Wednesday, June 26, 2019

पाठशाला का प्रथम दिन

नीति अग्निहोत्री
मेरा पाठशाला का प्रथम दिन मजेदार था।मेरी मां उस सरकारी पाठशाला में शिक्षिका थी । मुझे घर पर ही १०० तक गिनती और १० तक पहाडे सिखा दिए थे और मुझे पाठशाला भर्ती  करवाने ले गईं। पाठशाला का पहला दिन और वह भी शिक्षिका मां के साध । बच्चे बड़ी आदर भरी नजरों से देख रहे थे । वही साथ के शिक्षक और शिक्षिकाओं  में  होड़ लगी थी कि मुझे कुछ उपहार दें ।पास में ही दुकान थी सो कोई टाफी तो कोई पेंसिल सेट तो कोई कापी  आदि लाकर दे रहा था । भोजन के अवकाश में कोई कुछ खिला रहा था तो कोई कुछ खिला रहा था । बड़ा मजा आरहा था। प्रारंभ में मां ने मेज पर बिठा कर कक्षा में मुझसे सब बच्चों को गिनती ं पहाडे और बारहखडी सुनवाई । मेरी कक्षा के शिक्षक और बच्चे बहुत प्रभावित हुए। मैं अपने को किसी नायिका से कम नहीं समझ रही थी ।
बाद में  जिंदगी में समझ आया कि कोई अपना किसी विभाग में कार्यरत हो तो आपका काम अच्छे से हो जाता है और कोई परेशानी नहीं होती। आदर मिलता है सो अलग । बस जान पहचान होनी चाहिए तभी काम जल्दी होगा वर्ना लगो लाईन में । फाईल भी जल्दी आगे नहीं बढेगी।ंंं
नीति अग्निहोत्री

पाठशाला का प्रथम दिन


प्रभा जैन
माँ, पिताजी के साथ पहले दिन गुजराती स्कूल में प्रवेश दिलाने ले गए।चूंकि मध्य प्रदेश ग्वालियर से पिताजी का ट्रांसफर गुजरात वल्लभ विद्या नगर होने के कारण मुझे गुजराती मीडियम में भर्ती कराया गया।वँहा पर हिंदी या अंग्रेजी मीडियम की कोई स्कूल नही थी।कॉलोनी के सारे फ्रेंड्स के बच्चे वहीं पढ़ रहे थे।पहले दिन ही क्लास में बहिनजी ने गुजराती में नाम पूछा।कुछ भी पल्ले नही पड़ रहा था क्या पूछ रही हैं।बस खड़े होकर आंखों में पानी लिए ,नीचे ज़मीन कुरेदते हुए खड़ी रही।और एक दो बार पुनः वही पूछा ।मुझे समझ ही नही आरहा था क्या पूछा जा रहा है।जब थोड़ी देर बाद मेरे पड़ोस में रहने वाली सखी यामिनी ने जवाब दिया,तब समझ आया कि मेरा नाम पूछा जारहा था।घर आकर माँ से शिकायत की मुझे  स्कूल नही जाना है।,,और करीब एक सप्ताह तक स्कूल नही जाने की ज़िद रही।फिर अगले सप्ताह टिचरजी ने पुनः कुछ पूछा,जिसमे स्वाद के बारे में पूछा कि सफेद वस्तु क्या है,और इसका स्वाद क्या है?
मुझसे पूछा गया,पुनः
[26/06, 1:15 AM] Prbha Jain: पुनः मैने कांपती आवाज़ में जवाब दिया।मिठु।सभीको हंसी आरही थी।मिठु यानीकि नमक का स्वाद  मीठा होता है सुनकर।,,,फिर स्कूल जाने का मन नही होता था।किंतु धीरे 2 समय के अनुसार गुजराती सिख ली ,और आज मध्यप्रदेश में रहकर जब भी किसी साहित्य का भाषान्तर करना होता है तब मुझे ही याद किया जाता है।,,खैर मेहनत और लगन से सब कुछ किया जा सकता है।ये पाठ पढ़ने को मिला।आज भी गुजराती स्कूल के दिन और ऐसे किस्से याद आ जाते है।
प्रभा जैन।

