Thursday, November 14, 2019

छोटा सा बच्चा पिता बना
पापा को डाँटते बोला
पापा मत खाओ गुटका
नुक़सान करे ये दिल का
नहीं रोकना कहने से
आज जनम दिन चाचा का
बाल दिवस है पापा
कुछ गिफ़्ट करो इस दिन का
उपहार मेरा उत्तम होगा
कर दो त्याग तबांखू  का
जीरो बिमारी लाइफ़ जियो
जूस लस्सी पानी खूब पियो
आज आपका बना मैं डॉक्टर
अवसर बाल दिवस का पाकर
जैसा पापा आप करोगे
हम बच्चे अनुसरण करेंगे
चलो मनायें चौदह नवम्बर
बच्चे बनो बच्चों में जाकर

...........,,,,🌺🌷🌷🌷🌷🌷
🌹🌹🌹कुसुम सोगानी🌺🌺

बाल दिवस की सभी बच्चों की मातायें पिताओं को बधाई🌹🌹

दौड़


लघु कथा
( दौड़)
मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि जल्दी उठा करो, स्कूल  हमेशा समय पर पहुँचना चाहिए। मैंने लगभग खींचते हुए अपनी छह साल की बेटी को उठाया ओर साथ ही उसे तैयार करते हुए, समय की पाबंदी पर बोले भी जा रही थी।
 जब उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तुम सुन भी रही हो। उसने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए कहा,
"आप तो कहती थी कि बचपन के दिन बहुत सुहाने होते है,
पर मुझे तो लगता है कि बचपन स्कूल ओर कोचिंग के बीच भागने को कहते है। "
अपनी बात कहकर उसने अपना बैग लिया ओर स्कूल के लिए निकल गई ओर मैं बेबसी से उसकी तरफ देख रही थी,
 ओर सोच रही थी कि सच में आज बच्चे अपना बचपन कहा जी पा रहे है, जहाँ देखो वहाँ एक दौड़ है, चाहे परीक्षा में अच्छे अंक लाने 
की हो या टी. वी के किसी रियलटी शो में भाग लेने से लेकर उसे जीतने तक। आजकल बच्चों की ज़िन्दगी भी दौड़ जैसी हो गई है।
आदिति  भदोरिया
बचपन __________
 फूलों सा कोमल है बचपन , उस पर ना अत्याचार करो , कच्ची कलियों को खिलने दो , उस पर ना प्रहार करो ।
बच्चों के मुस्कुराहट के आगे, फीका है धन और दौलत , घर की रौनक घर की खुशियां, बच्चों के बदौलत , मस्ती में मस्त रहने दो , बचपन का नाम व्यापार करो। प्यारी बहना का भाई , मां बाप का राज दुलारा है, मनमोहना ,कृष्ण -कन्हैया , सबकी आंखों का तारा है, जीवन उनका उद्देश्य पूर्ण हो , इस पर सुविचार करो । बच्चे दिल की धड़कन है, बच्चे देश की शान है, जिस घर में बच्चे नहीं , वह घर रेगिस्तान है , धर्म जाति से ऊपर उठकर, जी भर कर उनको प्यार करो। बीत गया सुनहरा पल बचपन का, वह यादगार बन जाएगा , संगी साथी छूट जाएंगे , बचपन लौट कर ना आएगा, बगिया को सींचो स्नेह जल से, उनका तुम सत्कार करो। श्रीमती शोभा रानी तिवारी 619 अक्षत अपार्टमेंट, खातीवाला टैंक इंदौर मध्य प्रदेश, मोबाइल 89894 09210
f
मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि जल्दी उठा करो, स्कूल हमेशा समय पर पहुँचना चाहिए। मैंने लगभग खींचते हुए अपनी छह साल की बेटी को उठाया ओर साथ ही उसे तैयार करते हुए, समय की पाबंदी पर बोले भी जा रही थी। जब उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तुम सुन भी रही हो। उसने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "आप तो कहती थी कि बचपन के दिन बहुत सुहाने होते है, पर मुझे तो लगता है कि बचपन स्कूल ओर कोचिंग के बीच भागने को कहते है। " अपनी बात कहकर उसने अपना बैग लिया ओर स्कूल के लिए निकल गई ओर मैं बेबसी से उसकी


