Wednesday, May 22, 2019

रेलगाड़ी



छुक छुक करती आती रेल
छुक छुक करती जाती रेल
दूर पास सभी को ले जाती
बड़े काम है आती रेल ...

शान बड़ी निराली इसकी
चाल बड़ी मतवाली इसकी
चलती ज्यों करती हो खेल .....

नर हो या हो फिर नारी
सभी करें इसकी सवारी
मचती रहती  है रेलमपेल .....

मर्जी हो जहां तुम जाओ
मर्जी हो वहां से आओ
चाहे दिसपुर हो या परेल .....

हिन्दू ,मुस्लिम, सिख्ख ,ईसाई
करे सफ़र जैसे हों भाई
सभी धर्म का कराती मेल .......

चेन्नई से इडली ले जाती
कश्मीर से केशर ले आती
और मुंबई से लाती है भेल ....

हल्का हो या भारी माल
चाहे पीला हो या लाल
सबको लाती ले जाती रेल ......

तुमको चाहे कहीं भी जाना
टिकट कटाना भूल न जाना
वरना जुर्माने संग होगी जैल ....

             -----मधु सक्सेना

आसमा



वसुधा का छोटा सा घरौंदा,
सारा दिन पति विकास के साथ नितांत अकेले गुजरता है। बस वृक्षों के झुरमुठ से पंछियों का कलरव ही सुकून देता है। शामें अक्सर आंगन के बगीचे में ही गुजरती है। आज ची ची की चहचहाहट कुछ अधिक ही सुनाई दे रही है। इतने में ही दो चूजे फुदकते हुए आंगन में आए,,
मानो किसी को पुकार रहे हो। यह क्या चिड़ा चिड़ी आगए, अपनी चोंच में भरे दाने चूजों को खिलाने लगे। घोंसले के बिखरे तिनकों को संवारकर फिर चले अपने काम पर। और एक दिन पंख आने पर दोनों चूजे फुर्र से उड़ गए।
वसुधा को याद आने लगे वे दिन जब पंखुरी व अबीर की धमाचौकड़ियों से घर आबाद रहता था।दिन रात पलक झपकते ही बीत जाते थे,,
स्कूल क्लासेस ऊपर से नई नई फरमाइशें ।वह दिन भी आया जब बारी बारी से दोनों बच्चे भी चूजों की तरह अपनी अपनी उड़ान पर चले गए।
परन्तु दूर रहकर भी माँ का दिल है कि मानता ही नहीं।वसुधा अचार पापड़ बड़ी मसाले और त्यौहारी गुजियां
आदि मिठाइयां बनाने में जुटी रहती। विकास टोंकते, "क्यों इतनी माथाफोड़ी करती हो,कौन खाता है इन्हें ? फिर पता नहीं कब आएंगे तुम्हारे बच्चे ? " वसुधा जवाब देती, " आप भी बस,,,घर की बनाई चीज़े मिलती कहाँ है भला।अरे भिजवा देगें किसी के साथ।" विकास चिल्लाते हुए कहते हैं," याद है दिवाली पर हमारी भेजी मिठाइयां दोस्तों में बाँट दी थी और ड्रेसेस तो उन्हें पसंद ही नहीं आई।अब तुम भी भूल जाओ उन्हें , आसमां जो मिल गया है,,माँ को भूल गए हैं।
वसुधा आह भर कर कहती है, " चलो कोई तो माँ मिली।"
सरला मेहता,,,मौलिक

Tuesday, May 21, 2019

बचपन की अठखेलियाँ

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बच्पन की अठखेलियाँ करती शरारते ।
मे तीसरी कक्षा मे पढ़ती थी उन दिनों मे ओर मेरी सहेली ओटले पर बेठकर गप्पे लड़ाते थे ।
पडो़स मे दो मुसलमान परिवार रहता था वह शाम को जब बुरखा ओढ़ कर निकलती तब हम पीछे से उनका बुरखा खीच कर गली मे छिप जाते ,संयोग वश एक रोज मे भागने लगी मेरा पेर फिसला और मे गिर गई ।
सामने से डाःसाःने देख लिया जब मेघर पर गई तब माँ ने पूछा क्या हुआ केसे गिरी तब मे कुछ बोलती उससे पहले मेरी सहेली ने माँ को सच बता दिया और पट्टी कराने ले गये तब
डासाः ने कहा पहले पट्टी फिर धूलम पट्टी
मनोरमा जोशी

भगवान की इक्छा



एक बार एक किसान जंगल
में लकड़ी बिनने गया तो उसने
एक अद्भुत बात देखी।

एक लोमड़ी के दो पैर नहीं थे,
फिर भी वह खुशी खुशी घसीट
कर चल रही थी।

यह कैसे ज़िंदा रहती है जबकि
किसी शिकार को भी नहीं पकड़
सकती, किसान ने सोचा।

तभी उसने देखा कि एक शेर
अपने दांतो में एक शिकार
दबाए उसी तरफ आ रहा है
सभी जानवर भागने लगे,
वह किसान भी पेड़ पर चढ़
गया। उसने देखा कि शेर
उस लोमड़ी के पास आया,
उसे खाने की जगह, प्यार से
शिकार का थोड़ा हिस्सा
डालकर चला गया।

दूसरे दिन भी उसने देखा कि
शेर बड़े प्यार से लोमड़ी को
खाना देकर चला गया।

किसान ने इस अद्भुत लीला के
 लिए भगवान का मन में नमन
किया। उसे अहसास हो गया कि
*भगवान जिसे पैदा करते है*
*उसकी रोटी का भी इंतजाम*
*कर देते हैं।*

यह जानकर वह भी एक निर्जन
स्थान चला गया और वहां पर
चुपचाप बैठ कर भोजन का
रास्ता देखता। कई दिन गुज़र
गए, कोई नहीं आया। वह
मरणासन्न होकर वापस
लौटने लगा। तभी उसे एक
विद्वान महात्मा मिले। उन्होंने
उसे भोजन पानी कराया, तो
वह किसान उनके चरणों में
गिरकर वह लोमड़ी की बात
बताते हुए बोला, "महाराज,
भगवान ने उस अपंग लोमड़ी
पर दया दिखाई पर मैं तो मरते
मरते बचा। ऐसा क्यों हुआ कि
भगवान् मुझ पर इतने निर्दयी
हो गए?

महात्मा जी उस किसान के सर
पर हाथ फिराकर मुस्कुराते हुए
बोले, तुम इतने नासमझ हो गए
कि तुमने भगवान का इशारा भी
नहीं समझा इसीलिए तुम्हें इस
तरह की मुसीबत उठानी पड़ी।
तुम ये क्यों नहीं समझे कि
भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह
मदद करने वाला बनते देखना
चाहते थे, निरीह लोमड़ी की
तरह नहीं।

हमारे जीवन में भी ऐसा कई
बार होता है कि हमें चीजें जिस
तरह समझनी चाहिए उसके
विपरीत समझ लेते हैं।

*ईश्वर ने हम सभी के अंदर*
*कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां*
*दी हैं जो हमें महान बना*
*सकती हैं। चुनाव हमें करना*
*होता है, शेर बनना है*
*या लोमड़ी।*
वंदना पुणेताम्रकर

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गणेशा


बात उन दिनों की है जब हम सब भाई बहनों की शादी नहीं हुई थी सिर्फ बड़ी दीदी, सपना की शादी हुई थी। और वह लोकल शादी थी तो अक्सर सपना दीदी और उसके ससुराल वालों का हमारे यहाँ आना जाना चलता रहता था। एक बार मेरा भाई, गट्टू जो नागपुर से इंजीनियरिंग कर रहा था और छुट्टियों में घर आया था। एक दिन शाम के समय हम सब घर पर नहीं थे सिर्फ मम्मी और गट्टू घर में थे। तभी अम्मा, दीदी की सास, का फोन आया कि हम लोग आ रहे हैं। दीदी ने मम्मी से पूछा 'आप और चाची सब घर पर है कि नहीं?' मम्मी ने कहा 'हाँ ये सब लोग बाज़ार गये हैं आते ही होंगे और हम तो घर पर ही हैं।आप लोग आइये।
मम्मी को उस दिन वैभव लक्ष्मी की पूजा करना था तो मम्मी ने फोन रखते ही निश्चय किया कि पूजा कर लें क्योंकि फिर रात हो जाएगी। तो मम्मी ने गट्टू से कहा कि 'हम पूजा कर रहे हैं और अगर कोई आए तो देख लेना।' गट्टू ने कहा 'ठीक है।' इसी बीच करीब 1 घंटे बाद दीदी की सास और उसके पूरे परिवार वाले हमारे घर आ गए। गट्टू बाहर गेट में हाथ रखकर खड़ा था। जैसे ही अम्मा और सब कार से उतरने लगे तो गट्टू कुछ घबराता हुआ सा बोला कि 'कोई घर पर नहीं है मम्मी चाची सब लोग बाज़ार गये हैं और देर से आयेंगे।' दीदी को बड़ा अजीब सा लगा कि अभी तो मम्मी से बात हुई थी फिर अचानक मम्मी बाज़ार क्यों चली गयीं। पर गट्टू के अजीब सा व्यवहार देख दीदी बात टालते हुए बोली 'ठीक है हम लोग कहीं और जा रहे हैं लौटकर आते हैं।'
यहाँ जब मम्मी की पूजा खत्म हुई तो मम्मी ने गट्टू से कहा कि 'सपना लोग आ रहे थे अभी तक नहीं आये। पता नहीं क्या हुआ।' गट्टू बोला कि 'वो लोग तो आए थे पर आपने कहा न कि किसी को अंदर मत आने देना तो मैंने बहाना बना दिया। इसीलिये वो लोग कहीं और चले गए।' वह आगे बोला 'मुझे लगा आप कुछ ख़ास पूजा कर रहीं हैं।' मम्मी ने कहा कि 'नहीं ऐसा नहीं था। वो तो हमने इसलिये कहा था कि हम जल्दी से उनके आने के पहले पूजा कर लें। 'मम्मी को हँसी भी आयी और ख़राब भी लगा।
फिर देर रात जब दीदी लोग घर पर आये तो मम्मी ने सबसे बहुत माफ़ी माँगी और पूरी बात बताई। तब अम्मा बोलीं  'अरे नहीं नहीं बहन जी आप ऐसा क्यों सोच रही हैं आज तो हमें गणेश जी के दर्शन हो गए जिन्होंने शंकर जी तक को अंदर नहीं आने दिया था। सब खूब हँसे।
यह बात हम सब भाई बहन अक्सर याद करते हैं। पूरा बचपन और वह पूरा समय याद आ जाता है l बहुत मीठी मीठी यादें और बहुत भोली भाली जिंदगी ...
डॉ स्वाति सिंग

