Saturday, February 23, 2019

नशीला फागुन




डॉ अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
राधा चूनर रंग गई धानी
फागुन में कान्हा करे बेइमानी,
सरस सराबोर करें होली में
साजन करें मनमानी।

लिख अपना नाम साजन
गुलाबी रुमाल दे गए हाथ,
फागुनी इत्रदान याद दिलाए
पल पल पिया का साथ।

नशीला फागुन काव्य-किरण
करती अनोखी अठखेलियां,
ऋतुराज की अगवानी
फाग गीत गाती सहेलियां।

बसंत राग की रंग रागिनी
तरन्नुम में गाती गीत-गजल,
नायिका करे प्रीत -श्रृंगार
घूंघट डाल रही कोंपल।

डां अंजुल कंसल"कनुप्रिया"

Friday, February 22, 2019

स्मृति कॉलेज ऑफ़ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन इंदौर का२० वी वार्षिक उत्सव सम्पन्न

०वी युवाम वार्षिक उत्सव का समापन स्मृति कॉलेज ऑफ़ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन, इंदौर में किया गया l
स्मृति कॉलेज ऑफ़  फार्मास्यूटिकल एजुकेशन इंदौर में २० वी वार्षिक उत्सव का सफलता पूर्वक सामापन किया गया इस कार्यक्रम में सिरकत करने प्रसिद्ध फार्मास्यूटिकल सिप्ला कंपनी लिमिटेड के वाईस प्रेसिडेंट श्री आशीष ज़िटसी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए साथ ही सन् फार्माक्यूटिकल लिमिटेड के साइड क्वालिटी वीड SGD& API श्री विनय वर्मा एवं मॉडर्न  इंस्टिट्यूट के मेनेजर डायरेक्टर श्री अनिल खरया  विशिष्ट रूप से उपस्थित थे। उद्घाटन समारोह में सर्वप्रथम स्मृति कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर नीलेश मालवीय ने  पुष्प गुच्छो से  इन सभी का स्वागत किया । ततपश्चात् डॉक्टर नीलेश मालवीय ने वार्षिक रिपोर्ट सभी के सम्मुख प्रस्तुत की। श्री आशीष जिटसी ने अपने   उदबोधन में छात्रो को उत्साहित करने के लिए समय प्रबंध एवं फार्माक्षेत्र नयी तकनीको की जानकारी को प्राप्त करने की सलाह दी। श्री विनय वर्मा ने कहा इस तरह के कार्यक्रम छात्रो के सम्पूर्ण विकास में सहायक होते है। श्री अनिल खरया  जी ने कॉलेज की गतवर्षीय उपलब्धियों पर बधाई दी।
इस  दस दिवसीए  युवाम  वार्षिक उत्सव में विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं जैसे मेहंदी, रंगोली, फेस पेंटिंग ,सलाद डेकोरेशन, इंस्टेंट डिस, गायन ,नृत्य ,कब्बडी, खो- खो,  वॉलीबॉल, टग ऑफ़, वॉर ,गर्ल्स क्रिकेट, बॉयज क्रिकेट आदि  का आयोजन किया गया lइन प्रतियोगिताओ में विजयी छात्रो को ट्रॉफी सर्टिफिकेट एवं मैडल सम्मानित करने  के साथ साथ स्टूडेंट ऑफ़ दा ईयर का अवार्ड भी दिया गया!
कॉलेज  प्रबंध से श्री राहुल नाहटा एक्सिक्यूटिव चेयरमैन brnss  ग्रुप के युवाम 2019 के सफलता पूर्वक संपन्न होने पर सभी छात्र छात्राओ , शिक्षक वर्ग एवं स्टाफ को बधाई देते हुए युवाम 2019 का समापन किया।

