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निर्देशक -डा सुनीता श्रीवास्तव
प्रकाशक -संकल्प श्रीवास्तव
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रचनाकार
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लता प्रसार
सविता ठाकुर
हेमलता शर्मा
मीना जैन
पूनम शर्मा
मित्रा शर्मा
मंजिरी पुणेतामबेकर
वंदना दुबे
अचला गुप्ता
स्वाति वाड़गे (वनकर)
निधी गिरी
सुनीता अग्रवाल
सुषमा शुक्ला
उषा गुप्ता
राजू चौरसिया
प्रभा जैन
स्मिता जैन
सरला मेहता
नवनीत जैन
अमिता मराठे
माया बदेका
नीति अग्निहोत्री
मनोरमा जोशी
डा अंजुल कंसल
शुभा शुक्ला
सुनीता सक्सेना
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उम्मीद के प्याले में
वादों को घुटते देख
पांव के छालों में
साहस को जुटते देख
मौन के हाला में
शब्दों को फटते देख
सहमा है समॉं
जिंदगी को मिटते देख
आइए ऐसे में
कुछ पल मुस्कुरा लें!
*लता प्रासर*
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बारिश
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रिमझिम रिमझिम बारिश आई,
मनभावन मौसम है लाई।।
कारे कारे बदरा छाए,
न सूरज,न धूप ही लाए।।
डोले फूल, पत्ती, डाली- डाली,
चारों ओर है छाई हरियाली।।
मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू,
करा रही जन्मभूमि से रूबरू।।
प्रकृति की सुंदर घटा छाई,
मनोरम दृश्य है देखो भाई।।
कागज की तुम नाव बनाओ,
पानी में इसे खूब चलाओ।।
पहली बारीश का स्नान ,
दिलाए चर्म रोग से निदान।।
भीग गया तन और मन,
पानी ने एसी लगाई अगन।।
आओ उठाए मौसम का आनन्द,
भर लें मन में रोमांच और उमंग।।
*सविता ठाकुर
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रिमझिम रिमझिम वर्षा ऋतु आए ।
मन के तारों को झंकृत कर गाएं ।।
एक गीत आज सुहाना ।
मौसम बड़ा ही मस्ताना ।।
तन के सारे अंग मुस्काएं ।
रिमझिम रिमझिम वर्षा ऋतु आए ।
मन मयूर बन नाच रहा ।
गिरती बूंदों को ताक रहा ।।
आओ मिलकर नाचे गाएं ।
रिमझिम रिमझिम वर्षा ऋतु आए ।।
सखियों का साथ अनूठा ।
तन-मन चंचल हो भीगा ।।
नैना भी चंचल हो आएं ।
रिमझिम रिमझिम वर्षा ऋतु आए ।।
स्वरचित
सुश्री हेमलता शर्मा
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रिमझिम बारिश और पुरानी यादों के पन्ने -
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आज सुबह से रिमझिम बारिश हो रही हैं। मैंने अपनी पुस्तक की अलमारी व्यवस्थित की तो
इस व्यवस्था में मुझे 1980 से लेकर 1992तक की चार डायरियाँ हाथ लग गई।अभी फेसबुक पर पढ़ रही थीं कि एक्टर सुशांत की मौत का राज़ उनकी डायरियाँ खोलेंगी।अपनी
डायरियों को उल्टा -पल्टा कर देखा तो दिमाग सन्न रह गया।
यह वही डायरी है जो अपने दौर में बहुत खास हुआ करती थी।
इनके बिना जिंदगी अधूरी -सी लगती थी।इनके खो जाने का डर किसी खजाने के खो जाने से भला कहाँ कम था और आज इनकी याद भी नहीं है ।
एक समय था जब खाली पोस्टकार्ड अन्तर्देशी
पत्र या स्कूल की खाली कॉपी परअस्त-व्यस्त लिखी पंक्तियों को डायरी मिलने पर व्यवस्थित लिखना एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी और वह डायरी भी खूब माँगी जाती थी ।