जन्मदिन



4- 5 साल की एक नन्ही बच्ची अपने बाबूजी को साइकिल पर ऑफिस जाते देखकर मचल गई और बोली मुझे भी आपके साथ चलना है। बाबूजी ने बहुत समझाया लेकिन वह नहीं मानी और जमीन पर धूल में लौटने लगी। अंदर से मां आई उसने भी बच्ची को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी और तुतलाती बोली में कहने लगी,आज मेरा जन्मदिन है मुझे घूमने जाना है। बाऊजी उसी समय साइकिल टिका कर उसका हाथ पकड़कर अंदर ले गए और उसकी मां से बोले मुझे कुछ पैसे दे दो और इसे तैयार कर दो । मां ने हाथ मुंह धुलवा कर बच्ची को तैयार कर दिया तब तक बाबूजी एक  अर्जी लिख ली, फिर बाबूजी ने उस बच्ची को  साइकिल पर आगे की सीट पर बिठा लिया और अपने एक सहकर्मी के घर जाकर वह अर्जी दे दी और कहा आज मैं स्कूल नहीं आऊंगा। बाबूजी उस स्कूल में हेडमास्टर थे।
फिर बाऊजी उसे अपने मित्र की अपने की दुकान पर ले गए वहां बच्ची फिर मचल गई उसे दो फ्रॉक पसंद आए,बाबूजी का शायद इतना बजट नहीं था। उन्हें बच्ची को मना करने में थोड़ा संकोच हो रहा था तभी उनके मित्र शायद उनकी मजबूरी भांप गए थे वे बोले  ,कोई बात नहीं सर आप ले जाइए दोनों। बच्ची का जन्मदिन है एक फ्रॉक मेरी तरफ से गिफ्ट। बच्ची खुश हो गई और बाबूजी उसे घुमाते फिराते कुछ खाने की चीजें दिलवा कर वापस घर ले आए।
 मां बोली ,अरे दो - दो फ्रॉक क्यों ले आए ,मैंने भी उसके लिए एक फ्रॉक सिला  है। बाबूजी ने बिटिया के सिर पर हाथ रखते हुए कहा कोई बात नहीं बिटिया का जन्मदिन है और एक तो किशन लाल जी ने गिफ्ट कर दिया नहीं तो मैं उधार करके आता, नन्ही सी गौरैया है कुछ दिन हमारे घर रहकर उड़ जाएगी। मां ने लाड करते हुए कहा बहुत जिद्दी है ये लड़की।फिर  बाबूजी ने अपनी झोले में से कुछ खाने की चीजें निकाली बच्चे ने फुर्ती से वह सब चीजें अपने छोटे से फ्रॉक में भर कर छुपा ली  ।उसके बड़े भाई बहन भी तब तक आ चुके थे। मां  प्यार से बोली  मेरी राजा बेटी अकेली खाएगी क्या ? तेरा जन्मदिन है ना चल सब को बिस्किट और टॉफी  बांट उसकी तारीफ करती हुई बोली, अरे हमारी बिटिया तो कितनी समझदार है देखो उसका जन्मदिन है आज वह सब को खिलाएगी। बच्ची ने तुरंत उठकर भाई बहनों से चीजें बाट ली। वो समझदारी और जिद्द का भरपूर सम्मिश्रण थी।कब जिद्दी बन जाए और कब समझदार,वो ही जाने।

निवेदिता ,हां यही नाम था उस बच्ची का प्यारी सी, गोरी चिट्टी घुंघराले बाल ,छम छम पायल पहनने का बहुत शौक । साथ ही जन्मदिन मानने का भी बहुत शौक था उस और वही शौक आज तक जीवित है उसे अपना जन्मदिन साल के 365 दिन में सबसे प्यारा लगता है ।उस समय भी जन्मदिन की तैयारियां बहुत पहले से शुरू हो जाती थी और आज भी वही हाल है यह बच्ची शरीर और मन से तो बड़ी हो गई है लेकिन उसके अंदर आज भी एक छोटी सी बच्ची का दिल मचलता है। वह आज भी अपने जन्मदिन पर इतनी ही खुश होती है और आज भी दो ड्रेसेस एक साथ लाती है......।

# मेरी डायरी " निवेदिता का बचपन" के कुछ अंश
सुषमा दुबे

नन्हा सा प्यारा सा बचपन

"एक था बचपन "एक था बचपन ,एक था बचपन ,छोटा सा नन्हा सा बचपन ,बचपन के एक बाबूजी थे , अच्छे सच्चे बाबूजी थे ,दोनों का सुन्दर था जीवन ,एक था बचपन ,आज फिर बचपन की स्मृतियां मेरे मानस पटल पर चलचित्र की तरह दृष्ट्वय हो गई ,जब बाबूजी की गोद में जाने को नींद का झूठा बहाना कर किसी ओर के बिछौने पर सो जाते थे ,और बाबूजी के उठाने पर जब न उठते तो वो गोद में उठाकर मेरे बिस्तर पर ले जाते और मैं ठहाके लगाकर हंसने लगती ,मुझे याद है मुझे पानी से बहुत डर लगता था और तब बाबूजी मुझे पानी की टंकी में डालने का नाटक कर के डराया करते ,तो कभी अपनी पीठ पर बैठाकर ले लो नमक की बोरी ऐसे सारे घर में घुमाते तो कभी पैरों पर बैठाकर कोड़ी के भाई कोड़ी के करके झुलाते थे हम तो बहने ओर मेरे चाचाजी के तीन बच्चे एक सौ प्रेस खेलते मुझे याद है में सबसे छोटी थी तो ये भाई बहनमुझे बुद्दू बनाते ओर कहते चल हम तुझे अच्छी जगह छिपा देते है ओर में उनकी बातो में आ जाती फिर जिस पर दम होता उस जाकर बता देते की में कहा छीप हूं ओर हमेशा मुझ पर ही दाम आ जाता ,मेरी सहेली जो की गुस्से की बहुत तेज थी मुझे रोज घर पर बुलाती क्योंकि उस समय को का चलन नहीं था ओर वो अपने हाथो की उंगलियों से जबरदस्ती मेरे हाथ पर मेहंदी से मोटी मोटी घड़ी बना देती थी जब बारिश होती थी तो इतनी समझ नहीं थी कि पानी कहा से आ रहा है तब खती थी भगवान ने खाना खाकर हाथ धोए है यही पानी गिर रहा है सच कितना सच्चा ओर निश्छल बचपन होता था तभी तो कहते है कि "बच्चे मन के सच्चे "और आज फिर अपने बाबूजी ओर बचपन को याद करके यही दोहराती हूं कि " आया है मुझे फिर याद वो जालिम गुजरा जमाना बचपन का ,ओर कहती हू ,कोई लोटा दे मेरे बीते हुए दिन ,बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन'""'',,,,,,,,,,,,,,,,
साधना श्रीवास्तव

घण्टी मददगार हुई


बात उन दिनों की थी जब मैं आठवीं कक्षा की छात्रा थी।एक दिन अचानक हमारी केमेस्ट्री की शिक्षिका ने सरप्राइज टेस्ट लेने के लिए कुछ प्रश्न पूछे।उनमें से एक सवाल बेहद कठिन था जिसका जवाब मुझे भी याद नही था।पर उन्हें मुझ पर पूरा भरोसा था कि मुझे जवाब मालूम होगा।उन्होंने पूरी कक्षा से एक एक करके सवाल पूछा और सभी खड़े रहते गए।अब बारी मेरी थी।उन्होंने कहा कि तुम जवाब देने से पहले स्टाफ रूम से स्केल ले कर आओ।घबराहट के मारे मैं तुरन्त क्लास से निकल कर स्टाफ रूम तक गयी पर अंदर जाकर स्केल लाने की हिम्मत नही हुई।मैं काफी देर बालकनी के चक्कर लगाती रही ताकि घण्टी बज जाए और पीरियड खत्म हो जाए ।और ऐसा ही हुआ।घण्टी जैसे ही बजी मैं क्लास की ओर दौड़ी और शिक्षिका जी ने कहा ,आज तो सबको माफ कर देती हूँ ,कल फिर टेस्ट होगा  ।मैंने राहत की सांस ली ।आज कभी कभी सोचती हूँ कि अगर मैं उन्हें स्केल ला कर दे देती तो खुद को भी सजा दिलवाती।स्कूल की घण्टी ने मुझे बचा लिया।

