Friday, June 19, 2020

e-बुक,लघुकथा दिवस,शुभसंकल्प समूह


लघुकथा-दिवस 
---------------
e-book 
-------


निर्देशक- डा सुनीता श्रीवास्तव 
संपादकीय  टीम-
मानवेंद नारायणी  माया 
डा  अर्चना श्रीवास्तव 
प्रकाशक-संकल्प श्रीवास्तव 
सहयोगी -चिन्मय श्रीवास्तव 

----------------------------




लघुकथा दिवस
-----------
रचनाकार
------------
1 स्वाति वाड़गे
2अचला गुप्ता
3पूनम शर्मा 
4 डा शेलचंद्रा
मंजिरी पुणताम्बेकर 
6निधी 
7डा  इंदू मालवीय 
8वंदना  दुबे
9मित्रा शर्मा 
11 शालिनी  रायजादा 
12सविता ठाकुर 
13प्रेरणा  सेन्दरे
14डा  वंदना  गुप्ता
15 मंजू गुप्ता 
16प्रभा  जैन 
17 मनोरमा जोशी 
18 उषा गुप्ता 
19 शारदा मिश्रा 
20 अमिता मराठे 
21कुमुद दुबे
22 नवनीत जैन 
23नीति अग्निहोत्री 
24कुसुम सोगानी
25 लिली डाबर 
26डा  विजय चौरे 
27 शोभा रानी तिवारी
28डा अंजुल  कंसल
29नंदिनी जोशी
30 साधना  श्रीवास्तव 
31 अनुराधा 
32 निर्मल सिंघल 
निर्देशक- डा सुनीता श्रीवास्तव 
संपादकीय  टीम-
मानवेंद नारायणी  माया 
डा  अर्चना श्रीवास्तव 
प्रकाशक-संकल्प श्रीवास्तव 
सहयोगी -चिन्मय श्रीवास्तव 

----------------------------






रोल-मॉडल
---------

नीति के घर के चार घर छोड़ पवांर अंकल आंटी का बंगला लगता है, अंकल आंटी का भरा पुरा परिवार है दो बेटे, एक बेटी, बहुएं उनके बच्चे बड़े वाले को एक लड़का-लड़की और छोटे वाले को एक लड़की परिवार देख के मन खुश होता कि चलो आज भी संयुक्त परिवार की परंपरा बनी हुई है, पैसो में तो पूरा परिवार खेलता है
पर आज जब नीति आफिस से लौट रही थी उसे पवांर अंकल के घर के बाहर बहुत भीड़ दिखाई दी पुलिस भी आई हुई थी मन आशंका से भर गया उसने घर पर फोन लगाया रवि आफिस से आ गये थे उसने सब बताया तो रवि ने उसे वहीं मिलने का बोला,रवि ने छबि को दादी के सुपुर्द किया और निकल पड़ा वे दोनों जब पवांर अंकल के यहां पहुंचे तो स्तब्ध रह गए पवांर अंकल के पोते ने जो कि इंजीनियरिंग के द्वितीय वर्ष में था खुद को अपने कमरे में फांसी लगा दी थी नोट में लिख कर गया कि "उसने फांसी लगा ली अब मैं भी अपने हिरो के बगैर जीना नहीं चाहता" पुरे घर का रो रोकर बुरा हाल था निती और रवि कि भी आंखें नम  हो गई और वे एक प्रश्न लेकर घर आ गए कि क्या हो गया है हमारी युवा पीढ़ी को ? इतनी कमजोर , कैसे लड़ेंगे ये लोग जिंदगी की परेशानियों से आज की पीढ़ी ने अपना रोल-मॉडल किसे बना रखा है फिल्मी हीरो को जो खुद ही अपना जीवन झुठ की बुनियाद पर टिकाए हुए हैं ,क्या ऐसे होते है मार्गदर्शक?

  
*स्वाति वाड़गे (वनकर)

==================================

मंथन 
----------

रेखा कुछ दिनों के लिए अपने मायके जा रही थी।ट्रेन में बैठे बैठे भी उसे घर की चिंता सता रही थी।पता नही बच्चे समय पर स्कूल निकले या नही।सुधीर जी का टिफिन राधा ने समय पर तैयार किया या नहीं।अगले ही क्षण उसे हंसी आने लगी।हम हमेशा यही क्यों सोचते हैं कि हमारे बिना काम नही हो सकता...
स्टेशन आ गया था।सामान कम था तो खुद ही उठा कर स्टेशन के बाहर आ गई।ऑटो वाले पूछने आ गए ,दीदी कहाँ चलना है।
पर रेखा ने देखा ,एक रिक्शेवाला कातर निगाहों से उसे देख रहा है।वह उसी रिक्शे में सवार हो गई।
बेचारे पर उसे दया भी आ रही थी।अधेड़ उम्र का वह सीधा सा दिखने वाला आदमी चुपचाप रिक्शा खींचे जा रहा था।रेखा एक समाजसेविका थी।
इनके लिए कुछ करना चाहिए,सोचते हुए बोली ,"भैया ,मुझे अच्छा नही लग रहा कि इंसान हो कर भी एक इंसान की सवारी पर बैठी हूँ।इतनी मेहनत करते हो आप ,ये साईकिल रिक्शा सरकार को बंद कर देना चाहिए।मैं कुछ करती हूँ आपके लिए।
रिक्शा धीमा हो गया था।रिक्शेवाले ने कहा ,"अरे दीदी,क्यों आप हमारे पेट पर लात मारने की बात कह रही हैं।हम गरीबों के नसीब में ये मेहनत लिखी है,हमे करने दीजिए।आपकी मदद की हमे जरूरत नहीं।हम ऑटो तो खरीद नही सकते ,आप क्या हमें घर पर बैठाएंगी।"
आक्रोश झलक रहा था उसकी बातों में।रेखा घर पहुंच गई थी।चुपचाप उतर कर पैसे दिए और घर के अंदर चली गई ,पर मंथन अभी जारी था।

*अचला गुप्ता
===========================================================
: *श्रद्धा*
----------

एक साधु थे उन्होंने अपने शिष्य से कहा" राम नाम जपने से मनुष्य सभी संकटों से पार हो जाता है" गुरुजी के वाक्य पर श्रद्धा तो थी लेकिन शिष्य को  पूर्ण विश्वास नहीं था, वह बोला राम नाम लेने किसी भी संकट से उबर जाते हैं क्या?
    एक बार उसे नदी पार करनी थी,वह बेचारा अर्ध श्रद्धालु राम नाम रटता हुआ नदी पार करने लगा,जैसे जैसे आगे की तरफ बढ़ा पानी उसके गले तक आने लगा,वो गोता खाता हुआ घबराकर बड़ी मुश्किल से नदी से बाहर आते ही वह गुरुजी 
से कहने लगा.......
    गुरुजी मैने लगातार राम नाम का स्मरण किया ,लेकिन पानी कम नहीं हुआ सब करना अकारथ सिद्ध हुआ,
गुरुजी बोले "अनेक बार नाम स्मरण किया इसीलिए अकाराथ हुआ *एक बार श्रद्धा से नाम स्मरण तूने क्यों नहीं किया*
श्रद्धा कम थी इसीलिए बार बार  स्मरण किया और  गोते खाए,
*भगवान् तो श्रद्धा के भूखे हैं*

*पूनम शर्मा

=============================================================
पूनम लघुकथा-
"इमोजी"
---------
        आज वह बहुत खुश थी। आज उसका एम्.ए. का रिजल्ट आया था।वह प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई थी। विवाह के बाद भी उसने अपनी पढाई जारी रखा हुआ था,यह उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण बात थी।
         उसने अपना रिजल्ट सोशल मीडिया पर शेयर किया। पहले  उसने अपने  भैया को व्हाटस् एप किया।इसके पूर्व भी जब भी उसकी कोई छोटी -मोटी रचना किसी पत्रिका में छपती या कोई महत्वपूर्ण बात होती तो वह अपने भैया को व्हाटस् एप करती तो झट से उधर से ठेंगा दिखाता हुआ या तीन ऊँगली पर दाद देता हुआ इमोजी प्रकट हो जाता। पहले इन इमोजी को देख वह प्रसन्न हो उठती पर कभी कोई कमेंन्ट नहीं आने पर  उसे दुःख भी होता। आज उसे लगा कि उसकी इस शानदार सफलता पर भैया चंद लाइन  जरूर कमेंन्ट  करेंगें।पर आज भी  ठेंगा दिखाता हुआ इमोजी ही भेजा गया था।
          लगातार चार सालों से भैया उससे केवल इमोजी की भाषा में  बातें कर रहे है फोन पर हाँ,हूँ या कभी-कभी फोन नहीं उठाते ।उनकी  ओर से कभी फोन नहीं आता। 
           वह सोचती शायद लोगों के पास अब समय के साथ -साथ भाषा की कमी भी होते जा रही है।तभी तो लोग अब इमोजी की भाषा बोलने लगे हैं।
         जब से उसकी शादी हुई है लगता है भैया-भाभी ने उससे मुक्ति पा लिया है ।तभी तो कभी भी उससे नहीं बतियाते हैं।वह अपनी भावनाएं कल्पनाएं उनसे अभिव्यक्त करना चाहती है। जी भर कर  बतिया कर अपने को हल्का कर लेना चाहती है।पर उनके पास शायद समय नहीं है या सवेंदनाएँ ? वह समझ नहीं पाती।
        आज भी भैया ने दाद देता हुआ इमोजी सेंड किया है। वह इन इमोजी को देख -देख कर बोर हो चुकी है।  उसे बहुत  दुःख हुआ।उसकी आँखें डबडबा गईं। उसने भी अपने भैया को  एक इमोजी सेंड किया। एक  रोती हुई गुड़िया की।
        आश्चर्य भाई ने पुनः  दाद देता हुआ इमोजी सेंड किया। उसने छलकते आंसुओं को पोंछते हुए अपना मोबाइल बंद कर दिया और अपनी आँखे बंद  कर ली। उसे लगा कि वह  स्वयं भी एक इमोजी बन चुकी है।