बीता बचपन

*
" बीता बचपन आ गया पचपन "*
बगीचे में बैठे ठंडी हवाओं का झोंका लेते हुए,
गुनगुनी धूप में बचपन का पिटारा निकाला था।
सुहानी यादों को संजोये तस्वीरों को सांझा करते हुए,
फिर से निहारते नई पीढ़ी में समेटे उकेर लिया था।
खट्टी मीठी बातों के संग गुदगुदाती यादें ताजा करते हुए,
भाई बहनों संग दिन महीनों सालों तक सम्हालते हुए गुजारा था।
शिकवे शिकायतों का दौर गुनगुनाते हुए,
बीते हुए लम्हों में रंगीन पड़ावों का सफर सुहाना था।
सुनहरी यादों के सहारे हसीन लम्हों को लिए हुए,
ना जाने क्यों बचपन के खेल खिलौनें घरौंदे अच्छे लगते थे।
अब परिपक्व हो दोस्ती यारी सुहाने पलों का तराना लिए हुए,
बीता बचपन आ गया पचपन पाँव जरा सा लड़खड़ाया था।
यादें ताजा सुहानी लड़कपन की फरियाद करते हुए,
काश.! फिर से लौट आये बचपन जैसे अभी पचपन में बच्चों का जमाना था।
तू - तू ,मैं -मैं हो जाती कुछ पलों में अलग होते हुए,
फिर मम्मी पापा ने आकर प्रेम से समझाया करते थे।
होली ,दीवाली, रक्षाबन्धन पर भाई बहनों के संग लिए हुए,
भले ही गिनती में एक या दो नही पाँच भाई बहनों का संग निराला था।
कमी किसी चीजों की नहीं भरपूर आनंद सहयोग लिए हुए,
आदर्श परिवार पूरा परिवार भंडार गृह का खजाना था।
बचपन की वो सुहानी यादें ताजा आधी उम्र लिए हुए,
काश...! अब फिर से लौट आये बचपन जैसे पचपन से बचपन की ओर चले थे ..
   *शशिकला व्यास*

व्यक्ति

व्यक्ति
एक लघुकथा
एक बार एक व्यक्ति अपने तीन बच्चो को लेकर डबल डेकर बस से यात्रा कर रहा था।बस कुछ खाली थी।वह व्यक्ति बस की खिडकी के पास विचार मग्न गंभीर अवस्था मे बैठा था।
तीनो बच्चे खाली बस का पूरा पूरा आनन्द उठा रहे थे।एक सीट से दूसरी सीट पर बन्दर के भाँति उछलकूद करने मे मस्त थे।
दूसरे यात्री पहले तो उनकी मौज के दर्शक बने रहे ।अंत मे परेशान होकर उस व्यक्ति की ओर देखने लगे ।जो ऐसा बैठा था मानो उसका कोई संबंध ही न हो ।उन यात्रियो ने उस व्यक्ति के पास जाकर बोला महाशय आपके बच्चे बस मे धम चौकडी मचा रहे है और आप निश्चिन्त बैठे है ।वह व्यक्ति हडबडाकर देखने लगा,स्थिति को समझकर शर्मिन्दा हुआ और बोला
       माफ कीजिए हम लोग अभी ही केइएम अस्पताल से आ रहे है।गंभीर बीमारी के कारण बच्चो की माँ का देहावसान हो गया है।मै इसी विचार मे हू कि इन निष्पाप को इस घटना को कैसे बताऊं।
        यह सुनते ही बस मे वातावरण बदल गया।एक पारसी युवती ने पर्स मे से बिस्किट का पैकेट निकाला और बच्चो को देने लगी ।सभी यथा शक्ति सहयोग का हाथ बढ़ाया ।अब वे बच्चे शैतान नही लग रहे थे, ना ही वह व्यक्ति बेजवाबदार।

अमिता मराठे
इन्दौर
स्व रचित रचना

नन्हे तारे




*मेरे बालनाटक संग्रह रंग मंच के नन्हे तारे से एक नाटक*
*उम्र* 7,8 साल


*गणपति बप्पा मोरया*


 पात्र परिचय


( देवू शेखर  पूजा  पिंकी  कॉलोनी में रहने वाले 8   9  साल के बच्चे  अभि भैया)


 पहला दृश्य.


