Sunday, July 28, 2019

एक कविता यह भी



सुरों मे शब्द भर दो ,
भाव का मकरंद भर दो,
एक दिव्यानंद भर दो ।
शब्द जिसमें तथ्य हो ,
समूचे अनुभवों का ,
शब्द हो मेरे उन कहकहों का
जो दर्द की अनुभूतियों
में थे लगायें पर आँखों से जो अश्क बनकर बह न पाये। ।
अरे पगली शब्द लेकर क्या करोगी,
खुद पढो़गी या धरोगी ।
गुन गुनाओगी इन्हें एक
रागिनी में  ,
साथ लेकर सोये रहोगी
यामिनी में ,
जिसकी तुमको है आस,
शबद हर्गिज़ नहीं कहेगें वह कहानी ।
जो कहता है इन नयनों का पानी ।
    मनोरमा जोशी ।

राखी



माँ  दीदी राखी पर आ रही हैं  , क्या सौरभ ने माँ से पूछा  माँ ने  कहाँ हा । फोन आया था उसका  माँ दीदी को पता नहीं चलना चाहिए की मेरी नौकरी छुट गई हैं।
 हम लोग किस परेशानी से गुजर रहे है। उसे दुःख होगा ,लीला भी परेशान सौरभ की नौकरी छुटे दो महीने हो गये।
सौरभ  सोच रहा था , क्या करु दीदी बच्चे  आरहे हैं । कैसे क्या करुंगा पैसे है नहीं  ।इन्टरव्यू देकर आया हूँ पर कुछ खबर नहीं रात भर सोचता रहा ।
 दो दिन बचे है , पर कहते हैं ना भाई बहन का रिश्ता नाडी से जुडा होता हैं ।  बहन  को जैसे सब पता चल गया हो । पति ने किराना रखा था । बच्चों  ने सामान के साथ वो भी रख दिया आटो मे और वो किराना के सामान भाई के घर आगया। जब सामान उतारा तो देखा किराने का सामान भी आ गया ।बहन ने कहाँ माँ अब कहाँ ले जाउगी यहीं रहने दो ,  छोटे भाई के लिए बहन की तरफसे तोफा और बहन के साथ ही खुश खबरी भी इन्टरव्यू दिया था जवाब आगया । राखी का त्यौहार खुशी से मना कर बहन अपने घर
सब ठीक हुआँ
 चारुमित्रा नागर

Saturday, July 20, 2019

भारतीय पशुमाता औऱ सदस्यों की अनुभूति

भारतीय पशुमाता और समूह सदस्यों की लेखनी
गौमाता की महिमा तो शब्दों में  कहना मुश्किल है।गाय को गौ माता ऐसे ही नहीं कहा गया है ।अभी भी मां जब नवजात शिशु को दूध नहीं  पिला पाती तो चिकित्सक गाय का दूध पिलाने की कहते हैं । मेरी खुद की जान दो बार गाय के दूध से बची है। बचपन में  ठीक एक साल बाद ही मेरे भाई का जन्म हुआ इसलिए मुझे गाय के दूध सेही पाला गया। मुझे माता जी का दूध नहीं के बराबर ही मिला । दूसरी बार जब मैं  अपने मामा के बेटा हुआ तो संभालने गईं मामी को तो वे सब्जी में  सरसों का तेल उपयोग में लाती थीं । एक महीने तक मैंने वही खाया करीब तीन साल तक मैं मिर्ची नही खा पाई। पूरे शरीर में  जलन और खुजली ।ऐसे में मेरा विवाह हुआ और सुराल में दो गाएं थीं ।उनका दूध अमृत साबित हुआ क्योंकि वह शीतल व पाचक होता है ।जय गौ माता की ।
पहले कच्चे घर होते थे और घरों में गाय के गोबर से  लिपाई होती थी ।दीवारें भी गोपर से लीपते थे । विज्ञान ने सिद्ध किया कि गोबर एंटी बायोटिक रिच मिनरल्स से  भरपूर होता है जो सौर विकिरण को रोकता है । हिंदू धर्म में स्थान की शुद्धि के लिये गौमूत्र छिड़का जाता है । यह क ई बिहारियों में  भी काम आता है और बहुत से  इसका बिमारी में पान करते हैं । यह बाइल म्यूकस को और हार्ट की बिमारी मे भी काम आता है ।।गाय के गोबर के कंडे औरमघी से हवन किया जाए तो वातावरण के किटाणुओं को समाप्त करता है । गाय पर रोज हाथ फेरने से  हाई बी पी कम होता है
श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सत्संग मे एक ने यही बात पूछी कि आजकल घर छोटे हैं और गाय नहीं पाल सकते तथा रोटी देने के लिए भी गाय नही दिखती तो क्या करें ॽ महाराजी ने कहा कि किसी गौशाला मे दान कर दें राशि या कुछ लोग समूह बना कर गौशाला बनाएं और सेवादार रख दे मिल कर देखभाल के लिए ताकि बूढ़ी गायों की भी सेवा हो सके । 
सही मे प्रगति के इस दौर में हमने अपने प्राचीन मूल्य खोए है । गायों को कसाईयों के हवाले किया जाता है ।गाय पालने का तो प्रश्न ही नहीं है ।कब हम अपनी धर्म और संस्कृति का महत्व समझेंगे । कीउपेक्षा क्योंॽ 
नीति अग्निहोत्री
गाय हमारा परिवार भी
🐂🐂🌺🌺....🌺🌺.....