20 वी युवाम वार्षिक उत्सव का समापन स्मृति कालेज ऑफ फॉर्मलटी कालेज द्वारा सम्पन्न

२०वी युवाम वार्षिक उत्सव का समापन स्मृति कॉलेज ऑफ़

युवाम वार्षिक उत्सव


प्रचार्य द्वारा लिखित पुस्तक का विमोचन
फार्मास्यूटिकल एजुकेशन, इंदौर में किया गया l
स्मृति कॉलेज ऑफ़  फार्मास्यूटिकल एजुकेशन इंदौर में २० वी वार्षिक उत्सव का सफलता पूर्वक सामापन किया गया इस कार्यक्रम में सिरकत करने प्रसिद्ध फार्मास्यूटिकल सिप्ला कंपनी लिमिटेड के वाईस प्रेसिडेंट श्री आशीष ज़िटसी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए साथ ही सन् फार्माक्यूटिकल लिमिटेड के साइड क्वालिटी वीड SGD& API श्री विनय वर्मा एवं मॉडर्न  इंस्टिट्यूट के मेनेजर डायरेक्टर श्री अनिल खरया  विशिष्ट रूप से उपस्थित थे। उद्घाटन समारोह में सर्वप्रथम स्मृति कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर नीलेश मालवीय ने  पुष्प गुच्छो से  इन सभी का स्वागत किया । ततपश्चात् डॉक्टर नीलेश मालवीय ने वार्षिक रिपोर्ट सभी के सम्मुख प्रस्तुत की। श्री आशीष जिटसी ने अपने   उदबोधन में छात्रो को उत्साहित करने के लिए समय प्रबंध एवं फार्माक्षेत्र नयी तकनीको की जानकारी को प्राप्त करने की सलाह दी। श्री विनय वर्मा ने कहा इस तरह के कार्यक्रम छात्रो के सम्पूर्ण विकास में सहायक होते है। श्री अनिल खरया  जी ने कॉलेज की गतवर्षीय उपलब्धियों पर बधाई दी।
इस  दस दिवसीए  युवाम  वार्षिक उत्सव में विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं जैसे मेहंदी, रंगोली, फेस पेंटिंग ,सलाद डेकोरेशन, इंस्टेंट डिस, गायन ,नृत्य ,कब्बडी, खो- खो,  वॉलीबॉल, टग ऑफ़, वॉर ,गर्ल्स क्रिकेट, बॉयज क्रिकेट आदि  का आयोजन किया गया lइन प्रतियोगिताओ में विजयी छात्रो को ट्रॉफी सर्टिफिकेट एवं मैडल सम्मानित करने  के साथ साथ स्टूडेंट ऑफ़ दा ईयर का अवार्ड भी दिया गया!
कॉलेज  प्रबंध से श्री राहुल नाहटा एक्सिक्यूटिव चेयरमैन brnss  ग्रुप के युवाम 2019 के सफलता पूर्वक संपन्न होने पर सभी छात्र छात्राओ , शिक्षक वर्ग एवं स्टाफ को बधाई देते हुए युवाम 2019 का समापन किया।

Thursday, February 21, 2019

पुष्प दिये का संवाद



श्रीमती नीति अग्निहोत्री
समीप रखे गुलाब से
दीये की कम्पित लो
एक मौन संवाद कायम
कर बैठी हैं।
जब तक तेल है दिये में
में यू ही झिलमिलाती रहूगी
या फिर किसी तेज हवा का
शिकार भी हो सकती हूं।
मुझे प्रदीप्त करने वाले हाथो को
एक विश्वास था कि
में अन्धकार से लडूंगी
उस विश्वास को बनाये रखना
 मेरे हाथों में नही था।
किन्तु गुलाब तुम्हारी नियति
तुम तो असमय  ही डाली से टूट
पूजा की थाली में बैठे हो,अभी देवता के
मस्तक पर चढ़ इठलाओगे
सच बताओ कि तुमको कैसा लगता हैं।
गुलाब एक ठंडी सॉस भरकर बोला
बहन जो हाल तुम्हारा है ,वह मेरा भी है
मैं जी भरकर माली को देख नही पाया
अब इस क्षण को ही जी पूरा जी लेना चाहता हूँ, जब मेरी सार्थकता को अनुभव
करवाने वाले देवता के मस्तक पर चढ़ जाऊँगा...।
  श्रीमती निति अग्निहोत्री
    इंदौर

कैसे मनाएंगे अब होली?



   
आशा जाकड़



कैसे मनायेंगे अब होली?
आतंकी खेल रहे खूनी होली ।

बहिनों के नेह का सूना हुआ डगर ,
कपोलों पर बहता सूख गया समन्दर ।
बिन भैया कैसे लगायेंगी माथे पे  रोली?
कैसे मनायेंगे अब होली ?

 ललनाओं के माथे का सिन्दूर मिट गया,
सारा संसार उनका अब वीरान हो गया ,
 कभी न सुनेगी अब वे प्रीतम की बोली।
कैसे मनायेंगे अब होली ?

