हमारी लोकसंस्कृति संझा बाई
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यह गीत श्राद्ध मे सोलह दिन गाये जाते है।
लड़कियां दीवार पर गोबर से इसे बनाती है ।
और शाम को आरती भोग लगाकर गीत गाती है ।
संझा ब ई जीम ले चूठ ले
मे जिमाऊ सारी रात ,
फूला लाड़ु भरी रे परात ,
चंमंक चादनी सी रात ।
संझा जीमले ।
संझा बाई तम तमारे घरें
जाव ,
तमारी माय मारेगी कने कूटेगी ,
चांद गयो गुजरात ,
हिरनी का बड़ा बड़ा दांत
के छोरा छोरी डरपेगा जी
ड़रपेगा ।
संझा बाई का लाड़ाजी ,
लुगड़ो लाया जाड़ाजी ,
असो कसो लाया ,दारी का ,
लाता गोट किनारी का ।
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संजा बाई के गीत
संजा बाई के सासरे जावागां खाटो रोटो खावागां संजा ब ई की सासु दुत्यारी दे दारु के चिमटा की हम बैठागां गादी पे उन्हें बिठायगां खूटी पे।
2-संजा बाई को सासरो सागर में,
पदम पधारिया घडियन में राऊ जी की चाकरी गुलाम थाकां देश,
छोडो मारी चाकरी पधारो थाकां देश।
3-संजा तो मांगें हरो हरो गोबर ,
कांसे लाऊं बाई हरो हरो गोबर।
संजा का बीराजी गुजर घर जाय वह से लाऊं बाई हरो हरो गोबर।
4-छोटीसी गाड़ी रडकती जाय, गड़कती जाय,
जेमे बैठी संजा बाई,
घाघरो घमकाती जाय चूडलो चमकाती जाय,
बिछिया बजाती जाय।
5संजा बाई जीम लो चूट लो अकेली मत जाओ साथे नीलू बाई के ले जाओ।
नीलू बाई जीम लो चूट लो अकेली मत जाओ साथे सभी सहेलिया ले जाओ।
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संझा बई को भोग
संझा तू जिम ले,
चूठ ले मैं जिमाऊं सारी रात,
चमक चांदनी सी रात,
फूलो भरी रे परात,
एक फूलो घटी गयो,
संझा माता रूसी गई,
एक घड़ी, दो घड़ी, साढ़े तीन घड़ीll
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हम भी बचपन में संजा कै गीत गाते थे रोज शाम को सहेलियों के घर जाकर। फिर आरती के बाद प्रसाद बंटता था। एक डिब्बे में बंद कर अनुमान करने को कहा जाता था और जिसका अनुमान सही वह विजेता घोषित किया जाता और उसे टॉफी ईनाम में मिलती। बडा़ आनंद आता। संजा गीत कुछ ऐसे होतै
संजा तो मांगे हरो _हरो गोबर
कहां से लाऊं भई हरो_हरो गोबर
संजा का दादा जी किसान घर जाए
वहां से लाए हरो _हरो गोबर
ले भई संजा हरो_हरो गोबर।
संजा तो मांगे लाल _पीला फूलडां
कहां से लाऊं लाल _पीला फूलडां
संजा का ताऊ ताऊ माली घर जाए
वहां से लाए लाल _पीला फूलडां
ले भई संजा लाल _पीला फूलडां।
संजा तो मांगे दूथ_पताशा
कहां से लाऊं भई दूध पताशा
संजा का काका हलवाई घर जाए
वहां से लाए दूघ _पताशा
ले भई संजा दूध _पताशा
२ छोटी सी गाडी़ लुढ़कती जाए
जिसमें बैठी संजा बाई अपने घर जाए
घाघरो घमकाती जाए / लूगडो़ लटकाती जाए
पायल बजाती जाए /बिंदिया चमकाती जाए
चुनरी झलकाती जाए / संजा की नथनी झोला खाए।
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बरखा की करी विदाई
ले आयी संजा शरद सुहानी
सौभाग्य बढ़ाने आयी
देश - विश्व में संजा रानी
तू क्वारी कन्याओं की महारानी
करती कामना पूरी संजा रानी
यादों में आई संजा रानी
बचपन में तोड़ के लाते मेंहदी
पीस -पीस के सिलबट्टे पर
