Saturday, February 29, 2020

हे राम !
    क्यों भाई ? बड़ी विचित्र बात है न कि आश्चर्य हुआ तो हे राम , दुःख विपत्ति से उबरना हो तो हे राम ,यही नहीं ...सहानुभूति प्रगट करना है तो राम राम ...अभिवादन करना है तो राम राम , अंतिम यात्रा में राम नाम ...., यानि जीवन के विविध प्रसंगों में राम समाहित है । हिन्दू धर्म में 33 कोटि क्षमा करें कोटि का अर्थ करोड़ नहीं है , कोटि यानि प्रकार ..खैर आगे बढे ...इतने देवी , देवताओं के होते राम ही हमारे जीवन में इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं ?
 मुझे याद है जब छठवीं कक्षा में संस्कृत पढ़ना शुरू किये थे तो व्याकरण पढ़ते समय कक्षा में राम की कारक रचना लिखवाये थे , जो बिल्कुल भी रोचक नहीं थी, यही नहीं  पानी पी पी कर रटने पर भी याद नहीं हुआ था तब छोटे काका जी ने एक श्लोक लिखवाया था हिदायत थी कि रविवार छुट्टी है याद करके शाम की पारिवारिक गोष्ठी में सुनाना है जिसे सबसे पहले याद हो जायेगा उसे इकन्नी ईनाम में मिलेगी ...धुर बचपन में ये उपरी आमदनी निहायत कम तो  नहीं थी ...आनन्द , आशुतोष और मैं ..लग पड़े राम के पीछे ....चलिये उस प्रलोभनकारी श्लोक  को बता ही देती हूं .....
  " रामो राजमणि: सदा विजयते , रामम् रमेशं भजे ,
    रामेणाभि हता निशाचर चमू , रामाय तस्मै नमः ।
    रामान नास्ति परायणम् परतरम् , रामस्य दासोसम्यह्म ,
    रामे चित्तलयः सदा भवतु मे , हे राम ! मामुद्धर...। "
           सम्भव है आज कोई शब्द गलत लिख गई होऊं ...मुख्य बात यह कि इकन्नी तो तब मिल गई थी राम शब्द की पुनरावृत्ति का रहस्य काका जी ने समझाया था कि इस श्लोक में राम की प्रथमा से सम्बोधन तक यानि आठों कारक विभक्तियों का प्रयोग है । आज समझ में आया कि शिक्षा प्राप्त करने के लिये भी राम नाम की शरण में जाना पड़ता है । वाकई इस श्लोक को समझने के बाद अन्य शब्दों की कारक रचना याद करने में बड़ी आसानी हुई ।
      बड़ी बुआ सोने से पहले  कॉपी में राम , राम लिखती थी , कार्तिक महीने में हम लड़कियों को सूर्योदय से पहले नहा कर तुलसी पत्ते पर चंदन या गोरोचन से राम लिखकर शालिग्राम में चढ़ाना पड़ता था अब सोचकर हंसी आती है छोटी दादी की धमकी ..." राम लिखा तुलसीपत्र नहीं चढ़ाने पर अच्छा वर नहीं मिलेगा , बूढे वर से गठबन्धन हो जायेगा । "
    छोटी थी तो सोचती थी ये कैसे  राम भगवान हैं भाई हर जगह हाज़िर हो जाते हैं , इनको कोई काम धाम नहीं है क्या ? बाक़ी भगवान लोग तो तीज त्यौहार में ही पूजे जाते हैं , काम पड़ने पर उन्हें याद करके हाथ जोड़ लिए छुट्टी पटी ...हे राम ! कैसे भगवान हैं आप? मित्रों ! आज भी मेरा प्रश्न अनुत्तरित ही है । ऐसा करते हैं हम सब मिलकर उत्तर खोजते हैं डरिये नहीं ...एक ही दिन में उत्तर न भी मिले तो कोई बात नहीं , प्रतिदिन प्रयास करेंगे , किसी को तो सटीक उत्तर सूझेगा , लाभ तो सबको मिलेगा ..।
चलिये मिलकर सोचते हैं ...
सरला शर्मा

वीरांगना

पहनती थी चूड़ियां।
पर काल का रुप थी।
वीरांगना भारत की।
नारी शक्ति गजब थी।

बनो फिर से चंडिका।
 मिथ्या भ्रम तोड़ कर।
आओ रण में फिर से।
कोमलता छोड़कर।

 पिशाच बने पुरुष।
रक्षा अब कौन करे।
नर बने निशाचर।
देश बदनाम करे।

भेड़िया कहे इनको।
राक्षस से क्रूर बने।
नवयुवक देश के।
रक्षक नही भक्षी बने।

धिक्कार धिक्कार आज।
भारत माता कहती।
ऐसे कपूतो को कैसे??
जननी नही सहती।

🙏  माया ( नारायणी   )
२९---२--२०२०
वीरांगना

पहनती थी चूड़ियां।
पर काल का रुप थी।
वीरांगना भारत की।
नारी शक्ति गजब थी।

बनो फिर से चंडिका।
 मिथ्या भ्रम तोड़ कर।
आओ रण में फिर से।
कोमलता छोड़कर।

 पिशाच बने पुरुष।
रक्षा अब कौन करे।
नर बने निशाचर।
देश बदनाम करे।

भेड़िया कहे इनको।
राक्षस से क्रूर बने।
नवयुवक देश के।
रक्षक नही भक्षी बने।

धिक्कार धिक्कार आज।
भारत माता कहती।
ऐसे कपूतो को कैसे??
जननी नही सहती।

🙏  माया ( नारायणी   )
२९---२--२०२०
जीना इसी का नाम है।        
   
        ।जीवन बहुल अनमोल है,उसे दिल से जिए सुख दुःख का सिलसिला तो सबके साथ चलता है,

 हर दुःख के बाद सुख अंधकार के बाद उजाला, अंधकार के बाद उजाला, निराशा के बाद आशा यही तो संदेश 

देती है कि जीवन एक सा नही चलता अपनी जिन्दगी को अच्छी सोच से,अच्छे कर्मों से आत्म विश्वास से,

अच्छे व्यवहार से,हर पल मुस्कुराकर,हिम्मत साहससे,धैर्य शांति से एक दूसरे से प्रेरणा लेकर प्रशंससे,अपने पवित्र 

रिश्तो को बखूबी निभातेहुए, सुख दुःख में सहभागी बन कर प्यार सम्मान से, बहुत खूबसूरत बनाया जा सकता है 

हर परिस्थिति में खुश होकर जीवन को सुंदर बनाया जा सकता है,खुद जिए और दूसरों के लिए भी जिए,जीना 

इसी का नाम है।           


                             स्व रचित नवनीत
नारी की शक्ति है महान करो  जग नारी का सम्मान
दुर्गा बन कर करती हैं   इन दुष्टों का संहार
जिसनें समझा उसनें ही  सर झुकाया हैं
अपनी रक्षा के लिए वो चन्डी भी बन जाती हैं
माँ  की ममता  सब पर लुटाती
भोली  भाली है ये है
नारी जग की शान  वो हैं घर की आन

*चरुमित्रा  नगर 



*
स्वयंसिद्धा*

वामांगी पुरुष की हूँ
सुनो ! सहगामिनी हूँ मैं 
हूँ इक पाया गृहस्थी का
नही अनुगामिनी हूँ मैं

सृष्टि हूँ जगत की मैं 
मैं भगिनी और तनया हूँ 
फलक के चाँद तारों-सी
सजीली यामिनी हूँ मैं

श्रद्धा हूँ नहीं केवल
स्वयंसिद्धा प्रमाणित है
पुरुष की कल्पना कविता में
बस एक कामिनी हूँ मैं

