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प्रकाशक
संकल्प श्रीवास्तव
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सयोजन
चिन्मय श्रीवास्तव
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लेखक/लेखिका
1-प्रभा जैन
2-पूनम शर्मा
3-अचला गुप्ता
5- शालिनी खरे
6-डा आभा माथुर
7- साधना श्रीवास्तव
8-शारदा मिश्रा
9-कविता सक्सेना
10-मनोरमा जोशी
11- चारुमित्रा नागर
12-स्वाति वाड़गे
13-माया कौल
15- मधु वैष्णव मान्य
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प्रभा जैन इंदौर मेरी बचपन की सवारी ,दो पहिये की प्यारी प्यारी लाल लाल फ्रॉक पहन मैं,लाल लाल साईकल पर सवार, माँ कहती है,हो जाते थे, रंग टपकते लाल गाल धूप हो या बारिश,न पेट्रोल की चिंता कोई,छाता ले निकल पड़ती टोली, बाजार हो या कॉलेज पिकनिक करते मस्ती ठिठोली पेंडल मार मार,ऑक्सीजन मिलता भरपूर,प्राकृतिक कसरत कर जम के लगती भूख जेहन में बसी है कॉलेज की यादें,स्लो साइकिलिंग मेमिले थे इनाम में तोहफे,, कितनी सलोनी ये सवारी चाहे बैठे हम दो हमारे दो का परिवार या धूम मस्ती करते सखियों की टोली और यार कितनी सीधी ये सवारी,न कोई लायसेंस,न पेट्रोल,बस फ्री की हवा पंप से भर लो,और थोड़ा सा ग्रीस आधुनिक जनता जाती जिम में साईकल चलाने ,हमतो यूँही 5,7,मील दौड़ लगाते साईकल से,,हो जाती दिन भर की कसरत, पुराने जमाने की बातें ही थी चतुराई भरी,हर बात में थी सेहत भरी मेरी प्यारी साईकल का आज भी मज़ा लेती,जब मिल जाती प्यारी,, दो पहिये की साईकल मेरी बचपन से पचपन तक,बनी रही मेरा जिम और हल्की फुल्की सवारी, कितनी सादी, कितनी सरल,चाहे जहाँ टिका दो हो जाती खड़ी। सुनहरी यादें मैं कभी नहीं भूल सकती, क्योंकि वो मेरे बाबूजी की भी थी बहुत प्यारी साईकल
की सवारी पर वो आफिस जाते,
और पलट पलट कर मुझे चुम्मी दे टाटा करते
स्कूल दिनों में परीक्षा समय,छोड़ के आते और लेने आते,
माँ ने भी तो घर को उठाया ,बचत कर साईकल से जा नॉकरी कर🙏🏻
उनकी ही मेहनत और मितव्ययिता ने उठा दिया हम सबको ऊपर,,,
ऐसी बहुत सी यादें जुड़ी प्यारी,
अनोखी साईकल की सवारी से तभी तो नहीं छोड़ पाती
आज भी वो दो पहिए की सायकल सवारी को
* प्रभा जैन,स्वरचित
👭🏻👩❤️👨🥳🥇👨👨👧👧
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समतल भूमि हो या पथरीली सभी पे चलती है
साइकिल जिंदगी भी दो पहिए पे चलती है
मेहनत ओर सत्कर्मों से जिंदगी के सही
मायने ये साइकिल ने समझा दिए थे हर पेडल से से
कम होती है
दूरी मंजिल को पाने की जब पहली बार
साइकिल से चोट खाई थी मैने...
