बाबूजी तुम कहाँ चले गए
मुझे अकेला छोड़ के
नहीं घेरती कभी हताशा
जीवन की उत्कट आशा
अमिट प्रेम की अभिलाषा थे
प्रोत्साहन की परिभाषा
आशीषों के बरगद थे तुम
शीतलता की ठौर थे
बाबूजी तुम कहाँ चले गए---
गीता के विश्लेषण में तुम
कौटिल्य नीति ज्ञान में
ज्योतिष की गणनाओं में तुम
जीवन के संग्राम में
नहीं हारते तुमको देखा
कठिनाई के दौर में
बाबूजी तुम कहाँ चले गए---
विचलित न देखा था तुमको
अधुनातन के शोर में
सबसे आगे तुमको देखा
संस्कारों की दौड़ में
थे आज़ाद खयालों में भी
मर्यादा की डोर में
बाबूजी तुम कहाँ चले गए---
सबसे प्यारी बेटी थी मैं
कंधों पर सो जाती थी
रात कहानी में कट जाती
नए-नए ख्वाब सजाती थी
दीवाली की जगमग में तुम
राखी की उस डोर में
बाबूजी, तुम कहाँ चले गए
जीवन भर का शूल चुभा है
तुमसे मिलने आ न सकी
अंत समय आ ही जाएगा
ये न मैं तो जान सकी
संतोषी मुस्कान अधर पर
दोनों मुट्ठी खोल के
बाबूजी तुम कहाँ चले गए
सारे बंधन तोड़ के
बाबूजी तुम कहाँ चले गए
मुझे अकेला छोड़ के ।
*- वंदना दुबे
धार, मध्य प्रदेश
Its an emotion of every daughter, towards her father! Beautifully put into words. Tears rolled out remembering my father. A great tribute from the daughter to her loving father.
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