"एक था बचपन "एक था बचपन ,एक था बचपन ,छोटा सा नन्हा सा बचपन ,बचपन के एक बाबूजी थे , अच्छे सच्चे बाबूजी थे ,दोनों का सुन्दर था जीवन ,एक था बचपन ,आज फिर बचपन की स्मृतियां मेरे मानस पटल पर चलचित्र की तरह दृष्ट्वय हो गई ,जब बाबूजी की गोद में जाने को नींद का झूठा बहाना कर किसी ओर के बिछौने पर सो जाते थे ,और बाबूजी के उठाने पर जब न उठते तो वो गोद में उठाकर मेरे बिस्तर पर ले जाते और मैं ठहाके लगाकर हंसने लगती ,मुझे याद है मुझे पानी से बहुत डर लगता था और तब बाबूजी मुझे पानी की टंकी में डालने का नाटक कर के डराया करते ,तो कभी अपनी पीठ पर बैठाकर ले लो नमक की बोरी ऐसे सारे घर में घुमाते तो कभी पैरों पर बैठाकर कोड़ी के भाई कोड़ी के करके झुलाते थे हम तो बहने ओर मेरे चाचाजी के तीन बच्चे एक सौ प्रेस खेलते मुझे याद है में सबसे छोटी थी तो ये भाई बहनमुझे बुद्दू बनाते ओर कहते चल हम तुझे अच्छी जगह छिपा देते है ओर में उनकी बातो में आ जाती फिर जिस पर दम होता उस जाकर बता देते की में कहा छीप हूं ओर हमेशा मुझ पर ही दाम आ जाता ,मेरी सहेली जो की गुस्से की बहुत तेज थी मुझे रोज घर पर बुलाती क्योंकि उस समय को का चलन नहीं था ओर वो अपने हाथो की उंगलियों से जबरदस्ती मेरे हाथ पर मेहंदी से मोटी मोटी घड़ी बना देती थी जब बारिश होती थी तो इतनी समझ नहीं थी कि पानी कहा से आ रहा है तब खती थी भगवान ने खाना खाकर हाथ धोए है यही पानी गिर रहा है सच कितना सच्चा ओर निश्छल बचपन होता था तभी तो कहते है कि "बच्चे मन के सच्चे "और आज फिर अपने बाबूजी ओर बचपन को याद करके यही दोहराती हूं कि " आया है मुझे फिर याद वो जालिम गुजरा जमाना बचपन का ,ओर कहती हू ,कोई लोटा दे मेरे बीते हुए दिन ,बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन'""'',,,,,,,,,,,,,,,,
साधना श्रीवास्तव
साधना श्रीवास्तव

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