घर का एक चिराग ही गुल हो गया ,
मातृभूमि की वेदी पर शहीद हो गया ,
घर के आँगन कैसे गूँजे अब ठिठोली ?
कैसे  मनायेंगे अब होली?

विदा दे रहे खेत,गाँव और नगर ,
जा रहे सिपाही सीमा पर हर पहर ,
बन्दूक की चल रही दनादन गोली ।
कैसे मनायेंगे अब होली  ?

अबोध बच्चे पूछेंगे कब आयेंगे तात ,
कब लायेंगे खिलौने,कब खायेगे साथ,
कृष्ण बिन अब राधा कैसे खेलेगी होली?
कैसे मनायेंगे अब होली ?
आतंकी खेल रहे खूनी होली ।।




  आशा जाकड़ ( कवयित्री )

घूघंट की लंबाई


आराधना विसावाडिया
लघुकथा
आज बरबस ही मधुरा का अपने ससुर से आमना-सामना हो गया |वह हड़बडा़हट में अपने सिर के पल्लू को खींचनें ही वाली थी कि पीछे से धक्का आया |देखा तो सासूमां खडी़ थीं |मधुरा सर पर पल्लू लो, दिखता नही है पापाजी खडे़ं
हैं |जानबूझकर सामने आ जाती हो |मधुरा कुछ बोल न सकी |
हमारे जमाने में तो एक हाथ का घूँघट होता था |घूंघट और नीचे करो |घर में ससुर हैं, जेठ हैं, कुछ तो लाज रखो |ऊपर से गांव वाले कया कहेंगे कि इतनी पढीं-लिखी बहू का कया
करेंगे |जब घूंघट में लंबाई ही नहीं?
शहर की लड़की गांव में आते ही कुछ और ही बन चुकी थी
संस्कारों के बोझ तले जुबान न खोलने की गांठ जो मां ने बांध दी थी |
एक दिन सासूमॉ ने कहा-तुमने सिलाई सीखी है न मधुरा?
जी मम्मीजी उसने कहा |चलो एक ब्लाउज सिलकर बताओ ये कपड़ा रखा  है | पहले काटो, फिर  सिलो |तुम्हारे पापा तो कह रहे थे कि लड़की को सिलाई आती है |
एक लड़की की शादी के बाद पल-पल परिछा होती है |मीठे में कया बनाना आता है ?जी मुझे कुछ भी बनाना नहीं आता
घर में छोटी थी तो मौका ही नहीं पड़ा |मन में सोचा सास भी मां की तरह ही होती है ,तो सीख लूंगी पर… .
मेरे बेटे अनुपम के लिए तो बहुत रिश्ते आ रहे थे |लाखों का
दहेज भी मिलता |यहां तो लड़कियों की लाईन लगी थी |
मधुरा नीचे बैठो, दिखता नहीं मैं नीचे बैठकर पूजा कर रही हूं, और तुम सोफे पर बैठी हो |
यदि मैं आपकी बेटी होती तब भी आप यही कहतीं, नीचे बैठो, लंबा घूँघट डालो |वाह क्या मोल-भाव किया है, एक
पढ़ी -लिखी लड़की का आपने?
शर्म तो ऑखो की होना चाहिए, न कि घूंघट की ओट की |
बडो़ं की इज्जत घूंघट व सिर ढकनें से होती है तो क्या पुरूष
कभी किसी की इज्जत नहीं करते? ऐसा घूंघट मेरे किसी काम का नहीं |यह मुझे आगे बढ़ने से रोकता है| गुलामी की
जंजीर में बांधता है |
द्वारा -आराधना विसावाडिया
इंदौर



वंदना अर्गल
जागृति
नारी की असमिता पर आज
पडा़ खतरा है,
आदमी को देखो आज
फिर हैवानियत पर उतरा है,
मानवीय संवेदना शूनय हुई,
दुषप़वतियो और दुशचरित की सघन घटाऐ छाई हैं,
मानवता आज फिर
सहमी और  सकुचाई है।
नारी को तुम दुबँल ना समझो
नारी अब न अबला है,
अब अब उसने भी जला ली
विदोह की पृबल जवाला है,
नारी की असमिता पर आज.....
बहुत हो चुका अब न सहेगी जुलमो को ,
एक न ई   क्राति लायेगी,
आतमबल और आतमविशवास से
भर नारीएक न ई जागृति लायेगी।
मूर्रछित हुई। वसुंधरा पर
मानवता फिरसे जगायेगी,
खोयी हुई गरिमा को पुनः वह बढा़येगी।
नारी की असमिता़.......