तेरे प्यार का चढ़ता सूर्ख रंग
जाते बाजार लेने सामान
संग -संग चलती सखी संजा रानी
गीतों में लिख -लिख महिमा गाती
जगत कल्याण करने संजा आती
समृद्धि , ऐश्र्वर्य के भंडार लाती
घर -धर , नगर द्वार में खुशियाँ छाती
फूलों से करे सोलह श्रृंगार संजा रानी
मधुर लोकगीतों में गाते संजा महारानी
शहरी संस्कृति ने तुझको बिसराया
मंजू नहीं भूली महानगर में संजा रानी
बरखा की करी विदाई
ले आयी संजा शरद सुहानी
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: पंजाब अली का पर्व भादो मास की पूर्णिमा से 4 महीने की अमावस्या तक मनाया जाता है! इसे दीवारों पर या पटिया पर गोबर से बनाया जाता है! और फूलों या रंगीन पेपरों से इसको सजाया जाता है! यह पर्व मालवा में ज्यादा लोकप्रिय हैं! और कुंवारी कन्याएं संजय वाली को बनाते हैं! ब्रज में भी राधाकृष्णन ने समझा बनी बनाई थी और वह आसान जी के नाम से स्कूल जाना जाता है यह संजय वाली के बारे में आपको मेरी जानकारी दी मैं
एक गीत पेश
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आमली की झाड़ रिमझिम बाजा बाजे रे!
1, छोटो सो सूरज वीरो के घोड़ी दौड़ा वेरी,
छोटी सी सजा बेनिया ले फुलड़ा बरसा वेरी!
2, छोटो सो चंदा वीरो ले घोड़ी दौडावे री ,
छोटी सी लच्छी बेनया ले फुलड़ा बरसा वेरी!
सनजा वली की जानकारी ओर सनजावली के गीत के साथ
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म्हारी संझा बाई "
बात अट्ठावन वर्ष पुरानी है जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ती थी | वहाँ के मोहल्ले की लड़कियाँ मेरी ही कक्षा में पढ़ती थीं , कुछ अन्य कक्षाओं में भी थीं , पर क्योंकि हम सब साथ मिलकर स्कूल आते - जाते थे इसलिए आपस में सहेलियाँ थीं | मेरा उस स्कूल में पहला ही साल था | जब संजा - पूजन के दिन आये तो मैंने देखा कि लड़कियाँ पहले के दिनों की अपेक्षा इन दिनों में रोज ही बहुत तैयार आतीं | मैंने पहले कभी संजा बाई के बारे में जाना या सुना नहीं था | स्कूल की छुट्टी के बाद लड़कियाँ रास्ते में से गाय का गोबर समेटती और बगीचों या लोगों के घरों से फूल इकट्ठे करती हुई जाती थीं |
एक दिन मैंने अपनी सहेलियों से पूछा कि तुम लोग आजकल ये सब क्या करती हो ? तो वो बोलीं कि तू भी हमारे साथ आया कर , बहुत मजा आता है | हम सब मिलकर शाम को ताजे गोबर से दीवार पर संजा मांडते हैं | फिर उसे रंग - बिरंगे फूलों की पत्तियों से सजाते हैं | उस पर चमकीले और रंगीन कागज चिपकाते हैं | उसके बाद बहुत सारे संजा बाई के गीत गाते हैं नाचते हैं और खेलते हैं | मेरी सहेलियों ने मुझे लड़ियाते हुए कहा कि आज तू भी जरूर से आना | तो मैं शाम को गई | उस दिन संजा बाई को सहेलियों ने मुझसे ही सजवाया | मुझे बहुत अच्छा लगा | उसके बाद सबने मिलकर गाने गाये और सभी ठिठोली करते गानों पर नाचने लगे | एक गाना मुझे आज भी कुछ - कुछ याद है | वो गाने में बोलती हैं कि संजा बाई का लाड़ा बिना गोट - किनारी का झोला झंगा जैसा लुगड़ा लेकर आया | पर म्हारी संजा बाई तो गोल - मटोल और नाटी सी