अचला गुप्ता
इंदौर

बचपन की यादें पचपन में



5 वर्ष की आयु से ही शैतानियां शुरू हो गई थी,ऐसा माँ कहती है।मिट्टी खेलते खेलते सहेलियों के सिर पर मिट्टी डालना,लोंगो के बागीचे में घुस कर जाम,और गुलाब के फूल तोड़ना,आम के दिनों में आम के पेड़पर चढ़ने की कोशिश कर पत्थर मार कच्ची कैरी तोड़ने की कोशिश में,पड़ोसी के शीशे तोड़ना,होली पर गुलाल लगानेकी होड़ में ,न खेलने वालों की दीवालें,टँकीके पानी को रंग देना शैतानियां,याद करते ही बचपन के उस दौर में पहुंच जाती हूँ।।क्या मस्ती भरे अल्हड़ दिनथे।n, c, c  केम्पस में देर रात को साथी यों की पेटियों से चोटी बांधना,मूंछे रँगना और सुबह में कप्तान की डाँट खाना आज भी याद आता है,
ऐसी ही एक बड़ी बदमाशी8 वर्ष की आयु में की घर के बड़े गेट पर चचेरी बहन मोना के साथ चढ़कर कूदना,हर 2 दिन में चोट आजाना, रोज का ही काम था।गेट से बाहर जानेकी सख्त मनाई थी।सरपट दौड़ती गाड़ियां, बर्फ का गोला,चाट वाला निकलता तो मन अत्यंत बेचेन हो जाता।एक दिन बहन अंदर घर पानी पीने गई उतनी देर में गेट के निचेसे लेटकर सरककर रॉड पर 1 घण्टे तक खेलने पहुंच गई।अत्याधिक गाड़ियोंकी आवाजाइ का मज़ा लेकर आधे पोन घन्टे में ही पुनः सरककर गेट के अंदर आने लगी तभी अचानक सर में गेट से टकराकर चोट लग गई।खून की धारा बहने लगी,मां,दादी की डांट का सोचते ही ,सिहर गई।सोचा माँ को नही बताती ,और ऊपर वाले कमरे में जाकर छुप गई  ज़मीन पर कब नींद आ गई मालूम ही नही पडा।इधर मा ने भी चौके से 1 घण्टे बाद निकलकर देखा,बहन को पूछा,और बहन के अनुसार गेट के बाहर पूरी कॉलोनी में ढूंढ आई।उनकी जान सुख रही थी,आंखों से आंसू,दिल बैठा जा रहा था।आज तो छोरी को कोई पकड़ के ले गया।1से2 घण्टे ढुंढाई हुई।इधर दादी ने भी पूरा घर छान मारा।जोर जोर से दादी की आवाज से मेरी नींद टूटी।दादी मुझे अपनी गोद मे लेकर चुम रही थी ,गालों पर डाँट की प्यार भरी थपकी भी मार रही थी।तेरी बदमाशियों से तो तंग आगये।ये चोट कैसे लगा ली। वैसे ही मेरी तीमारदारी में लग गई।इतने में माँ भी वापिस आगई।मुझे सम्हाला और डाँट लगाते हुए मेरी सिरकी मलहम पट्टी की
आज भी वह सिर का घाव भलेही बालों में छुपा है किंतु मेरे दिमाग के पटल हमेशा मेरी बदमाशियों और चुहलबाजी की याद दिलाता है।कितना प्यारा बचपन ,बिंदास,चुलबुला, आज भी रहे मेरा पचपन।🙏🤣🐵🤸‍♀🚴‍♀🏆
स्वरचित ,,प्रभा जैन,21 -5-2019

जन्मदिन





मानसी ने कमरे की सफाई कर और खिड़की  में रखे गमले में उगे पान की बेल को पानी डालती हुयी मुझ   से पूछा , " दीदी  आज  तो आप उदास लग रही हो और दिन तो आप मेरे हाल - चाल व मेरे  परिवार के बारे में कुशल - मंगल पूछती थी ."

    दुखी हो के  मैंने   उसे कोई जवाब नहीं दिया . यूँही चुपचाप उतरा हुआ मुँह लिए गुमसुम बैठी रही .

 मानसी ने मन  ही मन सोचा शायद आज काम करने देर से आयी हूँ . इसी वजह से खामोश और नाराज लगती है . फिर मानसी ने अपना प्यार भरा हाथ मेरी पीठ  पर थपथपाते  रख उदासी का कारण  पूछने लगी .

 मानसी के  प्यार भरे हाथों से  मैं भाव विह्वल हो गयी . सिसकियाँ ले - ले के रोने लगी . उसे ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे उसकी अपनी माँ हाल - चाल पूछ रही हो .  मेरे  मस्तिष्क  पटल पर  अतीत में मनाए गए जन्मदिनों के चलचित्र एक के बाद एक चलायमान हो के  मैं मानसी को बताने लगी  .

 "  आज मैं बारह वर्ष की हो गयी हूँ . इससे पहले मेरे माता - पिता ने  मेरा जन्मदिन कभी घर पर तो कभी  मेरी सहेलियों के साथ होटल में मनाया था . जन्मदिन पर अपनी मनपसन्द नयी फ्राक पहनकर , सज - धज के , दोस्तों के साथ पार्सल - पार्सल का खेल खेलकर और चाकलेट केक पर  मोमबत्तियां सजा कर केक  को काट कर बड़े प्यार से सबको खिलाती थी और रिटर्न गिफ्ट भी देती थी . मेरे माता - पिता दोनों ही वन विभाग में नौकरी करते हैं , उन्हें  दो साल के लिए ट्रेनिंग के लिए लंदन जाना पडा है . उन्होंने मेरे लिए  न तो  ग्रीटिंग कार्ड भेजा और न ही कोई  उपहार .  न ही मेरी सहलियों ने  और मेरी रूमेट   ने मुझे शुभकामना दी है .   लगता है मेरी सहेलियों की कोई चाल हो . मन में कड़वड़ाहट लिए तनावयुक्त हो कर अपने भावों में बह रही थी . "

 तभी मानसी ने  मेरे को गले लगाकर प्यार कर ढेर सारी शुभकानाएं दे के खूब खुश रहने का और फलो  - फूलो का आशीर्वाद दिया और जन्मदिन का उपहार देने का वादा कर होस्टल के दूसरे कमरों की सफाई करने में जुट गयी . यह अपनत्व भारी  आशीषें  जैसे   मुझ में नयी ऊर्जा , नयी शक्ति भर रही थी और मंगलमाय भविष्य की कामना भी . जो माता - पिता  के यादों का घना अँधेरे को दूर कर रहा था .

रात घिर आयी थी . जम्हाइयाँ ले मैं सो  गयी . मेज पर रखी घड़ी की सुइयां बारह पर आयी तो  रोज की तरह अलार्म बज उठा . जो उसने पढ़ाई करने के लिए लगाया था . तभी दरवाजे की घंटी बजी . अलसायी हुई आँखों से उठी .ी अलार्म बंद करते हुए दरवाजे को खोला तो उसकी आँखें नींद से जाग गयी .  आश्चर्य से  मेरा मुँह खुले का खुला रह गया . खुशी से उन सब सहेलियों को देखने लगी जिनके हाथों में जन्मदिन का केक , बुके , गुलाब के फूल , बहुत सारे  उपहार  और शुभकामनाओं के कार्ड थे . जिस पर लिखा था -

जीओ हजारों साल ,

जन्मदिन  बने  मिसाल ,

हमें  कभी न भुलाना ,

दोस्ती है बेमिसाल .

सभी सहलियाँ मुस्कुराती  हुई गाने लगी -

जन्मदिन मुबारक है ,

आई शुभ घड़ी है .

 तभी  परिवेश में एक मीठा स्वर और सुनाई दिया -

मंजु  के लिए हेप्पीबर्थ डे का पार्सल लन्दन से उसके माँ - पिता ने भेजा है .

हास्टल की वार्डन ने पार्सल मेरे को थमा दिया . साथ में मैंअपनी तरफ से जन्मदिन की पार्टी के साथ चाकलेट आदि दी  .

    यह सब देख के मेरी खुशी से झूम उठी . सहेलियों के प्रति , माँ - पिता , वार्डन के प्रति प्यार उमड़ आया . सब गले मिले. खुशी के आंसू उसके गालों पर लुढ़क गए  तभी मैंने  वार्डन और सहेलियों का आभार व्यक्त किया . तभी जन्म दिन मुबारक  है कि ध्वनि से स्टीरियो पर गीत बज उठा .  मैंने ऐसा महसूस किया कि जश्न में नयी सुबह शामिल हो गयी हो .

 कुछ समय  मैं अपने आप को अकेला , पराया महसूस कर रही थी . आज का शुभ दिन सबने मिलके बेमिसाल जन्मदिन बना दिया . हास्टिल की सीमाएं होती हैं . जहां खुला खर्च भी नहीं कर सकते हैं . अनुशासन होता है और अपनापन - प्यार भी . जो टूटे हुए दिल को जोड़ रहा था . 