अपने ही लिखे को बार- बार देखना- पढ़ना अच्छा लगता था। रिमझिम बारिश में डायरी को सीने पर रखकर लेट जाना ,आसमान की ओर देखना और फिर खुद से ही बात करते- करते गहरे शून्य में खो जाना ,
कितना अच्छा लगता था । सचमुच बहुत अच्छा लगता था ।
वह खुशी वह आनंद वह उमंग आज कहाँ? आज हमारी हँसी- खुशी ,प्रसन्नता हमारा आनंद दूसरों पर निर्भर हो गया है।
जो अपने आनन्द के लिए दूसरों पर निर्भर है ,वह जो चाहे हो पर आनंद नहीं हो सकता।वह चार डायरियाँ अब मेरी टेबल पर है ।
उन्हें देख पढ़ रही हूँ पुरानी जिंदगी को समझ रही हूँ।मेरी
नई डायरी अपने आप को उपेक्षित अनुभव कर रही है।
मेरी भावों की कलम पुराने पन्नों पर फिर कुछ नया लिखने का सोच रही है । रिमझिम बारिश में धरती नूतन हो जाती है, मेरा भी यहीं समय है जो फिर से नूतन हो रहा है। फिर इस रिमझिम बारिश में लेख ,कविता,फैशन शो ,शुभ -संकल्प के ब्लाक आदि के माध्यम से पुनः आनन्द पा रही हूँ और अपनी डायरी में स्थान दे रही हूँ।समय तो परिवर्तित होता है पुराने को सहेजकर नया अपना रही हूँ।
*मीना जैन
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: *बचपन में बारिश की यादें*
बचपन में सुहानी बारिश याद आती है
दिल खुशी से झूम उठता था मिट्टी की सौंधी खुशबू से
रिमझिम रिमझिम बारिश में खुद को भिगोना
बारिश के मौसम में कागज की कश्ती बनाना
सुना है पेड़ों पर बचपन बार बार आता है
खिजां के मौसम में सारे पत्ते झड जाते हैं
सावन के आते ही फिर पेड़ पोधें में बहार आती हैं
*काश आदमी के साथ भी ऐसा होता*.....
बचपन के दिन कितने प्यारे थे दामन में खुशियों के ख़ज़ाने थे
बचपन के दिन लौट आए मै अपने पापा की गोद में खेंलू
छोटे छोटे कंकड़ों को अपनी दौलत बना लूं
बचपन की बारिश में सभी गम धूल जाएं
ऐसी सुहानी बारिश का चाहत है मुझे
पूनम शर्मा
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वर्षा रानी
रिमझिम, रिमझिम बरस रही हो
प्राणों के प्यास बुझा रही हो
नेह लुटाकर वर्षा रानी
धरा के आंचल भीगा रही हो।
हिलोरे मारकर बहे नाला नदी
पल्लवित हो रही है हरियाली
पत्ते , पत्ते डाली, डाली
ले रही है अंगड़ाई ।
*मित्रा शर्मा
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बरखा रानी
जम के बरसी बरखा रानी
मानों बादल के आँचल से फटा पानी
पृथ्वी के सूखे अधरों पर
अमृत सा बन बरसा पानी
तुम हो बरखा सुहानी
तुम ही हो रस की रानी
तुम झूमने का मौका देतीं
नई उमंगों को मन में भरतीं
भीग गये सब गर्मी के मारे
स्वच्छ हुए हैं आज सारे
*मंजिरी पुणताम्बेकर
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कितनी मन-भावन है
लड़ियाँ रिमझिम की
सावन ये सुहावन है
उत्सव है ये बूँदों का
बिजुरी नाच रही
बादल बहका-बहका
साजिश ये हवाओं की
डाल के गलबहियाँ
बन मीत घटाओं की
अमृत के कलश भर-भर
श्याम घटा लाई
अभिषेक है पर्वत पर
बूँदों की थिरकन पर
आली, बावली-सी
गाए मल्हार के स्वर
हरियाली की चूनर
धरती नवेली ने
ओढी है सजधज कर
लो इंद्रधनुष निकला
हुई सतरंगी छटा
आकाश का रूप खिला
मिश्री की डाली कोयल
कूक रही वन में
मोरों ने किया नर्तन