 ?आपने कभी सुना या देखा
कि गायें बक़ायदा ड्राइंग रूम से 
प्रवेश कर अपने निवास याने 
तथाकथित गाय भैंस के कोठे में जाकर विश्राम लें। 
       हाँ मैंने देखा व रोज़ देखा है,
बहुत सालों पहले - मेरे मायके में गाय भैंस रखी जाती थीं फ़ैमिली मेंबर की तरह...
असल में बंगले के चारों तरफ़ 
मे से एक ओर गाय भैंस का बाड़ा 
बाड़ा  दूसरी तरफ़ कुँआ व चारों तरफ़ बग़ीचा था ।
गायें अनजाने में पेड़ या हरी सब्ज़ी की पत्तियाँ व मक्का आदि न खायें इस चक्कर में पिताजी 
उन्हें घर के अंदर से बुलवाते थे जबकि बाहर से भी रास्ता था 
उन्हें पानी छान कर ही पिलवाया जाता था।
उनके खाने के बड़े घमेले होते थे 
जिनमें बचा खाना दिया जाता था।
पिताजी ने शुरु से गाय मूक प्राणी है ये बताया पर हमारी कितनी जीवनोपयोगी है बताया।
गाय को रोटी फेंक कर नहीं हाथों से खिलाने की कोशिश करना चाहिये बताया।
येपशुधन है , इसका सम्मान करना चाहिये , सब बातें उन्होंने घुट्टी में ही पिला दी थीं। 
गाय पे निबंध या लेख लिखना आसान है पर गाय उचित तरीक़े से पालना साधारण बात नहीं 
पर उन्होंने हमें सब सिखाया । 
मुझे गर्व है कि शादी के समय मुझे गाय का दूध दुहना 
कंडे थोपना गाय की प्रसव पीड़ा पर लापसी बनाना व बछड़ा या या बछिया जन्म के बाद गाय को हरीरा बना कर देना आताथा। 
गाय के नवजात बच्चे को बाँस से बोतल नुमा कर दूध भी पिलाया है। रोज़ गायों को भी णमोकार मंत्र सुनाना बताते थे।बातें हल्की फुल्की हैं पर कितने लोगों को तजुरबा मिलता है । मैं भाग्यशाली रही कि मुझे गौमाता की किंचित् मात्र सेवा करने का अवसर मिला।
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प्रेषिका:- कुसुम सोगानी
कुसुम सोगानी
माँ ने कहाँ बेटा गाय को रोटी तो दे आ आज  दादाजी का श्राद्ध है और पहली रोटी पर तो गौ माता का ही हक है । 36 करोड देवता उनके शरीर में है गाय को माता कह कर पुकारा जाता हैं ।माँ समझा रही बेटा बडे ध्यान से सुन रहा था ।बोला माँ गाय तो है नहीं नगरपालिका वालों ने गाय को बाहर छोड दिया और कुत्ते गली में घूम रहे जिसे पालना  चाहिए उसका कत्ल हो रहा और जिससे डर हैं खतरनाक जानवर कुत्ते पाले जारहे । जो काट ले तो पेट मैं इन्जेक्शन लगते है पर सब उल्टा हो रहा है।
चारुमित्रा नागर


चरुमित्रा नागर
[20/07, 7:56 PM] +91 89895 04551: 🙏🏻 हे निर्दयी कसाइयों,मुझे मत मारो🙏🏻
मैं हूँ तुम्हारी भोली गैय्य्या जिसको जग पुकारता भोली भाली मैय्या
सदियों से पूजन,अर्चन कर  खिलाते तुम रोज रोटियां
मैं भी अपने बच्चे के हिस्सेका
दूध पिला देती तुम को भैय्या
चतुर्थ काल मे तो होते थे एक किशन कन्हैय्या
पंचम काल मे कँहा गए वो गोप गोपियाँ
🤔😭भक्ति कर भाव भासित होववेसा होगया जग का निष्ट्ठुर रवैय्या
प्रभा जैन
देखसुन,दिल रोवे,भक्त का भैय्या
मुझ भोली भालीका कसूर क्या
मैं तो देती हर दम जिंदगी को निधियां
कँहा गए वो कृष्ण गोपिय सद्बुद्धि दो उन क्रूर कसाइयों को,जिनको दिखता सिर्फ रुपैय्या
हाथ जोड़ नमन करती प्रभा मैं
सद्बुद्धि दो उन हत्त्यारोंको
गौ माता को पूजनीय माता समजो,नहीं बचोगे उन नरकों के डरावने दुखों से।
आओ हर जीवों को खुद सम समजो,,महावीर प्रभुका " जियो और जीने दो" का संदेश  फैलाएं।सुखी रहे हर जीव जग में ऐसी सुख की घड़ियां लाये।🙏🏻😊🐂
स्वरचित : प्रभा जैन।19 जुलाई 2019

गऊ बनाम माँ


       
जैसा कि हम बचपन से ही पढ़ते आ रहे हैं।कि गाय हमारी माता हैं।आज के बदलते परिवेश में हमारी पूज्यनीय गाय का निदंनीय ओर अवैध कारोबार खूब फलफूल रहा है।गाय हमे कितने प्राकृतिक उपहार देती है।हम यह सब भूल गए हैं।देशी गाय का दूध हमे कई बीमारियो से बचाता है।प्राचीन काल मे गाय के गोबर से घर लीपने के कुछ सैद्धान्तिक कारण थे।गाय के गोबर से लिपे घरों मे कीड़े-मकोड़े ओर सर्प का प्रवेश वर्जित माना जाता था।आज भी बीहड़ गाँवो में जहाँ गौ पालन होता है।वहां सुख,सम्रद्धि,सम्पदा पलती हैं।गाय जीवनदायिनी है। हर किसान के घर मे एक गाय तो आज भी देखने को  मिलती है।गाय बिना किसान अधूरा है। प्राकृतिक चिकित्सा में देशी गाय के घी,गोबर,मूत्र से अनेक कठिन बीमारियों के उपचार  किये जाते है।देशी गाय की होती लुप्तता से हमारी धरती को भी नुकसान पहुँच रहा है।गाय के गोबर से धरती में उर्वरक क्षमता बढ़ती हैं।हमे गाय को बचाकर पर्यावरण बचने  में मदद करनी चाहिए।
   वन्दना पुणतांबेकर

