाहिए? इतना तो पन्नी में पैक करने पर ही चिपक जायेगा? " बीस रुपए का ही चाहिए या थोड़ा ज्यादा दूँ?" वृद्धा बोली "भैया । बीस रूपए का ही चाहिए ।"

"अरे मांजी, इतने से घी को क्या ले जाओगी और क्या रोटी पर लगाओगी ?" तभी वृद्धा बोली "आज ग्यारस है ना, मुझे तुलसाजी को घी का दीपक लगाना है।" "खाने के लिए नहीं चाहिए ।" गोविन्द भाई को दो पल के लिए जैसे कुछ सूझा ही नहीं । जल्दी से गोविन्द भाई ने नौकर को आदेश दिया "दे दे जल्दी से मांजी को घी, दिया लग जाये इतना, लगभग बीस ग्राम ।"

घनश्यामदासजी अपनी बगलें झाँक रहे थे और गोविन्द भाई सोच रहे थे, भगवान् किसके भाव के भूखे हैं ? वृद्धा के या सेठ जी के?"

(सर्वाधिकार सुरक्षित)
रचयिता - श्रीमती पिंकी तिवारी, इंदौर

Friday, April 19, 2019

चित्र देख मन मोरा कहे

क्या कर रही हैं , आखियान में काजल लगा रही है ,यो एकरनगो (काला)बदन मुओ (निगोड़ा)क्या केवेगो ,म्हारो (मेरा ) कहना मान थारी (तेरी )आखियां में धोलो (सफेद ) चुनो (चुना )सोहेगो (अच्छा ) लगेगा
*साधना श्रीवास्तवताजगी
साधना श्रीवास्तव
-----------

मेरी सुंदरता मेरा मन है
मेरी कोमलता मेरा तन है
मेरा मन ही मेरा तन है

मेरे तन की शिथिलता
शरीर की कोमलता
मेरे पुराने होने का एकमात्र संकेत
पर, मेरा मन, मेरे मस्तिष्क का अक्स है
सुकून मेरा लक्ष्य है

मैं सुख दुख में सम
संपूर्ण, सुखद, सरल 
खूबसूरत मैं जीवंत नारी हूँ
स्वाति सिंग
*स्वाति सिंग
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अभी थके नही पाँव
अभी हारा नही है हौसला...
आशाओं की भौर निहार रही हूं मैं
आँखों में सजा के काजल....
खुद की नज़र उतार रही हूँ मैं......


नम्रता सरन सोना
*नम्रता सरन "सोना"
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लाल छड़ी
आंखों में कजरारी लड़ी
सजनवाकी पहने हाथो में घड़ी
मिलने को आतुर जंवा बन ,इंतज़ार में दर  पर खड़ी।
प्रभा जैन
*प्रभा जैन
----- -
बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम
मुहँ मे लड़खडा़ती जुबान सजने को आतुर मन ऐसे जैसे नव लेकर आई पैगाम
जज्बा और जुनून देखकर  हम हो गये हेरान ।
दिल से तो है जवान ।
*मनोरमा जोशी
मनोरमा जोशी
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है सोलह श्रृंगार ।मन पाखी भर ले उड़ान,दूर तलक उड़ता रहता है, नारी का मन उम्र का मौसम नहीं देखता
बचपन से लेकर बुढा़पे तक सजने -संवरने का मौसम नहीं देखता
दुर्बल तन, झुरियो के बीच मुस्कान है बाकी, जवानी का उल्लास है बाकी
मन की क्यारी में समाया है बसंत
वो चूडी़, लाली, बिंदी, काजल का
चाव नहीं छूटता
दुनिया कुछ भी कहे, लाल लिबास पहनतर इठलाने का खुमार नहीं छूटता
द्वारा -*आराधना विसावाडिया
आराधना
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उम्र की चिंता नही ,मुझे सजने
का है अधिकार ।
सुंदरता तन मन की निखरी
नारीत्व का आभार।
*अचला गुप्ता
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तन भले बूढ़ा हो चला पर
मन आज भी जवां है जैसे
आज भी सोलवा सावन हो
मन में आज भी वही उमंग है
सोलह श्रृंगार की देखो तो सही
आज भी दुनिया से जारी जंग है
लग न जाये कहीं इस जवां दिल को नज़र
इसलिए आज भी लगाती वो सयानी, काज़ल है
पहनकर लाल साड़ी आज भी करती सबको घायल है
कलाई में पहनी घड़ी उनकी ये संदेश देती है हमें
वक़्त चाहे जो भी हो आज भी वक़्त की वो कायल है