पीपल की शाखों पर
झूला झूल रही
मतवारी हँस-हँस कर
*वंदना दुबे*
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सावन
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रिमझिम बरस रहीं है बूंदें,
आसमान में मेघ हैं छाए।
पीहर की यादें हैं भिगोती,
तीज के साथ जो सावन आए।
भाई को भिजवा दो बाबा ,
राखी वहीं मनाऊंगी मैं ।
आंगन में झूला लगवा दो ,
गीत तीज के गाऊँगी मैं।
खनकेंगी मेरी हरी चूड़ियाँ ,
लाल चुनरिया भी दमकेगी।
बरस हुए हैं सबको देखे ,
आंखों की ज्योति चमकेगी।
अचला गुप्ता
इंदौर
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बारिश
मेरी रागी ताई को पढ़ने का बहुत शौक था उसके इस पढ़ने के शौक के कारण बाबा उसे उसके हर जन्म दिन पर story books उपहार में दिया करते उन्हीं में से एक किताब थी 'the little match girl'पता नहीं जबसे ताई ने यह किताब पढ़ी उसे बारिश के नाम से नफ़रत हो गई ,बारिश के दिनों में वह घर से कम हि निकलती अज्जी,
आई उसे बहुत बोलती "जा बेटा पहली बारिश थोड़ी शरीर पर ले ले, तेरे शरीर का ताप, घमौरियां सब गायब हो जाएंगे"पर नहीं वह कहती"सब झूठ है,पहली बारिश में एसिड होता है वह कहां से अच्छा होगा बताओ तो जरा"अजयजी कहती"हमें तो सालों हो गये पहली बारिश में नहाते हम तो नहीं गले एक इस पर ही एसिड का असर होगा बताओ तो जरा"पर रागी ताई नही मानती तो नहीं मानती एक साल की बात है ,मैं कक्षा छठी में थी और रागी ताई १०वीं में, जून का महीना था बारिश का आगमन होने ही वाला था तभी सूरत से रवि मामा का आना हुआ वे आए उसके दो दिन पहले ही सूरत में घमासान बारिश हुई थी वे जब आए तो अपने साथ २ पेटी लंगड़ा आम और अचार कि कैरियां लेकर आएं ,जब मामा ने पेटी खोली तो खुशी से सबके चेहरे खिल उठे क्योंकि मेरे परिवार को आम बहुत ज्यादा पसंद थे मामा ने फटाफट से २,४आम धोकर काटें और सबको खाने के लिए दिए पर ये क्या जैसे ही रागी ताई आम खाने गयी अज्जी ने उसे रोक दिया बोली"अरे रागी तू मत खा ये आम ये तो पहली बारिश में भीग चुके हैं इसमें एसिड होगा एसिड"अज्जी ने सबको ताकिद दि की खबरदार किसी ने भी रागिनी को आम खाने को दिये रागी ताई तो मन मसोस कर रह गई जैसे जैसे पेटी के आम खत्म होने लगे उसकी जान उपर नीचे होने लगती कि आज तो कोई मुझे देगा आम खाने को पर उसे किसी ने भी नहीं पूछा,२,४ दिन बाद अज्जी अचार के लिए मसाला कुटने लगी और आई ने कैरी काटकर उसपर नमक,हल्दि लगाकर सुखाने रख दी उस कैरी को खाने का मजा ही कुछ और था हमने भी उसके खुब चटखारे लिए,पर यहां भी रागी ताई को मौका हाथ से गवांना पड़ा अज्जी ने उसे कैरी देने से भी मना कर दिया उसे बहुत गुस्सा आ रहा था,२रे ही दिन बारिश ने दस्तक दी वाड़े के सभी बच्चे चिल्लाते हुए अपनी अपनी छत पर पहुंचे भीगने के लिए , बड़े भी कहा हार मानने वाले थे वे भी पहुंच गये छत पर भीगने तभी अज्जी ने मामा और बच्चों के कान में कुछ बात कही, वे सब दौड़ते हुए रागी के पास गये और घबराए हुए स्वर में बोले "रागी ताई जल्दी चल अज्जी को पुरे शरीर पर लाल चकत्ते हो गये है ,वे चिल्ला रही है चल उन्हे नीचे लेकर आना है"रागी ताई बोली"मैं न