(गणेश उत्सव का समय है बच्चों ने मिल जुल कर जोर शोर से सजावट की है। कॉलोनी में एक और टेबल को सजाकर छोटा सा स्टेज बनाया है।फूल माला आरती नारियल सब थाली में सजा हुआ रखा है।

बच्चे गणेश जी बैठा रहे हैं कंधे पर गणपति बप्पा को जय कारे के साथ लेकर आते हैं)

देवू--- (कांधे पर गणपति जी की मूर्ति रखे हुए हैं)

         गणपति बप्पा

बच्चे -------मोरया ....।

देवू--------अगले बरस तू

बच्चे------ जल्दी आ।

शेखर------जय ..गणेश ...

बच्चे -------जय गणेश।

 पूजा------ 1234

बच्चे --------गणेश जी की जय जयकार

पिंकी ------;गणपति बप्पा

 बच्चे --------मोरिया।

अभि भैया----(स्टेज के पास खड़े हैं)

                  लाओ लाओ यहां रखो गणपति जी को. पहले इनकी पूजा करेंगे फिर स्थापना करेंगे।
बच्चे ---------खुशी से जय गणेश जय गणेश

अभि भैया----- आओ पिंकी यह लो तुम आरती करो।

 शेखर --------नहीं भैया मैं आरती करूंगा।

अभिभैया------अच्छा आओ (आरती की थाली उठाकर शेखर आरती करता है। सब आरती गाते हैं जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा)

 अभि भैया-------हां तो दोस्तों आज से 10 दिनों तक गणपति जी हमारे मेहमान हैं हमें इनकी सेवा स्वागत-सत्कार अच्छी तरह करना है।

पूजा -------अरे भैया भोग तो लगाइए।देखो मैंने मोदक ला कर रखे हैं उधर कटोरी में

देवू--------ललचाते हुए वाह मोदक।

पूजा ---------गणपति जी के लिए है तुम्हारे लिए नहीं (

सब हंसते हैं)

 देवू--------- प्रसाद तो मिलेगा ना

अभिभैया------हां मिलेगा। और जिम्मेदारी भी ।रोज तिलक करना,पूजा करना, माला फूल लेकर आना , रात को गणपति जी को सुलाना।

शेखर ---------अरे भैया यह सब काम मैं करुंगा ।

पिंकी ----------भैया म्यूजिक सिस्टम लगाइए न।

 अभिभैया ---------शाम को लगा दूंगा गणपति जी को उनके ही भजन सुनायेंगे।

 पूजा ----------(हंसते हुए) कितना अच्छा लग रहा है कितनी रौनक है कितनी सुंदर सजावट है. देखो लग ही नहीं रहा कि यह सब हमने किया है ।

अभि भैया------ चलो चलो यह प्रसाद लो। एक बार जोर का जयकारा लगाओ, और घर चलो शाम को मिलते हैं।


दूसरा दृश्य


(शाम का समय है बच्चे गणपति जी के पास हंस गा रहे हैं म्यूजिक सिस्टम लग चुका है गणपति जी के गाने बज रहे हैं चारों तरफ रोशनी झिलमिल आ रही है)

 देवू--------(गाने के साथ साथ गुन गुनाता है) देवा हो देवा गणपति देवा ।
पूजा ----------तुमसे बढ़कर कौन  तुमसे बढ़कर कौन..
 पिंकी---------- और तुम्हारे भक्तजनों में ....
शेखर –--------हमसे बढ़कर कौन।
                ( सबखिलखिलाते हैं)
 अभि भैया---------- क्यों कैसा रहा
बच्चे --------------मजा आ गया भैया।
 अभि भैया-------- चलो आरती का समय हो गया है।
 शेखर -----------भैया मैं करूंगा।
 पिंकी----------- नही। तूने सुबह की थी अब देवू करेगा।
देवू------------हां मैं करूंगा आरती।
 अभि भैया ----------अच्छा तो कर ले आजा जल्दी ।यह आरती जला।
शेखर ------------मैंने कहा ना मैं ही करुंगा आरती।
 पूजा ---------नहीं शेखर देवू करेगा
देवू----------यह तो गलत है  शेखर । तू ही आरती करे तू ही माला पहनाए तू ही प्रसाद बांटे।
शेखर ----------हां मैं ही करूंगा यह सब क्या तुम जानते नहीं गणेश जी पर मेरा अधिकार सबसे ज्यादा है।
अभिभैया ---------यह कैसी बातें कर रहे हो शेखर