*प्रणिता राकेश सेठिया *परी*
प्रणीता राकेश सेठिया
------


मैं सुख दुख में सम
संपूर्ण, सुखद, सरल 
खूबसूरत मैं जीवंत नारी हूँ
सृष्टिचक्र की धुरी है नारी
उससे है संसार।
*अचला


अचला गुप्ता
🌷🌷हाथों में गर दम न होता
आंखो में काजल न डलता
झुर्रियों पे न जाना कोई
लाल रंग मुझ पे है फबता
आईना मुझको सिखाता
नारी और श्रृंगार नाता
सजना संवरना स्त्री के गुण
मृत्यु शय्या पर भी सजना
बाँधे घड़ी वो सोचती
पल पल सजूँ मन मोहती
कुसुम सोगानी
*कुसुम सोगानी
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
पहन कर लाल लिबास,करूं मैं
सोलह सिंगार,मेरी उमंगे
अनंत अपार।
मन  मे उठती लहरो को,आसमान की उँची उडान
भरने दो़
तन बूढा है तो कया
हुआ  हसरतो की बौछार
होने दो।
---------
वंदना अर्गल

Thursday, April 18, 2019

वोटर

अर्चना वर्मा
*the जिस किसी ने भी लिखा है*

*बहुत अच्छा व्यक्त किया है..*

मैं तो मध्यम वर्ग का सवर्ण हूँ,

मुझे चुनाव के नतीजों से क्या?

ना एक रूपये मे गेहुं मिलेगा,

ना आरक्षण.

ना मैं किसी का वोट bank हूँ ,

ना ही मुफ्त मकान का हकदार.

यहां तक कि

उन 50 करोड़ों लोगों में भी नहीं हु,

जिन्हें आयुष्मान भारत का

फ्री इलाज मिलेगा.

TV देख के खुश हो लूँगा,

सरकार  किसकी बनेगी.

और लग जाऊँगा

*मुफ्तखोरों के लिए*

*TAX कमाने में.*
                           

🌵🌵 *कटू सत्य*🌵🌵

*भारतीय राजनीति*

अल्लाह

कल मैं ट्रेन से यात्रा कर रहा था तो एक भिखारी मेरे पास आया और बोला....

*"अल्लाह के नाम पर कुछ दे दो बाबा"*

मैंने नजर उठा कर निर्विकार भाव से उसे देखा और बोला ....

*"मैं अल्लाह को नहीं मानता" तो क्यों दे दूँ ???*🚩🚩🚩
*उसने घुरकर मुझे देखा.. तो....*
*उसके बाद मैंने उसे प्रस्ताव दिया कि....*

*तुम "भगवान राम" के नाम पर मांगो तो मैं तुम्हें 10 रुपया दूँगा*.

*इस पर वो मेरा मुँह ताकने लगा और ट्रेन के आसपास के लोग भी कौतूहल से हमें देखने लगे.*

*फिर, मैंने अपने प्रस्ताव को और अधिक आकर्षक बनाते हुए कहा कि.... अगर वो भगवान राम के नाम पर मांगेगा तो मैं उसे "50 रुपया" दूँगा.*

*लेकिन, वो भिखारी इसके लिए तैयार नहीं हुआ और भुनभुनाते हुए चला गया*.

*और, मैं भी मन ही मन "उसकी कट्टरता को भांपकर, पेपर पढ़ने लगा.*

*लेकिन, इस घटना से मुझे ये सीख मिल गई कि....* *एक भिखारी जिसके पास खाने को कुछ नहीं है और भीख मांगकर अपना जीवन-यापन करता है, वो भी "धन के कारण, अपने धर्म से समझौता" नहीं करता है*.

*तो क्या हम हिन्दू.... एक भिखारी से भी ज्यादा गए-बीते हैं .... जो अपने निजी स्वार्थ (धन अथवा पद) की लालच में अपने धर्म से गद्दारी करने व सेक्यूलर बनने को हमेशा एक पैर पर खड़े रहते हैं*????

*सोचना अवश्य....* 🧐🧐🙏🏻🚩

अहसास

साधना श्रीवास्तव
बैठे बैठे दिल में ख्याल आया ,ईश्वर ने कितना सुंदर संसार बनाया ,कितने खुशियों के नजराने दिए ,
6
मुझे भी तो तोहफे में ग्रुप के माध्यम से आप सभी प्यारे दोस्तो के रूप में अनमोल खजाने दिए ,करती हूं कामना उस ईश्वर से यही ,सदा इस ग्रुप और ग्रुप के एडमिन त्था ग्रुप के लोगो को सलामत रखना ,जिसने हम सभी को मिलने के बहाने दिए 👍🏻🙏🏻 स्वरचित रचना 🙏🏻