           *  डॉ. शैल चन्द्रा
=====================================================
             


लघुकथा 
विषय - ईदी 
         ---------
           यह कहानी है बारामुला के पाटन गाँव की l पूरे गाँव में हरी  पताकायें और  हरे झंडे सजे थे l आज रमजान के पूरे तीस दिन हो गये थे l सारा गाँव ईद के उत्सव  की तैयारी में था l
       अनवर ने अपने बिस्तर से आवाज लगाई अम्मी.... अम्मी l अनवर उठ कर सीधा अम्मी को ढूंढते रसोईघर पहुँचा l अम्मी ईदमुबारक l रेहाना ने  उसका माथा चूमकर ईद की मुबारकबाद दी l आप क्या कर रहे हो?  अनवर ने रेहाना से पूछा l बेटा सेवईयाँ बना रहीं हूँ रेहाना ने कहा l अम्मी मैं तो सिर्फ सेवइयां ही खाऊंगा अनवर ने कहा l यह कहते अनवर की नजर खिड़की से सामने वाले घर पर गई l उसने उसकी खालाजान को देखा l पिछले पाँच सालों से अनवर के मन में यह प्रश्न कितनी बार आया होगा कि क्यूँ खालाजान ईद के दिन अम्मी जैसी तैयार नहीं होतीं?  क्यूँ उनके घर सिवइयां नहीं बनती?  आज उसने ये सवाल रेहाना से पूछ ही लिये l 
            तब रेहाना ने बताया कि बेटा अपनी ये जगह है जिसको आम आदमी जन्नत कहता है l लेकिन अभी तो ये जहन्नुम बन गई है l अनवर ने रेहाना से जहन्नुम बनने का कारण जानना चाहा l रेहाना ने 9बताया कि हमारे पड़ौसी मुल्क से आतंकवादी आते आतंक मचाते और तेरे उमर के बच्चों को बहला फुसलाकर अपने देश ले जाते l उन्हें आतंकी बनाने का प्रशिक्षण देते l एक बार ईद के दिन आतंकियों ने हमला किया और आपकी फरीदा खालाजान ने अपना नजीम खो दिया l तभी से वे ईद नहीं मनातीं l 
         रेहाना ने एक डिब्बे में सेवइयां डाल कर अनवर से फरीदा को देने कहा l अनवर ने रेहाना को भी खालाजान के घर चलने को कहा l फरीदा के घर पहुंचते ही अनवर दौड़ कर फरीदा की गोद में जाकर बैठ गया l फरीदा को ईदमुबारकबाद दी और रेहाना से कहने लगा कि अम्मी आज से मेरी दो अम्मी हो गईं हैं l 
             सुनते ही फरीदा की आखों से ख़ुशी के आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे l फरीदा ने रेहाना के गले लग कर कहा कि आज अनवर ने मुझे बेशकीमती ईदी दी है l फरीदा अपनी चुन्नी फैलाये अनवर को दुआएं देती रही l


*मंजिरी पुणताम्बेकर 
===============================================================
  

पूर्णता
-------

उस दिन न वो रो सक रहीं थीं न रोना ही रोक पा रहीं थीं।
बेटी जवाई अब न जाने कितने लम्बे अन्तराल को कलकत्ता बसने जो जा रहे थे।
भरे मन से अपने कलेजे के टुकड़े को ट्रेन में रवाना कर चुकी थीं जो उनका एकलौता नाती था वह भी वो जिसकी जान नानी ही थी। उसके माता-पिता के साथ; पहुच चुका था कोलकाता टूटा वो टूटी उसकी नानी की हर चहक 
टेलिफोन पर नाती ने पुछा नानी केसे रह रही हो बिना मेरे फ़ीर नाती टुट न जाये कहा यही तो है तुरंत मिल लेंगे तू फिक्र मत कर कुछ 1 माह में एसा कईयों दफा हो चुका था उस दिन जवाई बाबू जाने क्या ताड़ गए।
उठा पटक कर पुनः अपने शहर लोटा लाये। बेटी ने कई बार पुछा भी एसा क्यूँ,केसे?
जब आज करीब दो वर्ष बित गए थे जब सभी अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे अपनी पत्नी से बोले तुम बार बार पूछती थी ना अचानक कोलकाता छोडने की क्या सुझी!!!
देखो बेटे को जिसके तुम्हारे पेट में आने से लेकर आज तक किसके साथ पूर्णता महसूस की वो कोई और नही उसकी नानी हैं जिनके बिना वह हर बार फ़ोन पर यही जानना चहता था की जिस नानी का 1 पल नही कटता मेरे बगेर वो केसे रहेगी न जाने कब तक।
इस तरह दो अपूर्ण लोगो ने पूर्णता प्राप्त कर ली थी।

*निधि
============================================================= 


:सफर 
---------
ट्रेन की खिड़की से गुजरते हुए पेड़ो को देखकर बचपन की याद आ गई ,जब दौड़ते हुए पेड़ो को देखकर खुश हो जाया करते थे...।
पुरानी यादों ने चेहरे पर एक मुस्कान छोड़ दी... तभी नज़र पास खड़ी बच्ची पर गई!!!
उसके एक  हाथ में एक थैली थी और दूसरे हाथ से वह अपनी माँ का आँचल पकड़े खड़ी थी.... 
ट्रेन का डिब्बा यात्रियों से इस कदर भरा था जैसे चाय के कप से चाय प्लेट में गिरती हैं....
बच्ची की माँ कभी अपने को संभालती , कभी गोद के बच्चे को तो कभी अपने आँचल को!!!
तभी मेरी नज़र सामने बैठे महाशय पर पड़ी जो अपने दोनों पैरों को फैलाकर आराम से अखबार पढ़ रहे थे....
मैंने विनम्रता से कहा ,भाई साहब क्या आप थोड़ी सी जगह इस बच्ची को दे देंगे??? उन्होंने मेरी ओर इस तरह देखा जैसे मैंने उनकी सम्पत्ति मांग ली हो...
भारी आवाज में बोले, मेडम इस सीट के मैंने पूरे पैसे इसलिए भरे हैं ताकि मैं आराम से सफर कर सकूँ... और आपको इतनी ही दया आ रही हैं तो आप अपनी सीट दे दो.... इतना कहकर वे महाशय फिर से अखबार में देखने लगे..... वैसे वे न भी कहते तो भी  मैं उस महिला को अपनी सीट जरूर देती.... सीट पर बैठकर उन दोनों के चेहरों पर एक सुकून की  मुस्कान थी..... तभी टीटी साहब आ गए और सभी की टिकट चैक की और बारी आयी सामने वाले महाशय जी की टीटी देखते ही क्रोध से झल्लाया!!! अरे! ये इस सीट का टिकट नहीं है वो आखिरी वाले डिब्बे का हैं चलो उठो यहाँ से अपनी जगह पर  जाओ... .. सीट खाली होते ही भीड़ ने अपना कब्जा जमा लिया.... और अपने आप को उस सीट का मालिक कहने वाले महाशय कोने में खड़े नज़र आए....  कुछ देर बाद वह बच्ची अपनी जगह से उठी और महाशय जी के पास जाकर बोली!!!! बाबूजी आप हमारी जगह पर बैठ जाओ हमारा घर आ गया है ... कुछ पल रूककर उसने जो कहा वह शब्द नहीं अनुभूति थी!!! बाबूजी मुझे पता हैं खड़े रहने में पांव बहुत दुखते हैं.........
इतना कहकर वह बच्ची तो ट्रेन से उतरकर चली गई परंतु मुझे आज भी वो सफर  याद है और शायद उन महाशय जी को भी होगा ???
  
*डॉ. इन्दु बाला मालवीया

=========================================================

 *ठप्पा*
----------

 बिल्डिंग के सारे लोग जो कभी छत पर नहीं जाते थे ; लाॅकडाउन में रोज शाम को भीड़ के रूप में इकट्ठा हो जाते । बच्चे, युवा, पुरुष और महिलाओं ने अपना-अपना समूह बना लिया था । कोई गेम खेलता, तो कोई कोरोना पर चिंता व्यक्त करता,  कभी सेव परमल की पार्टी, तो कभी दालबाफले । जैसे कोरोना न हुआ कोई उत्सव हो गया हो ।

स्वभाव से स्पष्टवादी और स्वच्छता पसंद जूही से रहा न गया कई बार उन्हें हिदायत दी कि-

" कोरोना बहुत खतरनाक वायरस है इसकी गंभीरता को समझिये । दूर-दूर रहिये एक दूसरे से।" 

तिवारीजी - "मौत को जब आना होगा, तब आ ही जाएगी, बिटिया ! " 

कुसुम चुप हो गई ।

दिन भर घर की कैद और शाम को छत पर सबकी धमा-चौकड़ी के कारण जूही सुबह पांच बजे छत पर घूम आती ।

 छत पर फैली गंदगी देख जूही ने सबको टोका, पर किसी के कान पर जूं न रेंगी ।

एक दिन बिल्डिंग की सबसे जिम्मेदार महिला, वर्मा आंटी से उसने स्वच्छता और सामाजिक दूरी के बारे में चर्चा करना चाही तो  वो बड़े रूखे अंदाज में बोलीं-

"तुम्हे तो कुछ सुहाता नहीं।"

जूही आवाक रह गई !