शेखर---------तो पूछ लो इन्हीं लोगों से आज मुझ पर गुस्सा दिखा रहे हैं ,गणेश जी खरीदते समय कैसे विनती कर रहे थे ,भूल गए क्या।
अभिभैया--------- विनती.... मतलब ।
पिंकी ----------- वह क्या है भैया गणपति जी की मूर्तियां बड़ी महंगी-महंगी थी और हमारा चंदा कम हुआ था।
पूजा ------------तो शेखर ने ज्यादा पैसे मिला दिए थे।
 देवू-----------तब हमें क्या पता था कि यह ऐसा करेगा।
 शेखर---------ए देवू   । यह मत भूल अगर मैं पैसे नहीं मिलाता तो तुम लोग गणपति जी भी नहीं रख पाते।
देवू---------चल जा जा उलझ मत मुझसे ।
अभि भैया--------एक मिनिट । बंद करो यह फालतू बातें और शेखर तुम यह क्या कर रहे हो?
 शेखर ----------सच ही कह रहा हूं मैंने ज्यादा पैसे मिलाएं हैं तो हर चीज मैं पहले करूंगा।
देवू--------(गुस्से में) तो तू रख अपने गणपति अपने पास मैं जाता हूं ।वह चला जाता है ।
अभि भैया--------अरे देवू..... । शेखर रोको उसे....।
 शेखर --------------मैं क्यों रोकूँ। जाता है तो जाए चलो हम आरती करते हैं।
 पिंकी ------------तू ही कर।  मैं भी जा रही हूं
पूजा-------( पैर पटकते हुए ) और मैं भी । अब कर अकेले ही सब कुछ।
शेखर ----------अरे जाओ जाओ इतना गुस्सा किसे बताते हो ।
अभि भैया ----------शेखर तुझे तो मैं बाद में देखूंगा पहले उन्हें मनाता हूं।
शेखर ---------मैं अकेला ही अच्छा हूँ।


तीसरा दृश्य


(गणपति जी के पास उदासी छाई है शेखर अकेला बैठा है उसके साथ कोई नहीं है )

शेखर---------(मन ही मन)

                    जिसे नहीं आना मत आओ मैं तो आरती करूंगा भगवान की आरती की तैयारी करके आरती करता है फिर जोर से जयकारा लगाता है गणपति ....बब्बा ........।
पीछे कोई भी नहीं रहता जो बोले मोरिया ।वह पलट कर देखता है फिर स्वयं ही धीरे से कहता है मोरया।
 शेखर --------पता नहीं कब तक गुस्सा रहेंगे यह सब।( चहल कदमी करते हुए)
 ऐसे अकेले अकेले तो बिल्कुल भी मजा नहीं आ रहा ।(2 दिन ऐसे ही बीत जाते हैं.)
 अभि भैया-------(तीसरे दिन )अरे शेखर क्या हालचाल हैं ।और तुम्हारे गणपति जी इतने उदास क्यों दिख रहे हैं।
शेखर ---------मुझे बुखार है अभि भैया दवाई खा कर आया हूं।
अभि भैया ----------क्या....? बुखार । दिखाना तो अरे हां तुम तो गरम हो। फिर यहां क्यों बैठे हो। आराम करो ।
शेखर ----------गणपति जी को अकेला कैसे छोड़ दूं।
 अभि भैया---------अब तुमने ही तो सबसे लड़ाई की है ।
शेखर ----------मैं शर्मिंदा हूं भैया। पर कैसे मनाऊं सबको कोई नहीं मानेगा।
 अभिभैया-------तुम्हें गलती का एहसास हुआ यही बहुत है ।चलो रात को आरती हम दोनों साथ में करेंगे।
 शेखर ---------(खुश होकर) सच भैया।
 अभि भैया---------अभीचलो आराम करो।



 चौथा दृश्य


(अभी भैया और शेखर भगवान को फूल माला पहनाते हैं आरती करते हैं शेखर बुझे मनसे आरती करता है फिर धीरे से जयकारा लगाता है बोलो गणपति महाराज की.....  )
 बच्चे ----------(पीछे आकर खड़े हो जाते हैं और जोर से जोर से चिल्लाते हैं जय......)