कहती थी पहली बारिश अच्छी नहीं होती पर मेरी मानता कौन है"इतना कहकर वह छत की ओर दौड़ पड़ी और बाकी सब उसके पीछे-पीछे, जैसे ही वह छत पर पहुंची मामा ने टेपरिकॉर्डर चालू कर दिया जिसमें गाना बज रहा था"घोड़े जैसी चाल हाथी जैसी दुम ओ सावन राजा कहा से आए तुम"और इस गाने पर ठुमके लगा रही थी अज्जी और बाकी सभी बच्चे, तभी सभी ने खींचकर रागी ताई को बीच में किया और चारों तरफ़ से घेर लिया, बारिश भी पूरे जोश में थी पहले तो ताईं गुस्से से आग-बबूला हो गई पर जैसे ही उसने अज्जी को नाचते देखा वह भी उनके कमर में हाथ डाल कर नाचने लगी जबतक बारिश कम नहीं हुई वह भी हमारे साथ भीगती रही, जैसे ही बारिश कम हुई हम सब नीचे आ गये ,फटाफट तैयार होकर आंगन में बैठ गये ,आई ने गरमागरम पकौड़े और चाय बनाई ,अज्जी ने आई को बोला"सुनबाई जा रागी के लिए आम भी काटकर ले आ,और अचार कि कैरि उसे रात को खाने में दे देना"रागी ताई अज्जी के गले लग गई"मेरी प्यारी अज्जी तुने मेरे लिए आम बचा के रखें थे thank you "अज्जी बोली"हां,फिर मुझे तेरे मन का भ्रम जो दूर करना था बोल अब भी बोलेगी पहली बारिश अच्छी नहीं होती"रागी ताई बोली"नहीं मेरी प्यारी अज्जी बारिश में तो जादू होता है जादू"
स्वरचित
स्वाति वाड़गे (वनकर)
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'सारी कसर पूरी हो जाए'
रिम -झिम रिम-झिम आकर ओ फुहारों क्यूँ मुह फेर लिती हो!
बरसो बरखा रानी कहि किसान तो कहिं बच्चे आस लगाए बेठे हैं बरस जाना न तरसाना किसी की महामारी में जमिन दाव पर लगी है तो कहि बाल मन ने इस संकट काल में तुम्हे याद कर कर के जाने कितनी नोकाएँ गढ़ी हैं।
बरस जाओ बरस जाओ रिम झिम रिम झिम से धीरे-धीरे झमा झम तक पहुँच जाना जहाँ जितनी कसर हो तूम सारी पूरी कर जाना।
तन -मन -धन सब नये जोश से भर जाएँ जीतनी कसर बाकी हो सारी पूरी हो जाये।
*निधि गिरी
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हमराज
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जीवन में दो हमराज होते हैं
पहला दोस्त दूसरा साजन
मौसम हजार बदलते रहे,
मेरे यारो मेरे हमराज सारे जहां में दोस्ती सदाबहार बनी रहने दो,🌹🌹 उपवन है प्यार, दुलार स्नेह का, इसे गुलमोहर की तरह गुलज़ार रहने दो🌹 उम्र कितनी भी ढल जाए, यह मस्ती ये हसी ठिठोली जवां बने रहने दो,
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
तेरी हमराज हूं, तेरी दिल की धड़कन हूं, तेरे प्यार की रोशनी हूं, तेरे जीवन का मकसद हूं,🌹🌹
में अधूरी हूं तेरे बिन, मेरे दिल का सकून है तू🌹🌹
में तेरे बिन कुछ भी नहीं, तुम मेरी जान हो, में तेरी हमराज हूं, में तेरी दिल की धड़कन हूं,🌹🌹
हमराज ही दिल का रिश्ता, हमराज से छुपा न कोई दिल का नाता, माता पिता, भाई बहन जन्म के रिश्ते सारे, हमराज न हो तो जिंदगी अवसादों से घिरी हो, में तेरी हमराज हूं तेरी दिल की धड़कन हूं🌹🌹🌹🌹🌹
* सुनीता अग्रवाल इंदौर स्वरचित
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वर्षा,,,,,,
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तपती धूप के बाद पहली बारिश इस तन मन को सुकून देती है 💐मन हर्षाती और मुदित कर देती है 🙏मानसून पावस के आते ही चहुंओर हरियाली छा जाती है👍