क्या सचमुच मुझे कुछ नहीं सुहाता ? 

क्या ये गंदगी और ये निकटता का न सुहाना मेरी कमजोरी है ? 
या 
इन सबका हर गलत चीज से समझौता कर लेना इनका  महान गुण?

आज जूही को "तुम्हे कुछ नहीं सुहाता" का ठप्पा लग गया था !!

*-वंदना दुबे 
धार, (मध्यप्रदेश)

=================================================

*अब जियूंगी मैं*
-----------------------
"आजकल ज्यादा ही मोबाइल में लगी रहती हो। बच्चों का ध्यान भी न रहता मम्मी आपको... अब या तो हम या आप का मोबाइल ..।" बेटी की कड़कती आवाज ने मां को अंदर तक झंझोड़ डाला। तीनों बच्चों की परवरिश कर अब बमुश्किल से इस उमर में अंगुली से चलने वाला मोबाइल चलाना सीखा था। बच्चों के पापा की बेरुखी और ज्ञान-ध्यान के बाद ही तो अब जाकर अपने अकेलेपन को काटने कविता- कहानी लिखने की अपनी रुचियों को फिर जगाया था। ...उम्र के इस पड़ाव में जरा सा मैं अपने लिए क्या जीने लगी तो बेटियों को अखरने लग गई!!
 बेटी के झिड़की सुन मां को याद आया कि जब बेटियों को खिलाड़ी बनाने और बाहर भेजकर पढ़ाने के लिए अपने पति से भिड़ गई थी... मां को याद आया कि बेटी को जींस पहनने का मना करने पर किस तरह घरवालों को समझाया था कि लडकियां चांद पर पहुंच चुकी है। इन दकियानूसी बातों से लड़की को पीछे मत धकेलो...बेटी के सपनों को पंख लगाने के लिए उम्रभर जमाने से लड़ी।
... और आज मेरी जरा सी खुशी बेटियों को अखरने लग गई!!!
..आज एक मां ने ठान लिया कि बस्स।। पूरी उम्र अपने परिवार के लिए जी चुकी। अब थोड़ा सा अपने लिए भी जिऊंगी... फिर से जिंदा करूंगी अपने सपनों को...
..मां ने मोबाइल उठाया और साहित्य समूह में भेजने के लिए फिर एक नई कहानी लिखने बैठ गई.....!

*- मित्रा शर्मा

==================================================

शरद ऋतु का आगमन और साइकिल , मोटरसाइकिल और पैदल , कपड़ों का गट्ठर लिए फेरी वालो  में मुझे तो कुछ सांठ - गांठ सी लगती है क्योकि सर्दी  का मौसम बदलते ही वे भी ओझल हो जातें है । 
ऐसे ही आज मोटरसाइकिल पर
हाथ से बुनी हुई रंग - बिरंगी दरियाँ लिए हुए उस व्यक्ति पर मेरी नज़र पड़ी उत्सुकतावश मैंने उसे रोका ।एक एक कर बड़ी छोटी कई तरह की दरियाँ उसने दिखानी शुरू कर दी , उसने बताया कि वह पुराने कपड़ों जैसे पैंट शर्ट , साड़ी , कुर्ते और दुप्पटे लेकर उनसे धागे निकाल कर कुछ अपने धागे लेकर हाथ और लकड़ी के loom पर उनकी बिनाई करते है ।मैने कुछ पुराने कपड़े उसे दिए और दरियों के दो design पसंद किए। 
बातो - बातों में उसने बताया वह उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर का रहने वाला है ।
अचानक उसने पूछा आप हरिद्वार गयी है मेरे ना कहने पर फिर उसने पूछा -- और मथुरा कुछ खीजते हुए ( इससे क्या लेना देना की मैं हरिद्वार और मथुरा गयी हूँ या नही )  मैंने फिर ना कहा अरे आप इन दोनों जगह नही , लगता है घूमने का शौक नही है आपको , कुछ तल्ख़ लहज़े में मैने 
जानते हुए भी पूछा , क्यों ऐसा क्या है हरिद्वार और मथुरा में (की मुझे वहाँ जाना ही जाना चाहिए था ) ? 
आँखों मे चमक लिए वह बोला  ____ हरिद्वार में बहुत से सुंदर मंदिर है , गंगा घाट है और मथुरा तो कृष्ण की नगरी है उसने फिर ज़ोर देकर कहा मुझे वहाँ जरूर एक बार जाना चाहिए , बाहर से भी बहुत से tourist आते हैं वहाँ । मुझे वह फेरीवाले से ज्यादा up tourism का व्यक्ति अधिक लग रहा था ।
उसने एक पर्ची पर  सामान के पैसों का हिसाब , फ़ोन नंबर और आखिर ने अपना नाम लिखा --- शफ़ीक़ अहमद 
ये एक मुस्लिम होकर मुझे हरिद्वार और मथुरा की महत्ता बता रहा है और मुझे वहाँ घूमने के लिए कह रहा है।
सुखद लगा मुझे पर अचम्भा नही 
एक जानी - पहचानी सी अनुभूति हुई , समय के पन्नों को पलटने पर याद आये वो दिन  साथ मे पढ़ने वाली वे जिंदादिल लड़कियाँ
वे ममतामयी टीचर्स वे सब ख़ुशगवार अपने से पल
कहाँ कोई फ़र्क था अगर हमारे नाम अलग थे , पूजा करने के स्थान अलग थे , हम अलग धर्म के थे , वे कहतीं --- हाय अल्लाह , हम कहते --- हे भगवान 
, लेकिन वह सार्वभौमिक शक्ति का मतलब तो एक ही था दोनों के लिए , कितना सरल , सहज कोई शंका नही, प्रश्न नही ना ही किसी तरह का अविश्वास एक दूसरे पर।
मन ने कहा आज जो मैं tv पर देख रही हूं , सुन रही हूं , पढ़
रही हूं  सब बनावटी है 
इंसान तो एक ही है एक ही तरह की दुश्वारियां , कमजोरियां जिंदगी जीने की जद्दोजहद इन सब चीजों 
के लिए वक्त कहाँ , सोंच कर तसल्ली हुई  ,  शुक्र है ज्यादा कुछ नही बदला ।

*शालिनी  रायजादा 
=================================================
 

रूचि
--------

मोहिनी आठ वर्ष की सुंदर,सुशील कन्या थी। वह इन्दौर के पास एक गांव में  रहती थी।उसके पिता गरीब किसान थे।माता पास ही सीमेंट फेक्टरी में काम करती थी। उसके दो और छोटे भाई बहन थे। मोहिनी को घर का काम करना और उनकी देखभाल करना होता था।परन्तु उसे पढ़ने का शौक था। घर के सामने ही सरकारी स्कूल था। उसने  अपने माता पिता से इच्छा जाहिर की। वे थोडे़ असमंजस में पड़े कि कैसे संभव हो पाएगा,तो वे स्कूल मास्टर साहब के पास जाकर सारी बात कही।मास्टर साहब उसकी रुचि जानकर बहुत खुश हुए, उसे पढ़ाई में यथासंभव  सहयोग प्रदान किया। बारहवीं में मोहिनी ने सर्वोच्य स्थान प्राप्त किया। आगे की पढ़ाई जारी रखने में गांव के सरपंच ने  अपना योगदान दिया। मोहिनी की गहरी रूची,कड़ी मेहनत एवं उचित समय पर सहयोग प्राप्त हो जाने से उसका सपना साकार हुआ। उसने छोटे भाई बहन को भी पढ़ाया। आज सौभाग्य से वह महिला बाल विकास अधिकारी बनकर गांवों की महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए अपनी सेवा प्रदान कर  रही है। जहां चाह वहां राह होती है।


*सविता ठाकुर

===========================================================

-"यात्रा का सुकून"
----------

 जनवरी की कड़कती ठंड मैं और मेरी बहन उत्तर प्रदेश शादी में शामिल होने जा रहे थे।  एक तरफ पुरे अपार्टमेंट में एक महिला का ग्रुप जो सारी अध्यापिकाये थी, किसी टूर पर जा रही थी।  सभी समझदार लग रही थी। मेरा स्टेशन रात 11:00 बजे आने वाला था। 8:00 बजे हम सब खाना खाकर अपनी अपनी सीट पर लेटगए। ठंड बहुत थी।  रात 9:30 पर अचानक मैंने देखा कि सभी लोग मेरी सीट के नीचे अपने बच्चे हुए खाने को  रख रहे। मैंने उठकर अपनी  दीदी से पूछा कि क्या हुआ?  वह बोली कोई मांगने वाला नीचे सो रहा है।  उसे खाना दे रहे। मैंने सीट के नीचर झांककर देखा,  किसी बच्चे की बराबर हाइट का एक बच्चा पर वह बच्चा नहीं था। बोना था उसके पैर नहीं थे।  मुस्कुराकर मेरी ओर  देखने लगा।  मैंने बिना कुछ सोचे अपना बिछा हुआ चादर उसे उड़ा दिया। वह मुस्कुराया जैसे धन्यवाद बोल रहा।  मैंने उठकर सभी महिलाओं की ओर देखा ओर कहाँ ये ठण्ड से बचेगा तो खाना खाएगा।सभी मेरी ओर झुकी नजरों से देख रही थी।  और मेरे लिए बो पल आंतरिक सुकून कि  यात्रा वाले पल थे। 


       प्रेरणा सेंदेरे (म. प्र.
==========================================================


