Thursday, May 28, 2020

अर्चना चौरे
*चिड़िया का संदेश*


: प्रातः काल की मधुर बेला में चिड़ियों ने जब अपना मुंह खोला मधुर मधुर चली पुरवाई इतराता मस्ताता पत्ता डोला

 धन्यवाद मानो देते ये सब को सुबह-सुबह की बेला जो लाये कहती जाती सोते बच्चों से जो जागे वह सब पाय सोने से

सोना नहीं मिलता काम से ही सूर्य निकलता चलो उठो ,उठाओ बस्ता स्कूल का देखो रास्ता जल्दी उठकर कर्म जो करता

मीठा फल वही है चखता फुदकती चिड़िया देती संदेश उठो जागो बदला परिवेश


 *अर्चना चौरे*
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नेशन वांट स टू नो एक दिन शहर घूमते हुए मुझे महसूस हुआ कि कहीं भी कोई गरीबी रेखा के नीचे वाला दिखाई नहीं दे रहा। मै एकदम चौंक गई कही गरीबी हटाने के चक्कर में गरीबों को ही तो नहीं हटा दिया? यह ख्याल आया ही था कि सामने के मैदान में सारी भीड़ दिख गई। वहां एक टूटा फूटा मंच था। वहीं से एक आदमी गुस्से से बोल रहा था" भाइयों और बहनों, आप लोग जानते ही हो कि हम आज यहां क्यों एकत्रित हुए हैं। इन नेताओ ने '"गरीबी रेखा" बना रखी है । और आज हम लोग इनके लिए "अमीरी रेखा" बनाएंगे। जरा हम भी तो देखे कि अमीरी रेखा के नीचे कोन कोन से नेता आते है।" तभी भीड़ मेसे एक आवाज आई"पर हम "अमीरी रेखा"का पैमाना क्या बनाएंगे? इन लोगों ने तो हमारे पेट को पैमाना बनाकर गरीबी रेखा बना दी। कोई कहता है२२.५०पैसे में पेट भरता है । कोई कहता है२७ रुपए में तो कोई कहता है ३२ रुपए में।"। तभी एक और आवाज आई "अरे योजना आयोग के अनुसार तो जो व्यक्ति २२.५० पैसे ख़र्च कर सकता है वह गरीब नहीं माना जाएगा। और ये आकलन उन लोगो ने किया है जो अपनी विदेश यात्रा के दौरान लाखों रुपए रोजाना खर्च करते है।" तभी एक महिला भी बोल पड़ी "पर रामजी ने तो सबका पेट एकसा बनाया है।" यह सुनकर मंच से तुरन्त आवाज आई "रामजी को बीच में मत लाओ। ये कोई नेताओ कि चुनावी सभा नहीं है ।" तभी तीसरा आदमी चिल्लाया "तो ठीक है हम भी उनके पेट को ही पैमाना बना लेते है।" यह सुनते ही मा इक से जोरदार आवाज आई"बावले हो गए हो क्या? अरे हम उनके पेट को नहीं ले सकते। उसमे पता नहीं क्या क्या समाया है। चारा घोटाला, कोयला घोटाला, बोफोर्स खनन, व्यापम, रेलवे टेंडर, मद्यान भोजन, मतलब ए टू जेड घोटाले।" फिर एक आवाज आई" तो ऐसा करते हैं की उनके हाथों को पैमाना बना लेते हैं।" लेकिन मंच से आवाज आई "फिर वही नादानी। तुमने सुना है न कि कानून के हाथ लंबे होते है। पर इनके हाथ तो कानून से भी लंबे होते हैं। तभी तो जेल में ठाठ से रहते है। बीमारी का बहाना बनाकर जनता के रुपयों से जेलों में रहते हुए अच्छे अच्छे अस्पतालों में इलाज करवा लेते हैं। हाथ लंबे होते है इसीलिए जेल से बाहर आकर चुनाव भी जीत लेते हैं।" "तो ऐसा करते हैं की दिमाग को पैमाना बना लेते है।"। " वह भी नहीं कर सकते भाई, उनका दिमाग इतना शातिर होता कि कब, कहा, कैसे पार्टी बदलना है सब समझता है।"उन सबका वार्तालाप चल ही रहा था कि मेरी नींद खुल गई। अब एक प्रश्न सचमुच मेरे दिमाग में घूम रहा है कि नेताओं कि अमीरी रेखा होनी चाहिए। जनता को भी तो मालूम होना चाहिए कि कोन सा नेता अमीरी रेखा के नीचे है और कोन सा अमीरी रेखा के ऊपर। लेकिन नेताओ के लिए अमीरी रेखा खींचना हो तो क्या पैमाना होना चाहिए____कितने बीघे जमीन है? कितनी कोठियां है, कितना सोना, चांदी, हिरे ,जवारहत या कितना दबदबा है.... या और क्या? आप लोग ये जिज्ञासा दूर कीजिए और अमीरी रेखा केसे खींची जाय ये बताईए

। जयहिंद


। । नियति sapre..

Tuesday, May 26, 2020

"ईश्वर को पत्र

 "परम पूज्यनीय ईश्वर

,सादर वंदन🙏🏻 आ

ज हम मानव अपने ही कर्मों का फल के आगे विवश हैं आप त़ो अन्तर्यामी हैं आप तो जानते हैं की आज कोरोना की महामारी ने सबको परेशान कर रखा है साथ ही पानी ओर प्रदूषित पर्यावरण ने भी सबको घेरा है आज हम अपनी परेशानी आपको बता रहे हैं क्योंकि आप हमारे पिता परमेश्वर है हमने प्रकृति से खिलवाड़ कर के बहुत सजा पाई है ओर जीवन की आपाधापी में आपका स्मरण करना भी कभी कभी भूल जाते हैं आप हमारी इस भूल को माफ कर दीजिए ,क्योंकि कहते है "क्षमा बढन को चाहिए ,छोटन को उत्पात "हम स्वार्थ वश भूल जाते हैं और प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर देते है आज उसका नतीजा है कि हम जल प्रदूषण ओर कोरोना जैसी महामारी से त्रस्त है आप तो को चाहे कर सकते हैं हम अब कभी ऐसी भूल नहीं करेंगे आप तो सबकुछ कर सकते हैं क्योंकि कहते है "कोन सो संकट मोर गरीब को ,जो तुमसे नहीं जात है टारो"प्रभु इस मानव जाती को इस सृष्टि को इस संकट से उबारिये ,हम आपसे अपनी भूलो की क्षमा मांगते हैं हमें माफ कर दीजिए ओर सबका उद्धार इस संकट से कीजिए ""

आपकी पुत्री

"साधना श्रीवास्तव "🙏🏻🌹
दिनांक- २६-५-२०२० विषय- महापौर के नाम धन्यवाद पत्र


। सम्मानित मालिनी जी गौर सादर नमन,🙏🏻 भारत देश की नागरिक होने के नाते इंदौर शहर के गौरांगवित निवासी, मेरा यह कर्तव्य बनता है कि में अपने शहर के प्रति अपना कर्तव्य का निर्वहन करू। सामूहिकता में शक्ति होती है, में आपसे से बहुत अधिक प्रभावित हूं, आप एक महिला होकर सबको साथ लेकर चली तथा इंदौर शहर को लगातार तीन बार के पहला स्थान हासिल करवाया। जिसपर हम सभी इंदौर वासियों काफी नाज़ है। पूरे भारत में इंदौर का नाम रोशन हुआ एवं विश्वपटल पर भी इंदौर की एक अलग पहचान बन गई है।कई लोग विदेशो से आकर यहां सफाई अभियान को देखते और भूरी- भूरी प्रशंसा करते हैं। आपने विदेशो में जाकर वहां की व्यवस्था को देखा और समझा तथा अपने शहर में सफलतापूर्वक लागू किया । सफाई अभियान का जो प्लांट हमने लगाया है वो पूरे देश में कही नहीं है ट्रेचिंग ग्राउंड पर कचरे का पहाड़ खड़ा था उसे भी समतल कर दिया गया है। सभी प्रयोज्य कचरे को मशीनों द्वारा छांट कर पुनः उपयोग में लाया जाता है । पूरे इंदौर शहर के ९५ से भी अधिक बगीचे इतनी गर्मी में भी हरे भरे है वो भी वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट के माध्यम से। खुशी तो बहुत होती हैं जब बाहर जाते है और लोग कहते है, अच्छा आप "क्लीन सिटी" से है तब गर्व से सर ऊंचा हो जाता है अंत में यह कहना चाहूंगी कि हम सब कोविड- १९, महामारी से मिलकर लड़ेंगे, सामूहिकता से प्रशासन की गाइड लाइन का पालन करेंगे एवम सफाई के साथ साथ हैल्थ के क्षेत्र में भी बाजी मारेंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि आप के द्वारा वर्तमान व भविष्य के लिए जो भी योजनाएं लागू की गई हैं उससे इंदौर शहर में और भी निखार आएगा ।

 आपकी प्रशंसक सुनीता अग्रवाल
उन दिनों की बात है जब घरों में बिजली नहीं हुआ करती थी ।


संदेश पहुंचाने को सिर्फ पोस्ट ऑफिस का सहारा हुआ करता था । परदेश में रहने वाले अपने प्रियजन को चिट्ठी द्वारा ही मन की बात पहुंचा पाते थे। मुझे याद है गांव में पढ़ना लिखना भी रात के समय में एक लालटेन या दियासलाई हुआ करता था। मैं जब आठवीं में पढ़ाई करती थी तब की बात है , एक परिवार की बहू को अपनी मन की भावना पति को पहुंचाना था। पर मुश्किल तो यह था कि उसको पढ़ना लिखना नहीं आता था। उसका पति उससे रूठ कर गया था। वो अपनी पति को मनाना चाहती थी। बात मेरे समक्ष आया की एक मनुहार चिठ्ठी लिखना है । मै पहली बार चिठ्ठी लिखने बैठी । "सर के स्वामी चरण स्पर्श हम यहां सब कुशल मंगल है , आशा करती हूं आप भी कुशल मंगल होंगे । मुझे मालूम आप नाराज है मुझ से। आप जब जा रहे थे घर की आड़ से आप को निहारती रही एक दफा आप मुड़कर देखेंगे पर मुझे निराशा ही हाथ लगी । फिर सोचा की जाते ही आप की चिठ्ठी आएगी पर नहीं आई । आप क्यों इतना नाराज हुए की मेरा यह कहना था "कि सासू मां को मेरी हर काम में मिन मेख निकालने की आदत है । हम पांच बहु में से मै ही अखरती हूं उनको । आप बोलिए की मुझ से भी समान व्यवहार किया जाय। " इतने में ही आप मुझ से ही नाराज हो गए और दूसरे दिन उठ कर चल दिए नौकरी पर। मै यह भी जानती हूं कि अब आप के मन में कोई नाराजगी नहीं है न मेरे मन में है। कहते है न कि पति पत्नी की झगड़ा पराली के आग समान होती है । छुटकी की तबियत नरम गरम होती रहती है। पूछती है पापा कब आएंगे ? अब की बारी छुटकी के लिए हरलिक्स की दो सिसी ले आना । और अब ज्यादा क्या कहूं अपना ध्यान रखना । आप की फूलमती " उसके पति को यह मालूम था कि उसकी बीबी को लिखना नहीं आता। इतना सुलझे बातों से कौन कर सकता है। बाद में जब पता चला खास इज्जत बन गई मेरी । मेरी फिर यही इमेज बन गई की बिगड़ती बनाने वाली की। चिट्ठियां तो बहुत लिखे पर पहला चिट्ठी संस्मरण कि तौर पे आप लोग के समक्ष 🙏💐


 मित्रा शर्मा महू
प्रिय प्रणय

मेरा गोल मटोल लड्डू


कब घर में सभी से लम्बा हो गया मुझे पता ही नहीं चला । मेरा बेन टेन अब सोलह साल का सुपर कंप्यूटर हो गया है ।


मेरे ' मिस्टर कूल ' मैं चाहती हूँ तुम हमेशा ऐसे ही रहो । नंबर्स या रैंकिंग से तुम्हेँ कोई फर्क नहीं पड़ता है , तुम अपनी


पढ़ाई जश्न के रूप में करते हो और उसीमे खुश होते हो। न तुम्हें अपने पापा की उम्मीदों पर खरा उतरना है और न ही


अपनी मम्मी की इच्छा पूरी करनी है , बस खुद को खुश करना है । और तुम्हारी ख़ुशी में मैं खुश हूँ । गर्व या उम्मीद ये


शब्द हमारे बीच नहीं रहेंगे , रहेगी सिर्फ तुम्हारी ख़ुशी ।






 तुम्हारी माँ

मीता पंडित

*प्रेम पत



*एक पत्र पिता के नाम*


 पूज्य बाबूजी, सादर नमन ।



 बाबूजी हम सब यहाँ सकुशल हैं और हमारी कुशलता में ही तुम्हारा सुकून है यह मैं जानती हूँ । अभी यहाँ पर कोरोना नामक महामारी ने तांडव मचा कर रखा है 21 दिन के लाॅकडाउन में सब घर में बंद है। कभी-कभी एक अनजाना-सा डर लगता , जाने क्या हो? सभी लोग मानसिक अवसाद में घिरे हुए हैं आज तुम हमारे साथ होते , तो कितनी हिम्मत देते। एक वट वृक्ष की तरह अपनी बड़ी शाखाओं से हम स्नेह की छाया करते । तुम तो जानते हो, मैं बहुत जल्दी डर जाती हूँ तुम्हारा लाड़ कितनी हिम्मत देता था मुझे आज तुम्हारी कमी को सबसे ज्यादा शायद मैं ही महसूस कर रही हूँ । भैया की जब से बायपास सर्जरी हुई है, तब से चिंता बनी रहती है और फिर इस खतरनाक महामारी के समय तो चिंता स्वाभाविक है न ! तुम्हारे रहते शायद मैं बेफिक्र रहती । बाबूजी तुम हमेशा मुझसे यही कहते थे न कि दो-चार दिन चिट्ठी लिख दिया करो, ताकि समाचार मिलते रहें। पर क्या करूँ आजकल चिट्ठी लिखना छूट ही गया है। एक पुरानी अधूरी चिट्ठी आज मेरे हाथ लगी जिसे मैने शुरू तो किया था, पूरा नहीं कर पाई थी । आज बहुत अफसोस होता है कि तुम्हें , अपनी चिट्ठी की प्रतीक्षा ही कराती रही । आज बहुत लिखने का मन हो रहा बहुत सारी बातें तुम्हे बताना चाहती हूँ पर आँखें डबडबा रही हैं शब्द ठीक से दिख नहीं रहे, धुंधले पड़ । तुम्हारी बहुत याद आती है, बाबूजी । अगली चिट्ठी जल्दी लिखूँगी । पर बाबूजी इस चिट्ठी को मैं किस पते पर भेजूँ , तुम्हारा पता तो ---। आशा है तुम्हारी आत्मा मेरी इस भावना को समझ लेगी, क्योंकि कहते हैं कि मृत्यु के बाद भी माता-पिता की आत्मा अपने बच्चों के आसपास ही होती है----। है न !


