Monday, June 1, 2020

बाल साहित्य! e-book




सभी का आभर

          डा सुनीता श्रीवास्तव

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e--book
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बाल -साहित्य 
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शुभसंकल्प समूह 
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अनुक्रमणिका 
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1- स्वाति वाड़गे
2-हेमलता शर्मा 
3-रश्मि सक्सेना 
4-प्रेरणा सेन्द्रे
5-साधना श्रीवास्तव 
6-आशा गर्ग
7-मनोरमा  जोशी
8-सुनीता अग्रवाल
9-प्रभा जैन
10-उषा गुप्ता 
11-सुषमा शुक्ला 
12-अर्चना चौरे
13-वंदना  पुणेताबेकर 
14-डा  चित्रा जैन
15-मधु मान्या
16-मधु टाक 
17-अचला  गुप्ता
18-पूनम शर्मा 
19-डा  सुधा चौहान
22-माधुरी व्यास 
23-मंजिरी  पुणेताँबेकर 
24-ज्योति  प्रतीक
25-कविता  सक्सेना 
26-चारुमित्रा नागर 
27-मीना जैन 
28-शोभा रानी तिवारी 
29-डा  संगीता  पाठक 
30- सु रेन्द्र सिह
31-सरला मेहता 
32-शालिनी  खरे
34-वन्दना दुबे 
35-शालिनी राय जदा
36-अल्पना वाणी 
37-सुषमा दुबे
38-सुरेखा सिसोदिया 
39-मित्रा शर्मा 
40-मीता पंडित 
41-संजय कुमार मालवी
42-शारदा  मिश्रा 
43-डा  अमरजीत कौर 
44- नीति अग्निहोत्री 
45-आभा माथुर 
46-डा  अनुपमा  श्रीवास्तव
47-डा  मंजू  गुप्ता
48-अलका जैन्ं
49  -पूनम शर्मा 
50- चित्रा  जैन
51-स्वाति सिंग 
52 वंदना  अर्गल
53- चेतना भाटी
54- अरुणा खरगोनकर 
55-रश्मि  सक्सेना 
56-अन्जुल कंसल
57-नीना  महाजन
58-प्रमिला  सक्सेना 
59-डा  सीमा जोशी
60-शेल चंद्रा 
61- प्रणीता  सेठिया 
62- सरला मेहता 
63- स्मिता जैन
64 सीमा शिवहरे सुमन
65कुमुद दुबे
66निर्मल सिंघल
67 नवनीत जैन 
68 निशा अतुल्य
69 आभा माथुर 
70 विजय  पाण्डेय 
71 स्वाति वाड़गे
72 विजय चौरे 
73शोभना  नाईक
74 साधना श्रीवास्तव 
75 अलका पाडेय 
76 अमिता मराठे
77 निर्मल सिघल 
78 वंदना दुबे
  