भारतीय नारी के सुहागिन का चिन्ह बिछिया

भा
रतीय नारी का पारम्परीक गहना-- बिछिया
  सदियों से भारतीय नारी के पारम्परीक गहने प्रसिद्ध रहे हैं।
भारतीय धर्म के अनुसार ये गहने सर्वप्रथम दैवी, माता ने धारण किये।
पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती ने बिंदी, चूड़ी, हार, पायल, बिछुड़ी को धारण किया और उसे धरती पर भारतवर्ष में नारी सम्मान का प्रतीक बनाया।
सुंदरता और बुद्धिमता , ज्ञान और तेज को परिभाषित करते गहनों में बिछिया को भी नारी ने म त्वपूर्ण गहना मानकर धारण किया।
चूड़ी, बिंदी और पायल की तरहा सुहागन स्त्री का प्रमुख सुहाग बिछिया बन गया।
नारी पायल के साथ साथ पैरों की उंगलियों को दो दो तीन तीन बिछिया से संवारने लगी।
शादि में मांग भरने और मंगलसूत्र पहनाने के साथ साथ पति बिछिया भी पत्नि के पैरों में पहनाकर आव्हान करता है कि--" हे नारी तुम लक्ष्मी की तरहा मपायल और बिछिया धारणकर मेरे घर में प्रवेश करो और भेरे घर को धनधान्य करो।"
  पायल के साथ बिछिया भी शुभ प्रतीक मानी गयी।
इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी रहे।
बिछिया तीनों ऊंगलियों में पहनने से -- ह्दय, पेट और पैर की घुटनों से सम्बनाधित बीमारी नहीं होती है।
चांदी का इस्तेमाल इसलिये किया गया है। चांदी की ड़ंड़ी का नसों में दबाव पड़ते ही तीनों ऊंगलियों से सम्बन्धित शरीर के हर अंग में उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और औरत स्वस्थ रहती है।
जिंदगी भर शारीरिक कार्य - खाना बनाना, झाड़ू पोंछा, बरतन कपड़े धोना सब कार्य के लिये वो स्वस्थ रहती है और घर को स्वर्ग बनाती है।
यही कारण है कि---
छोटी सी बिछीया बड़ा सा गहना बनकर पैरों में इठलाती है।
सुंदरता का प्रमाण बन जाती है।
नारी को लुभाती है। तरहा तरहा के सुंदर सुंदर नक्काशियों में गढी जाती है।
    सुषमा व्यास 'राजनिधि'

दूध -धारा

विषय
गौ माता

हाँ माना है माँ तुमने मुझे,
और मैंने जीया है ,
इक विश्वास से यह।
तुम्हारी एक आवाज़ से जब,
बहने लगती थी,
 दूध की धारा मुझमें ।
मैंने तुम्हें माना था ,
बछड़े जैसा अपना।
ओर तुमने किया था,
जननी सा लाड़ मुझे।
पर सवाल मेरे मन में अब,
आते जाते नश्तर चुभोता है,
क्यों मुझको ही तुमने अपने ,
दर पर आने से रोका है ।
समय का चक्र जैसे है चला,
मैं ही दर दर भटकने लगी।
कहाँ मैं मुरली की तीनों। सी थी,
और अब हूँ डर की विधा बनी।
क्यों मेरे बछड़े की सूनी आंखें,
तेरी आँखों को नीर से न भरे।
जब वो भूख है तड़पता,
कैसे तेरे गले से निवाला उतरे ?
फिर जब भी मेरे भीतर की माँ,
लाड़ उसे करना चाहे,
तब तुझे उस पर यूँ ही,
अपने बालक सा लाड़ 
न आ पाए ?
जब भी खींच कर ले जाते है,
दूध की बजाए चमड़ी लेने को,
सूनी आंखें चीत्कार लगाती है,
मत ले जाओ ए मानव,
कुछ दिन मुझे अभी जीने दो।
दूध दिया है मैंने तुझको,
माँस न अपना दे पाऊँगी।
मेरे पीछे मेरे भोले बछड़े को,
बेसहारा कैसे छोड़ पाऊँगी ?
पर तू कभी सुन पाया,
मौन की इन सिसकियों  को।
मैं आज भी तेरे बाज़ारों में,
सामान की तरह बिकती हूँ ।
और खूंखार समय के हाथों,
तड़प तड़प कर रोज़ मरती हूँ ।
मैं अपने लिए कुछ न चाहूँ,
बस विनती करती हूँ तुमसे यह।
मेरे बछड़े को वो जीवन देना ,
जो जी न सकी तेरी होकर मैं।
क्या आटे का एक पेड़ा,
ओर गोवर्धन की गोबर पूजा।
मेरा आस्तितव क्या यही रहा,
क्या तूने मुझे इसलिए पूजा?
मैं तड़प रही हूँ जीने को,
एक अहसास को पीने को।
कि तू कभी हे मानव, 
वो धुन मुरली की छेड़ेगा ।
जिसमें झूमेगी तेरी मानवता,
और मेरा मन आकाश सा झूमेगा।
हाँ आशीर्वाद है मेरा तुझको,
तू सच में मानव बन दिखलाना,
मैं नीर गाय बनने तेरी,
ओर प्रेम से मुझको सहलाना।