 शेखर चौंक कर  पलटता है। खुशी से उसके आंसू निकल आते हैं पूरी हिम्मत के साथ फिर जयकारा लगाता हैं गणपति बब्बा.......
 बच्चे ------------मोरया......।

( शेखर सबसे गले मिलता है )
शेखर -----------तुम लोग.....। तुम्हें भैया लेकर आए ना
पूजा -------------अब तुम बेवकूफ हो तो हम थोड़े ही है ।
पिंकी ------------भइया ने बताया तुम बीमार हो तो हम अपने आप को रोक नहीं पाए।
शेखर------------ सच तुम लोग सच्चे मित्र हो।
 देवू-------------और तू तू.. बेवकूफ मित्र। है ना
 शेखर--------(उसे  गले लगते हुए ) सच।
अभिभैया---------- लो भाई प्रसाद लो सब ।
गणपति बब्बा .........
बच्चे ----------मोरया......।
 पूजा -----------एक दो तीन चार
बच्चे----------गणपति जी की जय जयकार।
(तभी गाना बज उठता है देवा हो देवा.......।
बच्चे झूमते हैं)
पर्दा गिरता है।

प्रतिमा अखिलेश

दौड़


लघु कथा

( दौड़)

मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि जल्दी उठा करो, स्कूल  हमेशा समय पर पहुँचना चाहिए। मैंने लगभग खींचते हुए अपनी छह साल की बेटी को उठाया ओर साथ ही उसे तैयार करते हुए, समय की पाबंदी पर बोले भी जा रही थी। जब उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तुम सुन भी रही हो। उसने बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "आप तो कहती थी कि बचपन के दिन बहुत सुहाने होते है, पर मुझे तो लगता है कि बचपन स्कूल ओर कोचिंग के बीच भागने को कहते है। "
अपनी बात कहकर उसने अपना बैग लिया ओर स्कूल के लिए निकल गई ओर मैं बेबसी से उसकी तरफ देख रही थी,  ओर सोच रही थी कि सच में आज बच्चे अपना बचपन कहा जी पा रहे है, जहाँ देखो वहाँ एक दौड़ है, चाहे परीक्षा में अच्छे अंक लाने
की हो या टी. वी के किसी रियलटी शो में भाग लेने से लेकर उसे जीतने तक। आजकल बच्चों की ज़िन्दगी भी दौड़ जैसी हो गई है।
*आदिती भदोरिया 

बाल दिवस

चाचा नेहरू प्यारे थे ।

भारत माँ के दुलारे थे ।
देश के पहले प्रधानमंत्री थे।

लाल गुलाब उन्हें प्यारा था ।
बच्चों से प्यार जताते थे ।

बच्चे सदा उन्हें चाहते थे ।
भारत माँ का लाल यह

सबसे ही था न्यारा।
भारत माँ का नाम बढाया ।

यह ऐसा लाल चमन का

चारूमित्रा नागर

भोली मुस्कान



भोली सी जिनकी मुस्कान,
थोड़े से हैं जो शैतान ,
हर घर के आंगन की रौनक ,
ये बच्चे है पुष्प समान।
खुशियों की खुशबू फैलाते ,
घर आंगन में उधम मचाते ,
शैतानी कर चुपके से ,दादी के आंचल में छुप जाते।
गुस्सा खूब दिखाती है माँ,
मन ही मन मुस्काती रहतीं ।
मेरा लाल है मेरा कान्हा ,सखियों
से वह कहती रहतीं।
दादाजी का प्यार बरसता ,
पापा बुनते सपने कल के।
दीदी की आंखों मे ममता ,प्यार
के मोती हर पल झलके।
ये भविष्य हैं ,भावी पीढ़ी है
इनको हम सब सम्भालें।
संस्कार इन्हें उत्तम हम देकर
एक अच्छा इंसान बना लें।

अचला गुप्ता
इंदौर

हम बच्चे



क्या हुआ जो बच्चे हैं
मन के तो हम सच्चे हैं
बात की अपनी पक्के हैं
देश के लिए मर - मिट जाएँगे ।।

माँ के हम सपूत हैं
दुश्मन के लिए भूत हैं
ईश्वर के हम दूत हैं
काम शांति के कर जाएँगे ।।

देश हमारा प्यारा है
सब देशों से न्यारा है
पढ़-लिखकर महान बनेंगे
नाम देश का कर जाएँगे ।।

शहीदों ने इसे ख़ून से सींचा है
हम इसके फूल ये हमारा बाग़ीचा है
हम बच्चे इसकी लक्ष्मण रेखा हैं
रक्षा में इसकी बिछ जाएँगे ।।