चित्रभाव

चित्र पर मन के भाव

वाह री किस्मत
एक वो हैं जो
दिन रात करते हैं ,
प्रार्थना
पर गूंजती नहीं किलकारी
उनके  अंगना।
जहां बरबस औलाद
अपना डेरा जमाए है,
एक नहीं दो नहीं
पूरे सप्तरंगी इंद्रधनुष
समाए हैं।
पुलिस वाला भी
 हाथ जोड रहा है।
धन्य हैं आप
सात बच्चों के बाप।
बधाई बधाई
खूब फले फूलें
एक मोटर साइकिल
पर सवार आप नौ हैं
पूरे नौ के नौ हैं।
झटपट यहां से निकल जाइये
मेरा मुंह मीठा कराते जाइये।

डां अंजुल कंसल"कनुप्रिया"

विरहणी

विरहणी
बहुत बोलती थी ,सासू मां।हर बात पर टोकना। उसके किसी भी काम को कभी प्रोत्साहित नही किया। बड़ी उलझन होती थी,विमला को।
पति से विमला कोई शिकायत नही करती।वह जानती थी की वो अपनी मां के विरूद्ध कभी कुछ नहीं कहेंगे।
पहले सामूहिक परिवार में सासू मां,ससुर जी,दादा ससुर जी,देवर, नंनद सबके साथ बहुत समय रही।
अपने पति का तबादला दुसरे शहर में होने पर भी वह घर आती जाती रही।
इस बार सासू मां विमला के पास आई थी।दस पन्द्रह दिन तो कुछ बोली नहीं, लेकिन एक दिन अपने बेटे को पड़ोस में बैठा देखकर, उन्होंने मौका देखकर धीरे से विमला से कहा,देख विमला अब बार बार बबुआ को छोड़ घर न आया कर और देख बच्ची भी पढ़ने लगी है।विमला को हंसी आ गई।वह सोचने लगी हमेशा परिवार की जिम्मेदारी बताने वाली सासू मां को एकदम क्या हो गया।
सासू मां विमला का चेहरा पढ़ रही थी,बरस बीते बहू को साथ रहते।अपनी बहू की निश्चलता जानती थी वह।
बोली बहू तेरे ससुर भी शादी के बाद कभी उनके पड़ोस में बैठे रहते थे बस प्यार का नाम और क्षणिक सुख भोगने में वह ऐसे लीन हुए की में केवल बबुआ की मां बनकर रह गई।
वह हतप्रभ थी ।सासू मां ने ताड़ लिया था। उसके पति की फिसलन उसे पता नहीं चल रही थी।
वह जान गई,विरहणी मन की आंख से देखती है,सुनती है।
प्रेषिका___
माया मालवेन्द्र बधेका
७४, अलखधाम नगर
उज्जैन( मप्र)
स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, April 17, 2019

चलो चले पीहर

🚌
यू
 
मनीषा सिंग
" चलो पीहर चलो पीहर"🚌


     नयी किताब आ गई 📖
बच्चो के रिजल्ट आ गए 📋
     🚌 चलो पीहर चलो पीहर
घर के काम निपटा लिए हों
तो चलो पीहर चलो पीहर ।

कैरी  का आचार डाल दिया हो,
साबूदाने की कचरी बन गई हो,
नन्द रहकर जा चुकी हो या,💃🏻
भाभी रह कर आ चुकी हो तो,
    चलो पीहर चलो पीहर🚌

🍪🍲गरम गरम खाने के लिए ,
🍷🍷ठंडा ठंडा पीने के लिए ,🍭
🙇🏻देर से रात में सोने के लिए ,
देर से सुबह उठने के लिए ,

चलो पीहर चलो पीहर ।


माँ के हाथ का खाने को,🍭
💑भाभी का प्यार पाने को,
👦🏻भाई से बात करने को,😭
भतीजो से मस्ती करने को,💃🏻
👭बच्चों के साथ बच्चा बनने को,
अपनी मनमानी करने को,😉
    🚘 चलो पीहर चलो पीहर

साड़े ग्यारह  महीने ससुराल में रहने के लिए😭
पीहर से 15 दिन में प्यार का खजाना  ले आती है  😘😘
यही 15 दिन के प्यार के  पेट्रोल से ससुराल में, साल भर हम औरतो की गाड़ी भागती हे 🚌🏄🏻

