शीर्षक - " हिंदी को बचाओ "🙏
अंग्रेजी के चलन से विलुप्त हो रही हैं,
हिंदी मातृभाषा से आम हो रही हैं। 🌹
सोच दिन व दिन बदल रही हैं,
हिंदी में बात करने में तौहीन हो रही हैं l🌹
बच्चों को हिंदी के अंक समझ नहीं आते हैं,
अपने ही कोर्स की किताब नहीं पढ पाते l🌹
विदेशी हमारी भाषा को सिख रहे हैं,
हम बेवकूफ बन उनकी भाषा अपना रहे हैं l🌹
गुड मॉर्निंग की जगह सुप्रभात नहीं बोलते,
अपनी दिन को शुरुआत ही नक़ल से करते l🌹
सभ्यता संस्कृति दर्शाती हैँ हिंदी
भारत कि आन और शान हैँ हिंदी 🌹
महादेवी जी, हरिवंश रॉय कि याद दिलाती हैँ
हिंदी से जब उनकी रचना भाव दर्शाती हैँ। 🌹
कबीर,रहीम के दोहे जब दो लाइन मैं पड़ते हैँ,
जीवन कि सच्चाई से हम रूबरू होते हैँ। 🌹
बदलो चाहे जितना पर अपनी पहचान ना खोने दो,
अपना लो मात्र भाषा हिंदी को विलुप्त न होने दो ll🙏🌹
* प्रेरणा सेन्द्रे
कानपुर नगर, उत्तरप्रदेश
विधा-नवगीत
विषय-*जीवन का आधार हिंदी*
मेरे जीवन का आधार है हिंदी,
भारत मां की आवाज है हिंदी,
हिंदू, मुस्लिम,ईसाई या हो सिंधी,
सबकी प्यारी भाषा होती है हिंदी।
हिंदी भाषा प्रेम का गागर है,
हमारी संस्कृतियों का सागर है,
प्राचीन संस्कृति को हमें बचाना है,
हिंदी को विश्व पटल पर लाना है।
बावन अक्षरों का योग है हिंदी,
संधि समास का संयोग है हिंदी
भारत माता की बिंदिया है हिंदी,
भारत की गौरव की गाथा में है हिंदी,
रामचरितमानस की भाषा है हिंदी,
कबीर रहीम तुलसी की कविता है हिंदी,
'ओम'कवियों की प्रियभाषा होती है हिंदी
भारत की प्यारी राष्ट्रभाषा भी है हिंदी।।
*ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम कानपुर नगर उत्तरप्रदेश
🍁🍁 बंधन 🍁🍁
बंधन तो बंधन होते है l
संबंधों का वंदन है l
माँ का मान बढाती है l
उस वीर वधू का वंदन है l
संस्कारों कि पहनकर माला,
जोड़ा दो परिवारों को l
अपने स्नेह से सिंचित कर,
सुरभित किया घर आँगन को l
मेहंदी हाथों में सजी है,
नयन स्वप्न लीन है l
स्वयं को श्रंगारित करती,
वीर की प्रतीक्षारत रहती l
वीर वधू का वंदन है l
उस वीर वधू का वंदन है l
माँ का मान बढाती है l
उस वीर वधू का वंदन है l
*रेखा दवे, विशाखा
बापू की राह पर चलकर,
हम जीना सीख गये,
जो वचन था ,
उसे निभाना सीख गये,
मौन की ताकत जब जाने,
जीवन को बदलना सीख गये,
शब्दों का मुल्य क्या है,
वक्त ने हमें सिखाया,
बापू की राह पर चलकर,
मंजिल को पाना सीख गये,
इरादों को मजबूत बनाकर, चट्टानों को हिलाना सीख गये,
इस ताकत को जब जाना,
जीवन को जीना सीख गये,
वक़्त ने चुनोतियाँ दी,
चुनोतियों से टकराना सीख गये,
बापू की राह पर चलकर,
हम जीना सीख गये।
*कल्पना ओसवाल
फिर आओ महात्मा गांधी
चल रही है झूठ हिंसा अनैतिकता की आंधी।
देश को बचाने फिर से आओ महात्मा गांधी।
सत्य का सूरज अस्त हो रहा।
अहिंसा का पुजारी पस्त हो रहा।
झूठों का सिक्का देश में चल रहा।
सच्चा आदमी भूखों मर रहा
नशे की गिरफ्त में हर युवा झूम रहा।
पतन की गर्त में देश है जा रहा।
सत्य अहिंसा के इस देश में।
नाच रही हिंसा विद्रूप वेश में।
अहिंसा का पताका फिर से फहराओ।
हे!बापू जल्द ही तुम लौट आओ।
देश की कन्याएं शर्म से गड़ रही हैं।
बलात्कारियों से वो मर लड़ रही हैं।
बच न पा रही हैं सीता अहिल्या द्रोपदी।
आई चहुँ ओर दुःख विपत्ति।
बापू!कृष्ण बन कर आओ।
चिर बढ़ाकर लाज बचाओ।
फिर से सुख शांति की बंसी बजाओ।
हे!गांधी इस धरा पर स्वर्णिम युग लेकर आओ।
* डॉ. शैल चन्द्रा
।। गणेश वंदना ।।
विधा हाइकु
स्वरचित स्मिता जैन
जय गणेश
हम सबके ईश
नवाते शीश।
हे विघ्नहर्ता
रिद्धि सिद्धि के संग
लाए आनंद।
श्री गजानन
जन जन के प्यारे
आप पधारे
नया आयाम
लोकमान्य तिलक
पूजा पंडाल।
दस दिनों में
हर साल उत्साह
भीड़ अपार।
बप्पा मोरिया
हर घर में आया
धूम मचाया।
हे गणपति
करे पूजा आरती
मिले सुमति।
मोदक थाल
लेझीम ढोल ताशा
नाचे दे ताल।
आया अनंत
गणेश विसर्जन
दुखित मन।
अगले साल
लाल बाग के राजा
तू जल्दी आना।
🌹 कब आओगे 🌹
हे मधुसूदन माधव मनोहारी नंदलाल,
कसक ये रूहानी कब मिटाओगे ,,,?
हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,,,,?
उदास मन निकुंज की यह गलियां सारी ,
मृदुल मुरली की तान कब लगाओगे ,,?
हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,,?
सूना सूना यमुना तट का उपवन,
कह रही गोपिया संग राधा रास रचाओगे
हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,
मनमोहक चितचोर अनोखी छवि तुम्हारी,
छाई जीवन में उदासी हरने कब आओगे,?
हे कृष्ण कहो कब आओगे ,,,,,,,?
प्रेम दीवानी मीरा का इकतारा पुकारे,,,
बोल रही राधा की मखमली प्रीत,
हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,,,?