मुश्किल से आज़ादी पाई है
वीरों ने अपनी जान गवांई है
हिंदु- मुस्लिम- सिक्ख- ईसाई
देश पर बलीहारी जाएँगे ।।

स्वरचित
उषा गुप्ता
इंदौर

बाल मन


बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
जिसमें खिल नहीं पाता बचपन
क्या होती माँ की लोरियाँ
क्या होती गर्म रोटियां
क्या होती रिश्तों की गर्मियां
नहीं जानता जो उपवन
क्या होता गुड्डेगुड़ियों का ब्याह
साथी संग दौड़ा नहीं जो बीच राह
गुल्ली डंडा और पतंग मांझा
क्या होता मस्तियों से रिश्ता साँझा
खेल मैदान है आसमान
गेंद  बन जाती चाँद समान
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
 जहाँ  गुजरती  सांसे किसी नुक्कड़ पर
चाय की केतली की भाप पर
छोटू छोटू की आवाज पर
बारूद के ढेर पर, तगारी की रेत पर
 कचरे में खजाने की खोज पर
सपनें बुनता उधेड़ता कोरा मन
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
 जिसमें बाली उमर बिन सिंदूर बनती दुल्हन
काँच  टूट बिखरता दिखती न चुभन
सुबह में है साँझ की थकन
खेल है  चाकू,छुरी  और गन
पटाखों का तमंचा दूर गगन
धुँआ धुँआ हो रहा चमन
 किसको दिखता बुझता सुलगता मन
इस बालदिवस :-
एक मुस्कान मिल जाती उस आँगन
जिसमें सजा जीवन का झूठा श्रृंगार
 माया का अंबार ग़ुम बापू का दुलार
 माँ नहीं मोबाईल है पास
कैसे बनें मीठे अहसास
किताबों में नहीं परियों की कहानी
जीवन में नहीं जीवन की रवानी
इस बालदिवस :-
बचपन को मिल जाता बचपन
सच कर लेता वो सुन्दर सपन

काव्य कृति :-
डॉ.संगीता भारुका

सार्थकता बाल दिवस

🎊  बाल दिवस,मनाना सार्थक।
🎊प्रभा जैन,,
चाचा नेहरू के जन्मदिवस को,आओ हम सब मिल  मनाएं आज,,,,,खुशियां बांटे जिसने सबके दिलों पर किया राज
बच्चों में वे खुश रहते थे,प्यारे बच्चे भी उनसे खुश रहते थे,,
कोट में टँके लाल गुलाब की खुशबू से,बच्चा 2 हो जाता सराबोर,,
आओ हम सब मिल मनाये,जन्मदिन उनका आज
बच्चों में खुशियाँ बांटे ,और बढ़ाएं शिक्षा और संस्कार
तभी देश को और मिलेंगे,नेहरू गांधी और सरदार
आओ हमसब हिलमिल इन प्यारों के संग खुशियां बांटे,और देश के बाल को दे संस्कार
जो भोली मुस्कान से हिलमिलकर रहे भाईचारे के संग
बिना स्वार्थ के सेवा संस्कारों से  देश को उन्नत करे जग,,,
ईमानदारी,प्यार ,की मिठास पूर्ण,ख़िलादें इन सब को केक
तभी तो चाचा नेहरू का हैप्पी बर्थ डे हो जाएगा सार्थक,,,,🎊🥁💐
खबर दर्पण,14 नवम्बर 2019     