🙋🏻💏इस लिए चलो पीहर चलो पीहर 😘😘

Dedicated to all lovely ladies ...😊😊

Thursday, April 11, 2019

हाईकू

मानवेंद्र नारायणी माया
आज का विषय
५_७_५
🙏
मंथन करे।
मंथरा संग रहे।
बचना जरा।
🌸
जय माता की
सिंहवाहिनी दुर्गे
पाप तारिणी ।
🌸
महागौरी मां
लाल चूनड़ ओढे
सौम्य प्रदाता।
🌸
श्रीराम जन्म
हर्षित नरनारी
उड़े गुलाल।

🌸
रामनवमी
 राम अवतरण
बजे नगाड़ा।
🌸
कालिका माता
नरमुंड पहने
पापी का नाश।
🙏माया नारायणी
_स्वरचित
११__४__२०१९

हाईकू

मैया की छबि न्यारी

सब की पालनहारी ,
करती सिंह सवारी
रखना लाज हमारी
-----------------
मनोरमा जोशी
-----------------

प्रमिला 
मॉ हम तुम  पर
पुष्प चढाऐ
दीप जलाऐ
हदय पकाशित
तेरे दर पे
प्रमिला सकसेना
-------------
Add caption
कन्या का हो कन्या पूजन
खुशी खुशहाल और समृद्ध हो जीवन
मैया ऐसा दो आशीर्वचन🙏🏻
Swati sing
--------

हाईकू


Add अनुराधा
शरीर रूपी झीनी चदरिया है
कषटो से उबारो माँ, सात चक्र है
माटी का पुतला, मूलाधार से सहसञार तक, व्याकुल है जनमानस माँ कलयुग दुख से भरा हुआ, अपने जन को तारो माँ
शंख, चक़, गदा, पद्,हल और मूसल से दुश्मनों को मारो माँ
अकाल -मृत्यु ,रोग-शोक,भूत-पिशाच देखते ही दूर भागे माँ
अनुराधा
--------------
भगवतीजगजननी

नम्रता. सरन सोना

मात भवानी
शुभ वरदायिनी
सुखों की दाता।।

मोहक छबि
मुस्कान मनोहर
मनभावन रूप।।

आशीष पाऐं
दरबार माता का
जो कोई आए ।।

रौद्र रूपिणी
दानव संहारक
दुष्टों का ह्रास ।।

करुणा मयी
ममता बरसातीं
दुखों का नाश ।।

जगत जननी
बारंबार प्रणाम
नैया को तार ।।

*नम्रता सरन "सोना"*
---------
शारदा मिश्रा
माॅ आशीर्वाद  मिले
तो कष्ट  मिटे।।

भवतारिणी
रूप  मनोहारिणी
करो उद्धार ।

माँ  वीणापाणि
ज्ञान  का  वरदान  दो
अज्ञान  मिटे ।।

मां  नवदुर्गा
दुखों  का  करे नाश
भरे  प्रकाश ।।

। महामाया रक्षा कर माँ
शारदा मिश्रा
--------

तू मा भोलीभाली

Neelu ji
माँ मेरी माता
मै भक्त तिहारी
मैं भक्ति भाव ना जानू माँ
ले ले शरण तिहारी माँ
तू जग जननी
तू सबकी पालन हारी
तू काली तू दुर्गा
तू माँ भोली भाली
दया दृष्टि करदे माँ
ले ले शरण तिहारी माँ
हाथ जोड़ विनती करु
माँ जगदंबा
जगत का दुःख दूर करो माँ
तू तो मात भवानी मा
ले ले शरण तिहारी
🙏🙏🙏🙏नीलू

मायका

सोनी श्रीवास्तव
*कभी माँ को भी  मायका सा लगने दो ll*

ठीक है, ये उसका घर है। उसी का घर है।
लेकिन
फिर भी कभी माँ को ये घर, मायका सा लगने दो।।

जागने दो कभी उसे भी देर से
नल आने का समय हो या बाई छुट्टी पर हो।
छोटी छोटी समस्याओं से उसे भी कभी मुक्ति दो।
कभी माँ को भी ये घर, मायका सा लगने दो।।

आज बना लेने दो उसको सब्जी पसंद की अपनी।
अधिक नहीं, बस थोड़ी सी, मदद करो तुम उसकी।।
उसकी पसंद और नापसंद पर ध्यान ज़रा तुम दो।
कभी माँ को भी ये घर, मायका सा लगने दो।

कभी सुबह उसके लिए तुम चाय बना लो।
पास बैठ कर अपने मन की बात कभी कह लो।
कभी उसकी बातें भी ध्यान से सुन लो।
अपना बड़प्पन उसे भी कभी महसूस होने दो।
कभी माँ को भी ये घर, मायका सा लगने दो।।

माँ को भी कभी आराम करने दो।
जिन हाथो ने प्यार से तुम्हें पाला,
कभी उन्हीं हाथों पर, अपना हाथ रख दो।