स्वरिचत
आदित सिंह भदौरिया।

बिछिया का आकर्षण


जब धरती पर स्त्री और पुरुष का अवतरण हुआ तो स्त्री की कोमलता और पुरुष के पुष्ट शरीर की पहचान की उलझन हुई। पुरुष सौन्दर्य का आकांक्षी बना। स्त्री लावण्य की मूर्ति बनी। धरती पर प्रकृति ने जो भी सिरजा पुरुष ने उससे स्त्री के सौन्दर्य को निखारा। धरती का हरा भरा सुकुमार रुप स्त्री के मानस रुप का सिंगार बनी। यही तो अद्भुत है। नारी के भाव संसार के विस्तार में  सोना चाँदी हीरे मोती सबके सब अपनी अमूल्यत्ता को समर्पित करने लगे। यदि कुछ मूल्यवान था तो वह था नारी रुप का समग्र सौन्दर्य जो आभूषण की उपरामता पाकर द्विगुणित हो जाता है।
स्त्री के सौन्दर्य को बढाने में जिस तरह लावण्य और सुडौल देह का महत्व है उसी प्रकार उसके नख से शिख तक के श्रृंगार उसके रुप सौन्दर्य में चार चांद लगा देते हैं। स्त्री के सौन्दर्य में उसकी देह भाषा इठलाना, शर्माना, लज्जा उसके सौन्दर्य के वैभव को बढा देती है। इस नख शिख श्रृंगार में बिछिया की मधुर और मन्द स्वर ध्वनि  रुप के समग्र संसार को स्पन्दित कर देती है।
   संझा के गीत में गाया जाता है -छोटी सी गाडी लुडकती जाये।
जेमे बैठी संझा बाई
बिछिया बजाती जाये।
चूडळो चमकाती जाये।
   विनीता रघुवंशी, हरदा

बिछिया और चुभन (लघुकथा)

सौफे पर बैठी पान चबाती सास ने झाड़ू लगाती बहू से पूछा , "क्यों री बहू ! तेरी उँगली  में बिछुए नहीं दिख रहे , 
क्यों उतारे ? अपशकुन कर दिया हमारे घर में ।तुझे मालूम है न जिंदगी में एक ही बार सुहाग के ये मंगल जेवर उतरते हैं । जब उसका पति ऊपर चला जाता है ।"
 " क्या करूँ माँजी , इन्होंने शराब के नशे में काँच का गिलास पैर पर दे  मारा  । सारी  अंगुलियाँ सूज गयी हैं । "
  " पीक फेंकते हुए , ह म्बे जरा सा ही लगा , जा बिछुआ ढीला कर पहन के आ ।"
"  न माँजी ,  घाव पर बिछुआ बहुत चुभता है । "
 मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई

बिछिया औऱ बचपन


चरुमित्रा नागर
मे छोटी थी सब औरतो को बिछीया पहने देखती तो मे भी पहन लेती मम्मी डाँट लगाती शादी  के पहले नही पहनते हैं । मे बोलती कब शादी होगी कब पहनुगी ,पैर कितने सुन्दर लगते है ।  मेरी शादी 17 साल कि उम्र हो गई ।पहले ज्यादा कुछ समझ नहीं थी । शादी शुरू हुई तो मेने यही पूछा बिछीया कब पहनायेगे
सब लोग हँसने लगे , जब फेरे हो गये तो मंगलसूत्र बिछीया  माँग भरना सारी रसमे हूई । बिछीया पहन कर मे यहीं बोली कितने सुन्दर लग रहे पैर
सुहाग हैं तो सुन्दर तो होगे ही
चारुमित्रा नागर

बिछिया और अहसास

वंदना अर्गल
बिछिया--
नारी और श्रृंगार एक दूसरे के पूरक हैं सदीयों से।सोलह श्रृंगार करना  हर नारी के मन को भाता है।शीश से नख तक नारी अनेक आभूषणों से सुसज्जित होती है।सुहाग चिन्हों में बिछीया  का अपना एक अलग अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।शादी में माँग भराई,बिछीया दबाई दो बहुत ही महत्वपूर्ण नेग माने गये हैं।दुल्हनो  को बिछीया पहने जब देखती थी बहुत ही अच्छा लगता  था। आलता लगे पाँव में पायल और बिछीया सदैव मुझे आकर्षित करते थे। बिछीया पहनना सांईटिफिकली भी सही है हमारे शरीर के प्रेशर पाँइंट दबते हैं ।जब शादी के समय  दुल्हन बन बिछीया पहनी तो  बेहद सुखद अनुभव था।आजकल माॅडर्न जमाने मे एक फैशन भी बन चुका है।लाल आलता लगे पैर हों या बिना आलता के चाँदी की बिछीया मन मोह लेती है।

बिछिया और परम्परा

बिछिया
पूनम शर्मा
हिन्दू समाज में फेरों के समय पहनाया जाता है,मेरे लिए यह बेहद सुखद अनुभव था क्योंकि हमारे यहां सुहागन होने का प्रतीक यही माना जाता है,जब मेरी शादी हुई तो तो तीन ऊंगली और अंगुंठे में बिछिया पहनाए गए , पैरों में पाजेब जिसमें बहुत सारे घुंघरू थे वो पहनाए गए थे,दुल्हन के सोलह श्रृंगार में इसका बहुत महत्व होता हैआज भी मेरे लिए इसको पहनना बहुत महत्व रखता है,मेरे लिए ये फैशन में नहीं आता है, साइंटिफिकली ये प्रूव हो चुका है इसको पहनने से स्वास्थ्य पर बहुत अच्छे प्रभाव पड़ता है

बिछिया और प्रीत की रीत



बिछिंयाँ पायल की हैं रीत
यह सुहाग का प्रतीक ।
छन छन बजती पायल ,
महकता जीवन मे संगीत
घर के बड़े बूढ़े शुभ मोहरत मे करते है रस्म ।
ईशवर के आषिश लेकर ,
प्रथम मिलन के गाते गीत
रीत रिवाजों की पूर्णता से
यह कार्य होता संपूर्ण ।
चाँदी के पायल बिछिंयाँ
मे सूर्य चँन्द्र की मिलती उर्जा  ,
यही है पोराणिक मान्यता ।
   मनोरमा जोशी ।

