Monday, September 28, 2020

हिंदी पखवाड़े पर इंदौर संघ लेखिकाओ के पसंदीदा पुस्तकों पर विचार



एक सच्चा रिश्ता एक अच्छी किताब की तराहा होता है, कितनी भी पुरानी हो जाए,
फिर भी शब्द नहीं बदलते,
रास्ते बहुत मिलेंगे भटकाने के लिए,
लेकिन संकल्प एक ही काफ़ी है,
मंज़िल तक जाने के लिए,
इन्दौर लेखिका संघ ने हिंदी पखवाड़े पर एक अनूठा कार्यक्रम आयोजित किया जिसका विषय था कि "लेखिकाओं की  पसंदीदा पुस्तक" के बारे में बताएं। कार्यक्रम का प्रारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। कार्यक्रम में 35 लेखिकाओं ने भाग लेकर अपने पसंदीदा पुस्तकों के बारे में विचार व्यक्त कर अनमोल रत्न बिखेर कर कार्यक्रम को बहुत ही रोचक बना दिया । सर्वप्रथम विनीता तिवारी ने अमृता प्रीतम द्वारा लिखित पिंजर उपन्यास पर अपने विचार व्यक्त किए और कहा "इसमें भारत और पाकिस्तान दोनों की मोहब्बत है "।स्वाति तिवारी जी ने पसंदीदा उपन्यास मन्नू भंडारी अत्यंत चर्चित उपन्यास "आपका बंटी  "पर अपने विचार  व्यक्त  करते हुये कहा कि है  यह उपन्यास हिंदी उपन्यासों के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाने वाली कृति है।   शोभा रानी के बारे में  प्रेमचंद की गोदान सुनीता श्रीवास्तव ने जयशंकर प्रसाद की कामायनी ,सुषमा व्यास ने  शिवाजी सावंत द्वारा रचित मृत्युंजय अपनी पसंदीदा पुस्तकें बताई। मीना गोदरे ने डॉ जयकुमार जलज की "महावीर का बुनियादी चिंतन " और संध्या राय चौधरी ने  शिवानी की "चौदह फेरे "मंजुला भूतडा ने मैथिली शरण गुप्त की "पंचवटी" ,रिचा बियाणी ने साकेत और ममता तिवारी ने शरत चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित" ग्रामीण समाज एवं काशीनाथ "पसन्दीदा पुस्तक पर अपने विचार प्रस्तुत किए ।
आशा जाकड़ ने लेखिका संघ की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ पुष्पा रानी गर्ग की पुस्तक रामचरितमानस में प्रबंधन पर विचार और अंजुल कंसल ने हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला पर कविता प्रस्तुत की ।हेमलता शर्मा ने अपने पसंदीदा पुस्तक जीप पर सवार इल्लियां,प्रेरणा जी ने श्रीमद्वभागवत ,कुसुम सोगानी ने "गुनाहों का देवता" माया कॉल ने "चंद्रकांता संतति ',डॉ सुधा चौहान ने रामचरितमानस ,वंदिता श्रीवास्तव ने शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की "दत्ता"और मुन्नी गर्ग ने पसंदीदा कहानी "गूंगा" पर विचार व्यक्त किए ।
मधुलिका सक्सेना ने कविता सुनाई, वंदना पुणे ने प्रेमचंद जी की शिक्षाप्रद कहानियाँ,,  सुरेखा भारती ने दुष्यंत कुमार जी की" साए में धूप" और चेतना जी ने  अ अध्यक्षीय उद्बोधन के साथ विष्णु प्रभाकर  की "आवारा मसीहा "पढ़कर  शरद जी के संपूर्ण प्रमाणित जीवन चरित्र दर्शाया । ऊषा गौर ,मनीषा व्यास और सरिता काला,ज्योति सिंह आदि ने पसंदीदा पुस्तक पढ़ कर खुशी जाहिर की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वाति तिवारी जी ने की और कार्यक्रम के बीच बीच में बहुत ही अद्भुत चीजें दिखाकर जैसे मिट्टी की किताबें वाटर लाइब्रेरी और पुराने मित्र चित्र इमारतें आदि दिखाकर कार्यक्रम को और भी मनमोहक बना दिया। संचालन डॉक्टर अंजुल कंसल ने किया और  सचिव विनीता तिवारी ने आभार  माना।


Sunday, September 27, 2020

October shubh sankalp

शीर्षक - " हिंदी को बचाओ "🙏

अंग्रेजी के चलन  से विलुप्त हो रही हैं, 
हिंदी मातृभाषा से आम हो रही हैं। 🌹

सोच दिन व दिन बदल रही हैं, 
हिंदी में बात करने में तौहीन हो रही हैं l🌹

बच्चों को हिंदी के अंक समझ नहीं आते हैं, 
अपने ही कोर्स की किताब नहीं पढ पाते l🌹

विदेशी हमारी भाषा को सिख रहे हैं, 
हम बेवकूफ बन उनकी भाषा अपना रहे हैं l🌹

गुड मॉर्निंग की जगह सुप्रभात नहीं बोलते, 
अपनी दिन को शुरुआत ही नक़ल से करते l🌹

सभ्यता संस्कृति दर्शाती हैँ हिंदी 
भारत कि आन और शान हैँ हिंदी 🌹

महादेवी जी, हरिवंश रॉय कि याद दिलाती हैँ 
हिंदी से जब उनकी रचना भाव दर्शाती हैँ। 🌹

कबीर,रहीम के दोहे जब दो लाइन मैं पड़ते हैँ, 
जीवन कि सच्चाई से हम रूबरू होते हैँ। 🌹

बदलो चाहे जितना पर अपनी पहचान ना खोने दो, 
अपना लो मात्र भाषा हिंदी को  विलुप्त न होने दो ll🙏🌹



            * प्रेरणा सेन्द्रे

कानपुर नगर, उत्तरप्रदेश
विधा-नवगीत
विषय-*जीवन का आधार हिंदी*

मेरे जीवन का आधार है हिंदी,
भारत मां की आवाज है हिंदी,
हिंदू, मुस्लिम,ईसाई या हो सिंधी,
सबकी प्यारी भाषा होती है हिंदी।

हिंदी भाषा प्रेम का गागर है,
हमारी संस्कृतियों का सागर है,
प्राचीन संस्कृति को हमें बचाना है,
हिंदी को विश्व पटल पर लाना है।

बावन अक्षरों  का योग है हिंदी,
संधि समास का संयोग है हिंदी
भारत माता  की बिंदिया है हिंदी,
भारत की गौरव की गाथा में है हिंदी,

रामचरितमानस की भाषा है हिंदी,
कबीर रहीम तुलसी की कविता है हिंदी,
'ओम'कवियों की प्रियभाषा होती है हिंदी
भारत की प्यारी राष्ट्रभाषा भी है हिंदी।।
*ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम कानपुर नगर उत्तरप्रदेश



🍁🍁 बंधन 🍁🍁

बंधन तो बंधन होते है l 
संबंधों का वंदन है l 
माँ का मान बढाती है l 
उस वीर वधू का वंदन है l

संस्कारों कि पहनकर माला,  
जोड़ा दो परिवारों को l 
अपने स्नेह से सिंचित कर, 
सुरभित किया घर आँगन को l 

मेहंदी हाथों में सजी है,  
नयन स्वप्न लीन है l 
स्वयं को श्रंगारित करती, 
वीर की प्रतीक्षारत रहती l 


वीर वधू का वंदन है l 
उस वीर वधू  का वंदन है l 
माँ का मान बढाती है l 
उस वीर वधू का वंदन है l 

*रेखा दवे,  विशाखा 




बापू की राह पर चलकर,
हम जीना सीख गये,
जो वचन था ,
उसे निभाना सीख गये,
 मौन की ताकत जब जाने,
जीवन को बदलना सीख गये,
शब्दों का मुल्य क्या है,
वक्त ने हमें सिखाया,
बापू की राह पर चलकर,
मंजिल को पाना सीख गये,
इरादों को मजबूत बनाकर, चट्टानों को हिलाना सीख गये,
इस ताकत को जब जाना,
जीवन को जीना सीख गये,
वक़्त ने चुनोतियाँ दी,
चुनोतियों से टकराना सीख गये,
बापू की राह पर चलकर, 
हम जीना सीख गये।

*कल्पना ओसवाल


          फिर आओ महात्मा गांधी

चल रही है झूठ हिंसा अनैतिकता की आंधी।
देश को बचाने फिर से आओ महात्मा गांधी।
सत्य का सूरज अस्त हो रहा।
अहिंसा का पुजारी पस्त हो रहा।
झूठों का सिक्का देश में चल रहा।
सच्चा आदमी भूखों मर रहा
नशे की  गिरफ्त में हर युवा झूम रहा।
पतन की गर्त में देश है जा रहा।
सत्य अहिंसा के इस देश में।
नाच रही हिंसा विद्रूप वेश में।
अहिंसा का पताका फिर से फहराओ।
हे!बापू जल्द ही तुम लौट आओ।
देश की कन्याएं शर्म से गड़ रही हैं।
बलात्कारियों से  वो मर लड़ रही हैं।
बच न पा रही हैं सीता अहिल्या द्रोपदी।
आई चहुँ ओर दुःख विपत्ति।
बापू!कृष्ण बन कर आओ।
चिर बढ़ाकर लाज बचाओ।
फिर से सुख शांति की बंसी बजाओ।
हे!गांधी इस धरा पर स्वर्णिम युग लेकर आओ।

          * डॉ. शैल चन्द्रा


।।   गणेश वंदना  ।।
      विधा   हाइकु 
स्वरचित स्मिता जैन

जय गणेश
हम सबके ईश
नवाते शीश।

हे विघ्नहर्ता
रिद्धि सिद्धि के संग
लाए आनंद।

श्री गजानन
जन जन के प्यारे
आप पधारे

नया आयाम
लोकमान्य तिलक
पूजा पंडाल।

दस दिनों में
हर साल उत्साह
भीड़ अपार।

बप्पा मोरिया
हर घर में आया
धूम मचाया।

हे गणपति
करे पूजा आरती
मिले सुमति।

मोदक थाल
लेझीम ढोल ताशा
नाचे दे ताल।

आया अनंत
गणेश विसर्जन
दुखित मन।

अगले साल 
लाल बाग के राजा
तू जल्दी आना।

    🌹 कब आओगे 🌹
 हे मधुसूदन माधव मनोहारी नंदलाल,
   कसक ये रूहानी कब मिटाओगे ,,,?
हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,,,,?
उदास मन निकुंज की यह गलियां सारी ,
मृदुल मुरली की तान कब लगाओगे ,,?
 हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,,?
 सूना सूना यमुना तट का उपवन,
 कह रही गोपिया संग राधा रास रचाओगे
हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,
मनमोहक चितचोर अनोखी छवि तुम्हारी,
छाई जीवन में उदासी हरने कब आओगे,?
हे कृष्ण कहो कब आओगे ,,,,,,,?
प्रेम दीवानी मीरा का इकतारा पुकारे,,, 
बोल रही राधा की मखमली  प्रीत,
 हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,,,?
रुकमणी हृदय कमल करे सोलह श्रृंगार,
मधु प्रेम विरहन के चित उपवन की चाह, 
हे कृष्ण कहो कब आओगे,,,,,,,?
       
*मधु वैष्णव "मान्या"
त मौलिक रचना ई बुक के लिए कृष्ण जन्माष्टमी पर रचना ई बुक के लिए जन्माष्टमी की रचना
बापू की राह पर चलकर,
हम जीना सीख गये,
जो वचन था ,
उसे निभाना सीख गये,
 मौन की ताकत जब जाने,
जीवन को बदलना सीख गये,
शब्दों का मुल्य क्या है,
वक्त ने हमें सिखाया,
बापू की राह पर चलकर,
मंजिल को पाना सीख गये,
इरादों को मजबूत बनाकर, चट्टानों को हिलाना सीख गये,
इस ताकत को जब जाना,
जीवन को जीना सीख गये,
वक़्त ने चुनोतियाँ दी,
चुनोतियों से टकराना सीख गये,
बापू की राह पर चलकर, 
हम जीना सीख गये।

*कल्पना ओसवाल

दशहरा पर्व की सार्थकता----
      दशहरा पर्व तभी सार्थक होगा जब हम राम और रावण के विरोधाभासी चरित्र एवं दोनों के बीच हुए युद्ध के कारण और परिणाम को समझें। राम अर्थात जिसके स्मरण मात्र से मिले आराम ही आराम शील, सौंदर्य और शौर्य का समन्वित रूप और सदाचार नीति और लोक मर्यादा आदि गुणों की खान राम। रावण विद्वान था चारों वेदों का ज्ञाता था और ज्योतिष विद्या में पारंगत था। भगवान शंकर ने स्वयं अपने घर की वास्तु शांति के लिए उसे बुलाया था।लगनशीलता और निडरता उसके दो मुख्य गुण थे उसकी उपलब्धियों में रसायन शास्त्र के ज्ञान के आधार पर अग्निबाण और ब्रह्मास्त्र बनाना, वेदों कीऋचाओं का अवलोकन कर विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान और आयुर्वेद की जानकारी आदि हैं और तो और वह कवि भी था ,उसकी प्रमुख कृति है"शिव तांडव स्त्रोत"।
   परंतु  अभिमान वश उसने राम से युद्ध न करने की बात अपनी पत्नी मंदोदरी अपने पुत्र प्रहस्त भाई कुंभकरण और बूढ़े नाना मालयवंत की भी नहीं सुनी उसके नाना ने उससे कहा था---
" जब ते तुम सीता हर आनी
 असगुन होहिं ना जाहि  बखानी"।
 पर उसने अपनी भूल  स्वीकार नहीं की।
   यह तो निर्विवाद सत्य है  कि अपनी भूल मान लेने से सुधार के रास्ते भी खुल जाते हैं। मन में अंधेरा होने पर कोई भी एक खिड़की खोल देने से रोशनी दरवाजे से टकराकर वापस नहीं जा सकती और जिसके मन में रोशनी को  जगह  मिल गई जिसने एक बार उसकी कीमत जान ली उसके मन में कभी अंधेरा हो ही नहीं सकता।
  एक ओर रावण राज्य लोकतांत्रिक नहीं था वही राम राज्य में राम के द्वारा जन भावनाओं का आदर करना किसी से छुपा नहीं है। एक साधारण धोबी के कहने पर उन्होंने सीता का परित्याग किया यह क्या कम था? यह सब राम ने जनता के आचरण को श्रेष्ठ बनाने के  लिए किया राम के राज्य में" नहीं दरिद्र   कोउ दुखी न दीना
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।"
    रावण राज्य की बढ़ती अनैतिकता के फल स्वरूप राम रावण युद्ध हुआ ।भगवान राम ने अपराजिता माता की विधिवत पूजा करके असुर  रावण कीअसुरता को सदा सदा के लिए समाप्त कर दिया। यह दिन था अश्विन महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का, जो दशहरा कहलाया।
    असत्य पर सत्य की विजय,अन्याय पर न्याय की विजय, अधर्म पर धर्म की विजय, दुष्कर्म पर सत्कर्म की विजय होने पर विजयदशमी कहलाया जो प्रतिवर्ष हमारे सामने आता है।
    विजयादशमी पर्व आते ही हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है तो आइए अबकी बार विजयदशमी के इस पर्व पर संकल्पित होकर मनका एक कोना उजास के नाम कर दें ताकि अंधेरों की कड़ियां ना जुड़े और  भूलो  तथा  गलतियों की जंजीर ना बने  ऐसा करने पर निश्चित रूप से हमारे कानों में समस्त विश्व के सम्मिलित स्वर  गूंजेंगे----
"देश हो तो भारत जैसा जहां सर्वत्र रामराज्य की बयार बहती है।"
       जय श्रीराम
   .