             
                              खामोश सिसकता बचपन
                                        ----------------------------------------
                                          (बाल दिवस पर विशेष रिपोर्ट)
                                  * डा . सुनीता श्रीवास्तव (विषेश  प्रतिनिधि)
स्वतंत्र भारत ने पंडित जवाहरलाल नेहरु  के जन्मदिन को बालदिवस का रुप भले ही दिया हो पर मानवीय स्तर  पर  वह बच्चों  के साथ न्याय करने मे अक्षम रहा है ,कारण कोई भी हो पर  यह एक कडवा सच हैं  कि  खामोश बचपन अब सिसक  रहा हैं  ।सर्वेक्षण के  आधार  पर  साबित होता हैं  कि  तमाम भौतिक  सुख सुविधाओं  के वावजूद आज बचपन पीडित हैं  हर क्षेत्र में  ।रिपोर्ट के आधार प्रतिमा  अकेले इंदौर  शहर में  एक साल में  478 रिपोर्ट दर्ज हुई जिसमे से 467 पर  कोई एक्शन  ही नही हुआ क्योकी शिकायतकर्ता  खुद ने आगे बड़ने से इन्कार कर  दिया ।जब पुलिस  की फाइल  से कुछ लोगो से पूछताछ  की तो निम्न बिंदू सामने आये--
1-अभी एक्शन लने पर  धमकी मिल रही हैं  बेहतर हैं  हम चुप हो जाए क्योकी कोई साथ तो देगा नही बस कागजी कार्यवाही  चलती रहेगी जो होना था वो हो चुका।
2-सामने वाले ने सक्षम अधिकारी  को खिलापिला दिया।
3-बार बार कचहरी के चक्कर में  लगाने पड  रहे हैं  समय नही हैं ।
4-कोई सुनने वाला नही है  ।
5-सबूत ही खत्म कर  दिये
यह तो वो कारण हैं  जो बच्चों  के साथ गल्त  हादसो के बाद पता चलने पर  किये  गये  पर  कई  किस्से तो बच्चे  खुद ही नही बताते है  और उनमें  89%स्वयं  परिवार के लोग ही जिम्मेदार  होते है  जो एक दुखद पहलू  हैं  ।
इंदौर  शहर में  इस समय 59 बालअनाथ आश्रम चल रहे है जो मान्य हैं  पर वहा भी अन्दरूनी हालत  सही नही हैं ,कहने के लिय कई  सामाजिक संस्था उनको आर्थिक सुविधाएं प्रदान करती हैं  पर  उनका सही उपयोग नही होता हैं  अभी हाल की ही बात हैं  इंदौर की एक प्रसिध्द  बालाश्रम  में  पित्रपक्ष में  कुछ दान  स्वरुप फल आदी लेकर जाना हुआ बातचीत अधिकारियो से चल रही थी तभी एक परिवार के लोग अपने पिताश्री के श्राद्ध में  कुछ कीमती सामान  आकर दे गये ,उनके जाने के बाद वो सामान तुरंत संचालक के घर पहुँचा दिया गया जब पुछा तो कहा गया एसा उनको करने का निर्देशन है  वरना सेवानिवृत्त  कर  दिये जाते है  मन कडवाहट  से भर  गया और लगा अपना सामान झुग्गी-झोपड़ी मे ही दे दो तो बेहतर है ।
नन्ही नन्ही बच्चियों के साथ परिवार के लोग ही उनका शोषण करते हैं  जिसका ग्राफ बडा हैं ,पर  आजकल लड़के  लोग भी हवस  का शिकार  हो रहे है  इंदौर के प्रसिध्द  उधोगपति द्वारा संचालित बालाश्रम  में जब महाराष्ट्र  से आये तीन भागे बच्चे  पकडा गए  तो उनका यही कहना  था की वार्ड्न  पुरुष उनको रात में  परेशान  करता था ।
इंदौर की एक बालाश्रम  में  तो  कुछ बच्चे  बड़े लोगो की  नाजायज निशानी हैं  सबसे मजे की बात यहा के कर्मचारी  भी इतने नालायक हो गए  है  कि  खुलेआम  सौदा  करते  है  इसका एक दूसरा  पहलू  चोकाने वाला भी था जब साथ के एक रिपोर्टे जो ट्रेनर था  उसे बालाश्रम  के एक कर्मचारी  ने कहा - यह तो आपका बच्चा  है उस बच्चे  के नाक नकक्ष  भी मिला दिये,(मतलब आप कदम रखे तो सम्हलकर)
यह हम भारतीयो का आधुनिक  समाज का मन है ।
निसन्देह यह एक गम्भीर मामला है  जो पेचिदा हैं  जिसे  धेर्य  के साथ समाज के हर पहलू से मनन करना होगा ।
                                                                                                               समाचार  दर्पण,14 नवम्बर 


                     
       खमोश सिसकता बचपन
        -------------------------------------------------


(बाल दिवस पर  विशेष  रिपोर्ट )
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*डा. सुनीता श्रीवास्तव (विशेष प्रतिनिधी)
                                           
