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हाथ में हथौड़ा
पीठ पर संतान
मज़दूरी पत्थर तोड़ना
बसी बच्चे में जान
शिशु पालने के ख़ातिर
करती कष्टमयी श्रमदान
कितना आत्मसुख प्राप्य ये माँ
नहीं जान पायें धनवान
यही हथौड़ा लोरी बनता
यही कभी संगीत सा बजता
शीत बयार का झौंका बनता
बहे स्वेद कण मीठे अहसास
मेहनत का जब पैसा मिलता
माँ की आत्मा शीतल होती
नहीं सिवा इसके है उपाय
हाथ हथौड़ा स्त्रोत है आय
मज़दूरी कर न लाचार
सुख पाती है अपरम्पार
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स्वरचित :- कुसुम सोगानी

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