पाठशाला का प्रथम दिन

वसुमती चतुर्वेदी
शाला का प्रथम दिन याद आते ही बाबूजी की छवि आँखों के सामने आ जाती है। बाबूजी स्वयं अद्यापक थे। यह यादगार घटना 1970 से की है।  वे राजस्थान में बून्दी सिटी जहां हम रहते थे, वहाँ से 10 किलोमीटर दूर एक गाँव में पढ़ाने जाया करते थे। स्कूल सड़क के किनारे था और सड़क पक्की थी।
उस दिन पहली बार मुझे उनके साथ स्कूल जाना था। माँ ने सुबह ही जल्दी उठाकर तैयार कर दिया। मेरे बस्ते में एक पुस्तक ,स्लेट और लिखने के लिए छोटी पेम रख दी।
बाबूजी ने मुझे अपनी साइकिल के आगे डंडे पर बैठाया और निकल पड़े। जुलाई का महीना था, मौसम भी अच्छा था। सड़क के आस-पास खेतों में मनोरम हरियाली फैली हुई थी। ठंडी हवा चल रही थी। जैसे ही हम  स्कूल पहुँचे। स्कूल के बच्चों ने हमे घेर लिया।  और सभी मास्टर साहब नमस्ते! कहकर अभिवादन करने लगे। बच्चे मुझे देखने लगे।
वैसे बचपन में पढ़ने में मेरी विशेष रुचि नहीं थी। बाबूजी ने मुझे अद्यापिका के साथ पहली कक्षा में भेज दिया। अद्यापिका ने मुझे स्लेट पर हिंदी वर्णमाला लिखने के लिए कहा। मैंने थोड़ा बहुत लिखा और पेम नाक में डालने लगी और पेम नाक में चली गई। मैं घबरा गई । अद्यापिका ने कोशिश की मुझे कहने लगी झटके से साँस बाहर छोड़ो । मैं भी प्रयत्न करने लगी। बाबूजी भी आ गए, सभी बच्चे एकत्रित हो गए कुछ तो दौड़कर अपने पिताजी आदि को बुला लाए। मैं  भी बच्ची थी कभी साँस अंदर ले लेती तो पेम अंदर चली जाती। 10-15 मिनट तक यह सब  चलता रहा। उस समय मुझे जोर जोर से  सांस बाहर छुड़वाई गई। इस तरह अनजाने में ही कपालभाति कर  पेम बाहर आई और सबने चैन की साँस ली।  आज भी उस घटना को याद कर हंसी आ जाती है।
वसुमति चतुर्वेदी
इंदौर

Monday, June 24, 2019

पाठशाला की यादे

अचला गुप्ता
मैं उन दिनों तीसरी कक्षा में पढ़ती थी।वार्षिक परीक्षा में मुझे प्रथम स्थान मिला था।उन्ही दिनों पापा का स्थानांतरण नागपूर हो गया।हम भिलाई से नागपूर चले आए।
लेकिन प्रथम स्थान के बावजूद मुझे नागपूर के अच्छे स्कूलों में एडमिशन नही मिल रहा था।सभी पुनः तीसरी कक्षा में ही एडमिशन की बात कह रहे थे ,जिससे पापा बहुत परेशान हो गए।घर के पास ही एक सरकारी स्कूल था।पापा ने जब वहां बात की तो वे चौथी कक्षा में एडमिशन देने को तैयार थे।फिर निर्णय लेते हुए पापा ने मुझे वहीं दाखिल किया और इस तरह अपना साल बचाया मैंने।पांचवीं कक्षा में मुझे नागपुर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में एडमिशन मिला जहां से मैंने दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की।लेकिन नागपुर का वह पहला स्कूल मैं कभी नही भूल पाऊँगी ,जहां से मैंने मराठी भाषा को सीखना शुरू किया था।