   *    लीला कृपलानी

दोहे में बसे   राम 
=======


   दहन दशानन में जगत ,  अहंकार कर राख ।
  
 मानवता  की  होय तब ,  जयकारा औ'साख ।।


शूर्पनखा बदला लिए , रावण किया  विनाश ।

  भस्म स्वर्ण लंका हुयी   ,  दर्प -दंभ का नाश ।


अवगुण  पर सद्गुण विजय  , कहे दशहरा पर्व।

अमल करें  हम सब तभी  , जगत करेगा गर्व ।


सकल  विश्व में मच गयी   ,  देख  दशहरा  धूम 

 परंपरा के ज़ोश   में , लोग रहें  हैं झूम 

दूर बुराई सब करें  ,  तभी मिलेगें   राम 

अहं मिटा  लंकेश का  ,  भू बनी  स्वर्ग -धाम ।


 सकल विश्व  से  होय अब   , लंकेशों  का अंत 

रक्षित नारी तब  रहें  ,  शेष कहीं न  असंत


रावण का वध  के लिए   , चला राम सम तीर 

  खत्म   दुष्ट होंगे तभी ,  तभी मिटेगी पीर ।   


राम राज्य में लंकपति ,    चले  कपट  की चाल 

 सीता का करके हरण  , फँसा मौत के जाल ।


  राम पधारो आज तुम , मिटा जगत-  व्यभिचार ।
l
  बसे प्रेम सद्भाव फिर ,' मंजु 'सकल संसार ।
*डॉ मंजु गुप्ता
19  द्वारका , प्लॉट -31




आओ सीखें आज हम कुछ  शिष्टाचार।
आती है जिससे फिर जीवन में बहार ।।
सूर्योदय से पूर्व उठने की अब आदत डालो
तन मन को प्रसन्न करने की आदत डालो ।।
आँखे खुलते ही करो पहले प्रभु स्मरण ।
फिर उठते ही माता पिता को करो नमन ।।
आँख मुँह धोकर करो फिर योगाभ्यास ।
प्राणायाम का भी करो नित्य प्रयास ।।
दातुन ब्रश ऊपर नीचे गोल घुमाकर ।
दाँतो को रखो स्वस्थ सफेद बनाकर ।।
पियो खाली पेट अब तुम गुनगुना पानी ।
है जीवन के लिए अमृत समान ये पानी ।।
कर स्नान जाओ तुम प्रभु दर्शन हेतु मंदिर ।
करो अब स्वास्थ्य वर्धक नाश्ता शाकाहार।
मूक पशुओं पर मांसाहार से न करो प्रहार ।।
करे अब विद्यालय की पढ़ाई मन लगाकर ।
ख्वाब को साकार करो लक्ष्य तुम बनाकर ।। 
खेलो कूदो पढ़ो और पढ़ाओ  वापस घर आकर ।।
बढ़ेगी प्रसन्नता तुम्हारी साथ दोस्तों का पाकर ।।
भोजन से पूर्व सदा हाथों को अच्छे से धोना ।
छूटने न पाए फिर हाथों का कोई भी कोना ।।
रहो तुम आबाद सूर्यास्त के पूर्व करके भोजन ।
रात्रि में दूध पीने से स्वस्थ रहता है तन मन ।।
जल्दी सोना भी अच्छे स्वास्थ्य की निशानी ।
बढ़ता है वो सदा आगे जिसने बड़ो की बात मानी ।।

*प्रणिता राकेश सेठिया *परी*




         लघु कथा
शीर्षक - "धरती के भगवान "

खट -खट -खट ....दरवाजे पर लगातार थाप पड़ रही थी ।बाहर जितना कोहराम था ...अंदर शायद उससे भी ज्यादा ।घर के अंदर दो बच्चे और बच्चों की मां बिलख -बिलख कर रो रही थी ।सामने खड़े एक मर्द के आगे हाथ जोड़ कर विनती कर रहे थे .....
"नहीं ,पापा, प्लीज ,मत जाओ पापा "
"हमारी तरफ भी देखो ना पापा , आप कहीं नहीं जाओगे पापा , प्लीज़ "
" आप को कुछ हो गया तो हम क्या करेंगे ...हमें कौन संभालेगा ??आपके सिवा मेरा और इन बच्चों का है ही कौन??" पत्नी दहाड़े मार-मार कर कह रही थी ।
"पर शीला , मैं एक डॉक्टर हूँ ..मेरा कार्य ही लोगों की सेवा करना है ।डॉक्टर बनने के बाद हम सेवा की शपथ लेते हैं ।बाहर कोई मुझे बुला रहा है ...मेरी राह देख रहा है ...अगर एक मिनट की भी देर हो गई ....तो ...तो ..नहीं ,नहीं ,भगवान कभी माफ नहीं करेगा ...मैं जा रहा हूं ...मुझे मत रोकना .."और डॉक्टर साहब दरवाजा खोल कर बाहर आने वाले के साथ चल दिए किसी की जान बचाने ।
इधर घर के अंदर माँ व बच्चे रोज की तरह रो-चीख कर चुपचाप हो गए ।डॉक्टर पति सुनते ही नहीं थे ।वे न दिन देखते , न रात, न गरमी ,न बारिश ...जब भी ,जहाँ भी उन्हें पुकारा जाता ...दौड़े चले जाते ।वह सब तो ठीक था पर अब ...इस महामारी में ...ऐसे माहौल में ... कहीं भी दौड़ पड़ते हैं ।बिना सोचे -समझे ..बिना हमारी फिक्र किए ....यही सोचते-सोचते  बच्चों के साथ उनकी माँ भी जहाँ थे ..जैसे थे ..वही सो गए ।सुबह मोबाइल की रिंग ने शीला को उठा दिया ।उनींदी आंखों से मोबाइल कान पर लगाया और बोली ,"हेलो .."
" हाँ ,शीला ,मैं बोल रहा हूँ ..थोड़े दिन एक होटल में रहूँगा... घर नहीं आऊँगा... नहीं, नहीं... गलत मत समझना...क्योंकि मुझे बच्चों की और तुम्हारी फिकर है ...इसीलिए ...तुम चिंता मत करना और  हाँ, एक एटीएम कार्ड घर पर रख कर आया हूँ...यहाँ बहुत मरीज आ रहे हैं ....उन्हें मेरी जरूरत है ...अपना ध्यान रखना ..बाय .." और फोन कट गया ।

कौन कहता है कि भगवान ऊपर आकाश में ही रहते हैं ।वे हमारी इस धरती पर हमारे आसपास ही मौजूद हैं।हमारी धरती के भगवान ...हमें जीवन देने वाले ...हर समय मौजूद... हमारी रक्षा करने के लिए... शत् शत् नमन उन्हें......।
*उषा गुप्ता
इंदौर



शीर्षक - अहम् भरा जो निमंत्रण आया
********************************
अहम् भरा जो निमंत्रण आया 
शिव जी ने गणपति को बुलाया,
गणपति ने जाना स्वीकारा 
फिर कुबेर घर लौट चले।

गणपति ने शुरू भोज किया है,
श्रीफल खा के पेट भरा न,
खाएँ राशन पेट भरा न,
बर्तन सारे निकल गए।

खायी रसोई पेट भरा न,
खाएँ गोदाम, पेट भरा न,
गहने खाएँ, पेट भरा न,
बोले अब तुझको खाऊँगा।

थे कुबेर को प्राण बचाने,
शिव जी के वह द्वार पधारे,
बोले शिव जी पान खिला दो,
खा उसे भोजन पूर्ण मानते।

अब कुबेर का अहम् है चूर,
गणपति का भोजन भी पूर्ण
पर गणपति का पेट भरा न,
है कुबेर को क्षमा किया।

*- कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज

(कुबेर को अपनी धन-संपत्ति का बहुत घमंड था। अपना धन-वैभव को दिखाने के लिए उसने शिवजी को भोजन के लिए आमंत्रित किया। अर्न्तयामी शिव जी ने निमंत्रण में गणेश जी को कुबेर का घमंड को दूर करने के लिए भेजा। गणेश जी जब निमंत्रण पर गए तो वे सारा भोजन चट कर गए। सारा भंडार कुबेर का खाली हो गया परंतु गणेश जी का पेट न भरा। पर सच तो यह था कि माँ पार्वती के द्वारा खिलाए गए एक कौर से ही गणेश जी की भूँख शांत हो जाती थी। फिर गणेश जी गुस्से से बोले- तुम मुझ एक को ही तृप्त नहीं कर सकते!  मेरी भूख शांत न कर सके तो कुछ न मिलने पर मैं तुम्हें खाऊंगा। अपने प्राण संकट में जान कुबेर भागते हुए शिवजी के पास गए,  शिवजी ने कहा पान से भरी थाली गणेश जी को दे दो। पान खा लेने के बाद भोजन पूर्ण माना जाता है। गणेश जी को कुबेर ने पान खिलाया, उनका भोजन पूर्ण मान लिया गया पर गणेश जी की भूँख शांत न हुई थी। कुबेर का घमंड चूर हो चुका था। गणेश जी ने कुबेर को क्षमादान दे दिया।)

(2)
शीर्षक - विद्रोह
**************
ले चलो ऐ 'अश्व' मुझको उस धरा के छोर
पाप रहित क्षेत्र हो; तम न हो; हो भोर।

भ्रमण करता 'क्षेत्र' में; गर्दभ-मति लिए हुए;        
पशु,प्रेत बन भटक रहा अज्ञात; शून्य से परे।      

देखता हूं मन की हलचल; लोचन का प्रकाश ले;
कह न 'बधिर'; सुन सका न गूँज अन्तर्रात्मा की; 

था विचार चल पड़ूँ सत्य मार्ग ओर;
है 'परिश्रम'; चल पड़ा मैं तम मार्ग ओर; 
तम में आकर सब ही 'गुह्यतम'; खुल सका न 'भेद'  
खुद को खोया; अश्व खोया; छुट गयी थी डोर;

तम में खा-खा स्पंद; नव ज्योति में आया;           
नव ज्योति में आया और अश्व को पाया।

बोला उससे- "अश्व मुझको! ले चल नगर ओर";
'नगर' में आया; 'चित्र' विचित्र ही पाया।
मानव 'मशीन'! या ''मशीन' मानव'!.. रहस्य ही रहा।       
बम 'मनुज! या मनुज 'बम'!..कुछ समझ न यह सका।

भू , वात, शून्य 'उच्छ्वास' हैं भरते;          
'विज्ञान'का तूने 'प्राचीर' बनाया;                    
तोड़ दे प्राचीर को वो श्वांस भरेंगे;
त्यज मोह; राह ये छोड़; 'ध्वंस' करेंगे।

ले चलो ऐ अश्व मुझको वन हरित उस ओर;
'विपिन' में आया; मन 'शांति' को पाया;        
'विहग-कलरव' छोर-छोर 'गूँज' हैं मचती;      
बिल्लियों को बिल्लियां ही नोंचतीं रहती।

'सर्प' जैसे 'शशक' का अनुसरण करता;          
'शशक' गर्दन मोड़ फिर-फिर दौड़ता रहता;
वृक्ष से जा भिड़ा; फँस गया 'झाड़ियों' में;
कंटकों में पैर थें; शिकार बन गया।

'सर्प' तो यहां भी हैं; 'गेंडुरी मारे हुए;
लगता करते 'अनुसरण'; 'शिकार' करेंगे।
'सर्प' अतिथि बनकर आतें; हैं 'अतिथि-सत्कार' करवातें; 
बनकर 'स्वजन'; डस कर 'स्वजन' राज करेंगे।

ले चलो ऐ अश्व! मुझको उन युगों की ओर 
जहां 'श्री रामचंद्र' और थें 'माखन चोर';

'त्रेतायुग' में शांति है; पशुओं में मित्रता है;
'अनुज' यहाँ 'अग्रज' का विरोध है करता 
क्योंकि वह 'असत्य संगी'; 'सिया' का हरण किया;
खो दिया 'भ्राता' उसने; असत्य खो दिया;
भेद कह दिया(कि रावण की नाभि में अमृत है)
सत्य विजय  हो गया;
विजयदशमी पर्व रूप याद बन गया।

युध्द 'कुरुक्षेत्र' में; जन ने संहार किया;
जन ने 'स्वजन' पर ही 'वार' है किया;
युध्द में पितामह हैं; भ्राता,चाचा,पुत्र हैं;
'शर' से स्वजन पर प्रहार है किया;
क्योंकि वे 'असत्य संगी'; असत्य पर विद्रोह जो 
खो कर 'स्वजन' को है 'सत्य' संग रहा।

कौणप कलयुग के हैं ऊँचे आसन पर      
'भ्रष्टाचारी' कलयुग का शैतान है बना;
'दीन' का रक्त चूसे; रक्त में वृद्धि करता;
'कंगाल' करके 'कंकाल' कर दिया;
कृष्ण! हे राम! तू कलयुग में ओझल;
नारायण जी! फिर से अवतार ले लो।
      
-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज

(शब्दार्थ:गर्दभ=गधा, शून्य=ईश्वर, लोचन=आँख, बधिर=बहरा, तम=अँधेरा, अश्व=घोड़ा, गुह्यतम=छिपना, स्पंद=झटका, मनुज=मनुष्य, वात=हवा, शून्य=आकाश, प्राचीर=दीवार, विपिन=जंगल, विहग=पक्षी शशक=खरगोश, कंटकों=काँटों, अनुज=छोटा भाई, अग्रज=बड़ा भाई, जन=इंसान, शर=बाण, दीन=गरीब, रक्त=खून, कंगाल=हीन, कौणप=राक्षस)


(3)
शीर्षक=मुट्ठी से लुटा दिया 
***********************
टप-टप बूँदें शोर मचाएँ;
चप्पल पहनें घन ज्यों भागें।
टर्र-टर्र की ध्वनियाँ काटे,
झींगुर की संग बोलियाँ।

पत्तों का वह फड़-फड़़ होना;
चमगादड़ का फड़फड़ाना;
धड़कन की भी गूँजे धक-धक;
सन्नाटा क्या बोल रहा!

लिए चाँदनी बन बैठे हैं
भूत भयानक वृक्ष कई;
पसर पड़ा सन्नाटा ही
या सन्नाटा है बोल रहा!

