नज़रें तकती है तुम्हें कभी द्वार पर
कभी देखूं तेरी राह मैं बाहर तक
तुम लौट आती हो जब मेरे पास
कस्तूरी बिखरती जैसे आसपास
कितना संघर्ष करती हो तुम माँ
मेरे एक निवाले के लिए भटकती हो
ठोकरों को जैसे तुम पटकती हो
मेरे उज्जवल भविष्य के लिए माँ
तुम रोज कितनी तकलीफ सहती हो
गुलाब सा बन मेरे जीवन में महकती हो
अपने लिए तुमने क्यों जीना छोड़ दिया
देखो मुसीबतों का रूख़ तुमने मोड़ दिया
अपने वजूद से तुमने मुझे पल पल सींचा
कभी अपनी देह से कभी रक्त से सींचा
कोख से लेकर अब तक पाला है मुझको
ऐसे ही हर पल तेरा सहारा मिले मुझको
अभी तो 8 वर्ष की नन्ही सी परी हूँ मैं माँ
हो जाने दो मुझे थोड़ा और अभी बड़ी,माँ
देखना तुम ,मिटा दूँगी मैं तुम्हारे दुख को
बिछा दूँगी कदमों में तेरे मैं हर सुख को
कभी कमी नही होने दूँगी मैं तुम्हें बेटे की
मैं हर फ़र्ज़ निभाऊंगी बेटे और बेटीे का
जिस विश्वास से तुमने मुझको जन्म दिया
कभी नही तोड़ूंगी मैं,मैंने खुद से ये वादा किया
कर्ज़ नही चुका पाऊंगी मैं कभी तुम्हारी ममता का
ये प्यार ,संस्कार,स्नेह और ये दुलार माँ का
लेकिन कुछ अंश ही सही लौटाऊंगी मैं पूरा
देखना मेरे वजूद में दिखेगा तुझे हर पल
तेरी परछाईं, तेरा अक्स मुझमें है समाया
माँ मैंने कभी ईश्वर को नही है देखा
पर तुझसे जुदा कहाँ उनका भी वजूद होगा
वो करते है जरूरत पूरी , इस दुनिया की
और तेरी तो पूरी दुनिया ही मैं हूँ -है न माँ
हर जन्म में मिले माँ मुझे तेरा ही साया
© मौलिक रचना सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रणिता राकेश सेठिया *परी*
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