कभी नारायणी हूँ तो,
कभी मैं शिव की हूँ शक्ति 
मै चंडी बन के हर लेती हूँ
हर दुख शामिनी हूँ मैं 

नहीं अब द्रोपदी, सीता
नही अबला कोई समझे
न हो अब मान पर कोई चोट
रिपुदल दामिनी हूँ मैं

-वंदना दुबे
 धार, मध्य प्रदेश ।
घर में स्त्री समझदार ना हो तो घर टूट कर बिखर जाता है ,
अगर घर में पुरुष समझदार ना हो तो स्त्री बिखर जाती है।।

युगों युगों से स्त्री शक्ति का सहनशक्ति का सम्मान किया गया है, और वो घर परिवार हमेशा उन्नति में रहे जहा स्त्री का सम्मान किया गया है,

स्त्री की मर्यादा पूरे परिवार को खानदान को सम्मान दिलाती है, खानदान में प्रतिभाशाली बच्चे हो वो उन्नति करे उनको योग्य सिर्फ स्त्री बनाती है।।

जब जब स्त्री को बेइज्जत किया गया तब तब विनाश हुए, रामायण से महाभारत तक के काल में पुरुषों को योग्य स्त्री ने बनाया, और स्त्री के अपमान ने विध्वंस कराया।।

आप स्त्री का सम्मान कीजिए क्यों  कि आपकी मां एक सम्मानित महिला है।।

आपका दिन शुभ हो।।
     जय श्री कृष्णा 🙏🌹🌹🌹

*सुशील  कोठारी 

Friday, February 21, 2020

गृहस्थ जीवन की गाड़ी के दो पहिए हैं, पुरुष और स्त्री। व्यवहार में, पुरुष के अनेक रूप हैं। वह भाई है, पिता है, दादा है, पति है, बेटा है इत्यादि। व्यवहार में, स्त्री के भी अनेक रूप हैं। वह बहन है, माता है, दादी है, पत्नी है, बेटी है इत्यादि।

संसार में जब स्त्री और पुरुष दोनों रहते हैं, तो दोनों को एक दूसरे के साथ व्यवहार करना पड़ता है।

 ईश्वर ने वेदों में यह संदेश दिया है कि *स्त्रियों का सम्मान करें। उनकी सुरक्षा करें। जिस घर में स्त्रियां प्रसन्न रहती हैं, वह घर सब प्रकार से फलता फूलता है। वहां देवता निवास करते हैं। सब प्रकार का सुख मिलता है। और जिस घर में स्त्रियाँ दुखी परेशान चिंतित रहती हैं, अपमानित महसूस करती हैं, उनकी सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता, वह घर वह समाज वह देश सदा दुखी होते हैं, और आगे चलकर नष्ट हो जाते हैं।*

इसलिए यदि पुरुषों को अपने घर समाज राष्ट्र की सुरक्षा समृद्धि खुशहाली की चिंता हो, तो उन्हें स्त्रियों का सम्मान और सुरक्षा करनी चाहिए। अपने बच्चों को यह संस्कार बचपन से देवें।  माता-पिता भी बच्चों को यह बात सिखाएं कि *स्त्रियों का सम्मान करें*. और स्कूल कॉलेज गुरुकुल आदि में शिक्षक आचार्य लोग भी अपने विद्यार्थियों को यह संस्कार दें, तब तो आपका घर परिवार समाज राष्ट्र सुखी समृद्ध और उन्नत होगा अन्यथा कुछ समय के पश्चात घर समाज आदि सब कुछ दुखमय होगा तथा अंततः नष्ट हो जाएगा !

*दिव्या
🙏जय जय शिव ओंकारा🙏

नारद की वीणा बजे।
नंदी मगन हो सजे।
भोले वरराजा बने।
कैलाश में खुशी छाई।

                       भूत प्रेत नाच रहे।
                        शिव शीश गंगा बहे।
                            देवता बाराती बने।
                            शुभ घड़ी देखो आई।

ब्रम्हांड  में  हुआ नाद।
धरा व्योम में आल्हाद।
पुष्पों की बरखा हुई।
पुलकित मैना जाई।

                          डमरू की डम बाजे।
                           त्रिशूल ले शम्भु राजे।
                              मंडप में शिव गौरा।
                                देवन ने स्तुति गाई।

🙏 शिवरात्रि महापर्व की  आप सभी को हार्दिक बधाइयां।💐💐

🙏 माया  ( नारायणी)
२१__२__२०२०
ओम नमः शिवाय🙏🙏🙏
शिवजी को कहते है त्रिलोचन
तीन नेत्रों में है सत्व, रज,तम
स्वर्ग ,मृत्यु या हो पातल
सभी पर है शिवजी का राज
मन , बुद्धि,वाणी का दोष
उपासना से मिट जाते है सभी क्लेश
आपके तन पर लगी है भस्म
नश्वर देह का है ये प्रतीक
शिवजी की जटाओं में गंगा समाहित
आपके गले में सर्प विराजित
पृथ्वी से आकाश तक
अन्धकार से प्रकाश तक
बेलपत्र से पलाश तक
आदि से अनंत तक
जीवन से मृत्यु तक
देवता राक्षस के अधिपति
सृष्टि में समाए कैलाशपति
सिर पर चंदमा का वास
चहुं ओर फैला प्रकाश
सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करते
वरदानों से झोली भर देते🙏🙏🙏
*पूनम शर्मा 
"महादेव"

बेलपत्र फल फूल से
 पूजन करें आज आप

होगी कृपा महादेव की
हर लेगे सारे पाप

शिवशंकर की महिमा अंनत
महादेव शुभनाम

 बाबा भोले बनाएंगे
         बिगड़े काम

बाबा भोलेनाथ का
    करते जो जन ध्यान
तारते भव सागर से
       नीलकंठ भगवान

विनती करू बस इतनी
 जपूँ निरंतर तुमरो नाम

ध्यान करती रहू
      महादेव आठों याम

कैलाश में विचरण करते
 सृष्टि को रक्षित करते
       सबके संकट हैं हरते ।।
                         शालिनी खरे
*शिवरात्रि की शुभकामनाएं*
कुण्डली छंद

1..
भोले  गौरा  के  भए,   छायो   हर्ष  अपार
दुल्हा  शिवशंकर  बने ,  दुल्हन  गौरा  नार !
दुल्हन  गौरा  नार, संग  खुश  सखियां सारी
तपस्या  सफल  भई, बिदा  की आई  बारी !
चढ़े  हिमालय   गौर,  बैल  पे   होले  -होले
 सुंदर झांकी  सजे ,  युगल  जब बैठे भोले !!

2.
धुनी  रमाए    बैठ   शिव ,  सोचें   अंर्तध्यान
मन  डग -मग  सो हो रयो, कौन चलाए बान!
कौन  चलाए   बान,   रुद्र  ने  आंखें  खोली
युगल रूप रति- काम, फूल  से  खेलें   होली!
कहे सुमन अब  हाय,  का होगो  सुर- नर-मुनी
भस्म कर दए काम ,  पुनः  रमा  बैठे  धुनी !!