गरज पड़ा; घन बरस पड़ा है;
तूफानों से उलझ पड़ा है;
जब बरसे तूफान भी संग में;
गरज पड़ा घन बरस पड़ा।

लुप्त हुए तारक समूह भी;            
जुगनूँ की चम-चम भी गायब।

खड़ा हुआ जो फल देता है;
पंछी को छाया देता है,
पीछे करने के मक़सद से
लंगी मार उसे भागे आगे,
मंजिल क्या तूफान न जाने;
अनजान बन दौड़ रहा।
तूफान भी दौड़ रहा है...
तूफान भी दौड़ रहा।

गहरी जिसकी जड़ है;
जिसने अन्तर रस जाना;
वह जीना है जाना,
वह जीवन है जाना।

पत्तों का वह फड़-फड़ होना;
चमगादड़ का फड़फड़ाना;
झींगुर ने भी चुप्पी साधी;
उल्लू भी खामोश हुए;
सूरज ने सिर से अपने 
ज्यों घूँघट हटा लिया।

बालक की नौकायें बहतीं,
इंद्रधनुष दिखता सतरंगी।
पंछी के पंखों पर पसरी 
मुक्ता रूपी बूँद ढुलकती,         
पल्लव ने उन बूँदों को तो        
गोद बिठाया है,
प्रकृति ने जो लोटा भर-भर 
कल खूब नहाया है।

तूफान भी मंद पड़ा अब,
धूल उड़े न; धरती भीगी;
धरती के उस कीचड़ पर 
कुछ कमल विराजे हैं।

पंछी अब हैं चहचहायें;
हंस तलैया तिरते जाएँ;              
सकारात्मकता अवि ने              
मुट्ठी से लुटा दिया।

-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज

(तारक= तारा, पल्लव=पत्ता, मुक्तक=मोती, तलैया=तालाब, अवि=सूर्य)

(4)
शीर्षक- कौन बड़ी यह बात है
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दहेज लिया था तीस लाख

जब बेटे की शादी होनी थी।

दहेज दिया था बीस लाख जब

बेटी की शादी होनी थी ।



सब देते है, सब लेते है

कौन बड़ी यह बात है

वह देते है तब लेते है

कौन बुरी यह बात है।



करते जघन्य अपराध

कहते कौन बड़ी यह बात है।



घूंस ले लिया, नकल कराया

शिक्षा को व्यवसाय बनाया।

बच्चों के फ्यूचर से क्या लेना

हमें पैसों से प्यार है।



करते जघन्य अपराध

कहते "कौन बड़ी यह बात है।



काला धन दे काम करा लूं

चलो खरीद उन्हें लेते है

यह ओछी ही सोच तेरी

भ्रष्टाचारी पैदा कर जाती।



वह बिकते है तब खरीदते

कौन बुरी यह बात है।



करते जघन्य अपराध

कहते "कौन बड़ी यह बात है"।



व्यवसाय था अच्छा-खासा

पैसा भी बढ़िया आता था

घूंस लिया तब काम किया फिर

कौन बड़ी यह बात है।

करते जघन्य अपराध

कहते कौन बड़ी यह बात है।

 

अन्याय का विरोध न करते

उसको तुम मजबूरी कहते   



हरिश्चंद्र राजा न कहते

साधारण इंसान है।

हनुमान तेरे भीतर शक्ति

याद करो उस शक्ति को

तोड़ दो उन जंजीरों को

जो तुम्हें बांधने आती है।



ये बातें तो किताबी ही है

बस कोरी ही बातें है

कह मत ऐसा कर्म करो तुम

बड़ी गहरी यह बात है।



झूठ को हमने झूठ कहा

और प्रश्न खड़े भी कर डाले।

पापी-दल भी समझ गया

यह विद्रोह की आग है।



आग में इस जल जाऊँगा।

यह आग नहीं ठंडी होगी।



पांव हटाए तब उसने

और सीधे आया मार्ग वह।



मत सोचो "कोई क्या सोचेगा!"

सत्य का बस दामन थामो। 



तोड़ दो उन जंजीरों को

जो तुम्हें बाँधने आती है।



शुरुआत तो कभी ना कभी

किसी चीज की होती है।

सब चुप है पर तुम बोलो

साधारण कोई इंसान नहीं।



सत्य ही ईश्वर सत्य ही भीतर

याद करो उस शक्ति को।



तोड़ दो उन जंजीरों को

जो तुम्हें बाँधने आती है।

-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज
-----------------------------

(5)
शीर्षक- भुक्खड़
***************************
इस युग में हैं कौन यह भुक्खड़
खा-खा जिनका पेट भरा न,
रक्त चूस कर रक्त बढ़ाया,
निर्धन खा धनवान हुए। 

नमक निगल गए; पेट भरा न,
खाएं जमीं पर पेट भरा न,
मिल खाएं पर पेट भरा न,
चावल की बोगी खाएं। 

सड़क निगल गए पेट भरा न
पुल खाएं पर पेट भरा न,
खाएं रुपए पर पेट भरा न,
हैं मकान भी निगल गए। 

बच्चों का स्कूल कहाँ है!
जो अक्सर कागज में दिखता,
नल, कूप, वह बांध कहाँ है!
जो अक्सर कागज में फिरता।

नौ करोड़ यह खाए हैं अभी
सुबह- सुबह के भोजन में,
आम आदमी का हक खाएं
सुबह-शाम ही भोजन में।

आम आदमी पीता आँसू
सुबह-शाम के भोजन में,
आम आदमी को यह खाते
सुबह-शाम ही भोजन में।

- कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज


(6)
शीर्षक- मृत वृक्ष
**********************************
पंछी के न कलरव; न पल्लव,        
निष्फल मैं; निष्प्राण हूँ।                           
व्याकुल हूँ; मूर्छित खड़ा, मैं   
वृक्ष न हूँ; कंगाल हूँ।                    
                                                 
तूफान आए जो फिर यह 
'भूमि' मेरा बिस्तर होगी।
पर मानूँ न गिर पडूँगा मैं,
तूफानों से लड़ बैठूँगा।

फिक्र नहीं मुझको कि मेरी
देह बिखर जाएगी;              
नीड़ पर नन्हा पंछी अपने            
प्राण गवाएगा।

नीड़ पर बैठे पंछी के मैं 
प्राण बचाऊँगा,
अस्तित्व बचाने को 
अस्तित्व बनाऊँगा।

-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

(पल्लव=पत्ता, निष्फल=बिना फल के, निष्प्राण=बिना प्राण के, व्याकुल=परेशान, मूर्छित=मुरझाया, देह=शरीर, नीड़=घोंसला)

(7)


मोदी जी आपको नमन
*********************
भारत को मन की बात बतलाया,
झाड़ू उठाया, देश स्वच्छ बनाया।
कुटिया सुदामा की महल बनाया।

मोदी जी आपको नमन।

चूल्हे के धुँए में भाजियाँ पकाती थी;
उस माँ को भी तो सिलेंडर दिया।

आतंकी हमले में वीरों को खोया था;
ऑपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक किया

और धारा तीन सौ सत्तर हटाया;
आतंकी से इस देश को बचाया।

भारत सहारा हो; हमने सराहा है ;
मोदी जी आपको नमन।

- कीर्ति जायसवाल,
प्रयागराज


(8)
शीर्षक=धाराओं में बहता जीवन
**************************
'अश्रु' 
वह तो सभी के नेत्रों की धाराएं हैं।
प्रवाहित करो 
तो खुशियों के,

पर इसका तात्पर्य यह नहीं 
कि दु:ख के अश्रु 
भीतर ही समा लो,

'खुशियाँ' और 'दु:ख' 
ये तो सभी के जीवन-संगी हैं।
'खुशियों' को ही निमंत्रण दो,
'दु:ख' दूर ही रहेंगे,

पास तो मैं 
अपनों को भी नहीं आने देती,
'सपना' ही मेरा अपना है 
जो मेरे पास हर पल रहता है।

-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज


(9)
शीर्षक=दर्द उठा हृदय में
***********************
दर्द उठा हृदय में, ये लुत्फ़ उठा रहे हैं,
भीतर ही भीतर रोयी, ताली बजा रहे हैं।

कविता जो हूँ मैं कहती, वह भावना में कहती,
ये दर्द को क्या समझें, ताली बजा रहे हैं। 

-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज


(10)
शीर्षक- काक विहग
************************
तन्हा हूँ पर भीड़ में शायद;
भीड़ में जब - जब तन्हा रहता।
अश्रु से भीगा - भीगा तन है;         
डोर से उलझा जो चला उड़ने।       

काक विहग एक नन्हा सा मैं,
आकुल क्षुधा से चंचु खुला है।    

आकुल दर्द से मेघ हों मूर्छित         
अश्रु प्रवाहित करते जाएँ,
दर्द क्या इनका वृक्ष वो जानें
अश्रु जो उनका पुष्प खिलाए।

कण्टक उबारे 'कण्टक' जो कोई,  
विष पहचाने 'विष' जो हो कोई ।
इंद्रधनुष  जहाँ पल - पल छाए;
टुण्ड्रा के तम को क्या जानें।    

पुष्प क्या जाने 'पत्र' के रंग को, 
पत्र क्या जाने 'पुष्प' के रंग को, 
प्रतिपल संग में;  एक न रंग में;   
रंग - रंग से नव रंग खिलाएँ,      
है क्या प्रयोजन नर को इनसे     
वह तो इसका फल ही जानें।

सूर्य जो आए लुप्त हो 'चंदा',
चंदा जो आए 'सूर्य' भी ओझल।
सूर्य क्या जाने 'चंदा' भी कोई,
चंदा क्या जाने 'सूर्य' भी कोई।
भ्रम में ही दोनों यह ही विचारे
"अम्बर पर एक मैं ही छाया"।        

अम्बर विचारे "सागर नीला",
सागर विचारे "अम्बर नीला"।
अम्बर विचारे "सागर ही छाया",
सागर विचारे "अम्बर ही छाया"।

रंग में जो एक; संग में रहें न,
संग में जो एक; एक रंग में रंगे न।
काक विहग चंचु खोल के बैठा
"बाज ही शायद अन्न खिलाए"।

कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज

(तन्हा= अकेला, अश्रु= आँसू, तन=शरीर, काक विहग= कौवा पक्षी, आकुल=व्याकुल, क्षुधा= भूँख, चंचु=चोंच, कण्टक= काँटा, पत्र=पत्ता, नव=नया, अम्बर=आसमान)

("टुण्ड्रा" एक ऐसा स्थान है जहाँ छः महीने दिन एवं छः महीने रात होती है)
-----------------------------


(11)
शीर्षक=डूब गए
**********************
बिजली की तलवार लिए 
घन तूफ़ांं के प्राण हरे।
ठंडी-ठंडी वात चले                        
पंछी नशे में डूब गए।
वृक्ष-पत्र कुछ यूं लहराएं
ज़ुल्फ़ ज्यों हो हम डूब गए।

हंस की गति ज्यों मंद-मंद               
त्यों मंद-मंद मुस्कान खिले।         
पुष्प-पराग में मधुप विराजे            
पी रस नशे में डूब गए।

टिम-टिम तारे अब हैं गगन में
'रात्रि' या 'दिन' हम भूल गए।
पग फिसला अरे! गिरे नदी में         
होश में अब पर डूब गए।

-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज

(शब्दार्थ: ज्यों=जिस पल, त्यों=उसी पल, मधुप=भौंरा, वात=हवा, ज्यों=जैसे, पग=पैर)

(12)भारत भूमि
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हिन्दू को न हिन्दू कहना,
मुस्लिम को न मुस्लिम कहना,
सिक्ख को न सिक्ख कहना,
ईसाई को न ईसाई कहना,
अपना धर्म उससे भी बड़ा है
मानव हूँ, मानवता धर्म है।

हिन्दू को न हिन्दू कहना,
मुस्लिम को न मुस्लिम कहना,
सिक्ख को न सिक्ख कहना,
ईसाई को न ईसाई कहना,
हम हैं भारत के निवासी
हमको कहना भारतवासी।

भारत माँ तेरी गोद में जन्मा
माँ तुझमें ही सो जाऊँगा।
न मरूँगा, न मिटूँगा
तुझमें ही माँ मिल जाऊँगा।

ऐ सुनो! ओ भारतवासी
माँ के लिए कुछ कर जाओ,
तन तू माँ की गोद में
गगन में नाम सजा जाओ।

अमर जवान कहेगी दुनिया
दिल में तेरी याद रहेगी।
बलिदान तेरा न जाएगा खाली
फल उसका भारत-भूमि चखेगी।

-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज

(13)
04/05/2020

वंदन करते वीणापाणि
********************
हे सरस्वती करते वंदन;
तू ज्ञान की ज्योति जला दे।
नव - प्रभात जीवन मे कर दे;
वंदन करते वीणापाणि

अहं भाव, कोई द्वेष धरे;
तू प्रेम के दीप जला दे।
हिन्दू - मुश्लिम बैर धरें न;
समभाव सिखला दे।

व्यक्ति भ्रष्ट जो क्रूर अभिमानी
ज्ञान के दीप जला दे।
सुख, शांति, समृद्धि हो;
तू सत्मार्ग दिखला दे।

हे सरस्वती करते वंदन;
तू ज्ञान की ज्योति जला दे।
नव - प्रभात जीवन में कर दे;
वंदन करते वीणापाणि। 

-कीर्ति जायसवाल
प्रयागराज


शीर्षक - " हिंदी को बचाओ "🙏

अंग्रेजी के चलन  से विलुप्त हो रही हैं, 
हिंदी मातृभाषा से आम हो रही हैं। 🌹

सोच दिन व दिन बदल रही हैं, 
हिंदी में बात करने में तौहीन हो रही हैं l🌹

बच्चों को हिंदी के अंक समझ नहीं आते हैं, 
अपने ही कोर्स की किताब नहीं पढ पाते l🌹

विदेशी हमारी भाषा को सिख रहे हैं, 
हम बेवकूफ बन उनकी भाषा अपना रहे हैं l🌹

गुड मॉर्निंग की जगह सुप्रभात नहीं बोलते, 
अपनी दिन को शुरुआत ही नक़ल से करते l🌹

सभ्यता संस्कृति दर्शाती हैँ हिंदी 
भारत कि आन और शान हैँ हिंदी 🌹

महादेवी जी, हरिवंश रॉय कि याद दिलाती हैँ 
हिंदी से जब उनकी रचना भाव दर्शाती हैँ। 🌹

कबीर,रहीम के दोहे जब दो लाइन मैं पड़ते हैँ, 
जीवन कि सच्चाई से हम रूबरू होते हैँ। 🌹

बदलो चाहे जितना पर अपनी पहचान ना खोने दो, 
अपना लो मात्र भाषा हिंदी को  विलुप्त न होने दो ll🙏🌹



             🙏~प्रेरणा सेन्द्रे🙏

सूरमयी सांझ के द्वार पर आंखों में उमड़ आए बादल
बादलों को तकती रही, प्रेम का बीज चाहत के धरातल
ना कोई आहट ,ना संदेसा कोई आया बालम
विरह वेदना में जल रहा मन, नम आंखों का काजल
ओ वीर !सुहाग की सेज पर बैठी, राह तकते रहे यह नैना
सोख लिए तकिए ने आंसू यह बिरहा के ओ सजना
देश के ओ सिपाही ,सरहद पार जाना भी जरूरी तेरा
विरह के ओले सहके, वतन की खातिर लहू में भीग जाना तेरा
 बदरा छाए मीठी यादों के, मद माता सावन भी आया
सावन कितना भी बरसा ,पर मेरा साजन नहीं आया
तिरंगे की आन की खातिर, सरहद पर अडिग रहना तेरा
जिस्म से बहते लहू पर ,वतन की मिट्टी को रगड़ना तेरा
बिरहा की अग्नि तेरे और मेरे अंतर्मन में है सुलगती
रूदनो की आह विरह पथ में भटके दिलों में है दहकती
होली ,दिवाली ,करवा चौथ पर साजन ,नैना बिछाये करती रही इंतजार
भूल गई मैं सजना कैसे ,भारत देश प्यारा तेरा दूजा प्यार
तिरंगे मे यूं प्यार से लिपटा हुआ तू जब आया सजना
असुअन बहते आंखों में शुन्य की चेतना, निरंतर अब विरह वेदना
बांट जोहके अबतक नमी आंखों में सोखी के आओ तो साथ साथ भीगे 
मिलन की आस में झेल रही थी एक विरह ,जीवन भर दूजी विरह वेदना तू दे गया सजना......