 डा मंजु गुप्ता

वाशी , नवी मुम्बई

जिंदगी की सुबह



"
बचपन ,जिन्दगी की सुबह ही है,जो ऊर्जा से भरी ,खुशियों के रंग मे रंगी होती है,फिर दोपहर की तपन,वीतरागी सांझ,और अन्त रात्रि "
"क्या बात है,आज बहुत साहित्यिक हो रही हो सुधा"अमर जी ने कहा।
"हां जी ,मै पुराना अलबम देख रही हूँ ।मै 5th मे थी ।क्लास की लड़कियो के साथ फोटो है,साथ मे मेरी क्लास टीचर जौहरी बहिन जी है।बहुत अनुशासन प्रिय थी।सभी लड़कियाँ डरती थी इनसे"
"अच्छा,तुम भी डरती थी?"
"बहोत,मै सामने की बैंच मे बैठती थी,ठीक उनके सामने।वो चेयर पर बैठती,और अपना एक पैर मेरी बैंच पर टिका देती,हाथ मे स्केल एक फुट का।"
"फिर"
"फिर क्या,अंग्रेजी की टीचर थी।आवाज लगाती "राम बाई खड़ी हो,ए,बी,सी,डी बोलो । वो डरते-डरते शुरु करती"ए,बी,--सी--डी--ई,फ---जी---का सही क्रम लेते हुए आगे--यम,यन-ओ।"इतना सुनते ही बहिन जी का पारा गरम।"इधर आओ ,तुम्हारा यम यन निकाले हम "।
वो स्केल फटकारती।हम सबकी सिट्टी पिट्टी गुम"
"फिर मारा होगा उसे"
"नही,वो उसकी हथेली पकड़ कर खोलती,स्केल ऊपर उठाती,राम बाई की आँखे बंद,हम सब डरे,अब पड़ी की तब पड़ी-----सबकी प्रतिक्रिया देख वो जोर से हँस पड़ी।उसका हाथ सहलाते बोली-तुम ज़हीन हो।बस अन्ग्रेजी के अक्षर( लेटर )सही ढंग से बोलना सीखो,उन्होने हमारी उस सहेली पर विशेष ध्यान दिया।यही नही,सभी बच्चो पर,कभी डांट कर,कभी हँस कर और कभी मार कर ,
अन्ग्रेजी की अधार शिला मजबूत की"
"हाँ सुधा,जिन्दगी की सुबह मे कुछ सूरज ऐसे होते है जो हमारे जीवन मे ताऊम्र रोशनी देते है"

सुनीता मिश्रा
मौलिक

Monday, May 20, 2019

जल्दी का काम

चारुमित्रा नागर
लोग कहते हैं ना जल्दी के काम शैतान का
 मुझे उठावने मे जाना था । सोचा जल्दी टिफिन बना दु । बस फटाफट टमाटर  बीना छोटे टुकड़े किये बगैर ही मिक्सर मे , पिसने लगी ढक्कन ढंग से लगा नही।  और मेरी उगली मिक्सर मे फट से बन्द किया  पर उगली कट राई के बराबर लटक रही थी। मेने  उसे  लगाई  चिल्ला ई  , मेरी बहन  बिन्दु को फोन लगाया  उसके  पहचान के  डॉक्टर हैं उनसे बात की ।  मे उगली पकडे रो रही  ,  खुन बह रहा था । पति भी आगये  भाषण  शुरू क्या जल्दी रहती हैं  ।चलो अब  डॉक्टर  के यहां  आनंद हास्पिटल  पहुंचे  बिन्दु आ गई थी  ।  डॉक्टर ने देखा कहा  हड्डी  टुट गई  आपरेशन करके राड लगाना पडे गी।। दो का  आपरेशन  राड  और  एक महिने का पट्टा काम काज बन्द  आज भी उगली पतली और ढेडी हैं

बचपन की शैतानी

अनीला जगत
मैं  पांच साल की रही होऊंगी, दादी के  यहाँ  सभी लोग गर्मी  की  छुट्टियों  में  इकट्ठा  हुए।8- 10 बच्चे  एक  ही उम्र  के  रहे होंगे । लडकों  का  ग्रुप  अलग बाहर शैतानियाॅ करता लडकियों  का घर में  ही गुड्डा गुडिया  की शादी और इसी प्रकार  के  घरेलू खेल होते। कहीं  से एक ब्लेड  मिल गया  ।उन दिनों  शेव सभी ब्लेड  से ही करते थे ।बस नई उपलब्धि  पर ज्ञानार्जन  होन लगा।किसी ने कहा बेकार  है तो दूसरे ने तुरंत  होशियारी  झाड़ नहीं  तेज है ।वाद विवाद  शुरू होगया ।अब कैसे  प्रमाणित  हो ?मैं  सबने कहा कहीं  जाॅच कर देखते हैं  ।ठीक है मैं  सबसे छोटी थी अधिक  सहयोग  नहनही कर पाती थी ।अतः सबने कहा इसकी छोटी उंगली पर चला कर देखते  हैं ।मैंने  भी साथ खेलने की चाहत  में  ऊँगली  आगे कर दी ।बडी दीदी  ने चलाया बहुत तेज था छुपाते ही खून का फव्वारे  को देख सब गायब
।मैमै मै भी हतप्रभ  थी क्षणिक किम्कर्त्तव्य विमूढ अपनी उंगली देख रही थी ।तभी बडी बुआ ने वहां  से जाते समय देखा और चिल्लाने  लगी देखो क्या किया इसने कितना खून निकल रहा है।मैं  भी घबरा कर रोने लगी ।पूरे घर में  उठा पटक मच गई ।सभी समझ रहे हैं  कि मैंने  ही काट ली है डाॅट रहे हैं  मै और जोर से रो रही हूँ  लेकिन कौन सुने साथ ही बडी बहिन  मनाकर रही हैं  कि बताना मत नहीं  तो खिलायेगे  नही।बस यही अच्छा  रहा कि उंगली अलग नहीं  हुई। आज भी निशान है

Sunday, May 19, 2019

महात्मा बुद्ध जयंती पर कार्यक्रम


महात्मा बुद्ध जयंती के अवसर पर कार्यक्रम

 महात्मा बुद्ध जयंती के अवसर पर अभिव्यक्ति कॉरपोरेशन भोपाल द्वारा बाग मुगलिया क्षेत्र में बौद्ध अनुयायियों के बीच बुद्धपूर्णिमा समारोह का आयोजन किया गयाI
कार्यक्रम में महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया और समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने का संदेश दिया गयाI इस अवसर पर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में रथ द्वारा महात्मा बौद्ध के सिद्धांतों को प्रचारित किया गयाI अनुयायियों में पोस्टर वितरण तथा समता बंधुता और न्याय पर आधारित सीधी *मुक्तिदाता के पथ पर* की रिकॉर्ड बिक्री भी की गई इस अवसर पर कार्यक्रम में बौद्ध धर्म के उपदेशक को सुनने बड़ी संख्या में बौद्ध बंधुओं ने उत्साह से भाग लिया


फुलपात्र

एक सामयिक चर्चा..........महाराष्ट्र में पानी पीने के लिए एक बर्तन का उपयोग किया जाता है, उसे मराठी में "फुलपात्र" कहते हैं... साईज़ में यह सामान्य कटोरी से थोड़ा ऊँचा, लेकिन गिलास से आधा होता है. मराठियों के घरों में पानी पीने के लिए उपयोग होते इसे सामान्य रूप से देखा जा सकता है.

फिलहाल इंदौर शहर में "पानी बचाओ मुहिम" के अंतर्गत "आधा ग्लास पानी अभियान" चल रहा है, जो एक सराहनीय कदम है. यह आधा ग्लास पानी की प्रथा महाराष्ट्रीयन परिवारों में कई वर्षों से निभाई जा रही है, चित्र में दिखाए गए "फुलपात्र" में ही अतिथि और घर के सदस्यों को पानी दिया जाता है.

मूलतः महाराष्ट्रीयन परिवार मितव्ययी और किसी भी कार्य को योजनाबद्ध करने में विश्वास रखते हैं, हालाँकि "कंजूस" और "कढियल" कहकर इन्हें गैर-मराठी भाषियों के ताने उलाहने, और खिल्ली सहनी पड़ती है. परन्तु अनादिकाल से ही महाराष्ट्रीयन परिवार प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी रहे चाहे वह स्त्रियों की शिक्षा हो, विधवा विवाह हो, दहेज नहीं लिया-दिया जाना हो, अन्धविश्वास निर्मूलन हो, स्वतंत्रता आंदोलन हो, शस्त्र संचालन हो, प्रशासनिक व्यवस्था हो... मराठी ब्राह्मण घर से लेकर कार्यक्षेत्रों तक सभी क्षेत्रों में अग्रणी रहे है. विवाह समारोह में विद्युत की बचत तथा अतिथियों को दिन का सुस्वादु भोजन परोसने के इरादे से मराठी परिवारों में विवाह भी दिन के समय होते हैं... (हालाँकि अब विद्रूपता और कुप्रथाओं की घुसपैठ के कारण रात के रिसेप्शन आम हो चले हैं).