है कैसे पहनेगी | फिर बोलती हैं कि संजा बाई का लाड़ा पीतल का गहना लाया | म्हारी संजा बाई तो वैसे ही साँवली है ऊपर से पीतल का गहना पहनकर कागली ( कौवी ) जैसी लगने लगेगी | फिर आगे वो गातीं कि संजा बाई का लाड़ा गुड़ की मिठाई लाया फिर भी फीकी ही है | पर म्हारी संजा बाई तो दूध मलाई की मिठाई खाती है | आखरी में वो गति हैं कि संजा बाई का लाड़ा जब उसको विदा कराने आया तो बिना घोड़ा - गाड़ी के पैदल ही आया | तो संजा बाई गुस्से में आगे - आगे भागती जा रही है और उसका लाड़ा पीछे - पीछे संजा बाई को आवाज लगाता जा रहा है |
ये गाते हुए सब खूब हँसती , मजाक करती और नाचती | जब तो उस उम्र में वो सब देखकर मैं भी बहुत खुश हुई पर अब समझ आता है कि उस समय संजा बाई के खेल के बहाने बच्चियों को संस्कृति की पहचान होती थी , मनोरंजन होता था | आपस में मेल मिलाप होता था , छेड़छाड़ और चुहलबाजी होती थी | फिर बह इस सबके बावजूद उनके मन बहुत पवित्र और निश्छल होते थे |
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संजा आई भादो मास,
रहेगी कुवार मास,
मनाए सोलह श्राद्ध,
नाचे गाये जावे बाद।
गांव सखी का मिलन,
राधा सजाती आंगन,
चटकीले पन्नी फूल,
गाती बजाती औ झूल।
रचती सजती संग
पूजन मन्नत संग,
"संजा तू जा थारा घर,"
निमाड़ी गीत घर घर।
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संजा
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आज से श्राद्ध पक्ष की शुरुआत हो चुकी हैं...श्राद्ध के यह सोलह दिन मालवांचल की बालिकाओं के लिए बड़े मस्ती भरे होते है...दुर्भाग्य बस इतना है कि हम अच्छी शिक्षा के नाम पर अपनी परम्पराओ को खोते जा रहे है...
कई शिक्षित लोग संजा का नाता अंधविश्वास से जोड़ देते है, जो बिल्कुल तथ्यहीन हैं.... संजा पर्व को जानने के पहले हमें #गाय के ग़ोबर को जानना होगा,उसकी ताजे ओर बासी होने के गुणों को जानना होगा,#फूल #पत्तियों को जानना होगा..ओर फिर सूर्यास्त के पूर्व इसे बनाना और सूर्यास्त के बाद इसकी पूजा के विधान को समझना होगा...आखिर प्रतिदिन ताजे ग़ोबर से ही संजा बनाना और उसे मुख्य द्वार के निकट ही बनाना क्यों अति आवश्यक हैं इन बातों को समझना होगा... ।
संजा पर्व अनेक गुणों का समावेशी त्योहार हैं एक ओर जहां संजा हमे स्वास्थ्य प्रदान करती हैं तो दूजी ओर कला का ज्ञान करवाती हैं, संजा गीतों की लयबद्धता सिखाती हैं,, संजा फूल पत्तियों के सहारे बालिकाओ को पर्यावरण से जोड़ती हैं.... फिर क्यों न हम अपने घर संजा बनाने का आह्वान अपनी बहन-बेटी से करें, ओर लोकपर्व की इसकी लोकप्रियता को बरकरार रख,स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करें...।।
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बई संजा हो
तमारा सांसरिया से
हाथी भी आयो
घोडो भी आयो
तमे जाओ
बई संजा सांसरी ।
ओ संजा
तू थारा घरे जा
थारी माँ मारेगी
के कूटेगी ।
चाँद गयो गुजरात
हिरणी का
बडा बडा दांत
के छोरा छोरी डरी
जायगा ।
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अङ्कित जाऊ खिडकित जाऊ