जाग्रति

वंदना अर्गल
महिला दिवस
---------------
नारी की असमिता पर आज
पडा़ खतरा है,
आदमी को देखो आज
फिर हैवानियत पर उतरा है,
मानवीय संवेदना शूनय हुई,
दुषप़वतियो और दुशचरित की सघन घटाऐ छाई हैं,
मानवता आज फिर
सहमी और  सकुचाई है।
नारी को तुम दुबँल ना समझो
नारी अब न अबला है,
अब अब उसने भी जला ली
विदोह की पृबल जवाला है,
नारी की असमिता पर आज.....
बहुत हो चुका अब न सहेगी जुलमो को ,
एक न ई   क्राति लायेगी,
आतमबल और आतमविशवास से
भर नारीएक न ई जागृति लायेगी।
मूर्रछित हुई। वसुंधरा पर
मानवता फिरसे जगायेगी,
खोयी हुई गरिमा को पुनः वह बढा़येगी।
नारी की असमिता़.......

Wednesday, February 20, 2019

सबल नारी


वंदना पुणेताम्रकर
( बलात्कार के बाद टूटी बालिकाओ के लिए एक सकारात्मक कविता)           


तुम एक सबल नारी हो,अबला
नही।
तुमकर सकती हो।
तुम हर परिस्थिति से लड़ सकती हो।
तुम एक बहूँ बनकर किसी परिवार को सँवार सकती हो।
 तुम सबल बन सकती हो।
जिस घर की बेटी तुम।
तुमसे घर महकता।
फिर से तुम महका सकती हो।
नारी जीवन संघर्ष भरा।
जीवन के इस ताने,बाने को।
 तुम बुन सकती हो।
वीरांगनाएं हुई अनेक।
तुमको भी कुछ करना होगा।
आँचल की छीनी हुई लाज को। तुमको हीअब ढ़कना होगा।
तुम ढक सकती हो।
तुम फिर खड़ी हो सकती हो।
ये वक्त नही सिसकियों में घुटने का।
ये वक्त हैं,सशक्त सबल बनने का। तुम बन सकती हो।
धैर्य की मिसाल तुम।
अब भी अधिकारों से लड़ सकती हो।
छल,धोखा,अविश्वास से छली गई हो।
उठो अब भी इन बाजीगरों की बाजी पलट सकती हो।
चेतन चंचल मन तेरा।
दर्द भरा यह तन तेरा।
हर चेहरे पर मुस्कुराहट।
तुम भर सकती हो।
पुरुष प्रधान समाज मे,तुम छली गई एक नारी हो।
जब जिसने जैसा देखा,तुम उस जाल में फसी फुलवारी हो।
तुम फिर खिल सकती हो।
दाग लगे इस दामन कोअब धोना होगा।
उठो अब नई दिशा में तुमको चलना होगा।
तुम चल सकती हो।
बुझी चिंगारी भी आग रखती।उठो अब नई रोशनी से इस जीवन को रोशन करना होगा।
तुम जीवन मे रोशनी भर सकती हो।
 तुम कर सकती हो।
         वन्दना पुणतांबेकर
                इंदौर

फागुन की चौपाल

मनोरमा जोशी


होली उत्सव प्रीत का ,
 यह रंगों  का बाजार ,
निशदिन फागुन प्रीत  ,
के नये पढ़ाये  पाठ ।
अखियों ही अखियों ,
हुऐं रंगों के संकेत  ,
रह रह कर महके 
रात भर कस्तूरी के खेत ।
 प्रीत महावर की तरह ,
 इसके न्यारे  है रंग ,
बतियाती पायल हँसे ,
हँसे  ऐड़ियाँ  संग ।
 रंगों  वाले  आईने ,
 भूलें  सभी  गुमान  ,
जो भीगें वो  जानता ,
फागुन  की  मुस्कान ।
दोहे  ठुमरी  सखियां ,
फाग  अभंग  ख्याल ,
मोसम  करता रतजगा ,
फागुन की चौपाल  ।
    
   मनोरमा जोशी 

नवेली बहू कि पहली होली








नवेली बहू की पहली होली ( लघुकथा )

