मानसी ने कमरे की सफाई कर और खिड़की में रखे गमले में उगे पान की बेल को पानी डालती हुयी मुझ से पूछा , " दीदी आज तो आप उदास लग रही हो और दिन तो आप मेरे हाल - चाल व मेरे परिवार के बारे में कुशल - मंगल पूछती थी ."
दुखी हो के मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया . यूँही चुपचाप उतरा हुआ मुँह लिए गुमसुम बैठी रही .
मानसी ने मन ही मन सोचा शायद आज काम करने देर से आयी हूँ . इसी वजह से खामोश और नाराज लगती है . फिर मानसी ने अपना प्यार भरा हाथ मेरी पीठ पर थपथपाते रख उदासी का कारण पूछने लगी .
मानसी के प्यार भरे हाथों से मैं भाव विह्वल हो गयी . सिसकियाँ ले - ले के रोने लगी . उसे ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे उसकी अपनी माँ हाल - चाल पूछ रही हो . मेरे मस्तिष्क पटल पर अतीत में मनाए गए जन्मदिनों के चलचित्र एक के बाद एक चलायमान हो के मैं मानसी को बताने लगी .
" आज मैं बारह वर्ष की हो गयी हूँ . इससे पहले मेरे माता - पिता ने मेरा जन्मदिन कभी घर पर तो कभी मेरी सहेलियों के साथ होटल में मनाया था . जन्मदिन पर अपनी मनपसन्द नयी फ्राक पहनकर , सज - धज के , दोस्तों के साथ पार्सल - पार्सल का खेल खेलकर और चाकलेट केक पर मोमबत्तियां सजा कर केक को काट कर बड़े प्यार से सबको खिलाती थी और रिटर्न गिफ्ट भी देती थी . मेरे माता - पिता दोनों ही वन विभाग में नौकरी करते हैं , उन्हें दो साल के लिए ट्रेनिंग के लिए लंदन जाना पडा है . उन्होंने मेरे लिए न तो ग्रीटिंग कार्ड भेजा और न ही कोई उपहार . न ही मेरी सहलियों ने और मेरी रूमेट ने मुझे शुभकामना दी है . लगता है मेरी सहेलियों की कोई चाल हो . मन में कड़वड़ाहट लिए तनावयुक्त हो कर अपने भावों में बह रही थी . "
तभी मानसी ने मेरे को गले लगाकर प्यार कर ढेर सारी शुभकानाएं दे के खूब खुश रहने का और फलो - फूलो का आशीर्वाद दिया और जन्मदिन का उपहार देने का वादा कर होस्टल के दूसरे कमरों की सफाई करने में जुट गयी . यह अपनत्व भारी आशीषें जैसे मुझ में नयी ऊर्जा , नयी शक्ति भर रही थी और मंगलमाय भविष्य की कामना भी . जो माता - पिता के यादों का घना अँधेरे को दूर कर रहा था .
रात घिर आयी थी . जम्हाइयाँ ले मैं सो गयी . मेज पर रखी घड़ी की सुइयां बारह पर आयी तो रोज की तरह अलार्म बज उठा . जो उसने पढ़ाई करने के लिए लगाया था . तभी दरवाजे की घंटी बजी . अलसायी हुई आँखों से उठी .ी अलार्म बंद करते हुए दरवाजे को खोला तो उसकी आँखें नींद से जाग गयी . आश्चर्य से मेरा मुँह खुले का खुला रह गया . खुशी से उन सब सहेलियों को देखने लगी जिनके हाथों में जन्मदिन का केक , बुके , गुलाब के फूल , बहुत सारे उपहार और शुभकामनाओं के कार्ड थे . जिस पर लिखा था -
जीओ हजारों साल ,
जन्मदिन बने मिसाल ,
हमें कभी न भुलाना ,
दोस्ती है बेमिसाल .
सभी सहलियाँ मुस्कुराती हुई गाने लगी -
जन्मदिन मुबारक है ,
आई शुभ घड़ी है .
तभी परिवेश में एक मीठा स्वर और सुनाई दिया -
मंजु के लिए हेप्पीबर्थ डे का पार्सल लन्दन से उसके माँ - पिता ने भेजा है .
हास्टल की वार्डन ने पार्सल मेरे को थमा दिया . साथ में मैंअपनी तरफ से जन्मदिन की पार्टी के साथ चाकलेट आदि दी .
यह सब देख के मेरी खुशी से झूम उठी . सहेलियों के प्रति , माँ - पिता , वार्डन के प्रति प्यार उमड़ आया . सब गले मिले. खुशी के आंसू उसके गालों पर लुढ़क गए तभी मैंने वार्डन और सहेलियों का आभार व्यक्त किया . तभी जन्म दिन मुबारक है कि ध्वनि से स्टीरियो पर गीत बज उठा . मैंने ऐसा महसूस किया कि जश्न में नयी सुबह शामिल हो गयी हो .
कुछ समय मैं अपने आप को अकेला , पराया महसूस कर रही थी . आज का शुभ दिन सबने मिलके बेमिसाल जन्मदिन बना दिया . हास्टिल की सीमाएं होती हैं . जहां खुला खर्च भी नहीं कर सकते हैं . अनुशासन होता है और अपनापन - प्यार भी . जो टूटे हुए दिल को जोड़ रहा था .
डा मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुम्बई

No comments:
Post a Comment