रुकमणी हृदय कमल करे सोलह श्रृंगार,
मधु प्रेम विरहन के चित उपवन की चाह,
हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,,?
*मधु वैष्णव "मान्या"
त मौलिक रचना ई बुक के लिए कृष्ण जन्माष्टमी पर रचना ई बुक के लिए जन्माष्टमी की रचना
बापू की राह पर चलकर,
हम जीना सीख गये,
जो वचन था ,
उसे निभाना सीख गये,
मौन की ताकत जब जाने,
जीवन को बदलना सीख गये,
शब्दों का मुल्य क्या है,
वक्त ने हमें सिखाया,
बापू की राह पर चलकर,
मंजिल को पाना सीख गये,
इरादों को मजबूत बनाकर, चट्टानों को हिलाना सीख गये,
इस ताकत को जब जाना,
जीवन को जीना सीख गये,
वक़्त ने चुनोतियाँ दी,
चुनोतियों से टकराना सीख गये,
बापू की राह पर चलकर,
हम जीना सीख गये।
*कल्पना ओसवाल
दशहरा पर्व की सार्थकता----
दशहरा पर्व तभी सार्थक होगा जब हम राम और रावण के विरोधाभासी चरित्र एवं दोनों के बीच हुए युद्ध के कारण और परिणाम को समझें। राम अर्थात जिसके स्मरण मात्र से मिले आराम ही आराम शील, सौंदर्य और शौर्य का समन्वित रूप और सदाचार नीति और लोक मर्यादा आदि गुणों की खान राम। रावण विद्वान था चारों वेदों का ज्ञाता था और ज्योतिष विद्या में पारंगत था। भगवान शंकर ने स्वयं अपने घर की वास्तु शांति के लिए उसे बुलाया था।लगनशीलता और निडरता उसके दो मुख्य गुण थे उसकी उपलब्धियों में रसायन शास्त्र के ज्ञान के आधार पर अग्निबाण और ब्रह्मास्त्र बनाना, वेदों कीऋचाओं का अवलोकन कर विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान और आयुर्वेद की जानकारी आदि हैं और तो और वह कवि भी था ,उसकी प्रमुख कृति है"शिव तांडव स्त्रोत"।
परंतु अभिमान वश उसने राम से युद्ध न करने की बात अपनी पत्नी मंदोदरी अपने पुत्र प्रहस्त भाई कुंभकरण और बूढ़े नाना मालयवंत की भी नहीं सुनी उसके नाना ने उससे कहा था---
" जब ते तुम सीता हर आनी
असगुन होहिं ना जाहि बखानी"।
पर उसने अपनी भूल स्वीकार नहीं की।
यह तो निर्विवाद सत्य है कि अपनी भूल मान लेने से सुधार के रास्ते भी खुल जाते हैं। मन में अंधेरा होने पर कोई भी एक खिड़की खोल देने से रोशनी दरवाजे से टकराकर वापस नहीं जा सकती और जिसके मन में रोशनी को जगह मिल गई जिसने एक बार उसकी कीमत जान ली उसके मन में कभी अंधेरा हो ही नहीं सकता।
एक ओर रावण राज्य लोकतांत्रिक नहीं था वही राम राज्य में राम के द्वारा जन भावनाओं का आदर करना किसी से छुपा नहीं है। एक साधारण धोबी के कहने पर उन्होंने सीता का परित्याग किया यह क्या कम था? यह सब राम ने जनता के आचरण को श्रेष्ठ बनाने के लिए किया राम के राज्य में" नहीं दरिद्र कोउ दुखी न दीना
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।"
रावण राज्य की बढ़ती अनैतिकता के फल स्वरूप राम रावण युद्ध हुआ ।भगवान राम ने अपराजिता माता की विधिवत पूजा करके असुर रावण कीअसुरता को सदा सदा के लिए समाप्त कर दिया। यह दिन था अश्विन महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का, जो दशहरा कहलाया।
असत्य पर सत्य की विजय,अन्याय पर न्याय की विजय, अधर्म पर धर्म की विजय, दुष्कर्म पर सत्कर्म की विजय होने पर विजयदशमी कहलाया जो प्रतिवर्ष हमारे सामने आता है।
विजयादशमी पर्व आते ही हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है तो आइए अबकी बार विजयदशमी के इस पर्व पर संकल्पित होकर मनका एक कोना उजास के नाम कर दें ताकि अंधेरों की कड़ियां ना जुड़े और भूलो तथा गलतियों की जंजीर ना बने ऐसा करने पर निश्चित रूप से हमारे कानों में समस्त विश्व के सम्मिलित स्वर गूंजेंगे----
"देश हो तो भारत जैसा जहां सर्वत्र रामराज्य की बयार बहती है।"
जय श्रीराम
.
* लीला कृपलानी
दोहे में बसे राम
=======
दहन दशानन में जगत , अहंकार कर राख ।
मानवता की होय तब , जयकारा औ'साख ।।
शूर्पनखा बदला लिए , रावण किया विनाश ।
भस्म स्वर्ण लंका हुयी , दर्प -दंभ का नाश ।
अवगुण पर सद्गुण विजय , कहे दशहरा पर्व।
अमल करें हम सब तभी , जगत करेगा गर्व ।
सकल विश्व में मच गयी , देख दशहरा धूम
परंपरा के ज़ोश में , लोग रहें हैं झूम
दूर बुराई सब करें , तभी मिलेगें राम
अहं मिटा लंकेश का , भू बनी स्वर्ग -धाम ।
सकल विश्व से होय अब , लंकेशों का अंत
रक्षित नारी तब रहें , शेष कहीं न असंत
रावण का वध के लिए , चला राम सम तीर
खत्म दुष्ट होंगे तभी , तभी मिटेगी पीर ।
राम राज्य में लंकपति , चले कपट की चाल
सीता का करके हरण , फँसा मौत के जाल ।
राम पधारो आज तुम , मिटा जगत- व्यभिचार ।
l
बसे प्रेम सद्भाव फिर ,' मंजु 'सकल संसार ।
*डॉ मंजु गुप्ता
19 द्वारका , प्लॉट -31
आओ सीखें आज हम कुछ शिष्टाचार।
आती है जिससे फिर जीवन में बहार ।।
सूर्योदय से पूर्व उठने की अब आदत डालो
तन मन को प्रसन्न करने की आदत डालो ।।
आँखे खुलते ही करो पहले प्रभु स्मरण ।
फिर उठते ही माता पिता को करो नमन ।।
आँख मुँह धोकर करो फिर योगाभ्यास ।
प्राणायाम का भी करो नित्य प्रयास ।।
दातुन ब्रश ऊपर नीचे गोल घुमाकर ।
दाँतो को रखो स्वस्थ सफेद बनाकर ।।
पियो खाली पेट अब तुम गुनगुना पानी ।
है जीवन के लिए अमृत समान ये पानी ।।
कर स्नान जाओ तुम प्रभु दर्शन हेतु मंदिर ।
करो अब स्वास्थ्य वर्धक नाश्ता शाकाहार।
मूक पशुओं पर मांसाहार से न करो प्रहार ।।
करे अब विद्यालय की पढ़ाई मन लगाकर ।
ख्वाब को साकार करो लक्ष्य तुम बनाकर ।।
खेलो कूदो पढ़ो और पढ़ाओ वापस घर आकर ।।
बढ़ेगी प्रसन्नता तुम्हारी साथ दोस्तों का पाकर ।।
भोजन से पूर्व सदा हाथों को अच्छे से धोना ।
छूटने न पाए फिर हाथों का कोई भी कोना ।।
रहो तुम आबाद सूर्यास्त के पूर्व करके भोजन ।
रात्रि में दूध पीने से स्वस्थ रहता है तन मन ।।
जल्दी सोना भी अच्छे स्वास्थ्य की निशानी ।
बढ़ता है वो सदा आगे जिसने बड़ो की बात मानी ।।
*प्रणिता राकेश सेठिया *परी*
लघु कथा
शीर्षक - "धरती के भगवान "
खट -खट -खट ....दरवाजे पर लगातार थाप पड़ रही थी ।बाहर जितना कोहराम था ...अंदर शायद उससे भी ज्यादा ।घर के अंदर दो बच्चे और बच्चों की मां बिलख -बिलख कर रो रही थी ।सामने खड़े एक मर्द के आगे हाथ जोड़ कर विनती कर रहे थे .....