अचला गुप्ता
इंदौर

शाला का प्रथम दिन

🌸🌸मेरा प्राथमिक शाला का प्रथम 🌸🌸
—————//————
कुसुम सोगानी
दिवस कितनी ..कितनी ssssssपुरानी🏠
बात हो गई । पर मेरे लिये स्कूल का वो पहला दिन आज नया है।याद भी है ।
मेरे पिताजी नगर के समृद्ध व्यक्तियों में बडे कारोबारी थे
व उन्हें व्यापार धंधे से कम समय मिलता था । हम छह भाई बहन थे पर परवरिश में उन्होंने कोई कसर नहीँ छोड़ी थी , क्योंकि हमारी माँ का अल्पायु में ही स्वर्गवास हो गया था इसलिये उन पर दोहरी जबाब दारी थी।
जब मैं पाँच वर्ष की हुयी उन्होंने नगर की सरकारी कन्या शाला में
जो उस समय श्रेष्ठ तम थी ।उसमें
दाख़िला करवाने के लिये
घर के बुजुर्ग गृह सेवक व ड्राइवर
के साथ मुझे स्कूल नाम लिखाने भेजा।
स्कूल में प्रधानाचार्य जी ने रजिस्टर में दर्ज किया ..जन्म तारीख़ —तो हमारे अल्ला रखा मुस्लिम ड्राईवर ने बताया
१- जुलाई ..
क्योंकि उस दिन १- जुलाई थी
पिता का नाम—
नामसुनकर उन्होंने पूछा - बच्ची का नाम-
अल्लारखा ने बताया
“कुलसूम “जैन
चूंकी मैडम परिचित थीं वो चौंकी
उन्होंने मुझसे पूछा - बेटा नाम बताओ — मैने कहा ..बडी मुन्नी
क्योंकि पहले स्कूल में एडमिशन तक मुख्य नाम रखा ही नही जाता
था।
उनको समझ आ गई वम्रे पहले ही मेरे परिवार केबडे पिताजी की लडकी का नाम लिखाया गया था
कुसुम पाटनी
तो मेरा नाम भी उन्होंने लिखा
कुसुम पाटनी
जो मुझे आज तक पसंद नहीं आया। पर क़िस्सा बहुत पसंद है
कुसुम सोगानी का शालेय प्रथम दिवस
व नामकरण अंत दिवस तक रहेगा😊😊
संस्मरण —..कुसुम सोगानी

Sunday, June 23, 2019

हमारा विचार



प्रदीप बहराइची
विषय - मीडिया द्वारा हिन्दी का प्रचार- प्रसार।

हिन्दी हमारी राजभाषा है और बहुभाषी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा भी है। राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त करने के लिए संघर्षरत हिन्दी के प्रचार प्रसार में आज मीडिया की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो चुकी है।
आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया दोनों माध्यम हिन्दी के लिए काफी हद तक सहायक साबित हो रहे हैं। भारत में सबसे अधिक पढ़े जाने वाला समाचार पत्र हो या सबसे अधिक देखा जाने वाला न्यूज चैनल हो, दोनों ही माध्यम में हिन्दी का एक छत्र राज है। हालांकि सरकारी लिखा पढ़ी के माध्यम में हिन्दी अभी पीछे है, फिर भी सरकार की मंशा यदि हिन्दी भाषा के प्रोत्साहन व विस्तार के लिए रही तो निश्चित ही सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेगा।
  आज सोशल मीडिया भी हिन्दी के प्रचार प्रसार में योगदान दे रहा है। हम लोग स्वयं ये आह्वान करते हैं कि हिन्दी भाषी सोशल मीडिया पर संदेश अधिकांशतः हिन्दी में ही भेजे और परिवार में हिन्दी के अधिकाधिक इस्तेमाल का माहौल बनाएं, जिससे हमारे बच्चे राजभाषा के महत्व को समझ सके और योगदान दे सकें।'जय हिंद -जय हिंदी' नारा तभी सार्थक हो सकेगा।

                 *प्रदीप बहराइची*
                बड़कागांव ,पयागपुर
                 जन- बहराइच उ.प्र.