कविता-
          फिर आओ महात्मा गांधी

चल रही है झूठ हिंसा अनैतिकता की आंधी।
देश को बचाने फिर से आओ महात्मा गांधी।
सत्य का सूरज अस्त हो रहा।
अहिंसा का पुजारी पस्त हो रहा।
झूठों का सिक्का देश में चल रहा।
सच्चा आदमी भूखों मर रहा
नशे की  गिरफ्त में हर युवा झूम रहा।
पतन की गर्त में देश है जा रहा।
सत्य अहिंसा के इस देश में।
नाच रही हिंसा विद्रूप वेश में।
अहिंसा का पताका फिर से फहराओ।
हे!बापू जल्द ही तुम लौट आओ।
देश की कन्याएं शर्म से गड़ रही हैं।
बलात्कारियों से  वो मर लड़ रही हैं।
बच न पा रही हैं सीता अहिल्या द्रोपदी।
आई चहुँ ओर दुःख विपत्ति।
बापू!कृष्ण बन कर आओ।
चिर बढ़ाकर लाज बचाओ।
फिर से सुख शांति की बंसी बजाओ।
हे!गांधी इस धरा पर स्वर्णिम युग लेकर आओ।

      *     डॉ. शैल चन्द्रा


*संझा*

मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में, श्राद्ध पक्ष में सोलह दिन बालिकाओं द्वारा मनाया जाने वाला लोकपर्व। 

जिसमें शाम के समय बालिकाओं द्वारा सूर्यास्त के पूर्व आंगन की दीवार पर गोबर से सुन्दर आकृति बनाई जाती है ,जिसमें चंद्र- सूर्य भी होते है इसे विभिन्न फूल पत्तियों से सजाया जाता है।  सूर्यास्त के पश्चात आरती करके प्रसाद वितरण किया जाता फिर सब सखियाँ मस्ती से ओतप्रोत संजा के मधुर गीत गाती हैं  ।

इसी तरह पंजाब में आली का पर्व, महाराष्ट्र में गुलाबई, बुंदेलखंड में सांझी नाम से श्राद्ध के समय कुछ इसी तरह की परंपराएं मौजूद थीं। 

आधुनिक शिक्षा, शहरों का आकर्षण , टी वी और मोबाइल के प्रभाव से यह खूबसूरत सामाजिक परंपरा   लुप्तप्राय हो चली है ।

संजा हमें स्वास्थ्य, कला, सामाजिकता एवं प्रकृति के दर्शन कराती है। 

यूँ तो मैंने भी मालवा में आने के बाद ही ग्रामीण अंचल की बालिकाओं के इस पर्व और उससे जुड़े उत्साह को देखा , जो एक कलाप्रेमी को सहज ही आकर्षित करते हैं।  

मैं मालवीय बोलना तो नहीं जानती पर मैंने संजा गीत गाने का प्रयास किया है । आप भी इसे सुनिये और आनंद लीजिए , 
साथ ही यह सुन्दर प्रथा जीवित रहे इसके लिये लिंक को सब्सक्राइब अवश्य कीजिएगा । धन्यवाद।  🙏😊

गीत
राम नाम जप ले रे मनवा

गम सब  हर  जाए रे मितवा,रहें न निशा घनेरे।
राम नाम जप ले रे मनवा,निशदिन साँझ-सवेरे।।
रघुवर हैं सकल लोक दयालु ,भर दे सबकी झोली
मोहनी मूरत बसा लें हिय,हो  पूजा  बन टोली
 अर्चन तू कर ले रे मितवा,विपदा न कभी घेरे।
राम नाम जप ले रे मनवा ,निशदिन साँझ -सवेरे
मंगल सुमन खिले घर-आँगन,
खुशियाँ सजाकर लड़ी।
मंगल धुन गूंजे होठो से,
आती रमन शुभ घड़ी।
भक्ति में डुबकी  ले रे मितवा,  मत कर तेरे-मेरे।
राम नाम जप ले रे मनवा ,निशदिन साँझ-सवेरे।।
भाव प्रेम के भूखे  हैं प्रभु ,
करें सबका उद्धार
निर्मल मन बहे  पावन गंग, 
बहाए शुद्ध  बयार।
प्रेमक  धुन रस   ले रे मितवा, फांसे न कभी फेरे।
राम नाम जप ले रे मनवा ,निशदिन साँझ सवेरे
        *   रीतु प्रज्ञा
      

मेरी मातृभाषा 

माँ से सीखी है जो भाषा,
वही है मेरी मातृभाशा।
मेरी मातृभाषा है हिंदी,
जैसे सुंदर मुख पर बिंदी। 
मनोभावों को व्यक्त करना,
बड़े-छोटे में फर्क करना,
यह हमको सिखलाती है।
‘तुम’ और ‘आप’ का प्रयोग सिखाकर,
हमें यह सभ्य बनाती है।
माँ जैसी ही प्यारी है यह,
प्रेम की भाशा कहलाती है।
कथा-सम्राट प्रेमचंद हों,
या महाकाव्यकार तुलसीदास।
रीतिकाल, आधुनिक काल को याद करें,
या आदिकाल, भक्तिकाल की बात करें।
हर काल ने अनेक साहित्यकारों से,
इस भाषा रूपी मुकुट में हैं अनमोल रत्न जड़े।
मातृभाषा में लिखना-पढ़ना, 
जन-जन का अधिकार है।
मन के दुर्भावों को हो मिटाना,
तो मातृभाषा एक सशक्त हथियार है।
मातृभाषा से जो प्यार न हो,
तो हमको धिक्कार है।
माँ का स्थान है सर्वोपरि,
बाद में चाची, ताई को नमस्कार है।
मातृभाषा का प्रचार-प्रसार करो,
हिंद में तो हिंदी का साम्राज्य हो।
हिंदी किसी परिचय की नहीं मुहताज है,
यह जन-जन की आवाज़ है।-2
भावों का सच्चा उद्गार है,
इसमें समाहित जीवन का सार है।
हिंदी मेरी मातृभाषा है,
हिंदी का यश फैले सर्वत्र,
इसके लिए समर्पित ये प्राण हंै।
यह मात्र भाषा नहीं, यह हिंदुस्तान की शा

*सीमा रानी मिश्रा


भाषा की रानी हिंदी 

भारत भाषा का धनी देश है ,
हिंदी इसकी रानी,
अलग-अलग बोली है यहां की,
पर हिंदी सब की जानी पहचानी,
हर भाव के लिए अलग से शब्द है,
सुंदर, सहज, अनूठे, 
अंतर्मन के अनेकों भाव का, 
हिंदी सुंदर अलख जगाती, 
गर्व हमें हम हिंदी भाषी, 
सुंदर इसकी बानी, 
राष्ट्रभाषा यह है हमारी, 
जग में जानी पहचानी l

*डॉ.  कीर्ति यादव
 कस्तूरबा ग्राम रूरल इंस्टीट्यूट 


शिक्षक यानी गुरु। हमारे भारत में शिक्षकों को सबसे ज्यादा सम्मान प्राप्त है।धर्म चाहे कोई भी हो शिक्षक का महत्व कहीं भी कभी भी कम नहीं होता। गुरु टीचर प्रीचर पंडित मौलवी अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग धर्म गुरु ईश्वर का मार्ग बताते हैं। सच्चाई, सत्यता,प्रेम,स्नेह ,भलाई ,परोपकार ,सद् मार्ग इन गुरुओं के द्वारा बताया जाता है। इस संदर्भ में मैं आपको श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के महिमा के बारे बता रही हूं जैसे कि नाम से ही पता चलता है वह ग्रंथ जो कि स्वयं में एक गुरु है।इसमें जो कार्य एक गुरु बताता है वह सारे कार्य बताए गए हैं जैसे कि  इनकी एक वाणी सुखमनी साहिब में बताया गया है कि इंसान को अपनी नेक कमाई का दशम हिस्सा सब कार्यों में लगाना चाहिए, किसी पराई स्त्री की तरफ देखा नहीं करनी चाहिए, झूठ से हमेशा दूर रहना चाहिए काम क्रोध लोभ मोह अहंकार से दूर रहना चाहिए।तू ही हो गई एक गुरु की बात मतलब एक धर्म की बात बाकी सभी धर्मों में भी इसी तरह से बताया गया है चाहे वह वेद हो चाहे पुरान हो चाहे अपने इष्ट कुरान या बाइबल हो सब यही बोलते हैं कि हमेशा सही रास्ते पर चलें और नैतिकता के नियमों का पालन करें। अब मैं अगर धर्म से हटके दूसरी तरह के शिक्षक यानी वह शिक्षक जो स्कूल और कॉलेजों में बच्चों को शिक्षा देते हैं उनके बारे में शब्द कहना चाहूंगी। इन शिक्षकों का कार्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं। अज्ञान से ज्ञान की तरफ,अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाने वाला यह शिक्षक ही तो है बच्चों का हाथ पकड़ कर दुनिया की भीड़ में उन्हें अलग पहचान दिलाने वाला और अच्छा नागरिक बनाने वाला एक शिक्षक ही तो है। असंभव कुछ नहीं सब कुछ संभव है, हम सब कर सकते हैं ,कोई भी कार्य मुश्किल नहीं है यह सब एक शिक्षक ही तो बताता है। चाहे माना आज शिक्षा  एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है पर इस व्यवसाय की मर्यादा और गरिमा को बढ़ाने वाला यह शिक्षक ही तो है । दिन रात सुबह शाम कार्य के दौरान स्कूल में कॉलेज में या घर आकर पूरे समय विद्यार्थियों की प्रगति के बारे में सोचने वाला और क्रियाशील करने वाला जिस शिक्षक ही तो है। और 2020 में तो शिक्षक की भूमिका और भी बढ़ गई है। ऑनलाइन माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा या फिर हमारा घर हमारा विद्यालय के तहत विद्यार्थियों के घर जाकर पढ़ाना वह भी ऐसे कोविड-19 जैसी खतरनाक बीमारी के चलते हुए यह जोखिम भरे काम को सरलता से करने वाला शिक्षक ही तो है।इस संदर्भ में जितना भी लिखा जाए या कहा जाए वह बहुत कम है, आटे में नमक के सामान। मैं अपनी वाणी एवं कलम को यहीं विराम देती हूं। 
         अंत में शिक्षक दिवस पर मैं यह कहना चाहूंगी कि जिंदगी में शिक्षक चाहे कोई भी हो चाहे वह शिक्षक जिंदगी खुद ही क्यों ना हो या फिर माता पिता या भाई बहन धर्मगुरु स्कूल कॉलेज की टीचर सबको मैं झुककर प्रणाम करती हूं और अंतिम 2 पंक्तियां इस संदर्भ में मैं कहना चाहती हूं , 
" ए शिक्षक तेरा हर सबक मेरे काम आएगा ,
ए  शिक्षक तेरा हर सबक मेरे काम आएगा। 
मैं रहूं ना रहूं हमेशा ऊंचा तेरा नाम आएगा। 
मैं रहूं या ना रहूं हमेशा ऊंचा तेरा नाम आएग 


*हरमीत कौर छाबड़ा 
शिक्षिका ( शासकीय हाई स्कूल खातीपुरा , इंदौर)


खजराना गणेश जी से प्रार्थना... मनहरण घनाक्षरी छंद में...             