कभी माँ को भी ये घर, मायका सा लगने दो।

Sunday, April 7, 2019

शुभसंकल्प समूह द्वारा गुडीपाडवा पर्व पर धार्मिक तृष्णा साहित्यिक प्रतियोगिता आयोजित


शुभसंकल्प समूह द्वारा गुडीपाडवा के उपलक्ष्य में सावित्री चेरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से धार्मिक तृष्णा साहित्यक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया इस प्रतियोगिता में सभी प्रतियोगी ने रामायण ,महाभारत ,गीता के चोपाई ,दोहे ,श्लोक आदि को मंच पर प्रस्तुत किया जिसमे प्रमुख -शोभा तिवारी ,मनोरमा श्रीवास्तव ,प्रभा जैन,रुपाली तंवर ,मृदुला सिन्हा ,प्रीति गिरी ,अचला गुप्ता ,अलका जैन ,पिंकी श्रीवास्तव ,शारदा गुप्ता ,अंजू निगम ,बबीता सक्सेना ,काजल किरण ,स्वाति श्रीवास्तव ,अल्पना वाणी ,स्वाति सिंग ,अंजुल कंसल ,अभिषेक स्वामी ,मीना गोंड ,सोनी श्रीवास्तव आदि ने धार्मिक रचनाओं का वाचन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया । इस प्रतियोगिता जा निर्णायक श्री अशोक श्रीवास्तव ,सुषमा दुबे ,शोभा दुबे ,स्नेहलता श्रीवास्तव थी । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री कृष्णकुमार अष्ठाना जी ,रीटा एडीशनल कलेक्टर ओमप्रकाश श्रीवास्तव ,डॉ अर्चना श्रीवास्तव ,डॉ साधना श्रीवास्तव ,उपेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने दीपक प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया ।
शुभसंकल्प समूह द्वारा गुडीपाडवा के उपलक्ष्य में सावित्री चेरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से धार्मिक तृष्णा साहित्यक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया इस प्रतियोगिता में सभी प्रतियोगी ने रामायण ,महाभारत ,गीता के चोपाई ,दोहे ,श्लोक आदि को मंच पर प्रस्तुत किया जिसमे प्रमुख -शोभा तिवारी ,मनोरमा श्रीवास्तव ,प्रभा जैन,रुपाली तंवर ,मृदुला सिन्हा ,प्रीति गिरी ,अचला गुप्ता ,अलका जैन ,पिंकी श्रीवास्तव ,शारदा गुप्ता ,अंजू निगम ,बबीता सक्सेना ,काजल किरण ,स्वाति श्रीवास्तव ,अल्पना वाणी ,स्वाति सिंग ,अंजुल कंसल ,अभिषेक स्वामी ,मीना गोंड ,सोनी श्रीवास्तव आदि ने धार्मिक रचनाओं का वाचन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया । इस
प्रतियोगिता जा निर्णायक श्री अशोक श्रीवास्तव ,सुषमा दुबे ,शोभा दुबे ,स्नेहलता श्रीवास्तव थी । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री कृष्णकुमार अष्ठाना जी ,रीटा एडीशनल कलेक्टर ओमप्रकाश श्रीवास्तव ,डॉ अर्चना श्रीवास्तव ,डॉ साधना श्रीवास्तव ,उपेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने दीपक प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया । कार्यक्रम के शुभारंभ के बाद दुर्गासप्तशती कवच का सामूहिक रूप से विधिवत सामुहिक पाठ किया गया। कार्यक्रम में राकेश श्रीवास्तव ,अनिल श्रीवास्तव ,सुशील जौहरी ,डॉ अनिमेष श्रीवास्तव ,चन्द्रमोहन श्रीवास्तव ने श्रोताओ को सम्बोधित किया। ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने आने ट्रस्ट के बारे में जानकारी दी ,डॉ अर्चना ने सावित्री चेरिटेबल ट्रस्ट की गतिविधियों से अवगत कराया ।
डॉ सुनीता श्रीवास्तव ने शुभसंकल्प समूह के लक्ष्य को बताते हुये कहा कि धार्मीक तृष्णा प्रतियोगिता से धर्म ज्योत की एक चिंगारी प्रज्ज्वलित करने का प्रयास किया जिसके लिये समूह के सदस्यों ने काफी मेहनत की थी आर्यन श्रीवास्तव ,अर्थव श्रीवास्तव बच्चों ने भी अपनी प्रस्तुति देकर आस की ज्योत जलाई । कार्यक्रम का संचालन डॉ अर्चना श्रीवास्तव ,स्वाति सिंग ने किया। पुरुस्कार वितरण का कार्य प्रीति गिरी ऒर रुपाली तंवर ने सम्हाला । आभार प्ररद 
कार्यक्रम के शुभारंभ के बाद दुर्गासप्तशती कवच का सामूहिक रूप से विधिवत सामुहिक पाठ किया गया। कार्यक्रम में राकेश श्रीवास्तव ,अनिल श्रीवास्तव ,सुशील जौहरी ,डॉ अनिमेष श्रीवास्तव ,चन्द्रमोहन श्रीवास्तव ने श्रोताओ को सम्बोधित किया। ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने आने ट्रस्ट के बारे में जानकारी दी ,डॉ अर्चना ने सावित्री चेरिटेबल ट्रस्ट की गतिविधियों से अवगत कराया । डॉ सुनीता श्रीवास्तव ने शुभसंकल्प समूह के लक्ष्य को बताते हुये कहा कि धार्मीक तृष्णा प्रतियोगिता से धर्म ज्योत की एक चिंगारी प्रज्ज्वलित करने का प्रयास किया जिसके लिये समूह के सदस्यों ने काफी मेहनत की थी आर्यन श्रीवास्तव ,अर्थव श्रीवास्तव बच्चों ने भी अपनी प्रस्तुति देकर आस की ज्योत जलाई । कार्यक्रम का संचालन डॉ अर्चना श्रीवास्तव ,स्वाति सिंग ने किया। पुरुस्कार वितरण का कार्य प्रीति गिरी ऒर रुपाली तंवर ने सम्हाला । आभार प्ररद  