*सीमा शिवहरे सुमन*
शरद ऋतु अभी पूरी तरह से विदा नही हुई है सूरज अभी बादलों की चादर ओढ़े सो रहा है , वातावरण में हल्की ठंडक घुली हुई है ।
ओम नमः शिवाय स्वर लहरियां कानों में पड़ी , समय देखा सुबह के पांच बजे थे , पर्दा हटा कर देखा  बाहर अंधेरा था ।
करीब बीस - तीस लोगों का एक समूह हाथों में मंजीरे और ढोलक लिए गर्म कपड़ों में लिपटे एक दुसरे के सुर में सुर मिलातें ताल की थाप पर झुमतें गाते चलें जा रहें थें ।
वातावरण में एक अतुलनीय शांति रच बस गयी प्रतीत हो रही थी , लगा उस शिव और सत्य के दर्शन हो गए जिसकी तलाश में हम कहाँ कहाँ नही फिरतें ।
उस सत्य और शिव के आलोक ने मन और मस्तिष्क का भी इस सत्य से परिचय कराया कि ------ सहजता और सरलता में ईश्वर का वास है हम जितनें आडम्बरहीन होगें उस परम परमात्मा के उतने ही पास होगें , आत्मिक शांति से भरे हुयें होगें । तभी हमें सर्वत्र शिवाय के दर्शन भी हो पायेगें । 🙏🙏
मातृभाषा में संस्कृति का निवास है
मातृभाषा राष्ट्रीयता का उत्कृष्ट संयोजन है
देशप्रेम की भावना का उत्प्रेरण है
मातृभाषा आत्मा की आवाज है
मन का संचलन है
संस्कारों की संवाहक है
माँ के आंचल का पल्ल्वन है
बालक के मानसिक विकास का सोपान है
बालपन में बोला गया पहला तुतलाता श्ब्द है
वाणी का प्रथम संप्रेषण है
यह बालक के सोचने समझने का कौशल 
और सामाजिक व्यवहार का अनौपचारिक शिक्षण है |

वसुमति चतुर्वेदी 
अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी 2020
"महादेव"

बेलपत्र फल फूल से
 पूजन करें आज आप

होगी कृपा महादेव की
हर लेगे सारे पाप

शिवशंकर की महिमा अंनत
महादेव शुभनाम

 बाबा भोले बनाएंगे
         बिगड़े काम

बाबा भोलेनाथ का
    करते जो जन ध्यान
तारते भव सागर से
       नीलकंठ भगवान

विनती करू बस इतनी
 जपूँ निरंतर तुमरो नाम

ध्यान करती रहू
      महादेव आठों याम

कैलाश में विचरण करते
 सृष्टि को रक्षित करते
       सबके संकट हैं हरते ।।
                         शालिनी खरे

आज मात्रभाषा दिवस की आप सभी को शुभकामनाएँ । चूंकि हमारी  मात्रभाषा हिन्दी है तो हमारी सारी क्रियाएँ  हिन्दी में ही होती है । हम हिन्दी को ओढ़ते बिछाते हैं ,हिन्दी में कल्पना करते हैं और हिन्दी में ही स्वप्न भी देखते हैं । कुछ यही भाव लिए हुए यह रचना देखिये-


  *हिन्दी अभिव्यक्ति*

जब भी सोचा भीतर से
आवाज़ है आई हिन्दी में

चोट लगी तब दर्दीली-सी
आह भरी वो हिन्दी में

नतमस्तक हो प्रभु के सम्मुख
विनय करी थी हिन्दी में

सपनों में थी स्वर्ण-पंख
उन्मुक्त उड़ानें हिन्दी में

भावावेश में बोल कटीले
मुख से निकले हिन्दी में

मारे भय के रक्षा की
गुहार लगाई हिन्दी में

मीठी लोरी गाकर लालन
को दुहराया हिन्दी में

पिया मिलन की आस रसीली
मन इठलाया हिन्दी में

विरह-शोक संतप्त हृदय का
करुण था रूदन हिन्दी में

अंतस् से सोते फूटे थे
शुभाशीष के हिन्दी में

श्वासोच्छ्वास भी हिन्दी में
और जीते-मरते हिन्दी में

आत्मा की भाषा हिन्दी में
और आत्मा बसती हिन्दी में

*वंदना दुबे*
शिव - शक्ति मिलन

आया शिवरात्रि पर्व ,
धूम  आस्था की  सर्व ,
रखते व्रत उपवास ,
प्रभु  पूर्ण करते आस ।

आज   सजे   भोलेनाथ ,
 बन दूल्हा चले नाथ ,
चली  कैसी  बारात ,
 हर मुँह करे शिव  बात ।

धार  नागों की माल ,
पहन के  शिव मृगछाल ,
तन पर मल के   भभूत ,
चले संग  बैल  भूत ।

करे  वधु माँ चित्कार,
   देव करते  जयकार ,
 करें खुशी वाह  - वाह,
  हुआ  शिव - गोरा  ब्याह ।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई

मौसम

मेरे देश में हर तीसरे-चौथे महीनें,
मौसम का बदल जाना,
कुछ सपनें कुछ वादें,
कुछ यादें ले-देकर,
फिर से लौट आने का,
दिलासा देकर,
वापस चले जाना...
मेरे देश में हर तीसरे-चौथे महीनें,
मौसम का बदलना,
क्यों नही बदल पाता,
उदास आँगन का मौसम,
क्यों नही लौट आती रौनक,
बेजान जिस्मों में....
कुछ घिनौनी घटनाओं से,
शर्मसार आसमान झुक जाता,
घरती काँपती रह जाती,
मौसम में गुलजार कलियां,
बेमौसम मारी जाती.....
तब उस घर से सारे मौसम,
रूठकर न जाने कहाँ जाते,
कानून में बंधे हाथ,
न्यायधीशों के हाथ को रोकते,
वो नही काट पाते,
समाज में उग आए,
नागफनियों को,
इनके कटने के इंतजार में,
बहुत सी आँखें रात भर जागती,
भले ही मेरे देश में,
हर तीसरे-चौथे महीनों में,
मौसम बदलता हो,
पर अब कुछ बदनसीब,
इंतजार में है,
मौसम के बदलने का....
प्रतिभा श्रीवास्तव अंश

सृष्टि के है रचयिता शिव ,
जग के परमपिता हैं शिव।
जटा धरे है गंगा अपनी ,
तन मले भस्मचिता हैं,शिव।
नही चाहते कठिन तपस्या ,
नही चाहते धन का दान ।
बेलपत्र और जल अर्पण से
द्रवित हो जाते कृपानिधान।
पापकर्म और अनाचार से
रुष्ट होते हैं भोले शंकर।
तांडव नृत्य से कंपा दें धरती,
नेत्र तीसरा खोले शंकर।
शिवरात्रि का पर्व है पावन ,
शिवमय सा है मानो कण कण।
प्रसाद कृपा का मांगें शिव से ,
शिवमय ही हो अपना जीवन।

अचला गुप्ता
इंदौर
सृष्टि के है रचयिता शिव ,
जग के परमपिता हैं शिव।
जटा धरे है गंगा अपनी ,
तन मले भस्मचिता हैं,शिव।
नही चाहते कठिन तपस्या ,
नही चाहते धन का दान ।
बेलपत्र और जल अर्पण से
द्रवित हो जाते कृपानिधान।
पापकर्म और अनाचार से
रुष्ट होते हैं भोले शंकर।
तांडव नृत्य से कंपा दें धरती,
नेत्र तीसरा खोले शंकर।
शिवरात्रि का पर्व है पावन ,
शिवमय सा है मानो कण कण।
प्रसाद कृपा का मांगें शिव से ,
शिवमय ही हो अपना जीवन।