हिंदी भाषा को अपनाएं



बोधीराम साहू
 *हिंद देश के निवासी हिंदी राष्ट्रभाषा है।*
 *हिंदी पर है गर्व हमें हिंदी पर अभिलाषा है।*
 *आओ सब हिंदी पढ़े बोले इस का मान बढ़ाएं।*
 *जहां भी जाएं वहां पर हिंदी भाषा को अपनाएं।*
 *बढ़ते अंग्रेजी के दौर पर हरगिज नहीं घबराना।*
 *हिंदी तो माथे की बिंदी है बस यही सब को समझाना।*
 *हिंदी का हो खूब प्रचार-प्रसार इसकी महत्ता बढ़ाना।*
 *हिंद देश के निवासी हिंदी को ही अपनाना।*
 *हिंदी को व्यवहार में लाकर अपनापन इसको दे जाना।*
 *हिंदी बोलो पढ़ो लिखो यही सभी को बतलाना।*
 *चाहे पत्रिका न्यूज़ चैनल हो हिंदी में बात समझाना।*
 *हिंदी का बोलबाला हो अंग्रेजी  नही अपनाना।*
*आओ हम सब मिलकर हिंदी को अपनाना।*
 *हिंदी का हर पल करें जतन हिंदी में ही पत्राचार कर जाना।*
 *हिंदी से करें प्यार हम हिंदी का हर पल मान बढ़ाना।*
*हिंदी के लिए हर जगह जन जागृति हो बस यही कहना है।*
 *जय हिंद जय भारती सब मिल बोलो हिंदी की है आरती।*
 *यदा-कदा जहां-तहां हर जगह कुर्बान हो हिंदी है भारती।*

_बोधीराम साहू* *सोनल भवन साहू* *चाल पुराना चंदनिया पारा जांजगीर जिला जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़* 495668
मो- *8319277182*
    *9425541664*

बारिश का पानी

💧💦🌧💧💦🌧💧
शशिकला
💦💧बूंदो की पड़ी फुहार, रिमझिम सा बरसता वो बारिश का पानी
💦💧तनमन को भिंगोने आँगन में टपकता टिप टिप वो बारिश का पानी
💦💧मेरे मन की उम्मीदों को खुशियों से भर जाता वो बारिश का पानी
💦💧कागज की किश्ती बना फिर से बचपन लौटाया वो बारिश का पानी
💦💧रिमझिम सी झड़ियाँ लगाते ठंडी हवाओं का झोंका दे जाता वो बारिश का पानी
💦💧मन मयूर सा नाच उठता मधुर संगीत छेड़ता वो बारिश का पानी
💦💧गरज गरज कर बरसाते हुए धरा की प्यास बुझाता वो बारिश का पानी
💦💧हरी भरी धरती को हरियाली में सँवारता वो बारिश का पानी
💦💧खेतों में बीज लगाने फसल उगाने उपज बढ़ाने आया वो बारिश का पानी
💦💧गर्म पकौड़े संग अदरक वाली चाय पिलाने आ गया वो बारिश का पानी
💦💧बूंदो की बौछार पड़ी तो झरनों से बरसता वो बारिश का पानी
*मानसून सत्र की पहली बारिश के लिए लिखी गई *वो बारिश का पानी*
*शशिकला व्यास*
*भोपाल मध्यप्रदेश*
💦💦🌧💦💦⛈💦💦🌩💦💧🌨💦💧⛈💦💧🌧☔ हैप्पी मानसून ☔🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈

बरसात



स्वाति सिंग

बरसात मौन है
आखिर जिम्मेदार कौन है?
नदिया शांत हैं
आखिर किसका योगदान है
वृक्ष मुरझा रहे
आखिर क्या है गुनगुना रहे
जंगल में बरसी आग है
आखिर किसकी ये सौगात है
चातक प्यासा है
मिट्टी है उदास
आखिर कौन समझे, कौन दे इनको आस
पेड़ों की मस्ती में है सूनापन
अब कश्ती मौन है उसमे भी न है अपनापन
माटी की तपन बुझने को है आतुर
आखिर कौन आग लगाकर है अब निरातुर
ऊपर देखते हैं सब कि नीचे वो बरसेंगे कब
आयेंगे वो कब और छाएंगे कब
कब कब ...
कब पशु पक्षी गीत सुनाएंगे
कब बच्चे कश्ती बहाएंगे
कब बारिश में वो नहाएंगे
कब खेत हरे लहराएंगे
कब नदियां कलकल गाएंगी
कब हम फिर से खुशहाली पाएंगे
कब प्रकृति के लुत्फ उठायेंगे
जब जब ....
जब प्रकृति को श्रृंगार बनाएंगे।।।