Thursday, April 4, 2019

नटनी



नम्रता सरन सोना
जादूगरनी सी
रस्सी पर चलती जाती
नटनी,,
संभल संभल कर
कदम कदम बढाती
नटनी,,
रस्सी के बीचों बीच
एक पैर पर
झूल झूल जाती
नटनी,,
देखने वालों की
साँसें रुक जाती,
पर,
ढम ढम की आवाज़ पर
हैरत अंगेज़ करतब दिखाती
नटनी,,
तमाशबीन चवन्नी अठन्नी
उछालकर अपनी राह पकड़ते ,
एक एक सिक्का जमा करके
पल्लू में गाँठ लगाती
नटनी,,
थके कदमों से घर को
सौदा लेकर जाती
नटनी,,
मौत को मात दे आई हो
ऐसा जश्न मनाती
नटनी,,
अगली सुबह फिर उठती
नटनी,,
ठुड्डी पर तिल लगाती
नटनी,,
जीने के खातिर फिर
मौत को गले लगाती
नटनी,,
ढोलक की इक थाप पर
रस्सी पर चढ़ जाती
नटनी,,,,,,,

*नम्रता सरन "सोना"*

दर्द



सोनी श्रीवास्तव
जब डॉक्टर ने ये बताया था ना , बधाई हो बेटी हुई है । मैंने लड्डू बांट दिए थे पूरे अस्पताल में क्योंकि मुझे शिखा ( पत्नी) जैसी बेटी ही चाहिए थी ।जब चलती थी ना  तो उसके छोटे छोटे पैरों की  पायल की गूंज पूरे घर में दौड़ जाती थी ।मुझे याद है उसने पहली बार जब पापा बोला था। कितना खुश था मैं । मैंने उसे अपने गोद में उठा लिया  घंटों में उससे बोलता रहा , बेटा पापा बोलो , पा.....पा ,पा......पा और वो गर्दन मटकाने लगती । मैं उसकी हर नादानी पर बहुत हंसता ।
जब वो पांचवी में थी उसने पापा के ऊपर निबंध लिखा । उसने लिखा मेरे पापा हीरो है ।जो उसने अपने शब्दों में लिखा था , दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जो पापा मेरे लिए नहीं ला सकते और ऐसा कोई काम नहीं जिसे पापा नहीं कर सकते । मेरे पापा अलादीन के चिराग हैं ।मैंने न जाने कितनी बार उस निबंध को पढ़ा । जब भी मैं उसे पढ़ता तो मुझे एक सफल पिता की झलक उसमें दिखती
अपनी मां की चुन्नी ओढ़कर अक्सर मुझे खाना बनाकर खिलाती ।
 धीरे धीरे मेरी  प्लास्टिक की गुड़िया दादी अम्मा बन गई  ।मैं उसमें अपनी मां की छवि देखता  ।हर बात पर मुझे डांटना ।,"पापा आप ऐसे क्यों करते हो ?पापा आप ऐसे क्यों नहीं करते ? इतने सवाल उसके  हर सवाल को मजाक में उड़ा दिया करता । जब कभी सफाई करती पोछा लगाती है मैं उसकी पोचे के अंदर अगर चप्पल पहन कर आ जाता तो मानो मेरी मां ही मुझे डांट रही हो
  गुस्से में  पापा मैंने पोछा  लगाया  है ।
मैं बोल देता बेटा मुझे नजर नहीं आया था।
 पापा आप रोज ऐसे ही करते हो ।
अच्छा  , अच्छा अब नहीं करुंगा ।
मैंने उससे कहा था । तुम आर्ट ले लो कॉलेज में उसने कहा नहीं मुझे साइंस  पढ़नी  है । साइंस की सुविधा हमारे शहर में नहीं थी  ,दूसरे शहर मैंने उसे पढ़ने के लिए भेजा ।सचमुच जिस दिन वो जा रही थी ना मैं  रोया था । शिखा ने मुझे समझाया ," अभी तो बेटी कॉलेज जा रही है । आप अभी से इतना रो रहे हैं ।जिस दिन ससुराल जाएगी उस दिन कितना रोयेंगे  ?"