 तुम्हारी लाड़ली वंदना ।
🥰 एक पत्र 🥰

 प्रिय सिंधु


 सस्नेह तुम और सुधाकर हम दोनों को पागल ही कहोगे जब तुम्हें पढ़कर मालूम पड़ेगा कि


हम दोनों इकत्तीस दिसंबर मनाने व्यास नदी की घाटी मनाली आये हैं l अभी तक चार बार बर्फ़बारी हो चुकी है l और


अभी भी बर्फ के फाहे गिर रहे हैं l हिमान्छित पर्वत शिखर और हरी भरी घाटियाँ सम्मोहित कर रहीं हैं l ये सब देख कर


 मैंने जिग्नासु को बोला कि आपके रिटायरमेन्ट के बाद हम यहीं आजायेंगे रहने l चौबीस तारीख़ को हम रोहतांग पास


और पच्चीस को सोलन घाटी देख आये l दोनों ही जगहों की खूबसूरती अवर्णनीय है l इसलिए उसको हमने अपने


मोबाइल में कैद कर लिया है l तुम्हें अभी सारे फोटो तुम्हारे मोबाइल पर भेज रही हूँ l यहाँ अदभुत संस्कृति का समन्वय


है l एक तरफ तिब्बती बौद्ध मंदिर है l दूसरी तरफ हिप्पीयों का डेरा l इनके बीच संतुलन बनाते, व्यापार करते व्यापारी


और होटल के मालिक l हिप्पीयों को देख कर लग रहा था कि हम लासवेगस में चरसियों के साथ घूम रहे है देवभूमी में

नहीं l अरे हाँ एक बात तो बताना ही रह गई l यहाँ पर हेलीकॉप्टर भी चलता है l छः मिनिट आपको रोहतांग तक जाकर

वापस लाता है l पता है कितने पैसे लेता है? पूरे पचास हजार l मैंने तो उसको भी सुना दिया l मैंने कहा भैया इतने पैसे

में तो हम घर जाकर वापस फ्लाइट से आजायेंगे l और यदि चंडीगढ़ से फ्लाइट लेंगे तो हिमालय के उत्तुंग शिखर की सैर


करते आएंगे l हा.. हा.. हा.. हा.. l आज यहाँ का तापमान शून्य से पंद्रह *सेल्सियस है l कमरे में तीन तीन हीटर चालू है

l हमने दो स्वेटर पहने हैं l ऊपर से रजाई भी ओढ़ी है फिर भी ठण्ड लग रही है l सुन सुधाकर को मत बताना कि मैं तेरे

लिये होटल की सारी टॉयलेटरीज उपहार के रूप में ला रही हूँ l गुस्सा मत हो प्रिये l चल अब सौ रही हूँ l कल सुबह पाँच

बजे की फ्लाइट है l एयरपोर्ट पर लेने आना मत भूलना l


 तेरी सखी मंजिरी

एक पत्र देश के नाम-

 26/5/2020 इंदौर(म.प्र.)

प्रिय देश, सादर नमस्कार🙏🏻 तुम्हारी भूमि में जन्म लेकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।तुम भी मेरे समान आदर्श नागरिक पा कर

प्रसन्न होंगे।तुम्हे विदित हो कि

 इस धरा पर बड़े होते हुए मुझमे तुमसे प्रेम और आत्मीयता अनायास ही सहज रूप से पनप गई है।पिछले दो दशकों में समझ नहीं आता कि तुम्हारे विकास और उन्नति का जश्न मनाऊँ या तुम्हारे मौलिक गुणों के पतन का मातम मनाऊँ।उम्र के हर पड़ाव पर मैंने तुम्हारे साथ परिवर्तन को महसूस किया है।मेरे प्यारे देश तुम्हारा वो समय जब यहाँ की बेटियाँ, लाज शर्म में रहते हुए,बेख़ौफ़ सभी में अपनापन अनुभव किया करती थी।यहाँ के बेटे नैतिक रूप से संबल थे।यहाँ का हर नागरिक आपसी बंधन में मजबूती से बंधा था।भौतिक संसाधनों और सुख-सुविधाओं को पाने की होड में हे! भारत आज जो तुम्हारे मौलिक गुणों का ह्रास हुआ है इससे मन द्रवित हो जाता है मेरा!तुम जानते हो शांति,अमन,चैन के वो दिन जब इंसानियत ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी।हमारी भारतमाता सुनहरी मुस्कुराहट बिखेरती थी और तुम सोने कि चिड़िया नाम के बेटे थे उसके।मैंने तो उन दिनों कि तुम्हारी सुंदरता के चर्चे किस्सों के रूप में मेरी दादी माँ के श्री मुख से ही सुने है। जब तुम संसार में "हिंदुस्तान"नाम से प्रसिद्ध हुए तो तुमने विश्व के लोगो को अपनी संस्कृति में मिला लिया और अन्य मानव संस्कृति को भी स्वयं में घोल लिया।फिर फ़िरंगियों ने तुम्हे बड़े प्रेम से "इंडिया" पुकारना शुरू किया।इस प्यार भरे नाम इंडिया की कैसी दुर्दशा लगातार 200 वर्षों तक की उसे पुस्तकों में पढ़कर ही मैं तो सिहर जाती हूँ।उस कठिन दौर में भी तुमने देशवासियों की आवश्यकता कि पूर्ति की।लोगों की मुलभूत जरूरतों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पूरा कर स्वयं के रक्षा-कवच में भारतीयों को महफ़ूज रखा। तुम्हारे चालीस कोटी सपूतों ने हमारी भारतमाता को गुलामी की बेड़ियों से छुटकारा दिलाया था।आज गुलामी की जंजीरों को टूटे लगभग 73 वर्ष हो चुके है।धीरे-धीरे दकियानुसी रूढ़ियों की जंजीरों से भी तुम आजाद होते गए।स्वतन्त्र हुए उन तमाम बन्धनों से जो तुम्हारे विकास की गति को अवरुध्द करते थे।विडम्बना इस बात की है कि डूब जाने के अंधे भय से तुम्हारे कुछ प्रतिशत रहवासियों ने उन टूटी जंजीरों को अब भी हाथों में थाम रखा है।जो तुम्हारी प्रगति चक्र को तीव्र नहीं होने देते। स्वतंत्रता का मतलब उच्छृंखलता नहीं होती यह देश की युवा पीढ़ी नहीं समझ पा रही।अनुशासनहीन होते कुछ युवा तुम्हे खुशहाल नहीं रहने देते।दूसरी ओर यह युवा शक्ति गर्व से तुम्हारा भाल ऊंचा भी उठती है।जब वह अपने कौशल से विश्व को चकित कर देती है।वह भी एक दौर था जब तुम्हारे टुकड़े सम्प्रदाय के नाम पर किये गए और तुम!सहर्ष दो हिस्सों में बंट गए ताकि मानवता आहत ना हो।परन्तु जब अब भी क्षेत्र और भाषा मे नाम पर तुम्हे विभाजित करने का प्रयास किया जाता है तो विभाजन का दर्द फिर से उभरने लगता है।आतंकवाद और नक्सलवाद को तुम अपनी देह पर सहते हो तो देशभक्तों के मन मे तुम्हारी तकलीफ से हूक-सी उठती है।तुम्हारा हृदय भी विपन्न हो जाता होगा ना! पर तुम बोहोत बहादुर हो बुराइयों के सर कुचलने में! तुम्हारी तो मिट्टी में ही एकता और अपनेपन की सुगंध है,इसलिए तुम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। आज वैश्विक महामारी का बड़ा कठिन दौर है।इसके प्रभाव से तुम भी बीमार हो गए हो,पर तुम चिंता मत करो,हम सब देशवासी मिलकर तुम्हे इस कष्ट से बचा लेंगे।मेरे प्यारे देश तुम सदैव अग्रणी और विश्वगुरु रहे हो,तुम्हारे प्रति गर्व का अनुभव होता है जब आर्थिक मंदी के इस विकट वैश्विक दौर में भी तुम अपने पैर मजबूती जमाकर सम्पूर्ण विश्व मे सर बुलंद कर खड़े हो।विश्वास रखो मेरे प्यारे !वैश्विक खेलों में तुम फिर विजय का जयघोष करोगे,विकास के नए आयाम स्थापित करने में लिए आकाश का सीना चीरकर फिर अंतरिक्ष यान प्रक्षेपित करोगे।स्वस्थ,सम्पन्न और पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो जाओगे।संसार के विकास की दौड़ में नम्बर वन का खिताब पाओगे।तुम्हारी प्यारी धरा पर मुझे बड़ा अपनापन लगता है।तुम्हारी भूमि देवभूमि है और इसमे जन्म लेकर मैं खुद को धन्य मानती हुँ।


 तुम्हारी अपनी माधुरी व्यास"नवपमा"
प्रिय बिट्टू

 शुभाशीष प्यार बेटा

आप जब से गए हो पुणे घर सुना व खाली खाली सा लगता है फोन पर बात तो होती है पर कुछ बातें हैं जो मैं तुमसे कहना चाहती हूंँ इन्हें बेटा तुम उपदेश ना समझना सीख व सलाह समझ अमल करना बेटा तुम अपनी जिद से बाहर गई यहां रह कर भी पढ़ाई पूरी की जा सकती थी, तुम्हारे पापा और मैं तुम्हारी फिक्र करते हैं प्यार करते हैं तुमसे लाडो ।तुम खूब पढ़ो आगे बढ़ो आसमान की ऊंचाइयों को छुओ पर आसमान को छू कर नीचे ही आना है क्योंकि आपकी सफलता व तरक्की पर गर्व करने वाले आपके अपने यहीं रहते हैं पंछी आकाश की सैर कर वापस अपने घौंसले में आ जाते हैं अपने साथियों के पास हम इंसान ही हैं जो ऊंचाइयों में खो जाते हैं बेटा जिंदगी कांटो का सफर है हिम्मत और हौसले से ही अपना रास्ता बनाना है मंजिल पर पहुंचना है तो राह की मुश्किलों से मत घबराना आत्मविश्वास से कदम आगे बढ़ाना हम सब हमेशा तुम्हारे साथ हैं और बेटा आधुनिकता की जो हवा चल रही है उसमें न बहना, आधुनिकता हमारे विचारों में होना चाहिए हमें अपने संस्कार व मर्यादा नहीं भूलनी चाहिए कोई हमारी सीमाएं निर्धारित करें इससे अच्छा हमें खुद अपनी लिमिट बनानी चाहिए। हमारे रीति रिवाज व संस्कार हमारी बेडियां नहीं इनके साथ ही हमें आगे बढ़ना है अपना लक्ष्य निर्धारित करो और उसे पूरा करो, समय पर अपना हर काम पूरा करों टाईम पर सोना और टाईम पर उठना सफलता की पहली सीढ़ी है तुम यहां होती तो मैं तुम्हें समय पर जगाती अब वहां तुम खुद अपना ध्यान रखना और अपनी दोस्तों का भी क्योंकि बेटा जो सोता है वह खोता है "जो सोवत है वह खोवत है जो जागत है वो पावत है" वक्त की रफ्तार समझो जो बातें मैं तुमको बोल रही हूं वह सब तुम्हारे भैया को भी बोलती हूंँ आगे तुम लोगों को ही समाज व देश की तरक्की का हिस्सा बनना है तुम अब बड़ी हो रही हो सही गलत अच्छे बुरे की पहचान सीखो ,सही दोस्त चुनो दोस्तों की भीड़ इकट्ठी करने से अच्छा है कुछ खास दोस्त ही चुनना जो अच्छे व सच्चे हो क्योंकि बिट्टू रिश्ते हमें जन्म से मिल जाते हैं एक दोस्ती का रिश्ता ही है जो हम खुद ही चुनते हैं वो हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा होते हैं। और आजादी फ्रीडम का मतलब यह नहीं कि हम बिना मतलब सड़कों पर घूमे , देर रात तक बाहर रहे ,मुझे पता है यह सब तुम्हें भी पसंद नहीं है पर तुम जिस शहर में हो उस शहर की हवा ही कुछ ऐसी है वह शहर दौड़ता है तुम अपनी स्वाभिकता न खोना और हां तुम कराटे क्लास जा रही हो न और बैडमिंटन की प्रैक्टिस कर रही हो ना प्रतियोगिताएं नजदीक ही है मुझे पूरा विश्वास है तुम जीतोगी ही ,तुम में जीत के प्रति जुनून है और इरादे भी बुलंद है। बेटा आप हर काम सोच समझ कर करना आजकल जो हो रहा है लड़कियों के साथ तुम्हें भी पता है कुछ करने से पहले दो बार सोचना कि क्या वह तुम्हारे लिए सही है कोई भी चमकती हुई चीज सोना नहीं होती किसी की भी चकाचौंध में नहीं खोना और हां मैं तो भूल ही जा रही थी मोनू आ रहा है तुम्हारे पास तुम दोनों भाई बहन खूब घूमना मजे करना शॉपिंग करना, उसकी भी दो दिन की छुट्टी है दोनों एक दूसरे का ख्याल रखना तो मम्मी पापा की याद कम आएगी वो वहीं से चेन्नई चला जाएगा ।

