कर्म की तस्वीर हूँ मैं
मर्म की तदबीर हूँ मै
हथौड़ी उठाए हाथ में
करती हूँ निर्माण मैं
भविष्य को लादे पीठ पर
रचती हूँ भविष्य मैं
हाथ में भले हो चुड़िया
पर कांच की तरह तपती हूँ मैं
जलती हुई धूप में
पसीने से तरबतर
गढ़ती हूँ भविष्य मैं
हाँ मजदूर हूँ मैं
अनवरत बिना थके
करती हूँ निर्माण में
हाँ मजदूर हूँ मैं
मजबूर नही
करती हूं निर्माण मैं।
स्वरचित द्वारा
डॉ बबीता कडकिया
मर्म की तदबीर हूँ मै
हथौड़ी उठाए हाथ में
करती हूँ निर्माण मैं
भविष्य को लादे पीठ पर
रचती हूँ भविष्य मैं
हाथ में भले हो चुड़िया
पर कांच की तरह तपती हूँ मैं
जलती हुई धूप में
पसीने से तरबतर
गढ़ती हूँ भविष्य मैं
हाँ मजदूर हूँ मैं
अनवरत बिना थके
करती हूँ निर्माण में
हाँ मजदूर हूँ मैं
मजबूर नही
करती हूं निर्माण मैं।
स्वरचित द्वारा
डॉ बबीता कडकिया

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