गोद उठाई की रस्म 
     -----------

           लघुकथा 
           ---------

  " माँ !   जल्दी से नवजात के लिये ओढ़ना , बिछोना , कपड़े दो । '" 
डॉ बेटी विभा  ने  अपनी माँ से कहा . 
 "अचानक ऐसा क्यों कह रही हो ?"
 " अभी   बस में प्रसव वेदना से पीड़िता ने लड़की को जन्म दिया है ।  उसे नगरपालिका के अस्पताल में भर्ती करा के आयी हूँ ।  संजोग से  मेरे संग मेरी डॉ सहेली शिल्पा  भी उसी बस  में थी ।    हमारी सहायता से डाक्टरों ने उसे भर्ती करने में कोई आनाकानी नहीं की । उसके पति ने उसे छोड़ा हुआ है । उसे आर्थिक मदद भी चाहिए । "
  " ठीक है , यह लो उसके पहनने के लिए मैक्सी ,  धोती ,  नवजात के लिए कम्बल ,चादर ,  कपड़े और जच्चा के लिए हरीरा ,  एक हजार का नोट भी  और  आगे भी उसे जरूरत होगी तो हम उसकी मदद करेंगे  ।" 
 सब समान  फटाफट थैले में भर चेहरे पर मानवता की मुस्कान लिए डॉ विभा   फुर्ती से अस्पताल में  पहुँची और दूसरी अजनबी नवजात बेटी   को अपनत्व  की गोद में ले के गोद  उठाई की रस्म कर खुशी से झूमने लगी और मानवता की रक्षा हेतु एक बेटी के कंधों ने दूसरी  नवजात बेटी की ऊँगली थाम उसकी माँ के हाथ में पर्स में से एक - एक हजार के दो  नोट  थमा के फिर मिलने का और आर्थिक मदद का वादा कर दोनों सहेलियाँ फर्ज का  आशियाना   बन अपने घर चल दी . नवप्रसूता अपनी आँखों में उन दोनों की  इंसानियत की ऊँचाई  की चमक  को देख रही थी .  

*डॉ मंजु गुप्ता

============================================================


*बदलते उसूल*
----------

पहली तनख्वाह मिलने की खुशी में अंतर्मन तक भीग गयी थी सुमन... आखिर कितने वर्षों की मेहनत के बाद यहाँ तक पहुँची थी। वह ऑफिस से सीधे मार्केट गयी। घर पहुँचते ही उसने चहक कर सबको इकट्ठा कर लिया।

"यह तेरे लिए मेरी पहली तनख्वाह से खरीदा हुआ उपहार..." पहला पैकेट उसने छोटी बहन की ओर बढ़ाया। दोनों के चेहरे पर बेशुमार खुशी थी। दूसरा पैकेट छोटे भाई को देते हुए उसके चेहरे पर खुशी के साथ जिम्मेदारी वाला भाव भी नज़र आया। तीसरा पैकेट पिताजी को दिया और कहा.. "आपने मुझे इस लायक बनाया कि मैं आज आपके लिए कुछ खरीद सकी.. आपके आशीर्वाद और सहयोग के बिना मैं कुछ नहीं हूँ... कृतज्ञतास्वरूप मेरे स्नेह की तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिए.." पिता की आँखों मे आशा और स्नेह के असंख्य दीप जल उठे।
अंत में उसने माँ की ओर देखते हुए एक पैकेट उनकी ओर बढ़ाया ही था कि माँ एकदम से पीछे हटते हुए बोलीं.... "न न बेटा... हमें तेरी कमाई खाकर अधर्मी नहीं बनना.. तेरा पैसा इकट्ठा होने दे, तेरी शादी में तुझे ही दे देंगे, हमें कुछ नहीं चाहिए.."
वह एकदम बुझ सी गयी। फिर उसने माँ का हाथ पकड़ा और सीधे उनकी आँखों में देखा...
"माँ! एक बात बताओ यदि आपको पहला बेटा होता और आज वह कमाने लायक होता तो आपको ज्यादा खुशी होती न..?? उसकी कमाई पर आप अपना हक समझती और उसके दिए उपहार पर आपत्ति भी नहीं करतीं.."
माँ निरुत्तर देखती रही... वह आगे बोली.."मैं लड़की हूँ तो क्या आपने मेरी शिक्षा या परवरिश में कोई कमी की..? या बेटे और बेटी के लिए कोई अलग मापदण्ड रखे?? नहीं न.. जब एक जैसा दिया है तो एक जैसा लेने में आपत्ति क्यों??" वह उदास हो गयी... "शायद... इसी कारण लोग बेटी नहीं बेटा चाहते हैं..."

माँ अचानक ही सदियों का सफर कर आयी... थोड़ी देर शून्य में देखती रही और उसने सुमन को गले से लगा लिया। उसका मन तरल होने लगा... कुछ पिघल कर आँखों से अनवरत बहता रहा...!

©डॉ वन्दना गुप्ता
   उज्जैन (मध्यप्रदेश)

===================================================
लघु कथा

 कोई बात नहीं
-----------


   झुरमुर बारिश की रात्रि के आठ साढ़े आठ बजे थे।गेट पर कोई आवाज़ दे रहा है ऐसा भासित हुआ।टीवी देखते देखते मैं ने खुली खिड़की से झांका,एक तीस पैंतीस वर्षीय ,साधारण से कपड़े पहने हुए एक महिला छोटा सा झोला लिए खड़ी थी।जैसे ही आवाज सुनी उसकी,,कह रही थी,मैडमजी राशन कुछ थोड़ा देदो।रोड पर सामने वाला ही घर पड़ता है मेरा सो कोरोना के इस मुश्किल समय में मदद के लिए हर दो चार घण्टे में कोई न कोई आ जाता है। दिन भर में महीने भर से आटेके छोटे छोटे पैकेट भी बांटे थे
      किन्तु पता नहीं, अनायास ही मेरे मुँह से निकल गया।नहीं है बाई ,नई नई तुम आगे जाओ। मेरा इतना ही कहना था,और वो महिला मायूसी से बोली,कोई बात नहीं दीदी।और अपने रास्ते चली गई
    थोड़ी ही देर बाद जब मैं मेरी पोती को परोसने लगी और थाली में मुझे उस महिला का चेहरा आँखों में घूम रहा था और बोल गूंज रहे थे,,और आज तक जब थाली पर बैठती हुं।बस यही प्रति ध्वनि सुनाई देती है ,"कोई बात नही"
  और दुःखी मन से विचारों में पड़ जाती हुं ,मैंने क्यों बेचारी को राशन नहीं दिया? थोड़ा सा दे मित्रा देती तो कोई घर में से कम नहीं हो जाता? आज भी रह रह कर मन दुःखी  हो जाता है कि अगर उस बाई की जगह पर मैं होती तो,,,,

*प्रभा जैन

=====================================================

       "पछतावा"(लघुकथ)
       ------------------

आज अमन बहुत खुश है, माँ को पहली नौकरी की खबर देता है।माँ आशीर्वाद देते अतीत में खो गई।वह हृदय विदारक घटना जब पिता देव का दुर्घटना में आकस्मिक निधन हो गया।कैसे !अमन को बीमार पड़ने पर रात में अकेली हॉस्पिटल लेकर दौड़ती,कैसे! स्कूल लेने छोड़ने...और ना जाने क्या- क्या याद आने लगा।माँ क्या सोचने लगी? कुछ नहीं बेटा जब तू तीन साल का था तब से आज तक....हाँ माँ कैसे सिलाई में दिनभर भीड़ी रहती हो,पर अब मत सोचो ये सब अब!कुछ समय बीता अमन को विदेश भेज जाना पड़ा,केरल के मूल निवासी थे,   समय-परिस्थितियों ने यही का रख छोड़ा था।माँ-बेटे का कोई अपना ना था, बेटा माँ को एक वर्ष का वादा कर वृद्धाश्रम में छोड़कर चला गया।दो वर्ष बीत गए,शुरू में अमन का फोन आता था,अब वो भी बन्द हो गया।वृद्धाश्रम से बार-बार सन्देश आता-"जल्दी आओ तुम्हारी माँ बीमार है।" एक दिन फोन पर डांट कर कहा -"अब भी नहीं आये तो देर हो जायेगी।"
आज अमन माँ को मुखाग्नि देते  हुए देर होने का एहसास कर रहा है, माँ की आत्मा शांत है कोई बेचैनी नहीं हैं।जलती लकड़ी अमन के हाथ मे है और अमन की आत्मा चिता जैसी धधक रही हैं।