बिछिया और मुस्कुराहट

पायल की रुन झुन  और कंगना की खन खन गर्वित हों कहतीं,
बिछिया तुम खामोश सी पांव की
उंगलियों में क्यों पड़ी रहती?
बिछिया यह सुन मुस्काई और
शुभ्र आभा से लगी दमकने।
बोली ,बहनों ,हम सब तो हैं सुहागिनों के अनमोल गहने।
जब मैं सजती सुहागिनों के पांव
में ,हो जाती अनमोल।
स्त्रीत्व की गरिमा है मुझसे,सभी
जानते मेरा मोल।
खनक नही है तुमसी मुझमे ,
लेकिन दमक की हूँ मैं स्वामिनी।
मुझे पहन जब इठलातीं हैं ,हर
नारी लगती है कामिनी।

अचला गुप्ता
इंदौर

बिछिया बनाम पिया का अहसास


प्रभा जैन
बालिका वधू बन जब मैं 17 वर्ष की कमसिन उम्र में,विवाह कर ससुराल में आई,तब पहला सुप्रभात आज भी आंखों के सामने याद आजाता है।बारात के साथ रात्रि में ही बिदाई हो गई।देर रात पहुंच कर पहली सुप्रभात हुई ससुराल में।भरा पूरा परिवार एवम मेहमानों से खचाखच।आज भी याद आती है वो पहली सुबह जब सुप्रभातिया कि भक्तिसे सुनहरी भोर हुईं।उठकर स्नानादि से निवृत हो सबसे पहले हुआ सब महिला मेहमानो के बीच  सासूमाँ द्वारा किया गया मेरा श्रृंगार।नख से शिख तक मानो वे चाहती थीं, उनके बेटेकी नवेली दुल्हन श्रृंगारित रहे।सबसे पहला कार्यक्रम ही रखा था चूड़ा, बिछिया,पहनाने का
  ।अपने हाथों से उन्होंने सजाया था अपनी बहुरानी को।उनके शब्द थे पैर में पाय जेब पहनाते हुए।सदा सुहागन रहो, पूतो फलो।
बहुरानी  या पायजेब ,बिछिया,सुहाग की निशानी छे।कभी भी निकालजे मत। ऐकी आवाज से तो घर की रौनक छे।न मालूम पडज कि लाडी बाई यंहाज कनि काम करी रिज।शायद यह एक घर मे पुरुष वर्ग को अलर्ट करने  का तरीका हो सकता है।बिछिया,पायजेब भी घुँघरूवाले जो होते थे,,,
बिछिया पायजेब हमेशा सुहागन का ही श्रृंगार होता था जिससे पता पड़ता था कि कौन सधवा,और कौन विधवा
कुछ भी कहो ये पैरो के श्रृंगार को आज की आधुनिक महिलाओं ने तन से हटा दिया है,,,,उन्हें बेड़ी मानकर स्वतन्त्रता के दौर में ऊंची उड़ान भरना चाहती हैं।आजकी आधुनिक नारी को ये सब ढकोसले लगते हैं।किन्तु समय के साथ मैं अनुभवी,समझदार हो गई हूं,इसलिए ये जरूर  सोचती हूँ कि,,,नही हमारे पूर्वज बहुत समझदार और बुद्धिशाली थे।उनकी ज़िंदगी जीने के तरीके में हमेशा चतुराई होती थी।प्राकृतिक रूप से अपने आपको स्वस्थ रखनेका तरीका उनके पास था।अर्थात उदाहरण के रूप में भारी भरकम गहनों को ही लें।जो एक्यूप्रेशर का काम करतेथे।पैरो की अंगुली में पहन ने वाली बिछिया,से एक्यूप्रेशर होता है जो महिला सम्बन्धी माहवारी,प्रग्नेंसी आदि परिस्तिथि के लिए लाभदायी होती है।हमारे पैरो में पहने जाने वाले गहने महिला के अच्छे स्वास्थ्य ,कमर,घुटने,पेट आदि रोगों के सुधार में एक्यूप्रेशर के सहायक होकर काया को निरोगी बनाते हैं।
आज की  आधुनिक बच्चियों से मेरा यही कहना है कि हम पुरानी पीढ़ी की  दादी नानी,सासुजी के विचारों को अपने हित मे मानते हुए  सकारात्मक सोच रखें।ये ना सोचे,कहें,की ये सब तो ढकोसले हैं।
सचमुच में मुझे आज भी याद आती है मेरी वो प्यारी 2 सासूमाँ, जो अपने बेटे की लंबी  उम्र की कामना करते हुए  वर्ष में चार बार,दिवाली, दशेरा, पर्युषण, सुहाग दशमी पर नई नई डिज़ाइन की पायजेब बिछिया की जोड़ लाकर पहनाती थी।शायद उन के दिए गए उन आशीर्वाद से ही मैं अपने भरे पूरे परिवारके साथ स्वस्थ,और खुश हूँ।
   अंत मे यही कहूंगी
सासुमाँ के सबसे प्रथम प्यारेसे उपहार बिछिया  ने ही एक स्नेहिल पिया दिया,या ये कहो कि प्यारे पिया ने ही बिछिया से श्रृंगारित किया।🙏🏻
स्वरचित,:प्रभा जैन।19 जुलाई 2019

Friday, July 19, 2019

संस्मरण नीरज


नीति अग्निहोत्री
नीरज जी से मैं भी बहुत प्रभावित रही ।देवास के मीना बाजार में हर साल कवि सम्मेलन होता था जिसमे वे  आते थे  और पिताजी हमें कवि सम्मेलन में ले जाते थे । मेरी प्रारंभिक कविताओं में उनका कुछ असर भी रहा है । नीरज जी वाकई  साहित्यकाश मे एक अलग ही खुशबू और रंग  रखते हैं जो दुर्लभ ही है । उनका कविता बोलने का लहजा शब्दों का प्रभाव  और महत्व दुगना कर देता था । आज उनका काव्य संग्रह फिर दीप जलेगा मेरे हाथों में है और इसमें  उनकी पहली कविता की पहली पंक्ति है ं एक दिन भी जी मगर तू ताज बन कर जी ं अटल विश्वास बन कर जी ं अमर विश्वास बन कर जी।सही में  वे कविताओं के मस्तक का ताज बन कर जिए और हमें लुभा कर चले  गये ।उनकी कविताओं का दार्शनिक पक्ष भी सशक्त रहा।उनकी जिजीविषा देखिए ं दिये से  मिटेगा न मन का अंधेरा ं धरा को उठाओ ं गगन को झुकाओ। अंत में यही कहूंगी ऐसी  आत्माएं यदा कदा ही धरती पर आती हैं और दिलो दिमाग पर छा जाती हैं । सादर नमन।

