Wednesday, May 1, 2019

मजदूरनी की इमारत



माथे से
टपकती बूंदें,
सिर पर
बोझ ढोती
मजदूरनी की
फिक्र नहीं है,,,,
फिक्र तो उसे
साड़ी के
झूले मे पड़े
दुधमुंहे बच्चे की है,,,,

दिन भर पानी
पी पी कर
इमारत बुनती रही,,
पत्थर गिट्टी चुनती रही,,

बच्चा माँ का पसीना
दूध जान पीकर सो गया,,
मेहनत के खारे पानी से
वो मासूम तृप्त हो गया,,,

माँ प्यार से
सिर पर हाथ फेरती है,,
कहती है
मेरे मुन्ना राजा
तू मेरी बुलंद इमारत है
पसीने से  लिखी इबारत है,,,,
मेरा सूरज मेरा चंदा
तू ही मेरी इबादत है,,,,

देख ये इमारत
ईंट पत्थरों से
बन रही है,,
पर खोखली है,,

तू बनेगा
मजबूत इमारत,
क्योंकि..
तेरे लहू मे
मेरे पसीने की
बूंदें घुली है,,,,
न वक्त की आंधियां
तुझे हिला पाएगी,,
न कोई तूफां
डिगा सकेगा
पथ से,,

हौसले तेरे
होंगे बुलंद,,,,
न करेगा तू
किसी से फरियाद,,,,
मजदूर की
मजबूत औलाद है तू,,,
आसमां के
सरमाये मे
तप कर बढ रहा
वो फौलाद है तू,,,,,

माँ का लाडला
चुप हो सब सुन रहा,
मानो माँ के सपने गुन रहा,,,,

माँ तो सिर्फ
माँ होती है,,,
अमीर हो या गरीब
लाचारी मे तन्हा रोती है,,,

लेकिन.
बच्चों को सदा
साहस देती है,,,,,
इस माँ का भी
यही किस्सा है साहेब,,,,
जानती है भूखे पेट
दूध पिला नही सकती,,,
पर चंदा तारे
तोड़ लाएगी  माँ,,,
संबल बेटे का
ज़रूर बढाएगी माँ,,,,

*नम्रता सरन"सोना"*

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