*मनोरम जोशी

====================================================

 " हम होंगे कामयाब "
      ----------------

" पापा-पापा, कितने दिन हो गए हैं घर में बैठे हुए.....कितने दिनों से हम नदी किनारे नहीं गएँ हैं.... चलो न प्लीज़" नीरा रूँआसे होते हुए बोली।
" ओ मेरी लाड़ो, मुझे पता है कि तुम्हें नदियाँ बहुत पसंद हैं.... और हम हर सप्ताह किसी न किसी नदी किनारे जाते हैं.... पर... इस वक्त.. नहीं बेटा... अभी नहीं " पापा ने बेटी को प्यार करते हुए कहा।
अब नीर बोला , " पापा, दीदी सही कह रही है, चलो न प्लीज़.."
" बच्चों, तुम्हें पता है न कि इस समय लाकडाउन चल रहा है, कोरोना नामक महामारी ने तकरीबन हर राज्य में पैर जमा रखें हैं। हमारे इंदौर में सबसे ज्यादा केस हो गए हैं... ऐसे में घर से बाहर निकलने की सोचना भी... नहीं नहीं... अभी किसी भी हालात में नहीं .." माँ ने ऐलान करते हुए कहा।
"अब क्या करें पापा ?" दोनों बच्चे बोले ।
क्या ? क्या करें, जा नही सकते पर इस बारे में बात कर सकतें हैं ..और क्या??" पापा ने माँ को इशारा किया ।
" हाँ नीरा, तुम बताओ.. अभी के हालात में नदी और पर्यावरण की क्या स्थिति है ?"माँ ने गंभीरता से पूछा ।
नीरा ने कुछ सोचा और फिर बोलना शुरू किया- "मैं समझती हूं कि इस समय हमारा वातावरण बड़ा ही अच्छा, साफ़ और स्वच्छ है । नदियों का प्रदूषण काफ़ी हद तक कम हो गया है"।
" कैसे दीदी ?" नीर ने पूछा ।
" सिंपल नीर, देखो, फ़िलहाल इक्का दुक्का वाहन ही चल रहें हैं... सड़क पर, पटरी पर और हवा में.. इस कारण धुँआ भी नहीं है। आक्सीजन की मात्रा बढ़ गई है।इसी तरह पानी के स्त्रोत तक कोई जा नहीं रहा है, कोई कचरा, पोलीथीन आदि नहीं फेंक रहा है... इसी तरह अधिकांश कारखाने बंद होने के कारण वहाँ का प्रदूषित पानी जल स्त्रोतों में नहीं जा रहा है... तो हो गई न हमारी नदियाँ प्रदूषण रहित..." नीरा के स्वर में गर्व का पुट था ।
" अरे नीरा, इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम इस कोरोना को अच्छा मान रही हो ??" पापा ने प्रश्न किया।
" अं......अं.... नहीं.... वो मैं... मैं तो ..." नीरा के पास जवाब नहीं था।
" मैं बताता हूँ ... ध्यान से सुनो- यह महामारी बहुत ही खतरनाक है..पर इस महामारी ने हमें बहुत कुछ सीखाया है, जैसे सफाई रखना चाहिए, साबुन से बार बार अपने हाथ धोना चाहिए, कम और सीमित साधनों में गुज़ारा करना चाहिए, वातावरण को साफ़ रखना चाहिए, पानी का उचित उपयोग करना चाहिए, यदि हमनें इतना भी कर लिया तो हमारे जल स्त्रोत और पर्यावरण अपने आप स्वच्छ रहेंगे। इनमें किसी भी प्रकार की गंदगी डालने से बचना चाहिए ।
यदि हमें कुदरत का ये इशारा समझ में नहीं आया तो ये कुदरत हमें किसी न किसी रूप में सजा सुना ही देती है..।"पापा ने बात खत्म की।
" इसलिए बच्चों , हमें अपने जल स्त्रोतों को और  पर्यावरण को हमेशा हमेशा बचाए रखना है... ये कोरोना तो भाग जाएगा पर हमें याद रखना है कि हर हाल में हम अपने स्त्रोतों को सँभाल कर रखेंगे... समझे !" माँ ने बात पूरी करते हुए कहा ।
" हाँ मम्मी-पापा , हमारी ज़िम्मेदारी अब शुरू होती है । हम अपने स्कूल में, अपनी कॉलोनी में, अपने शहर में सबको समझाएंगे ताकि सब इसे अपनी ज़िंदगी की मूलभूत आवश्यकता मान कर उसकी हिफाज़त करें।" नीरा बोली।
हाँ दीदी, चलो न बहुत सारा काम करना है ।"नीर उत्साहित होकर बोला।
" हाँ नीर, अभी तो बहुत दिनों तक घर में रहना है... अच्छा है कि हमारे पास सारा जरूरी सामान है। ड्राइंग बनाएँगे, पीपीटी बनाएँगे, छोटे-छोटे नाटक और नुक्कड नाटक भी बनाएँगे।" नीरा ने कहा।
" हाँ- हाँ दीदी, चलो , हमारी नदियाँ, तालाब, सरोवर आदि बचाए रखने हैं.." नीर ने नीरा का हाथ पकड़ा और दोनों चल पड़े अपने कमरे की ओर ।
आखिर उन्हें कामयाब जो होना था ।


*उषा गुप्ता

========================================
शहिद
------

हैलो  , आप  कौन  बोल  रहे  है।फोन  पर 
 एक  आवाज  सुन सहसा  मैं  बोल  उठी ।दूसरी  तरफ  से  पुनः वहीं  प्रश्न  सुन  झुंझलाते हुए  मैंने  कहा  फोन  मैंने  नहीं  आपने  लगाया है,  मुझे  बहुत  काम  है कहकर  फोन  रखने  ही  वाली  थी  तभी  करूणा  भरी  आवाज  आई  बेटी  फोन  मत  काटना ।
आवाज  में  पीडा  को  महसूस  कर  मैंने  पूछा  आप  कौन  हैं  मेरा  नम्बर  किसने  दिया ।बुजुर्ग ने  दर्द  भरी  आवाज  में  कहा  मैंने  तो  ईश्वर  का  नाम  लेकर  यू  ही  नम्बर  डायल  किया  कि  किसी  को   तो  मेरी  मदद  के  लिए  उसने  चुना  होगा  नम्बर  तुम्हें  लग गया ।
वह  उसी  दर्दीले अंदाज  में  बोले  बेटा  धरती  मां  का कर्ज  चुकाने  के  लिए  अपने  एकमात्र  पुत्र  को  सेना  में  भर्ती  किया  था  , रात  उसके  हेडक्वार्टर  से  फोन  आया  कि बेटा  आतंकी  हमले  में  मारा  गया  है  ।मैं  तो  बाप  हूँ  दिल  पर  पत्थर  रखकर  उसकी  शहादत  पर  गर्व  कर  रहा  हूं  पर  उसकी  मां  को  कैसे  समझाता  जब  से  सुना  है  बेहोश  पङी है ।
इस  शहर  में  हम  नए  है,हेडक्वार्टर  से अभी  फोन  आया है  कि  वह  बेटे  के  शव  को  कुछ ही देर  में  ला   रहे  हैं ।बेटी  तुम  कौन  हो  कहा  रहती  हो  मैं  नही  जानता  क्या  इस  समय  तुम  मेरी  मदद  कर  सकती  हो ।
दूसरी  और  से आ  रही  आवाज  के  एक  एक  शब्द  ने  मुझे  अंदर  तक  झकझोर  दिया  था केवल  इतना  कह  पायी  आप  अपना पता  बताइए  और  बदहवास  सी निकल  पङी  उस आनेवाले  सपूत  की  अगवानी  करने  जिसने  हमारी  जान  बचाने  के  लिए  अपनी  जान  की  बाजी  लगा  दी ।वतन  का  वही  रखवाला  आज  तिरंगे  से लिपटा   उसके  घर  जो आ रहा  था  ।


*शारदा  मिश्रा

==============================


           आस्था
            ------

श्रावण सोमवार का उपवास और शिवजी की पूजा-अर्चना की तैयारी में सीमा व्यस्त थी।उसी समय कुमार ने कहा क्यों न हम सब व्रत रखें। सभी घर में रहते हर कामों से हिलमिल गये  थे‌ ।घर के प्रति  एक अदृश्य आस्था का निर्माण हुआ था।
    वैसे भी  वर्षा के आगमन के साथ ही त्यौहारों का, व्रतादि का आनन्द कुछ विशेष होता हैं।श्रावण भादो की हरियाली मन मोह लेती हैं।घर का वातावरण भी शुद्ध लगने लगता है।
            पापा ने कहा बेटा कुमार सारा दिन कुछ न कुछ खाने वाले तुमसे उपवास नहीं होगा।तब कुमार ने बहुत सुंदर जवाब दिया।पापा आज दुनिया में खलबली मची हुई है।हमारा देश संकटों से गुजर रहा है।कई घरों के बच्चे बिलख रहे हैं।हम चार दिवारो में बैठने को विवश हैं। क्यों न हम अपनी आध्यात्मिकता को जगाने के लिए योग, ध्यान उपवास , व्रत आदि से मन एकाग्र करें औरजो दुःखी है उन आत्माओं के प्रति मन से शक्ति का दान करें।
        सोलह वर्षीय बेटे के मुख से इतनी जागरुक वाणी सुनकर पापा मम्मी स्तब्ध थे। मां ने गंभीरता पूर्वक कहा बात तों सही है ।हमें ये ज्ञात होना चाहिए कि भूख का महत्व क्या है ।गरीब, असहाय पीड़ित,लोगों का दर्द समझ उनके प्रति उदारता सहिष्णुता का भाव हो।हमारी भारतीय संस्कृति हमें रहमदिल ,व परोपकारिता का सन्देश देती ।आप समाज सेवी को नितान्त सजग रहना चाहिए।अब पापा मां बेटे की विचारधारा का अध्ययन कर रहे थे।

*अमिता मराठे

=============================================

                      रौनक
                     ----------
आॅफिस से घर लौटे साठे जी जूते उतारते हुये पत्नी शोभा से बोले,
शोभा ! मैं कुछ दिनों से देख रहा हूँ अपनी कालोनी के अतुल जी के यहाँ हमेशा सन्नाटा छाया रहता था, आजकल रौनक बनी हुई है। देर रात तक घर की लाईटें जलती रहती हैं आैर लोगों का आना जाना भी लगा रहता है। क्या बात है?
शोभा बोली!
ऐ जी मेरे मन में भी यही सवाल उठा था! मैने आज ही किटी पार्टी की फ्रेंड माला जो अतुल जी की अरसे से पडौसी रही है उससे पता किया। वह बता रही थी- अतुल जी के पिता जब नौकरी में थे अतुल जी इसी 
घर में माता-पिता के साथ रहते थे। वे बहुत ही मिलनसार, व्यवहारिक आैर काॅलोनी के लोगों की किसी भी प्रकार की परेशानी में सहायता के लिये सदा तत्पर रहते थे। बच्चे, बड़े-बूढे सभी के चहेते रहे हैं। रिटायरमेंट के बाद अपने गाँव में रहकर गरीबों की सेवा विद्यादान में ही अपना अधिकांश समय व्यतीत कर रहे हैं! कुछ दिन की यह रौनक़ उनके आने से है।


