मिट्टी की दीवारें , टूटी छ्त ये कहती है ।
हम हुए पुराने , बच्चों दुनियाँ अब तुम्हारी है ।।
अंबर को छुते घर हों ।
पर गूंज हँसी की बिखेरे रखना ।।
जगमग हो रोशनी से घर सारा ।
पर सुर्य की किरणों के लिये खिड़की रखना ।।
कभी चांदनी रात में ।
याद बिते पलों की करते रहना ।
जब याद आए वो अपने ।
तो चाँद में उन्हें देखते रहना ।।
रखना याद , बचपन अपना ।
बच्चों को भी ख़ुशियां देते रहना ।।
भीगने देना बारिश में ।
एक नाव कगज़ की बना कर देना ।।
ग़र हो मिलना पड़ोसियों से कभी ।
तो रिश्तों की डोर बांधे रखना ।।
जब मिले फुर्सत कभी ।
तो पिटारा यादों का खोलते रहना ।।
यादों की इस मिठी हलचल से ।
परिवार को संस्कारों में बांधे रखना ।।
उम्र के हर दौर को ,खुशियों से भरते रहना ।
छु लेना अंबर को , पर जड़ों को अपनी मत भूलना ।।
मिट्टी की दीवारें , टूटी छ्त ये कहती है ।
हम हुए पुराने , बच्चों दुनियाँ अब तुम्हारी है ।।
" मीनू मांणक "

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