एक और उत्कृष्ठ उदाहरण है "मुम्बई चा डबेवाला" है, जो निम्न शैक्षणिक योग्यता के उपरांत भी आज MBA के छात्रो के लिये मैनेजमेन्ट का पाठ पढ़ाते है. मूल उद्देश्य यही है कि सीमित संसाधनों से भी महाराष्ट्रीयन उसे पूर्ण करते हैं... आधुनिकता के साथ संस्कारो का संरक्षण भी मराठी परिवारों में आज भी दिखाई देता है... जलसंकट पूरे भारत में पसरता जा रहा है, आप भी अतिथि को आधा गिलास पानी परोसें, फिर लगे तो फिर परोसें... फिर लगे तो फिर से... लेकिन हर बार "फुलपात्र" जितना ही दें, अपव्यय नहीं होगा.

"आधा ग्लास पानी" उन लोगो के लिये एक संदेश है जो महाराष्ट्रीयन परिवारों की मितव्ययिता को हेय और दोयम दर्जे की दृष्टि से देखते हैं... मराठियों की खिल्ली उड़ाने वालों के लिए एक सन्देश है कि, "घमण्ड" चाहे रूप का हो, या धन का, अच्छी बात नहीं है....
🌹🙏🙏🌹

तोरा मन दर्पण कहलाये



*एक व्यक्ति ने अपने गुरु से पूछा - मेरे कर्मचारी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और सभी लोग मतलबी है । कोई भी सही नहीं है क्या करूं ?*

*गुरु थोडा मुस्कुराये और उसे एक कहानी सुनाई।*

*एक गाँव में एक विशेष कमरा था जिसमे १००० शीशे लगे थे । एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी । उसने देखा १००० बच्चे उसके साथ खेल रहे है और वो उन प्रतिबिम्ब बच्चो के साथ खुश रहने लगी । जैसे ही वो अपने हाथ से ताली बजाती सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाते । उसने सोचा यह दुनिया की सबसे अच्छी जगह है और यहां बार बार आना चाहेगी ।*

*थोड़ी देर बाद इसी जगह पर एक उदास आदमी कहीं से आया । उसने अपने चारो तरफ हजारों दु:ख से भरे चेहरे देखे । वह बहुत दु:खी हुआ । उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाकर हटाना चाहा तो उसने देखा हजारों हाथ उसे धक्का मार रहे है ।उसने कहा यह दुनिया की सबसे खराब जगह है वह यहां दोबारा कभी नहीं आएगा और उसने वो जगह छोड़ दी ।*

*इसी तरह यह दुनिया एक कमरा है जिसमें हजारों शीशे लगे है । जो कुछ भी हमारे अंदर भरा होता है वो ही प्रकृति हमें लौटा देती है ।*

*अपने मन और दिल को साफ़ रखें तब यह दुनिया आपके लिए स्वर्ग समान तरह ही है ।*



जय जिनेन्द्र

अटलबिहारी वाजपेयी जी और चुनाव


उन दिनों चुनाव प्रचार बहुत धूमधाम से नहीं होता था। कोई तामझाम नहीं।न शोर शराबा न बड़ी बड़ी रैलियां।
सबसे बड़ी बात बोलने में कटुता नहीं।
पूज्यवर अटल बिहारी जी बाजपेई उस समय जनसंघ के बहुत महत्वपूर्ण और बहुत योग्य व्यक्तित्व के नेता थे।
उनका ह्रदय बहुत विशाल और सरल व्यवहार था। मुझे अपने पूज्य पिताजी के साथ उनके सानिध्य का कई बार अवसर मिला। बहुत सौभाग्य रहा मेरा की जब भी चुनाव प्रचार या राजनीतिक कार्यक्रम में पूज्यवर पधारते तो भोजन का कार्यक्रम हमारे यहां रहता। बहुत छोटी उम्र थी मेरी जब अपने हाथों से बनी रोटी पहली बार उनको परोसी। मुझे याद है उन्होंने कहा था की बिटिया अगर मेरे घर जन्म लेती तुम तो तुम्हारा नाम अन्नपूर्णा रखता।इस बात पर सभी बहुत हंसे।मेरे पिताजी ने बहुत सम्मान पूर्वक कहा कि अटलजी यह आपकी भी बेटी है। ऐसे कई अवसर आये,जब भी पूज्यवर मिलते बहुत आशीर्वाद देते। हमेशा नीचे बैठकर भोजन करना और अपनी थाली या पत्तल स्वयं उठाना। बहुत सादगी थी।
उनका कहना होता की बेटी को  पढ़ाना,खूब प्यार से रखना चाहिए। बेटियां बड़ी कोमल होती है और न जाने कब ये बेटियां जिंदगी में कितने सपने छोड़ देती हैं केवल समाज और दिखावें के लिए।
सचमुच वह पहले का माहौल और वर्तमान में बहुत अंतर है।
पहले के चुनाव प्रचार पैदल, साईकिल से होते थे और फिर भी सरलता से सभी कार्यक्रम होते थे।सभी छोटे बड़े नेता और जनता का आमना-सामना होता था, लेकिन इतने बातों के तीर नहीं चलते थे।
सचमुच पूज्यवर अटल बिहारी बाजपेई जी बहुत ही सरल और सहृदय इंसान थे। इतने विद्वान और निश्छल ह्रदय के आशीर्वाद एक नहीं कई बार मिले।
उनकी एक कविता

आओ मन की गांठे खोलें
यमुना तट, टीले रेतीले,
घास-फूस का घर हांडे पर
गोबर सी लीपे आंगन में
तुलसी का बिरवा, घंटी स्वर
मां के मुंह से रामायण के
दोहे-चौपाई रस घोले
आओ मन की गांठे खोलें।
बाबा की बैठक में बिछी चटाई
बाहर रखे खड़ाऊं
मिलने वाले के मन में असमंजस
जाऊं या ना जाऊं
माथे तिलक नाक पर ऐनक
पोथी खुली स्वयं से बोलें
आओ मन की गांठे खोलें।
सरस्वती की देख साधना
लक्ष्मी ने संबंध न जोड़ा
मिट्टी ने माथे का चंदन
बनने का संकल्प न छोड़ा
नए वर्ष की अगवानी में
टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें
आओ मन की गांठे खोलें।
उनकी एक से बढ़कर एक रचना।
कितने संदेश अनछुपे।

हार नहीं मानूंगा,रार नहीं ठानूंगा।
यहीं बात,यही संदेश यहीं विचार मनन करते हुए। पूज्यवर अटल बिहारी जी बाजपेई को सादर नमन🙏🙏
प्रस्तुति
माया मालवेन्द्र बदेका

वोटिंग

आज हम लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण का वोट डालने जा रहे हैं, अब तक जीवन में जितनी भी बार वोट देने का अवसर आया है, तब वोट देते समय मन में देश के प्रति जिम्मेदारी या कर्तव्य का ही भाव रहा है, या किसी सरकार के प्रति आक्रोश का भाव रहा है, जिसे हटाने के लिए वोट किया ।

यह जीवन में पहला अवसर है जब वोट देते समय मन में धन्यवाद और कृतज्ञता का भाव है। इस बार वोट के रूप में ही धन्यवाद प्रेषित करने की कामना है ।

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने एहसास कराया कि इस देश में हिंदू भी रहता है...

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने दुनिया में भारतीय होने के गर्व का एहसास कराया ..

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए गंगा आरती के गौरव को बढ़ाया....

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिनके फोटो हमने इफ्तार पार्टी करते हुए नहीं देखें बल्कि गंगा आरती और मंदिरों में पूजन अर्चन करते हुए देखें....

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने दुनिया के देशों में भारत के योग का मान बढ़ाया....

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने विदेशियों को तोहफे में ताजमहल की प्रतिकृति के स्थान पर गीता की प्रतियां भेंट की....

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने भारत के पायलट अभिनंदन को पाकिस्तान से स्वस्थ सकुशल वापस लाने का साहसिक कार्य किया....

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने पाकिस्तान के भीतर घुसकर भारत के दुश्मन आतंकवादियों के चिथड़े उड़ा दिए....

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए अपने निजी और पारिवारिक स्वार्थों का कभी विचार नहीं किया....

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने एक दिन की भी छुट्टी लिए बिना अविरत देश के स्वाभिमान, सम्मान और विकास के लिए काम किया...

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने स्वच्छता जैसे काम को संभव कर दिखाया...

धन्यवाद उस व्यक्ति का जिन्होंने सरदार पटेल को उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ऊंचाई प्रदान की....

ऐसे और भी अनेक विषय हैं जिनके कारण मन में अत्यंत कृतज्ञता और धन्यवाद के भाव इस चुनाव में वोट डालते समय मेरे मन में है....

मोदी जी, मैं ह्रदय से आपका आभारी हूं, मैं ह्रदय से आपको धन्यवाद देता हूं, आपने इस देश के सजग, जागृत, संवेदनशील हिंदुओं के मन की आशाओं को टूटने से बचाया है...

आप इस देश के हिंदुओं के लिए आशा और विश्वास की किरण हैं...

आपने उस विश्वास की डोर को पिछले 5 वर्षों में मजबूत किया है...

अगले 5 वर्ष भी यही विश्वास है कि आप भारत देश और हिंदू धर्म का पूरी दुनिया में और अधिक गौरव स्थापित करेंगे, इसलिए मेरा वोट ही आपको धन्यवाद स्वरूप मैं देने जा रहा हूं, मेरे इस कृतज्ञता और धन्यवाद स्वरूप वोट को, जो भले ही छोटी गिलहरी के प्रयास जैसा हो आप स्वीकार करें और राम काज में इसी तरह आगे बढ़ते रहें, ईश्वर आपको स्वस्थ रखे और दीर्घायु प्रदान करें...