         *   कुमुद दुबे


===========================================
                                                
कर्मो का फल
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


एक व्यक्ति का बिजनेस खूब फल फूल रहा था खूब कमाई हो रही थी बड़ा खुश था कि मैं करोड़ पति हो गया हूंलेकिन सारी कमाई वो टैक्स चोरी करके कर रहा था
 उसका एक ही बेटा था उसने सोचा जब ये बड़ा होगा उसके लिए खूब पैसा कमा लूं ताकि उसे खूब पढ़ा लिखा सकूंगा  बड़े होने पर अच्छी डिग्री के लिए विदेश भेजने की तैयारी करता है वो दुर्भाग्य से पागल हो जाता है बहुत इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो पाता उस पिता के सारे अरमानों पर पानी फ़िर जाता है बहुत दुखी हो जाता है एक संत के पास जाता है पूछता है मैंने इतने तन मन से धन कमाया  बेटे के लिए ये क्या हो गया मै क्या करू संत ने कहा सब तुम्हारे कर्मो का फल है तुमने नेक तरीके से नहीं कमाया तुम्हारे  गलत कामो का परिणाम है   गलत कार्यों का फल बुरा ही होता है उसे अपनी गलती का एहसास हुआ उसके बाद से उसने पूरी ईमानदारी से बराबर टैक्स चुकाते हुए ही पूरा व्यापार करने लगा  और बेटे को बड़े बड़े डाक्टर को दिखाया धीरे धीरे वह बेटा होने लगा उसके पिता की खुशी का ठिकाना नहीं था 
इसी लिए कहते है नेक कार्यों का फल अच्छा ही होता है और गलत कार्यों का बुरा,,,जैसा कर्म वैसा फल,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

*,नवनीत  जैन
================================================

चिंतन मनन
-------------

ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड़  रही थी। हमारी उस सामान्य श्रेणी के डिब्बे यात्रा इसलिए हो रही थी कि पहले से रिजर्वेशन नहीं करवाया था और यात्रा का कार्यक्रम अचानक बना। जब यात्रा लंबी हो तो आसपास बैठे यात्रियों से भी सहज ही बातचीत हो जाती है । क्योंकि हमारी यह यात्रा धार्मिक स्थल वृन्दावन की थी  इसलिए बातें भजन और सत्संग की हो रही थीं। रूचि रखने वाले भी हमारे  वार्तालाप में शामिल हो गये। वार्तालाप मै
में राजनीतिक और सामाजिक बिंदु भी शामिल हो रहे थे । उसी समय तीन बार तलाक कहने से तलाक तलाक पर पाबंदी लगाने का कानून बना था। एक बहुत ही खूबसूरत बुर्केधारी हमारी पास वाली बर्थ पर विराजमान थीं ।वो अभी तक तटस्थ हो कर बातचीत सुन रही थीं परन्तु ॒इस विषय पर चर्चा होने पर बोल उठीं।कहने लगीं यह तो महिलाओं  के हित में ही हुआ है । वैसे यह वर्ग अपने नियम कायदों के प्रति काफी दृढ़ और समर्पित होता है और हम तो सोच रहे थे कि वो शायद इसके विपक्ष में बोलेंगी तथा चार बातें हमको सुना देंगी परन्तु  ऐसा नहीं हुआ । उन्होंने अपनी जाति और धर्म से जुड़ी ऐसी बातें रखीं जो चिंतन ॒मनन के लिए विवश करती हैं ।उनका कहना था हमरे धर्म ॒ग्ंथ में एक चींटी को मारना भी गुनाह है  और हिंसा तो बहुत दूर की बात है ।वही सब उन्होंने बताया जो हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा है कि द्वेष ं क्रोध ं लालच और हिंसा से दूर रहो ।
 उनकी ये बातें सुन कर मन सोचने को विवश हो गया कि फिर धर्म या जाति के नाम पर झगड़े ंहिंसा ं अलगाव कौन फैलाता हैॽधर्म तो सबका एक सा है कि ईश्वर को जानना ं मानना और पाना । इसके बाद ईश्वर की बनाई रचना प्राणी मात्र का सम्मान करना जिसमें मानवता  और सभी से प्रेम का पाठ सर्वोपरि है । जब सबकी मंजिल एक है तो सभी धर्म आदरणीय और सम्माननीय हैं ।फिर ये लडाई झगड़े कौन और क्यों करवाते हैं ॽकुछ स्वार्थी तत्व अपने स्वार्थ पूरा करने के लिए अपने स्वार्थ की रोटियां सेकतें हैं । काश्वे सम्झ पाते कि वे ईश्वर का ही अपमान  कर रहे हैं ।

*  नीति अग्निहोत्र

==========================================================

   विवश
------‐‐---


            विजय कुमार सेठ संपूर्ण जीवन भर चिंतित रहे ...पहले अपने रंग रूप को लेकर 
तत्पश्चात संतानों के काले रंग
को लेकर ।तमाम सुख सुविधाओं भरपूर पैसे से मिलने वाले संतोष सेअधिक दुख उन्हें अपने काले 
रंग का था।
           नस्ल सुधारने की दृष्टि से तीन लड़कियों के बाद हुये पुत्र की समयानुसार शादी उन्होंने 
सामान्य परिवार की सुंदर गोरी लड़की से की। वे बहु से संतुष्ट थे। 
    बहु जब ब्याह कर आयी तो 
उन्होंने बहुत उत्सव किये... 
किंतु इसके बाद से अनायास बीमार रहने लगे ।
अब उन्हें लगने लगा कि अंत समय निकट आ रहा है तो एक दिन अस्वस्थता के दौरान 
उन्होंने पुत्र व बहु को बुलाया  और अपनी इच्छा ज़ाहिर की-
     बहु क्या ? तुम मेरे वंश को एक सुंदर स्वस्थ गोरा पौत्र देकर आगे बढ़ाओगी।
पुत्रवधू ने कहा - हाँ पिताजी मैं
आपकी इच्छा अवश्य पूरी करूँगी किंतु क्या आप मेरी संतान को गोद में खिलायेंगे?
            मेरे वश में होता तो अवश्य खिलाता पर अंत समय निकट जान पड़ता है!!
            तो !! पिताजी काले विचार मन में लाके दिल मैला न करें- वधु ने कहा-
          जब मरण समय आपके वश में नहीं तो काली या गोरी 
संतति को जन्म देना मेरे वश में कैसे होगा?
       हाँ मैं अपनी संतान को उज्जवल संस्कार दूँगी । 
         पुत्र ने देखा पिताजी के प्राण पखेरू उड़ चुके थे।

.
             
*   कुसुम सोगानी

===========================================

पिता
------
(लघु कथा)


पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आ चुकी है,रिपोर्ट के अनुसार बेटे ने फांसी लगाकर मौत को आगोश में ले लिया है वैसे ही जैसे  जीवित रहते अपनी महबूबा को। लेकिन एक टूटा हुआ पिता अपने बेटे के पार्थिव शरीर को आगोश में लेकर कहता है , नहीं मेरा बेटा ऐसा कर ही नहीं सकता।  अपने बच्चों पर विश्वास का दूसरा नाम है....पिता।