डॉ स्वाति सिंह
७९९९९४३२२१

नीला नीला गगन

अचला गुप्ता

हरी भरी वसुंधरा ,नीला नीला ये गगन.... इस सुमधुर गीत में पर्यावरण की सुंदरता और चित्रकार सृष्टि निर्माता का बेहतरीन वर्णन है। कल कल बहती नदियां ,ऊंचे पर्वत शिखर ,वन ,बाग बगीचे हमारी धरोहर हैं जो प्रकृति प्रदत्त हैं।लेकिन आधुनिकता और शहरीकरण की दौड़ में हम इनकी उपस्थिति को ही अनदेखा कर रहे हैं।छायादार वृक्षों की कटाई कर कांक्रीट की बस्तियां बढाई जा रही हैं।आगे बढ़ने की चाह ने हमे मानो विचारविहीन कर दिया है।
हमारा बचपन मे बारिश में भीगना ,कागज की नाव बना कर बहते पानी मे तैरना ,संगी साथियों को बारिश के पानी की तरफ धकेलना ये सब मानो अब कल्पनातीत हो गया है।हमारी वर्तमान और अगली पीढ़ी इन खूबसूरत अनुभवों से वंचित सी होती जा रही है।
अब समय आ गया है कि हम प्रकृति के संरक्षण का जिम्मा उठाएं।इसके लिए हमे ही पहल करनी होगी ,युवाओं और बच्चों के मन मे प्रकृति प्रेम का अलख जगाना होगा।वृक्षारोपण  के लिए उन्हें प्रेरित करना होगा ।
लुप्त होते पक्षियों की रक्षा के लिए भी यह बेहद आवश्यक है।
यदि हम थोड़ा सा भी प्रयास इस दिशा में करें तो वो दिन दूर नही जब हमारी अगली पीढियां भी ये गीत गुनगुनाएँगी ,हरी भरी वसुंधरा ,नीला नीला ये गगन....

अचला गुप्ता
इंदौर

Saturday, June 22, 2019

अमृता प्रीतम की रचना



पूनम शर्मा
अपने पूरे होश-ओ-हवास में
लिख रही हूँ आज... मैं
वसीयत ..अपनी
मेरे मरने के बाद
खंगालना.. मेरा कमरा
टटोलना.. हर एक चीज़
घर भर में ..बिन ताले के
मेरा सामान.. बिखरा पड़ा है

दे देना... मेरे खवाब
उन तमाम.. स्त्रियों को
जो किचेन से बेडरूम
तक सिमट गयी ..अपनी दुनिया में
गुम गयी हैं
वे भूल चुकी हैं सालों पहले
खवाब देखना

बाँट देना.. मेरे ठहाके
वृद्धाश्रम के.. उन बूढों में
जिनके बच्चे
अमरीका के जगमगाते शहरों में
लापता हो गए हैं

टेबल पर.. मेरे देखना
कुछ रंग पड़े होंगे
इस रंग से ..रंग देना उस बेवा की साड़ी
जिसके आदमी के खून से
बोर्डर... रंगा हुआ है
तिरंगे में लिपटकर
वो कल शाम सो गया है

आंसू मेरे दे देना
तमाम शायरों को
हर बूँद से
होगी ग़ज़ल पैदा
मेरा वादा है

मेरा मान , मेरी आबरु
उस वैश्या के नाम है
बेचती है जिस्म जो
बेटी को पढ़ाने के लिए

इस देश के एक-एक युवक को
पकड़ के
लगा देना इंजेक्शन
मेरे आक्रोश का
पड़ेगी इसकी ज़रुरत
क्रांति के दिन उन्हें

दीवानगी मेरी
हिस्से में है
उस सूफी के
निकला है जो
सब छोड़कर
खुदा की तलाश में

बस !
बाक़ी बची
मेरी ईर्ष्या
मेरा लालच
मेरा क्रोध
मेरा झूठ
मेरा स्वार्थ
तो
ऐसा करना
उन्हें मेरे संग ही जला देना...