 खुश रहो ढेर सारा प्यार

 तुम्हारी मां

 शालिनी खरे
27मई2020भोपाल *प्रिय बिटिया ज्योति* *


अपार स्नेह*


*इस लॉकडाउन में मैंने रामायण और महाभारत धारावाहिक



देखें। उनसे मुझे सीख मिली कि कैसी भी स्थितियाँ हो हमें अपने परिवार के साथ मजबूती से खड़े रहना चाहिए। यदि



आप देश ,समाज* *एवं परिवार का हाथ दृढ़ता से थामते हैं, तो युगों-युग तक आपको सम्मान मिलता रहता है* ।



*ज्योति इन दोनों पवित्र ग्रंथों की सीख को आपने अपने जीवन में धारण ही नहीं किया अपितु उसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी

दिया है।आपने हर चिंता को छोड़,केवल परिवार की चिंता की। आप कलयुग की श्रवण कुमारी हो ।इस आपदा* *में घर

की सीढ़ी लांघते हुए हमारे पैर कांपने लगते हैं तो आपको उन वीरान सूनी सड़को पर रात्रि के घोर अंधकार में डर नहीं


लगा? तपती धूप में बीमार पिता को साइकिल पर बैठाकर गुरूग्राम से दरभंगा तक की यात्रा आपने कैसे कर ली? जब


आप अपने गन्तव्य की ओर बढ़ रही थी तो किशोरवय की चंचलता आप* *कहाँ छोड़ आई थी? आपके साहस को

अभिनंदन करते हैं। आज विश्व की हर नारी आपके साथ है ।आपने इस यात्रा के माध्यम से जीवन- यात्रा के लिए अपने

देश की बेटियों को संदेश दिया है कि कैसी भी स्थिति रहे हमें अपना साहस नहीं खोना है। अपने अधिकार के लिए*

*लड़ना है रिश्ते के परदे के पीछे छिपे अपमान को नहीं सहना है। हर क्षेत्र में साहस के साथ आगे बढ़ना है। बेटी हमें


आप पर गर्व है*। *एक बात है ज्योति यदि सोनू सूद भैया को यह बात पता चलती तो वह कभी आपको ऐसी

कठिन,साहसिक यात्रा पर अकेले नहीं जाने देते।भाई तो होते ही है बहनों की रक्षा के लिए। भारतमाता भी आप जैसी

दोनों सन्तानों को पाकर गर्व कर रही होंगी।अभिनन्दन, अभिनन्दन ।जय भारत,जय हिंद*।



*आपकी प्रशंसक* *मीना जैन (भोपाल)*
प्रिय बेनी ,


 मधुर स्नेह विश्वास है तुम्हें नया वातावरण अच्छा लग रहा होगा ।नए परिवेश से तुम्हारा धीरे - धीरे सामंजस्य भी हो रहा

होगा । तुम्हारा जन्मदिन नज़दीक है लेकिन यह पहली बार है कि तुम यहाँ नही हो , यहाँ होते तो हम सब हमेशा की तरह

तुम्हारी पसंद की कोई छोटी सी ट्रिप बना लेते घूमने की । दुरबीन , स्मार्ट वाच वीडियो कैमरा तुम्हारी वांटेड लिस्ट में हैं


इनमे से कोई एक चीज़ जो तुम्हे अभी चाहिए बताओ जिससे कि मैं समय से उसे भेज सकूँ और जन्मदिन पर तुम्हें मिल

जाये ( हमेशा की तरह मत कहना कि मुझे कुछ नही चाहिए ) हमे तुम्हारी कमी महसूस होती है लगता है आस - पास


सब चुप सा हो गया है लेकिन जानती हूँ तुम वहाँ बहुत कुछ अच्छा सीखोगे जो तुम्हे मजबूत बनायेगा । कुछ पंक्तियां


तुम्हारे लिए ----- चुनों राहें वे ----- जो हो चुनौतियों से भरपूर , उम्मीद की रोशनी दो उन्हें जो हो नाउम्मीद , बढ़ायो कदम

अपने मदद के -- सतत आगे

, हो प्रशस्त जीवन तुम्हारा , हौसला , सच्चाई और नेकनीयती से ।


 शुभेच्छु मम्मी ।

शालनी रा यजदा 
लेखिका का परिचय नाम- सुश्री हेमलता शर्मा भोली बैन शिक्षा- स्नातकोत्तर जन्मतिथि- 19/12/1977 पता-राजेंद्र नगर, इंदौर मध्य प्रदेश पिन कोड 452012 कार्यक्षेत्र-वर्तमान में लेखिका सहायक संचालक वित्त संयुक्त संचालक कोष एवं लेखा इंदौर में द्वितीय श्रेणी राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत है इससे पूर्व सहायक संचालक जनसंपर्क के रूप में कार्य कर चुकी हैं लेखन विधा में कविता आलेख व्यंग और लघु कथा लिखती हैं मध्य प्रदेश अभिव्यक्ति जैसी शासकीय पत्रिकाओं एवं दैनिक भास्कर पत्रिका नई दुनिया इंदौर समाचार जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में आपके आलेख एवं कविताएं व्यंग लघुकथा प्रकाशित होती रही हैं सामाजिक क्षेत्र इंदौर शहर ही है राष्ट्रीय सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी से उत्कृष्ट कवित्री, अग्रसर हिंदी साहित्य मंच जोधपुर राजस्थान से उत्कृष्ट समीक्षक सहित विभिन्न सामाजिक साहित्यिक संस्थाओं से सम्मान प्राप्त हो चुके हैं शासकीय क्षेत्र में भी उत्कृष्ट कार्य हेतु तीन बार सम्मानित किया जा चुका है। विशेष उपलब्धि-मध्य प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग से चयनित आगर मालवा जिले की प्रथम प्रशासनिक अधिकारी विभिन्न अवसरों पर मंच संचालन अध्यक्षता मालवा थिएटर के कलाकार के रूप में मालवी बोली के प्रचार-प्रसार हेतु *अपणो मालवो* के माध्यम से प्रचार-प्रसार एवं आनंद के रूप में विभिन्न सामाजिक- साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से समाज सेवा एवं जनकल्याण कार्यों में भागीदारी करना है । हाल ही में प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी के उपन्यास का मालवी बोली में अनुवाद कार्य किया है । मालवा जन समुदाय द्वारा आपको *मालवा की शान* एवं *भोली बैन* के तखल्लुस से सम्मानित किया जा चुका है । आपके लेखन का उद्देश्य मातृभाषा हिंदी एवं मालवी बोली का प्रचार प्रसार करना है।
बालक आज के बालक
तुम कल देश के कर्णधार
 भाई चारे के नारे का बनना तुम सूत्रधार।
 यह भारत की माटी को सींचना तुम
पसीने से जय जवान जय किसान सार्थक करना
सलीके से देश के लिए देना पड़े बलिदान लहू
से तो तुम हटना नहीं पीछे सरहद पर कुर्बानी से।
 डगमगाना नहीं तुम जैसी परिस्थिति आए संवारना है
मां को मिलकर हाथ बढ़ाए
* मित्रा शर्मा
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परिचय
 : नाम_मित्रा शर्मा
 स्थाई निवास _महू
रुचि_ साहित्य पठन पाठन 
'
पाती पिता की' प्रतियोगिता हेतु मेरी रचना -- 🙏


पाती पिता की 🙏

 पूज्यनीय पिताजी , सादर चरण स्पर्श ,

आज जब मैं आपसे इतनी दूर किसी दूसरे शहर में नौकरी कर रहा हूँ , अब मुझे जीवन के इस पथ पर पल - पल आपकी शिक्षा और याद आ रही । काश कि आपने मुझे अपने स्नेह की छाया में रखकर पढ़ाया - लिखाया नहीं होता तो मैं आज कहीं का नहीं होता । वास्तव में वो आपकी कठोरता नहीं आपका प्यार था जिसे मैं अब जान पाया । आज मैं आपको याद करते हुए एक गीत लिख रहा हूँ , कागज़ पे मेरी क़लम चल रही है और भावनाओं में डूबी हुई मेरी अँखियों से अश्रुधार ,जो इस ख़त के कागज़ को गीला कर रही है । पर सच तो ये कि ये ख़ुशी के आँसू हैं , पिताजी मैं आपको सौ सौ नमन करता हूँ । 🙏पापा तुमसा कोई न प्यारा🙏 मन्दिर, मस्ज़िद और गुरुद्वारा साधू सन्त ज्योतिष का द्वारा जा जाकर मैं हारा... पापा तुमसा कोई न प्यारा पापा तुमसा.....। नहीं मैं समझा रूप तुम्हारा, छिपा क्रोध में प्यार तुम्हारा । करूणामयी है हृदय तुम्हारा , तुमसे शोभित घर है सारा । आपकी मेहनत से सँवरा , आज ये भाग्य हमारा... पापा तुमसा....। ख़ुद न खाकर हमें खिलाया , जो भी मांगा हमें दिलाया । अँगुली पकड़कर चलना सिखाया , जीवन पथ हमको दिखलाया । छाँव बने तुम सिर पे हमारे धूप में दिया सहारा .... पापा तुमसा .....। भूल हमारी बहुत हैं पापा , क्षमा तुम्हरा गुण है पापा । बहुत सताया हमने तुमको , गले लगाया तुमने हमको ।

जनम - जनम तक तुमको पाऊँ पुत्र बनूँ मैं



तुम्हारा.... पापा तुमसा....। -- सुरेन्द्र सिंह राजपूत 'हमसफ़र' मोब. - 98269 29480 LIG सी 6/25 आवास नगर

 मक्सी रोड़ देवास (मध्यप्रदेश) पिन -- 455001
प्रिय बिटिया आशा है ,स्वस्थ ,प्रसन्न होगी।मैं जानती हूं तुम्हारे लिए यह मुश्किल समय है।लॉक डाऊन में सब बन्द है और

तुम मातृत्व की सुखद और कठिन परीक्षा से गुजर २ही हो।दिनभर आनलाईन ऑफिस का काम,सुबह शाम पारिवारिक


जिम्मेदारियों का निर्वहन और तुम्हारी गर्भावस्था ..थक जाती होगी बिटिया रानी..।यह परीक्षा का काल ६ै बेटु अतः अपना

ध्यान रखना।खूब खुश रहने का प्रयास करना।सकारात्मकता हर परेशानी का हल ६ै।कृष्ण की तरह संतान हर विपत्ति


को चीर कर तुमको सुख प्रदान करेगी।ईश्वर सबका कल्याण करेंगे।तुम घर में बड़ों की सेवा कर २ही हो उनका आशीर्वाद भी तुम्हारे साथ है।

 शेष शुभ ह्रै ढ़ेर सा

 आशीष तुम्हारी माँ


*संगीता सहज  पाठक
पिताजी को पत्र 26/05/20 परम आदरणीय मेरे प्यारे पापा सस्नेह याद, अत्र कुशलम तत्रास्तु । आशा है आप भी मेरे


प्यारे भाई एवं भाभी के साथ मंगलमय होगें। आपसे रुबरु हुए काफी समय हो गया है।आपकी सदैव याद आती है।



आपसे मिलने का मन बहुत हो रहा है परन्तु इस लॉकडाउन के कारण संभव नही हो पा रहा है।आपके साथ बिताये



जीवन के उन अनमोल पलो को याद करती हूँ तो आँखे भीग जाती है। आपने हमें जीवन मे कैसे हर काम को पूरी लगन


 मेहनत और सही ढंग से करना सिखाया।अपना आत्मविश्वास व आत्मबल हमेशा बनाये रखकर जीवन के पथ पर


सफलता के साथ सदैव अग्रसर होते रहे यही मंत्र बताया जो आज हमारे जीवन रूपी नैया को सुचारु रूप से चलाने में


 अत्यंत सहायक सिध्द हो रही हैं। माँ के अचानक न रहने पर आपने जो माँ एवं पिता दोनों ही किरदार बखूबी निभाये


उनकी कमी कभी भी महसूस नही होने दी। आपने जो संस्कार मुझे दिए है उनको पूरी तरह निभाते हुए आगे बढ़ती जा


रही हूँ।बडो़ का आदर ,सम्मान और छोटो को प्यार देना आपने यही सीख दी है।दुनियादारी की हर रीत आपके मार्गदर्शन


और आशिर्वाद से निभाते हुएअपने कार्यो से सबको खुश रखने का प्रयास करती हूँ। आपका सानिध्य जल्दी ही मिलेगा ऐसी आशा है। बच्चे कभी भी माता -पिता के उऋण नही हो सकते है ।।मैं सदैव आपकी छत्रछाया में रहना चाहूँगी आपकी सेवा का मौका मुझे मिले यही विनती ईश्वर से करती हूँ।घर में सबको यथायोग्य पापा ।आप सदैव स्वस्थ ,सुखी एवं प्रसन्न रहें यही प्रार्थना है।


