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हाथ में न पैसा होता उनके फिर भी कभी ना हारे
जो था पास उनके न्योछाबर कर डारे
धीरे धीरे बोलना सिखा दिया तुमने
पर पर जालिम दुनिया की खातिर लड़ना सीख लिया हमने।
तपती धूप बरसता पानी उन पर असर ना हुआ
हर दुख को उन्होंने बनाकर उड़ा दिया धुआँ
ज्ञान का पाठ पढ़ा का बना दिया हमें अनमोल
क्या दे पायंगे हम बदले में उनका कोई न मोल।
डोली में बैठाकर कर दिया मुझे विदा
संस्कारों पर जो मेरे हमेशा रहते थे फिदा।
ससुराल की डेल्ही पर ढूँढा तेरा प्यार
आज महसूस ये हुआ बीस साल हुए बेकार।
न कोई तुम जैसा मिला ना उनकी कोई आश
पिता की जगह कोई नहीं न ले सका पिता है मेरे खास।।
प्रेरणा सेन्द्रे (इंदौर )
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