अचला गुप्ता
इंदौर

Friday, February 14, 2020


 कहानी story
समय
एक समय की बात है एक देश था जिसका नाम लगभग बर्थ था उस देश में एक आदमी कहता है की टाइम कितना जल्दी निकल जाता है तभी पीछे एक आदमी उसकी यह बातें सुन रहा होता है और और वह आदमी कहता है की टाइम बहुत जल्दी निकलता है तो फिर पीछे वाला आदमी कहता है टाइम तो  बड़े धीरे निकलता है तो वह आदमी बोलता है कि टाइम है जल्दी बहुत जल्दी निकलता है तुम्हारे लिए धीरे निकलता है और फिर जैसे ही वह घर पहुंचता है तो वह देखता है और इतना ज्यादा टाइम हो गया तो वह आदमी समझ जाता है कि टाइम बहुत जल्दी निकलता है और फिर वह आदमी उस आदमी के पास जाता है जो आदमी कह रहा था कि टाइम बहुत तेज निकलता है और फिर वह आदमी जो कहता है कि टाइम बहुत धीरे निकलता है वह आज भी उस आदमी से माफी मांगता है की कि मैंने ऐसा कहा की टाइम बहुत धीरे निकलता है इसके लिए मुझे माफ कर दो आदमी उसे माफ कर देता है और फिर वह आदमी कहता है अब से तुम टाइम की कद्र करना सीखो तब से वह आदमी कदर करना सीख जाता है और दोनों खुशी खुशी रहते हैं
********

मॉरल हमें समय की इज्जत करनी चाहिए
: कहानी
 राजा

एक समय कि बात है एक xiang  xinga नाम का राजा चाइना के स्तिथ shanxi मे रह्ता था उस के पास बहुत सरा ₹₹₹💸💸💴💶💷पेसा था ले किन वो बहुत दुखी रहता था सब लोग बोलते थे हमारे राजा कितने अच्छे कम करते है लिकीन कितने दुखी रह्ते है उनका उदास पन हटाने के लिए क्या करे वे शहर के लोग कुछ भी करे लिकिंन राजा फिर भी उदास रह्ते थे एक अदमी ने कहा कि हम राजा से ही पुछ लेते है कि वो इतने उदास क्यो रह्ते है राजा से पुछा तो राजा ने कहा कि मे इस लिए उदास रह्ता हूँ कि मेरा बेटा France चलागया है तो शहर के लोग किसी भी तरहा से राजा के बेटे को बुला लेते है उस के बाद जेसे ही राजा अपने बेटे से मिलते है राजा बहुत खुश हो जते है और सभी शहर वाले भी
*********


कहानी
एक दिन

  एक समय कि बात है एक Jone
 नाम का बच्चा Ukrain में रह्ता था
 वो समय का मजाक उड़ाता था उसे
 सभी लोग बोलते थे कि समय कि
 कद्र करो लिकिंन वो बच्चा किसी कि
 भी बात नही सुनता था एक दिन
 उसने देखा कि अभी तो सुबह के 8
 बज रहे थे इतनी जल्दी शाम के 5
 बज गए वे कोई असल में पाछ नही
 हुए थे वे उनकी एक चाल थी कि वो बच्चा समय कि कद्र करना सिखे उनकी चाल चलती गाई फिर जब असल के 8 बजे और उस बच्चे के लिए 11 तब जाकर वो बच्चा समय कद्र करना सिखा।

मॉरल — इस कहानी से हमे यह सिख मिलती है कि हमे हमिशा समय कि कद्र करना चाहिये
*******((

धन्यवाद
लेखक आर्यन श्रीवास्तव
वीर  शहीदों  देश  वासी न भुला  सकेगें,

गर्व  करेगें  जब  जब  तुमको  याद  करेंगे ।


लुटा  गए तुम  प्राण  वतन  की  शान  ,

अमर  बन  दिल  पर  छाए ।

तुम्हें  सब शीश  झुकाए  ,

याद में  दीप जलाए।।


*शारदा  मिश्रा

"प्रेम "
प्रेम अलौकिक,प्रेम दिव्य है

प्रेम साधना ,प्रेम सृजन है

प्रेम आत्मा,प्रेम परमात्मा है

प्रेम सौंदर्य ,प्रेम ज्योतिर्मय है

प्रेम निर्मल ,प्रेम उन्मुक्त  है

प्रेम समर्पण,प्रेम निस्वार्थ है

प्रेम स्पंदन,प्रेम अनुभूति है

प्रेम स्मृति,प्रेम अहसास है

प्रेम स्वर,प्रेम मौन है

प्रेम आकाश,प्रेम समुंदर है

प्रेम मिलन ,प्रेम विरह है

प्रेम संयोग ,प्रेम वियोग है

प्रेम अनंत,प्रेम अद्वैत है

प्रेम चिंतन ,प्रेम मनन है

प्रेम सत्य ,प्रेम सास्वत है

प्रेम कृष्ण ,प्रेम राधा है

*पूनम  शर्मा
प्रेम सदा से है पाकीजा

ज्यों-ज्यों उतरा,त्यों -त्यों डूबा।

सारे जहाँ के गम भूलकर

थाम तू मेरा दामन फिर सो जा।

तेरी नींद में खलल पड़े ना

पाँव भी न हिलाऊँ,तुम मेरे

जन्मों के साथी कैसे तम्हे सताऊं?

सोच रहा हूँ उम्र हो चली

चला चली की बेला है

न जाने किसके खाते

रहना लिखा अकेला है

जब तक सांस तब तक आस

वक्त यहीं ठहर जाए यही

है उस रब से अरदास

रश्मि लता मिश्रा
बिलासपुर,सी,जी
सृष्टि की संरचना को

--- परिभाषित करते तुम और हम ,

जीवन - संध्या का पड़ाव ये ,

पार करें हम , संबल बन एक दूजे के ,

क्यों बांधें प्रेम को हम शब्दों के जाल में ,

होता अभिव्यक्त अनुराग यहां ,

हृदय - तल की गहराइयों से ,

शब्द होतें यहां -- मौन

*शालनी रायजादा

दिल

दिल का भी  है रिश्ता अजीब,


कभी दर्द का , कभी प्यार का,


कभी  नफरत से रूला भी  देता,


दिल को समझाते, बहलाते हैं


      कभी खुशी के ,कभी गम के


 आंसू बहाते है

*डा  रमा  चौहान 





जागो अभया सम्मान

प्यार तो बस प्यार है
प्रेमी प्रेमिका का परस्पर लगाव
इसे प्यार काटे हैं
निःशब्द रहते हुए भी
किसी की भावना को समझ लेना
क्या यह प्यार नहीं है ?
अपने पराए के भेद से परे
हर रिश्ते को सम्मान देना
क्या यह प्यार नहीं है ?
किसी वृद्ध बेसहारा को
घर में पनाह दे देना
क्या यह प्यार नहीं है ?
किसी भूखे प्यासे को
भोजन पानी से तृप्त कर देना
क्या यह प्यार नहीं है ?
निरीह मूक पशुओं की
सेवा सुश्रुषा कर देना
क्या यह प्यार नहीं है ?
सूखते हुए नन्हे पौधों को
सींच कर लहलहा देना
क्या यह प्यार नहीं है ?
प्यार तो बस प्यार ही है
जहाँ भी ढूंढो,,,,मिल जाएगा

सरला मेहता
पुलवामा हमले में वीर शहीदों की शहादत के लिए श्रद्धांजलि

व्यर्थ नहोगी शहादत जिनने जान गंवाई
कायर ने जिन की पीठ पर गोली चलाई
अमर रहेगा इतिहास में जीत का येदिन
शेरों से गीदडों की लड़ाई का ये दिन

नहीं भुला पाएंगे जोश होश का ये दिन
नहींभूलेंगे कलम की ताकतों का दिन
सारे तोडने वाले भीजब एकजुट हो गए
नहीं भूल सकते देश कीएकता का दिन

गर्व से सीना जिनने  ऊंचा कर दिया
हवा कीराह से हवा का रुखबदल दिया
देश की खातिरजो बांध कर चले कफन
उनकेजोश वीरता को हम करते हैंनमन

