जिसका पिता न हो,
उसे पितृ दिवस मनाने का कुछ उपाय है क्या??
शायद उसे उसकी मां,, पिता की मनमोहक कहानियां सुनाती होगी,,,,
सुनने की छुअन ,,
बच्चे के बाल सहलाती होगी,,,वो कल्पना में पिता को हंसता देखता होगा,,
सोचता होगा पिता मेरे होते तो लाते,,
टाफियां,,,मेरे दोस्त के पिता की तरह,,,
ऑफिस से आकर
हांक लगाते होंगे,,,
कहाँ गया बदमाश??? ,,दिख नही रहा,,,?
ऐसा ही कुछ होता मेरे भी साथ,,,
पर पिता होकर भी,,
आते न हों,, जिसके,,
मां जिक्र होने पर,,,,
देखती हो विवश कातर निगाहों से,,,
इतनी कि बच्चे भी सहम जाएं,,,
अपने ही प्रश्न से,,,
मौन ही मौन पसर जाए,,आवाजों,,,का
मां ही तो जानती है,,
मुस्कुराके टालना औ ,,,बन जाना,
तत्क्षण,
धोती और बिंदी में
पिता का नवीन,,रूप
रख देना हांथों पे सिक्के स्नेहसिक्त,,,
जाओ और खालो कुछ मनभावन
लेलो फिर एक बॉल,,
खेलो जी भर के आज,,,
सोचती हूं अभिनय क्या इतना सरल होता है,,,
*माया कौल
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