तभी उसी दिन गिर कर उठना सीख लिया था हिम्मत
और धेर्य का दामन कभी नहीं जीवन में छोड़ना*
*जिंदगी भी दो पहियों के मानिंद है जीवन का संतुलन बनाए रखने के लिए*
*पूनम शर्मा
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मेरी साइकिल, सबसे न्यारी मेरी साइकिल ।
हवा से जो बातें करती है,
सरपट भागे मेरी साइकिल।
सौदा लेने साथ मे जाती ,
*अचला गुप्ता इंदौर
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मेरी प्यारी साइकल प्यारी ,
मेरी सेहत की सवारी,
सबसे अच्छी एक्सरसाइज कराती,
सोशल डिस्टेंसिग का पालन करती घुटनों जोड़ो का दर्द भगाती,
पेट्रोल का खर्च बचाती, पर्यावरण की रक्षा करती, प्रदूषण का स्तर कम करती,
सबका ब्रेन पावर बड़ाती, फिटनेस को बरकरार रखती,,
सबसे सस्ती ,सबसे सुरक्षित, भरोसेमंद है सवारी,,,,,,,,,,,,,,,,,
सभी को बहुत बहुत शुभकामनाए इस दिवस की,,,,,,
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साइकल हैं
शान की सवारी बैठ
इस पर मिलता दिल को शुकुन सेहत बनाती
पल्यूशन का भी रखती ख्याल प्रकृति
इसकी सखी सहेली बच्चों को देती
भरपूर खुशी बड़ों का भी मन खुश हैं
करती शोर शराबा बिल्कुल न करती
* शालिनी खरे भोपाल ✍🏻
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मेरा भविष्य*
(संस्मरण )
मैंने जिस शहर में बचपन व्यतीत किया वहाँ पर उन दिनों इण्टरमीडिएट तक ही विद्यालय थे।आगे की शिक्षा के लिये या तो प्राइवेट विद्यार्थी के तौर पर परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती थी या छात्रावास में रह कर अध्ययन करना होता था । मेरी बड़ी बहनों ने प्राइवेट बी.ए. किया था ,शायद मैं भी वही करती परन्तु हाई स्कूल और इण्टरमीडियेट में मेरे अंक बहुत अच्छे होने के कारण यह निश्चय किया गया कि मुझे किसी संस्था से बी.ए. करवाया जाये ।लखनऊ में मेरी एक बहन रहती थीं अत: लखनऊ में मेरी शिक्षा जारी रखने का निश्चय हुआ । लखनऊ जा कर वि.वि. में प्रवेश तो ले लिया पर बहन के घर से वि.वि. बहुत दूर था । पहले दो किलोमीटर तक रिक्शा से दूरी तय करने के बाद दो बसें बदलनी पड़ती थीं तब जा कर वि.वि. पहुँचा जा सकता था । इस सब में बहुत समय नष्ट होता था अतः साइकिल लेने का निश्चय किया गया । साइकिल चलाना मुझे आता नहीं था ,अत: साइकिल चलाना सीखने को रात का खाना खाने के बाद घर से थोड़ी दूर स्थित एक मंदिर के सामने की सड़क पर मैं ,मेरी बहन और उनके देवर ( जो मेरे साइकिल-गुरु बने ) जाते थे । दिन में वहाँ भीड़ होने के कारण साइकिल सीखना संभव नहीं था । थोड़े प्रयास से वह लोहे का घोड़ा भी वश में आ गया और नई साइकिल भी ख़रीद ली गई ।शायद सीखने के लिये किराये पर साइकिल लाई जाती थी क्यों कि घर में साइकिलें तो दो तीन थीं पर सभी मर्दानी साइकिलें थीं ।वह साइकिल मेरे पास अनेक वर्ष तक रही बी.ए. के बाद बी.