आज मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
उसमें है हमारे सुख-दुख की यादों बसेरा।
उसमें हैं मां का हंसता हुआ ममतामयी चेहरा।
उसमें है जीवन के अनमोल पलों का खजाना।
उसमें ना कोई कुंजी है ना कोई ताला।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
सुकोमव, श्वेतवर्णी मां के नयनों में स्नेह की बहार।
मुख पर चन्द्रकिरणों सी स्निग्धता
और माथे के कुंकुम का दैवीय सौन्दर्य श्रंगार।
मृदु समीर के झोंके सी उनकी वाणी।
सुख और संतोष से रचा मर्मस्पर्शी संसार।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
वो मां के आंचल से मसाले की महक।
वो मां की सौंधी रोटी को खाने की ललक।
वो मां के खट्टे-मीठ्ठे अचार का स्वाद।
वो मां के खाने में बरसता आग्रह का प्यार।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
वो मां का सबको खिला के भूखा रह जाना।
वो मां का दो ही साड़ी में जीवन बिताना।
वो मां का अपने ही आंसू खुद से छीपा लेना।
वो मां का अपनी हंसी से घर की हर कमी को ढांक देना।
हां मैने खोला है मां की यादों का पिटारा।
मां से ही सीखा है अपनों के लिये जीना।
कड़कती धूप में शीतल छांव बनकर रहना।
संतोष और धैर्य से जीवन की राह अपनानान।
मां की सीख में ही ईश्वरीय वरदान पाना।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
उसमें है हमारे सुख दुख का बसेरा।
हां मैंने खोला है मां की यादों का पिटारा।
सुषमा व्यास ‘राजनिधि’
कहानीकार, कवियित्री
3043/E सुदामानगर, इंदौर(म.प्र.)
मोबाईल—8959689009
ई मेल—sushma29vyas@gmail.com

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