नीरज औऱ यादे

कुसुम सोगानी
नीरज जी से मैं इतनी प्रभावित थी
कि स्कूल कालेज में हमेशा उनकी कविता ही पढ़ती व सुनाया करती थी।
एक बार मुझेउनके हाथों सम्मानित होने का मौका भी मिला था । सालों साल हो गये
मुझे उनके साहित्यिक नाम काम
इतना पसंद था कि मैने  अपने भतीजे का नाम स्कूल में नीरज रखवाया व घर में गोपालदास बोला करते थे।😊😄
मेरे मायके की पूरी फ़ैमिली उनसे प्रभावित व उनकी किताबें
ख़रीदा करती थी।

ऑडिशन






टोफ़ी’ नाम सुनते ही मन में मिठास आजाती है , ‘Hunarsfox ki TOFI’  नाम से बनाई जा रही short फ़िल्म के audition कल Hunarsfox Academy Campus-2 में हुए.
जहाँ बच्चों ने अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित किया.
वैसे तो टोफ़ी की spelling Toffee होती है मगर इस फ़िल्म में Toffee की जगह TOFI लिखा गया है जिसके पीछे फ़िल्म की कहनी छुपी हुई है साथ ही एक सकारात्मक संदेश
संकल्प श्रीवास्तव
भी है ।
‘Hunarsfox की TOFI’ नाम से बन रही फ़िल्म के writer director संकल्प श्रीवास्तव है .

इस फ़िल्म को गंगा production house ओर Hunarsfox के संयोजन से बनाया जाएगा ।
संकल्प श्रीवास्तव गंगा production house के producer भी है जिन्होंने 2014 में feature फ़िल्म ‘जय सिंह अरे बार रे ‘ का निर्माण किया था जो Indore के multiplex में लगी थी ओर 14 फ़िल्में एक साथ release हुई थीं ओर उनमें सबसे शानदार occupancy दिखायी थी ।
‘Hunarsfox की TOFI’ में एक theme सोंग रहेगा जिसकी तैयारियाँ अभी चल रही है .
ये audition दो भागो में होने है एक बच्चों के लियें एक बड़ो के लिये । बच्चों के audition हो गये है अब बड़ो के होना बाक़ी है ।
Audition में selection के लियें संकल्प श्रीवास्तव ने बताया की फ़िल्म की कहनी बच्चों के इर्द गिर्द ही घुमती है जिसमें ख़ूब सारे बच्चें लगेंगे इस लिए Hunarsfox की कोशिश है के audition दे रहें सभी बच्चों को शामिल किया जायें , जिससे बच्चों को प्रोत्साहन मिलेगा साथ ही आगे ओर अच्छा करने का सार्थक संदेश भी मिलेगा ।
‘Hunarsfox की TOFI ‘ की कहानी inspirational है जिसे देख कर ये संदेश जाएगा की समय कितना भी ख़राब क्यू ना हों अपनी सोच ओर positivity के दम पर दुनिया जीती जा सकती है , जो मुश्किल आने पर भी हार ना माने कोशिश कारता रहे बार-बार लगातार वही है “HUNARSFOX” !
जिन बच्चों ने audition में अपने हुनर से सबका दिल जीत लिया वो है इशनी,महक,ईशान,भव्य,मिश्ति,श्रिजन,नियति,अग्रिम,आनेरी,अनिरुध,दरवांक,कनिका,समर,सिद्धान्त,नीलांश,तेजस,आर्यन.
Hunarsfox के director उपेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, Hunarsfox के CEO संकल्प श्रीवास्तव ओर She Zone beauty parlour की संस्थापक हिमानी भारद्वाज द्वारा सभी बच्चों को उनके परेंट्स के साथ प्रोत्साहन के रूप में certificate भी दिए गये ।

Thursday, July 18, 2019

यादो में नीरज

यादों में नीरज
नहीं हमारे बीच में ,  गोपाल नीरज का शरीर
साहित्य के साक्ष्य हैं , जैसे मीर कबीर