 सदैव आपकी स्नेहाकांक्षी प्यारी बिटिया

 🙏 वन्दना अर्गल (रानी)🙏
पत्र मेरे नाम मैं आज स्वयं के नाम पत्र लिखना चाहती हूँ ।मैंने अपनी जिंदगी को अपनी ही शर्तों पर जिया इसलिए स्वयं

से प्यार भी है। मैंने लिखने का क्षेत्र चुना और लिखती रही बस लिखती रही परन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि कयों नहीं मिली समझ


 नहीं आता। ऐसा प्रतीत हुआ कि ये मेरी पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं है। मैं कहीं न कहीं विलुप्त हूं और अपने को पूरी तरह


व्यक्त नहीं कर पा रही हूं। सब कुछ अधूरा सा लगता हैऔर कभी लगता है मैं वह नहीं हूं जो रचनाआओं से प्रस्फुटित हो


रहा है।मन के संसार की थोड़ी सी झलक तो है उनमें यही सोच कर नई ऊर्जा के साथरचने लगती हूं नये बिम्ब । पूर्ण तो


हम कभी अभिव्यक्त हो नहीं सकते क्योंकि हम ईश्वर नहीं इंसान हैं यही सोच कर मन को समझा लेती हूं। शायद यही

भाव मुझे प्रेरित करता है कि और अच्छा लिखूं । मेरी प्रेरणा सिर्फ मैं हूं और इसने पग ॒पग पर नये विचारों से मुझे

अवगत कराया है। मुझे स्वयं से इतना ही कहना है कि कभी हारना मत और जब मन विचलित हो तो बस कलम उठा लो

। लिख कर प्रकट कर दो अपने जज्बात । |||

नीति अग्निहोत्री|||

| ५७ साईं विहार इन्दौर मप्र
पत्र "संस्था के अध्यक्ष को नाम"


 आदरणीया क्लब अध्यक्षा (सुनिता श्रीवास्तव) स्नेह भरा नमस्कार कुशलता के उपरांत

कुशलता की कामना करती हूँ आप इसे चिट्ठी या पत्र न समझे इसमें मेरे भावों की बगिया लहलहाती है आपने इस संस्था


का अनुठे अंदाज में गठन करके नारी के मन के भावों को प्रकट करने का एक अद्भुत मंच प्रदान किया है आपने



महिलाओं के वर्चस्व स्वीकार कर इनमें छुपी प्रतिभाओ को निखारने हेतू संस्था की स्थापना कर समाज सेवा का का कार्य


 किया है क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है आप एक सरल, सौम्य व्यक्तित्व की धनी है अनेकानेक गुणों का


समावेश आपके व्यक्तित्व में है आपको शब्दों समेटना असम्भव लगता है फिर भी लिखने को मन करता है आप एक


कर्मठ एंव आपकी नेतृत्व कला ने आपके पथ को अनुकरणीय बनाया है आपने यह सिद्ध कर दिखाया कि महिला सिर्फ


गपशप की गलियारी ही नहीं वरन् प्रबंधन के क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं आप स्नेहिल, कर्मशील कुशाग्र बुद्धि एंव सबको साथ लेकर

चलना की अद्भुत विशेषता है आपने नारी शक्ति को सार्थक किया है आपकी जादुई लेखनी एंव ओजस्वी वाणी में

अनोखा माधुर्य सा सम्मोहन है ईश्वर से प्रार्थना है आप निरंतर गतिशील रहें एंव हमारा मार्गदर्शन करती रहें आपके

उज्जवल भविष्य के लिये प्रभु से प्रार्थना करती हूँ


 आपकी अपनी मधु टाक [इन्दौर ]
शुभ संकल्प साउथ तुकोगंज इंदौर 26 मई 2020


 प्रिय बेटी खुश रहो।


तुम्हे इस घर से बिदा हुए एक महीना हो गया है ।परंतु ऐसा लगता है कि बहुत दिन बीत गए ।तुम्हें बहुत याद करती हूँ।

तुम्हारे बिना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है ।परंतु मन तो लगाना ही पड़ेगा।यह कैसी रीत है क्यों लड़की पराया धन होती

है ? क्यों उसे एक न एक दिन अपने बाबुल का घर छोड़कर ससुराल जाना पड़ता है । बेटी तुम तो मेरी बहुत समझदार

बच्ची हो ,मैं तुम्हें क्या कहूँ पर फिर भी माँ होने के नाते तुम्हें कुछ सीख देना चाहूंगी ।बेटी अब तुम जहाँ गई हो वही


तुम्हारा घर है ,परिवार है ।उसकी रक्षा करना ,उसकी देखभाल करना तुम्हारा कर्तव्य है ।ऐसा कोई कार्य न करना जिससे

तुम्हारे परिवार पर कोई भी दाग लगे ।तुम बहुत समझदार हो ,पढ़ी लिखी हो ,अच्छे संस्कारों के साथ पली बढ़ी हो ,

अच्छे से घर को संभालना जानती हो ।सारे काम करना लेकिन अपना स्वाभिमान कभी भी नहीं खोना ।गलत को गलत

समझाना बहुत जरूरी है लेकिन उसके लिए झगड़ा करना जरूरी नहीं है ।आप प्यार से भी समझा सकते हो ।एक

बार,दो बार ,चार बार शायद तुम सफल नहीं हो पर सहनशक्ति तुम्हें रखनी होगी ।धीरज तुम्हें रखना होगा ।अगर तुम

ऐसा कर पाई तो देखो तुम्हारा परिवार तुम पर नाज़ करेगा और हमें भी तुम पर अभिमान होगा । बहुत बहुत ध्यान रखना

अपने परिवार का ,अपना और कभी-कभी हमें भी याद करती रहना ।हरदम तुम्हारे साथ रहने वाली


 तुम्हारी माँ


उषा गुप्ता 
भाभी के नाम पत्र मेरी प्यारी भाभी आप कितनी अच्छी है ।



 हमको कितना प्यार करती हो और पूरे परिवार का ध्यान रखती हो ,



सभी का काम समय पर पूरा करती हो ,



बच्चों को स्कूल भेजने से लेकर दूकान पर जाना सभी कुछ करती हो ।पर चेहरे पर कभी बया नहीं करती पापा को


फेक्चर हुआ भैया आफिस के काम से बाहर गये हुए थे उस वक्त आपने दोनो की जिम्मेदारी कितने अच्छे से निभाई थी ।

मेरी प्यारी भाभी आप भाभी नही भाभी माँ हो हम बहनों का भी आप कितना ध्यान रखती हो ,छुट्टी मे आते हैं तो कुछ



नही करने देतीहो ।आपने घर को कितने अच्छे से सवारा हैं । पूरा परिवार आप से बहुत खुश है बस भगवान से यही


प्रार्थना करती हु मुझे हर जन्म आप ही




 भाभी के रूप मे मिले


आपकी चारूमित्रा नागर
आदरणीय पापाजी ,


 सादर चरण स्पर्श . आज मुझे आपकी बहुत याद आ रही है।

आपके प्रमोशन के बाद आप भिलाई रहने चले गए



।हमे हमारी पढ़ाई की वजह से मां के साथ रहना पड़ रहा है।


आप हर 15 दिनों में घर आते हैं पर मेहमान की तरह 2 दिनों के बाद चले जाते हैं।


कल मेरा जन्मदिन है और आप आ नही पाएंगे ,जानती हूं


पर आपका स्नेह और आशीर्वाद मेरे साथ है ये भी जानती हूं।


आपकी उपस्थिति मात्र से ये घर ,घर लगता था।


आपकी काम के प्रति लगन और ईमानदारी ही मेरी प्रेरणा है

,जो आजीवन मेरा मार्गदर्शन करेंगी ।

आपके दिए संस्कारों और सत्यनिष्ठा को मैं आजीवन अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखूँगी


 ये इस जन्मदिन पर आपसे वादा करती हूं। जल्दी घर आएं ,हम सब आपका इंतजार कर रहे हैं।


 आपकी बिटिया

* अचला गुप्ता इंदौर
प्रिय बेटी हिमानी , सदैव खुश रहो . पत्र आत्मीयता का संवाद होता है . जो बात रू - ब- रू हो के नहीं कह सकता हूँ . वही सच मैं पत्र के द्वारा कह रहा हूँ . तुम्हारे अतीत के साक्षी सुनहरी स्मृतियों के दस्तावेज की धरोहर तुम्हें सौंप रहा हूँ . बिटिया ! भारतीय संस्कृति में माँ को परिवार की धुरी कहा जाता है और पिता को धन कमाके परिवार को आर्थिक संबल देना , अर्थ सत्ता का नियंत्रण करना आदि काम बताया है . बेटी के प्रसंग में संस्कृत में श्लोक है - " पुत्रीती जाता महतीत चिंता , कस्यै प्रदेयती महान्वितर्क : . दत्वा सुखं प्राप्स्यति वा न वेति , कन्या पितृत्वं खलु नाम कष्टम . " अर्थात पुत्री का जन्म असीम चिंता का विषय है . किससे विवाह होगा , किस वर का चयन करना होगा . कन्या विवाहोपरांत सुख पा सकेगी या नहीं . इसके अलावा माता- पिता को बेटी की सुरक्षा की चिंता और आर्थिक कारण भी सताते हैं . सच में एक पिता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि लडकी का पिता होना कितना कष्टदायक है ? तुम्हारे प्यारे बचपन का कारवाँ मेरी नजरों के सामने गुजर रहा है . तुम्हारी पैदाइश भारत की आर्थिक राजधानी ,औद्योगिक , सामाजिक , सांस्कृतिक , साहित्यिक , आध्यात्मिक , लोक कला , बालीबुड की महानगरी गोरेगाँव , मुम्बई में हुयी थी . भरा - पूरा परिवार दादा - दादी , चाचा , बुआ की गोद में आँखें खोली . तुम भाग्यशाली हो कि तुम्हें अपनों का प्यार मिला जो रिश्तों की बुनियाद होते हैं . तुम लक्ष्मी , सरस्वती , दुर्गा का रूप धर के हमारी जीवन की बगिया को महकाने आयी . तुम्हारा हँसना , खिलखिलाना , रोना आदि बड़ा मोहक लगता था . लेकिन तुम्हारी पुराने ख्यालों वाली दादी - दादा के चेहरे पर पोती होने की खबर ने शिकन ला दी थी और तुम उन्हें बोझ लगी थी . प्रगतिशील भारत में यह कैसी उपेक्षित , बीमारू सोच है . क्या संवेदनाओं का स्तर इतना गिर गया है कि प्रसव वेदनाओं को सह कर गोद में में आयी माँ की संतान तो जिगर का टुकड़ा होती है . हाँ हिमानी ! तुम हमारा प्यार हो , जिगर का टुकड़ा हो . हिमानी नाम तुम्हारा भी ख़ास है . हिमालय की तरह बर्फीली और ईश का उपहार हो . आधी आबादी का प्रतिनिधित्वकारी सशक्त हस्ताक्षर हो . महिला शब्द का शाब्दिक अर्थ करें तो मही का अर्थ पृथ्वी को हिला देने वाली . जिन्दगी के सफर में अब संघर्षों का दौर आँधी बन आया . घर में मैं सबसे बड़ा होने के कारण श्रवण कुमार बन माता - पिता की जिम्मेदारी बहन की शादी का दायित्व था . पिताजी कपड़ा मील में समय से पहले ही सेवा निवृत होगये . क्योंकि मुम्बई की उस समय सारी कपड़ा मील बंद हो गयी थीं , लोग बेरोजगार हो गये थे . इस सदमे से पिताजी बीमार रहने लगे . उनकी सेवा , दवाइयों में पैसा बहने लगा . आर्थिक हालत गिरने लगी . वहीं ' अँधेरी ' मुम्बई में ' नेल्को कम्पनी ' में इंजीनियर के पद पर कार्यरत था . आफिस जाने का सुबह का ८ बजे का वक्त निश्चित था . रात में ८ - ९ बजे वापस आना होता था . तुम्हारी अच्छी परवरिश , स्वस्थ जीवन , चरित्र निर्माण के लिए नैतिक मूल्यों को संस्कार में लाना , सर्वांगीण विकास , तुम्हारी पढ़ाई की जिम्मेदारी तुम्हारी माँ के कंधों पर आ गयी . मुझे घर की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए नौकरी के प्रति १०० % पूर्ण रूप समर्पित रहा था . जबकि संसार में पिता ही ऐसा निस्वार्थ रिश्ता होता है जो संतान की उन्नति , भविष्य बनाता है , शिक्षक और मार्गदर्शक भी है . जीवन एक जटिल पहेली लगने लगा . तुम्हारी प्रारंभिक शिक्षा यानी कक्षा पहली के लिए एडमिशन फ़ार्म लेने के लिए रात भर जागकर स्कूल के मैदान में अगले दिन सुबह तक के लिए लाइन लगानी पड़ती थी . तब जाकर खुशकिस्मत लोगों को दाखिला फ़ार्म मिलता था . में भी भाग्यशाली था तुम्हारे लिए ' विवेक विद्यालय का फ़ार्म मिल गया . तुम्हारी विद्या का श्री गणेश हुआ . जीवन की पाठशाला की वर्णमाला का पहला अक्षर ज्ञान तुमने अपनी माँ से सिखा . तुम्हारी तर्क शक्ति , विलक्ष्ण प्रतिभा की प्रशंसा सभी करते थे . तुम अव्वल आके शिक्षा के सौपान चढ़ने लगी . हिंदी अंग्रेजी , मराठी जैसी विविध भाषा बोलना इन भाषा की किताबें की कहानियाँ , कविता तुम्हारा मित्र बन मार्गदर्शन करती थीं . तुमने माँ से ज्यादा मुझ पर अपना प्यार लुटाया . तुम्हें एलिफेंटा , जुहू ,चौपाटी पर समुद्र की लहरों पर खेलना बढ़िया लगता था . यहाँ पर तुम्हें अंग्रेजी , हिंदी के शब्द भंडार को खेल -खेल में सीखा खूब बढ़ाता था . जो मनोरजन के साथ ज्ञानार्जन था . मुम्बई मेट्रोपोलिटन होने के कारण विविध भाषा , जाति, धर्म संस्कृति लोगों के बीच दीवार न हो के पुल का काम करती है . यहाँ सब एक दूजे के त्यौहार मनाते हैं . तुम्हें सबके साथ खुशियाँ , मिठाई बाँटना अच्छा लगता था . जैसे - जैसे तुम उम्र के पायदान पर चढ़ रही थी . वैसे ही कंपनी की प्रगति , अपने प्रमोशन के लिए मुझे देश - विदेश में कई महीनों के लिए बाहर दौरों पर जाना पड़ता था . मेरी भाग -दौड़ , परेशानी को तुम्हारी माँ ने समझ हिम्मत हौंसले से मेरा साथ दिया . तुम्हारी पढ़ाई के प्रति प्रतिबद्धता , दृढ निश्चय , लगन , कड़ी मेहनत , ईमानदारी से बीडीएस में अव्वल आ के दाँतों के डाक्टर बनने का सपना साकार किया . हमारे खनदान में पहली डाक्टर बनी . हमारी खुशी का ठिकाना न था . पारिवारिक विरोध के बावजूद तुम्हारे उन्नत भविष्य के लिए एमडीएस की तैयारी करवायी और सौभाग्य से तुम पहली बार में ही प्रीलियम में सलेक्ट होगयी । मैं तुम्हें एमडी. एस ( मास्टर आफ डेंटल सर्जन ) की पढ़ाई के लिए ' कृष्ण देव राय दंत चिकित्सा महाविद्यालय , बंगलुरु ' में ले गया , जहाँ तुम्हें मेरिट में स्थान मिला .तुम्हारे साथ डीन से मिला . तीन साल के लिए वहाँ के छात्रावास में रहकर पढ़ाई के लिए सूरज की तरह तपकर एमडी . एस की डिग्री लिए दाँतों की डॉक्टर बनकर घर पर आ गयी . तुमने अपनी प्रतिभा से भारतीय समाज की बेटी बोझ है की मानसिकता को तोड़ा ."बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ "की मिसाल बनके तुम ' बीआरसी ' मुंबई में डाक्टर बन के समाज में आग्रणीय भूमिका निभा के आर्थिक रूप से सशक्त , स्वावलंबी बनी . हम भाग्यशाली हैं हमें दहेज का दानव का सामना नहीं करना पड़ा . तुम्हारे जीवनसाथी एमडीएस डॉक्टर ने हमसे खुद तुम्हारा हाथ माँगा . बेटी हमें तुम पर गर्व है कि पीड़ित , वंचितों की मसीहा बन उनकी निःशुक्ल सेवा कर रही हो । तुम दोनों भारतीय समाज की आन - बान - शान हो . ,तुम दोनों को हमारा आशीर्वाद , फलो -फूलो और सदा खुश रहो तुम्हारा पिता स्वतंत्र गुप्ता लेखिका -


