बहुत याद आते है पापा
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काँधे पर जिसके बचपन बिता
जिसने सम्भाला डगमगाते क़दमों को
चेहरे पर लिए एक विश्वास
घोड़ा, हाथी बनकर पूरे आँगन में घूमना आपका
मेरे खिलखिलाते बचपन को दे गया नई ऊँचाइयों का आभास
गणित के उलझे सवालों को मिनटों में सुलझा कर
भर दिया मुझमे आत्मविश्वास
ऊपर से सख़्त हमेशा पर मोम
सा ह्रदय लिए
बाहों में अपनी समेट कर समझा
हमेशा मुझे अपना अभिमान
सिखाया पाठ मेहनत, लगन व परिश्रम का
बनी मैं तपकर सोना
कर्म बना मेरा जीवन अभ्यास
कभी बने पथ प्रदर्शक
कभी बने छाया घने पेड़ की
कभी बने झोंका ठंडी हवा का
कभी न छूने पाया मुझे अवसाद
शाखाओं को अपनी सींचते, सँवारते
संस्कारों का पाठ पढ़ाते, एक अनकहा, आनबोला रिश्ता बना
हम दोनों में अपने आप
आस तुम्हीं, विश्वास तुम्हीं
स्वाभिमान भी हो तुम मेरे
याद तुम्हारी है एक मीठे सपने समान
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा क्या मैं
जानू, आप ईश्वर समान
जहाँ भर की दौलत भी है इस जग में मेरे लिए कौड़ियों समान
शारदा गुप्ता
इंदौर
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