Sunday, June 21, 2020

लघुकथा

                  लघुकथा
                     ---    
                उसके पिता


       बचपन से उसे अपने पिता से सख्त नफरत थी।उसके पिता पतले-दुबले और चिड़चिड़े स्वभाव के थे।बात-बात पर चिल्लाना-चीखना उनकी आदत थी। वह छोटा था तो बड़े भोलेपन से मां से कहता-" दुनिया में तुम्हें यही आदमी शादी करने को मिला था। मुझे ये पापा पसन्द नहीं है। "यह कर वह रोने लगता। उसकी बुआ उसे बहलाने को कहती ठीक है  तुम्हीं दूसरा पापा ढूंढ कर ले आओ।" यह कहकर बुआ हँस पड़ती। वह शरमाकर  भाग जाता।
     जब  वह कॉलेज पढ़ने के लिए शहर गया  तब  उसके  पिता ने कभी भी उसे फोन नहीं किया न ही वो कभी शहर मिलने गए।पिता के ऐसे व्यवहार से उसे बहुत दुःख होता। वह  मां से कहता-" पिता जी मुझे बिल्कुल प्यार नहीं करते । तभी तो कभी मुझे फोन करते न मिलने आते।" 
        मां  कहती"नहीं बेटा , ऐसा नहीं है ।वो काम  में फंसे रहते हैं ।उन्हें फुर्सत कहाँ है फिर सब तेरे लिए तो करते हैं।वे तुझे बहुत प्यार करते हैं ।रोज तेरे बारे में मुझसे पूछते रहते हैं।" पर उसके मन का विषाद कम नहीं होता।
       आज वह एक बहुत बड़े मल्टीनेशनल कम्पनी में बड़ा अफसर है।उनके इस कम्पनी में विशेष रूप से मातृ पितृ दिवस मनाया जाता है। फादर्स डे पर कम्पनी के हर कर्मचारी को अपने साथ अपने पिता को लेकर आना होता है। कम्पनी का यह नियम  उसे बड़ा विचित्र लगता है।  उसने अपने एक सहकर्मी से कहा-" क्या फालतू का  नियम बनाया कम्पनी वालों ने कि अपने पिता को  साथ लेकर आओ ।जैसे कोई स्कूल हो।"
        सहकर्मी ने कहा-  नहीं यार! यही तो इस कम्पनी की विशेषता है।  कम्पनी का मालिक पितृ भक्त है तभी तो  यहां के दीवारों पर  लिखा है-"मातृ:देवो भव: पितृ देवो भव:। मेरे पिता तो इस दिन का इंतजार करते हैं जब मैं उन्हें इस अवसर पर कोई छोटा-मोटा गिफ्ट देता हूँ तो वे प्रसन्न हो जाते हैं। क्या है पुत्र जब बड़ा हो जाता है तो  पिता बच्चे जैसा बन जाते हैं ।है न यह भी विचित्र बात।" यह कहकर मित्र हंसने लगा।
      यह सुनकर वह सोचने लगा । उसके और उसके पिता में ऐसा सम्बन्ध  तो बिल्कुल नहीं है। यह सोचते  हुए उसे दुःख हुआ।
     घर आकर मां से उसने कहा-" माँ ,कल फादर्स डे है ।पिता जी को मेरे साथ मेरे ऑफिस जाना होगा। कम्पनी का यह नियम है।क्या वो मेरे साथ जाएंगे?"
      मां ने कहा-" हां ,क्यों नहीं ।वो तो तुझसे बात करने का बहाना ढूंढते हैं।तेरे पास आना चाहते हैं पर  तू ही उनसे दूर भागता है।सच वो तुझे बहुत प्यार करते हैं। रही बात उनके रूखे  व्यवहार की।तो वे बचपन से अपने परिवार का बोझ ढोते -ढोते चिड़चिड़े हो गए। अपने बहनों की शादी फिर अपनी बुआओं की शादी ।सारी जिम्मेदारी से उनकी अपनी खुशी दूर हो गई और वे रूखे से हो गए।"यह सब सुनकर पहली बार उसे अपने पिता के प्रति थोड़ी सहानुभूति हुई।
       पिता के साथ आज पहली बार वह कहीं जा रहा था। पिता सहमे हुए से  सिकुड़ कर बैठे थे।उसने  कहा,-" पिताजी ,ठीक से बैठिये न! क्या आप मुझसे डरते हैं?"
      यह सुनकर  उसके पिता ने कहा, हाँ बेटा, अब डरने की बारी मेरी है।
     यह सुनकर अनायास पिता -पुत्र दोनों हँस पड़े। पिता को यों हंसते देखकर उसके मन का सारा विषाद जाता रहा। 
    उसके पिता माइक पर कह रहे थे -"पिता नारियल की  तरह  होता है बाहर से एकदम कठोर  भीतर से कोमल ।  अगर माँ की तरह पिता भी हो जाये तो पुत्र जीवन के अनजाने राह में भटक सकता है। आज मुझे अपने  बेटे पर गर्व है कि वह एक कामयाब इंसान है।"
          यह सुनकर उसकी आँखों से झर-झर अश्रु बहने लगे।
          *   डॉ. शैल चन्द्रा
             रावण भाठा, नगरी
            जिला-धमतरी
            छत्तीसगढ़

No comments:

Post a Comment

Featured Post

हिंदी पखवाड़े पर इंदौर संघ लेखिकाओ के पसंदीदा पुस्तकों पर विचार

एक सच्चा रिश्ता एक अच्छी किताब की तराहा होता है,  कितनी भी पुरानी हो जाए, फिर भी शब्द नहीं बदलते, रास्ते बहुत मिलेंगे भटकाने के लिए, लेकिन स...