बारिश के मौसम में भुट्टे के भजिए खाने का आनंद ही कुछ और है 👍बच्चों का भीगना ,मस्ती करना, मां का चिल्लाना, आनंद की भोर है🌹 कृषक बारिश का इंतजार करते हैं फलों की वृद्धि का आगाज करते हैं💐💐 पहली बारिश इस किसान के लिए खुशी की पोटली है🙏 यह मानसून के मौसम को चिन्हित करती हैं💐
भारत में मानसून का स्वागत खुशी के साथ होता है💐 धूप और उबाऊ मौसम से यह निजात दिलाता है💐💐 बारिश की ठंडी फुहार मनमीत को पुकारे,,, स्वाति पपीहा, कोयल, ठंडी बयार है ,,हर मन को चंचल कर डालें🌹🌹
* सुषमा शुक्ला इंदौर
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बरखा
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ओ बरखा
बरस बरस कर बरसी
सर सर सर कर सरसी
टिप टिप टिप टिप गीत सुनाती
कैसे इतनी लय तान में गाती ।।
कभी फुहार बनकर इतराती
तो कभी छमा छम छम छम आती
जब गिर धरा पर बुलबुले बनाती
तब तुम बच्चों के मन को हर्षाती।।
कभी कभी तड तड तड़पती हो
मां जैसी तम तम तमकती हो
कभी गुस्से में बल खाती हो
कभी खुश होकर लहराती हो।।
कागज़ की वह कश्ती बना कर
खुश होते तेरे पानी में तैरा कर
तुम तो ऐसे ही अच्छी लगती हो
फिर क्यों रोद्ररूप धर हमें डराती हो ।।
गरज गरज कर मेघा गरजे
चमक चमक कर चपला चमके
धड़क धड़क दिल धड़के
रूप तेरा आँखों में चमके।।
टिप टिप करती इन बूंदों से
बनता मेरा भावी पल
तू बरसे तू धरती हरसे
महके मेरा हर दिन हर पल।।
*उषा गुप्ता
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जज्बा
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निकालेंगे नफरत को जेहन से अपने ,
मधुर प्रेम शब्दों की भाषा लिखूंगा ll
मेरी कामयावी मेरे दिल का जज़्बा ,
निराशा के पन्नों पर आशा लिखूंगा ll
बुराई की बातें जमाने होती इसी को ,
भुलाने की जिद हमने ठानी ll
सूरज की किरणों में तम को जलाकर ,
नही मान मानव हताशा लिखूंगा ll
मुझे अपने कुछ भी कहें सब सुनूंगा ,
मगर गैर का में कठिन हूँ विरोधी ll
विनय बेदना में विकलता के चलते ,
सयंम धैर्य अपना धरा सा लिखूंगा ll
अलापों न बेसुर में रागों को राजू ,
सभी स्वर कठिन है लगेंगे न तुमसे ,
बहुत नासमझ तूँ , कसम से तूँ कम है ,
जरा सा है तूँ तो ,जरासा लिखूंगा
*गीतकार कवि राजू चौरसिया इंदौर
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:रिमझीम बरखा
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रिमझीम बरखा
सुनहरे सुप्रभात में
डोले मोरा मनवा
प्रेयसी का पहला
मिलन भीगी जुल्फों तले
रेशमी अहसास
सुकून देती ठंडी
पुरवैय्या संदेश देती
कहती मैं पास ही
रिमझीम बरसो
बस,इतना ही बरसो
आकर,वो न जाए
बादलों की ओट से
रवि भी झांक के खुश है
ऋतु मिलन रिमझीम
* :प्रभा जैन
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: रिमझिम रिमझिम वर्षा
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वर्षा के संग
इंद्रधनुषी रंग
छाया उमंग।
आया सावन
पुलकित अंबर
धरा पावन।
पानी बरसा
रितु मनभावन
मन बहका।
मिट्टी की गंध
नाच उठा मयूर
फैला के पंख।
बरखा आई
गर्म चाय पकौड़ी