कड़वी बहू

शिल्पा रघुवंशी


जानकी के बहु बेटे शहर में बस चुके थे लेकिन उसका गाँव छोड़ने का मन नहीं हुआ इसलिए अकेले ही रहती थी। वह रोजाना की तरह मंदिर जा कर आ रही थी। रास्ते मे उसका संतुलन बिगड़ा और गिर पड़ी।
गाँव के लोगों ने उठाया, पानी पिलाया और समझाया 'अब इस अवस्था में अकेले रहना उचित नहीं। किसी भी बेटे के पास चली जाओ।' जानकी ने भी परिस्थिति को स्वीकार कर बेटे बहुओं को ले जाने के लिए कहने हेतु फोन करने का मन बना लिया।
जानकी की तीन बहुएँ थी। एक बड़ी सविता जो आज्ञाकारी मंझली शोभग आज्ञाकारी और छोटी ममता कड़वी। जानकी अति धार्मिक थी। कोई व्रत त्यौहार आता पहले से ही तीनों बहुओं को सचेत कर देती। 'सविता' खुशी खुशी व्रत करती। शोभग भी मान जाती थी लेकिन ममता एक कान से सुनती ओर दूसरे कान से निकाल देती या विरोध पर उतर आती ।
"आप हर त्योहार पर व्रत रखवा कर उसके आनंद को कष्ट में परिवर्तित कर देती हैं।"
"तेरी जुबान लड़ाने की आदत है। कुछ व्रत तप कर ले आगे तक साथ जाएँगे।"
दोनों की किसी न किसी बात पर बहस हो जाती। गुस्से में एक दिन जानकी ने कह दिया था
"तू क्या समझती है! बुढापे में मुझे तेरी जरूरत पड़ने वाली है। तो अच्छी तरह समझ ले। सड़ जाऊँगी लेकिन तेरे पास नहीं आऊँगी।"
अब सबसे पहले उसने सविता को फोन किया
"गिर गई हूँ। आजकल कई बार ऐसा हो गया है। सोचती हूँ तुम्हारे पास ही आजाउँ।"
सविता ने कहा "नवरात्र में? अभी नहीं माँ जी। नंगे पाँव रह रही हूं आजकल। किसी का छुआ भी नहीं खाती।"
शोभाग को भी फोन किया लेकिन उसने भी बहाना कर टाल दिया।
जब सविता और शोभाग ही टाल चुकी तो ममता को फोन करने का कोई फायदा नहीं था और अहम अभी टूटा था लेकिन खत्म नहीं हुआ था। फोन पर हाथ रख आने वाले कठिन समय की कल्पना करने लगी थी। तभी फोन की घण्टी बजी। आवाज़ से ही समझ गई थी ममता  है
"माँ जी गिर गये ना? आपने तो बताया नहीं लेकिन मैंने भी जासूस छोड़ रखे हैं। पोते को भेज रही हूँ लेने।"
सासु -"क्या तुझे मेरे शब्द याद नहीं?"
ममता -"जिंदगी भर नहीं भूलूँगी। आपने कहा था सड़ जाऊँगी तो भी तेरे पास नहीं आऊँगी। तभी मैंने व्रत ले लिया था इस बुढ़िया को सड़ने नहीं देना है। मेरा तप अब शुरू होगा।" क्योंकि  मुझे मेरी माँ ने यह शिक्षा दी थी कि बुढापे में सास , ससुर की ही सबसे बड़ा महाव्रत ओर महातप है ।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻

🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷

इक्छा

*भगवान से माँगना नहीं चाहिए और अगर माँगना ही है तो माँगना आना चाहिए।*

*प्रहलादजी ने भगवान से माँगा: "हे प्रभु मैं यह माँगता हूँ कि मेरी माँगने की इच्छा ही ख़त्म हो जाए।"*

*माँ कुंती ने भगवान से माँगा: "हे प्रभु मुझे बार बार विपत्ति दो ताकि आपका स्मरण होता रहे।"*

*महाराज पृथु ने भगवान से माँगा: "हे प्रभु मुझे दस हज़ार कान दीजिये ताकि में आपकी पावन लीला गुणानुवाद का अधिक से अधिक रसास्वादन कर सकूँ।"*

 *सुग्रीवजी तो बड़ा ही सुंदर कहते हैं: "अब प्रभु कृपा करो एही भाँती।सब तजि भजन करौं दिन राती॥"*

*बाली तो एक क़दम आगे चला मरते समय परमात्मा से बात करते हुए कहता है कि " अब नाथ करि करुणा बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहिं जोनि जन्मो कर्म बस तहँ राम पद अनरागऊ यह तनय मम सम बिनय बल कल्याण पद प्रभु लीजिए । गहि बाहँ सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिए ।।"*