🙏🏼🙏🏼

मिट्टी की दीवारें




मिट्टी की दीवारें , टूटी छ्त ये कहती है ।
हम हुए पुराने , बच्चों दुनियाँ अब तुम्हारी है ।।

अंबर को छुते घर हों ।
पर गूंज हँसी की बिखेरे रखना ।।

जगमग हो रोशनी से घर सारा ।
पर सुर्य की किरणों के लिये खिड़की रखना ।।

कभी चांदनी रात में  ।
याद बिते पलों की करते रहना ।

जब याद आए वो अपने ।
तो चाँद में उन्हें देखते रहना ।।

रखना याद , बचपन अपना ।
बच्चों को भी ख़ुशियां देते रहना ।।

भीगने देना बारिश में ।
एक नाव कगज़ की बना कर देना ।।

ग़र हो मिलना पड़ोसियों से कभी ।
तो रिश्तों की डोर बांधे रखना ।।

जब मिले फुर्सत कभी ।
तो पिटारा यादों का खोलते रहना ।।

यादों की इस मिठी हलचल से ।
परिवार को संस्कारों में बांधे रखना ।।

उम्र के हर दौर को ,खुशियों से भरते रहना ।
छु लेना अंबर को , पर जड़ों को अपनी मत भूलना ।।

मिट्टी की दीवारें , टूटी छ्त ये कहती है ।
हम हुए पुराने , बच्चों दुनियाँ अब तुम्हारी है ।।

                         "  मीनू मांणक  "

में और मतदान


मेरी शादी १८ वर्ष की उम्र में ही हो गई थी । मैने अपना पहला वोट
इंदौर ससुराल में ही डाला।
तब वोट पत्र में फोटो नहीं दिखाये जाते थे। जिस दिन वोटिंग थी ,
मैं मेरी दादी सासुजी के साथ
वोट डालने गई । तब थोड़ा सा घूँघट भी होता था।
जंहा वोट डालना थावंहा हमारे परिवार से सारे ही परिचित थे।
जब मेरा नंबर आया तब हमारेही परिचित व संबंधी जिन्होंने न मुझे देखा था न मैने उन्हें , ये कह कर रुकवा दिया कि ये अपनी जिठानी के नाम पर वोट डाल रही है ।मेरी जिठानी पीहर जयपुर गई थीं।मेरी दादी सासुजी दबंग औरत थीं वो सबसे उचित तर्क
व लड़ झगड़ कर मुझे बिना वोट डाले लेकर आगईं।
यद्यपि सब बाद में माफ़ी माँगने वबहुत मनुहार के साथ लेने पुन: पुन: आये पर नउनहोने भेजा न मैं गई क्योंकि बात अहम की थी।
पर फिर मेरे ससुर जी ने सच्चाई साबित करने व मौका हाथ से न जाने देने का निर्णय लिया व अंतिम समय होते होते वोट डलवाया ।पोलिटिकली दुश्मनी निकालने को उस कथित शख़्स ने चालबाज़ी करी ,
जबकि मैं स्वयं के नाम पर गई थी। मेरे पति नागपुर में पढ़ते थे उस समय।
परंतु कुछ वर्ष बाद जब मैं उस शख़्स को जानने लगी तो मुझे अनायास उस व्यक्ति से नफ़रत हो गई व चाहकर भी मैं उसे माफ़ नहीं कर पाई क्योंकि सुसराल की किसी ख़ास मौक़े पर जो पाँच साल में एक बार आता है ,उसने मेरा अपमान कियाथा।झूठा बताकर....
—————-**__________
लेखिका:- कुसुम सोगानी

ताई ओर यादे


ये किस्सा है सन,19 81 ,82 का।तब पहली बार मुझे एक राजनेता से मिलने का सु अवसर प्राप्त हुआ था।ताई तो जब सेवाभावी करता के रूप में ही रही होंगी,और आज लोकसभा सांसद की अध्यक्ष।बहुत फक्र होता है आज ,की कैसे ताई सहज ही मुझसे मिलने आ गई थी ,मेरे निवास स्थान न्यू पलासिया पर।उस वर्ष मैने भी लायनेस क्लब इंदौर वेस्ट का कार्य भार सम्हाल रखा था।जोकि एक सेवा भावी संस्था है।स्व, इंदिराजी गांधी के असामयिक अवसान के बाद हमारे इंदौर शहर में बड़े दंगे हुए थे।बहुत खराब माहौल हो गया था।सिक्खों के घर जला दिए गए थे।बहुत से परिवार बेघर हो गए थे।l,I,g,,,,m,I,g, colony के घर अग्नि को स्वाहा हुए थे।तब ताई मेरे घर पर आई और मुझसे गुजारिश की ,तुम चलो,देखो,उन परिवारों का सब कुछ खत्म हो गया है।हमे उनकी मदद करना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि हमे उन परिवार की महिलाओ को सिलाई मशीने देना चाहते हैं ताकि वो अपने परिवारों को खुशहाल बना सके।मैं ताई के साथ उन आग में स्वाहा घरों को देखने गई।आज भी वो सीन पूरा मेरी आँखों मे चल चित्र के सामने घूम जाता है,और रोंगटे खड़े हो जाते हैं,।हमने तुरन्त ही निर्णय लिया और 4,5 सिलाई मशीन सदस्यों ने मिलकर दी।मुझे बहुत ही सन्तुष्टि रहती है कि सच मे मैंने ज़िन्दगी में कुछ नेक कार्य कर पाई।उसके बाद से तो एक सिलसिला चला, प्रतिवर्ष किसी  न किसी जरूरतमंद महिला को  व्यक्तिगत रूप से सिलाई मशीन देने का मिशन बन गया।
स्वच्छता अभियान में भी ताई के साथ जुड़ने का मौका मिला।30 भिन्न 2 कॉलोनी में जाकर सफाई की आवाज़ भी उठाई।ताई ने भी मंच से व्यक्तिगत रूपसे,तथा लायनेस सेवाभावी संस्था का नाम लेकर सम्मानित किया।बस ऐसे ही यह छोटीसी ज़िन्दगी में मौके मिले ,और कार्य होता गया।
वैसे समाचार पत्रों में राज नेताओ की कार्य प्रणाली देखकर ,उनके अच्छे बुरे कार्यो पर विश्वास नही होता।मन नही होता कि राजनेताओं के लफडों में पड़ना चाहिए।किन्तु एक सही नेता चुनने का अधिकार जब दिया है तो स्वयम के मन की आवाज़ सुनकर,सिर्फ देश की सेवा को ही सर्वोपरि मानने वाले राज नेता को गद्दी के कर्तव्यभार सौंपना चाहिए।
अंत मे आपतो पढ़े लिखे हैं, अवश्य मतदान का उपयोग करेंगे,पर अन्यो को भी इस नेक कार्य करने की सद्बुद्धि दें।
जय हिंद।जय भारत
🙏प्रभा जैन,इंदौर।🙏
क्टिविधि की फ़ोटो भी सलंग्न है

नेता जी का परिचय

घटना उस समय की है जब मैं दसवीं कक्षा की छात्रा थी।स्कूल के वार्षिक उत्सव के लिए सचिव चुनी गई थी।हमारे मुख्य अतिथि तत्कालीन शिक्षा मंत्री माननीय बलिराम जी हिरे थे जिनका सम्मान मुझे करना था और स्वागत भाषण के साथ स्कूल की गतिविधियों से उन्हें अवगत कराना था।मैंने दिन रात मेहनत की ।भाषण की तैयारी और जिम्मेदारी के अहसास ने मुझे और अधिक मेहनती बना दिया था।
हमारे कार्यक्रम में मंत्री महोदय पधारे ।मैंने पुष्प गुच्छ से उनका स्वागत किया और जैसे ही भाषण शुरू किया उन्होंने इशारे से रोक दिया।समय उनके पास कम था ,उन्हें और भी कहीं जाना था और मेरी सारी तैयारी धरी रह गयी।उदास मन और भरे गले से मैंने धन्यवाद कहा और स्टेज से नीचे उतर आई।
आज भी वह घटना जब याद आती है तो किशोरावस्था की मासूमियत पर बरबस हंसी आ जाती है।
अचला गुप्ता
इंदौर

Sunday, May 12, 2019

माँ

शोभा दुबे
मातृ दिवस
लघुकथा

लघुकथा केले,तीर्थ यात्रा


कृष्णा श्रीवास्तव
रुपल ने मधुकर को आवाज लगाते हुए कहा अ टूर तीर्थ जी सुनते हो जरा फल की दुकान से बीस रूपय के केले लै लेना थोड़े जादा पके हुए हौ तो भी चलेगा मधुकर ने कहा अच्छा
मधुकर ने केले खरीद कर रुपल को दे दिये
घर पहुचने पर कुछ समय पश्चात मधुकर ने रुपल से कहा केल कहाँ रख दिये वडी भूख लगी है
रुपल वह केले तो मैंने गाय को खिला दिये वे चारी वडी भूखी लग रही थी मधुकर ने गुस्से से रुपल को देखा
अगले ही दिन मधुकर को पता चला कि कमपनी ने मधुकर का पँमोशन हो गया है और कमपनी ने उसका बैतन बढा कर एक लाख बीस हजार रुपये कर दिया है
मधुकर ने जब यह बात रुपल को बताई तो रुपल आत्मग्लानि से भर गया