हे गणेश गणपति खजराना अधिपति ,
भगवन  हमें अब  यूँ  ना बिसराइये।

महादेव गौरी सुत कार्तिक अनुज तुम,
गजानन थोड़ी सी तो कृपा बरसाइये।

पीड़ा से सिसक रहा जन गण मन अब,
मेरे  प्रिय देश में अमन कर जाइये।

भूलेंगे ना कभी हम तेरी ऐसी महिमा को,                  
देवादेव देवव्रत दुख हर जाईये।

*रश्मि चौधरी*
*इंदौर*

Saturday, September 26, 2020

Z
   





लायनेस क्लब ऑफ इंदौर वेस्ट का  आनलाइन कार्यक्रम  सम्पन्न हुआ 
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Nop
जैन जैन
लायनेस क्लब ऑफ इंदौर वेस्ट का  आनलाइन कार्यक्रम  सम्पन्न हुआ  इस  कार्यक्रम  में
*ला. पूनम शर्मा अध्यक्ष*
*ला. अचला गुप्ता सचिव*
*ला. प्रिया जैन कोषाध्यक्ष
कार्यक्रम  अतिथि 
क्लब मार्गदर्शक पा. डि. प्रे. लायनेस निर्मला जी वोहरा, व हमारी पा. म. प्रे. लायनेस प्रभा जी जैन का 
*लायनेस क्लब ऑफ इंदौर वेस्ट*ने  सभी  अतिथियों  का  स्वागत किया l
सचिव ला. अचला गुप्ता सेवा गतिविधियों का त्रैमासिक विवरण प्रस्तुत किया जो  निम्नलिखित  है __
प्रशासनिक सेवा गतिविधियों के अंतर्गत14 अगस्त को डिस्ट्रिक्ट प्रेसीडेंट के शपथ विधि समारोह में क्लब की सहभागिता रही।
15 अगस्त एवं 23 अगस्त को लॉयन क्लब की मीटिंग्स में उपस्थिति रही।
स्वास्थ्य सेवा के अंतर्गत  दवाईयों व अन्य स्वास्थ्य सामग्री के लिए 3 एवं डायलिसिस के लिए 24 सदस्याओं द्वारा सहयोग किया गया।
जन संरक्षण के अंतर्गत कोरोना रिलीफ फंड में 3 एवं जरूरत मंदों को 19 सदस्याओं द्वारा आवश्यक सामग्री का वितरण किया गया।
शिक्षा के क्षेत्र में कुल 4 सेवा गतिविधियां की गईं।
दिव्यांग सेवा के अंतर्गत दिव्यांग बच्चों को मिट्टी के गणेशजी बनाने का निःशुल्क प्रशिक्षण दिया गया और उन्हें मास्क ,खाद्य सामग्री वितरित की गई।
नारी कल्याण के लिए 2 एवं गौशाला में 2 सदस्याओं द्वारा सहयोग किया गया।
शिक्षक दिवस के अवसर पर अनुभूति विजन सेवा संस्थान में 8 शिक्षकों को श्रीफल व तुलसी के पौधे भेंट कर सम्मानित किया गया।
पर्यावरण के संरक्षण हेतु अनेक लॉयनेस बहनों द्वारा घर मे व आसपास पौधारोपण किया गया।
उपर्युक्त सभी सेवा गतिविधियों में कुल 2,46,750 ₹  व्यय हुए।
कुल सेवा गतिविधियां 81 हुई जिसे 89 व अनेक लाभान्वित हुए।
      इस  अवसर  पर साधना  सक्सेना  जी  ,नवनीत  जैन अर्चना जी ने स्वागत  गीत  प्रस्तुत किया l
वैश्विक महामारी कोरोना के दौर में हम सभी महिलाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ पर बुरा असर पड़ रहा है,इन्हीं बातों को मद्दे नज़र रखते हुए *Psychological counselor सुश्री डोली जी* डिसूजा को स्पीकर मीटिंग का  जिक्र  किया गया l
   हम बहनें घर के सभी लोगों का ख्याल रखते हुए  अपने स्वास्थ का  ख्याल कैसे  रखें और आज  के हालात में  तनाव रहित कैसे रहा जाए , इससे सम्बन्धित कुछ लाभ प्रद जानकारी  दी गई l
 रीजनल कार्डिनेटर स्नेह किरण श्रीवास्तव ने अधिकृत यात्रा व उनका बहुत ही सारगर्भित बढ़िया उद्बोधन दिया l
आभा  मेहता  ने  कार्यक्रम  का  संचालन किया l
इस  अवसर  पर  अनामिका  जी  ने  तंबोला  गेम  खिलाया  जिसमें  सभी  ने  भाग लिया, मृदुला सिन्हा ने जन्मदिन  की  बधाई  सभी  सदस्यों  को  प्रदान की  ,प्रिया  जैन  ने  खर्च  आय  का  विवरण  दिया, पूनम  शर्मा  जी  ने  सबका आभार  व्यक्त किया। 


Monday, September 14, 2020

मोगरे के फूल पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम सम्पन्न

मीना  गोदरे  की  पुस्तक  का विमोचन  कार्यक्रम  सम्पन्न 
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हिन्दी दिवस पर  लेखिका  संघ  और  अवनी  सृजन  समूह के  सयुक्त तत्वावधान में  मीना  गोदरे जी  की 
पुस्तक  "मोगरे  का  फूल"पुस्तक  का विमोचन  कार्यक्रम सम्पन्न  हुआ l
य़ह  कार्यक्रम  आनलाइन  आयोजित  किया गया l
कार्यक्रम  में  डॉ  सरोज  कुमार  ,डॉ  कांता  राय  ,श्री  सतीश  राठी  डॉ जय कुमार  जलज  विशेष रूप  से  आमंत्रित  थे l

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद द्वारा हिंदी दिवस पर बच्चों के लिए आनलाइन कार्यक्रम सम्पन्न

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी परिषद द्वारा  हिंदी  दिवस  पर 
 बच्चों  के  लिए  आनलाइन  कार्यक्रम  सम्पन्न 
 हिंदी दिवस पर अंतरराष्ट्रीय हिंदी परिषद मंच पर बच्चों के लिए हिंदी कविता या कहानी पाठ प्रतियोगिता आयोजित की गई 
इस प्रतियोगिता में 16 साल तक के बच्चे ने भाग लिया सभी बच्चे 2 मिनट का ऑडियो या वीडियो कविता या कहानी का बनाकर भेजना  था करें 
प्रतिभागियों के नाम निम्नलिखित है___
1. आशुतोष अवस्थी उम्र 6 साल 1/1 उषा गंज छावनी इंदौर 
2-हिति चौधरी मुम्बई उम्र 8साल
3-आर्यन मदनावत मुम्बई उम्र7साल
4-अवीर सावलानी मुम्बई उम्र9साल
5-कशिका जाकड़ इन्दौर उम्र10 साल
6-हेतवी शाह इन्दौर उम्र5साल
7-अनुष्का यादव
8-अनुष्का सेन्द्रे  इन्दौर उम्र16साल
9-कनुप्रिया गर्ग गुजरात उम्र9साल
10-अविका यादव,इन्दौर उम्र6साल
11- सुविज्ञ सिंह बैंगलोर उम्र8साल
12-प्रदक्ष भटेले, गुजरात 4 वर्ष तेरा 13 आध्या दुबे देवास,12 वर्ष 
14- आर्यमन दुबे देवास 8 वर्ष 15-रिद्धिमा पांडे देवास 5 वर्ष
16-वृद्धि शुक्ला
17-रिशान सक्सेना,अमृतसर
18- नव्या यादव इन्दौर उम्र 6 साल
19- सुहानी श्रीवास्तव उम्र 11 साल 20 -सौमिल श्रीवास्तव उम्र 5 साल 21--जीविका अठवाल उम्र 8साल
22- सूफी हलधर उम्र7 साल
23-ओजस शेष उम्र 5साल
24-राघव शर्मा उम्र 8साल
25-परी अठवाल उम्र11साल
26-शरण्या उम्र साल
27-बेबीसरिता वारासिवनी 8साल
28-आराध्य चौरसिया,नागदा उम्र6वर्ष
29- ओजस व्यास उम्र 7वर्ष
30- आर्यन श्रीवास्तव उम्र 11 वर्ष
 31      पार्थ उपाध्याय 5 वर्ष
32 अनाया  नायक (पूना से) 
 वसुंधरा पांडे 
मध्य प्रदेश अध्यक्ष महिला प्रकोष्ठ आशा जाकड़ ने  सभी को  प्रोत्साहित किया। 
 

Saturday, September 12, 2020

महादेवी वर्मा की पुण्य तिथि पर शुभसंकल्प का आयोजन

आदरणिय महादेवी वर्मा की पुण्य तिथि  पर  शुभ संकल्प  समूह द्वारा  आनलाइन  श्रद्धांजलि अर्पित  कर  समूह सदस्यों  ने  उनकी  रचना  का  पाठ  किया, इस  अवसर  पर  समूह निर्देशक  डॉ  सुनीता  श्रीवास्तव  ने  बताया  कि  महादेवी  वर्मा  की  स्मृति  में  गीत  ,भजन  भी  प्रस्तुत  किए  गए l

कार्यक्रम  में  शिरकत  करने  वाले  काव्य  वाचक  की  रचनाओं  के  अंश  प्रस्तुत  है 


🌹जो तुम आ जाते एक बार🌹


जो तुम आ जाते एकबार, 

कितनी करुणा, कितने संदेश, 

पथ में  बिछ जाते, बन पराग, 

गाता प्राणों का तार तार, 

अनुराग भरा उन्माद वाद, 

आंसु लेते थे, पग पखार,

जो तुम आ जाते एकबार, 


हस उठते पलमें आर्द्र नैन, 

धूल जाता होंठों से बिसाद, 

छा जाता जीवन में  बसंत, 

लूट जाता, चीर संचित पराग, 

आंखें देती, सर्व सुवार, 

जो तुम आ जाते एक बार, 



*पद्माक्षी शुक्ल, पुणे

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महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित जानी मानी छायावादी कवियत्री है उन्होंने प्रकृति ओर विरह पर अपनी अधिकतम रचनाएं लिखी ,महादेवी जी मेरी प्रेरणा भी है !उनका वासना से रहित प्रेम ओर उनकी काव्य रचना ओर प्रकृति के प्रति प्रेम ओर उनकी भाषा शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया! 

मैने एम, ए,हिंदी साहित्य में ,महादेवीजी के उपर थीसिस भी लिखी ! 

उनकी कुछ पंक्तियां उनके चरणों में समर्पित करती हूं 🙏! 

1"तुम दुख बन इस पथ से आना ,शुलो में नित मृदु पाटल सा खिलते देना मेरा जीवन, क्या हार बनेगा वह जिसने सिखा , न ह्रदय का बिधवाना"!

 2,"रंगमय है देव दूरी , छू तुम्हे रह जाएगी यह चित्रमय क्रीड़ा अधूरी ,दूर रहकर खेलना पर मन न मेरा मानता ,मूंद पलके रात करती जब हृदय हठ ठानता " !

3," क्या पूजा क्या अर्चन  रे,उस असीम का सुंदर मंदिर मेरा लघुतम  जीवन रे ,मेरी सांसें करती रहती नित प्रिय का अभिनंदन रे !

4"बीन भी हुं मैं तुम्हारी रागिनी भी हुं ,दूर तुमसे हूं , अखंड सुहागिनी भी हूं !

5"मेरी लघुता पर आती ,जिस दिव्य लोक को व्रीडा,उनके प्राणों से पूछो , क्या , पाल सकेंगे पीड़ा "!

6 उनसे कैसे छोटा है ,मेरा यह भिक्षुक जीवन ,उसमे अनंत करुणा है ,इसमें असीम सूनापन "!

7"कह दे मा अब क्या देखू ,देखू खिलते कमल या अधरो की लड़ियां देखु "!

इन पंक्तियों के साथ महादेवी जी के चरणों में शत शत वंदन करती हूं और अपने भावों की पुष्पांजलि इन शब्दों में इन शब्दों में अर्पित करती हूं! 


"जब तक ये धरा ओर आसमान रहेगा ,हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कवियत्री महादेवी जी आपका नाम रहेगा ,तुम्हारे काव्य में को टिस,दर्द वेदना है ,उस काव्य का सदा सम्मान रहेगा "! 

*साधना  श्रीवास्तव 

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महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित जानी मानी छायावादी कवियत्री है उन्होंने प्रकृति ओर विरह पर अपनी अधिकतम रचनाएं लिखी ,महादेवी जी मेरी प्रेरणा भी है !उनका वासना से रहित प्रेम ओर उनकी काव्य रचना ओर प्रकृति के प्रति प्रेम ओर उनकी भाषा शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया! 

मैने एम, ए,हिंदी साहित्य में ,महादेवीजी के उपर थीसिस भी लिखी ! 

उनकी कुछ पंक्तियां उनके चरणों में समर्पित करती हूं 🙏! 

1"तुम दुख बन इस पथ से आना ,शुलो में नित मृदु पाटल सा खिलते देना मेरा जीवन, क्या हार बनेगा वह जिसने सिखा , न ह्रदय का बिधवाना"!

 2,"रंगमय है देव दूरी , छू तुम्हे रह जाएगी यह चित्रमय क्रीड़ा अधूरी ,दूर रहकर खेलना पर मन न मेरा मानता ,मूंद पलके रात करती जब हृदय हठ ठानता " !

3," क्या पूजा क्या अर्चन  रे,उस असीम का सुंदर मंदिर मेरा लघुतम  जीवन रे ,मेरी सांसें करती रहती नित प्रिय का अभिनंदन रे !

4"बीन भी हुं मैं तुम्हारी रागिनी भी हुं ,दूर तुमसे हूं , अखंड सुहागिनी भी हूं !

5"मेरी लघुता पर आती ,जिस दिव्य लोक को व्रीडा,उनके प्राणों से पूछो , क्या , पाल सकेंगे पीड़ा "!

6 उनसे कैसे छोटा है ,मेरा यह भिक्षुक जीवन ,उसमे अनंत करुणा है ,इसमें असीम सूनापन "!

7"कह दे मा अब क्या देखू ,देखू खिलते कमल या अधरो की लड़ियां देखु "!

इन पंक्तियों के साथ महादेवी जी के चरणों में शत शत वंदन करती हूं और अपने भावों की पुष्पांजलि इन शब्दों में इन शब्दों में अर्पित करती हूं! 


"जब तक ये धरा ओर आसमान रहेगा ,हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कवियत्री महादेवी जी आपका नाम रहेगा ,तुम्हारे काव्य में को टिस,दर्द वेदना है ,उस काव्य का सदा सम्मान रहेगा "! 



मुरछाया फूल


था कली के रूप शैशव मै , अहो सुखे फूल ।

हास्य करता था , खिलाती अंक में  तुझको  पवन ।

खिल गया  जब पूर्ण  तू मंजूल सुकोमल पुष्पवर ।

लुब्ध मधु के हेतू  मंडराते लंगे आने भ्रमर ।

स्निग्ध किरणे  चंद्र की तुझको हँ साती थीं सदा ।

रात तुझ पर वारती थीं मोतियों की संपदा ।

लोरियों गाकर मधूप निंद्रा विवश करते तुझे ।

यत्न माली का रहा आनंद से भरता तुझे ।


*चारूमित्रा नागर


===================


साहित्य सेवा में जिसने 

सारा जीवन अपना होम किया

छायावाद  को नई दिशा 

और दृष्टी से समृध्द किया

नारी की वेदना पर जिसने 

अपनी कलम चलायी

मैं नीर भरी दुःख की बदली,निहार,नीरजा और यामा जैसी रचनाओं का जिसने उत्कृष्ट सृजन किया

नारी जीवन को जिसने अपनी रचनाओं में ऊँचा स्थान दिया

'आधुनिक मीरा'बनकर जिसने साहित्य का विस्तार किया

अपने महान कर्मों से 'महादेवी'

ने अपने नाम को सार्थक कियाII

                     *डा.  नंदिनी जोशी

==========================

                         