भेड़ियों की म्यांद में जब शेर घिर गया
डर गई मां भारती  मेरा लाल छिन गया
देख समर्पण दुश्मन भी झुक गया गया
लाल वर्धमान, तिलक भाल लगा गया
                   मीनाअवनि
प्रेम
                     *मेघना रॉय
स्वतः जनित हृदय ,संवाद है प्रेम---
स्फूर्ति की निश्छल ,अविरल धार है प्रेम
जहाँ गिरा हो जाती है सनयन,
नयन करते नीरव भाषण।
नहीं मांगता जो प्रतिदान,
देना चाहता जो बलिदान।
प्रेम मे कहाँ प्रदर्शन,
भाता जिसे सिर्फ समर्पण।
नि:स्वार्थता की पराकाष्ठा है प्रेम।
प्रकृति के हर कण मे है प्रेम, भास्कर की मौन भाषा, पुलकित हो,
कुमुदिनी से कुछ कहती--
तो शशि की नीरव धवल चाँदनी, है रजनीगंधा को भाँति।
अंतस की ज्योतिर्मय राह है प्रेम,
सतत निर्झर प्रवाह है प्रेम।
यह उन्मुक्त होता है, स्वछंद नहीं--
स्वतंत्र होता है, उत्श्रृंखल नही---
साध्य नहीं, साधना है प्रेम--
अमूर्त इच्छाओं की अभिव्यक्ति है प्रेम,
सम्पूर्ण समग्रता से ऊपर उठकर,
व्यक्ति से समष्टि बन,
निखर,मुखर,हो बिखर, सँवर जाता है ये प्रेम।।
तिनका तिनका नीड़ बनाया,
बड़े प्यार से उसे सजाया।
जीवनपथ पर साथ चले हम,
एक दूजे की बन कर छाया।
फूल खिले राहों में अपनी,
खुशबू से आंगन महकाया।
अपना जीवन जीने को ,वो
जुदा हुए जब,मन भर आया।
पर मुस्कान तुम्हारी और दृढ़ता
मेरी का है जब साथ।
उम्र की क्यों परवाह करें हम,
हाथ तुम्हारे मेरा हाथ।
नींद तुम्हे आएगी जब ,मेरी
गोदी में सर रख लेना।
जब मैं थक जाऊं ,तुम मुझको,
कांधे का सहारा देना।


अचला गुप्ता
इंदौर
आम बौर से लदे तो मन प्रफ्फुलित हो गया खूब आम खायेगे बांटेगे अमिया  बनाएंगे फिर आंधी तूफान आये बौर

झड़ गए इस प्राकृतिक घटना पर उदास भी नही हो सकते। चुनाव आते ही ऐसे ही वादों की बहार आती है।

जनता मतदान कर आती है फिर दौर शुरू होता है बहानो, विदेशी दौरों, धन की। कमी,पिछली सरकारों को कोसने

का बौर के झड़ने  की तरह ।मोहभंग होता,और सारे अरमान आंसूओ में बह जाते


उम्र के एक पड़ाव पर वेलेंटाइन पर कुछ दिया तो नहीं पर मैं बहुत थक के सो  जाऊं और ये खुद खाना गर्म कर

खालें बर्तन समेट के पीछे रख दे आधी रात को नीँद खुली देखा टेबल पे एक नोट था आज तो वेलेंटाइन दिवस है

सुख से दुखी  थी

*शांता पारीख
गुम हो जाऊं उस पल में

       तेरे प्रेम के बंधन में

       हर उस दुख को भूलकर

       गोद मे तेरी सिर रखकर



     
ना कोई आरजू

ना कोई तमन्ना


         बस प्यार की छांव हो

         न तीख़ी धूप की राह हो

         मरते दम तक टूटे न ये बंधन

         तुझ संग प्रीत जनम-जन



ना कोई आरजू

ना कोई तमन्ना

सिर्फ और सिर्फ

एक दूजे का साथ हो

*श्रुति,इंदौर 
पुलवामा के शहीदों   की पहली वर्षी पर  मेरे संग देश का नमन

 जयहिंद के  निशान

देश के गद्दारों की खाट खड़ी कर डालो
पनाहगारों के भेड़ियों को मार डालो
प्रेम  पर्व पर मसले गए चालीस गुलाब
जयचंदों ने  जख्मी किए शौर्य आफताब ।

छुट्टी से लौट घर पर  वादा कर  मिलने का
निकला फिर  सैन्य  काफ़िला देश सेवा  का
तभी मचाया जैश आतंकी दरिंदों  ने कहर
शहीदों की शहादतों से मौन गया ठहर ।

वीर शहीदों की शहादत पर रोष  फूटा
खूनी फाग देख भारत माँ का दिल टूटा
थर्राया पुलवामा का अवंतीपोरा
उड़ा गया  धड़ , बाँह था वह आतंकी छोरा ।


 अमित , अमर , अजीत,  श्याम , रमेश  का दो जवाब
वीरों के बलिदान से देश जिंदा है जनाब
देश की सुरक्षा में आठों प्रहर खड़े जवान
मौत कफ़न सिर पर बाँध देते अपनी जान ।

कयामत के ट्रकों में लिपटे तिरंगे में शव
पहुँचे अजीज अपने  शहर , गाँव   घर - द्वार जब
था वह माँ - पिता ,  पत्नी की आँखों का तारा
था बुढ़ापे की लाठी का  इकलौता सहारा ।

देखा  लाल को जब माँ ने आँसू  थमे नहीं
मिटी माँग , टूटी चूड़ी , बिखरा मंगल सूत्र वहीं
नादानों को पता नहीं दादा , माँ  क्यों रोते
 हुए  यतीम मासूम न जाने पिता क्या होते ।

शौर्य , साहस , जज्बे की कहानी  बन  गए
   देशभक्ति , राष्ट्रहित हेतु जवानी दे गए
 अमर जवान ज्योति बन जग में रहे चमक
   रण स्तम्भ बनके हर  धड़कनों में रहे महक

 व्यर्थ न जाने देगा देश उनका बलिदान
पाक की भाषा में देगा  जवाब हर जवान
तिरंगे की शान के खातिर हुए वे कुर्बान
भारत के वीरों को करे  " मंजु " नमन जहान  ।
 डॉ. मंजुगुप्ता
वाशी , नवी मुंबई
फोन 9833960213
writermanju@gmail.com
14 फरवरी 2020

पुलवामा दिवस पर एक श्रद्धांजलि

विधा- पद्य (कविता )
शीर्षक -"है नमन मेरा जवानों को "

नमन है देश के उन जाँबाजों को
कर दिया कुर्बान देश के लिए जाँ को
शहीदों की शहादत कैसे सकते भूल
हजारों बेनामों का समर्पण
बना गया दुश्मनों के दिल का शूल।।

दो हज़ार उन्नीस में पुलवामा जिले में
हुई थी एक बड़ी कायराना हरकत
14 फरवरी के दिन आतंकियों ने
कर दिया शर्मनाक अमानवीय कृत्य।।

सीआरपीएफ के वाहनों पर
अचानक किया आतंकी हमला
आईईडी ब्लास्ट करके
40 जवानों को मार डाला ।।

इस आत्मघाती हमले से
पूरा देश रह गया स्तब्ध
हर एक भारतवासी था
उस दिन दुखी और क्षुब्ध
जैश ए मोहम्मद ने ली
इस जघन्य कृत्य की जिम्मेदारी
हताश हो कुछ ना कर सका
तो पीछे से मारी हम पर कटारी।।

ये थे हमारे देश प्रेमी
कर रहे थे निस्वार्थ सेवा
पूरा वतन एकजुट हो
प्रगट कर रहा था संवेदना
आतंकवाद को हमें अब
नेस्तनाबूद करना ही होगा
घृणित कृत्य करने वालों को
जड़ से उखाड़ना ही होगा ।।