' काश इन रंगों में मिलावट न होती बुदबुदाते रंजन ने रंजना के गाल  पर मरहम लगाते सहलाने में मगन हो गया ! '
गुजिया ,नमकीन , मिठाई , शक्करपारे आदि पकवानों की महक से सेठ उमेश का बंगला  ' उमा निकेतन ' महक रहा था। पसीना पोंछके सेठानी उमा ने नौकरानी के हाथ सेठ जी को सारे पकवान चखाने के लिए भेजे। हमेशा की तरह सेठ जी ने उमा के स्वादिष्ट पकवानों के तारीफों के पुल बाँध दिए।

इस बार सेठ जी के बेटे रंजन बहू रंजना की शादी की पहली ,  विशेष  प्रेम के रंगीन सपनों की   होली थी। नवेली  बहू होली की रस्म जाने माता श्री के कहे अनुसार मायके से आयी मिठाई , नमकीन , बड़े - बड़े गुजे ( गुजिया ) जिनमें मावा - मेवा के साथ चांदी के सिक्के भरे थे। लाल साड़ी पहन सोलह श्रृंगार कर रंजना पूजा की तैयारी में जुट गई। सभी जने आम की लकड़ियों पर समिधा डाल हवन कर गुजे को होलिका की अग्नि में समर्पित कर ,चने की बाले भून कर यानी बुराई के अंकुर , असत्य वृति की होलिका को जला केऔर  पवित्र पंचामृत  का आचमन लेकर नयी नवेली  बहू रंजना ने सभी बड़ों के पैर छू ' दूधो नहाओ पूतो फलो ' का आशीर्वाद लिया।

दूसरी ओर मैदान में नौकर अलग - अलग बड़े कढ़ाहों में मेहँदी  , टेसू , गैंदा , गुलाब , गुलमोहर ,, गुड़हल,  हार सिंगार के फूलों को उबाल , छान के रंगींन पानी में चंदन , केवड़ा , केसर , गुलाबजल मिलाके होली खेलने के लिए प्राकृतिक फूल - पत्तों के    रंगों से  भीना - भीना सुगन्धित रंगीन पानी  तैयार करने में जुटे हुए थे। कुदरती  रंगों की ,  गुलाल की भीनी - भीनी खुशबू आने - जाने वालों को, परिवेश को महका रही थी।
बच्चे ,रिश्तेदार , पड़ोसी , दोस्त ,दुश्मन भी भेदभाव , ऊँच - नीच ,अमीरी - गरीबी ,  मनमुटाव को  मिटा के एक दूसरे पर कुदरती रंगों के गुलाल , रंगीन सुगंधित धारों की प्रेम फुहारों से जमकर मस्ती से बौछारें कर रहे थे , साथ में पकवानों का आनंद ले रहे थे।
मधुरता - सरसता , समरसता की होली खेल सभी अपने घर चले गए । तभी रंजन - रंजना  उत्साहित कदमों से अपने हमउम्र दोस्तों के घर  लाल ,नीले , पीले हर्बल रंगों पाउडर की थैलियाँ ले के पहली  होली खेलने गए , तो रास्तों में रसायनिक रंगों की बौछारें , गुब्बारों की मार खाते , बचते - बचाते कैसे तैसे पहुंचे। दोस्तों ने एक दूसरे को होली की शुभ कामना दे गले लगाकर रंग लगाए। तभी रंजना के गुलाबी गाल पर मिलावटी रंगों से जलने लगे और एलर्जी से दाने - दाने उभर आए।

 रंग में भंग हो गया।

ये मिलावटी , हानिकारक  नकली रंग होली मिलन को  विकृत कर रहे थे।
' काश इन रंगों में मिलावट न होती बुदबुदाते हुए रंजन ने रंजना के गाल पर मरहम लगाते सहलाने में मगन हो गया ! '


नाम : मंजु गुप्तावेली बहू की पहली होली ( लघुकथा )

' काश इन रंगों में मिलावट न होती बुदबुदाते रंजन ने रंजना के गाल  पर मरहम लगाते सहलाने में मगन हो गया ! '
गुजिया ,नमकीन , मिठाई , शक्करपारे आदि पकवानों की महक से सेठ उमेश का बंगला  ' उमा निकेतन ' महक रहा था। पसीना पोंछके सेठानी उमा ने नौकरानी के हाथ सेठ जी को सारे पकवान चखाने के लिए भेजे। हमेशा की तरह सेठ जी ने उमा के स्वादिष्ट पकवानों के तारीफों के पुल बाँध दिए।