"नहीं ,पापा, प्लीज ,मत जाओ पापा "
"हमारी तरफ भी देखो ना पापा , आप कहीं नहीं जाओगे पापा , प्लीज़ "
" आप को कुछ हो गया तो हम क्या करेंगे ...हमें कौन संभालेगा ??आपके सिवा मेरा और इन बच्चों का है ही कौन??" पत्नी दहाड़े मार-मार कर कह रही थी ।
"पर शीला , मैं एक डॉक्टर हूँ ..मेरा कार्य ही लोगों की सेवा करना है ।डॉक्टर बनने के बाद हम सेवा की शपथ लेते हैं ।बाहर कोई मुझे बुला रहा है ...मेरी राह देख रहा है ...अगर एक मिनट की भी देर हो गई ....तो ...तो ..नहीं ,नहीं ,भगवान कभी माफ नहीं करेगा ...मैं जा रहा हूं ...मुझे मत रोकना .."और डॉक्टर साहब दरवाजा खोल कर बाहर आने वाले के साथ चल दिए किसी की जान बचाने ।
इधर घर के अंदर माँ व बच्चे रोज की तरह रो-चीख कर चुपचाप हो गए ।डॉक्टर पति सुनते ही नहीं थे ।वे न दिन देखते , न रात, न गरमी ,न बारिश ...जब भी ,जहाँ भी उन्हें पुकारा जाता ...दौड़े चले जाते ।वह सब तो ठीक था पर अब ...इस महामारी में ...ऐसे माहौल में ... कहीं भी दौड़ पड़ते हैं ।बिना सोचे -समझे ..बिना हमारी फिक्र किए ....यही सोचते-सोचते बच्चों के साथ उनकी माँ भी जहाँ थे ..जैसे थे ..वही सो गए ।सुबह मोबाइल की रिंग ने शीला को उठा दिया ।उनींदी आंखों से मोबाइल कान पर लगाया और बोली ,"हेलो .."
" हाँ ,शीला ,मैं बोल रहा हूँ ..थोड़े दिन एक होटल में रहूँगा... घर नहीं आऊँगा... नहीं, नहीं... गलत मत समझना...क्योंकि मुझे बच्चों की और तुम्हारी फिकर है ...इसीलिए ...तुम चिंता मत करना और हाँ, एक एटीएम कार्ड घर पर रख कर आया हूँ...यहाँ बहुत मरीज आ रहे हैं ....उन्हें मेरी जरूरत है ...अपना ध्यान रखना ..बाय .." और फोन कट गया ।
कौन कहता है कि भगवान ऊपर आकाश में ही रहते हैं ।वे हमारी इस धरती पर हमारे आसपास ही मौजूद हैं।हमारी धरती के भगवान ...हमें जीवन देने वाले ...हर समय मौजूद... हमारी रक्षा करने के लिए... शत् शत् नमन उन्हें......।
*उषा गुप्ता
इंदौर
शीर्षक - अहम् भरा जो निमंत्रण आया
********************************
अहम् भरा जो निमंत्रण आया
शिव जी ने गणपति को बुलाया,
गणपति ने जाना स्वीकारा
फिर कुबेर घर लौट चले।
गणपति ने शुरू भोज किया है,
श्रीफल खा के पेट भरा न,
खाएँ राशन पेट भरा न,
बर्तन सारे निकल गए।
खायी रसोई पेट भरा न,
खाएँ गोदाम, पेट भरा न,
गहने खाएँ, पेट भरा न,
बोले अब तुझको खाऊँगा।
थे कुबेर को प्राण बचाने,
शिव जी के वह द्वार पधारे,
बोले शिव जी पान खिला दो,
खा उसे भोजन पूर्ण मानते।
अब कुबेर का अहम् है चूर,
गणपति का भोजन भी पूर्ण
पर गणपति का पेट भरा न,
है कुबेर को क्षमा किया।
*- कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(कुबेर को अपनी धन-संपत्ति का बहुत घमंड था। अपना धन-वैभव को दिखाने के लिए उसने शिवजी को भोजन के लिए आमंत्रित किया। अर्न्तयामी शिव जी ने निमंत्रण में गणेश जी को कुबेर का घमंड को दूर करने के लिए भेजा। गणेश जी जब निमंत्रण पर गए तो वे सारा भोजन चट कर गए। सारा भंडार कुबेर का खाली हो गया परंतु गणेश जी का पेट न भरा। पर सच तो यह था कि माँ पार्वती के द्वारा खिलाए गए एक कौर से ही गणेश जी की भूँख शांत हो जाती थी। फिर गणेश जी गुस्से से बोले- तुम मुझ एक को ही तृप्त नहीं कर सकते! मेरी भूख शांत न कर सके तो कुछ न मिलने पर मैं तुम्हें खाऊंगा। अपने प्राण संकट में जान कुबेर भागते हुए शिवजी के पास गए, शिवजी ने कहा पान से भरी थाली गणेश जी को दे दो। पान खा लेने के बाद भोजन पूर्ण माना जाता है। गणेश जी को कुबेर ने पान खिलाया, उनका भोजन पूर्ण मान लिया गया पर गणेश जी की भूँख शांत न हुई थी। कुबेर का घमंड चूर हो चुका था। गणेश जी ने कुबेर को क्षमादान दे दिया।)