विश्व साहित्याकाश के  देदीप्यमान  नक्षत्र  मा नीरज जी को  हमारी और देश और विश्व साहित्य जगत  की  ओर से हार्दिक विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ ।
    मैं अपनी किताबों को प्रकाशित कराने के लिए मुम्बई से  अलीगढ़ गयी थी और नीरज जी से मिलने की अभिलाषा मन में भी थी । तभी   देवसंयोग से मेरी किताब ' प्रांत पर्व  पयोधि ' उन्हें मिली  और  उसमें मेरा  टेलीफोन नम्बर भी था  ।  उन्होंने   मुझे  फोन कर अपने निवास स्थान पर आमंत्रित किया ।  उनसे अपनत्वपूर्ण संवाद करके ऐसा लगा कि ईश का देवदूत बन धरा   पर आएँ हैं  और मेरे मन की बात जैसे उन्होंने सुन ली हो ।
     मैं  उत्सुकता के साथ  उनसे मिलने अपने हमसफ़र के साथ शाम को उनके घर पँहुची  । साफ - सुथरा सुंदर सुसज्जित उनका बड़ा सा हॉल  था ।जहाँ वे  दो दोस्तों के साथ ताश खेल रहे थे ।  खेल जो तनावों से मुक्त रख के दिमागी कसरत है और अपने आप को व्यस्त रख के मनोरंजन का भी साधन  है । तभी मन में ख्याल आया कि विश्व विख्यात  गीत  कारवां गुजर गया -
 स्वप्न झरे  फूल  से
  मीत चुभे शूल से ।
 जैसे गीतों के रचयिता  किस तरहअपना  समय  खेल के साथ लेखन को समर्पित  कर रखा था । उनकी रचनाओं में जीवन दर्शन , प्रेम , श्रृंगार , विरह  , दर्द , देश प्रेम , देशभक्ति ,मानवता का पैगाम मिलता है । नीरज जी आजादी से पहले  दिल्ली में  सरकारी  कार्यालय में कार्यरत थे । जहाँ उन्हें ब्रिटेनिया सरकार की झूठी प्रशंसा , खूबियों के बारे में लिखना होता था ।जब  कोलकत्ता में  गए तो ब्रिटेनिया   सरकार के विरोध में नज्म लिख दी । तब सरकार इनको पकड़ने के लिए  पीछे पड़ गयी ।  तब  अपने को बचाने  के लिए छिपते - छिपाते कानपुर में आ गए । यहीं पर  कार्यरत हो गए ।
फिर एक दिन उनके मित्र चंद्रा जी मुंबई नगरी ले आए । एक कार्यक्रम में     देवानन्द जी ने उनकी नज्म सुनी तो नीरज जी कलम की तारीफ की । उन्होंने संगीतकार  आर डी बर्मन से मिलवाया ।  तो उन्होंने नीरज को रंगीला शब्द पर गीत लिखने को दिया ।
तब उन्होंने "  रंगीला रे तेरे रंग  में ......" खूब बड़ा गीत लिख दिया । बर्मन जी खूब पसंद आया । इस तरह से फिल्मों में गानों को लिखना सिलसिला चल निकला । गीतों ने कामयाबियाँ , बुलन्दी , यश तो दिया ।लेकिन नीरज जी का मुम्बई में मन  नहीं लगा । खुशियां तलाशने अलीगढ़ आ गए । तब से यहीं परिवार के साथ आकर बस गए । यहाँ उनकी तबीयत खराब रहने लगी । तब भी वे लेखन से जुड़े रहे , कवि सम्मेलनों , हिंदी कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे थे ।  आज वे 93 साल के  हैं । हमारे बीच नहीं हैं । लेकिन अपनी कृतियों साहित्य सेवाओं से हमारे साथ हैं । गीता , ओशो  के विचारों को मानने वाले नीरज जी ने देह त्यागी है ।  आत्मा यहीं भारत में बसी है ।
     मैं उनके खूबसूरत , हँसमुख सरल , सहज , विद्वत्ता , आत्मीयता से पूर्ण व्यक्तित्व  से बहुत प्रभावित हुई ।
अनओपचारिकतापूर्ण  परिवेश में चाय पीकर मेरा परिचय उनसे हुआ । प्रांत पर्व पयोधि  को देख कर मुस्कुराते हुए बोले - बिटिया  देश -प्रेम  जिस की रगों में बहता है , तन - मन समर्पित हो । वही  देश भक्ति मानवीयता का पुजारी होता है । " मेरी कृतियों  के बारे में , मेरी पांडुलिपि दीपक , सृष्टि , अल्बम आदि के बारे में संवाद चला और मेरी उन पांडुलिपियों की समीक्षा भी करके  मुझे अपनी उदारता , निस्वार्थता  , सहज , हितैषी  व्यक्तित्व का परिचय  दिया । इतने महान साहित्यकार अहम कोसो दूर था ।

पांडुलिपियों की समीक्षा कर मुझे आशीर्वाद दिया था । जो आज फल-फूल रहा है ।
 आज वे फोटो के संग अमर पल उनके सानिध्य का स्मरण कर के उनकी आत्मा को शांति मिले  ईश से हम सब  प्रार्थना करते हैं ।
   मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई

नीरज औऱ क्षणिकाएं


बारिशों से
नहीं कमतर
 जब भी बरसते हैं
 बरसते हैं जमकर ।

● इस ज़मी के कण-कण में
 नृत्य -संगीत की रवानी है
साहित्य ,गीत-प्रीत की
अद्भुत सी कहानी है।

● कुछ ज़मी, ऐसी भी कहीं
 कि सोचना पड़ता है
  कहां सांसे अटकी हैं
कि पैर  उठते ही नहीं!

●एक  है सबसे ‘मुकम्मल रंग'
  वो है ख़ुदाई का रंग
अगर उसका छिड़काव
हो जाये  तो उतरता नहीं
सभी पर यही रंग चढ़ जाये
 तो सार्थक  हो जाये
 मेरा इस पन्ने पर 
भावों के रंग उकेरना
 और सच हो जाए
" *सत्यम  शिवम  सुंदरम "*
 की सुंदर संकल्पना।

©अनुपमा अनुश्री

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Monday, July 15, 2019

बारिश



ये बारिश बडी अजीब है
अभी अनमनी सी है
कभी आती है
कभी लौट जाती है
आखिर इसे भी तो
बादलों से बिछड़ने का दुख होगा
तभी जार जार रोती है
कभी बिलखती है
पृथ्वी पर वजूद पटकती है
बाबला बादल अंधा होकर
भटक जाता है तो
बारिश मनाने चली जाती है
बादल के आग़ोश में छुप जाती है
किंतु धरती माँ के स्नेह को
भूलना नामुमकिन है
तो लौट लौट मायके
चार महीने ही तो आती है
स्वरचित:- कुसुम सोगानी