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लघुकथा
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तीर्थ यात्रा
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रमेश ने मां को आवाज लगाई मां मैं ने तुम्हारी तीर्थ यात्रा का सारा इतंजाम कर दिया है
आट़ो वाले को भी समझा दिया है वह तुम्हे ट्रेन में बिठा देगा मैं तुम्हारी बहू को छोडऩे उसके मायके जा रहा हूं पडोस मे खेल रही शुभी ने देखा वह भागती हुई आई और चारू से बोली दादीमाँ कहीं जा रही हो किया चारू ने बताया हां विटिया तीर्थ यात्रा पर जा रही हूं तभी शुभी भागती हुई घर के अनदर गई और दहीचीनी दादी को खिलाती हुई बोली दादी किसी अच्छे काम के लिए जाने से पहले दही चीनी खा कर जाना चाहिए यह सुनकर दादी की आखौ मैं आसूं और ओढो पर ढेर सारे आशीर्वाद थे ।
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कृष्णा श्रीवास्तव
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मा



नज़रें तकती है तुम्हें कभी द्वार पर
कभी देखूं तेरी राह मैं बाहर तक
तुम लौट आती हो जब मेरे पास
कस्तूरी बिखरती जैसे आसपास
कितना संघर्ष करती हो तुम माँ
मेरे एक निवाले के लिए भटकती हो
ठोकरों को जैसे तुम पटकती हो
मेरे उज्जवल भविष्य के लिए माँ
तुम रोज कितनी तकलीफ सहती हो
गुलाब सा बन मेरे जीवन में महकती हो
अपने लिए तुमने क्यों जीना छोड़ दिया
देखो मुसीबतों का रूख़ तुमने मोड़ दिया
अपने वजूद से तुमने मुझे पल पल सींचा
कभी अपनी देह से कभी रक्त से सींचा
कोख से लेकर अब तक पाला है मुझको
ऐसे ही हर पल तेरा सहारा मिले मुझको
अभी तो 8 वर्ष की नन्ही सी परी हूँ मैं माँ
हो जाने दो मुझे थोड़ा और अभी बड़ी,माँ
देखना तुम ,मिटा दूँगी मैं तुम्हारे दुख को
बिछा दूँगी कदमों में तेरे मैं हर सुख को
कभी कमी नही होने दूँगी मैं तुम्हें बेटे की
मैं हर फ़र्ज़ निभाऊंगी बेटे और बेटीे का
जिस विश्वास से तुमने मुझको जन्म दिया
कभी नही तोड़ूंगी मैं,मैंने खुद से ये वादा किया
कर्ज़ नही चुका पाऊंगी मैं कभी तुम्हारी ममता का
ये प्यार ,संस्कार,स्नेह और ये दुलार माँ का
लेकिन कुछ अंश ही सही लौटाऊंगी मैं पूरा
देखना मेरे वजूद में दिखेगा तुझे हर पल
तेरी परछाईं, तेरा अक्स मुझमें है समाया
माँ मैंने कभी ईश्वर को नही है देखा
पर तुझसे जुदा कहाँ उनका भी वजूद होगा
वो करते है जरूरत पूरी , इस दुनिया की
और तेरी तो पूरी दुनिया ही मैं हूँ -है न माँ
हर जन्म में मिले माँ मुझे तेरा ही साया

© मौलिक रचना सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रणिता राकेश सेठिया *परी*

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माँ



माँ '
बचपन  में  तूने प्यार से  गूँथी , मेरी  दो  चोटियां ।
आ आज तेरे सफेद बालो को, में संवार दू  माँ ............

बचपन में खिलाई   तूने मुझे, तेरे हाथो से रोटियां।
आ तुझे  दो कौर   आज,  में ख़िला दू माँ ...........

बचपन में थपकी दे मुझे, तूने  सुनाई लोरियां ।
आ आज मधुर सा भजन तुझे,  सुना  दू  माँ ....................

बचपन में अंगुली थाम बोली, चल पैय्या पैय्या ।
आ आज तू टिक कर बैठ, में  तुझे सहारा दू माँ ....................

बचपन में तूने  मेरे लिए, फैलाई मन्नत की झोलियां।
आ आज तेरी छत्र छाया की, मांग लू में भी एक दुआ माँ.....................

बेटे ही नही  माँ पिता के  रक्षक ,फर्ज पूरे कर सकती है बेटियां।
बेटे ही नही बेटिया भी, नौ महीने उसी कोख में रहती है माँ

बेटे से मुक्ति,गति होती, यह सब है किवदन्तियां।
बेटी हूँ तो क्या हुआ, में भी तेरे वंश अंश का वजूद हूँ'माँ'-----
-----///----//
🌹 मां🌹

मां
तेरी
महक
पसरी है
जीवन दात्री
जीवन दायिनी
कोख का तेरा कर्ज
कब चुका सका कोई
तू जागी  रात मे, में सोई
घना अंधकार  जीवन मे
 सदा प्रकाश पुंज बन आई
गोदी तेरी अद्भुत  देव समाई
विलग नही होती बेटियां कभी मां
अंतर्मन छबी बसी जननी की
नदी की कलकल ध्वनि माता
झरनों का मधुर संगीत
मन के सुमधुर गीत
ईश्वर का उपहार
सृष्टि का है आधार
जननी नमन
करूं वंदन
चरणों में
प्रणाम
तुझे
मां।

🙏💐माया मालवेन्द्र बदेका
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
१२__५__२०१९

सत्यम शिवम सुंदरम सी मेरी माँ


मेरी माँ  सत्यम् में कन्या , शिवम् में माँ  और माँ के रूप में सुंदरम् में विराजमान है . अगर विश्व की कोई अद्वितीय सकती है तो वह मेरी माँ . उसके आगे जग के अन्य रिश्ते  तौले तो माँ का  पलड़ा भारी  रहेगा  . मेरी माँ मेरी प्रारंभिक पाठशाला है जो शिक्षिका बन देश भक्ति , सद्संस्कारों , वेद- पुराण और नैतिक मूल्यों की रामायण - महाभारत   सी शिक्षा  दे मेरे भविष्य का  निर्माण करती है .  आज उन्हीं के योगदान से मैं फिजियोथेरेपिस्ट हूँ .
 माँ के प्यार की बात ही अलग है .  जब मैं मुसीबत में होती हूँ तब माँ शब्द ही निकलता है . बीमारी में नर्स बन वह मेरी  देखभाल - सेवा में रात - दिन एक
कर देती है . जीवन की समस्याओं को सुलझा देती है . मैं अपनी माँ के अतुलनीय योगदान की ऋणी हूँ . मेरे लिए  हर दिन  ' मातृ दिवस '  है . माँ से बड़ी दुनिया की कोई दौलत नहीं है .
मंजु गुप्ता

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Sent from Fast notepad

सुभद्राकुमारी चौहान के काव्य में माँ


यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली॥

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता॥

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता॥

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता॥

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे॥

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता॥

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं॥

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे॥
🙏🙏🙏💐💐💐
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता

माँ मेरी।माँ

माँ स्त्रीलिंग नहीं पुल्लिंग भी होती है
क्योंकि देखा है मैने पिता को मां
बनते हुये
जन्म देकर बहन नवजात
व तीन बरस की थी ,मैं..
ईश्वर को प्यारी हो गई जननि
माँ बोलना कभी आया नहीं रहापिता का साया ही
मां की कल्पना भी न की
देखा है पिता को माँ बनते
बच्चों को पालते पोसते
सारी शि़क्षायें माँ बनकर दी
जो बताना नामुमकिन था
वो क़रीबी महिला रिश्तों से दिलवाई
जो चोट हमें लगती वो दर्द उन्हें हुआ
लोरी गाकर सुलाने का उपक्रम भी किया
दिन में धनोपार्जन तो
शाम घर पर बच्चों पर ध्यानाकर्ष भी किया
हमारे लिये जिये हमारे लिये रहे
पुनर्विवाह  भी नहीं किया
नारी की हर कला में पारंगत किया
पुरुषोचित कार्यों का परिचय भी दिया 
एेसे थे मेरे पिता
माँ का फ़र्ज़ अदा किया
तो बताओ कैसे न कंहूं कि पिता
माँ भी बन जाता है कभी कभी
माँ की याद नहीं आई कभी ...