(2)
शीर्षक - विद्रोह
**************
ले चलो ऐ 'अश्व' मुझको उस धरा के छोर
पाप रहित क्षेत्र हो; तम न हो; हो भोर।
भ्रमण करता 'क्षेत्र' में; गर्दभ-मति लिए हुए;
पशु,प्रेत बन भटक रहा अज्ञात; शून्य से परे।
देखता हूं मन की हलचल; लोचन का प्रकाश ले;
कह न 'बधिर'; सुन सका न गूँज अन्तर्रात्मा की;
था विचार चल पड़ूँ सत्य मार्ग ओर;
है 'परिश्रम'; चल पड़ा मैं तम मार्ग ओर;
तम में आकर सब ही 'गुह्यतम'; खुल सका न 'भेद'
खुद को खोया; अश्व खोया; छुट गयी थी डोर;
तम में खा-खा स्पंद; नव ज्योति में आया;
नव ज्योति में आया और अश्व को पाया।
बोला उससे- "अश्व मुझको! ले चल नगर ओर";
'नगर' में आया; 'चित्र' विचित्र ही पाया।
मानव 'मशीन'! या ''मशीन' मानव'!.. रहस्य ही रहा।
बम 'मनुज! या मनुज 'बम'!..कुछ समझ न यह सका।
भू , वात, शून्य 'उच्छ्वास' हैं भरते;
'विज्ञान'का तूने 'प्राचीर' बनाया;
तोड़ दे प्राचीर को वो श्वांस भरेंगे;
त्यज मोह; राह ये छोड़; 'ध्वंस' करेंगे।
ले चलो ऐ अश्व मुझको वन हरित उस ओर;
'विपिन' में आया; मन 'शांति' को पाया;
'विहग-कलरव' छोर-छोर 'गूँज' हैं मचती;
बिल्लियों को बिल्लियां ही नोंचतीं रहती।
'सर्प' जैसे 'शशक' का अनुसरण करता;
'शशक' गर्दन मोड़ फिर-फिर दौड़ता रहता;
वृक्ष से जा भिड़ा; फँस गया 'झाड़ियों' में;
कंटकों में पैर थें; शिकार बन गया।
'सर्प' तो यहां भी हैं; 'गेंडुरी मारे हुए;
लगता करते 'अनुसरण'; 'शिकार' करेंगे।
'सर्प' अतिथि बनकर आतें; हैं 'अतिथि-सत्कार' करवातें;
बनकर 'स्वजन'; डस कर 'स्वजन' राज करेंगे।
ले चलो ऐ अश्व! मुझको उन युगों की ओर
जहां 'श्री रामचंद्र' और थें 'माखन चोर';
'त्रेतायुग' में शांति है; पशुओं में मित्रता है;
'अनुज' यहाँ 'अग्रज' का विरोध है करता
क्योंकि वह 'असत्य संगी'; 'सिया' का हरण किया;
खो दिया 'भ्राता' उसने; असत्य खो दिया;
भेद कह दिया(कि रावण की नाभि में अमृत है)
सत्य विजय हो गया;
विजयदशमी पर्व रूप याद बन गया।
युध्द 'कुरुक्षेत्र' में; जन ने संहार किया;
जन ने 'स्वजन' पर ही 'वार' है किया;
युध्द में पितामह हैं; भ्राता,चाचा,पुत्र हैं;
'शर' से स्वजन पर प्रहार है किया;
क्योंकि वे 'असत्य संगी'; असत्य पर विद्रोह जो
खो कर 'स्वजन' को है 'सत्य' संग रहा।
कौणप कलयुग के हैं ऊँचे आसन पर
'भ्रष्टाचारी' कलयुग का शैतान है बना;
'दीन' का रक्त चूसे; रक्त में वृद्धि करता;
'कंगाल' करके 'कंकाल' कर दिया;
कृष्ण! हे राम! तू कलयुग में ओझल;
नारायण जी! फिर से अवतार ले लो।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(शब्दार्थ:गर्दभ=गधा, शून्य=ईश्वर, लोचन=आँख, बधिर=बहरा, तम=अँधेरा, अश्व=घोड़ा, गुह्यतम=छिपना, स्पंद=झटका, मनुज=मनुष्य, वात=हवा, शून्य=आकाश, प्राचीर=दीवार, विपिन=जंगल, विहग=पक्षी शशक=खरगोश, कंटकों=काँटों, अनुज=छोटा भाई, अग्रज=बड़ा भाई, जन=इंसान, शर=बाण, दीन=गरीब, रक्त=खून, कंगाल=हीन, कौणप=राक्षस)
(3)
शीर्षक=मुट्ठी से लुटा दिया
***********************
टप-टप बूँदें शोर मचाएँ;
चप्पल पहनें घन ज्यों भागें।
टर्र-टर्र की ध्वनियाँ काटे,
झींगुर की संग बोलियाँ।
पत्तों का वह फड़-फड़़ होना;
चमगादड़ का फड़फड़ाना;
धड़कन की भी गूँजे धक-धक;
सन्नाटा क्या बोल रहा!
लिए चाँदनी बन बैठे हैं
भूत भयानक वृक्ष कई;
पसर पड़ा सन्नाटा ही
या सन्नाटा है बोल रहा!
गरज पड़ा; घन बरस पड़ा है;
तूफानों से उलझ पड़ा है;
जब बरसे तूफान भी संग में;
गरज पड़ा घन बरस पड़ा।
लुप्त हुए तारक समूह भी;
जुगनूँ की चम-चम भी गायब।
खड़ा हुआ जो फल देता है;
पंछी को छाया देता है,
पीछे करने के मक़सद से
लंगी मार उसे भागे आगे,
मंजिल क्या तूफान न जाने;
अनजान बन दौड़ रहा।
तूफान भी दौड़ रहा है...