अपने नाम को सार्थक करती

आप देवी महान

आधुनिक मीरा से सम्मानित

साहित्य जगत की शान


तारीख छबबीस, माह मार्च

 वर्ष उन्निसस्सो सात

भारत भूमि धन्य हुई पाकर

 देवी रूपी कन्या की सौगात


रंग पर्व पर अवतरीत

बिखेरे साहित्यिक रंग हजार

नारी चेतना, पीड़ा, श्रंगार

से रचा अद्भुत संसार


जीव दया,जीव प्रेम भी था

साहित्य सागर में समाया

दया ,करुणा,समाज सेवा

का सुंदर पाठ पढ़ाया



अग्नि रेखा ,आत्मिका, सप्तपर्णा

नीरजा,गील्लू ,श्रृंखला की कड़ियां

सात भूमिकाएं व निलांबरा

 यामा जैसी दीपों की लड़ियां


 प्रणय, वेदना, करुणा के दर्शन

 रश्मि, संधिनी और संस्मरण

 दीप गीत, श्रेष्ठ गीत, पथ के साथी

 से भरी रचनाओं की सजी सुंदर थाती



 कालिदास समारोह उज्जैन में

 साक्षात् दर्शन के हर पल

मुझे याद है, विद्वता युक्त  चेहरा

सहज सौम्य और सरल


अथाह भीड़ कड़ी सुरक्षा थी

मन था  मिलने को तत्पर

किसी अदृश्य मदद ने  जैसे

मुझे छोड़ा आपके पास लाकर



छोटे से कागज के पुर्जे पर

आपके पाए थे अनमोल हस्ताक्षर

दादी नानी के कोमल हाथो सा

सिर पर पाया स्पर्श ,हुआ में साक्षर


लेखनी पकड़ अपने हाथों से

 दिया था आशीर्वाद व प्यार

 धरोहर यही है मेरे जीवन की

 ज्ञान ही जीवन का सार



ग्यारह सितम्बर वर्ष सीत्यासी

किया महा प्रयाण

 ज्ञान की गंगा का शिव की गंगा में

हुआ मिलन महान


छायावाद की काव्य साधना

शिक्षा जगत की प्रबल प्रेरणा

काव्यांजलि अर्पित करता मन

कमल चरणों में शत शत नमन


 *डॉ विजय आर चौरे* 


==========================

 


कमरे में लगे एक शीशे के सामने बैठे उसे देर हो गई थी। जरीदार साड़ी, हाथों में काली चुड़ियाँ, सिर पर सिंदुर की लाल रंग की रेखा। शरीर पर आभूषण सब कुछ उसे नववधु होेने की पहचान दे रहे थे। किमती सामानों से भरापूरा कमरा ऐश्वर्यवान होने का प्रमाण दे रहा था। साथ ही कमरे रखी पुस्तकें यह दर्शा रही थी कि उस पर माँ सरस्वती की कृपा है। 

धन एश्वर्य विद्या के बावजूद भी वह उदास थी। दर्पण में  देख कर सोच रही थी कि सौंदर्य किसे कहते है? वह सुंदर नहीं थी पर कुरुप भी नहीं कहा जा सकता है। प्रश्न कर रही थी स्वयं से क्या सुंदर नाक नक्श गोरी त्वचा को सुंदर कहा जाता है। क्या गुणों की पहचान कुछ नहीं होती? उसने अपने से फिर प्रश्न किया। संगमरमर देह यष्टि जो अपने ज्वाला से अनेको को झुलसा दे या फिर वह गुण जिन के कृतित्वों के कारण अनेक जिंदगियाँ विकसित हो, दोनों में से उसे एक चुनना है। 

निर्णय तो हो चुका था पति ने साफ कह दिया था कि मैं तुम्हे साथ नहीं रख सकता। उसकी दृष्टि में शरीर के अलावा और कुछ था ही नहीं यदि होता तो वह यह शब्द नहीं कहते। अचाानक घड़ी की ओर देखा मन ने कहा - आने वाले होंगे। नारी सदियों से ही पुरुष के हाथों से खिलौना रही थी। दरवाजे पर कदमांे की आहट सुनाई दी। गठीले शरीर के एक युवक ने प्रवेश किया। जिसके मुख मण्डल पर पुरुष होने का गौरव झलक रहा था। उसने एक नजर देखा और पूछा --‘क्या फेैसला किया तुमने?’

घुटन या संघर्ष महादेवी जी पहले ही संघंर्ष चुन चुकी थी। पति का निर्णय अटल इसलिए उन्होंने बंधनों से मुक्ति पा ली थी। साहित्यिक जगत में अपने भावों में संपूर्ण ब्रह्माण्ड के सौंदर्य को सजाऐ हुए वह सौंदर्य की देवी सदा सदा के लिए अमरत्व प्राप्त कर गई।

 

*डा.सुरेखा भारती

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 विरह - वेदना की अप्रतिम गायिका -- महादेवी वर्मा छायावादी रचनाकारों ---- पंत , निराला , प्रसाद की श्रृंखला की एक सशक्त कड़ी और साहित्य में अपने योगदान के लिए कभी ना मिटने वाला हस्ताक्षर हैं । 

बाल्यवस्था में ही विवाह बंधन में बंधी कवि ह्रदया महादेवी जी का गृहस्थ जीवन लम्बी आयु ना पा सका पति से उनका अलगाव हो गया । उसके बाद उन्होनें अपनी आगे की पढ़ाई तथा स्वतंत्र लेखन  

आरम्भ किया । 

 उनकी लेखनी में एक टीस है विछोह की ( शायद अधूरे दाम्पत्य जीवन के कारण ) जो उन्हें भक्ति रस में रा रंगी कृष्ण के प्रेम में रमी 

आधुनिक मीरा का स्थान दे देती है । वे स्वयं कृष्ण की अनन्य भक्त थीं ।

पशु - पक्षियों से भी उनको अगाध प्रेम था उनका घर परित्यक्त जानवरों की आश्रय स्थली था ।

शास्त्रीय गायक स्वर्गीय पंडित जसराज ने अपने ऊपर लिखी डॉक्टर सुनीता बुद्धिराजा की किताब में महादेवी जी के बारे में अपने उद्गगार व्यक्त किये हैं ----- 

महादेवी जी पंडित जी को अपना अनुज मानती थी और इसी नाम से उन्हें संबोधित भी करतीं थीं , कोलकाता के उनके एक प्रोग्राम में महादेवी जी भी उपस्थित थी एक श्रोता के रूप में , बाद में इलाहाबाद में जब पंडित जसराज उनसे मिलने गए तो बोली --- अनुज तुम गाते तो बहुत अच्छा हो पर अपने गाने में थोड़ी भावना लाओ प्यार करो उससे । बाद में पंडित जी ने उस पर विचार किया और पाया वो पानी के किनारे ही खड़ें है उतरे नही है उसमें , महादेवी जी कही बात उन्हें समझ  मे आ गयी थी उसको पंडित जसराज ने पकड़ कर गाने में सुधार किया । उसके बाद उनका गाना मस्तिष्क के साथ - साथ सुनने वालों के दिलों में भी गहरे उतर गया ।

नाम के अनुरूप महादेवी वर्मा भावनाभूतियों की भी महादेवी थीं 

उनकी पुण्यथिति पर मैं उन्हें श्रद्धानवत हो नमन करती हूँ ।

*शालिनी 

====================


दिव्य अलौकिक शब्द साधना,

जीवन यथार्थ चित्रण लिए खड़ी।

छायावाद का  थी आधार स्तंभ,

मधु शब्द ज्वाला रश्मि  लिए खड़ी।

अतीत के चलचित्र की परिक्रमा,

मधु शब्दों का महासागर लिए खड़ी।

त्याग प्रेम समर्पण का भाव भरा,

आधुनिक मीरा की भक्ति  लिए खड़ी।

       * मधु वैष्णव "मान्या"जोधपुर राजस्थान

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कलम की धार से मानवीय

संवेदनाओं को उकेरा ।

नारीत्व की गरिमा को 

कोरे कागज पर बिखेरा।

भारतीय साहित्य का 

गौरव थीं साहित्यकारा ।

शब्दों से रचतीं थीं भावनाओं

का संसार सारा 

जिनकी रचना हर लेती थी ,

पल में हर मन का तम

उन महादेवी जी को

करते है शत शत नमन।


*अचला गुप्ता

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साहित्य सेवा में जिसने 

सारा जीवन अपना होम किया

छायावाद  को नई दिशा 

और दृष्टी से समृध्द किया

नारी की वेदना पर जिसने 

अपनी कलम चलायी

मैं नीर भरी दुःख की बदली,निहार,नीरजा और यामा जैसी रचनाओं का जिसने उत्कृष्ट सृजन किया

नारी जीवन को जिसने अपनी रचनाओं में ऊँचा स्थान दिया

'आधुनिक मीरा'बनकर जिसने साहित्य का विस्तार किया

अपने महान कर्मों से 'महादेवी'

ने अपने नाम को सार्थक कियाII

                  *   डा.  नंदिनी जोशी

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साहित्य की कवयित्री और थीं लेखिका 

विलक्षण प्रतिभा की धनी इस युग की मीरा 

छायावादी युग की थीं वो प्रमुख स्तम्भ 

लेखनी में लिखें दुःख पढ़ने वाले हो जाते दंग 

वे रहेंगी हमारे बीच ध्रुव तारे सी प्रकाशमान 

निहार से सप्तपर्णो तक चंद्रकांता मणि समान 

रचनाओं ने किया समाज की मानसिकता पर प्रहार 

स्त्री अत्याचार पर लिख किया लेखनी से संहार 

*मंजिरी पुणताम्बेकर 

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*साहित्य जगत कीअनुपम सितारा*।

*भक्तिन का दिया आपने अपना सहारा*।

*आधुनिक मीरा को है हमारा वन्दन*।

 *साहित्य की महादेवी को हमारा नमन* ।


*ज्ञान, कर्म,विरह,वैराग्य का संगम*।

*भावनाओं से छूती सोना हिरणी का मर्म*।

*करुणा की बहाती हो ऐसी अनुपम धारा*।

*करती हो सृजन यामा, नीरजा और निहारा*।


*मीना जैन दुष्यंत भोपाल

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ना मिट सकोगी

  साहित्याकाश का चमकीला ध्रुवतारा हो

  गगन में चंदा का उजियारा हो

  सूरज का तेज अलौकिक प्रकाश हो

भूल ना पाएंगे जो भी हो।

रचनाओं से साहित्य सागर समृद्ध किया

  सृजन लहरों ने कभी शंख दिया

  तो कभी सीपों का मोती दिया

  अनमोल रत्नों का भंडार सौंप दिया।

  कई वर्षों में ऐसी ज्योति मिलती

  जिसकी आभा कभी भी नहीं मिटती

 ज्ञान ,कला वैराग्य का संगम बनती

  ऐसी त्रिवेणी भला कहां है मिलती।

  सदियों तक याद सभी को रहोगी

  दया ,करूणा का पाठ पढा़ती रहोगी

  सवके दिलों पर राज करती रहोगी

रस भरी बदली मिट ना सकोगी ।

  *नीति अग्निहोत्री

======================

 


प्रिय सुधि भूले री,

मै पथ भूली ।

मेरे ही मृदु उर में हस बस

श्वासों में भर मादक मधु रस ,

लघु कलिका के चल ,

परिमल से ,

वे नभ छाये री मैं वन फूली ।

प्रिय सुधि भूले री मैं

पथ भूली ।

तज उनका गिरी सा ,

गुरु अंतर ,

मैं सिकता कण सी ,

आयी झर ।

आज सजनी उनसे ,

परिचय क्या ?

वे घन चुम्बित मैं पथ भूली ।


*  मनोरमा जोशी 

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26 मार्च होली के दिन अवतरित,एक चमकता सितारा,हीरे सी आभा बिखेरती हुई प्रतिभावान"माँ सरस्वती- मीरा के नाम से प्रख्यात ऐसी आदरणीय महादेवी वर्मा को यह साहित्य संसार हमेशा याद रखेगा।पदम् भूषण,विभूषण,ज्ञानपीठ सम्मान  प्राप्त उपन्यासकार कवियत्री पूज्यनीय महादेवीजी ने अपनी पीड़ा ,रचनाओं केमाध्यम से समाजमें संवेदना मयी दृष्टि प्रदान की।स्नेह श्रृंगार सजी नारी चेतना,तथा समाज कल्याण के विषय दीपशिखा बन प्रकाश डाला।ऐसी महान साहित्यकार आदरणीय महादेवीजी को उनकी पुण्य तिथि पर शत शत नमन🙏🏻नमन

  * प्रभा जैन इंदौर

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महादेवी जी वर्मा हिंदी के विशाल मन्दिर की सरस्वती थी छायावादी युग की प्राण थी भावुकता एवम् करूणा उनके बहुमुखी कार्यों की पहचान है इसीलिए उन्हें आधुनिक युग की मीरा के नाम से जाना जाता है हिन्दी कविता में वे एक महत्व पूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। उनके काव्य में प्रणय,वेदना,करूणा,रहस्यवाद,छायावाद के एक साथ दर्शन होते है गीत काव्य में उनका स्थान सर्वोपरि हैवे अद्भुत व्यक्तित्व की धनी थी उनके व्यक्तित्व में संवेदना, दृदता,आक्रोश का अद्भुत संतुलन मिलता है। वो एक सफल अध्यापक, कवियत्री,गद्य कार,कलाकार,समाजसेवी,विदुषी के बहुरंगी मिलन का जीता जागता उदाहरण थी,उनकी काव्य साधना के लिए हिंदी साहित्य जगत हमेशा उनका ऋणी रहेगा। ऐसी महान साहित्य कार के चरणों में शत शत नमन।

                  *   नवनीत जैन

=========================


अपने नाम को सार्थक करती

आप देवी महान

आधुनिक मीरा से सम्मानित

साहित्य जगत की शान


तारीख छबबीस, माह मार्च

 वर्ष उन्निसस्सो सात

भारत भूमि धन्य हुई पाकर

 देवी रूपी कन्या की सौगात


रंग पर्व पर अवतरीत

बिखेरे साहित्यिक रंग हजार

नारी चेतना, पीड़ा, श्रंगार

से रचा अद्भुत संसार


जीव दया,जीव प्रेम भी था

साहित्य सागर में समाया

दया ,करुणा,समाज सेवा

का सुंदर पाठ पढ़ाया



अग्नि रेखा ,आत्मिका, सप्तपर्णा

नीरजा,गील्लू ,श्रृंखला की कड़ियां

सात भूमिकाएं व निलांबरा

 यामा जैसी दीपों की लड़ियां


 प्रणय, वेदना, करुणा के दर्शन

 रश्मि, संधिनी और संस्मरण

 दीप गीत, श्रेष्ठ गीत, पथ के साथी

 से भरी रचनाओं की सजी सुंदर थाती



 कालिदास समारोह उज्जैन में

 साक्षात् दर्शन के हर पल

मुझे याद है, विद्वता युक्त  चेहरा

सहज सौम्य और सरल


अथाह भीड़ कड़ी सुरक्षा थी

मन था  मिलने को तत्पर

किसी अदृश्य मदद ने  जैसे

मुझे छोड़ा आपके पास लाकर



छोटे से कागज के पुर्जे पर

आपके पाए थे अनमोल हस्ताक्षर

दादी नानी के कोमल हाथो सा

सिर पर पाया स्पर्श ,हुआ में साक्षर


लेखनी पकड़ अपने हाथों से

 दिया था आशीर्वाद व प्यार

 धरोहर यही है मेरे जीवन की

 ज्ञान ही जीवन का सार



ग्यारह सितम्बर वर्ष सीत्यासी

किया महा प्रयाण

 ज्ञान की गंगा का शिव की गंगा में

हुआ मिलन महान


छायावाद की काव्य साधना

शिक्षा जगत की प्रबल प्रेरणा

काव्यांजलि अर्पित करता मन

कमल चरणों में शत शत नमन


 *डॉ विजय आर चौरे* 

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मैं नीर भरी दु:ख की बदली!