अब कॉलेज भी पूरा हुआ । तलाश एक अच्छे लड़के की जो मेरी बेटी को मेरी तरह खुश रख सके। उसके लिए मैं कोई भी कीमत देने के लिए तैयार था ।अच्छे से अच्छा घर ,अच्छे से अच्छा परिवार मैं उसके लिए देखना चाहता था । मैंने एक आलीशान घर में उसका रिश्ता तय किया ।जहां किसी चीज की कोई कमी नहीं थी ।मुझे लगा कि मेरी बेटियां सुख से रहेगी । क्या हुआ जो मैं अपनी सारी FD तुड़वा दूंगा ।क्या हुआ जो मैंने अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचा कर नहीं  रखा है । उसे भी मैं उसकी झोली में डाल दूंगा लेकिन उसके लिए तो खुशियां खरीद लूंगा ना ।और मैंने खरीद लीं उसके लिए खुशियां ।शादी वाले दिन जब वो गहना जेवरों से लदी हुई थी तो मैं सारे दुख भूल गया था कि मैंने अपने लिए एक पाई भी नहीं छोड़ी है ।

उसकी विदाई के समय मैं बहुत रोया  , बहुत ज्यादा  ।उसकी गाड़ी जब बारात घर से निकली तो बाहर  मैं घंटों खड़ा होकर रोया ।मुझे नहीं पता था मेरी चिड़िया 1 दिन ऐसे उड़ जाएगी मेरे घोसले से ।उसकी भी आंखें जहां तक गाड़ी मुड़ी  मेरे ऊपर ही टिकी  थीं । मैंने संभाल लिया खुद को आखिर यही नियम है । बेटी को एक दिन अपने घर जाना ही है।

  उसके जाने के बाद भी उसको भूलना नामुमकिन था ।जब भी चप्पल पहनकर अंदर आता ना तो मुझे गुड़िया याद आती । जब भी अपनी प्रेस के  कपड़े ढूंढता तो मुझे गुड़िया याद आती । जब भी एक कप चाय पीने का मन होता तो मुझे गुड़िया याद आती ।जब भी  शिखा मुझे डांटती तो मुझे गुड़िया याद आती , कैसे मैं हंसकर कह दिया करता था देखो गुड़िया तुम्हारी मम्मी मुझे डांट रही है । जब भी मैं कुछ भारी समान बाजार से लेकर आता तो मुझे गुड़िया है याद आती , कैसे वो गेट पर आते ही मेरा सामान मेरे हाथ से ले लिया करती । जब भी बाजार में रखे हुए अंगूर  देखता  तो मुझे गुड़िया याद आती क्योंकि उसे अंगूर   बहुत पसंद थे । फिर अपने आपको समझाता पागल हो गया है क्या रामेश्वर ? तूने अपनी जीवन भर की कमाई क्या इसलिए खर्च की है कि तेरी बेटी अंगूर के लिए तरसे ।उसे किस बात की कमी। हर मौके पर मुझे उसकी याद आती शायद वो भी मुझे इतना ही याद करती होगी ।

 हां दिखाती नहीं है ।  जब घर आती , तो मैं छुपकर उसे संतुष्टि से 5 , 10 मिनट पहले देखता था । उसका चेहरा पढ़ता । वो खुश तो है ना । उसकी मुस्कुराहट में जैसे मैं उसकी यादों  को भुला देना चाहता था , पर न जाने क्यों ? उसे देख कर लगता है बहुत कमजोर हो गई है । कई बार मैंने उससे पूछा , अपने पास प्यार  से बिठाकर बेटा कुछ कमजोर लग रही हो तो उसने बनावटी हंसी हंसते हुए कहा ," पापा ये तो फैशन है जो जितना पतला होगा उतना ही ज्यादा सुंदर दिखेगा ।"

