शीर्षक
पिता
विरासत की जड़ों
संस्कृति
संस्कार के
पल्लवों को संजोए
सहेजे सहलाये
टूटते झरते बिखरते
मूल्यों के बीच
आस्था ,विश्वास
स्नेहिल ऊष्मा का
कवच बन जाये
हमारे पिता है वे
सघन कलुष को तोड़
दीप से दीप जलाए .....।
आंसू ,दुःख दर्द /उलझाव में
कंधे से निराशा हटाये
खड़े है गर्व से पुलकित
चक्रवातों के बीच
चट्टान से अडिग
नगाधिराज बन जाये
हमारे पिता है वे
पुरुषार्थ की कर्म गीता लिख
धरती पर
हरियाली लाए....।
कभी कभी चांदी सी
बहती जलधारा
सरिता सी कलकल
शीतल लहर
भक्ति आराधना की
गुन गुन
धुन के बीच
सुरीली तान बन जाए
हमारे पिता है वे
संवेदना से भरे
सागर छलकाए....।
जननी की सांस
परिवार की आस के
कण कण में समाए
सत्य सा पैनापन
शिव सा तांडव
या
सुंदरम की अनुभूत अभिव्यक्ति
सर्वशक्तिमान परमेश्वर
अल्लाह या ईश्वर के बीच
परम सत्ता बन जाए
हमारे पिता है वे
सृजन के प्रणेता
नमन कर हाथ जुड़ जाएं .....।
डॉ सीमा शाहजी
थांदला जिला झाबुआ
मोबाइल 7987678511
No comments:
Post a Comment