तूफान भी दौड़ रहा।
गहरी जिसकी जड़ है;
जिसने अन्तर रस जाना;
वह जीना है जाना,
वह जीवन है जाना।
पत्तों का वह फड़-फड़ होना;
चमगादड़ का फड़फड़ाना;
झींगुर ने भी चुप्पी साधी;
उल्लू भी खामोश हुए;
सूरज ने सिर से अपने
ज्यों घूँघट हटा लिया।
बालक की नौकायें बहतीं,
इंद्रधनुष दिखता सतरंगी।
पंछी के पंखों पर पसरी
मुक्ता रूपी बूँद ढुलकती,
पल्लव ने उन बूँदों को तो
गोद बिठाया है,
प्रकृति ने जो लोटा भर-भर
कल खूब नहाया है।
तूफान भी मंद पड़ा अब,
धूल उड़े न; धरती भीगी;
धरती के उस कीचड़ पर
कुछ कमल विराजे हैं।
पंछी अब हैं चहचहायें;
हंस तलैया तिरते जाएँ;
सकारात्मकता अवि ने
मुट्ठी से लुटा दिया।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(तारक= तारा, पल्लव=पत्ता, मुक्तक=मोती, तलैया=तालाब, अवि=सूर्य)
(4)
शीर्षक- कौन बड़ी यह बात है
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दहेज लिया था तीस लाख
जब बेटे की शादी होनी थी।
दहेज दिया था बीस लाख जब
बेटी की शादी होनी थी ।
सब देते है, सब लेते है
कौन बड़ी यह बात है
वह देते है तब लेते है
कौन बुरी यह बात है।
करते जघन्य अपराध
कहते कौन बड़ी यह बात है।
घूंस ले लिया, नकल कराया
शिक्षा को व्यवसाय बनाया।
बच्चों के फ्यूचर से क्या लेना
हमें पैसों से प्यार है।
करते जघन्य अपराध
कहते "कौन बड़ी यह बात है।
काला धन दे काम करा लूं
चलो खरीद उन्हें लेते है
यह ओछी ही सोच तेरी
भ्रष्टाचारी पैदा कर जाती।
वह बिकते है तब खरीदते
कौन बुरी यह बात है।
करते जघन्य अपराध
कहते "कौन बड़ी यह बात है"।
व्यवसाय था अच्छा-खासा
पैसा भी बढ़िया आता था
घूंस लिया तब काम किया फिर
कौन बड़ी यह बात है।
करते जघन्य अपराध
कहते कौन बड़ी यह बात है।
अन्याय का विरोध न करते
उसको तुम मजबूरी कहते
हरिश्चंद्र राजा न कहते
साधारण इंसान है।
हनुमान तेरे भीतर शक्ति
याद करो उस शक्ति को
तोड़ दो उन जंजीरों को
जो तुम्हें बांधने आती है।
ये बातें तो किताबी ही है
बस कोरी ही बातें है
कह मत ऐसा कर्म करो तुम
बड़ी गहरी यह बात है।
झूठ को हमने झूठ कहा
और प्रश्न खड़े भी कर डाले।
पापी-दल भी समझ गया
यह विद्रोह की आग है।
आग में इस जल जाऊँगा।
यह आग नहीं ठंडी होगी।
पांव हटाए तब उसने
और सीधे आया मार्ग वह।
मत सोचो "कोई क्या सोचेगा!"
सत्य का बस दामन थामो।
तोड़ दो उन जंजीरों को
जो तुम्हें बाँधने आती है।
शुरुआत तो कभी ना कभी
किसी चीज की होती है।
सब चुप है पर तुम बोलो
साधारण कोई इंसान नहीं।
सत्य ही ईश्वर सत्य ही भीतर
याद करो उस शक्ति को।
तोड़ दो उन जंजीरों को
जो तुम्हें बाँधने आती है।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
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(5)
शीर्षक- भुक्खड़
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इस युग में हैं कौन यह भुक्खड़
खा-खा जिनका पेट भरा न,
रक्त चूस कर रक्त बढ़ाया,
निर्धन खा धनवान हुए।
नमक निगल गए; पेट भरा न,
खाएं जमीं पर पेट भरा न,
मिल खाएं पर पेट भरा न,
चावल की बोगी खाएं।
सड़क निगल गए पेट भरा न
पुल खाएं पर पेट भरा न,
खाएं रुपए पर पेट भरा न,
हैं मकान भी निगल गए।
बच्चों का स्कूल कहाँ है!
जो अक्सर कागज में दिखता,
नल, कूप, वह बांध कहाँ है!
जो अक्सर कागज में फिरता।
नौ करोड़ यह खाए हैं अभी
सुबह- सुबह के भोजन में,
आम आदमी का हक खाएं
सुबह-शाम ही भोजन में।
आम आदमी पीता आँसू
सुबह-शाम के भोजन में,
आम आदमी को यह खाते
सुबह-शाम ही भोजन में।
- कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(6)
शीर्षक- मृत वृक्ष
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पंछी के न कलरव; न पल्लव,
निष्फल मैं; निष्प्राण हूँ।
व्याकुल हूँ; मूर्छित खड़ा, मैं
वृक्ष न हूँ; कंगाल हूँ।
तूफान आए जो फिर यह
'भूमि' मेरा बिस्तर होगी।
पर मानूँ न गिर पडूँगा मैं,
तूफानों से लड़ बैठूँगा।
फिक्र नहीं मुझको कि मेरी
देह बिखर जाएगी;
नीड़ पर नन्हा पंछी अपने
प्राण गवाएगा।
नीड़ पर बैठे पंछी के मैं
प्राण बचाऊँगा,
अस्तित्व बचाने को
अस्तित्व बनाऊँगा।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
(पल्लव=पत्ता, निष्फल=बिना फल के, निष्प्राण=बिना प्राण के, व्याकुल=परेशान, मूर्छित=मुरझाया, देह=शरीर, नीड़=घोंसला)
(7)
मोदी जी आपको नमन
*********************
भारत को मन की बात बतलाया,
झाड़ू उठाया, देश स्वच्छ बनाया।
कुटिया सुदामा की महल बनाया।
मोदी जी आपको नमन।
चूल्हे के धुँए में भाजियाँ पकाती थी;
उस माँ को भी तो सिलेंडर दिया।
आतंकी हमले में वीरों को खोया था;
ऑपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक किया
और धारा तीन सौ सत्तर हटाया;
आतंकी से इस देश को बचाया।
भारत सहारा हो; हमने सराहा है ;
मोदी जी आपको नमन।
- कीर्ति जायसवाल,
प्रयागराज
(8)
शीर्षक=धाराओं में बहता जीवन
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'अश्रु'
वह तो सभी के नेत्रों की धाराएं हैं।
प्रवाहित करो
तो खुशियों के,
पर इसका तात्पर्य यह नहीं
कि दु:ख के अश्रु
भीतर ही समा लो,
'खुशियाँ' और 'दु:ख'
ये तो सभी के जीवन-संगी हैं।
'खुशियों' को ही निमंत्रण दो,
'दु:ख' दूर ही रहेंगे,
पास तो मैं
अपनों को भी नहीं आने देती,
'सपना' ही मेरा अपना है
जो मेरे पास हर पल रहता है।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(9)
शीर्षक=दर्द उठा हृदय में
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दर्द उठा हृदय में, ये लुत्फ़ उठा रहे हैं,
भीतर ही भीतर रोयी, ताली बजा रहे हैं।
कविता जो हूँ मैं कहती, वह भावना में कहती,
ये दर्द को क्या समझें, ताली बजा रहे हैं।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(10)
शीर्षक- काक विहग