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सम्पादकीय  टीम
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डा सुनीता श्रीवास्तव 
संकल्प श्रीवास्तव 
मानवेन्द्र नारायणि माया 
चिन्मय  श्रीवास्तव  
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नाम: स्वाती वाडगे 
पति का नाम: प्रणय वाड़गे 
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कहानी स्वावंलबी बनो महीने का दूसरा शनिवार था, सायली और रागी ताई की छूट्टी थी,रागी ताई अपने कमरे में मोबाईल पर chatting करने में मस्त थी तभी आई ने उसे आवाज दी "रागी सुन तो जरा,बेटा जा ये गेहूं चक्की पर डाल आ,आटा खत्म हो गया है,जल्दी जा नहीं तो मुझे अज्जी से डांट पड़ जाएगी कि खत्म होने तक क्यो राह देखी,जा मेरी प्यारी बेटी" रागी : क्या आई, मैं और गेहूं पिसवाने, मैं कैसे? आप सवि ताई को क्यो नहीं भेज देती?या तो शाम को बाबा दलवा लाएंगे आई :" सवि ताई कालेज गई हैं और बाबा को आने में देरी होगी तब तक तो यह काम पूरा भी हो जाएगा,चल बेटा,डब्बा में साईकिल पर रखवाने में मदद कर दूंगी" रागी ताई बेमन से उठी और सायली को जो कि गुड़िया से खेल रही थी गुस्से में बोली "जल्दी बड़ी हो जा तुझे भी सब काम करने पड़ेंगे"सायली मुंह पर हाथ रख हंसने लगी आई ने डब्बा साईकिल पर रखवा दिया अब रागी चली चक्की पर उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई कि कहीं आस-पड़ोस वाले उसे देख तो नहीं रहे, देखेंगे तो हंसी उड़ाएंगे कि देखो इसे ये छोटे काम भी करने पड़ते हैं और रीना तो पूरे स्कूल में ये बात फैला देगी वह जल्दी से अपनी गली छोड़ चक्की पर पहूंची वहां उसे एक छोटा लड़का चक्की की साफ-सफाई और एक लड़की झाड़ू लगाते हूए दिखी उसने लड़की को देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ अरे!ये तो उसकी सहपाठीन मीना हैं वो यहां झाड़ू क्यो लगा रहीं हैं स्कूल में तो अच्छी रहती हैं आती भी कभी-कभी कार में है फिर? मीना ने जैसे ही उसे देखा मुस्कराकर गेहूं का डब्बा साईकिल से निकालने में मदद कि और अपने बाबा के पास पिसवाने के लिए दे दिया रागी ने उससे पूछा "अरे! मीना तुम और यहां? मीना : हां रागी ये मेरे बाबा कि ही चक्की हैं छुट्टी वाले दिन में और मेरा भाई बाबा को चक्की पर मदद करने आ जाते हैं रागी: तुम्हें बुरा नहीं लगता कि सब लोग क्या कहेंगे कि चक्की वाले के यहां नौकर होते हुए भी अपने बच्चों से काम करवाते हैं मीना: नहीं, मेरी आई का कहना हैं काम छोटा हो या बड़ा उसको करने में झिझकना या शर्माना नहीं चाहीए हम एक दिन के लिए नौकरों को छुट्टी दे देते हैं और उस दिन का काम हम ही करते हैं रागी यह सुनकर मन ही मन बहुत शर्मिन्दा हुई उसने सोचा कितने अच्छे विचार है मीना और उसके परिवार के उसने एक निर्णय के साथ आटे का डब्बा साईकिल पर रखा और घर कि और चल पड़ी पूरे आत्मविश्वास के साथ उसकी झिझक अब खत्म हो चुकी थी घर पहुंचते ही उसने आटे का डब्बा किचन में रखा और अज्जी के कमरे में पहुंच उनके गले लग गई और उन्हें पूरा किस्सा सुनाया ,अज्जी कि आंखे खुशी से चमक उठी उन्होंने प्यार से रागी ताई के सिर पर हाथ रखा और कहा "वहीं तो मैं तुम्हें हमेशा समझाती हूं बेटा अपना काम आप करो स्वावंलबी बनो गांधी जी भी अपने काम खुद ही करते थे जैसे झाड़ू,बर्तन धोना,खाना बनाना जब उनके जैसा महान व्यक्ति भी अपने काम खुद कर सकता हे तो हमें कैसी झिझक आत्मनिर्भर बनने कि यही शुरूआत है


*स्वाति 

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परिचय

नाम- सुश्री हेमलता शर्मा भोली बैन 
शिक्षा- स्नातकोत्तर जन्मतिथि- 19/12/1977 पता-राजेंद्र नगर,
 इंदौर मध्य प्रदेश पिन कोड 452012 
कार्यक्षेत्र-वर्तमान में लेखिका सहायक संचालक वित्त 
संयुक्त संचालक कोष एवं लेखा इंदौर में द्वितीय श्रेणी राजपत्रित अधिकारी 

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कविता
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*शीर्षक-बच्चे देश की शान* 
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बच्चे हैं घर का उजियारा , 
इनसे रोशन रहता घर सारा । 
बच्चे हैं माता पिता के प्राण , बच्चे ही हैं देश की शान ।। 
 सारा मोहल्ला इनसे कांपे, दिन भर खेलें रात को जागे । 
टॉप करके बढ़ाते परिवार का मान, बच्चे ही हैं देश की शान ।। 
 भविष्य देश का इन पर है टिका, इन्हें दो संस्कारों की शिक्षा । 
 बच्चों से ही बनेगा देश महान, बच्चे ही हैं देश की शान ।।


* हेमलता शर्मा 'भोली बैन' 

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*परिचय* 
 नाम : *रश्मि सक्सैना* शिक्षा : एम. ए. (अर्थशास्त्र) लेखन में गहरी रुचि छंद, ग़ज़ल , गीत , मुक्तक, अतुकांत कविताओं जैसी कई साहित्यिक विधा में पारंगत कविसम्मेलनों में प्रस्तुति देश की जानी मानी कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख , लघुकथा , ग़ज़ल , दोहे प्रकाशित 10 साझा संकलन *दोहा रत्न सम्मान* *ग़ज़ल साम्राज्ञी सम्मान* *साहित्य सृजक सम्मान* *काव्य सुधा सम्मान* *मुक्तक गौरव सम्मान* *नवोदित साहित्यकार सम्मान* *कबीर-तुलसी सम्मान* कई प्रतिष्ठित साहित्य मंचों की सदस्यता साहित्य में कई पुरस्कार
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*बाल कविता* 
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तितली-रानी तितली-रानी उड़ जाती
 हो कहाँ सयानी लाल-गुलाबी ,
 नीले-पीले कितने प्यारे पंख तुम्हारे 
 चंदामामा चंदामामा कहलाते तुम सबके मामा
 आसमान पर क्यों रहते हो
 पास नहीं तुम क्यों आते हो 
 कहाँ हो प्यारी चिड़िया रानी 
लाई हूँ मैं दाना-पानी तिनका 
लाकर नीड़ बनाओ चीं-चीं से घर को 
चहकाओ खड़ी हुई थी पेड़ के नीचे
 बोला मुझसे आँखे मींचे काटोगे जो 
आज को ऐसे फल खाओगे कल को कैसे