खिडकित ठेवला बत्ता
भुलुबाई ला मुलगा झाला
नाव ठेवा दत्ता
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अड़कित जाऊ ,खिड़कित जाऊ
खिड़कित होता काजू
भुला बाई ला मुलगा झाला
नाव ठेवा राजू
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त्यौहार एक मनाने का तरीका अलग-अलग पर लक्ष्य एक ही अपनी संस्कृति ,धरोहर, परम्पराओं को बचाएं रखना, महाराष्ट्र में गुलाबाई, राजस्थान में संझया,और हरियाणा में धुंधा के नाम से मनाया जाता है, संस्कृति तो बचती ही हे साथ ही समुह में काम करने तथा कला को उजागर करने का मौका भी मिलता है संगीत, नृत्य,
शिल्पकला,रोज विविध प्रकार के व्यंजन बनाकर उनको डिब्बे में बंद कर पहचानने को बोलकर पाक-कला को निपुण करना तरह तरह नाटिकाएं प्रस्तुत करना, हमारे त्यौहारों से ही हमें एक तरह का stage मिलता है,संजा,गुलाबाई, संझया,धुंधला उन्हीं में से एक है बचपन में हमने भी खुब गुलाबाई के गाने गाए हैं
"गुलाबाई लेकी,आल्याच याकी,दुध भात जेवाकी, दुध भात आळली, त्याला हवे मिठ,मिठ काही मिळत नाही दुध भात मिळत नाही मिठाचे झाले पाणी जेवायला बसली गुलाबाची राणी"
आली आता कोजागिरी पौर्णिमा आली
चांदण्या रात्री गुलाबाई जागवाच्या
चित्र मांडुनी आरास करूनि गुलाबाईची
कोणी चहा कोणी दुध देत भगिनींना
कौणी कोको, कोणी काफी
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भुलाबाई शब्द सही है। मराठी में बाहुली/भावली शब्द गुड़िया के लिए है। भुलोजी(शंकरजी)भुलाबाई(पार्वती)की स्थापना भाद्रपद मास में होती है और विसर्जन शरद पूर्णिमा को होता है।हिंदु धर्म में शंकर पार्वती को आदर्श गार्हस्थ्य का उदाहरण मानते हैं पुराने ज़माने में लड़कियाँ स्कूल नहीं जाती थीं , तो चातुर्मास की व्रत कथाएँ, लोक कथाएँ, गीत व्यवहार और नीति शिक्षा के माध्यम होते थे।भुलाबाई के एक गीत में तो करंज्या(गुझिया)की रेसिपी भी बताई है।"असे गहू सुरेख बाई रवा तो दळावा ,असा रवा सुरेख बाई करंज्या कराव्या. अशा करंज्या सुरेख बाई माहेरी धाडाव्या."
"नदीच्या काठी गं धोबी धुणं धूतो.भुलाबाई च्या पातळाला हिरवा रंग देतो".ऐसे सभी रंगों के नाम आते हैं।
"कार्ल्याचा वेल लाव गं सूनबाई मग जा आपुल्या माहेरा.
कार्ल्याचा वेल लावला हो सासूबाई,
आता तरी जाऊ द्या माहेरा माहेरा.
कार्ल्याची भाजी कर गं सूनबाई मग जा आपुल्या माहेरा माहेरा.
कार्ल्याची भाजी केली हो सासूबाई आता तरी जाऊ द्या माहेरा माहेरा.
आणा फणगट घाला वेणगट जा सुनगट माहेरा, माहेरा."
इस तरह के गाने शाम के समय लड़कियाँ टिपरी (डांडिये)की ताल पर गाया करती थीं आरती, प्रशाद बाल गणेश (हळकुंडबाळा)को लोरी गा कर सुलाने के बाद लड़कियाँ अपने-अपने घर जाती थीं।
कोंकण में इसी को "भोंडल्याची गाणी"कहते हैं।
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वो भी क्या समय था?
जब किसी को स्टेशन
छोडने जाओ तो भी
आंख नम हो जाती थी;
अब तो श्मशान मे भी
नही भीगती !!
जन्म और मृत्यु"
अब मंहगे हो गए हैं;
सीज़ेरियन के बिना
कोई आता नहीं
और वेंटीलेटर के बिना
कोई जाता नहीं!!