स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,

क्रन्दन में आहत विश्व हंसा,

नयनों में दीपक से जलते,

पलकों में निर्झरिणी मचली!


मेरा पग-पग संगीत भरा,

श्वासों में स्वप्न पराग झरा,

नभ के नव रंग बुनते दुकूल,

छाया में मलय बयार पली,


मैं क्षितिज भॄकुटि पर घिर धूमिल,

चिंता का भार बनी अविरल,

रज-कण पर जल-कण हो बरसी,

नव जीवन अंकुर बन निकली!


पथ को न मलिन करता आना,

पद चिन्ह न दे जाता जाना,

सुधि मेरे आगम की जग में,

सुख की सिहरन बन अंत खिली!


विस्तृत नभ का कोई कोना,

मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली!


 *शिव कुमार  दुबे 

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कमरे में लगे एक शीशे के सामने बैठे उसे देर हो गई थी। जरीदार साड़ी, हाथों में काली चुड़ियाँ, सिर पर सिंदुर की लाल रंग की रेखा। शरीर पर आभूषण सब कुछ उसे नववधु होेने की पहचान दे रहे थे। किमती सामानों से भरापूरा कमरा ऐश्वर्यवान होने का प्रमाण दे रहा था। साथ ही कमरे रखी पुस्तकें यह दर्शा रही थी कि उस पर माँ सरस्वती की कृपा है। 

धन एश्वर्य विद्या के बावजूद भी वह उदास थी। दर्पण में  देख कर सोच रही थी कि सौंदर्य किसे कहते है? वह सुंदर नहीं थी पर कुरुप भी नहीं कहा जा सकता है। प्रश्न कर रही थी स्वयं से क्या सुंदर नाक नक्श गोरी त्वचा को सुंदर कहा जाता है। क्या गुणों की पहचान कुछ नहीं होती? उसने अपने से फिर प्रश्न किया। संगमरमर देह यष्टि जो अपने ज्वाला से अनेको को झुलसा दे या फिर वह गुण जिन के कृतित्वों के कारण अनेक जिंदगियाँ विकसित हो, दोनों में से उसे एक चुनना है। 

निर्णय तो हो चुका था पति ने साफ कह दिया था कि मैं तुम्हे साथ नहीं रख सकता। उसकी दृष्टि में शरीर के अलावा और कुछ था ही नहीं यदि होता तो वह यह शब्द नहीं कहते। अचाानक घड़ी की ओर देखा मन ने कहा - आने वाले होंगे। नारी सदियों से ही पुरुष के हाथों से खिलौना रही थी। दरवाजे पर कदमांे की आहट सुनाई दी। गठीले शरीर के एक युवक ने प्रवेश किया। जिसके मुख मण्डल पर पुरुष होने का गौरव झलक रहा था। उसने एक नजर देखा और पूछा --‘क्या फेैसला किया तुमने?’

घुटन या संघर्ष महादेवी जी पहले ही संघंर्ष चुन चुकी थी। पति का निर्णय अटल इसलिए उन्होंने बंधनों से मुक्ति पा ली थी। साहित्यिक जगत में अपने भावों में संपूर्ण ब्रह्माण्ड के सौंदर्य को सजाऐ हुए वह सौंदर्य की देवी सदा सदा के लिए अमरत्व प्राप्त कर गई।

 

*डा.सुरेखा भारती


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महादेवी वर्मा

कहलायी आधुनिक मीरा

था शुभ दिवस

हुई अवतरित धरा पर जब

छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ सात,

दिया साहित्य को हीरा अनमोल

हेमा रानी गोद में...

खेलती, हुई पुष्पित।

पिता गोविन्द दास का

   मिला स्नेह भरपूर।

आजादी की दीवानी वह,

लिखी गीत जोशीली।

उपन्यासकार थी अद्भुत,

पुजारी थी अद्वितीय,

विशाल मंदिर साहित्य के

यम, नीरजा,मेरा परिवार

है साहित्य जगत के धरोहर।

आया अंधेरा हिन्द में

ग्यारह सितम्बर उन्नीस सौ बयासी

पंचतत्व में महान देवी समायी।

झुकता है शीश हमारा,

उनका पदचिन्ह दे सहारा।


        *  रीतु प्रज्ञा

        

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*आधुनिक मीरा श्रीमती महादेवी वर्मा जी का जन्म होली के दिन 24 मार्च सन 1907 ईस्वी को फर्रुखाबाद में हुआ था। उनके पिता श्री गोविंद प्रसाद वर्मा प्रतिष्ठित कवि थे और माता श्रीमती हेम रानी देवी कवियत्री थीं 9 वर्ष की बाल्यावस्था में ही श्री स्वरूप नारायण वर्मा से उनका विवाह हो गया। विवाह उपरांत उनकी विद्यालयीय शिक्षा गतिशील न रह सकी। उनका पारिवारिक जीवन सुखमय ना रहा। बाद में उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से एम ए संस्कृत की परीक्षा ससम्मान प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वे बहुत समय तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या रहीं। वे मधुर गीत लेखिका के रूप में साहित्य सर्जन करने लगीं। हार्दिक वेदना एवं स्नेह को उन्होंने निरीह जीवों पर विकीर्ण किया। वे छायावादी सशक्त गीतकार के रूप में उभरकर आयीं तथा आधुनिक युग की मीरा कहलायीं। वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या भी रहीं। सरकार ने उन्हें 1956 ईस्वी में पद्मभूषण की उपाधि से विभूषित किया।*

*यद्यपि महादेवी वर्मा कवयित्री के रूप में लोकप्रिय हैं, परन्तु वे एक सशक्त गद्य लेखिका भी थीं। यद्यपि काव्य में वे कल्पना के पंख लगाकर आकाशविहारिणी हैं, लेकिन गद्य में वे पथरीली और ऊबड़-खाबड़ यथार्थ की भूमि पर उतर आयी है। अत: काव्य के अतिरिक्त गद्य के क्षेत्र में भी उनकी देन कम नहीं है। हिन्दी-जगत की यह साभिका 11 सितम्बर, सन् 1987 ई० को चिरनिद्रा में लीन हो गयीं।*

*महादेवी वर्मा अपने जीवन के प्रारम्भिक काल से ही हिन्दी साहित्य की सेवा में संलग्न रहीं। तन्होंने गद्य तथा पद्य दोनों क्षेत्रों में ही रचना की है। उन्हें सन् १९३६ ई. में ‘नीरजा’ पर सेकसरिया पुरस्कार, सन् १९४० ई. में ‘यामा’ पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक और सन १९८२ ई. में ‘माया एवं ‘दीपशिखा’ पर साहित्य का स्वच्छ ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। वे आधुनिक मीरा के रूप में तीव्र वेदना लेकर गीत-जगत में अवतीर्ण हुई। अदृष्ट प्रियतम के प्रति ललक, उत्कण्ठा एवं मिलन के भाव उनके मन में बने रहे, फिर भी वे विरह में डूबी रहीं।


*चित्रगुप्त समाज भोपाल*
 book 
हमारी लोकसंस्कृति संझा बाई 
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यह गीत श्राद्ध मे सोलह दिन गाये जाते है।
लड़कियां दीवार पर गोबर से इसे बनाती है ।
और शाम को आरती भोग लगाकर गीत गाती है ।

संझा ब ई जीम ले चूठ ले
मे जिमाऊ सारी रात ,
फूला लाड़ु भरी रे परात ,
चंमंक चादनी सी रात ।
संझा जीमले ।
संझा बाई तम तमारे घरें
जाव ,
तमारी माय मारेगी कने कूटेगी ,
चांद गयो गुजरात ,
हिरनी का बड़ा बड़ा दांत
के छोरा छोरी डरपेगा जी
ड़रपेगा ।

संझा बाई का लाड़ाजी ,
लुगड़ो लाया जाड़ाजी ,
असो कसो लाया ,दारी का ,
लाता गोट किनारी का ।

  *मनोरमा जोशी 
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 संजा बाई के गीत 

संजा बाई के सासरे जावागां खाटो रोटो खावागां संजा ब ई की सासु दुत्यारी दे दारु के चिमटा की हम बैठागां गादी पे उन्हें बिठायगां खूटी पे।

2-संजा बाई को सासरो सागर में,
 पदम पधारिया घडियन में राऊ जी की चाकरी गुलाम थाकां देश,
 छोडो मारी चाकरी पधारो थाकां देश।

3-संजा तो मांगें हरो हरो गोबर ,
कांसे लाऊं बाई हरो हरो गोबर।
 संजा का बीराजी गुजर घर जाय वह से लाऊं बाई हरो हरो गोबर।
4-छोटीसी गाड़ी रडकती जाय, गड़कती जाय,
 जेमे बैठी संजा बाई,
 घाघरो घमकाती जाय चूडलो चमकाती जाय,
 बिछिया बजाती जाय।

5संजा बाई जीम लो चूट लो अकेली मत जाओ साथे नीलू बाई के ले जाओ।
नीलू बाई जीम लो चूट लो अकेली मत जाओ साथे सभी सहेलिया ले जाओ।

 
             *   नीलू सक्सेना देवास
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संझा बई को भोग

संझा तू जिम ले,
चूठ ले मैं जिमाऊं सारी रात,
चमक चांदनी सी रात,
फूलो भरी रे परात,
 
एक फूलो घटी गयो,
संझा माता रूसी गई,
एक घड़ी, दो घड़ी, साढ़े तीन घड़ीll
            *  डा.नंदिनी जोशी

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हम भी बचपन में संजा कै गीत गाते थे रोज शाम को सहेलियों के घर जाकर। फिर आरती के बाद प्रसाद बंटता था। एक डिब्बे में बंद कर अनुमान करने को कहा जाता था और जिसका अनुमान सही वह विजेता घोषित किया जाता और उसे टॉफी ईनाम में मिलती। बडा़ आनंद आता। संजा गीत कुछ ऐसे होतै 
    संजा तो मांगे हरो _हरो गोबर
   कहां से लाऊं भई हरो_हरो गोबर
   संजा का दादा जी किसान घर जाए
   वहां से लाए हरो _हरो गोबर
   ले भई संजा हरो_हरो गोबर।
  संजा तो मांगे लाल _पीला फूलडां
   कहां से लाऊं लाल _पीला फूलडां
  संजा का ताऊ ताऊ माली घर जाए
  वहां से लाए लाल _पीला फूलडां
   ले भई संजा लाल _पीला फूलडां।
   संजा तो मांगे दूथ_पताशा
  कहां से लाऊं भई दूध पताशा
 संजा का काका हलवाई घर जाए
  वहां से लाए दूघ _पताशा
 ले भई संजा दूध _पताशा
२ छोटी  सी गाडी़ लुढ़कती जाए
जिसमें बैठी संजा बाई अपने घर जाए
  घाघरो घमकाती जाए / लूगडो़ लटकाती जाए
  पायल बजाती जाए /बिंदिया चमकाती जाए
  चुनरी झलकाती जाए / संजा की नथनी झोला खाए।
 * नीति अग्निहोत्री
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बरखा की करी विदाई 
ले आयी संजा शरद  सुहानी 

सौभाग्य बढ़ाने आयी 
देश - विश्व में संजा रानी 
 तू क्वारी कन्याओं की महारानी 
करती कामना पूरी संजा रानी 

यादों में आई संजा रानी
बचपन में तोड़ के लाते मेंहदी 
 पीस  -पीस के सिलबट्टे पर 
तेरे प्यार का चढ़ता सूर्ख रंग 
 जाते बाजार लेने सामान 
संग -संग चलती सखी संजा रानी 


गीतों में लिख -लिख महिमा  गाती
जगत कल्याण करने संजा आती 
समृद्धि ,  ऐश्र्वर्य के भंडार  लाती 
घर -धर , नगर द्वार में खुशियाँ  छाती 


फूलों से करे सोलह श्रृंगार संजा रानी
मधुर लोकगीतों में गाते संजा महारानी 
शहरी संस्कृति ने तुझको बिसराया
मंजू नहीं भूली महानगर में संजा  रानी


बरखा की करी विदाई 
ले आयी संजा शरद  सुहानी 
*डॉ मंजु गुप्ता 
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: पंजाब अली का पर्व भादो मास की पूर्णिमा से 4 महीने की अमावस्या तक मनाया जाता है! इसे दीवारों पर या पटिया पर गोबर से बनाया जाता है!  और फूलों या रंगीन पेपरों से इसको सजाया जाता है! यह पर्व मालवा में ज्यादा लोकप्रिय हैं! और कुंवारी कन्याएं संजय वाली को बनाते हैं! ब्रज में भी राधाकृष्णन ने समझा बनी बनाई थी और वह आसान जी के नाम से स्कूल जाना जाता है यह संजय वाली के बारे में आपको मेरी जानकारी दी मैं
 एक गीत पेश
*************"
 आमली की झाड़ रिमझिम बाजा बाजे रे!        
                1, छोटो सो सूरज वीरो के घोड़ी दौड़ा वेरी,
 छोटी सी सजा बेनिया ले फुलड़ा बरसा वेरी!       
                                  2, छोटो सो चंदा वीरो ले घोड़ी दौडावे री , 
छोटी सी लच्छी बेनया ले फुलड़ा बरसा वेरी!          
                  सनजा वली की जानकारी ओर सनजावली के गीत के साथ
* "साधना श्रीवास्तव 

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 म्हारी  संझा बाई "