एड. मैंने छात्रावास में रह कर किया क्योंकि जीजा जी का स्थानान्तरण हो चुका था और वे अपने परिवार यानि मेरी बहन सहित दूसरे नगर जा चुके थे ,पर साइकिल मेरे पास ही रही और मैं छात्रावास से ही वि.वि. जाती थी ,भले ही दूरी पैदल चलने योग्य थी । बी. एड. के बाद जब मैं अपने घर वापस आने वाली थी तब सीधे साइकिल ले कर स्टेशन पहुँच गई । मुझे इतना तो पता था कि साइकिल बुक करवानी पड़ती है परंतु यह नहीं पता था कि उसका टोकन बना कर ले जाना चाहिये । रेलवे के कर्मचारियों ने ही टोकन बना कर लगाया ।साइकिल बुक करवा कर और टिकट ले कर मैं गाड़ी में बैठ कर अपने नगर आ गई । दूसरे दिन अपने घर से स्टेशन गई ,साइकिल छुड़वाई और साइकिल चला कर अपने घर वापस आ गई । मैं समझती हूँ कि वि.वि. में प्रवेश लेना मेरे लिये बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ क्योंकि वहीं से मेरा दृष्टिकोण विस्तृत हुआ और भविष्य में उच्च शिक्षा के बाद उच्च कैरियर की चाह उत्पन्न हुई ।यह सब किसके सहारे हुआ ? साइकिल के सहारे । साइकिल न होती तो मैं लखनऊ पहुँच कर भी वि.वि. में प्रवेश नहीं ले सकती थी , अधिक से अधिक घर से दो किलोमीटर स्थित गर्ल्स डिग्री कॉलेज में प्रवेश ले कर बी. ए. या शायद बी.एड. भी कर लेती और सन्तुष्ट हो जाती । वि.वि. में प्रवेश ले कर मैंने ऊँचे सपने देखना सीखा । एक बात आजकल के बच्चों को नहीं मालूम होगी कि उन दिनों साइकिल का भी लाइसेंस बनवाना पड़ता था । कुछ वर्ष बाद सेवाकाल में ट्रान्ज़िस्टर ख़रीदा तो उसका भी लाइसेंस बनवाना पड़ा । साइकिल चलाते समय सामने से आने वाले को ध्यान से देखती थी । क्यों ? यह जानने के लिये कि यह किधर से टकरायेगा। शायद ही कोई लड़का या पुरुष हो जो साइकिल लड़ाने की कोशिश न करता हो । उनका काम था कोशिश करना पर मैं कभी उन्हे सफल नहीं होने देती थी । सामने वाला जिस साइड से टकराने की कोशिश करता था , मैं उसके विपरीत दिशा में साइकिल ले जाती थी। कई वर्षों तक मेरे पास रहने के बाद वह साइकिल परिवार की ही एक लड़की को दे दी गई । अथ श्री साइकिल पुराणम् समाप्तम्
*डॉ.आभा माथुर*
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🚲 "मेरी साइकिल " मेरी साइकिल सबसे प्यारी ,
जिसमे करती में सवारी
!
उसके हेंडिल में बांधती रंग बिरंगे फिते
,
ओर पहियो में लगाती रंगीन गुबारे,दुल्हन सी सज कर चलती मेरी साइकिल न्यारी !
मुझे बिठा कर सेर कराती ,स्कूल ओर बाजार घूम आती ,
मुझको बचपन याद दिलाती मेरी साइकिल प्यारी !
कसरत भी मेरी हो जाती ,
जब चलाकर उसको थक जाती
,नहीं भाते मुझे स्कूटी ओर कार क्योंकि
मुझको स्वस्थ बनाती मेरी साइकिल न्यारी !
न इंजन की भक भक,न पेट्रोल की झंझट
,
खर्चे ओर प्रदूषण से मुझ को बचाती मेरी साइकिल प्यारी
सच मुझको बहुत ही भाती मेरी सायकल दुनिया के सब वाहन से न्यारी !
हा मेरी सायकिल प्यारी !
