5 वर्ष की आयु से ही शैतानियां शुरू हो गई थी,ऐसा माँ कहती है।मिट्टी खेलते खेलते सहेलियों के सिर पर मिट्टी डालना,लोंगो के बागीचे में घुस कर जाम,और गुलाब के फूल तोड़ना,आम के दिनों में आम के पेड़पर चढ़ने की कोशिश कर पत्थर मार कच्ची कैरी तोड़ने की कोशिश में,पड़ोसी के शीशे तोड़ना,होली पर गुलाल लगानेकी होड़ में ,न खेलने वालों की दीवालें,टँकीके पानी को रंग देना शैतानियां,याद करते ही बचपन के उस दौर में पहुंच जाती हूँ।।क्या मस्ती भरे अल्हड़ दिनथे।n, c, c केम्पस में देर रात को साथी यों की पेटियों से चोटी बांधना,मूंछे रँगना और सुबह में कप्तान की डाँट खाना आज भी याद आता है,
ऐसी ही एक बड़ी बदमाशी8 वर्ष की आयु में की घर के बड़े गेट पर चचेरी बहन मोना के साथ चढ़कर कूदना,हर 2 दिन में चोट आजाना, रोज का ही काम था।गेट से बाहर जानेकी सख्त मनाई थी।सरपट दौड़ती गाड़ियां, बर्फ का गोला,चाट वाला निकलता तो मन अत्यंत बेचेन हो जाता।एक दिन बहन अंदर घर पानी पीने गई उतनी देर में गेट के निचेसे लेटकर सरककर रॉड पर 1 घण्टे तक खेलने पहुंच गई।अत्याधिक गाड़ियोंकी आवाजाइ का मज़ा लेकर आधे पोन घन्टे में ही पुनः सरककर गेट के अंदर आने लगी तभी अचानक सर में गेट से टकराकर चोट लग गई।खून की धारा बहने लगी,मां,दादी की डांट का सोचते ही ,सिहर गई।सोचा माँ को नही बताती ,और ऊपर वाले कमरे में जाकर छुप गई ज़मीन पर कब नींद आ गई मालूम ही नही पडा।इधर मा ने भी चौके से 1 घण्टे बाद निकलकर देखा,बहन को पूछा,और बहन के अनुसार गेट के बाहर पूरी कॉलोनी में ढूंढ आई।उनकी जान सुख रही थी,आंखों से आंसू,दिल बैठा जा रहा था।आज तो छोरी को कोई पकड़ के ले गया।1से2 घण्टे ढुंढाई हुई।इधर दादी ने भी पूरा घर छान मारा।जोर जोर से दादी की आवाज से मेरी नींद टूटी।दादी मुझे अपनी गोद मे लेकर चुम रही थी ,गालों पर डाँट की प्यार भरी थपकी भी मार रही थी।तेरी बदमाशियों से तो तंग आगये।ये चोट कैसे लगा ली। वैसे ही मेरी तीमारदारी में लग गई।इतने में माँ भी वापिस आगई।मुझे सम्हाला और डाँट लगाते हुए मेरी सिरकी मलहम पट्टी की
आज भी वह सिर का घाव भलेही बालों में छुपा है किंतु मेरे दिमाग के पटल हमेशा मेरी बदमाशियों और चुहलबाजी की याद दिलाता है।कितना प्यारा बचपन ,बिंदास,चुलबुला, आज भी रहे मेरा पचपन।🙏🤣🐵🤸♀🚴♀🏆
स्वरचित ,,प्रभा जैन,21 -5-2019

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