सबको भाई।
पानी में तैरी
वो कागज की कश्ती
तेरी ना मेरी।
कृष्ण जनम
हर्षित जन मन
रक्षाबंधन।
बारिश आई
हरियाली है छाई
खुशियां लाई।
हाइकु द्वारा
ये कविता बनाई
स्मिता जैन ने ।
* स्मिता जैन रांची
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सावन की दस्तक
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चातक पपीहे बूंदों को तरसे हैं
काले बादलों की खिड़की से
सावन की दस्तक है
बंजर प्यासी धरा की छाती है
बीज लेकर के झोली में
हल्कू की मुनिया है
सहमे पंछी नीड़ों में दुबके हैं
चूज़ों को बस बहलाते
भिखारी से खड़े हैं
ताल नदी झरने सब ही सूने हैं
उदास कश्ती के कानों में
शहनाई लहरों की गूंजे है
छम छमाछम वर्षा की बूंदें हैं
ओ माही अब घर आजा
हर बूंद की सिफारिश है
*सरला मेहता
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मन भावन ऋतु,
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मन भावन बरखा ऋतु आई,
खुशियों की सौगातें लाई,
चारो ओर मस्ती छाई,
रिम झिम रिम झिम् बारिश आई,
जीवन ने ली अंगड़ाई,
प्रकृति चारो ओर मुस्कुराई,
बगिया ही बगिया महकाई,,
हरियाली की चादर अोड़ाई,
खिलती कलियां इथलाई,
झुलो की कतारें लगाई,
झूम झूम के मन को भाई,
घुमड़ घुमड़ के बदली छाई,
जीवन में उमंगे लाई,
प्यारी बरखा रानी आई।
* नवनीत जैन
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,
पावस ऋतु
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पावस ऋतु का आगमन
पल में परिवर्तित परिवेश
अवनी तल हुआ रसाल
नभ में इन्द्रधनुष विशाल
गरज़ते है बादल गगन में
छाई है चहूं ओर घटाएं
झरती झर झर धाराएं
मोती की लड़ियों सी बूंदे
सूरज चांद भी नभ में
कर रहे मनोरम क्रीड़ाएं
जुगनू भी शान से चमके
प्रहरी बन ये शशी किरणें
नभ शोभा अनोखी होऐं
सीख है आओ मुस्कराऐं
गीले शिकवे यें धूल जाएं
प्रेम से अबगले मिल जाएं
*अमिता मराठे
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बरस री बरस
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लरजती सिमटती
फुहारों में सजती
रिमझिम रिमझिम
धीमे धीमे बरसती।
गौरी ठाड़ी द्वारे, सजन को पुकारें।
सावन के झूले पड़े ,प्रीतम न आये।
रिमझिम रिमझिम, बारिश बरसे।
बदरवा ये बरसे , ह्रदय अकुलाये।
पग पग की आहट, मन की सुगबुगाहट।
माने ना जियरा ,बदरिया बरसती।
लिखी प्रेम पाती ,भेजा संदेशा
मन की बात, सजन सुन न पाये।
पल पल विरहन, मिलन को तरसे।
सखी की ठीठोली, अगन को बढाये।
कानों में कैसी, किसकी फुसफुसाहट।
बिजली भी ,रह रह कर चमकती।
लरजती सिमटती
फुहारों में सजती
रिमझिम रिमझिम
धीमे धीमे बरसती।
*माया बदेका
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||||| सावन||||
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आनंद की अनुभूति से भर कर
पेड़ ॒पौधे भी लहकने व चहकने लगे
मतवाले भँवरे उमंगों से भर कर
झूम ॒झूम प्रेम के गीत गुनगुनाने लगे
अरमानों को झोली में भर कर
तितलियों के दिल भी मचलने लगे
प्यार से फूलों ने की पहुनाईं ।
बिजली चपला का गजरा बांध कर
आकाश भी जोर से गरज रहा
झूम रहे बदरा रिमझिम-रिमझिम बरस कर