पुल्लिंग माताओं कोभी मेरा नमन🙏🙏
कुसुम सोगानी

माँ शक्ति

माँ के लिए क्या लिखुं
उसकी ही तो लिखावट हुँ मै।
माँ से जन्मी
माँ के अंश की
एक बनावट हुँ मै।
माँ के सिखाए बोलो से ही
तो बनी एक कहावत हुँ मै।

माँ के लिए क्या कहुँ
उसकी ही शक्ति से बनी
उसकी  हिम्मत हुँ मै।
माँ के जीवन मे घटित
हर घटना में उसकी
सहायक हुँ मै।
माँ के हर कर्म की
उत्तराधिकारी हुँ मै।
अंधेरे मे साथ चलती
माँ की परछाई हुँ मै।

माँ के लिए क्या कहुँ
माँ की ही तो
एक सजावट हुँ मै।
माँ के आँगन मे थिरकते
हर कदम की आहट हुँ मै।
माँ के मन मंदिर मे बसी
प्रेम की मूरत हुँ मै।
माँ के मुख से निकले
हर शब्द की आहट हुँ मै।

माँ के लिए क्या कहुँ
माँ शब्द से उसकी
पहली पहचान हुँ
मनोरमा जोशी

माँ

बचपन मे जिन आँखों मे
मां का चेहरा बसता था,
हंसी ,ठिठोली से घर का
कोना कोना हँसता था।
वृद्धाश्रम की चौखट पर
बैठी है बूढ़ी मां गुमसुम ।
तलाश रही है उस चेहरे को ,बेटे
कब आओगे तुम।
उंगली पकड़ लो ,मुझे ले चलो
मेरे ही अपने घर मे ,
पड़ी रहूंगी एक कोने में ,
एक वस्त्र ,एक चादर में ।

अचला गुप्ता
स्वरचित

माँ की महिमा


 माँ तू है जगत जननी
तुझे शत शत नमन है,
तेरे  स्नेह से गुलजार
सारा चमन है
मेरी श्रद्धा के सुमन तुझे अर्पन है।
माँ तू प्रेम, दया और ममता की मूरत है,
तेरा ह्रदय है विशाल मोहिनी तेरी सूरत है,
माँ तू जगत जननी
  तुझे शत शत नमन है।
माँ वो तुम ही तो थी, जो मेरे लिए
 जागी थी सारी रैन,
गीले बिछौनो पर सोई,मीठी लोरी सुनाई
मेरे लिए भूली थी अपना
सारा सुख चैन।
माँ आज मैं बड़ी और सयानी हो चली हूँ लेकिन जब भी तुमहें पाती हुँ अपने सामने,
मैं एक भोली सी नादान मासूम  बाला बन जाती हुँ।
माँ सदा तुम ही तो मेरे जीवन पथ की
डगर पर मेरी पथ प्रदर्शक ,मेरी सखी और मागदर्शक बनी हो,
चाहें कठिनाईया कितनी भी आजाये,
कभी ना घबराना ऐसी सीख दे चली हो।
 माँ तू जगत जननी तूझे शत शत नमन है़।
  स्वरचित --              वंदना अर्गल।

यादों का पिटारा



आज मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।

उसमें है हमारे सुख-दुख की यादों बसेरा।
उसमें हैं मां का हंसता हुआ ममतामयी चेहरा।
उसमें है जीवन के अनमोल पलों का खजाना।
उसमें ना कोई कुंजी है ना कोई ताला।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।


सुकोमव, श्वेतवर्णी मां के नयनों में स्नेह की बहार।
मुख पर चन्द्रकिरणों सी स्निग्धता
और माथे के कुंकुम का दैवीय सौन्दर्य श्रंगार।
मृदु समीर के झोंके सी उनकी वाणी।
सुख और संतोष से रचा मर्मस्पर्शी संसार।
 हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।

वो मां के आंचल से मसाले की महक।
वो मां की सौंधी रोटी को खाने की ललक।
वो मां के खट्टे-मीठ्ठे अचार का स्वाद।
वो मां के खाने में बरसता आग्रह का प्यार।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।


वो मां का सबको खिला के भूखा रह जाना।
वो मां का दो ही साड़ी में जीवन बिताना।
वो मां का अपने ही आंसू खुद से छीपा लेना।
वो मां का अपनी हंसी से घर की हर कमी को ढांक देना।
हां मैने खोला है मां की यादों का पिटारा।


मां से ही सीखा है अपनों के लिये जीना।
कड़कती धूप में शीतल छांव बनकर रहना।
संतोष और धैर्य से जीवन की राह अपनानान।
मां की सीख में ही ईश्वरीय वरदान पाना।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।

उसमें है हमारे सुख दुख का बसेरा।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।

 सुषमा व्यास ‘राजनिधि’
कहानीकार, कवियित्री
3043/E सुदामानगर, इंदौर(म.प्र.)
मोबाईल—8959689009
ई मेल—sushma29vyas@gmail.com

माँ की यादों का पिटारा



आज मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।

उसमें है हमारे सुख-दुख की यादों बसेरा।
उसमें हैं मां का हंसता हुआ ममतामयी चेहरा।
उसमें है जीवन के अनमोल पलों का खजाना।
उसमें ना कोई कुंजी है ना कोई ताला।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।


सुकोमव, श्वेतवर्णी मां के नयनों में स्नेह की बहार।
मुख पर चन्द्रकिरणों सी स्निग्धता
और माथे के कुंकुम का दैवीय सौन्दर्य श्रंगार।
मृदु समीर के झोंके सी उनकी वाणी।
सुख और संतोष से रचा मर्मस्पर्शी संसार।
 हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।

वो मां के आंचल से मसाले की महक।
वो मां की सौंधी रोटी को खाने की ललक।
वो मां के खट्टे-मीठ्ठे अचार का स्वाद।
वो मां के खाने में बरसता आग्रह का प्यार।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।


वो मां का सबको खिला के भूखा रह जाना।
वो मां का दो ही साड़ी में जीवन बिताना।
वो मां का अपने ही आंसू खुद से छीपा लेना।
वो मां का अपनी हंसी से घर की हर कमी को ढांक देना।
हां मैने खोला है मां की यादों का पिटारा।


मां से ही सीखा है अपनों के लिये जीना।
कड़कती धूप में शीतल छांव बनकर रहना।
संतोष और धैर्य से जीवन की राह अपनानान।
मां की सीख में ही ईश्वरीय वरदान पाना।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।

उसमें है हमारे सुख दुख का बसेरा।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।

 सुषमा व्यास ‘राजनिधि’
कहानीकार, कवियित्री
3043/E सुदामानगर, इंदौर(म.प्र.)
मोबाईल—8959689009
ई मेल—sushma29vyas@gmail.com

माँ का।गुणगान

ओ मां किन शब्दों में तेरा गुणगान करू ,क्यों न तुझ पर में अभिमान करू ,जब उंगली पकड़कर तूने मुझको चलना सिखलाया था ,मेरी ही तुतली भाषा में लोरी गाकर मीठी नींद सुलाया था ,बनकर मेरी प्रथम गुरु जब मुझको राह दिखाई थी ,जीवन की इस दुनिया का जब ज्ञान मुझे बतलाया था ,जीवन के हर मोड़ पर संघर्षों से लड़ना सिखलाया था ,मा आज तेरी सारी बाते मानस पटल पर मेरे घिर घिर आती है ,तेरे लाड दुलार की हर एक बाते मेरे नयनों को भीगा जाती हैं ,अक्सर तारो में मा में तुमको देखा करती हूं हा मेरी प्यारी मा में आज भी तुमको बहुत याद में करती हूं ,मा मेर इन स्वरचित पंक्तियों के श्रद्धा सुमन 🌹🌹🌹🌹 में तुमको अर्पित करती हूं ,हर जनम में तुम मेरी मां बनकर आ जाना तुमसे यही अनुरोध मै करती हूं 🙏🏻 मेरी स्वरचित पंक्तियों के साथ सभी को मातृ दिवस की बहुत बहुत शुभ कामनाएं 💐💐💐💐👍🏻
साधना श्रीवास्तव

माँ


 मेरी हर चोट पर जिसने मरहम लगाया
ठोकर खा जब भी गिरा उसने गले लगाया

 खुद भूखी रहकर हमें खिलाया
 वह मेरी मां है हां वही तो मेरी मां है

मां ,आज तू नहीं पर तेरा एहसास है
चारों ओर खोजती तुझे मेरी आस है

मां तेरे जाने से मेरे सारे सुख चले गए

भीड़ होते हुए भी हम अकेले रह गए

मां अब कोई मेरा सुख दुख नहीं पूछता
बेटा खाना खाया अब कोई नहीं पूछता

देर से घर आने पर कोई नहीं टोकता
 ममता का वह स्पर्श दे कोई नहीं जगाता

 मां मेरे दर्द को तू बिन बताए समझ जाती थी
मुझे क्या चाहिए वह बिन मांगे दे देती थी

तू पाई पाई जोड़ रकम भी मुझ पर लुटा देती
मेरे सुख की खातिर तू हर दुख सह लेती

मां आज भी तू मेरे आसपास है मेरे साथ है
राज इस बात का मुझे एहसास है
कि तू मेरे साथ है


डॉ सुधा चौहान राज इंदौर

माँ जैसा कोई नही

मातृत्व ममता सम्मान 2019 के लिए

नाम - डां अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
पता - 21-22/4 न्यू पलासिया
 अपना स्वीट्स के पास
    इंदौर   452001
    मोः7772068243

कविता-"मां जैसा कोई नहीं"

मां तेरी निश्चल हंसी
फूलों सी तू खिलती।
झरने सी मुस्काती
सच मां जैसा कोई नहीं।

मां का अनमोल प्यार
लाड प्यार और मनुहार।
पल पल करती दुलार
मेरी मां जैसा कोई नहीं।

मां की करूं अर्चना
मां पूजा,करूं वंदना।
मां महकी जाए चंदना
सच मां जैसा कोई नहीं।

मां ममता की मीठी लोरी
रोशन करने वाली ज्योति।
 घुंघरू सी सदा खनकती
मेरी मां जैसा कोई नहीं।
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समूह सदस्यों के माम।और बच्चों के कैमरे में कैद यादे

माँ तुझे प्रणाम
मातृ दिवस पर समूह के सदस्यों की फ़ोटो पहचाने कौन कौन हैं ?
लाइक तो बनता हैं👌👍💐







































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