*लिली संजय डावर✍️

=================

 
 अविश्वास
----------

कार्यालय से निकलकर सारे काम निपटा ते हुए महू नाका क्रॉस करके अन्नपूर्णा मंदिर से आगे  निकला ही था की बाई और तालाब के पहले नजर गई कोई सज्जन उम्र करीब 65 से 70 के बीच रही होगी अपना स्कूटर खींच कर ले जा रहे थे। विचार आया पूछू क्या बात है कुछ खराबी है या पेट्रोल खत्म हो गया, सोचते सोचते गाड़ी मैंने धीमी कर ली, फिर सोचा कि पेट्रोल पंप थोड़ा आगे ही है कुछ देर में वे अंकल पहुंच जाएंगे । मैंने गाड़ी आगे बडादी, फिर सोचा नहीं उचित नहीं है मुझे एक बार तो पूछ लेना चाहिए, उनकी गाड़ी के पास पहुंचा वे गाड़ी  स्टैंड पर लगाकर किक लगाने की कोशिश कर रहे थे, मैं समझ गया स्टार्टिंग समस्या है, मैंने धीरे धीरे आगे बढ़ना शुरू किया  पर ध्यान उनकी ओर ही था,पीछे मुड़कर देखा वे गाड़ी हांफते हुए धकेलते हुए  आगे बढ़ रहे थे । इस प्रकार कई बार उनका रुकना, मेरा  वापस आना, फिर उनके पास से निकलना यह उन्होंने भी महसूस कर लिया था। मैंने गर्दन घुमाकर पीछे देखा मन मान ही नहीं रहा था। मदद करने की प्रबल इच्छा हुई। वापस गाड़ी मोड़ी,उनके पास आकर पूछ ही लिया,अंकल जी कुछ मदद की आवश्यकता है ,क्या समस्या है ?उन्होंने मुझे घूर कर ऊपर नीचे देखा ,बहुत सोचते हुए बोले, पेट्रोल खत्म हो गया है, एक बार सोचा उनकी गाड़ी खींचकर पास के पेट्रोल पंप तक पहुंचा दूं, और फिर  वापस आकर अपना स्कूटर ले जाऊं।  मुझे याद आया, मेरे स्कूटर में पेट्रोल निकालने के लिए नली और एक छोटी सी बोतल रखी हुई है, मैंने कहा कि आप परेशान ना हो  डिक्की खोल दें। अनमने ढंग से थोड़ा समय लेते हुए उन्होंने डिक्की खोली, सामान भरा हुआ था,जैसे तैसे उन्होंने ढक्कन खोला। मैंने अपने स्कूटर से नली व  बोतल निकाली एवं पर्याप्त पेट्रोल निकाल लिया, जिससे कि उनकी गाड़ी पेट्रोल पंप तक पहुंच जाएं वेआशंकित मन से मेरी मदद ले रहे थे, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था।  सहायता लेने में सहजता के स्थान पर उनमें डर, असहजता, अविश्वास सा नजर आया। मैंने पेट्रोल उनकी डिक्की में डाल दिया।  अपने स्कूटर की और  वापस आने लगा, सोचा वे ढक्कन लगाएंगे, गाड़ी स्टार्ट करेंगे, धन्यवाद देंगे, तब तक मैं बोतल व नली अपनी डिक्की में रख लेता हूं। मैंने यह कार्य संपन्न किया और गाड़ी स्टैंड पर लगा कर , उनकी और बिना देखे बढ़ गया ताकि वह धन्यवाद ज्ञापित कर सकें। जैसे ही मेरी नजर गई उनका स्कूटर बहुत दूर नजर आया।कब स्टार्ट किया ,और इतनी तेजी से गायब हो गए। मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया ऐसा क्या  हो गया ।अपने स्कूटर के पास वापस आया, गाड़ी चलाने की इच्छा नहीं हुई। धन्यवाद के दो शब्द मिल जाते तो मुझे बहुत अच्छा लगता।  फिर विचार आया मदद के नाम पर गाड़ी रोकने वाले, लूटने वालो के समाचार सुनते ही रहता हूं,इंदौर में तो सामान्य बात है। उनलोगो  ने ऐसा वातावरण बना दिया कि बुजुर्ग लोगों ने सभी को अविश्वास के दायरे में लेकर शंका करना शुरू कर दिया। उंक्लेजी  की सतर्कता अपनी जगह सही थी ,मैं भी अपनी जगह सही था ।पर  विश्वास पर  अविश्वास जो किसी तीसरे  के कारण हम लोगों के बीच में आ गया था ,ने मुझे बहुत ज्यादा सोचने पर मजबूर कर दिया। अनमने ढंग से गाड़ी स्टार्ट की। पेट्रोल पंप करीब आने पर एक नजर डाली।  उन सज्जन को देखते हुए और यह सोचते हुए की अविश्वास की यह खाई कब पटेगी और मदद करने वालों के मन में खुशी का भाव कब आएगा ,मैने स्कूटर आगे बड़ा लिया और घटना को भूलने की कोशिश करने लगा। 

 *डॉ विजय आर  चौरे,* 

===========================================

 दर्द   
----------------

मुन्नी चलो ,रमा सब सामान रख लो ।राजू को गोदी में बारी -बारी से उठा लेंगे। मुन्नी ने कहा, कहां चले बापू ? रमेश ने  कहा ,हम अब यहां नहीं रहेंगे । इस शहर ने हमें  दिया ही क्या है ? 10 वर्ष हो गये ,हम  यहां कमाने खाने के लिए  अपने गांव  से शहर "मुंबई "आए थे।इन  10  वर्षों में  मेहनत और परिश्रम किया भवन  का निर्माण  किया। कभी गुंबद पर चढ़कर ,कभी मंदिर के  नींव में दबकर ,लेकिन लॉक डाउन में जब  लोगों की बारी  आई तब हमारा ख्याल रखने को  कोई नहीं आया ।सबने हाथ झटक दिए।  तीन दिनों से हम भूखे  और प्यासे हैं। कोई  पानी तक को पूछने नहीं आया ।सेठ ने हमें नौकरी से निकाल दिया । अब क्या करें ? तो हमें हमारा  गांव ही दिखाई दे रहा है।धीरे से रमा ने कहां ,लेकिन हम गांव जाएंगे कैसे ?  ट्रेन ,बस तो चल नहीं रही  है। रमेश ने जवाब  दिया , अभी  हमारे हाथ पैर सही सलामत हैं। हम पैदल ही जाएंगे ,और मुन्नी और राजू को  बारी- बारी से कंधों पर  उठा लेंगे । रमेश को दर्द भी हो रहा था शहर छोड़ने का ,पर  उनके पास कोई और  विकल्प नहीं था।  वे घर से बाहर निकले  ही थे  कि पुलिस ने उन्हें रोक लिया। कहां जा रहे हो, कैसे जाओगे?  यहीं क्यों नहीं रह जाते? बहुत से प्रश्न किया।  अगर  कोई  कोरोना पॉजिटिव मिल गया तो तुम  लोग मर जाओगे ।रमेश ने कहा कि  कोरोना से मरें  या ना मरें मगर  भूख से अवश्य मर जाएंगे ।हमें जाने दीजिए ।वे चलने  लगे । चलते -चलते पैरों में छाले पड़ गए  और खून बहने लगा ,जो  समय के इतिहास की  कहानी लिख रहा था।भूख और प्यास के कारण बच्चों का बुरा हाल था। दोनों बच्चे जोर- जोर से  चिल्लाने  लगे।भूख और प्यास के कारण  राजू की तबीयत बिगड़ने लगी। कुछ समय बाद राजू की मृत्यु हो गई ।अब रमेश  राजू की  लाश को कंधे पर रखा  चला जा रहा था। सोच रहा था राजू जिंदा भले ही गांव नहीं  पहुंच पाया तो क्या ,गांव की मिट्टी  तो उसे नसीब होगी। आंखों से अश्रु धारा  अविरल बहने लगी।

*श्रीमती शोभा रानी तिवारी


==================================

 करोना त्यौहार     (लघुकथा)

कुछ बच्चे सडक पर खेल रहे थे।एक संवाददाता माइक लेकर जल्दी से उनके पास पहुंचा -उसने पूछा -"बच्चों तुम लोग क्या खेल रहे हो?बच्चा तपाक से बोला -"हमारी छुट्टियां चल रही हैं,इसलिए हम खेल रहे हैं"
"क्या खेल रहे हो?"
"हम सितौलिया खेल रहे हैं"
दूसरा बच्चा बोला-"रंगपंचमी के बाद का त्योहार मना रहे हैं"
"यह कौन सा त्योहार है?"
"यह करोना है"
"यह क्या होता है?"
"यह नया त्यौहार है इस बार मोदी जी ने मनाया है। हम चाहते हैं हर साल होली के बाद करोना मनाया जाए।हमें बहुत अच्छा लग रहा है"।
तीसरा बच्चा-"इम्तहान का झंझट नहीं।खूब खेल रहे हैं।नया त्यौहार है"।
संवाददाता हैरान-बच्चों का उत्तर सुनकर।वह बोला-"करोना तो बीमारी है।इसमें कुछ छूते नहीं,बार बार हाथ धोते हैं।"
"अंकल हमें इस बीमारी के बारे में कुछ बताया नहीं गया।हमें तो स्कूल में करोना की छुट्टी दी गई है।हमें लगा यह कोई नया त्यौहार है।इसलिए हम खेल रहे हैं,मजे कर रहे हैं।"
संवाददाता बोला-तुम सब बच्चे अपने अपने घर जाओ और घर में खेलो"।
बच्चे शोर मचाते अपने घर चल दिए,जोर जोर से चिल्लाते हुए-"अगले बरस करोना फिर आना,खूब मौज मस्ती करेंगे"।

*डां अंजुल कंसल"कनुप्रिया"

==========================================



हिसाब
----------

आज भी सास-बहू की खटपट हुई और बहू हमेशा की तरह गुस्से में  अपने मायके चली गईl जब यशवंत आफिस से आया तो उसका व्यवहार भी कुछ उखडा-उखडा सा लगाl शायद बहुत थक गया होगा, सो लता जी उसे पानी देकर चाय बनाने चली गईl चाय देकर वहीं बेटे के पास कुछ देर बैठ गईl सोचा आते से उसे बहू और उसके बारे में क्या कहूँl तभी बेटे ने ही पूछ लिया-माँ नेहा कहाँ है?दिख नहीं रहीl वो... लताजी कुछ कहे उसके पहले ही बेटा बोल उठा,आज फिर...क्या माँ तंग आ गया हूँ मैं, तुम दोनों की खटपट सेlआज मैं फैसला कर के ही रहूँगाl बेटे की बात अनसुनी कर, लता जी  झूठे कप प्लेट किचन में ले जाने लगीI तभी पीछे-पीछे बेटा भी आ गयाlमाँ-हाँ बोलlथोडी देर चुप रहने के बाद वह फिर बोलाl माँ आज तक तुमने मेरे लिए जो किया उसका हिसाब बता दोl मैं तुम्हारा पूरा हिसाब ब्याज समेत चुका दूँगा और...  और फिर तुम अपनी अलग व्यवस्था कर लेनाl ये क्या कह रहा है रे तूl नहीं माँ अब बहुत हो गयाl अपनी आँखों के से बहते आँसूओं को अपने पल्ले से पोछ माँ मुस्कुराई और उसने बेटे से एक दिन का समय माँगाl उसी रात जब बेटा सो गया,तब माँ ने जिस तरफ यशवंत सोया था उस तरफ एक लोटा पानी डाल दियाlबेटा बहुत नींद में था उसने करवट बदल ली फिर उस तरफ भी माँ ने पानी डाल दिया lगीलेपन के कारण उसकी नींद खुल जाती है और माँ को बिस्तर गीला करते देख तिलमिला जाता हैI माँ ये सब क्या है चिल्लाने लगता हैIतभी बिल्कुल शांत भाव से माँ कहती है-अरे बेटा मैं तो हिसाब लगा रही हूँI