मोर वन में खुश नाच रहा
आया मौसम पिया संदेशा ले कर
मन का पत्ता-पत्ता भी हरष रहा
दिलों ने ली एक मीठी अंगड़ाई ।
झूलों ने बतियाँ बनाई हंस ॒हंस कर
ऊंची ॒ऊंची पेंगों का आनंद ले रहे
गोरी की प्यारी सूरत निरख कर
रंगबिरंगी चूड़ियों के स्वर गूंज रहे
नैनों में प्यारे सपने सजा कर
कच् हरा आंचल धरती ने फहराई।
|||| नीति अग्निहोत्री||||
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रिमझिम वर्षा
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रिमझिम रिमझिम पडी़
फुहारें ,
मनवा गायें मधुर तराने ,
जिसमें भरें हो मदभरे,
भाव रे ।
मन मयूरा नचे नभ में
मृदंग बाजे ,
भाव उर में उठे स्वप्न
दृग मे सजे ,
प्रीत पर छाया मधुमास रे
मन मे उमड़ी आस रे ।
भीगा तन भीगा मन ,
बैठ पिया पास रे ,
रिमझिम फुहार पड़ी ,
अंगना मे आज रे ।
* मनोरमा जोशी ।
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(गीत)
बरखा रानी बुंदिया बन,रिमझिम बरसो अँगना रे
धरा पर हरियाली बन,पर्यावरण बचाओ रे - -
हरियाली तेरा ओढ़ना,हरी दूब तेरा बिछौना
गुलमोहर की बहार रे,मंद मँद मुस्काये रे
वेणी सजाकर केशों में,मुझको रिझाती जाए
बरखा - - -
हरियाली की खुशहाली,छाई अँतर्मन में
बरखा की छमछम बुंदिया ,दिखाए अपनापन
चम्पा चमेली जूही,खिलती मुस्काती जाए
बरखा - -
गुलमोहर के झूमर,अमलतास का आंचल
बंसी बजाए कांहा,राधा मुस्काए उपवन
छमछम करके ये,गीत सुना जा रे
बरखा- - -
*डां अंजुल कंसल"कनुप्रिया"
×××××××××××××××××××××××××××××××
1
पावस ऋतु
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रिमझिम रिमझिम बरखा की पड़े हैं फुहार
नैनन से निंदिया रूठी है
बिरहा अगन जगाय------रिमझिम रिमझिम
मोर मोरनी नाच नाच के मेघा को रिझाये
कोयल की मीठी कुहू कुहू से
सबका मन हर्षाए----रिमझिम रिमझिम
टिप टिप करता पानी बहकर बच्चो को ललचाए है
बहते पानी में कागज की
कश्ती लिए चलाए -----रिमझिम रिमझिम
रिमझिम की फुहार जो पड़े खेत धानी लहराने लगे
देख फसल को लहर लहर
उसका मालिक मुसकाय-----रिमझिम रिमझिम
गरज गरज के मेघा बरसे पिया मिलन को मन ये तरसे
शीतल ठंडी चले पुरवाई
पिहू पिहू पपीहा गाय ------रिमझिम रिमझीम
दूर देश बैठें हैं सजनवा आsssss
याद सजन की आज सताये
का करूं जतन , बोल रे सखी
हो जाए दीदार ------ रिमझिम रिमझिम
*शुभा शुक्ला निशा
×××××××××××××××××××××××××××××××
यादे
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पुरानी बचपन कीयादें पानी बाबा आजा ककड़ी भुट्टे लेजा स्कूल जातेथे स्कूल के आगे बेर जामुन भुट्टे इमलीवाली बेढती थीदस पेसे में हम जामुन ख़रीदते थे पानी में जामुन खाने में मज़ा आता थाफिरऐक दिन स्कूल से आतेआते बारीश हुई हम घर आये वबस्ता पट्टीफ़ेक कर उपर छत पर गई भाई बहनो कोआवाज़ दींओरसब हम छत पर रीमझिम बरसात में कूदते कुदते मस्ती करते हुए गाते पानी बाबा आजा ककड़ी भुट्टा लेजा बड़ा मजा आता जब हम ज़ोर ज़ोर सेगाते पानी में नाचते वो बचपन के दिन याद आते हे आज भीयाद हे जब रीम झीम बारसात आती हेक्याबचपन थावो दिन कभी नही भूल सकते हे यह क़हांवत आज भी सबको याद हे की पानी बाबा आजा ककड़ी भुट्टा लेजा !