- माँ मंजु गुप्ता वाशी , नवी मुंबई ।
अति प्रिय प्रभु, सादर वंदन, प्रभा का सादर नमन के साथ ,

प्रभु आपकी जय हो,🙏🏻आज मुझे बहुत प्रसन्नता है कि ,


,आप मेरा पत्र पढोगे और मुझे उत्तर के रूप में आशीर्वाद देंगे,,


 प्रभु कभी कभी मुझे लगता है कि,,आप तो कण कण में है फिर भी मेरी हर


आशा पूरी क्यों नहीं करते🙏🏻मेरी कोई अज्ञानता वश त्रुटि हुई क्या? मैं कुछ समझ नही पा रही

🙏🏻,प्रभु ने दिव्य ध्वनि से मेरे पत्र का उत्तर दिया,


,,मैं समझ गई आपकी सारी बात आप ये आधुनिक जमाने के WIFI जैसे है,


,आपने मुझे सही पास वर्ड चुनकर जुड़ने का सन्देश दिया,,, आपने येभी बताया


 ,ये पासवर्ड है " स्वानुभूति",,,स्व की अनुभूति,,आपकी यह बात भी बहुत सत्य लगी कि


,हम बच्चे हमारा दिल साफ रखें ,तो हमेशा आपके खास रहेंगे।आपने हमारी हर सुप्रभात शुभ ,


मंगलमय रहे ,मुसकान बिखेरती हुई हो ऐसा आशीर्वाद दिया,,प्रभु आपकी हर बात मुझे मान्य रहेगी,सर आंखों पर


रखूंगी,,,क्योंकि मैं सचमुच में सुख शांति चाहती हूँ।🙏🏻प्रभु आप मुझे सदैव सु पथ दिखाते रहुन,मैं उसी पर चलना चाहती
हूं🙏🏻मुझे सदा सद्बुद्धि देते रहें प्रभु आप,,बारम्बार सादर नमन आपको🙏🏻



* प्रभा जैन इंदौर🎊
विधा।

 लघुकथा शीर्षक।

 ख़ुशी ईद मुबारक हो आज़ आमीन बहुत खुश था। उसने ऐसा खिताब जीता था जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर

सकता था। उसने शबा को आवाज लगाई।शबा भी दौड़ कर आई थी। आमीन उसका हाथ पकड़ नाचने लगा था। आठ

साल की उम्र में ही दुबई में रहने वाले माता-पिता ने उसे भारत में एक होस्टल में रख दिया था ।मुझे होस्टल में और इतना


दूर क्यों रखा गया इसका ज्ञान उसे नहीं था ।तब हुआ जब वह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ गया था। दृढ़ता के साथ-साथ

आमीन ऊर रहमान ने अपना शैक्षणिक दर्जा स्वयं ही एम काम ,डीसिए, विडियो एडिटर जैसें आवश्यक प्रशिक्षण लेकर

बढ़ा लिए थे।। लाॅकडाउन के चलते आमीन ने विश्व भर में बसे अपने समाज के लोगों को महामारी के चलते जो

जागरूकता अभियान चलाया उस हेतु ह्रदय से दुआएं मिल रहीं है थी। बड़े बड़े महानुभावों के विद्वानों के भाषण इनकी

पूरी टीम विडियो के ज़रिए पहुंचाने का काम बखुबी निभा रही थी। गांवों में बसे बधिर स्वयं के साथ सबको बचाने में जुट

गये थे। स्वस्थ रहो मस्त रहो का नारा दिया जा रहा था। चार दिवारो के बीच बैठें अथक ,तटस्थ,दृढ़ आमीन को विश्व

बधिर एसोसिएशन की ओर से श्रेष्ठ सेवा सम्मान पुरस्कार प्राप्त हुआ था।जन्म सेअपनी मूक बधिरता को मात देने वाले

आमीन ने दुनिया के समस्त बधिर समाज को जंग जीतना है हारना नहीं हैं कहते ईद की मुबारक दी। आश्रु पुरित नेत्रो से

 बधिर शबा अपने पति की ओर देख रहीं थीं। आंतरिक खुशी ज़ाहिर करते हुए उसने भी ऊपर अल्लाह को याद कर हाथ उठा दिए थे।

*अमिता मराठे इन्दौर स्व रचित सत्य पर आधारित
*
💐💐एक पत्र*💐

💐 प्रिय सखी असीम स्नेह,

 *अत्र कुशलम तथास्तु*,

पहले तो में तुमसे क्षमा चाहती हूं क्योंकि मैने पत्र लिखने ने बहुत देरी कर दी है,

तुमने पूछा था कैसा लग रहा है नए शहर में ? गुवाहाटी ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा हुआ एक सुंदर शहर है,

यह नगर प्राचीन हिन्दू मंदिरों के लिए जाना जाता है,

मेरे कोर्स में असम का इतिहास है उसमें लिखा है मुगलों ने बहुत बार असम पर आक्रमण किया हर बार

उनकी हार हुई थी,यहां पर विभिन्न नस्ल,धर्म, ओर क्षेत्र के लोग रहते हैं,

 मम्मी कह रही थी गुवाहाटी का पहले नाम*प्रागज्योतीषपुर* था,
हम लोगों को यहां बहुत अच्छा लग रहा है,

*हमने यहां पर स्टेट म्यूजियम , गुवाहाटी तारामंडल *कामख्या*मंदिर* को देखा है,
*कामख्या मंदिर हमारे घर से १० किलोमीटर की दूरी पर नीलांचल पहाड़ी पर स्थित है जब हम लोग मंदिर के दर्शन के लिए जा रहे थे तो चारों तरफ बहुत सुंदर नजारा देखने को मिला

,मैने जीवन में कभी भी इतनी शांति और सुख का अनुभव नहीं किया
 जितना नीलांचल की हरी भरी वादियों में किया, मम्मी ने बताया ये मां भगवती दुर्गा की एक्यवान शक्ति पीठों में से सर्वोच्च स्थान रखता है,*यहां पर यह मान्यता है बाहर से आए भक्त गण अपने जीवन काल में इस मंदिर के तीन बार दर्शन कर ले तो वह संसारिक भव बंधन से मुक्त हो जाता है* *या*देवी*सर्व भूतेशु*मातृ रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः*🙏🙏🙏
 सखी अब पत्र को समाप्त करती हूं,पत्र पढ़कर तुमको कैसा लगा,मेरे को अपने पत्र द्वारा अवगत कराना, घर में सभी को मेरा यथा योग्य कहना,


 अनंत शुभकामनाओं के साथ तुम्हारी मित्र
                              *   पूनम शर्मा

Sunday, May 17, 2020

जिंदा रहे तो फिर से आयेंगे बाबू तुम्हारे शहरों को आबाद करने । वहीं मिलेंगे गगन चुंबी इमारतों के नीचे प्लास्टिक के तिरपाल से ढकी झुग्गियों में । चौराहों पर अपने औजारों के साथ फैक्ट्रियों से निकलते काले धुंए जैसे होटलों और ढाबों पर खाना बनाते । बर्तनो को धोते हर गली हर नुक्कड़ पर फेरियों मे रिक्शा खींचते। आटो चलाते रिक्शा चलाते पसीने में तर बतर होकर तुम्हे तुम्हारी मंजिलों तक पहुंचाते । हर कहीं फिर हम मिल जायेंगे तुम्हे पानी पिलाते गन्ना पेरते । कपड़े धोते , प्रेस करते , सेठ से किराए पर ली हुई रेहड़ी पर समोसा तलते या पानीपूरी बेचते । ईंट भट्ठों पर , तेजाब से धोते जेवरात को , पालिश करते स्टील के बर्तनों को । मुरादाबाद ब्राश के कारखानों से लेकर फिरोजाबाद की चूड़ियों तक । पंजाब के हरे भरे लहलहाते खेतों से लेकर लोहा मंडी गोबिंद गढ़ तक। चाय बगानों से लेकर जहाजरानी तक । अनाज मंडियों मे माल ढोते हर जगह होंगे हम बस सिर्फ एक मेहरबानी कर दो बाबू हम पर , इस बार हमें अपने घर पहुंचा दो । घर पर बूढी अम्मा है बाप है जवान बहिन है । सुनकर खबर महामारी की, वो बहुत परेशान हैं बाट जोह रहे हैं सब मिल कर हमारी , काका काकी ताया ताई। मत रोको हमे अब बस जाने दो विश्वास जो हमारा तुम शहर वालों से टूट चुका उसे वापिस लाने मे थोड़ा हमे समय दो । हम भी इन्सान हैं तुम्हारी तरह , वो बात अलग है हमारे तन पर पसीने की गन्ध के फटे पुराने कपडे हैं, तुमहारे जैसे चमकदार और उजले कपडे नही। बाबू चिन्ता ना करो , विश्वास अगर जमा पाए तो फिर आयेंगे लौट कर जिंदा रहे तो फिर आएँगे लौट कर । जिन्दा रहे तो फिर आएँगे लौट कर । वैसे अब जीने के उम्मीद तो कम है अगर मर भी गए तो हमें इतना तो हक दे दो । हमें अपने इलाके की ही मिट्टी मे समा जाने दो । आपने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जो कुछ भी खाने दिया उसका दिल से शुक्रिया । बना बना कर फूड पैकेट हमारी झोली में डाले उसका शुक्रिया। आप भी आखिर कब तक हमको खिलाओगे । वक्त ने अगर ला दिया आपको भी हमारे बराबर फिर हमको कैसे खिलाओगे । तो क्यों नही जाने देते हो हमें हमारे घर और गाँव । तुम्हे मुबारक हो यह चकाचौंध भरा शहर तुम्हारा । हमको तो अपनी जान से प्यारा है भोला भाला

 गाँव हमारा ।। _प्रवासी मजदूरों के दिल की आवाज शहरों मे रहने वालों को समर्पित ।_ जैसा आया वैसा साझा किया


सविता राठौर 😢 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
डर के आगे डर है। जी हां, ठीक पढ़ा आपने डर के आगे डर है