इस बार सेठ जी के बेटे रंजन बहू रंजना की शादी की पहली ,  विशेष  प्रेम के रंगीन सपनों की   होली थी। नवेली  बहू होली की रस्म जाने माता श्री के कहे अनुसार मायके से आयी मिठाई , नमकीन , बड़े - बड़े गुजे ( गुजिया ) जिनमें मावा - मेवा के साथ चांदी के सिक्के भरे थे। लाल साड़ी पहन सोलह श्रृंगार कर रंजना पूजा की तैयारी में जुट गई। सभी जने आम की लकड़ियों पर समिधा डाल हवन कर गुजे को होलिका की अग्नि में समर्पित कर ,चने की बाले भून कर यानी बुराई के अंकुर , असत्य वृति की होलिका को जला केऔर  पवित्र पंचामृत  का आचमन लेकर नयी नवेली  बहू रंजना ने सभी बड़ों के पैर छू ' दूधो नहाओ पूतो फलो ' का आशीर्वाद लिया।

दूसरी ओर मैदान में नौकर अलग - अलग बड़े कढ़ाहों में मेहँदी  , टेसू , गैंदा , गुलाब , गुलमोहर ,, गुड़हल,  हार सिंगार के फूलों को उबाल , छान के रंगींन पानी में चंदन , केवड़ा , केसर , गुलाबजल मिलाके होली खेलने के लिए प्राकृतिक फूल - पत्तों के    रंगों से  भीना - भीना सुगन्धित रंगीन पानी  तैयार करने में जुटे हुए थे। कुदरती  रंगों की ,  गुलाल की भीनी - भीनी खुशबू आने - जाने वालों को, परिवेश को महका रही थी।
बच्चे ,रिश्तेदार , पड़ोसी , दोस्त ,दुश्मन भी भेदभाव , ऊँच - नीच ,अमीरी - गरीबी ,  मनमुटाव को  मिटा के एक दूसरे पर कुदरती रंगों के गुलाल , रंगीन सुगंधित धारों की प्रेम फुहारों से जमकर मस्ती से बौछारें कर रहे थे , साथ में पकवानों का आनंद ले रहे थे।
मधुरता - सरसता , समरसता की होली खेल सभी अपने घर चले गए । तभी रंजन - रंजना  उत्साहित कदमों से अपने हमउम्र दोस्तों के घर  लाल ,नीले , पीले हर्बल रंगों पाउडर की थैलियाँ ले के पहली  होली खेलने गए , तो रास्तों में रसायनिक रंगों की बौछारें , गुब्बारों की मार खाते , बचते - बचाते कैसे तैसे पहुंचे। दोस्तों ने एक दूसरे को होली की शुभ कामना दे गले लगाकर रंग लगाए। तभी रंजना के गुलाबी गाल पर मिलावटी रंगों से जलने लगे और एलर्जी से दाने - दाने उभर आए।

 रंग में भंग हो गया।

ये मिलावटी , हानिकारक  नकली रंग होली मिलन को  विकृत कर रहे थे।
' काश इन रंगों में मिलावट न होती बुदबुदाते हुए रंजन ने रंजना के गाल पर मरहम लगाते सहलाने में मगन हो गया ! '


नाम : मंजु गुप्ता

होली आई रे

नम्रता सरन सोना


अबीर गुलाल उड़े छटा में
महके टेसू पलास
इन्द्रधनुषी रंगों में
खिल रहा मधुमास ,,

रंगने को आतुर प्रियतम
गौरी के व्याकुल प्राण
कैसे रहे दूर पिया से
निश्छल नैनों के बाण ,,,

बूँद बूँद घुल रहा रंग
प्रेम भरी नांद में
प्रीत का गुलाल है
अंग भरा उन्माद में ,,,,

छिटक छिटक रंग मुख से
दहक दहक अंग अंग
सरक सरक चुनरिया गोरी
रंगने लगी पी के रंग,,,

खेलो आज ऐसा फागुन
तन मन हो समर्पण
तन से तन को रंग लगे
मन हो मन को अर्पण ,,,,

*नम्रता सरन “सोना”*
अबीर गुलाल उड़े छटा में
महके टेसू पलास
इन्द्रधनुषी रंगों में
खिल रहा मधुमास ,,

रंगने को आतुर प्रियतम
गौरी के व्याकुल प्राण
कैसे रहे दूर पिया से
निश्छल नैनों के बाण ,,,