और कमजोर और उदास और गंभीर वो दिन पर दिन होती चली गई और फैशन का मुखौटा पहना कितनी आसानी से उसने मुझे पागल बना दिया । मैं कैसे नहीं देख पाया उसके दर्द को ।आज मेरी गुड़िया मेरे सामने वाले कमरे में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है । उसने अपने बाप से पैसा मांगने की बजाय खुद को फांसी लगाना ज्यादा बेहतर समझा । यहां तक कि अपने करीबी दोस्त को भी मना कर दिया , उसके पापा तक ये बात ना पहुंचे की ससुराल में वो कैसे रहती है ? क्यों नहीं आई वो मेरे पास । वो जो हर चीज के लिए मेरे पास आती थी । उसने क्यों नहीं कहा , पापा मुझे इस नर्क से निकाल लो ।मैं उसे कभी नहीं रहने देता वहां । चाहे मैं खुद बिक जाता , पर मैं उसे वहां से निकाल लेता । क्या करूंगा मैं उसके लिए अब लड़कर जब वो  नहीं रहेगी ? मैं हर बड़ी से बड़ी लड़ाई लड़ता उसके लिए उसने क्यों नहीं समझा मुझे इस लायक । पुलिस के फोन से पहले काश उसका फोन आया होता ,"पापा अब मैं इस घुटन में नहीं जी सकती " तो मैं उसे समझाता बेटा मैं हूं ना । जब तक मैं हूं , तब तक दुनिया में कोई ऐसा दुख नहीं है जो तुम्हें छू सके । वो क्यों भूल गई कि उसके पापा अलादीन के चिराग हैं!

स्त मस्त भगोरिया
मस्ताने फागुन ने बिखेरे  कई रंग
भगोरिया को भी लाया है अपने संग
रिश्तों की खुशहाली का मौसम आया
दिल के द्वार पर खुशियों की दस्तक लाया ।

 बाग बगीचों खेतों  में टेसू  है दहका
प्रणय निवेदन के रस  युवा में छलकाता
मस्त नशीला  महुआ फ़िजाओं  में चहका
गदराया आम बोर सपनों को महकाता ।

  डालों  पर  कोकिल पंचम स्वर में पी बुलाए
मन वीणा के तार मिलन की आस  जो लाए
प्रेम प्रीत नेह स्नेह से  सुरभित गगन धरा
छुअन की सिहरन से उल्लासित ऋतु अधरा ।

मैं तेरी भाषा तू मेरा भाव है  पिया
करता है अर्ज आज तुझ से मेरा हिया
 बीड़ी शराब नशे से रहना तुम अब  दूर
साफ -सफाई स्वच्छता का बरसाना नूर ।

  तेरे  चुड़ला पायल से   करूँ सोलह श्रृंगार
 खिला दे पान का बीड़ा चलूँ तेरे  द्वार
खुशियों का गुलाल मल  छिटका प्रेम  छटा
गीत छंद में घुली है तेरे शबाव की घटा ।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई ।

Tuesday, April 2, 2019

जिंदगी

क्या खूब लिखा है -                                                               
किरण जेती
*आहिस्ता  चल  जिंदगी,अभी*
*कई  कर्ज  चुकाना  बाकी  है*
*कुछ  दर्द  मिटाना   बाकी  है*
*कुछ   फर्ज निभाना  बाकी है*
                   *रफ़्तार  में तेरे  चलने से*
                   *कुछ रूठ गए कुछ छूट गए*
                   *रूठों को मनाना बाकी है*
                   *रोतों को हँसाना बाकी है*
*कुछ रिश्ते बनकर ,टूट गए*
*कुछ जुड़ते -जुड़ते छूट गए*
*उन टूटे -छूटे रिश्तों के*
*जख्मों को मिटाना बाकी है*
                    *कुछ हसरतें अभी  अधूरी हैं*
                    *कुछ काम भी और जरूरी हैं*
                    *जीवन की उलझ  पहेली को*
                    *पूरा  सुलझाना  बाकी     है*
*जब साँसों को थम जाना है*
*फिर क्या खोना ,क्या पाना है*
*पर मन के जिद्दी बच्चे को*
*यह   बात   बताना  बाकी  है*
                     *आहिस्ता चल जिंदगी ,अभी*
                     *कई कर्ज चुकाना बाकी    है*
                     *कुछ दर्द मिटाना   बाकी   है* 
                     *कुछ  फर्ज निभाना बाकी है !*
 🙏🙏🙏🙏🙏
     👣जय दादा की

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