*सुशीला कोठारी
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मन उल्लसित हुआ
मौसम ने भरे रंग
एक पल में मिल गया
अपनों का संग
सांसे फिर कह उठी
प्यार भरा उपहार
देहरी पर चाँद बैठा
महक रहा आँगन
सूरज ने तोड़ दिए
रातों के बंधन
खोल दिए अपनों ने
सपनों के द्वार
भूल रही आशा
अपना स्वभाव
खुशियों के साज सजे
थिरक उठे पाँव
कैसे रोके अब कोई
मन के भाव
*आशा जैन सिहोरा
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हम भी बचपन में संजा कै गीत गाते थे रोज शाम को सहेलियों के घर जाकर। फिर आरती के बाद प्रसाद बंटता था। एक डिब्बे में बंद कर अनुमान करने को कहा जाता था और जिसका अनुमान सही वह विजेता घोषित किया जाता और उसे टॉफी ईनाम में मिलती। बडा़ आनंद आता। संजा गीत कुछ ऐसे होतै
संजा तो मांगे हरो _हरो गोबर
कहां से लाऊं भई हरो_हरो गोबर
संजा का दादा जी किसान घर जाए
वहां से लाए हरो _हरो गोबर
ले भई संजा हरो_हरो गोबर।
संजा तो मांगे लाल _पीला फूलडां
कहां से लाऊं लाल _पीला फूलडां
संजा का ताऊ ताऊ माली घर जाए
वहां से लाए लाल _पीला फूलडां
ले भई संजा लाल _पीला फूलडां।
संजा तो मांगे दूथ_पताशा
कहां से लाऊं भई दूध पताशा
संजा का काका हलवाई घर जाए
वहां से लाए दूघ _पताशा
ले भई संजा दूध _पताशा
२ छोटी सी गाडी़ लुढ़कती जाए
जिसमें बैठी संजा बाई अपने घर जाए
घाघरो घमकाती जाए / लूगडो़ लटकाती जाए
पायल बजाती जाए /बिंदिया चमकाती जाए
चुनरी झलकाती जाए / संजा की नथनी झोला खाए।
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:संजा बाई
म्हारा आकडा़ सुनार / म्हारा बांकडा़ सुनार
म्हारी नथनी घड़ई दो मालवा जाऊं
मालवा से आई गाडी़ इंदौर होती जाए
इसमें बैठी संजा बाई सासरे जाए
संजा बाई के सासरे से हाथी भी आया
घोड़ा भी आया/ जाओ संजा बाई सासरिया।
संजा बाई जवाब देती है_
हूं तो नी जाऊं दादा जी सासरिए
दादा जी समझाते हैं
हांथी हाथ बंधाऊं,घोडा़ पाल बंधाऊं/गाडी़ सड़क पे खडी़
जा हो संजा बाई सासरिए।
* नीति अग्निहोत्री
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घूंघट डाल ले रे गुजरिया घुंघट काड ले
घूंघट में मेरा जिया घबरा घबरा जाते छोरे
कहना मान लें रे गुजरिया कहनो मान लें
गांव की सारी लुगाइयां बदनामी करे तेरी
जा देश सारी लुगाइयां लम्बो घूंघट काढ़े
गांव में हमारे यहीं रिवाज रित पुरनी चालें
जा गांव की सारी लुगाइयां सांवली काली हो
मैं गोरी चांद सा मुखड़ा मेरा मैं कैसे घूंघट डालू
मेरे रूप के दिवाने पंच सरपंच कोटवाल पुजारी
मेरा रंग रूप देखने को सारा गांव बैचैन रे छोरे
दिन बन जाते उन दिवानौ का जो दीदार हो मेरा
घूंघट डाल ले रे गुजरिया घुंघट काड ले रे गुजरिया
मैं ना डालू घुंघट मै रूप की रानी कैसे घुंघट डालू
घूंघट डाल ले रे गुजरिया घुंघट काड ले रे गुजरिया
अलका जैन इंदौर मध्यप्रदेश
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संजा बई का गीत
संजा बई तमतो हठीला
संजा बई तमतो नखराला
कैसे मनाउं बेनिया तमके।
माथे बोर हठीलो
काना झुमको नखरारो
माथे चूंदड घनी चमके।
संजा बई तमतो हठीला
संजा बई तमतो नखराला
कैसे मनाउं बेनिया तमके।
तमारा नैन कजरारी
तमारो रुप हजारी
मुखड़ों दप दप दमके।
संजा बई तमतो हठीला
संजा बई तमतो नखराला
कैसे मनाउ बेनिया तमके।
वीरा थारे लेवा ने आवे
बई तू तो हाथी चढ़ी ने आवे
इका पग घम घम घमके।
संजा बई तमतो हठीला
संजा बई तमतो नखराला
कैसे मनाउ बेनिया तमके।
*माया मालवेंद्र बदेका (नारायणी)
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
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