इस कविता की प्रस्तुत कर्ता
"साधना श्रीवास्तव "🙏
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जिसे आगे का डंडा कटवाकर ।
लेडिज सायकल का नाम दिया था, जेन्टस,
🚲 को लेडिज किया था ।
दस साल की उम्र मे, सह न पायी उसका बोझ।
छिल गए घुटने, निकल गया जोश ।
फिर हिम्मत कर, पहले बेलेंस बनाया ।
फिर ✂ फिर 💺 सीट पर बैठ कर, ऐसा अहसास हुआ ,
जैसे हमने आकाश को छुआ ।
पीछे 🚲 पर बैठना, चलती 🚴
से कूदना । कराता था आभास, जैसे हम है खास ।
जब एक हाथ 🙋 छोड़कर, 🚴 ले बाजार जाते ।
अपने आप को , दूसरो से महान पाते ।
वह 🚴 और मेरा, प्यारा सा साथ ।
भूल पाती नही, बालपन का वह सफर आज ।।
, विश्व 🚲सायकिल दिवस पर यादों के झरोखे से
*शारदा मिश्रा
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पैर तो मार रहे पर सांस फूल रहा है।
घंटी बजा कर कुछ दिल को बहला ले,
अवरोध हो तो हैंडल दूजी ओर घुमा ले।
पहिए दोनों साथ चले थाम कर हाथ चले
,
एक हो पंचर तो दूसरा भार सम्हाल चले।
चैन इसकी उतर जाए तो तनिक न घबराये,
बंधन है ये बंधन कभी न टूट पाये।
स्पीड ब्रेकर से घबराकर कही न रुक जाए,
थोड़ा धीमा कर ले न कोई ब्रेक लगाये।
सवारी सायकल की शान की सवारी ,
सीखा देती जीवन की हर जिम्मेदारी।
*कविता सक्सेना शुजालपुर O3-06-2020
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विषय
साईकल दिवस पर
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मे और मेरी साईकल प्यारी , शाही राजा सवारी ।
बच्पन से पच्पन तक की करती सवारी ।
सेहत और सुकून के लियें फायदेमंद है सवारी ।
दो चार पैडल मारो ,पाँव मे नहीं लगता जंग , खुल जाते नसों के बंद ।
बिन पेट्रोल चलती सरपट निराली। मेरी सायकल हल्की फुलकी प्यारी ।
आगे टोकरी मे रखते थे,बसता , कभी मेडम के लिये गुलदस्ता ।
झूमते सहेलियों के संग , घंटी बजाते ट्रिन टिन मस्ती में गाते स्कूल जाते,
पंचर हो जाती घसीट कर लाते ।
रास्ते मे दिखा जाम का पेड़ कच्चे पके तोड़ खाते आहट हुई किसी की भाग जाते ,
कभी धडा़म से गिर जाते ।
पाँव छिल जाते ,माँ से छिपाते , पर फ्राक पर लगा ,लहूँ सबूत मिल जाता ।
साईकल सवारी का बड़ा मजा आता ।
वह दीवानगी शरारत ,याद आती, काश फिर वह दिन लौट आये ।
*🚲मनोरमा जोशी
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शान की सवारी दो पहियों वाली
एक पेडल मे दौड लगाती ब्रेक
लगाने से रुक जाती सबको पसंद
आती हैं मेरी छोटी सी
सायकिल प्यारी
*चारूमित्रा नागर
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"पुकारता चला हूं मैं गली गली बहार की" जब भी यह गाना रेडियो पर बजता सायली अपने बचपन के दिनों में खो जाती बचपन! कितने सुहाने दिन होते हैं न इस उम्र के,उसे याद है वाड़े के बच्चों के साथ खेलते पढ़ते कब दिन निकल जाता पता ही नहीं चलता था उन्हीं सुहाने दिनों में से एक था साईकिल की सवारी यूं तो वाड़े के सभी बच्चे एक दुसरो के खिलौनों से खेलते थे पर उन्हीं दिनों रोहित को उसके आई बाबा ने हिरो साईकिल उपहार में दी बस फिर क्या था बच्चों कि टोली के तो मजे हो गये सभी को एक एक बार सवारी करने का मौका मिला जब सायली की बारी आई तो रोहित ने उसे झिड़क दिया 'अरे! तुम