लघुकथा
-----------
--------
राशि चिड़िया के पिंजरे को देख रही थी ,लान के पेड़ पर टंगे पिंजरे के आसपास कुछ चिड़िया आ कर चहक रही थी ,वो उनको देख विभोर हो गई ,कुछ देर बाद वे सब पक्षी उड़ गए ,पिंजरे में केद केवल उसकी लाई चिड़िया रह गई ,लाक डाऊन की केद का अहसास ,पक्षियों का पिंजरे के पास चहचाहने की छवि से यंत्रचलित होकर पिजरे का दरवाजा खोल दिया,कुछ देर तो उसकी लाई प्यारी चिड़िया दुबक कर पिंजरे की छत पर तारों में पंजे फसा कर लटक देखने लगी ,शायद इस आशंका से ,कोई उस पर वार तो नही करे,जब एक तरफ हो कर आरामकुर्सी पर जा कर अपने पंछी को देखने लगी -थोड़ी देर बाद वो पंछी उस पिंजरे से फूर्र--'अरे क्या उस पंछी को मुझसे तनिक भी प्यार नही ,रोज नहलाती-धुलाती ,दना पानी देती ...?खेर पंछी मुक्त होकर खुश होगा यही सोच एक ठडी सास भरकर सोचा चलो-'इस पिंजरे में दाना,पानी ,फल आदिक रख दे ..उस दिन के समान पंछी आ जायेगे...!
रोज पिंजरे को देखती पर कही कोई पंछीं नजर नही आया...
क्या पंछी को दाना ,पानी ,फल की जरुरत नही ....?
किंकर्तव्यविमूढ़ होकर में कभी पिंजरे को और कभी आकाश में उड़ते पंछी को देख हेरान हू,यह लाक डाऊन का असली पर्त मुझे उकसाती है --'क्या पंछी चाहिए या पिंजरा...?
डा सुनीता श्रीवास्तव
इंदौर
9826887380
No comments:
Post a Comment