*किरण जिरेती इन्दोर
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जिंदगी
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जिंदगी एक हसीन ख्वाब है
जिसमें जीने की चाहत होना चाहिए
गम खुद ही खुशी में बदल जाएंगे
सिर्फ मुस्कुराने की आदत होना
चाहिए
पूज्य गुरुदेव को प्रणाम करती हूं सब सखियों की ओर से
कल अवॉर्ड फंक्शन में काफी वीडियो हैउस समय तो कोई भी पूरे नहीं देख पा रहा है पर अभी आराम से देखने में बहुत अच्छा लग रहा है सखियों आपने बहुत बढ़-चढ़कर अवॉर्ड फंक्शन को इंजॉय करा ढेर सारा प्यार स्नेह आप सबकीउमंग उत्साह वास्तव में तारीफ लायक है जिसके लिए मेरे पास कोई शब्द नहींआप सब को ढेर सारी शुभकामनाएं गुरुदेव की ओर से आशीर्वाद
स्नेही किरण ने बहुत सुंदर सुझाव दिया हम सब सखियां मिलकर उस पर चिंतन करेंगे क्योंकि कार्यक्रम तो होते ही रहेंगे आप सब जोर शोर से ऐसे ही भाग लेते रहेंगे प्रोग्राम देख रही हमारी कई सखियां ने कुछ प्राइज अपनी ओर से रखे थे हमारी अतिथि डॉक्टर साधना सोडाणी जिन्होंने 40 से ऊपर उम्र बाली सखियों के लिए 50% कंसेशनदेने का विचार किया है उन्हें प्रोग्राम बहुत पसंद आया पूरा कार्यक्रम उन्होंने देखा वीना जी ने भी कार्यक्रम की सराहना की और उन्होंने दो शब्द कहे
सबको गिला है
बहुत कम मिला है
जरा सोचिए : ...
आप जितना कितने को मिला है
हम सबभाग्यशाली हैं जिन्हें इतने अच्छे सतगुरु मिले जो हमेशा हमारे ऊपर आनंद की वर्षा आशीर्वाद की वर्षा करते रहते हैं
सखियों गुरु पूर्णिमा आने वाली है आप सभी एक एक प्रश्न जो आपके हृदय में आता है सुंदर हो आप गुरुदेव से पूछ सकती हैं वह वह प्रश्न उनके जो वीडियो बनते हैं उसमें आपके नाम से उनका उत्तर गुरुदेव से पूछा जाएगा एक प्रश्न काएक वीडियो बनेगा आप अपना नाम लिखिए उसके नीचे प्रश्न लिखिए मैं सभी के नोट करती जाऊंगी यदि आप का मन है एक से ज्यादा भी पूछ सकती हैं मैं एक वीडियो पोस्ट करती हूं जो नई सखियां हैं उन्हें नहीं मालूम आप इस वीडियो में भाग ले सकती हैं आप सब का स्वागत है जितनी जल्दी भेजेंगे वीडियो इतनी जल्दी बनेंगे
एक सुझाव और है आप सबसे गुरु पूर्णिमा पर्व को हम इतना सुंदर मना सकते हैं आप सभी सुझाव दें जिससे सब मिलकर तैयारी करें
गुरु का महत्व यह पुस्तकशीघ्र प्रकाशित होगी जिसमें आप अपने लिए संस्मरण कहानी कविता गीतभेज सकती इसकी जिम्मेदारी कविता जी शुजालपुर रश्मी जी पचोर के साथ और भी शामिल हो
यह जिम्मेदारी का काम है हम सब को मिलकर करना है
चाय कॉफी पार्टी गुरुवार को 3:00 बजे उस दिन जैसे करना है मैं लिंक भेज दूंगी आप लोग सभी आनाजो पीते हैं चाय कॉफी सामने रखना और हम लोग बातें करेंगे इंजॉय पार्टी रहेगी बहुत मजा आएगा
हे अंधेरे बहुत तुम सितारा बनो
डूबते के लिए तुम किनारा बनो
इस जमाने में है बेसहारा बहुत
तुम सहारे ना लो बस सहारा बनो
* सुनीता सक्सेना
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