                  बात  अट्ठावन  वर्ष  पुरानी है  जब  मैं  तीसरी  कक्षा  में  पढ़ती  थी |  वहाँ  के  मोहल्ले  की  लड़कियाँ  मेरी  ही  कक्षा  में  पढ़ती थीं ,  कुछ  अन्य  कक्षाओं  में  भी  थीं ,   पर  क्योंकि  हम  सब  साथ  मिलकर  स्कूल आते - जाते  थे इसलिए  आपस  में  सहेलियाँ  थीं |  मेरा  उस  स्कूल में  पहला  ही  साल  था |  जब  संजा - पूजन  के  दिन  आये  तो  मैंने  देखा  कि  लड़कियाँ  पहले  के  दिनों  की  अपेक्षा  इन  दिनों  में  रोज  ही  बहुत  तैयार  आतीं  |  मैंने  पहले  कभी  संजा  बाई  के बारे  में  जाना  या  सुना  नहीं  था | स्कूल  की  छुट्टी  के  बाद  लड़कियाँ  रास्ते  में  से  गाय  का  गोबर  समेटती  और  बगीचों  या  लोगों  के  घरों  से  फूल  इकट्ठे  करती  हुई  जाती  थीं | 
                    एक  दिन  मैंने  अपनी  सहेलियों  से  पूछा  कि  तुम  लोग  आजकल  ये  सब  क्या  करती  हो ?   तो  वो  बोलीं  कि  तू  भी  हमारे  साथ  आया  कर ,  बहुत  मजा  आता  है | हम  सब  मिलकर  शाम  को  ताजे  गोबर  से  दीवार  पर  संजा  मांडते  हैं  | फिर  उसे  रंग - बिरंगे  फूलों  की  पत्तियों  से  सजाते  हैं | उस  पर  चमकीले  और  रंगीन  कागज  चिपकाते  हैं | उसके  बाद  बहुत  सारे संजा  बाई  के  गीत गाते  हैं  नाचते  हैं  और  खेलते  हैं | मेरी  सहेलियों  ने  मुझे  लड़ियाते  हुए  कहा  कि  आज  तू  भी  जरूर  से  आना | तो  मैं  शाम  को  गई | उस  दिन  संजा  बाई  को  सहेलियों  ने  मुझसे  ही  सजवाया | मुझे  बहुत  अच्छा  लगा | उसके  बाद  सबने  मिलकर  गाने  गाये  और  सभी  ठिठोली  करते  गानों  पर  नाचने  लगे | एक  गाना मुझे  आज  भी  कुछ - कुछ  याद  है | वो  गाने  में  बोलती  हैं  कि संजा  बाई  का  लाड़ा  बिना  गोट - किनारी  का  झोला  झंगा  जैसा  लुगड़ा  लेकर  आया | पर  म्हारी  संजा  बाई  तो  गोल - मटोल  और  नाटी सी  है कैसे  पहनेगी  | फिर  बोलती  हैं  कि संजा  बाई  का  लाड़ा  पीतल  का  गहना  लाया | म्हारी  संजा  बाई  तो  वैसे  ही  साँवली  है  ऊपर  से  पीतल  का  गहना  पहनकर  कागली  ( कौवी ) जैसी  लगने  लगेगी | फिर  आगे  वो  गातीं  कि  संजा  बाई  का  लाड़ा  गुड़  की  मिठाई  लाया  फिर  भी  फीकी  ही  है | पर  म्हारी  संजा  बाई  तो  दूध  मलाई  की  मिठाई  खाती  है | आखरी  में  वो  गति  हैं  कि  संजा  बाई  का  लाड़ा  जब  उसको  विदा  कराने  आया  तो  बिना  घोड़ा - गाड़ी  के  पैदल  ही  आया | तो  संजा  बाई  गुस्से  में  आगे - आगे  भागती  जा  रही  है  और  उसका  लाड़ा  पीछे - पीछे  संजा  बाई  को  आवाज  लगाता  जा  रहा  है | 
                     ये  गाते  हुए  सब  खूब  हँसती , मजाक  करती  और  नाचती | जब  तो  उस  उम्र  में  वो  सब  देखकर  मैं  भी  बहुत  खुश  हुई  पर  अब  समझ  आता है  कि उस  समय  संजा  बाई  के  खेल  के  बहाने  बच्चियों  को  संस्कृति  की  पहचान  होती  थी  , मनोरंजन  होता  था | आपस  में  मेल  मिलाप  होता  था , छेड़छाड़  और  चुहलबाजी  होती  थी | फिर  बह  इस  सबके  बावजूद  उनके  मन  बहुत  पवित्र  और  निश्छल  होते  थे |

             
 *आशा  गर्ग   
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संजा आई भादो मास,
रहेगी कुवार मास,
मनाए सोलह श्राद्ध,
नाचे गाये जावे बाद।

गांव सखी का मिलन,
राधा सजाती आंगन,
चटकीले पन्नी फूल,
गाती बजाती औ झूल। 

रचती सजती संग
पूजन मन्नत संग,
 "संजा तू जा थारा घर,"
निमाड़ी गीत घर घर। 

*प्रभा जैन इंदौर
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संजा
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आज से श्राद्ध पक्ष की शुरुआत हो चुकी हैं...श्राद्ध के यह सोलह दिन मालवांचल की बालिकाओं के लिए बड़े मस्ती भरे होते है...दुर्भाग्य बस इतना है कि हम अच्छी शिक्षा के नाम पर अपनी परम्पराओ को खोते जा रहे है...
कई शिक्षित लोग संजा का नाता अंधविश्वास से जोड़ देते है, जो बिल्कुल तथ्यहीन हैं.... संजा पर्व को जानने के पहले हमें #गाय के ग़ोबर को जानना होगा,उसकी ताजे ओर बासी होने के गुणों को जानना होगा,#फूल #पत्तियों को जानना होगा..ओर फिर सूर्यास्त के पूर्व इसे बनाना और सूर्यास्त के बाद इसकी पूजा के विधान को समझना होगा...आखिर प्रतिदिन ताजे ग़ोबर से ही संजा बनाना और उसे मुख्य द्वार के निकट ही बनाना क्यों अति आवश्यक हैं इन बातों को समझना होगा... ।

संजा पर्व अनेक गुणों का समावेशी त्योहार हैं एक ओर जहां संजा हमे स्वास्थ्य प्रदान करती हैं तो दूजी ओर कला का ज्ञान करवाती हैं, संजा गीतों की लयबद्धता सिखाती हैं,, संजा फूल पत्तियों के सहारे बालिकाओ को पर्यावरण से जोड़ती हैं.... फिर क्यों न हम अपने घर संजा बनाने का आह्वान अपनी बहन-बेटी से करें, ओर लोकपर्व की इसकी लोकप्रियता को बरकरार रख,स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करें...।।
*डॉ  अंजू  कंसल
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 बई संजा हो 
तमारा सांसरिया से 
हाथी भी आयो 
घोडो भी आयो 
तमे जाओ
 बई संजा सांसरी ।
ओ संजा 
तू थारा घरे जा 
थारी माँ मारेगी 
के कूटेगी ।
चाँद गयो गुजरात 
हिरणी का 
बडा बडा दांत 
के छोरा छोरी डरी 
जायगा ।
*मंजिरी  पुणेतामेंकर 
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अङ्कित जाऊ खिडकित जाऊ 
खिडकित ठेवला बत्ता 
भुलुबाई ला मुलगा झाला 
नाव ठेवा दत्ता

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अड़कित जाऊ ,खिड़कित जाऊ
खिड़कित होता काजू
भुला बाई ला मुलगा झाला
नाव ठेवा राजू
*अचला  गुप्ता 
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त्यौहार एक मनाने का तरीका अलग-अलग पर लक्ष्य एक ही अपनी संस्कृति ,धरोहर, परम्पराओं को बचाएं रखना, महाराष्ट्र में गुलाबाई, राजस्थान में संझया,और हरियाणा में धुंधा के नाम से मनाया जाता है, संस्कृति तो बचती ही हे  साथ ही समुह में काम करने तथा कला को उजागर करने का मौका भी मिलता है संगीत, नृत्य,
शिल्पकला,रोज विविध प्रकार के व्यंजन बनाकर उनको डिब्बे में बंद कर पहचानने को बोलकर पाक-कला को निपुण करना तरह तरह नाटिकाएं प्रस्तुत करना, हमारे त्यौहारों से ही हमें एक तरह का stage मिलता है,संजा,गुलाबाई, संझया,धुंधला उन्हीं में से एक है बचपन में हमने भी खुब गुलाबाई के गाने गाए हैं
"गुलाबाई लेकी,आल्याच याकी,दुध भात जेवाकी, दुध भात आळली, त्याला हवे मिठ,मिठ काही मिळत नाही दुध भात मिळत नाही मिठाचे झाले पाणी जेवायला बसली गुलाबाची राणी"

आली आता कोजागिरी पौर्णिमा आली
चांदण्या रात्री गुलाबाई जागवाच्या
चित्र मांडुनी आरास करूनि गुलाबाईची
कोणी चहा कोणी दुध देत भगिनींना 
कौणी कोको, कोणी काफी 
 
*स्वाती वाड़गे (वनकर)
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भुलाबाई शब्द सही है। मराठी में बाहुली/भावली शब्द गुड़िया के लिए है। भुलोजी(शंकरजी)भुलाबाई(पार्वती)की स्थापना भाद्रपद मास में होती है और विसर्जन शरद पूर्णिमा को होता है।हिंदु धर्म में शंकर पार्वती को आदर्श गार्हस्थ्य का उदाहरण मानते हैं पुराने ज़माने में लड़कियाँ स्कूल नहीं जाती थीं , तो चातुर्मास की व्रत कथाएँ, लोक कथाएँ, गीत व्यवहार और नीति शिक्षा के माध्यम होते थे।भुलाबाई के एक गीत में तो करंज्या(गुझिया)की रेसिपी भी बताई है।"असे गहू सुरेख बाई  रवा तो दळावा ,असा रवा सुरेख बाई करंज्या कराव्या. अशा करंज्या सुरेख बाई माहेरी धाडाव्या."
"नदीच्या काठी गं धोबी धुणं धूतो.भुलाबाई च्या पातळाला हिरवा रंग देतो".ऐसे सभी रंगों के नाम आते हैं।
"कार्ल्याचा वेल लाव गं सूनबाई मग जा आपुल्या माहेरा.
कार्ल्याचा वेल लावला हो सासूबाई,
आता तरी जाऊ द्या माहेरा माहेरा.
कार्ल्याची भाजी कर गं सूनबाई मग जा आपुल्या माहेरा माहेरा.
कार्ल्याची भाजी केली हो सासूबाई आता तरी जाऊ द्या माहेरा माहेरा.
आणा फणगट घाला वेणगट जा सुनगट माहेरा, माहेरा."
इस तरह के गाने शाम के समय लड़कियाँ  टिपरी (डांडिये)की ताल पर गाया करती थीं आरती, प्रशाद बाल गणेश (हळकुंडबाळा)को लोरी गा कर सुलाने के बाद लड़कियाँ अपने-अपने घर जाती थीं।
कोंकण में इसी को "भोंडल्याची गाणी"कहते हैं।
*अरुणा  खरगौनकर 
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वो भी क्या समय था?
जब किसी को स्टेशन
छोडने जाओ तो भी
आंख नम हो जाती थी; 
अब तो श्मशान मे भी
नही भीगती !!

जन्म और मृत्यु"
अब मंहगे हो गए हैं;
सीज़ेरियन के बिना
कोई आता नहीं
और वेंटीलेटर के बिना
कोई जाता नहीं!!
*सुशीला  कोठारी 
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मन उल्लसित हुआ
मौसम ने भरे रंग
एक पल में मिल गया 
अपनों का संग
सांसे फिर कह उठी
प्यार भरा उपहार
देहरी पर चाँद बैठा
महक रहा आँगन
सूरज ने तोड़ दिए 
रातों के बंधन
खोल दिए अपनों ने
सपनों के द्वार
भूल रही आशा 
अपना स्वभाव
खुशियों के साज सजे
थिरक उठे पाँव
कैसे रोके अब कोई
मन के भाव
*आशा जैन सिहोरा
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 हम भी बचपन में संजा कै गीत गाते थे रोज शाम को सहेलियों के घर जाकर। फिर आरती के बाद प्रसाद बंटता था। एक डिब्बे में बंद कर अनुमान करने को कहा जाता था और जिसका अनुमान सही वह विजेता घोषित किया जाता और उसे टॉफी ईनाम में मिलती। बडा़ आनंद आता। संजा गीत कुछ ऐसे होतै 
    संजा तो मांगे हरो _हरो गोबर
   कहां से लाऊं भई हरो_हरो गोबर
   संजा का दादा जी किसान घर जाए
   वहां से लाए हरो _हरो गोबर
   ले भई संजा हरो_हरो गोबर।
  संजा तो मांगे लाल _पीला फूलडां
   कहां से लाऊं लाल _पीला फूलडां
  संजा का ताऊ ताऊ माली घर जाए
  वहां से लाए लाल _पीला फूलडां
   ले भई संजा लाल _पीला फूलडां।
   संजा तो मांगे दूथ_पताशा
  कहां से लाऊं भई दूध पताशा
 संजा का काका हलवाई घर जाए
  वहां से लाए दूघ _पताशा
 ले भई संजा दूध _पताशा
२ छोटी  सी गाडी़ लुढ़कती जाए
जिसमें बैठी संजा बाई अपने घर जाए
  घाघरो घमकाती जाए / लूगडो़ लटकाती जाए
  पायल बजाती जाए /बिंदिया चमकाती जाए
  चुनरी झलकाती जाए / संजा की नथनी झोला खाए।
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  :संजा बाई
  म्हारा आकडा़ सुनार / म्हारा बांकडा़ सुनार
  म्हारी नथनी घड़ई दो मालवा जाऊं
  मालवा से आई गाडी़ इंदौर होती जाए
  इसमें बैठी संजा बाई सासरे जाए
 संजा बाई के सासरे से हाथी भी आया
  घोड़ा भी आया/ जाओ संजा बाई सासरिया।
  संजा बाई जवाब देती है_
हूं तो नी जाऊं दादा जी सासरिए
दादा जी समझाते हैं
 हांथी हाथ बंधाऊं,घोडा़ पाल बंधाऊं/गाडी़ सड़क पे खडी़
 जा हो संजा बाई सासरिए।
*  नीति अग्निहोत्री

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घूंघट डाल ले रे गुजरिया घुंघट काड ले
घूंघट में मेरा जिया घबरा घबरा जाते छोरे
कहना मान लें रे गुजरिया कहनो मान लें
गांव की सारी लुगाइयां  बदनामी करे तेरी
जा देश  सारी लुगाइयां लम्बो  घूंघट काढ़े
गांव में हमारे यहीं रिवाज  रित  पुरनी चालें
जा गांव की सारी लुगाइयां सांवली काली हो
मैं गोरी चांद  सा मुखड़ा मेरा मैं कैसे घूंघट डालू
मेरे रूप के दिवाने पंच सरपंच  कोटवाल पुजारी
 मेरा रंग रूप देखने को सारा गांव  बैचैन रे छोरे
दिन बन जाते  उन  दिवानौ का जो दीदार हो मेरा
घूंघट डाल ले रे गुजरिया घुंघट काड ले रे गुजरिया
मैं ना डालू घुंघट   मै‌ रूप की रानी कैसे घुंघट डालू
घूंघट डाल ले रे गुजरिया घुंघट काड ले रे गुजरिया
अलका जैन इंदौर मध्यप्रदेश
*अलका जैन
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संजा बई का गीत
संजा बई तमतो हठीला
संजा बई तमतो नखराला
कैसे मनाउं बेनिया तमके।
माथे बोर हठीलो
काना झुमको नखरारो
माथे चूंदड घनी चमके।
संजा बई तमतो हठीला
संजा बई तमतो नखराला
कैसे मनाउं बेनिया तमके।
तमारा नैन कजरारी
तमारो रुप हजारी
मुखड़ों दप दप दमके।
संजा बई तमतो हठीला
संजा बई तमतो नखराला
कैसे मनाउ बेनिया तमके।
वीरा थारे लेवा ने आवे
बई तू तो हाथी चढ़ी ने आवे
इका पग घम घम घमके।
संजा बई तमतो हठीला
संजा बई तमतो नखराला
कैसे मनाउ बेनिया तमके।
*माया मालवेंद्र बदेका (नारायणी)
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
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