हम आतंकी और बुरी ताकतों के खिलाफ हरवक्त एकजुट हैं
जब जब ऐसा होगा तो
उन्हें तोड़ने को हम अटूट हैं
हमारा हर एक जवान
ग्यारह सौ के समतुल्य है
विश्व की निर्णायक प्रतिक्रिया
की सबको सख्त जरूरत है ।।

उन्हीं की बदौलत आज
ज़िंदा दिखाई देते हैं हम लोग
खुली फिज़ा में साँस लेते हैं
बिस्तर पर  चैन से सोते हैं हम लोग
साहस के उनको हमारे
हैं हजारों-हज़ारों सलाम
ज़िंदा रहोगे यादों में हमारी
ओ शहीदों, बेनाम और गुमनाम।।

स्वरचित
उषा गुप्ता
इंदौर
इश्क, प्रेम , मुहब्बत जो
दरिया कहलाता था
 कभी आग का..
बनकर रह गया शुरुवाती
 आकर्षक  मात्र  और
केवल किताबी -बातें..!
प्रेम के लिए सात जन्म
कम हैं, एक प्रेम दिवस
सिर्फआडम्बर मात्र.. .!
एक रिश्ता
जिसकी सरहदें
जिस्म से जिस्म तक
 घुट कर रह जाती है
अक्सर प्रेम- व्यवसाय में...!
नहीं पढ़े जाते मन...
दूर रहकर नहीं महसूस
करता अब महबूब उसकी
बैचेनियां, बेताबियां
या वो आभास जो
छूकर उसे आई हवा
में कभी लेला-मजनू
हीरा -रांझा और राधा
से दूर कृष्ण को हुआ
करता था ..;
क्या इस कलयुग में
किसी को होता है
वो दिल में असहनीय दर्द...
जो हर कभी नम कर
देता हो आंखों को..
याद करते ही होने
लगता हो आभास
उस लगाव का कि
कोई है जो अब मन
का कोना खाली करने
को तैयार ही नहीं..
जानते हुए कि वो
कभी नहीं मिल
 सकता उसे ..
शायद यही प्रेम है‌?
जोअब कहीं नज़र नहीं
आता...!!


*सीमा शिवहरे सुमन*

कविता
*अकेले*
-------'
*साथ छोड़ चुका जग अपना।*
*तन्हा हैं, हम इस जग में।*
*जीवन जिसके नाम गवाया,।*
*वह खोए हैं,अपने रंग में।*
*मासूमो को किलकारी को*
*बाहों के झूले में झुलाया*।
 *वह खो गये अपनी दुनियॉ में*
*हमारी सिसकिया खो गई।*
*अब उनके ठहाको में।*
*हम तुम ही बस साथ रहे।*
*बनके सहारा एक दूजे का।*
*आपस मे विश्वास रखें।*
*हम भीड़ में खो ना जाए*
 *हाथ थामले एक दूजे का।*
*चलो हम-तुम अब साथ जी ले।*
*करवट बदलती जिंदगी में।*
*इस अकेले पन के हमराज बने।*
*चलो हम-तुम अब साथ रहे।*
*दर्द बाटले एक दूजे का।*
*थोड़ा तुम सो लो।*
*थोड़ा में सो लू।*
*ढ़लती शामों के हमराह बने।*

*वन्दना पुणतांबेकर*🌹🌹

Thursday, February 13, 2020

श्
भारत भविष्य का ताज
््््््््््््््््््््््

श्रेष्ठ भारत भारत भविष्य का ताज पहनाया था मिलकर,
सोचा था देश प्रगति करेगा,भारत की जमीं पर भेदभाव नहीं होगा।
अमन चैन की छांव तले बैठेथे हम  सब
अच्छे दिनों की सौगात, सबका साथ सबका विकास होगा।

यहां कभी सोचा नहीं था, उनके वादे इरादे बदल जायेंगे,
यहां नहीं जानते थे कथनी-करनी में इतनी जल्दी अमल होगा।
बुद्धिजीवी और आमजन तो समझ भी नहीं सकें उनके आचरण को,
देश को झोंक दिया अराजकता में सोचा भी नहीं था चार दिवारों में हमारे कानून भी विफल होगा।

हवाओं में ज़हर है, उनकी मिठास में ज़हर घूल गया है,
रगंत भी अब पिंकी नजर आ रही है, महंगाई की मार, बेरोजगारी की मार, युवा भटक रहा है,छात्रौ पर अत्याचार हमारी भारतीयता पर अठहांस कर रहा है।
एन सी आर सी ए ए में समाज और राष्ट्र उलझकर रहें गये है।

खामौस क्यौ है,प्रश्चीन, गगन कहां गए कर्णदार , राष्ट्र निर्माता झुकने नहीं दूंगा टुटने नहीं दूंगा भारत को  बिकने नहीं दूंगा, देश के जवानों किसानों को मरने नहीं दूंग मोदी हैं तो सब मुमकिन है यही कहा था जनता से धोखा किया दिल्ली की हार ने उजागर कर दिया है।

               सृजनहार
गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू मध्य प्रदेश इन्दौर लेखक संघ आ भा साहित्य परिषद मंहू साहित्य मित्र मण्डल कोदरिया मंहू
"
१४ फरवरी बनाम प्रेम दिवस "

सभी  अपनों के संग जगवासियों को प्रेम दिवस की शुभ कामनाएँ

क्लोडियस राजा  ने किया प्रेम का विरोध


 प्रेमियों के विवाह पर लगाई रोक 

युवा प्रेमी के दिलों को लगी चोट

वेलेंटाइन को राजा पर आया आक्रोश 


कराई शादी सभी प्रेमी युगलों की

राजा ने  दिया मृत्यु दंड वेलेंटाइन को

प्रेमियों  ने आदर्श माना शहादत को

' वेलेंटाइन डे ' के नाम से जग ने जाना

मंजु को भाती नहीं कभी भी तन्हाई

हर दिल की धड़कन बन बजाती शहनाई ।


  डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई


🙏🏻स्त्री का संघर्ष 🙏🏻

मैंने हर मुश्किल परिस्थितियों में खुद को‌ अकेले संभाला है , । 
हर चाहत को अपने सिने में दफनाया है‌।

कोई साथ हो ना हो‌, फिर भी कदम बढ़ाया है ।‌
मै‌ टूट  टूट कर जुड़ती रही , अपने हौसलो से आगे बढ़ती रही ।‌

मेरा ईश्वर मेरी परिक्षा ले रहा हे, सोचकर करती रही ।‌
हर काम आंसा कर दिया, हर मुश्किल को मैंने रोक दिया,।
सबकी ख़ुशी के आगे खुद के वजूद को झौंक दिया ।

फिर‌ आज मेरी बात को‌ क्यो‌ , अधूरा छोड़ दिया,
जब मैं सबके खातिर‌ अकेली चली , आज मुझे अकेला छोड़ दिया ।
मैं टूट गई उस खंजर से ,जो पीठ पर मैंने खाए हैं।

इन अपनों की खातीर मैंने तीस साल गंवाए हैं ,??
वो दुर्योधन,वो दुश्शाशन , उनकी खुद की लाज नहीं ,।

पर द्रोपदी के साथ ,पांडव भी तो आज‌ नही ।
हे विश्व तु बस देख ले‌,जो‌ शर्म सार हो रहा,।

मेरी दशा पर‌ आज खुश सारा परिवार हो रहा ।
हे कृष्ण जब  तुम सुनोगे द्रोपदी की बात को ।