मानवीय दृष्टिकोण

इन दिनों टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले एक सीरियल के कुछ अंश
दिखाते हुए एक मूकबधिर युवा के बारे में कहा जा रहा है कि इनकी इनकमिंग और आउटगोइंग बंद है।इस बात ने मुझे विचलित कर दिया ।किसी की भी कमियों के इस तरह वर्णन बेहद शर्मनाक है।इस संदर्भ में एक घटना याद आ रही है ।हमारे कॉलेज में चुनाव प्रक्रिया चल रही थी और सभी मस्ती के मूड में भी थे।एक दिन हमने देखा कि एक छात्र लंगड़ाने का अभिनय करते हुए एक दिव्यांग छात्र के पीछे चल रहा था और उसके मित्र उसका साथ दे रहे थे।इस घटना ने मुझे व्यथित कर दिया।
तकरीबन चार महीने बाद हम क्लास में थे ।अचानक बाहर शोरगुल की आवाज और किसी के चीखने की आवाज सुन कर बाहर दौड़े तो पता चला कि उसी छात्र को कुछ लोगों ने पैर में चाकू से हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया है।बाद में भी वह पूरी तरह ठीक नही हो पाया।एक दिन कॉलेज के बरामदे में जब मैं खड़ी थी तब उसे लंगड़ाते हुए चलते देख पिछली घटना को याद करते हुए सोचने लगी कि सचमुच जो जैसा करता है ,वैसा ही भरता है।ईश्वर की नजर सभी पर है और न्याय सभी के साथ होता है चाहे देर से ही क्यों न हो।

अचला गुप्ता
इंदौर

Sunday, July 14, 2019

अथकथा-ए -धारावाहिक



"
अनुपमा अनुश्री
सुनिए ' क' नाम से ,
शुरू होने वाले 
सीरियल्स की 'अथकथा'
कहना बहुत दिनों से,
 दिल चाहता था ।
च्ईगंम की तरह खिंचते
 ये सीरियल्स
क्या ख़ूब पकाते हैं ।


वक़्त बदलता है,
जगह भी बदलती है
साल बदल जाते हैं 
पात्र भी बदल जाते हैं
लोकशंस बदल जाते हैं
देश से विदेश भी पहुंच जाते हैं
लेकिन साल दर साल 
सीन दर सीन
 'वही का वही ' वही का वही ,
  बड़ी शिद्दत से फ़िल्माते हैं
दर्शकों का धैर्य 
जम कर आज़माते हैं।
इन्हें लिखता कौन है 
हम यह सोच -सोच रह जाते हैं।

आम आदमी हिंदुस्तानी
मुश्किलों का मारा, क्या करे 
दफ़्तर से आकर थका हारा 
बैठ जाता है टी.वी के आगे बेचारा।
महिलाएं भी बनाते -बनाते कढ़ी
देखती रहती हैं इनमें  पकते 
षड्यंत्रों की खिचड़ी
बढा देती हैं मज़बूरी में टी.आर .पी।
  

क्या करे दर्शक ,अपने खाने पीने,
 उलझनें सुलझाने की फ़िक्र करे
या इनकी बैंड बज़ाने ,
 बंद करवाने का ज़िक्र करे।
ये तो फ़ायदा उठाये जा रहे हैं 
ख़ूब कमाये जा रहे हैं।
 पद है, पैसा है, ग्लैमर है, 
पात्रों को फिर भी न सुकूं ,न राहत है।


ज़माना कहां से कहां पहुंच रहा
पर इन्हें षडयंत्र ,व्यर्थ प्रपंच
 अभद्रता, बनावटीपन से प्यार है 
कोई नये विषय सूझते नहीं 
इन्हें देखना ख़ुद की और 
देश की सेहत के लिए बेकार है। 
टीवी समाज का आईना है
या टीवी - फ़िल्मों से 
बनता -बिगड़ता समाज है
इस पर शोध की दरकार है ।
सच दोस्तो ! सब जगह ताज़ी 
सुकून देती हवाओं की दरकार है।

© अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'

सोच

प्रभा जैन
सोचती हूँ,कभी कभी
ये हरे भरे पेड़,कितनी खुशनुमा ज़िन्दगी देते है सबको,,
प्राणों को ऊर्जा,हवा,पानी,मिट्टी
पेडों पर लदे फल से ,तृप्त क
र जाते भूख सबकी,चाहे मारो पत्थर ,या आरी चलादो पेड़ पर
उपकारी है वो चौपाये जानवर भी,जो घांस खाकर दे जाते दूध रूप अमृत
कभी सोचती,हम दो पायों का क्या उपकार है इस जगको?
बस इतना जरूर उपकार करना मानव,
मानवी बने रहकर,मानव नाम को ऊंचा करना
नाव ,नवीन करते हुए,मान सबका रखना
प्रकृति में प्रभुकी कृति जगत ,की जो है
हवा,पानी,मिट्टी,जीव अनेक
उपकारी बन,सब को बचाये रखना
ये उपकार हो तुम्हारा,ये विनती करते हम सब का कहना

प्रभा जैन।स्व  रचित

गुरु

मानवेन्द्र नारायणी माया 
*गुरू एक तेज है:- जिनके आते ही, सारे सन्शय के अंधकार खत्म हो जाते हैं !*

*गुरू वो मृदंग है:- जिसके बजते ही अनाहद नाद सुनने शुरू हो जाते है !*

*गुरू वो ज्ञान हैं :-जिसके मिलते ही पांचो शरीर एक हो जाते हैं !*

*गुरू वो दीक्षा है:- जो सही मायने में मिलती है तो भवसागर पार हो जाते है !*

*गुरू वो नदी है :- जो निरंतर हमारे प्राण से बहती हैं !*

*गुरू वो सत चित आनंद है:- जो हमें हमारी पहचान देता है !*

*गुरू वो अमृत है :-जिसे पीकर कोई कभी प्यासा नही रहता है !*

*गुरू वो मृदँग है :-जिसे बजाते ही सोहम नाद की झलक मिलती है !*

*गुरू वो खजाना है :-जो अनमोल है !*

*गुरू वो प्रसाद है :-जिसके भाग्य में हो, उसे कभी कुछ भी मांगने की ज़रूरत नही पड़ती हैं|*

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