 कुछ समय पहले मेरी सहेली का फोन आया था। कहने लगी

 " ये कोरोना तो २०२२ तक चलने वाला है ।जितनी भी डरावनी संभावनाएं हो सकती थीं उसने बता दी। कैसे होगा? क्या करेंगे? मराठी के एक लेखक हैं उन्होने क ही लिखा था कि " जब आलस आता है फिर आलस ही आता है और फिर आलस ही आता है। यही हाल डर का है। जब डर लगता है तो फिर डर, फिर डर ही लगता है। अभी हमारे सामने। कोरों ना का सबसे बड़ा डर खड़ा है। हमें लग रहा है कि इससे बड़ी विपदा,समस्या, संकट कुछ हो ही नहीं सकता। हम सब लगे हुए हैं हाथ धोने में, हाथ धोने के बाद भी शंकित मन से फिर धोते हैं। हाथ धड़ा धड धु ल रहे हैं।सब्जियां धुल रही है। समान ७२-७२ घंटे धूप में रखकर पानी से खंगाला जा रहा है। बच्चों को भी हाथ धोने का विशेष महत्व समझा दिया है। बच्चों को तो वैसे ही पानी से खेलने का शगल होता है। पूरा देश अभी " हाथ धो ओ, कोरॉना भगाओ" में लगा हुआ है ।जो जरूरी भी है । लेकिन अब गरमी शुरू हो गई है। पानी की किल्लत शुरू हो जाएगी। वाट्सअप महाराज पर संदेश आने लगेंगे कि धरती पर इतने प्रतिशत ही पानी बचा है। तीसरा महायुद्ध पानी के लिए ही होगा। आदि आदि। पानी के टैंकर कि मा रामार शुरू हो जाएगी। एक डर हमारे सामने फिर खड़ा हो जाएगा। कही पानी न कम पड़े। पानी स्टोर कर कर के हम हलकान होंगे। फिर हम पानी की त्रा सदी से डरेंगे। ये एक डर मुंह बांए खड़ा हो जाएगा। घर में काम करने वाली महिलाओं को यदि हम काम पर रखेंगे तो २०२२ तक का korona हमारे दिमाग में भय पैदा करेगा । हम सशंकित हो जाएंगे। यदि हम उं महिलाओं को काम पर नहीं रखते हैं तो को हमारे भरोसे ५_१० सालों से थीं, उसका क्या होगा? और यदि हम उनको काम पर न रखकर केवल मेहनताना देते रहे तो हमारी आर्थिक स्थिति के साथ साथ हमारी शारीरिक हालत के बिगड़ने का डर हमारे ऊपर हावी रहेगा। और यदि उनको काम से निकाल दिया तो सामाजिक संवेदना और उनके प्रति उत्तरदायित्व न निभा पाने का भय हम चैन नहीं लेने देगा। कुछ समय बाद स्कूल शुरू हो जाएंगे हमारे बच्चे स्कूल में हाथ धो रहे है या नहीं, ईधर उधर हाथ तो नहीं लगा रहे ये डर सताएगा। कुछ लोग नोकरी जाने के डर से, फैक्ट्री बन्द होने के डर से,आर्थिक नुकसान के डर से भयभीत रहेंगे। विदेशो में रहने वाले हमारे बच्चो का डर।ऐसे ही जब हम किसी समारोह में बुलाया जाएगा। तो क्या हमारा हाथ समोसा या द ही बड़े कि प्लेट लेते लेते रुक जाएगा? फिर डर? मतलब कोरोणा क ही से भी चला जाय किंतु जब तक हमारे दिलो_दिमाग से, हमारे विचारों से, हमारे आपसी वार्तालाप से नहीं जाएगा तब तक हम उसके आंतक से डरते रहेंगे। इसलिए मैने कहा कि डर के आगे डर है। एक डर डर भागेंगे तो दूसरा सम्मुख खड़ा हो जाएगा। और यदि ऐसी ही मानसिकता रही तो हम खोफ के साए में ही जीना पड़ेगा। इसलिए सावधानियां पूरी रखें। और रिस्क कि उतनी ही तेयारी रखें जितनी स्कूटर, कार में एक एक स्टेपनी दी जाती है। हम कभी ये तो नहीं सोचते कि स्कूटर के दोनों टायर या कार के चारो टायर पंचर हो गए तो? इसलिए एक स्टेपनी जितना ही सोचिए।दूसरी बात दुनिया से तो कोई किसी भी ब हाने कूच कर सकता है। कोरो ना बिचारा क्या करेगा सिर्फ इ तना ही कहेगा""मुफ्त हुए बदनाम "। इसलिए धीरज रखिए। सब कुछ चंगा होगा।वैसे ही बावले पोहे के ठेले पर मिलेंगे जैसे मतवाले मदिरा की दुकान पर थे। ईश्वर हमारे साथ है, हम सब साथ है। जयहिंद।

*नियति  सप्रे 
आप सभी को परिवार दिवस की शुभकामनाएं


💐💐 स्वरचित पारिवारिक रचना एक तरफ पुराने जमाने के किस्से सुनाए जाते है, एक और पुराने नगमे सुनाए जाते है।


जल्दी ही रूठते हैं जल्दी ही मान जाते हैं । थोड़ा प्यार थोड़ी फिकर से एक दूसरे को दवा खिलाते है। एक और नफे



नुकसान की बाते चलती रहती है, ये कर लेंगे वो कर लेंगे सबके भविष्य की चिंता लगी रहती है। सबकी जरूरतों की



लिस्ट बनती रहती है। हर एक कि पूर्ति के लिए एक मशीन चलती रहती हैं। एक ओर रंग और कुची से केनवास सजाए


जाते हैं, एक और इतिहास लिख लिखकर, इतिहास बनाये जाते है, अपने अपने सपनो की महफिले सजाया करते हैं।


 एक ओर रसोई में कुछ कुछ गुनगुनाती है, वही नृत्य करती हुई पायल छन छनाती है, कलम लेकर कागज पर अरमान


अपने रचती है, एक छोटे से घर मे 'कविता' कितनी दुनियाएं बसती है...




 कविता सक्सेना शुजालपुर 15-05-2020
लोग ईश्वर को धरा पर बुलाते है।

आते है तो उन्हे.भी रूलाते.है।

दरदर नंगे पैर कैसे वन मे भटकाते.है।

पति पत्नी को भी साथ नही रहने देते है।

सुंदर उनके बालको को गरीबी मे. रखते है।

माता रही तो पिता नही पिता मिले तो मां नही।

वाह रे दुनिया, क्यो तु झूठे आंसू बहाती है।

सभी जन लक्ष्मी चाहते है, लक्ष्मी को मान देते है।

साक्षात जब जन्म लेती, अग्नि परीक्षा लेते है।

 इतना भी नही सोचा जग ने, कोख से नही वो जन्मी थी।

भूमि की.बेटी.थी, भूमि मे समाई थी।

लंकापति को ठुकराया, अशोकवाटिका मे रही।

 एक ही पेड के नीचे तो, बिना खाये पीए रही।

तब नही ऊन्हे लगा, साधारण नही सह सकता।

 चार माह बारिश मे.रही, फिर भी दीन बन भटकाया।

लक्ष्मी से धन मांगते, महिलाए, जेवर है।

और स्वयं लक्ष्मी पर बिना कारण के तेवर है।।

जब पति,विश्वास मे रखता, जालिम क्यो जमाना बनता।

परनारी की निदां करके, खूद बूरा कहलाता।

आओ आज इतना ही कर लो। सीताओ को छोड दो,किसी घर की नारियो की बुराई यहां तज दो।


श्रीमती ममतावैरागी धार
ग़जल

 *ऐ ख़ुदा हर तरफ मौत- खाना हुआ*

 *आफ़तों का कहां कब ठिकाना हुआ*

 *आज फिर जां गई एक इंसान की*

*सिलसिला-ए -कयामत पुराना हुआ*

 *वार पर वार कर ,खत्म हो जाय ना*

 *ये सहनशीलता आज़माना हुआ*


 *चांद से भेज दे इक मसीहा हमें*

 *बंद इंसान मिलना- मिलाना हुआ*

 *हो गया ये शहर आज वीरान सा*

*भीड़ देखें हुए इक ज़माना ‌ हुआ*

 *लोग पथरा गए राह तकते हुए*

 *सांवरे का जमीं पर न आना हुआ*

 *जानती है 'सुमन' भौर फिर आयगी*

*कब निशा का सदा शामियाना हुआ*

👉 सीमा शिवहरे सुमन
1

🌹यह #सच्ची_घटना_भाव_विभोर कर गयी🌹
 👇👇👇👇 डोरवेल बहुत ही #संकोच_में_बजाई गयी थी, तो मैं चौंका!! #कौन_होगा....🤔 दाई, नौकर, #ड्राइवर_धोबी_दादा, या #सब्जी_वाला!! सबकी #डोरवेल बजाने की स्टाइल अलग अलग ही होती है। वैसे भी 45 दिन से अधिक चल रहे #अज्ञातवास में न कोई दोस्त आ रहे न कोई रिश्तेदार। 🌹 गेट पर जाकर देखा तो मोहल्ले के मंदिर के पुजारी #वयोवृद्ध_पंडित_जी खड़े थे। चरण स्पर्श भी नहीं कर सकते थे, (#social_distance जो मेंटेन करना था) 🌹 सो #ससंकोच दूर से ही करबद्ध सादर प्रणाम किया। उन्होंने #आशीर्वाद देते हुये पुराने किन्तु साफ-सुथरे थैले से मंदिर का #प्रसाद निकाल कर दिया। हम दोनों मुँह में गमछा लपेटे एक दूसरे को देख रहे थे। 🌹 पंडित जी ने कहा कि #अक्षय_तृतीया भी व्यतीत हो गयी,आज मंगलवार था, पर आप नहीं आए । हमने वर्तमान परिस्थिति स्पष्ट करते हुये समझाना चाहा कि स्थिति आप देख ही रहे हैं।अब तो भगवान जब सब ठीक ठाक करेंगे तभी आना होगा। 🌹 तभी पंडित जी ने मुँह से अपना गमछा हटाया,वे धीरे-धीरे #सुबकते हुये बोले कि आप लोगों के दान और चढ़ावे से ही मेरे परिवार का #भरण_पोषण होता है.....एक महीने से सब बंद है...भूखों मरने की नौबत है। हमलोगों के लिए अन्य कोई व्यवस्था नहीं है........हमें भूख नहीं लगती है क्या?? हम भी आपके #धार्मिक_मजदूर ही तो हैं😢 🌹 हम #उद्विग्न हो उठे......अपने परिवार को कोरोना से सुरक्षित रखने की चिंताओं के बीच इनकी चिंता ही हमें नहीं रही। हमने उन्हें #शाब्दिक_सान्त्वना देते हुये...घर के अंदर आने का आग्रह किया। सूखे कपोलों में ढलके आँसू पोंछते हुये...पंडित जी ने #स्वल्पाहार लेने से मना कर दिया.. बोले👇 घर में सब #भूखे_बैठे हैं, मैं #कैसे_खा लूँ ? 🌹 हमने तत्काल मोहल्ले की #परचून के दूकानदार को फोनकर महीने भर का राशन पुजारी जी के यहांँ पहुँचाने का आग्रह किया तो पुजारी जी संतुष्ट हुये। #हजारों_आशीष देते हुये बार बार पीछे मुड़ मुड़कर हमें #कृतज्ञ_नेत्रों से देखते हुये पुजारी जी वापस जा रहे थे । 😇 #धर्म_वाहकों का भी ध्यान रखें....सड़क चलते राहगीरों से हाथ फैलाकर भिक्षा माँगने के लिए इन्हें विवश न करें। मदरसों के #मौलवियों की तरह कोई सरकार इन्हें वेतन नहीं देती। हमारे आपके #आश्रय से ही इनका परिवार भी पलता है । 🌹#जय_सनातन_धर्म🌹
👇👇कविता👇👇👇


पारंपरिक परिधानों में, कितनी सुन्दर लगती है। ये कविता नयीनवेली सी, जैसे दुल्हन लगती है। कर सोलह श्रृंगार चली, एक पिया की आस भरी। पांच पति भी प्यारे थे, रही द्रोपदी कितनी भली। आधुनिका चंचल तितली, नये नये दोस्त बनाती नित। देहमयी छलना में द्वंद लिए टूटी बिखरी निखरी निखरी छंदों का प्रतिकार किया है स्वच्छंद व्यवहार किया है जीवन की लय-ताल कहां प्रणय का व्यापार किया है यौवन आया, होश गंवाकर अपना सब अधिकार लिया वस्त्र लज्जावान अनावृत्त बिखर रही चांदनी बाहों में, सर सरोज सुधाकर सरस उर उरोज उतुंग मतंग अंग रंगढंग तरंग अनंग भंग जंग अवनि अबंर अधर अधीरा रजनी सजनी साजन संग प्रणय पंथ बुहार लिया है। पर खोयी खोयी सी है, प्रणय का व्यापार किया है तुमने कैसा प्यार किया है,

प्रणय का व्यापार किया है 🖋🖋🖋🖋


👉 कृष्ण चतुर्वेदी बूंदी, राजस्थान
सत्य की पहचान शाश्वत सत्य हां मानव का आना और जाना है काल के आगे नहीं चलता किसी का कोई बहाना है आसींद ख्वाइशों को हम पूरी करते करते सुबह शाम और दिन रात हम घटते रहते पता ही नहीं चला उम्र कैसे निकल जाता है रेत की भांति मुट्ठी से फिसल जाता है शाश्वत सत्य यहां मानव का आना और जाना है काल के आगे नहीं चलता किसी का कोई बहाना है राग देस सिरसिया अकड़ से हम भरे रहते हैं जुबा से ऊंच-नीच सत्य असत्य ना जाने हम क्या क्या कहते हैं चार दिन की जिंदगी मिली है हमें सौगात में फिर भी हम रहते अपनी दिखावे की औकात में मनुष्य और मनुष्यता को हमने कभी पहचाना है शाश्वत सत्य यहां मानव का आना और जाना है काल की आगे नहीं चलता किसी का कोई बहाना है अजर अमर जहां वही हो जाते हैं जो खुद के संग और के लिए जी जाते हैं याद करती है दुनिया उनको फिर बसाती है दुनिया उनको वरना एक दिन तो सभी को धू धू कर जल जाना है शाश्वत सत्य हां मानव का आना और जाना है कॉल के आगे नहीं चलता किसी का कोई बहाना है