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तन्हा हूँ पर भीड़ में शायद;
भीड़ में जब - जब तन्हा रहता।
अश्रु से भीगा - भीगा तन है;
डोर से उलझा जो चला उड़ने।
काक विहग एक नन्हा सा मैं,
आकुल क्षुधा से चंचु खुला है।
आकुल दर्द से मेघ हों मूर्छित
अश्रु प्रवाहित करते जाएँ,
दर्द क्या इनका वृक्ष वो जानें
अश्रु जो उनका पुष्प खिलाए।
कण्टक उबारे 'कण्टक' जो कोई,
विष पहचाने 'विष' जो हो कोई ।
इंद्रधनुष जहाँ पल - पल छाए;
टुण्ड्रा के तम को क्या जानें।
पुष्प क्या जाने 'पत्र' के रंग को,
पत्र क्या जाने 'पुष्प' के रंग को,
प्रतिपल संग में; एक न रंग में;
रंग - रंग से नव रंग खिलाएँ,
है क्या प्रयोजन नर को इनसे
वह तो इसका फल ही जानें।
सूर्य जो आए लुप्त हो 'चंदा',
चंदा जो आए 'सूर्य' भी ओझल।
सूर्य क्या जाने 'चंदा' भी कोई,
चंदा क्या जाने 'सूर्य' भी कोई।
भ्रम में ही दोनों यह ही विचारे
"अम्बर पर एक मैं ही छाया"।
अम्बर विचारे "सागर नीला",
सागर विचारे "अम्बर नीला"।
अम्बर विचारे "सागर ही छाया",
सागर विचारे "अम्बर ही छाया"।
रंग में जो एक; संग में रहें न,
संग में जो एक; एक रंग में रंगे न।
काक विहग चंचु खोल के बैठा
"बाज ही शायद अन्न खिलाए"।
कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(तन्हा= अकेला, अश्रु= आँसू, तन=शरीर, काक विहग= कौवा पक्षी, आकुल=व्याकुल, क्षुधा= भूँख, चंचु=चोंच, कण्टक= काँटा, पत्र=पत्ता, नव=नया, अम्बर=आसमान)
("टुण्ड्रा" एक ऐसा स्थान है जहाँ छः महीने दिन एवं छः महीने रात होती है)
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(11)
शीर्षक=डूब गए
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बिजली की तलवार लिए
घन तूफ़ांं के प्राण हरे।
ठंडी-ठंडी वात चले
पंछी नशे में डूब गए।
वृक्ष-पत्र कुछ यूं लहराएं
ज़ुल्फ़ ज्यों हो हम डूब गए।
हंस की गति ज्यों मंद-मंद
त्यों मंद-मंद मुस्कान खिले।
पुष्प-पराग में मधुप विराजे
पी रस नशे में डूब गए।
टिम-टिम तारे अब हैं गगन में
'रात्रि' या 'दिन' हम भूल गए।
पग फिसला अरे! गिरे नदी में
होश में अब पर डूब गए।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(शब्दार्थ: ज्यों=जिस पल, त्यों=उसी पल, मधुप=भौंरा, वात=हवा, ज्यों=जैसे, पग=पैर)
(12)भारत भूमि
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हिन्दू को न हिन्दू कहना,
मुस्लिम को न मुस्लिम कहना,
सिक्ख को न सिक्ख कहना,
ईसाई को न ईसाई कहना,
अपना धर्म उससे भी बड़ा है
मानव हूँ, मानवता धर्म है।
हिन्दू को न हिन्दू कहना,
मुस्लिम को न मुस्लिम कहना,
सिक्ख को न सिक्ख कहना,
ईसाई को न ईसाई कहना,
हम हैं भारत के निवासी
हमको कहना भारतवासी।
भारत माँ तेरी गोद में जन्मा
माँ तुझमें ही सो जाऊँगा।
न मरूँगा, न मिटूँगा
तुझमें ही माँ मिल जाऊँगा।
ऐ सुनो! ओ भारतवासी
माँ के लिए कुछ कर जाओ,
तन तू माँ की गोद में
गगन में नाम सजा जाओ।
अमर जवान कहेगी दुनिया
दिल में तेरी याद रहेगी।
बलिदान तेरा न जाएगा खाली
फल उसका भारत-भूमि चखेगी।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
(13)
04/05/2020
वंदन करते वीणापाणि
********************
हे सरस्वती करते वंदन;
तू ज्ञान की ज्योति जला दे।
नव - प्रभात जीवन मे कर दे;
वंदन करते वीणापाणि
अहं भाव, कोई द्वेष धरे;
तू प्रेम के दीप जला दे।
हिन्दू - मुश्लिम बैर धरें न;
समभाव सिखला दे।
व्यक्ति भ्रष्ट जो क्रूर अभिमानी
ज्ञान के दीप जला दे।
सुख, शांति, समृद्धि हो;
तू सत्मार्ग दिखला दे।
हे सरस्वती करते वंदन;
तू ज्ञान की ज्योति जला दे।
नव - प्रभात जीवन में कर दे;
वंदन करते वीणापाणि।
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
शीर्षक - " हिंदी को बचाओ "🙏
अंग्रेजी के चलन से विलुप्त हो रही हैं,
हिंदी मातृभाषा से आम हो रही हैं। 🌹
सोच दिन व दिन बदल रही हैं,
हिंदी में बात करने में तौहीन हो रही हैं l🌹
बच्चों को हिंदी के अंक समझ नहीं आते हैं,
अपने ही कोर्स की किताब नहीं पढ पाते l🌹
विदेशी हमारी भाषा को सिख रहे हैं,
हम बेवकूफ बन उनकी भाषा अपना रहे हैं l🌹
गुड मॉर्निंग की जगह सुप्रभात नहीं बोलते,
अपनी दिन को शुरुआत ही नक़ल से करते l🌹
सभ्यता संस्कृति दर्शाती हैँ हिंदी
भारत कि आन और शान हैँ हिंदी 🌹
महादेवी जी, हरिवंश रॉय कि याद दिलाती हैँ
हिंदी से जब उनकी रचना भाव दर्शाती हैँ। 🌹
कबीर,रहीम के दोहे जब दो लाइन मैं पड़ते हैँ,
जीवन कि सच्चाई से हम रूबरू होते हैँ। 🌹
बदलो चाहे जितना पर अपनी पहचान ना खोने दो,
अपना लो मात्र भाषा हिंदी को विलुप्त न होने दो ll🙏🌹
🙏~प्रेरणा सेन्द्रे🙏
सूरमयी सांझ के द्वार पर आंखों में उमड़ आए बादल
बादलों को तकती रही, प्रेम का बीज चाहत के धरातल
ना कोई आहट ,ना संदेसा कोई आया बालम
विरह वेदना में जल रहा मन, नम आंखों का काजल
ओ वीर !सुहाग की सेज पर बैठी, राह तकते रहे यह नैना
सोख लिए तकिए ने आंसू यह बिरहा के ओ सजना
देश के ओ सिपाही ,सरहद पार जाना भी जरूरी तेरा
विरह के ओले सहके, वतन की खातिर लहू में भीग जाना तेरा
बदरा छाए मीठी यादों के, मद माता सावन भी आया
सावन कितना भी बरसा ,पर मेरा साजन नहीं आया
तिरंगे की आन की खातिर, सरहद पर अडिग रहना तेरा
जिस्म से बहते लहू पर ,वतन की मिट्टी को रगड़ना तेरा
बिरहा की अग्नि तेरे और मेरे अंतर्मन में है सुलगती
रूदनो की आह विरह पथ में भटके दिलों में है दहकती
होली ,दिवाली ,करवा चौथ पर साजन ,नैना बिछाये करती रही इंतजार
भूल गई मैं सजना कैसे ,भारत देश प्यारा तेरा दूजा प्यार
तिरंगे मे यूं प्यार से लिपटा हुआ तू जब आया सजना
असुअन बहते आंखों में शुन्य की चेतना, निरंतर अब विरह वेदना
बांट जोहके अबतक नमी आंखों में सोखी के आओ तो साथ साथ भीगे
मिलन की आस में झेल रही थी एक विरह ,जीवन भर दूजी विरह वेदना तू दे गया सजना......