*नंदिनी जोशी

========================================================

  लघुकथा _ 

"शांति "
-----------                          

    विनी जैसे जैसे बड़ी होने लगी उसके ख्वाबों को जैसे पंख लग गए ,उसने सोचा पड़ लिख लू खूब पैसा कमा लूं फिर शांति से रहूंगी ,ओर पड़ते पड़ते उसकी मेहनत से उसे अच्छी नौकरी मिल गई पर दिनभर वो इतना थक जाती की उसे अपने लिए समय नहीं मिल पाता उसने सोचा नोकरी छोड़ देती हूं और अच्छा सा लड़का देखकर शादी कर लेती हूं पति कमाएगा ओर मै आराम से रहूंगी ,पर शादी के बाद सुबह नाश्ता ,फिर खाना ,घर के काम ओर फिर पति की सेवा में ही उसका दिन निकल जाता ,फिर भगवान की दया से उसके दो बच्चे हो गए उसने सोचा थोड़े समय की परेशानी है बच्चे बड़े हो जाएंगे पड़ लिख जाएंगे फिर उनके साथ मन बहल जाएगा पर बच्चे भी अपने  साथियों में ओर पढ़ाई में व्यस्त हो गए कुछ समय बाद बेटे की शादी हो गई उसने सोचा बहु के साथ समय  बिताएंगे पर बहु भी काम से निपट कर अपने मायके वालों से बात करती ओर कुछ समय सो जाती किसी के पास भी विनी के लिए समय नहीं था अब विनी इधर उधर पड़ोस में अपनी खुशी तलाशने लगी पर पड़ोसी भी मतलब निकल जाने पर उसका साथ छोड़ देते वह मन्दिर में जाकर चुपचाप बैठ गई ,एक महिला ने उससे पूछा बेटा तुम उदास क्यों हो बी बोली मुझे कही शांति नहीं मिलती सब अपने अपने काम में व्यस्त रहते है में बहुत बेचैन हो जाती हूं  में सोचती थी शादी होगी खूब पैसा होगा ,शानदार मजन होगा ,गाड़ी ओर ऐसी होंगे घर में फ्रिज सोफे सारी सुख सुविधा होगी ,अच्छा खाऊंगी अच्छे अच्छे कपडे पहनुगी ,आराम से शांति से रहूंगी ,महिला ने कहा बेटा जिन मकान , कार , ऐसी कपडे ओर खाने को तुम सुख समझ रही थी ओर सोच रही थी कि ये सब तुम्हे शांति देंगे तो बेटा ये तुम्हारा भ्रम था ये तुम्हे शारिरीक सुविधा दे सकते हैं शांति नहीं अगर शांति कहीं है तो वो अपने मन के अंदर है जब तक तुम खुद संतुष्ट नहीं होगी तुम्हे शांति नहीं मिलेगी क्योंकि असली शांति मन की होती है जो अपने अंदर ही होती है अगर मन शांत नहीं तो कितनी भी सुख सुविधा हो हमें सुख मिल सकता है पर शांति नहीं   मेरी स्वरचित लघु कथा के साथ


* "साधना श्रीवास्तव "

======================================




: स्मिता आइने के सामने खड़ी अपने मेकअप को ठीक कर रही थी.और सामने सोफे पर बैठा हुआ पूर्णेंदु बार बार कह रहा था सिमी थोड़ा जल्दी करो।
पार्टी नौ बजे से है और तुमने घर में ही नौ बजा दिए,स्मिता ने सोचा ऐसी भी क्या जल्दी की मेरे इतने श्रंगार की जरा भी तारीफ नहीं की।
इतनी देर मे भागता हुआ कार्तिक आया जो खुद भी सुनहरी शेरवानी में राजकुमार लग रहा था।अपनी मां से बोला.मम्मा आप कितनी सुंदर हो ।स्मिता मुस्कुरा दी.तो कार्तिक ने पूछा मम्मा आप इतनी सुंदर कैसे हो?हंस के स्मिता ने कहा.क्योंकि मैं आपकी मां हूँ।
पूर्णेन्दु ने खीझ के कहा.येक्या बात हुई.. कि मैं तुम्हारी मां हूं.मां तो हर बच्चे की होती है।अब स्मिता ने भी कमर कस ली बहस के लिए.. उसने कहा स्त्री का तो जन्म ही हुआ है मां बनने के लिए. मां और ममता पर्याय है ं एक दूसरे के।आप किसी मां को देखिए उसके आगे हजारों विश्व सुंदरियां पानी भरें।आपने भी देखा होगा हर बच्चे को अपनी मां सबसे सुंदर लगती है।इसका कारण मां का रूपवती होना नहीं अपितु ममतामयी होना है।अब मंदिर में प्रस्तर प्रतिमा को जब हम दुर्गा मां.यशोदा मैया.सीतला माई.पुकारते हैं तो इसी कामना से कि मां सब दुख हर के हमारी झोली खुशियों सेभर देगी।जो हमारे लिए सब कुछ करने को तत्पर हो हर दुख सहने को तैयार हो उससे सुंदर भला कौन होगा। मां पिता की बहस के बीच कार्तिक सो गया थाऔर गंतव्य पर पहुंचने से पूर्व बहस खत्म करते हुए. पूर्णेन्दु नेहंस कर कहा अच्छा मेरी मां तुम जीती मैं हारा.हंसते हुए स्मिता ने कहा ..तो अब आप भी मान गए मैं इतनी सुंदर कैसे हूँ।
क्योंकि मैं एक ममतामयी मां हूँ।


*अनुराधा


=============================================
    
              हैप्पी बर्थडे
              ----------

मेरे पड़ोस में एक परिवार रहने आया था। ना तो उन्होंने किसी से परिचय किया ना ही किसीको स्माइल दी। 4, 5 दिन पहले परिवार के पुरुष सदस्य बाहर गांव जाते दिखे। 3  दिन बाद एक
दोपहर उनकी 5 वरस के लगभग
बच्ची के जोर जोर से रोने की आवाज अा रही थी वह बर्थडे मना ना चाहती थी,जो कि पापा के ना होने से केसे मनेगा।मैने घर में से सुना तो निश्चय कर लिया की स्वीट डी श ओर दो सवजी पूरी बना कर उनके घर जा कर बिटिया का बर्थडे मना देगे सब तेयारी करके बैठक में आकर देखती हूं कि पतिदेव ओर बेटा गायब है। कहा गए होगे।थोड़ी देर में बर्थडे items,happy birthday ki झालर ,डेकोरेटिव समान,केक,गिफ्ट लेकर,बेटा गुब्बारे ओर नमकीन,पेप्सी की बोतल लेकर आए और बोले चलो पड़ोस में बेटी का बर्थडे मानने चलते है। हमने नोक किया,ओर हैप्पी बर्थडे प्यारी अंजू कहते हुए उनके घर में प्रवेश किया उनसे बिना पूछे बेटे ने जल्दी से सब सजावट का सामान सजा दिया।
अंजू यो उछल पड़ी  उसने  खुशी खुशी केक काटा,मिठाई खाई,गिफ्ट लिया,ओर भिया कहकर बेटे के टांगो में लिपट गई,उसके सारे फोटो उसके पापा को सैंड कर दिए।तुरंत उसके पापा ने आश्चर्य करते हुए धन्यवाद कहा।हम पांचों ने डिनर साथ में लिया। अगली सुबह ही अपने गिफ्ट से खेलते हुए अंजू बेझिझक हमारे घर में अा गई। प्यार से प्यार ही मिलता है,ये सच है         
*     निर्मल सिंघल एडवोकेट


=============================
निर्देशक- डा सुनीता श्रीवास्तव 
संपादकीय  टीम-
मानवेंद नारायणी  माया 
डा  अर्चना श्रीवास्तव 
प्रकाशक-संकल्प श्रीवास्तव 
सहयोगी -चिन्मय श्रीवास्तव 

----------------------------




लघुकथा दिवस
-----------
रचनाकार
------------
1 स्वाति वाड़गे
2अचला गुप्ता
3पूनम शर्मा 
4 डा शेलचंद्रा
मंजिरी पुणताम्बेकर 
6निधी 
7डा  इंदू मालवीय 
8वंदना  दुबे
9मित्रा शर्मा 
11 शालिनी  रायजादा 
12सविता ठाकुर 
13प्रेरणा  सेन्दरे
14डा  वंदना  गुप्ता
15 मंजू गुप्ता 
16प्रभा  जैन 
17 मनोरमा जोशी 
18 उषा गुप्ता 
19 शारदा मिश्रा 
20 अमिता मराठे 
21कुमुद दुबे
22 नवनीत जैन 
23नीति अग्निहोत्री 
24कुसुम सोगानी
25 लिली डाबर 
26डा  विजय चौरे 
27 शोभा रानी तिवारी
28डा अंजुल  कंसल
29नंदिनी जोशी
30 साधना  श्रीवास्तव 
31 अनुराधा 
32 निर्मल सिंघल 

No comments:

Post a Comment

Featured Post

हिंदी पखवाड़े पर इंदौर संघ लेखिकाओ के पसंदीदा पुस्तकों पर विचार

एक सच्चा रिश्ता एक अच्छी किताब की तराहा होता है,  कितनी भी पुरानी हो जाए, फिर भी शब्द नहीं बदलते, रास्ते बहुत मिलेंगे भटकाने के लिए, लेकिन स...