👉 डॉ बीना सिंह छत्तीसगढ़ सर्वाधिक सुरक्षित

Saturday, May 16, 2020

दा रहे तो फिर से आयेंगे बाबू तुम्हारे शहरों को आबाद करने । वहीं मिलेंगे गगन चुंबी इमारतों के नीचे प्लास्टिक के तिरपाल से ढकी झुग्गियों में । चौराहों पर अपने औजारों के साथ फैक्ट्रियों से निकलते काले धुंए जैसे होटलों और ढाबों पर खाना बनाते । बर्तनो को धोते हर गली हर नुक्कड़ पर फेरियों मे रिक्शा खींचते। आटो चलाते रिक्शा चलाते पसीने में तर बतर होकर तुम्हे तुम्हारी मंजिलों तक पहुंचाते । हर कहीं फिर हम मिल जायेंगे तुम्हे पानी पिलाते गन्ना पेरते । कपड़े धोते , प्रेस करते , सेठ से किराए पर ली हुई रेहड़ी पर समोसा तलते या पानीपूरी बेचते । ईंट भट्ठों पर , तेजाब से धोते जेवरात को , पालिश करते स्टील के बर्तनों को । मुरादाबाद ब्राश के कारखानों से लेकर फिरोजाबाद की चूड़ियों तक । पंजाब के हरे भरे लहलहाते खेतों से लेकर लोहा मंडी गोबिंद गढ़ तक। चाय बगानों से लेकर जहाजरानी तक । अनाज मंडियों मे माल ढोते हर जगह होंगे हम बस सिर्फ एक मेहरबानी कर दो बाबू हम पर , इस बार हमें अपने घर पहुंचा दो । घर पर बूढी अम्मा है बाप है जवान बहिन है । सुनकर खबर महामारी की, वो बहुत परेशान हैं बाट जोह रहे हैं सब मिल कर हमारी , काका काकी ताया ताई। मत रोको हमे अब बस जाने दो विश्वास जो हमारा तुम शहर वालों से टूट चुका उसे वापिस लाने मे थोड़ा हमे समय दो । हम भी इन्सान हैं तुम्हारी तरह , वो बात अलग है हमारे तन पर पसीने की गन्ध के फटे पुराने कपडे हैं, तुमहारे जैसे चमकदार और उजले कपडे नही। बाबू चिन्ता ना करो , विश्वास अगर जमा पाए तो फिर आयेंगे लौट कर । जिंदा रहे तो फिर आएँगे लौट कर । जिन्दा रहे तो फिर आएँगे लौट कर । वैसे अब जीने के उम्मीद तो कम है अगर मर भी गए तो हमें इतना तो हक दे दो । हमें अपने इलाके की ही मिट्टी मे समा जाने दो । आपने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जो कुछ भी खाने दिया उसका दिल से शुक्रिया । बना बना कर फूड पैकेट हमारी झोली में डाले उसका शुक्रिया। आप भी आखिर कब तक हमको खिलाओगे । वक्त ने अगर ला दिया आपको भी हमारे बराबर फिर हमको कैसे खिलाओगे । तो क्यों नही जाने देते हो हमें हमारे घर और गाँव । तुम्हे मुबारक हो यह चकाचौंध भरा शहर तुम्हारा । हमको तो अपनी जान से प्यारा है भोला भाला गाँव हमारा । प्रवासी मजदूरों के दिल की आवाज शहरों मे रहने वालों को समर्पित ।


शिवकुमार  दुबे👉

Saturday, May 9, 2020

ममतामयी मूरत तेरी सीरत लिख दु,


क्यों न माँ आज तुझे ये खत लिख दु..


 तुझसे ही मायके की रौनक है लिख दु,


क्यों न माँ आज तुझे ये खत लिख दु....

 स्याही के संग छलक रहे ये अश्क लिख दु,

क्यो न माँ आज तुझे ये खत लिख दु..

 तेरी लड़खड़ाती जुबा के पूरे शब्द लिख दु,

 क्यों न माँ आज तुझे ये खत लिख दु..

.. तेरे आँचल में जो हैं सारा सुकून लिख दु, क्यों न माँ आज तुझे ये खत लिख दु...

. बच्चों के लिए तेरा त्याग समर्पण लिख दु, क्यो न माँ आज तुझे ये खत लिख दु.....

 कविता सक्सेना शुजालपुर
आप सभी गुणीजनों को सादर नमस्कार करती हूं ।

प्रस्तुत है आपके समक्ष मेरी यह रचना,

जिसका शीर्षक है- *"मां को नमन* शत-शत नमन करें हम मां को, जिसने यह संसार दिखाया, हाथ जोड़कर करें वंदना,

चलना जिसने हमें सिखाया, शत-शत नमन करें हम मां को, जिसने सुख-दुख का भान कराया, प्रथम गुरु कहलाती वह


तो, जिसने ज्ञान का अलख जगाया, शत-शत नमन करें हम मां को, अपने आंचल में जिसने छुपाया, सारी दुनिया से लड़

कर भी, खुद दुख सह कर हमें बचाया, ममता की छांव में रखा सदा ही, जीवन जीने योग्य बनाया, शत शत नमन करें हम

मां को, मुश्किल घड़ी में हमको उबारा, रखती सदा आशीष का साया, जीवन है कर्जदार हमारा, जिसका हमने न मोल

चुकाया, शत-शत नमन करें हम मां को, जिसने यह संसार दिखाया।

 स्वरचित सुश्री हेमलता शर्मा 'भोली बैन' राजेंद्र नगर, इंदौर
🌹🌹🌹माँ 🌹🌹🌹 🌹🌹


माँ तुम मुझसे दूर बहुत दूर हो ,दूसरी दुनिया में 🌹🌹

पर मुझे तो लगता हैं कि तुम मेरे आस पास ही हो।

🌹🌹माँ जब तुम मुझे छोड़कर जा रही थीं, तब मेरी ही गोद में तुम्हारा सिर था, और होंठो पर आशीर्वाद।

🌹🌹 माँ आज भी जब मुझे कुछ याद नहीं आता, या कोई बात भूल जाती ह तो सोचती हूँ रात में सुबह पूछ लुंगी माँ से। 🌹


🌹माँ तुम हर पल याद आती हो, जब में तुम्हारे जैसा खाना बनाने की कोशिश करती हूं ,या तुम्हारी कोई साड़ी पहनती हु। तो लगता है कि मैं भी तो कुछ कुछ माँ जैसी लगाने लगी हु,। 🌹

🌹गुणों में तो मैं तुम्हारी बराबरी नही कर सकती , पर शक्ल तो आईने में तुम्हारे जैसी ही लगती है।

🌹🌹अब तो कुछ लोग कहने भी लगे है, की तुम अपनी मां जैसी लगती हो। 🌹🌹

मुझे बड़ा गर्व होता है ,कि चलो गुणों में तो नहीं पर , कम से कम सूरत में तुम्हारे जैसी ही लगती हु माँ 🙏🌹🌹 🌹🌹