सब देखलेगे‌ दृष्य़ भी वो जो लूट ना पाई लाज को ।‌

बिंदू मेहता 
:
उषा के आनेपर, खिलता है कमल

पर ये क्या हुआ,यहाँ तो खिल गया गुलाब

वो भी एक नही अनेक,नानवर्णी नानरूपी,

हर आकार प्रकार का,

दुरंगी तिरंगी भी,

कितना प्यारा संसार तुमने बसाया है

जिसमे शरीक होने हमको

[बुलाया है,

तुम रोज होते हो प्रफ्फुलित,

पर हाथ साणे होते होंगे माटी में


हमे बुलाकर किया आनंदि

पर हमारे हाथ माटी में नही,
मक्ख़न मलाई में सने है

नथुने फड़क रहे है अन्न  की सुगन्ध से

और मन तरंगित है तुम्हारी मनुहार से

सदा रहो विजयी  फूल में भी कांटो में भी

हम देंगे दुआ इस प्रकृति के आंचल में

मित्र समागम,फूलों की गमक,

इस प्यार को आदाब, इस प्यार को आदाब।

श्रीमती शांता  पारीख
*
हिन्दी वर्णमाला का अक्षरक्रम से  संदेशपरक कवितामय का सुदंर प्रयोग।*

*अ* चानक,
*आ* कर मुझसे,
*इ* ठलाता हुआ पंछी बोला।

*ई* श्वर ने मानव को तो-
*उ* त्तम ज्ञान-दान से तौला।

*ऊ* पर हो तुम सब जीवों में-
*ऋ* ष्य तुल्य अनमोल,
*ए* क अकेली जात अनोखी।

*ऐ* सी क्या मजबूरी तुमको-
*ओ* ट रहे होंठों की शोख़ी!

*औ* र सताकर कमज़ोरों को,
*अं* ग तुम्हारा खिल जाता है;
*अ:* तुम्हें क्या मिल जाता है?


*क* हा मैंने- कि कहो,
*ख* ग आज सम्पूर्ण,
*ग* र्व से कि- हर अभाव में भी,
*घ* र तुम्हारा बड़े मजे से,
*च* ल रहा है।

*छो* टी सी- टहनी के सिरे की
*ज* गह में, बिना किसी
*झ* गड़े के, ना ही किसी-
*ट* कराव के पूरा कुनबा पल रहा है।

*ठौ* र यहीं है उसमें,
*डा* ली-डाली, पत्ते-पत्ते;
*ढ* लता सूरज-
*त* रावट देता है।

*थ* कावट सारी, पूरे
*दि* वस की-तारों की लड़ियों से
*ध* न-धान्य की लिखावट लेता है।

*ना* दान-नियति से अनजान अरे,
*प्र* गतिशील मानव,
*फ़* रेब के पुतलो,
*ब* न बैठे हो समर्थ।
*भ* ला याद कहाँ तुम्हे,
*म* नुष्यता का अर्थ?

*य* ह जो थी, प्रभु की,
*र* चना अनुपम.......

*ला* लच-लोभ के
*व* शिभूत होकर,
*श* र्म-धर्म सब तजकर।
*ष* ड्यंत्रों के खेतों में,
*स* दा पाप-बीजों को बोकर।

*हो* कर स्वयं से दूर-
*क्ष* णभंगुर सुख में अटक चुके हो।
*त्रा* स को आमंत्रित करते-
*ज्ञा* न-पथ से भटक चुके हो।
जनार्दन  शर्मा
शीर्षक    हूआं नीड़ सूना ।
विधा   कविता ।

लुट गया मधुवन .
हुआं वो नीड़ सूना ।
अब ना माली के ,
हर्दय का घाव छूना ।
मधुप कलियों को ,
चले जाकर रुलाकर ,
उड़ ग ई कोकिला
अधूरा गीत गाकर ,
जब ना होगा नीर ,
सरिता क्या बहेगीं
मीन जल से बिछुड़कर ,
कैसे रहेगीं ।
लहरियां तट को ,
जाती झुलाकर ,
उड़ गयीँ कोकिला ,
अधूरा गीत गाकर ।
कोन तुम अंजान ,
बन मेहमान आयें ,
स्वपन मे दो गीत ,
जीवन के सुनायें  ।
चल दिये क्यों नींद ,
मेरी अब चुराकर ,
उड़ गयी कोकिला ,
अधूरा गीत गाकर  ।
लुट गया उपवन  ,
हुआं वो नीड़ सूना ।
अब ना माली के ,
हर्दय का घाव छूना  ।

  मनोरमा जोशी ।🙏🏻
फ्रिज 

घर्र , घर्रर, घर्रर तेज़ आवाज़ काम मे ख़लल डालने के लिए काफी है आज तो साफ करना ही है फ्रिज की डिफ्रॉस्ट ट्रे को , फ्रिज के पीछे की सफाई हमेशा छूट जाती है लेकिन वह आज शायद आज आया ।

फ्रिज के पास से गुज़रते समय लगा जैसे किसी ने कहा ---- घर्र , घर्र , रुको --- कदम थम गये ये आवाज कही फ्रिज से तो नही 

ठाना अभी , अभी ही करती हूं इसकी सफाई । 
फ्रिज को आगे खिसकाया , जितनी धूल हो सकती थी उससे ज्यादा ही थी  defrost Trey पानी और गंदगी से पूरी तरह से भरी हुई थी ।
 आधे घंटे के फ्रिज सफाई अभियान के बाद फ्रिज को start किया ।

कोई आवाज़ नही plug को tight किया लगा कही ढीला ना हो , ना कोई घर्र नही खोल कर देखा चल रहा है कि नही , चल तो रहा पर उसकी आवाज़ ----घर्रर घर्र  

नही वो आवाज़ नही थी शायद उसकी कराह थी पूरी भर चुकी गंदे पानी की defrost treyके कारण जिससे कि उसके compressor पर बेवज़ह load  पड़ रहा था ।

पता नही क्यो मुझे मशीन और इंसानी फितरत में एक समानता दिखाई दी ।

मन मे बैठी दुश्चिंताएँ , तनाव , अशांति , अफ़सोस , क्रोध 

हमारे मन - मस्तिष्क को अपने बोझ तले नही कुचल रहा , क्या हम उस बोझ से खुद को मुक्त कर

सहज  शांत , निर्मल नही हो सकते फ्रिज जैसे ?

शालनी रायजदा
*
फागुन* (गीत)

रंगीला फागुन आया है ।
रंगीला फागुन आया है ।
वधू-वसुधा भी पुलकित है ,
वो परिणय-पत्र लाया है ।


हिलोरें ले रहा है मन
उमंगें खिलखिलाई हैं ,
रंगीले पी से मिलने को
धरा ने रूप सजाया है ।


रंगीला फागुन आया है ----


ओढी है जो फूलों की
धरा ने चूनर सतरंगी ,
सजाई माँग किंशुक से
सिंदूरी रंग भराया है ।


रंगीला फागुन आया है ----

चंचल शोख़ हवाओं की
हुई कैसी शरारत ये ,
कपोलों में धरा के लाल-
गुलाबी रंग लगाया है  ।


रंगीला फागुन आया है ----


बौर आए रसालों पर
हुई चंपई फ़िज़ाएं भी ,
मधूरी तान में कोकिल ने
मंगल गीत गाया है  ।

रंगीला फागुन आया है ----


*वंदना दुबे*
मूरत है कर्तव्य ,प्रेम की,
हर संकट पर भारी है।

लेकिन खामोशी की चादर
ओढ़े बैठी नारी है।

बचपन बीता आदेशों और
पाबन्दी के साए में,
आज भी धूमिल सपनों की
यादें नयनों में खारी हैं।

