मेरी शादी १८ वर्ष की उम्र में ही हो गई थी । मैने अपना पहला वोट
इंदौर ससुराल में ही डाला।
तब वोट पत्र में फोटो नहीं दिखाये जाते थे। जिस दिन वोटिंग थी ,
मैं मेरी दादी सासुजी के साथ
वोट डालने गई । तब थोड़ा सा घूँघट भी होता था।
जंहा वोट डालना थावंहा हमारे परिवार से सारे ही परिचित थे।
जब मेरा नंबर आया तब हमारेही परिचित व संबंधी जिन्होंने न मुझे देखा था न मैने उन्हें , ये कह कर रुकवा दिया कि ये अपनी जिठानी के नाम पर वोट डाल रही है ।मेरी जिठानी पीहर जयपुर गई थीं।मेरी दादी सासुजी दबंग औरत थीं वो सबसे उचित तर्क
व लड़ झगड़ कर मुझे बिना वोट डाले लेकर आगईं।
यद्यपि सब बाद में माफ़ी माँगने वबहुत मनुहार के साथ लेने पुन: पुन: आये पर नउनहोने भेजा न मैं गई क्योंकि बात अहम की थी।
पर फिर मेरे ससुर जी ने सच्चाई साबित करने व मौका हाथ से न जाने देने का निर्णय लिया व अंतिम समय होते होते वोट डलवाया ।पोलिटिकली दुश्मनी निकालने को उस कथित शख़्स ने चालबाज़ी करी ,
जबकि मैं स्वयं के नाम पर गई थी। मेरे पति नागपुर में पढ़ते थे उस समय।
परंतु कुछ वर्ष बाद जब मैं उस शख़्स को जानने लगी तो मुझे अनायास उस व्यक्ति से नफ़रत हो गई व चाहकर भी मैं उसे माफ़ नहीं कर पाई क्योंकि सुसराल की किसी ख़ास मौक़े पर जो पाँच साल में एक बार आता है ,उसने मेरा अपमान कियाथा।झूठा बताकर....
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लेखिका:- कुसुम सोगानी

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