माँ के लिए क्या लिखुं
उसकी ही तो लिखावट हुँ मै।
माँ से जन्मी
माँ के अंश की
एक बनावट हुँ मै।
माँ के सिखाए बोलो से ही
तो बनी एक कहावत हुँ मै।
माँ के लिए क्या कहुँ
उसकी ही शक्ति से बनी
उसकी हिम्मत हुँ मै।
माँ के जीवन मे घटित
हर घटना में उसकी
सहायक हुँ मै।
माँ के हर कर्म की
उत्तराधिकारी हुँ मै।
अंधेरे मे साथ चलती
माँ की परछाई हुँ मै।
माँ के लिए क्या कहुँ
माँ की ही तो
एक सजावट हुँ मै।
माँ के आँगन मे थिरकते
हर कदम की आहट हुँ मै।
माँ के मन मंदिर मे बसी
प्रेम की मूरत हुँ मै।
माँ के मुख से निकले
हर शब्द की आहट हुँ मै।
माँ के लिए क्या कहुँ
माँ शब्द से उसकी
पहली पहचान हुँ
मनोरमा जोशी
उसकी ही तो लिखावट हुँ मै।
माँ से जन्मी
माँ के अंश की
एक बनावट हुँ मै।
माँ के सिखाए बोलो से ही
तो बनी एक कहावत हुँ मै।
माँ के लिए क्या कहुँ
उसकी ही शक्ति से बनी
उसकी हिम्मत हुँ मै।
माँ के जीवन मे घटित
हर घटना में उसकी
सहायक हुँ मै।
माँ के हर कर्म की
उत्तराधिकारी हुँ मै।
अंधेरे मे साथ चलती
माँ की परछाई हुँ मै।
माँ के लिए क्या कहुँ
माँ की ही तो
एक सजावट हुँ मै।
माँ के आँगन मे थिरकते
हर कदम की आहट हुँ मै।
माँ के मन मंदिर मे बसी
प्रेम की मूरत हुँ मै।
माँ के मुख से निकले
हर शब्द की आहट हुँ मै।
माँ के लिए क्या कहुँ
माँ शब्द से उसकी
पहली पहचान हुँ
मनोरमा जोशी

No comments:
Post a Comment