बूँद बूँद घुल रहा रंग
प्रेम भरी नांद में
प्रीत का गुलाल है
अंग भरा उन्माद में ,,,,

छिटक छिटक रंग मुख से
दहक दहक अंग अंग
सरक सरक चुनरिया गोरी
रंगने लगी पी के रंग,,,

खेलो आज ऐसा फागुन
तन मन हो समर्पण
तन से तन को रंग लगे
मन हो मन को अर्पण ,,,,


*नम्रता सरन “सोना”*

आटे का दीया

सुश्री स्वाति सिंह
आज तो मैं.. आज मैं... बस अब नहीं | विशाल बहुत ज्यादा परेशान था आखिर उसे रहा नहीं गया और एक दिन उसने छत पर चढ़कर आवाज सुनने की कोशिश की| यह जानने की कि आखिर उन लोगों को गरिमा से क्या परेशानी है| उसने दरवाजे से कई बार झाँकने की कोशिश भी की पर उसे ठीक तरह से कुछ समझ में नहीं आया| हाँ पर यह पक्का था कि यह गरिमा की ही रोने की आवाज़ थी| अब तो उस तरफ से आने वाली हर आवाज़ जैसे उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थी | एक दिन जब सुबह से कोई आवाज़ नहीं आयी तो विशाल और भी ज्यादा बैचैन हो गया| तभी उसका ध्यान बाहर सड़क पर गया| गरिमा मंदिर जा रही थी वह शेविंग आधी छोड़कर बाहर सड़क पर आ गया और गरिमा के पीछे पीछे चलने लगा और मौका पाते ही बोला 'क्यों इतना सहन कर रही हो?' 'छोड़ क्यों नहीं देतीं?' 'मैं तुम्हारा साथ दूंगा|' गरिमा बोली 'मैं हाँथ जोड़ती हूँ तुम चले जाओ यहाँ से |' वह बोला एक बार सोच  ...  गरिमा रुंधे हुए गले से बीच में ही बोली - 'घर के अंदर तो कम से कम ज़िंदगी चलती रहेगी | तुम्हें पता है एक औरत की ज़िंदगी आटे के दिए की तरह होती है | अगर ठिकाने नहीं लग पायी तो घर के अंदर उसे चूहे कुतर कर खा लेते हैं और बाहर उसे कौवे नोंच लेते हैं...

Sunday, February 10, 2019

वसंत पंचमी पर शुभसँकल्प समूह द्वारा रचनात्मक कार्यक्रम

संत पंचमी पर शुभसँकल्प समूह द्वारा रचनात्मक कार्यक्रम आयोजित किया गया .इस कार्यक्रम में ग्रामसेवा समिति का संचालक श्री अर्पण जेन ,साहित्यकार श्रीमती शिखा जेन ,सावित्री चेरीबल ट्रस्ट की डारेक्टर डॉ अर्चना श्रीवास्तव ,शुभसँकल्प पत्रिका के एडवाइजर श्री उपेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने दीपक प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम श्री गणेश किया ।इस अवसर पर अर्पण जेन ने कहा कि हम अपने ऑफिशियल और ड्यूटी करते हुए हिंदी को अपनाए ,शिखा जेन ने कहा कि हम कम से कम हिंदी में हस्ताक्षर तो कर ही सकते हैं तो हिंदी में हस्ताक्षर करो के अभियान में सहयोग दे ,डॉ अर्चना श्रीवास्तव ने कहा कि वसंत पँचमी बहारो का संदेश लेकर आई है तो हम कुछ नई योजनाओं की शुरुआत करें।


शुभसँकल्प पत्रिका की संपादक डॉ सुनीता श्रीवास्तव ने कार्यक्रम और समूह की जानकारी देते हुये कहा कि हम अंतिम पंक्ति के लोगो को भी आगे ले ,उन्होंने  शुभसँकल्प वसंत पंचमी संग्रह की विवेचना करते हुये कहा कि आज के डिजिटल युग में लेखको को ढेर सी चुनोतियो का सामना करते हुये आगे बढ़ना है ।इस अवसर पर शुभसँकल्प चित्रांश समूह द्वारा  अर्पण शिखा जी को चित्रगुप्त सम्मान से सम्मानित किया गया ।इस अवसर पर श्रीमती स्वाति जैन ,श्रीमती अचला गुप्ता ,श्रीमती मनोरमा जोशी ,श्रीमती विभा ,डॉ अंजुल कंसल , आदि ने वसंत पंचमी पर अपनी रचनाओं के द्वारा समा बाँध दिया ,उपेंद्र श्रीवास्तव ने बासुरी वादन किया ,इस अवसर पर दौड़ प्रतियोगिता के खिलाड़ियों को भी पुरुस्कृत किया गया ।प्रथम ,विकास , राहुल ,वासु ने फूल मालाओं से अथितियों का सम्मान किया
आभार प्रर्दशन डॉ सुनीता श्रीवास्तव ने किया।