नहीं चला सकती साईकिल, लड़कियां साईकिल नहीं चलाती और यह सुनकर सायली को बहुत गुस्सा आया वह रोते-रोते घर कि और भागी उसका रोना सुनकर आई, रागी ताई ,सवि ताई,अज्जी डर के मारे बाहर आए उनको लगा कहीं गिर तो नहीं गयी, पर जब रोते-रोते उसने पुरी बात बताई तो अज्जी ओर सवि ताई को बहुत गुस्सा आया अज्जी बोली"चल बता कहां चला रहा है वो रोहित साईकिल मैं भी तो देखूं जरा लड़के क्या अलग ढंग से चलाते हैं साईकिल ,सवि ताई भी बोली "हां चल अज्जी मैं भी आती हूं, तुम दोनों पहूचो में ५मिनट में वहां पहूंचती हूं कहकर वह निकल पड़ीं,अज्जी सायली को लेकर रोहीत और बच्चे जहां साईकिल चला रहे थे वहां पहुंचे रोहित हि साईकिल चला रहा था अज्जी ने उसे रोका और कहा "क्यों रे रोहित सायली को क्यों नहीं दे रहा चलाने को? रोहित कि डर के मारे घिघ्घी बंध गई उसने कहा"नहीं नहीं अज्जी में तो मज़ाक कर रहा था अज्जी बोली "ला दे तेरी साईकिल अज्जी ने रोहित से साईकिल ली और ये क्या हूआ ६४ साल की अज्जी खुद साईकिल चलाने लगी वो भी एक दम बेलेंस में,उधर से सवि ताई भी गज्जू काका से किराए की साईकिल चलाते हुए आई उसने पीछे की सीट पर सायली को बिठाया और पूरे मैदान के अज्जी और ताई ने ४ चक्कर लगाएं बच्चों ने बहुत ताली बजाईं फिर साईकिल रोहित को लौटाते हुए अज्जी बोली"क्यों रे रोहित अब बता क्या सच में लड़कियां साईकिल नहीं चला सकती "रोहित का सिर शर्म से झुक गया बोला "नहीं अज्जी sorry लड़कियां तो champion होती है खैर इस बात का एक फायदा जरूर हुआ अज्जी ने तीनों बहनों को दिवाली में उपहार स्वरूप एक साईकिल दी जिसको तीनों बहनों ने कई सालों तक चलाया
* स्वरचित स्वाति वाड़गे (वनकर)
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गोल गोल नित घूम घूम कर
सिर पर वजन लाद तुम चलती
साईकल
बोली चुन्नू मुन्नू जब लड़ते है मेरी खातिर,
,
मेरी थकन तभी उड़ जाती,,,
चुन्नू कहता मेरी है ये मुन्नू कहता मत छूना तुम,,,
नन्हे हाथों से नहलाते बोलो फिर क्या थक जाउंगी??
साईकल साईकल मैं हूं साईकल सबकी प्यारी सबसे न्यारी
* स्वरचित रचना माया कौल
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साइकिल दिवस स्कूल के दिनों की याद आती है बहोत,
ट्रिन ट्रिन ये आवाज मुझे भाती है बहोत
देखो मेरी साइकिल चले कितनी शान से,
बड़े तो बड़े बच्चे भी चला लेते हैं आराम से
अगर पलटे तो चोट लगने की उम्मीदें रहती हैं कम,
अगर बिगड जाये तो कंधे पर भी ले सकते हैं हम
गरीबों का वाहन पर अमीरों की होती शान,
बचपन में सभी बच्चे देते इसको मान
भीड़ भरी सड़कों से ये जाए फट से निकल,
पर्यावरण और सेहत इससे जाये निखर
ऊँचाई पर चढ़ते समय जाए सांस भर,
नीचे उतरते ही चले फर फर
* मंजिरी पुणताम्बेकर
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पगडंडियों पर दौड़ती सरपट साइकिल,
हवा केआंचल में मुस्कुराती
चली साइकिल मद मस्त
बचपन की रूहानी हमसफर ,
पंख लगा कर बेबाक उड़ी है साइकिल।
गुनगुनाती निकली ख्वाहिशों के आसमां से
आज ज़िस्त का हंसी क़िस्सा बनी साईकिल। 🌹
*मधु वैष्णव मान्या 🌹 जोधपुर राजस्थान स्वरचित मौलिक रचना,
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