कविता-
फिर आओ महात्मा गांधी
चल रही है झूठ हिंसा अनैतिकता की आंधी।
देश को बचाने फिर से आओ महात्मा गांधी।
सत्य का सूरज अस्त हो रहा।
अहिंसा का पुजारी पस्त हो रहा।
झूठों का सिक्का देश में चल रहा।
सच्चा आदमी भूखों मर रहा
नशे की गिरफ्त में हर युवा झूम रहा।
पतन की गर्त में देश है जा रहा।
सत्य अहिंसा के इस देश में।
नाच रही हिंसा विद्रूप वेश में।
अहिंसा का पताका फिर से फहराओ।
हे!बापू जल्द ही तुम लौट आओ।
देश की कन्याएं शर्म से गड़ रही हैं।
बलात्कारियों से वो मर लड़ रही हैं।
बच न पा रही हैं सीता अहिल्या द्रोपदी।
आई चहुँ ओर दुःख विपत्ति।
बापू!कृष्ण बन कर आओ।
चिर बढ़ाकर लाज बचाओ।
फिर से सुख शांति की बंसी बजाओ।
हे!गांधी इस धरा पर स्वर्णिम युग लेकर आओ।
* डॉ. शैल चन्द्रा
*संझा*
मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में, श्राद्ध पक्ष में सोलह दिन बालिकाओं द्वारा मनाया जाने वाला लोकपर्व।
जिसमें शाम के समय बालिकाओं द्वारा सूर्यास्त के पूर्व आंगन की दीवार पर गोबर से सुन्दर आकृति बनाई जाती है ,जिसमें चंद्र- सूर्य भी होते है इसे विभिन्न फूल पत्तियों से सजाया जाता है। सूर्यास्त के पश्चात आरती करके प्रसाद वितरण किया जाता फिर सब सखियाँ मस्ती से ओतप्रोत संजा के मधुर गीत गाती हैं ।
इसी तरह पंजाब में आली का पर्व, महाराष्ट्र में गुलाबई, बुंदेलखंड में सांझी नाम से श्राद्ध के समय कुछ इसी तरह की परंपराएं मौजूद थीं।
आधुनिक शिक्षा, शहरों का आकर्षण , टी वी और मोबाइल के प्रभाव से यह खूबसूरत सामाजिक परंपरा लुप्तप्राय हो चली है ।
संजा हमें स्वास्थ्य, कला, सामाजिकता एवं प्रकृति के दर्शन कराती है।
यूँ तो मैंने भी मालवा में आने के बाद ही ग्रामीण अंचल की बालिकाओं के इस पर्व और उससे जुड़े उत्साह को देखा , जो एक कलाप्रेमी को सहज ही आकर्षित करते हैं।
मैं मालवीय बोलना तो नहीं जानती पर मैंने संजा गीत गाने का प्रयास किया है । आप भी इसे सुनिये और आनंद लीजिए ,
साथ ही यह सुन्दर प्रथा जीवित रहे इसके लिये लिंक को सब्सक्राइब अवश्य कीजिएगा । धन्यवाद। 🙏😊
गीत
राम नाम जप ले रे मनवा
गम सब हर जाए रे मितवा,रहें न निशा घनेरे।
राम नाम जप ले रे मनवा,निशदिन साँझ-सवेरे।।
रघुवर हैं सकल लोक दयालु ,भर दे सबकी झोली
मोहनी मूरत बसा लें हिय,हो पूजा बन टोली
अर्चन तू कर ले रे मितवा,विपदा न कभी घेरे।
राम नाम जप ले रे मनवा ,निशदिन साँझ -सवेरे
मंगल सुमन खिले घर-आँगन,
खुशियाँ सजाकर लड़ी।
मंगल धुन गूंजे होठो से,
आती रमन शुभ घड़ी।
भक्ति में डुबकी ले रे मितवा, मत कर तेरे-मेरे।
राम नाम जप ले रे मनवा ,निशदिन साँझ-सवेरे।।
भाव प्रेम के भूखे हैं प्रभु ,
करें सबका उद्धार
निर्मल मन बहे पावन गंग,
बहाए शुद्ध बयार।
प्रेमक धुन रस ले रे मितवा, फांसे न कभी फेरे।
राम नाम जप ले रे मनवा ,निशदिन साँझ सवेरे
* रीतु प्रज्ञा
मेरी मातृभाषा
माँ से सीखी है जो भाषा,
वही है मेरी मातृभाशा।
मेरी मातृभाषा है हिंदी,
जैसे सुंदर मुख पर बिंदी।
मनोभावों को व्यक्त करना,
बड़े-छोटे में फर्क करना,
यह हमको सिखलाती है।
‘तुम’ और ‘आप’ का प्रयोग सिखाकर,
हमें यह सभ्य बनाती है।
माँ जैसी ही प्यारी है यह,
प्रेम की भाशा कहलाती है।
कथा-सम्राट प्रेमचंद हों,
या महाकाव्यकार तुलसीदास।
रीतिकाल, आधुनिक काल को याद करें,
या आदिकाल, भक्तिकाल की बात करें।
हर काल ने अनेक साहित्यकारों से,
इस भाषा रूपी मुकुट में हैं अनमोल रत्न जड़े।
मातृभाषा में लिखना-पढ़ना,
जन-जन का अधिकार है।
मन के दुर्भावों को हो मिटाना,
तो मातृभाषा एक सशक्त हथियार है।
मातृभाषा से जो प्यार न हो,
तो हमको धिक्कार है।
माँ का स्थान है सर्वोपरि,
बाद में चाची, ताई को नमस्कार है।
मातृभाषा का प्रचार-प्रसार करो,
हिंद में तो हिंदी का साम्राज्य हो।
हिंदी किसी परिचय की नहीं मुहताज है,
यह जन-जन की आवाज़ है।-2
भावों का सच्चा उद्गार है,
इसमें समाहित जीवन का सार है।
हिंदी मेरी मातृभाषा है,
हिंदी का यश फैले सर्वत्र,
इसके लिए समर्पित ये प्राण हंै।
यह मात्र भाषा नहीं, यह हिंदुस्तान की शा
*सीमा रानी मिश्रा
भाषा की रानी हिंदी
भारत भाषा का धनी देश है ,