न्यौछावर कर डाले अपने
सपने सारे अपनों पर,
अपमानित हो आंसू संग
रातें चुपचाप गुजारी हैं।

पाली पोसी अपनी छाया
सपनों को गूंथा उनके,
फिर भी उलाहनों के बोझ से
आँचल उसका भारी है।

नही चाहिए दौलत ,शोहरत,
थोड़ा सा सम्मान उसे दो ।
प्रेमदीप की ज्योत जलेगी,
वह पूजा की थाली है।

अचला गुप्ता
इंदौर

Monday, February 3, 2020

**  फारगती **

फारगती
पितर जी,पितर जी।
करता रे।
धूप बत्ती करीने
फारगती वे।
पितरजी, पितर जी।
करता रे।
खीर,पूड़ी करी ने
फारगती वे।
पितर जी,पितर जी।
करता रे।
ठंडो माटलो भरे मंदर।
फारगती वे।
पितर जी पितर जी।
करता रे।
छतरी दय के।
फारगती वे।
पितर जी पितर जी।
करता रे।
बामण जिमाया।
फारगती वे।
वी__
बच्चा होन बच्चा होन ।
करता रिया।
कदे वे फारगती देता तो। ???

🙏 माया (नारायणी)
शीर्षक||||   प्रेम से  ।।।।।
फिर एक ठिठुरती हुई प्रातः बेला है
पत्तों और फूलों के मन हर्षित हैं क्योंकि
उन्हें ओस के मोती उपहार में मिले हैं
जोअन्य मौसम में नहीं मिल सकते।
बड़ा अच्छा लगता है उनका कोमल स्पर्श
हांलाकि ं वे जानते हैं कि सूरज निकलेगा
और ये मोती गायब हो जाएंगे
प्रतीक्षा रहेगी रात्रि के बाद सुबह की
जिसमें उन मोतियों से बतियाने का
आनंद भरपूर मिलेगा ं क्योंकि मोती
बड़ी अच्छी और प्यारी बातें करते हैं ।
कहते हैं कि यही जीवन दर्शन है
अभी हैं तो कुछ समय बाद नहीं
क्यो ना इन क्षणों को भरपूर जी लें
और क्षणिक जीवन का आनंद लें
सान्निध्य का बातों मुलाकातों का।
बाद में तो तुम भी मुरझा जाओगे
या सूख जाओगे तब हमारी बाते
बहुत याद आएंगी तुम्हें कयोंकि 
तुम पर भी अस्थाई होने का ठप्पा
हमारी तरह ही लगा है ।
यह बात सृष्टि के नियमों केअंतर्गत है
जिनको हमें मानना ही है
बस प्रार्थना यही करते हैं कि
जितना समय हमें मिला उतना
बढिया से बढिया बीत जाए।
दुनिया के लोगों को भी संदेश यही
देते हैं कि जब तक रहें प्रेम से रहें
और हर पल भरपूर जिएं
नफरत ंवैमनस्य और बदले की भावना
में  कुछ नहीं  रखा है प्यारों ।
|||||||  नीति अग्निहोत्री
५७सांई विहार इन्दौर|| म प्र

जब मैंने राँ गेय को देखा

सनत  रेग्मी जी
लघु संस्मरण
                जब मैने रांगेय राघवको देखा था
                                           
                                               सनत रेग्मी

यह उन दिनो की बात है जब रांगेय राघव गोरख नाथ एन्ड कनफटाज योगी पर थिसिस लिख रहे थे।इसी शिलसीलेमे वे कुमाउ घढवाल होतेहुवे नेपालके पश्चिमि पहाडों के दार्चुला डोटी आए थेे  ।
आगरा लौटनेकेलिए वे नेपालगन्ज भी आएथे। नेपालगन्ज मे वह हमारे मुहल्लेकि उदासी सम्प्रदाय के कारवारी बाबा के अखाडे मे ठहरे थे ।
मै उस समय५ सालका था।
मेरे पिताजी कारवारी बाबा के अखाडे मे जाया करते थे।
एकदिन उन्हे घर आने मे देर होगयी। माँ नै कहा जावो पिताजी को बुलालाओ।
 मे साधु बाबाओं से डरता  था ।
डरते डरते मै कारवारि वावा के अखाडे मे पहुंचा।
वहाँपर गोरखनाथको लेकर चर्चा और बहस हो रहा था। रांगेय राघव साधुवों और उनके भक्तों से घिरे हुवे थे। बारम्बार गोरखनाथ कि नामोच्चारण के कारण मैने उन्हे गोरख नाथ समझ लिया।
पिताजि को घर चलनेको कहनेपर उन्होने वहाँ कहातो था कि अच्छा तो राघव साहब घर से बुलावा आगया ।
आप जैसे विद्वान से मिलना हुवा।

हम धन्य होगए। पर मेरा बालपन कुछ समझ नहिपाया।
लौटते वक्त मैने पिताजि से कहा पितजी वह गोरखनाथ तो बहुत सुन्दर है। मेरी बात सुनकर पिताजि ने कहा धत वावरा वो गोरखनाथ थोडे हैं।
 मैने कहा सबतो गोरखनाथ गोरख नाथ कहरहे थे।
 िपताजी  हँस पडे और उन्होने बताया बह भारतके अच्छे साहित्यकार हैं।
बे गोरखनाथ पर शोध कार्य  कररहेहैं। चुंकि नेपालमे नाथ पंथियों का तमाम जगह  है इसलिए घुमते घामते यहां भि आ गए।
आगरा मे रहते हैं। कल सुबह चले जाएँगे।
 उनकानाम रांगेय राघव है।
बचपनमें मैने उन्हे देखाथा इसलिए बडे होनेपर जब मै हिन्दि साहित्य   पढने लगा  तो रांगेय राघव की सभी पुस्तकें  पढ डडाली।

Sunday, February 2, 2020

नीति अग्निहोत्री 
वृद्धावस्था पर एक कविता
|||||||||| पतझर।।।।।।
पतझर ऐसा शब्द है जो मन में नकारात्मकता पैदा करता है
पतझर का स्वरूप आंखों के सामने
तैरने लगता है और सहानुभूति उपजती है
उन पेड़ों के प्रतिजो अपनी शान यानि
हरियाली धीरे धीरे  खो देंगे ।
पेड़ झेल जाते हैं यह लाचारी क्योंकि
जानते हैं यह तो क्षणिक अथवा कुछ
समय का है और नयी कोंपलें आएंगी
पुनः नया ॠंगार होगा उनका ।
यही सकारात्मक भाव पेडों को
जिन्दा रखता है ं परन्तु
उन संतानों का क्या जो मां ॒बाप
को अकेला छोड़ विदेश के लिए
प्रस्थान कर उनके जीवन को पतझर
स्थाई रूप से सौंप जाते हैं ।
उनके मन की हरियाली अपने
हाथों से सौंप जाते हैं और मां ॒बाप
निरे ठूंठ  से कैसे जीते हैं क्या
नौनिहालों ने कभी सोचा है ॽ
मां ॒बाप का कुसूर इतना ही तो था
कि उन्होंने दिन ॒रात एक कर के
बच्चों को इस लायक बनाया कि वे
शान और मान से जी सकें ।
आज जब बच्चे ऐसाअसहाय सा
छोड़ जाते हैं तो भी उन्हें कोई
गिला ॒शिकवा नहीं होता परन्तु शाम
को घर में बनाए घोंसले में
चिड़िया को अपने बच्चों से मिलते
देख कर उनके मन की कोंपलें
मुरझा जाती हैं और एक वीतरागता
मन को घेर लेती है ।
|||||| नीति अग्निहोत्री
५७सांई विहार इन्दौर म ं प्र।

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