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शरद ऋतु का आगमन और साइकिल , मोटरसाइकिल और पैदल , कपड़ों का गट्ठर लिए फेरी वालो में मुझे तो कुछ सांठ - गांठ सी लगती है क्योकि सर्दी का मौसम बदलते ही वे भी ओझल हो जातें है ।
ऐसे ही आज मोटरसाइकिल पर
हाथ से बुनी हुई रंग - बिरंगी दरियाँ लिए हुए उस व्यक्ति पर मेरी नज़र पड़ी उत्सुकतावश मैंने उसे रोका ।एक एक कर बड़ी छोटी कई तरह की दरियाँ उसने दिखानी शुरू कर दी , उसने बताया कि वह पुराने कपड़ों जैसे पैंट शर्ट , साड़ी , कुर्ते और दुप्पटे लेकर उनसे धागे निकाल कर कुछ अपने धागे लेकर हाथ और लकड़ी के loom पर उनकी बिनाई करते है ।मैने कुछ पुराने कपड़े उसे दिए और दरियों के दो design पसंद किए।
बातो - बातों में उसने बताया वह उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर का रहने वाला है ।
अचानक उसने पूछा आप हरिद्वार गयी है मेरे ना कहने पर फिर उसने पूछा -- और मथुरा कुछ खीजते हुए ( इससे क्या लेना देना की मैं हरिद्वार और मथुरा गयी हूँ या नही ) मैंने फिर ना कहा अरे आप इन दोनों जगह नही , लगता है घूमने का शौक नही है आपको , कुछ तल्ख़ लहज़े में मैने
जानते हुए भी पूछा , क्यों ऐसा क्या है हरिद्वार और मथुरा में (की मुझे वहाँ जाना ही जाना चाहिए था ) ?
आँखों मे चमक लिए वह बोला ____ हरिद्वार में बहुत से सुंदर मंदिर है , गंगा घाट है और मथुरा तो कृष्ण की नगरी है उसने फिर ज़ोर देकर कहा मुझे वहाँ जरूर एक बार जाना चाहिए , बाहर से भी बहुत से tourist आते हैं वहाँ । मुझे वह फेरीवाले से ज्यादा up tourism का व्यक्ति अधिक लग रहा था ।
उसने एक पर्ची पर सामान के पैसों का हिसाब , फ़ोन नंबर और आखिर ने अपना नाम लिखा --- शफ़ीक़ अहमद
ये एक मुस्लिम होकर मुझे हरिद्वार और मथुरा की महत्ता बता रहा है और मुझे वहाँ घूमने के लिए कह रहा है।
सुखद लगा मुझे पर अचम्भा नही
एक जानी - पहचानी सी अनुभूति हुई , समय के पन्नों को पलटने पर याद आये वो दिन साथ मे पढ़ने वाली वे जिंदादिल लड़कियाँ
वे ममतामयी टीचर्स वे सब ख़ुशगवार अपने से पल
कहाँ कोई फ़र्क था अगर हमारे नाम अलग थे , पूजा करने के स्थान अलग थे , हम अलग धर्म के थे , वे कहतीं --- हाय अल्लाह , हम कहते --- हे भगवान
, लेकिन वह सार्वभौमिक शक्ति का मतलब तो एक ही था दोनों के लिए , कितना सरल , सहज कोई शंका नही, प्रश्न नही ना ही किसी तरह का अविश्वास एक दूसरे पर।
मन ने कहा आज जो मैं tv पर देख रही हूं , सुन रही हूं , पढ़
रही हूं सब बनावटी है
इंसान तो एक ही है एक ही तरह की दुश्वारियां , कमजोरियां जिंदगी जीने की जद्दोजहद इन सब चीजों
के लिए वक्त कहाँ , सोंच कर तसल्ली हुई , शुक्र है ज्यादा कुछ नही बदला ।
*शालिनी रायजदा
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