नीलू सक्सेना🌹🌹 🌹🌹🙏🙏🙏🙏🌹🌹
एक कहानी रोज़--25 *कवि प्रेम--कहानी* *काव्य* मंचों पर अंजना आज जाना-पहचाना नाम था। एक कवि सम्मेलन में सहभागिता करने का प्रायः एक लाख रूपये पारिश्रमिक था। पुरी दुनिया में अंजना के कविता प्रेमी लोग थे। जो उसे समय-समय पर अपने यहां प्रोग्राम में आमन्त्रित किया करते थे। विशेष भी एक मंचीय कवि था। एक आला दर्जें का ओज का रस कवि। उसके गीत और कविता सोशल मीडिया पर छाये रहते। मगर वह अंजना के समतुल्य प्रसिद्ध न था। वह देश के बाहर कभी नहीं गया। अंजना और विशेष जल्द ही शादी करने वाले थे। दोनों की पहली मुलाकात एक बड़े कवि सम्मेलन के मंच पर हुयी थी। जहां देश के जाने-माने कवि और कवित्रीयों को बुलाया गया था। विशेष भी आमंत्रित था। उसने पहली बार मंच से श्रृंगार गीत पढ़ा। इस श्रृंगार गीत ने श्रौताओं का दिल जीत लिया। अंजना भी भाव-विभोर हो गयी। दोनों की पहली मुलाकात धीरे-धीरे प्यार में तब्दील हो गयी। अंजना प्रयास करती की विशेष को अधिक से अधिक मंच मिले। ताकी वह उसके समकक्ष आ जाये, जिससे उसके स्टेटस के लोग भी विशेष को स्वीकार कर ले। विशेष को अपनी मौलिक विधा ही पंसद थी। मगर अंजना उसे श्रृंगार रस हेतु प्रेरित करती। विशेष का स्वाभिमान कभी इस बात के लिए राज़ी नहीं हुआ। इस बात पर अंजना और विशेष की नोंक-झोंक भी हो जाया करती। कई-कई दिनों तक अंजना विशेष से बात नहीं करती। मगर वह विशेष से ज्यादा समय तक दुर भी नहीं रह सकती थी। विशेष अपनी वाकचातुर्यता से अंजना को मना ही लेता। वह उसे प्रसन्न करने के लिए श्रृंगार मुक्तक पढ़ता, तो कभी रस प्रेम में डुबी कविता सुनाता। ऐसा करने में उसका ईगो कभी आड़े नहीं आया। अंजना उसके प्रिय वचनों के आगे अपना क्रोध भुल जाती। अंजना चाहती थी की विशेष गुटबाजी का हिस्सा बने। क्योंकि मंचों पर वर्तमान में यही सब चल रहा था। जिसने आपको मंच पर बुलाया है वह आपको भी बुलायेगा। यही नीति आजकल मंच प्राप्ती का अनोखा नियम बन चली थी। उसका मानना था कि मंच पर श्रौताओं को जितना अधिक कल्पना में ले जाओ वे उतना ही कवि को सिर आंखों पर बिठाते है। आजकल सच कोई नहीं सुनन चाहता। सब को झुठ में जीना पसंद है। इसलिए जितना झूठ परोस सको, मंचों पर परोस दिया जाना चाहिये। "विशू! तुम्हें अपने स्वरचित गीतों की पुस्तक प्रकाशित करवानी चाहिए।" अंजना ने विशेष से कहा। "जरूर। मगर पैसे देकर नहीं। मैं अपनी पुस्तक तब ही प्रकशनार्थ भेजूंगा जब कोई प्रकाशक मेरी पुस्तक निःशुल्क प्रकाशित करे। इसके लिए धन की मांग न करे। मैं इसके विरूध्द हूं।" विशेष बोला। "मगर यही बिजनेस है विशू। कोई प्रकाशक तब ही पुस्तक छापता है जब उसे उन पुस्तकों के बिक जाने की गारंटी हो। इसीलिए ये लोग लेखकों से एडवांस रूपये मांगते है। ताकी बुक न बिके तब भी उनका वित्तीय घाटा न हो। और फिर बुक का अच्छा प्रतिसाद मिलने पर वे लोग लेखक को राॅयल्टी भी तो देते है।" अंजना बोली। "अंजना! यदि मेरे लेखन में वो बात नहीं जिसे पढ़कर प्रकाशक या पाठक प्रसन्न न हो और वह समाज में बदलाव ला सकने में समर्थ न हो तब उस पुस्तक के प्रकाशित होने से क्या लाभ? पुस्तक वही काम की है जिसे पाठक पढ़े। उस पर चिंतन हो, वह सार्वजनिक बहस का विषय हो, लोक कल्याणकारी हो। वह ऐसी पुस्तक न हो जिसे लाइब्रेरी में सिर्फ संजा के रखा जाता है।" विशेष ने तर्क दिये। "तुम्हारी इन्हीं बातों के कारण तुम अब तक कुछ खास नहीं कर सके विशू? वर्ना तुम आज कहां से कहां पहूंच गये होते।" अंजना ने चिढ़ते हुये कहा। "अंजना! मुझे जितनी सफलता मिलनी चाहिये, मिल रही है। और मैं उससे संतुष्ट हूं।" विशेष बोला। "क्या कहा! सफल! हूअं। साल के बारह प्रोग्राम भी नहीं पढ़ पाते हो तुम! और अपने आप को सफल कहते हो? मुझे देखो। पुरे साल भर बिजी रहती हूं। महिने के तीसों दिन बुक रहते है मेरे। सेकड़ों बार विदेश में कविता पढ़कर आई हूं। और तुम कभी नेपाल तक भी नहीं जा सके।" अंजना अभिमान में बोल रही थी। "तुम सही हो अंजना! मुझे विदेश में जाकर काव्य पाठ की कोई लालसा नहीं। मैं अपने लोगों के बीच ही खुश हूं।" विशेष बोला। "एक बार फिर सोचो विशू! मैं तुम्हारी लाइफ बना सकती हूं! अगर तुम मेरे बताये रास्ते पर चलो तो?" अंजना ने कहा। "कैसे?" विशेष ने पुछा। "तुम अच्छा लिखते हो। थोड़ा बहुत पाॅलिक्टिस पर भी लिखो। और सबसे जरूरी है कि पाॅलिशियन के विषय में लिखो। अच्छा लिखो, उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर समाज के सामने प्रस्तुत करो। आजकल पाॅलिटिकल पार्टीस अच्छे लेखकों को अपना संरक्षण देती है। पार्टी के लिए श्लोगन, राजनेताओं का महिमा मंडन करते हुये लेख, उनके अनुभवों को प्रभावी भाषा शैली में लिपी बध्द करना, उनकी पर्सनल स्पीच तैयार करना, उनकी आत्मकथा लिखना, उनके सोशल मिडिया अकाॅउण्ट को मैनेज करना तथा समुचित टीका-टिप्पणी का उचित जवाब और रखरखाव करना, यह सब काम आज के लेखक ही तो संभाल रहे है। इसके बदले उन्हें पर्याप्त मानदेय मिलता है। पाॅलिटीकल सपोर्ट से हो सकता है तुम्हें फिल्मों में या टीवी में लेखन का अवसर भी मिल जाये। एक बार यदि किसी फिल्म के लिए गीत लिख दिये तब अपना उध्दार ही समझो। क्योंकि जब तुम्हारे पास पाॅलिटीकल सपोर्ट होगा तो आगे भी फिल्म मिलती रहेगी।" अंजना बोल रही थी। "क्रिकेट और खेल जगत की प्रसिद्ध हस्तियों पर उम्दा लेख को प्रिन्ट मीडीयां मुंह मांगे दाम पर प्रकाशित करने को तैयार खड़ी है। अभिनेत्रीयों के निजी जिन्दगी से जुड़े घटनाक्रम और उनके अन्य को-स्टार के साथ अंतरंग संबंध को उत्तेजित भाषा में लिखों, फिर देखो तुम कैसे रातों-रात स्टार लेखक बन जाओगे।" अंजना ने आगे कहा। विशेष अब भी चुप खड़ा अंजना को देख रहा था। उसे आभास था कि अंजना की बातें अभी खत्म नहीं हुई है। "देश भक्ति का प्रदर्शन मंच तक ही सीमित रखो विशू! उसे अपनी निजी जिन्दगी पर हावी मत होने दो। वर्ना तुम्हारी हालात भी उन भूतपूर्व कवियों की तरह हो जायेगी जिनका अब नाम लेने वाला भी कोई नहीं है। क्या तुम चाहते हो की आने वाले कुछ सालों के बाद जो थोड़े बहुत मंच तुम्हें मिल रहे है, वे भी न मिले?" अंजना ने आगे पुछा। "इसीलिए मैं जो कह रही हूं उस पर अमल करो। जिन्दगी खुशहाल हो जायेगी। क्योंकि तब तक हम दोनों किसी सेलीब्रिटी से कम नहीं होंगे? और आज के दौर में सेलीब्रिटी भगवान से कम नहीं होते।" अंजना ने कहा। "अंजना! तुम्हें पता है कि तुम क्या कह रही हो?" विशेष ने प्रश्न किया। "हां मुझे पता है।" अंजना ने जवाब दिया। "नही! तुम्हें शायद पता नहीं अंजना! तुम क्या कह रही हो। तुम मुझे समाज के धनाढ्य लोगों का गुलाम़ बनाने की सलाह दे रही हो। तुम चाहती हो की मैं जीवन भर उनकी पराधीनता में रहूं। वे कहे वैसा लिखुं। सच को झूठ और झुठ को सच बताऊं।" विशेष ने कहा। "तो इसमें गल़त क्या है? आजकल सभी यही कर रहे है।" अंजना ने कहा। ये बड़ी अजीब बात थी। अंजना को विशेष के जिन गुणों से चिढ़ थी, कभी इन्हीं गुणों से प्रभावित होकर वह उसके करीब आई थी। विशेष अब भी सबसे अलग है, यह अंजना जानती थी। तभी तो अपने परिवार के विरुद्ध जाकर उसने विशेष से मेलजोल जारी रखा था। "ठीक है अंजना! अगर तुम यही चाहती हो तो मैं तुम्हारी खुशी के लिए यह सब करने को तैयार हूं।" विशेष ने कहा। अंजना प्रसन्न हो उठी। "क्या सचमुच तुम मेरी कहे अनुसार वैसा ही करोगे।" अंजना का सिर विशेष के सीने पर था। "हां अंजना! मैं तुमसे प्रेम करता हूं और तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूं।" विशेष ने कहा। उसने अंजना के इर्द-गिर्द अपनी बाहें फैला दी। विशेष में आये इस बदलाब को देखकर अंजना गदगद थी। उसे अपनी विद्वता पर गर्व हो रहा था जिसने अपने प्रभावि वक्तव्य से विशेष जैसे प्रभाव शाली लेखक को अपने रंग में रंग लिया था। "अंजना! मैं तुम्हारी सभी बातें मान लुंगा! बस मुझे इतना बता दो, कल जब दुनियां मुझे चापलूस और बहुत बड़ा चाटुकार कहेगी तब तुम यह सह सकोगी?" विशेष ने पुछा। अंजना बोलना चाहती थी मगर उसके पास इसका कोई उपयुक्त प्रतिउत्तर न था। "तुम्हारे बताये मार्ग का अनुसरण करने से मेरा जीवन पहले से बेहतर हो जायेगा इसमें कोई श़क नहीं है। मगर यह भी विचारणीय है कि कल जब किसी ने तुम्हारे पति याने की मुझे किसी राजनेता का पालतु कुत्ता कह दिया तब क्या तुम एक कुत्ते की पत्नी की उपाधि स्वीकार कर सकोगी? अगर यह सहने के लिए तुम तैयार हो तो मैं भी तैयार हूं।" विशेष बोला। अंजना निरूत्तर थी। "तुम्हारे कहे अनुसार चलने पर यकिनन मेरे पास काम की कोई कमी नहीं होगी। धन-धान्य भी पर्याप्त होगा। नहीं होगा तो मेरा अपना स्वाभिमान। जिसे मैंने बड़े गर्व से पाल-पोस कर बड़ा किया है। और जब मेरा स्वाभिमान ही मेरे पास नहीं होगा तब मेरा ये शरीर बिना आत्मा के समान हो जायेगा। जिसमें प्राण तो होंगे किन्तु भावनाएं मर चूकी होगीं। एहसास दम तोड़ चूके होगें। हाड़-मांस के पुतले के साथ यदि तुम अपना सारा जीवन बिताने को तैयार हो तो मैं भी तैयार हुं।" विशेष के तर्कों के आगे अंजना ने अपने हथियार डाल दिये। "अंजना! हम बहुत सौभाग्यशाली है कि हम लेखक है। लेखक समाज की आंख होती है। समाज लेखक के कानों से सुनता है। किताबों में, ग्रंथों में लेखकों ने जो लिख दिया, पाठक उसे सत्य मान लेते है। पुस्तकों में वर्णित उदाहरण देकर समाज को सुधार हेतु प्रेरित किया जाता है। अखबारों को, पत्रिकाओं को आम जन इस उम्मीद से पढ़ते है कि शायद उनके योग्य कोई तो ख़बर होगी? ऐसा कोई समाचार तो अवश्य छपा होगा जिसे पढ़कर उन्हें आत्म संतुष्टि का अनुभव होगा।" "हमारे पुरातन कवि और लेखक मात्र ऐश्वर्य के बदले में लिखते तो हमें कभी रामायण और महाभारत जैसे धर्मग्रंथ नहीं मिलते। जो आज भी लाखों लोगों का मार्गदर्शन कर रहे है और आगे भी करते रहेंगे। हमारे महाकवियों ने तात्कालिक देश, काल और सामाजिक व्यवस्था का कितना सुन्दर चित्रण अपनी कृतियों में किया है। यदि वे लोग भी धन लाभ के विषय में सोचते या किसी व्यक्ति विशेष के प्रभाव में आकर संबंधित का ही महिमा मंडन करते तब इन महाग्रंथों के इतने व्यापक और विभिन्न दृष्टिकोण क्या हमें कभी देखने को मिलते।" विशेष का स्वर गंभीर था। अंजना के चेहरे पर शर्मिन्दगी के भाव उभर आये थे। "देश प्रेम और वीरता मंचों पर वाह-वाही लुटने के लिए नहीं होती। अपितु जैसा बन सके, जिस तरह हो सके साहित्य के माध्यम से देश वासियों को देश प्रेम के प्रति प्रीत जागाने की प्रेरणा देनी चाहिए। देश की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्तिथि का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करना लेखक का धर्म है। जिससे देश वासियों को प्रस्तावित चुनौतियों का सही-सही भान हो। यह सत्तारूढ़ सरकार का दायित्व निर्धारित करने में भी सहायक होगा।" "जो लेखक सिनेमा, अथवा मनोरंजन की मिर्च-मसाला दार ख़बरों को गढ़ते है, या सुप्रसिद्ध हस्तियों के विषय में कलम चलाते है, उनकी कमीयों को नज़रअंदाज करते हुये मात्र अच्छाइयां दिखाते है, मैं उनका विरोध नहीं करता। मगर उनका समर्थन भी नहीं करता। विवादित विषयों पर लेखन, जानबुझकर काॅन्ट्रोवर्सी पर लिखना, ये सभी देश और समाज के हित में नहीं है। क्योंकि इनसे अफवाहों का बाज़ार गर्म होता है। और साम्प्रदायिक शक्तियों को बल मिलता है। जो कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता। निष्पक्ष लेखन समाज के लिए, देश के लिए, हम सभी के लिए आवश्यक है क्योंकी ये सभी के लिए कल्याणकारी है।" "मुझे एक लेखक को अपना कर्तव्य स्मरण कराना पड़ रहा है इससे बड़ी दुःख की बात मेरे लिए दुसरी नहीं है। एक सत्यनिष्ठ कुशल लेखक वही है जो अपने हृदय में उठ रहे उदगारों को लिपी बद्ध करे। उसने जो यथास्थिति अनुभव की उसे बिना किसी पक्ष के साथ भेदभाव किये लिखे। धन और ऐश्वर्य अथवा किसी के प्रभाव में आये बगैर निष्पक्ष भाव का लेखन ही उत्तम है। क्योंकि लेखक का लेखन समाज की दशा और दिशा बताता है तथा अच्छे विचार और आवश्यक सुधारों की तरफ ध्यान इंगित करता है। जिससे नव निर्माण की संभावना को आवश्यक बल मिलता है। अध्ययन-अध्यापन और शोध के नये मार्ग खुलते है। वैचारिक वाद-विवाद और जनहित के मुद्दों पर जनमत संग्रह के विचार पनपते है। बेहतर भविष्य के लिए सामुहिक प्रयास आरंभ होने लगते है। रोजमर्रा की समस्याओं के उपाय खोजने और रोज़गार के नये अवसर मिलने की संभावना ढुंढी जाने लगती है। जीवन सुखमय बनता है।" विशेष बोल चुका था। अंजना अब भी निशब्द थी। "तुम अगर अब भी चाहती हो की मैं तुम्हारे बताये मार्ग पर चलूं तो मैं सहर्ष प्रस्तुत हूं।" विशेष ने अंजना के आगे अपना सिर झूका दिया। "विशू! आज मुझे गर्व हो रहा है कि मैंने तुमसे प्यार किया। तुम वाकई एक सच्चे देश भक्त लेखक हो। तुम्हारे विचारों के आगे मेरे सभी प्रस्ताव, मेरे कहे गये सभी शब्द निरर्थक है। मैं अपना प्रस्ताव स्वयं ही खारिज़ करती हूं और तुम्हारे ओजस्वी राष्ट्र प्रेम के आगे अपना शिश झुकाकर तुमसे कही अपनी सभी बातों के लिए क्षमा मांगती हूं।" अंजना ने कहा। "अब मुझे विश्वास हो गया है की जब तक इस देश में तुम जैसे लेखक है जिसे स्वयं से अधिक अपने देश और देश वासियों से प्रेम है, उस देश की एकता और अखण्डता की गौरव गाथा सदैव लिखी जाती रहेगी।" अंजना बोली। वह पुनः विशेष के हृदय से लग गयी। "एक प्रार्थना है विशू!" अंजना के स्वर साहित्यिक थे। "बोलो!" विशेष ने कहा। "मैं जब भी अपने मार्ग से भटकूं, तुम इसी तरह मेरा मार्गदर्शन करते रहना। तुम कहो तो मैं अब से मंच पर काव्य पाठ करना छोड़ दुं! मुझे आजीवन अपने हृदय के पास रखना। तुमसे दुर रहकर में जीवित नहीं रह सकूंगी।" अंजना का गला भर आया था। "नहीं अंजना! ये तुम्हारा बड़ा हृदय ही है, जिसने अपनी भुल तुरंत स्वीकार कर ली। मुझे तुम पर गर्व है। तुम्हें मंचीय काव्य पाठ छोड़ने की कोई जरूरत नहीं। मेरे जीवन में तुम्हारा स्थान महत्वपूर्ण है और सदैव रहेगा। मैं अपने हृदय मंदिर में तुम्हें देवी की भांति आजीवन पुजता रहूंगा, क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूं और हमेशा करता रहूंगा।" विशेष ने कहा। अंजना यह सुनकर बहुत खुश थी। उसकी आंखें भीग चूकी थी। जो स्वतः ही बंद हो गयी। अंजना विशेष से लिपटकर उसका आभार व्यक्त कर रही थी। विशेष अपने हृदय से लगी अंजना को दोनों हाथों से सहला रहा था। दोनों का हृदय परस्पर स्वच्छ हो चुका था। समाप्त --------------------------------- प्रमाणीकरण-- कहानी मौलिक रचना होकर अप्रकाशित तथा अप्रसारित है। कहानी प्रकाशनार्थ लेखक की सहर्ष सहमती है। ©®सर्वाधिकार सुरक्षित लेखक-- जितेन्द्र शिवहरे 177, इंदिरा एकता नगर पूर्व रिंग रोड मुसाखेड़ी इंदौर मध्यप्रदेश मोबाइल नम्बर 7746842533 8770870151 Jshivhare2015@gmail.com Myshivhare2018@gmail.com

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