*भगवान से माँगना दोष नहीं मगर साथ में क्या माँगना ये होश जरूर रहे।*


*जय जय श्रीराधे* 🌹🙏🏼🌹

Friday, June 21, 2019

क्रांति मेघवाल जी के आथित्य में

विशेष संवाददाता : मध्यप्रदेश / इन्दौर : युवा कलमकार कान्तिलाल मेघवाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दसवीं बार " इंटरनेशनल हिंदीं कॉन्फ्रेंस में इन्दौर में हुए सम्मानित। मुख्य अतिथि के नाते की शिरकत।                         मध्यप्रदेश  / इन्दौर :  युवा कलमकार कान्तिलाल मेघवाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दसवीं बार " इंटरनेशनल हिन्दी कॉन्फ्रेंस " में इन्दौर में हुए सम्मानित।                      अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों में शुमार जालोर जिले के उर्जावान एवं सक्रि

य पत्रकार उम्मेदाबाद के कान्तिलाल मेघवाल को मध्यप्रदेश राज्य के इन्दौर स्थित बॉम्बे हॉस्पिटल के पास स्थित होटल मंगल रीजेंसी में इंटरनेशनल हिन्दी कॉन्फ्रेंस में शुभ संकल्प समूह के तत्वावधान में उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर दसवीं बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर " इंटरनेशनल हिन्दी कॉन्फ्रेंस " में कानून के ज्ञाताओं की केप , मोमेन्टो, प्रशस्ति पत्र एवं प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। मेघवाल ने इस अंतर्राष्ट्रीय स्तर के  सम्मान समारोह में एक मुख्य अतिथि के नाते प्रमुख रूप से शिरकत की।  जिसमें देशभर सहित विदेशों से 50 वरिष्ठ पत्रकारों एवं कवियों , साहित्यकारों को भी उनके क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर सम्मानित किया गया । जिसमें सम्पूर्ण राजस्थान से एकमात्र युवा कलमकार एवं अंतर्राष्ट्रीय कलमकारों में शुमार जालोर के उभरते हुए उर्जावान एवं सक्रिय उम्मेदाबाद के कांतिलाल मेघवाल ने मुख्य अतिथि के नाते कार्यक्रम में बखुबी भूमिका निभाई । मुख्य अतिथि मेघवाल ने कई कवियों , कवियत्रियों , साहित्यकारों को मोमेन्टो, प्रशस्ति पत्र एवं प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। उन्होंने इंटरनेशनल हिन्दी कॉन्फ्रेंस कार्यक्रम में एक मुख्य  अतिथि के नाते कार्यक्रम में शिरकत की।  मेघवाल मात्र 25 वर्ष की उम्र में दस बार राष्ट्रीय अवार्डों से एवं दस बार अन्तर्राष्ट्रीय अवार्डों से नवाजे जा चुके  हैं।  वहीं मेघवाल ने मुख्य अतिथि के नाते कार्यक्रम में शिरकत की। मेघवाल के लिए खुशियों के पल।।    मेघवाल को डॉ अलका सिंह , डॉ कृष्णा अग्निहोत्री , डॉ लतिका खानवलकर , डॉ मीनाक्षी स्वामी , शीतल राय , नेपाल से दीपा थापा , वरिष्ठ पत्रकार सुनिता श्रीवास्तव इन्दौर सहित कई कवियों एवं साहित्यकारों ने मोमेन्टो , प्रमाण पत्र एवं प्रशस्ति पत्र देकर कई कवियों एवं साहित्यकारों के द्वारा सहित कई समाजसेवियों के द्वारा नवाजा गया। मेघवाल मीडिया के क्षेत्र में जालोर जिले ही नहीं अपितु सम्पूर्ण राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे भारत देश सहित विदेशों में भी वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार हैं । मेघवाल देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी सुनिन्दा पत्रकारों में शुमार हैं । यह जानकारी वरिष्ठ पत्रकार सुनीता श्रीवास्तव इन्दौर ने दी। मेघवाल के इसी उपलब्धि पर उनके समाजबंधुओं , पत्रकारों एवं परिवार में खुशी की लहर हैं। मेघवाल के इसी उपलब्धि पर सोशल मीडिया के माध्यम से बधाइयां देने का तांता लगा हुआ हैं ।

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