स्वतंत्र भारत ने पंडित जवाहरलाल नेहरु  के जन्मदिन को बालदिवस का रुप भले ही दिया हो पर मानवीय स्तर  पर  वह बच्चों  के साथ न्याय करने मे अक्षम रहा है ,कारण कोई भी हो पर  यह एक कडवा सच हैं  कि  खामोश बचपन अब सिसक  रहा हैं  ।सर्वेक्षण के  आधार  पर  साबित होता हैं  कि  तमाम भौतिक  सुख सुविधाओं  के वावजूद आज बचपन पीडित हैं  हर क्षेत्र में ।पर्ट के आधार प्रतिमा  अकेले इंदौर  शहर में  एक साल में  478 रिपोर्ट दर्ज हुई जिसमे से 467 पर  कोई एक्शन  ही नही हुआ क्योकी शिकायतकर्ता  खुद ने आगे बड़ने से इन्कार कर  दिया ।जब पुलिस  की फाइल  से कुछ लोगो से पूछताछ  की तो निम्न बिंदू सामने आये--
1-अभी एक्शन लने पर  धमकी मिल रही हैं  बेहतर हैं  हम चुप हो जाए क्योकी कोई साथ तो देगा नही बस कागजी कार्यवाही  चलती रहेगी जो होना था वो हो चुका।
2-सामने वाले ने सक्षम अधिकारी  को खिलापिला दिया।
3-बार बार कचहरी के चक्कर में  लगाने पड  रहे हैं  समय नही हैं ।
4-कोई सुनने वाला नही है  ।
5-सबूत ही खत्म कर  दिये
यह तो वो कारण हैं  जो बच्चों  के साथ गल्त  हादसो के बाद पता चलने पर  किये  गये  पर  कई  किस्से तो बच्चे  खुद ही नही बताते है  और उनमें  89%स्वयं  परिवार के लोग ही जिम्मेदार  होते है  जो एक दुखद पहलू  हैं  ।
इंदौर  शहर में  इस समय 59 बालअनाथ आश्रम चल रहे है जो मान्य हैं  पर वहा भी अन्दरूनी हालत  सही नही हैं ,कहने के लिय कई  सामाजिक संस्था उनको आर्थिक सुविधाएं प्रदान करती हैं  पर  उनका सही उपयोग नही होता हैं  अभी हाल की ही बात हैं  इंदौर की एक प्रसिध्द  बालाश्रम  में  पित्रपक्ष में  कुछ दान  स्वरुप फल आदी लेकर जाना हुआ बातचीत अधिकारियो से चल रही थी तभी एक परिवार के लोग अपने पिताश्री के श्राद्ध में  कुछ कीमती सामान  आकर दे गये ,उनके जाने के बाद वो सामान तुरंत संचालक के घर पहुँचा दिया गया जब पुछा तो कहा गया एसा उनको करने का निर्देशन है  वरना सेवानिवृत्त  कर  दिये जाते है  मन कडवाहट  से भर  गया और लगा अपना सामान झुग्गी-झोपड़ी मे ही दे दो तो बेहतर है ।
नन्ही नन्ही बच्चियों के साथ परिवार के लोग ही उनका शोषण करते हैं  जिसका ग्राफ बडा हैं ,पर  आजकल लड़के  लोग भी हवस  का शिकार  हो रहे है  इंदौर के प्रसिध्द  उधोगपति द्वारा संचालित बालाश्रम  में जब महाराष्ट्र  से आये तीन भागे बच्चे  पकडा गए  तो उनका यही कहना  था की वार्ड्न  पुरुष उनको रात में  परेशान  करता था ।
इंदौर की एक बालाश्रम  में  तो  कुछ बच्चे  बड़े लोगो की  नाजायज निशानी हैं  सबसे मजे की बात यहा के कर्मचारी  भी इतने नालायक हो गए  है  कि  खुलेआम  सौदा  करते  है  इसका एक दूसरा  पहलू  चोकाने वाला भी था जब साथ के एक रिपोर्टे जो ट्रेनर था  उसे बालाश्रम  के एक कर्मचारी  ने कहा - यह तो आपका बच्चा  है उस बच्चे  के नाक नकक्ष  भी मिला दिये,(मतलब आप कदम रखे तो सम्हलकर)
यह हम भारतीयो का आधुनिक  समाज का मन है ।
निसन्देह यह एक गम्भीर मामला है  जो पेचिदा हैं  जिसे  धेर्य  के साथ समाज के हर पहलू से मनन करना होगा ।

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