Sunday, June 21, 2020

मेरे बाबूजी










           मेरे बाबूजी-
           ------------

मुझे अपने बाबूजी पर गर्व है
उन जैसा पिता भाग्यशाली बच्चों
को मिलते हैं।
हर पल उनकी बातें 
याद भरी मिठास का अहसास है
याद है मुझे 
जब मैं छोटी थी
सब बहनों में सबसे बड़ी थी
फिर भी उनकी लाड़ली रही
साईकिल पर बैठा बाजार ले जाना
साथ बैठा दूध रोटी  खिलाना
सखि के घर पढ़ने जाने 
और आने में देर होने पर
चिंता लिए पीछे है आते
पर टोका टाकी डांट डपट का
स्थान न था 
इम्तिहान के दिन
पेंसिल पेन के साथ
कमपाक्स बाक्स भी
तैयार कर देते
आफिस से छुट्टी लेकर
रूम के बाहर रखी बेंच पर
संतरा अंगूर नींबू पानी
ग्लूकोज सब लिये बैठे रहते 
सब याद है मुझे

शनिवार रविवार की छुट्टी आने पर
जरुरत का सामान लेने शहर जाते
दूरी होने से चाचाजी के घर रात बिता
दूसरे रोज़ वापस आते
हम उनकी बांट जोहते
घर के बाहर बार बार झांकते
जब भी कोई साईकिल पर
दूर झोला टांगें आता दिखाई देता
बाबूजी समझ दौड़ जाते
सब याद है मुझे

परिवार बड़ा और वेतन कम
फिर भी मूंगफली चने
खजूर सिंघाड़े आम जाम
मौसम की हर चीज़
होती थी उनके झोले में
सब याद है मुझे

हम बड़े खर्च भी बढ़े
पर बेटियों का दुलार
न हुआ कमतर
खूब पढ़ाया आत्मनिर्भर बनाया
सब याद है मुझे

दुखी मन पर मजबूरी 
बिदा तो करना था
अब जब भी घर जाती हूं
वहीं बचपन का 
प्यारा सा अहसास पाती हूं
बाबूजी के हाथ का 
बना हलुआ
 सिल की बटी  बटी चटनी
की फरमाइश उनकी 
पचहत्तर की उम्र में भी 
करती रही
समय बीतता गया
साइकल की जगह लूना आ गयी
दो गली छोड़ ससुराल था
पर रास्ता न भटक जांऊ
लूना से छोड़ने जाते
सब याद है मुझे

आज फिर 
शरीर तो यहीं ... पर 
मन अतीत में खो गया 
बाबूजी पर गर्व करते करते
अपने पर गर्व  कर बैठी कि
मैं वह बेटी हूं जिसे 
अपने बाबूजी पर गर्व है
हां मुझे अपने बाबूजी पर गर्व है
कि इस धरती पर
मेरे बाबूजी जैसा कोई  और नहीं।

            कुमुद दुबे
       इन्दौर (म०प्र०)

No comments:

Post a Comment

Featured Post

हिंदी पखवाड़े पर इंदौर संघ लेखिकाओ के पसंदीदा पुस्तकों पर विचार

एक सच्चा रिश्ता एक अच्छी किताब की तराहा होता है,  कितनी भी पुरानी हो जाए, फिर भी शब्द नहीं बदलते, रास्ते बहुत मिलेंगे भटकाने के लिए, लेकिन स...