हिंदी इसकी रानी,
अलग-अलग बोली है यहां की,
पर हिंदी सब की जानी पहचानी,
हर भाव के लिए अलग से शब्द है,
सुंदर, सहज, अनूठे,
अंतर्मन के अनेकों भाव का,
हिंदी सुंदर अलख जगाती,
गर्व हमें हम हिंदी भाषी,
सुंदर इसकी बानी,
राष्ट्रभाषा यह है हमारी,
जग में जानी पहचानी l
*डॉ. कीर्ति यादव
कस्तूरबा ग्राम रूरल इंस्टीट्यूट
शिक्षक यानी गुरु। हमारे भारत में शिक्षकों को सबसे ज्यादा सम्मान प्राप्त है।धर्म चाहे कोई भी हो शिक्षक का महत्व कहीं भी कभी भी कम नहीं होता। गुरु टीचर प्रीचर पंडित मौलवी अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग धर्म गुरु ईश्वर का मार्ग बताते हैं। सच्चाई, सत्यता,प्रेम,स्नेह ,भलाई ,परोपकार ,सद् मार्ग इन गुरुओं के द्वारा बताया जाता है। इस संदर्भ में मैं आपको श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के महिमा के बारे बता रही हूं जैसे कि नाम से ही पता चलता है वह ग्रंथ जो कि स्वयं में एक गुरु है।इसमें जो कार्य एक गुरु बताता है वह सारे कार्य बताए गए हैं जैसे कि इनकी एक वाणी सुखमनी साहिब में बताया गया है कि इंसान को अपनी नेक कमाई का दशम हिस्सा सब कार्यों में लगाना चाहिए, किसी पराई स्त्री की तरफ देखा नहीं करनी चाहिए, झूठ से हमेशा दूर रहना चाहिए काम क्रोध लोभ मोह अहंकार से दूर रहना चाहिए।तू ही हो गई एक गुरु की बात मतलब एक धर्म की बात बाकी सभी धर्मों में भी इसी तरह से बताया गया है चाहे वह वेद हो चाहे पुरान हो चाहे अपने इष्ट कुरान या बाइबल हो सब यही बोलते हैं कि हमेशा सही रास्ते पर चलें और नैतिकता के नियमों का पालन करें। अब मैं अगर धर्म से हटके दूसरी तरह के शिक्षक यानी वह शिक्षक जो स्कूल और कॉलेजों में बच्चों को शिक्षा देते हैं उनके बारे में शब्द कहना चाहूंगी। इन शिक्षकों का कार्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं। अज्ञान से ज्ञान की तरफ,अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाने वाला यह शिक्षक ही तो है बच्चों का हाथ पकड़ कर दुनिया की भीड़ में उन्हें अलग पहचान दिलाने वाला और अच्छा नागरिक बनाने वाला एक शिक्षक ही तो है। असंभव कुछ नहीं सब कुछ संभव है, हम सब कर सकते हैं ,कोई भी कार्य मुश्किल नहीं है यह सब एक शिक्षक ही तो बताता है। चाहे माना आज शिक्षा एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है पर इस व्यवसाय की मर्यादा और गरिमा को बढ़ाने वाला यह शिक्षक ही तो है । दिन रात सुबह शाम कार्य के दौरान स्कूल में कॉलेज में या घर आकर पूरे समय विद्यार्थियों की प्रगति के बारे में सोचने वाला और क्रियाशील करने वाला जिस शिक्षक ही तो है। और 2020 में तो शिक्षक की भूमिका और भी बढ़ गई है। ऑनलाइन माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा या फिर हमारा घर हमारा विद्यालय के तहत विद्यार्थियों के घर जाकर पढ़ाना वह भी ऐसे कोविड-19 जैसी खतरनाक बीमारी के चलते हुए यह जोखिम भरे काम को सरलता से करने वाला शिक्षक ही तो है।इस संदर्भ में जितना भी लिखा जाए या कहा जाए वह बहुत कम है, आटे में नमक के सामान। मैं अपनी वाणी एवं कलम को यहीं विराम देती हूं।
अंत में शिक्षक दिवस पर मैं यह कहना चाहूंगी कि जिंदगी में शिक्षक चाहे कोई भी हो चाहे वह शिक्षक जिंदगी खुद ही क्यों ना हो या फिर माता पिता या भाई बहन धर्मगुरु स्कूल कॉलेज की टीचर सबको मैं झुककर प्रणाम करती हूं और अंतिम 2 पंक्तियां इस संदर्भ में मैं कहना चाहती हूं ,
" ए शिक्षक तेरा हर सबक मेरे काम आएगा ,
ए शिक्षक तेरा हर सबक मेरे काम आएगा।
मैं रहूं ना रहूं हमेशा ऊंचा तेरा नाम आएगा।
मैं रहूं या ना रहूं हमेशा ऊंचा तेरा नाम आएग
*हरमीत कौर छाबड़ा
शिक्षिका ( शासकीय हाई स्कूल खातीपुरा , इंदौर)
खजराना गणेश जी से प्रार्थना... मनहरण घनाक्षरी छंद में...
हे गणेश गणपति खजराना अधिपति ,
भगवन हमें अब यूँ ना बिसराइये।
महादेव गौरी सुत कार्तिक अनुज तुम,
गजानन थोड़ी सी तो कृपा बरसाइये।
पीड़ा से सिसक रहा जन गण मन अब,
मेरे प्रिय देश में अमन कर जाइये।
भूलेंगे ना कभी हम तेरी ऐसी महिमा को,
देवादेव देवव्रत दुख हर जाईये।
*रश्मि चौधरी*
*इंदौर*