Friday, February 8, 2019

तिरंगा

मंजू कंसल
तिरंगा झंडा लहराये नीलाम्बरम्
मधुर राष्ट्रगान गाएं वंदेमातरम्

याद आती वीरों की कुर्बानी
आजाद भगत सिंह की जवानी
होठों पर थिरक रही बार बार
आजादी के दीवानों की कहानी।

केसरिया रंग है बलिदानी
हरित से हर्षित हरियाली
श्वेत शान्ति सत्य जुबानी
नीलचक्र न्याय की निशानी।

शीश कटाने तैयार बंधु साथी
सीमा पर डटे सैनिक वरदानी
मां बहन अक्षत कुंकुम थाली सजाई
गणतंत्र पर्व अभिनंदन,स्वीकारो बधाई।

मंजू कंसल

स्वागत बसंत


चेतना भाटी
फूल खिले , भँवरे डोले
तितली बोली

बसंत आया - बसंत आया 
 
कोयल कूकी , मन हर्षाया
बसंत आया - बसंत आया 

मस्तानी पवन चली
अनुराग - पराग बिखराया
आम बौराया
बसंत आया - बसंत आया



फूले पलाश , कचनार शरमाया 
बसंत आया - बसंत आया

अमलतास के झूमर झूमे
गुलमोहर गुदगुदाया - गुलगुलाया
बसंत आया - बसंत आया

चेतना भाटी

प्रेम का उत्सव

श्रीमती अचला गुप्ता 
धुर कूक गूंजे कोयल की ,
मंद चले शीतल पुरवाई।

प्रेम का उत्सव साथ मे अपने 
लेकर ऋतु वसंत है आई।

हरी भरी सी वसुंधरा है,
गीत मृदंग बजाते मन मे।

सुंदर पुष्प बिखेरें खुशबू ,
चहचहाते पंछी वन में।



धरा के हाथों में सृष्टि ने 
मानो मेहंदी आज रचाई।

प्रेम का उत्सव साथ मे अपने ,
लेकर ऋतु वसंत है आई ।

श्रीमती अचला गुप्ता 

आखिरी पत्र-पुत्र के नाम

नम्रता सरन " सोना"
मैं डटा हूँ सीमा पर
जान लड़ा दूँगा....
अपना देश बचाने को
रक्त की हर बूंद बहा दूंगा....
माटी की रक्षा के खातिर
अगर मिट जाए मेरी हस्ती....
तो मेरे  बेटे तुम
सीमा पर बसाना नई बस्ती....
डट जाना सीमा पर
जान हथेली पर रख कर....
मिटा देना वज़ूद उनका
देखे जो हिंद को घूर कर...

हम वीर सपूत
भारत माता के....
हमसे मत टकराना
मिट्टी में मिला देंगे....
एक जवान सौ के बराबर
दुश्मन को दिखला देंगे....

तेरी गोद न खाली होगी
ये कहना मेरी माँ से....
मांग न तेरी उजड़ेगी 
ये कहना तेरी माँ से...
शहीद कहाँ मरता कहीं
वो अजर हो जाता है....
ध्रुव तारे सा चमकता
वो अमर हो जाता है...

मेरे बेटे कमर कस ले
अब तुझको सीमा पर आना है....
सीने पर खाई है गोली मैंने
मुझको रुखसत पर जाना है...

कह दे मेरी माँ से
बेटे ने कसम निभाई है...
कह दे तेरी माँ से
अब तूने कसम उठाई है.....

ये देश है वीर जवानों का
देश के खातिर मिटने को हर युवा तैयार खड़ा...
किसमें ताकत है जो भारत माता का छू ले आँचल...
मिटा देंगे हस्ती उसकी,,चाटेगा धूल औंधे मुंह पड़ा पड़ा....

जयहिंद... वंदे मातरम

नम्रता सरन " सोना"

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