 * रश्मि सक्सेना


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परिचय : 
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प्रेरणा सेन्द्रे । एमएससी और बी•एड• (उ.प्र.) तक शिक्षित होकर, वर्तमान में योग शिक्षिका के पद पर कार्यरत । योग विद्या से पारंगत है। लेखन में शौकियाना हैं। श्रेष्ठ लेखन के लिए भोपाल में सामाजिक गतिविधि में थैलीसीमिया एंड चाइल्ड वेलफेयर ग्रुप के लिए कार्यरत, संस्था में संयुक्त सचिव पद पर सेवारत 
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शीर्षक 
"अच्छी सीख" 
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 दीवाली के आते ही चौदह साल का बेटा पटाखे के लिए जिद करता था l इस वर्ष भी वही हुआ पटाके के लिए दीवाली की सुबह मैंने अपने घर के दरवाज़े पर एक गणेश जी की सीनरी टाँगी, जिसे मैंने पन्द्रह साल से संभालकर रखा था, कि नये घर में टाँगूँगी l चूँकि इस बार मेरा नया घर था तो रात को पूजा से निवृत हो बेटा बाहर पटाके जला रहा था l अचानक से बारह गुच्छो का पताका फूटा और चारो ओर फैल गया l एक मेरे घर की पार्किंग मे आया जहाँ मैं, मेरे पति, मेरा बेटा और उसका दोस्त खड़े थे l पताका यहाँ-वहाँ से होता हुआ हम सबको बचाकर सीधे गणेश की सीनरी मे लगा जो तीन टुकड़ो में टूट गयी l थोड़ी देर सब स्तब्ध रहे l बेटा अंदर आकर बहुत रोया और बोला अब कभी पटाके नहीं जलाऊंगा l मैं थोड़ी देर शांत रही फिर बोली जो हुआ सो हुआ l कहा पहले मंदिर में जाकर ईश्वर को धन्यवाद दो कि उन्होंने हम सबको बचाकर मुसीबत अपने ऊपर लें ली l "जाको राखे साईया मार सके ना कोय "l फिर हम सब भूलकर नार्मल हो गए l बेटे के लिए अच्छा सबक बन था l बाल उम्र में घटित कोई भी घटना जीवनभर के लिए एक सीख बन जाती हैं l शायद हादसे से उसके मन में ईश्वर के प्रति आस्था जागृति हुई हो


*प्रेरणा  सेंद्ररे

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परिचय --
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साधना श्रीवास्तव एम .ए.हिन्दी विदिशा लेखन ,गायन में रुचि -
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बाल कविता
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"बालिका की आकांक्षा " ************************* 
--------------- *मुझको नन्हे पंख लगा दो , आसमान को छू लुंगी ,भरकर उम्मीदों की उड़ान अम्बर से मिल आऊंगी ,लेकर चंदा मामा को सब बच्चों को दिखलाऊंगी , नन्ही हुं पर मेरे स्वप्न सब ऊंचे हैं ,तोड़कर तारे झिलमिल सबके जीवन में उजियारा फैलाऊंगी ,कहते हैं सब आसमान में ही तो ईश्वर रहते हैं , बच्चों से वो प्रेम बहुत ही करते हैं ,कहते हैं सब बच्चे मन के सच्चे होते हैं ,इसलिये ईश्वर बच्चों की हर इच्छा पूरी करते हैं ,मुझको भी तो पंख लगा दो उड़ आसमान में जाऊंगी , ईश्वर से सबके जीवन में खुशियां मांग लाऊंगी ,अपने भारत के संस्कार को सदा अपनाऊंगी ,भूलाकर सब भेदभाव , स्नेह का पाठ पढ़ाऊंगी ,अपने भारत का परचम मैं आसमान में लहराऊगी ,भारत को हर युग में मैं विश्व गुरु बनाऊंगी मुझको भी तो पंख लगा दो आसमान में उड़ जाऊंगी "************************* जी हां मै बचपन में ही ऊंचे ख्वाब देखती हूं इसलिए आप सबको बता दू की "छोटा बच्चा जान के न कोई आंख दिखाना ये ,डिबी ,डिबी, डब ,डब ,अकल का कच्चा समझ के न हमको समझाना रे डिबी डिबी डब डब ,ना धिन धिन ना , ना धिन धिन ना नाच नचा देंगे "मेरी स्वरचित कविता में बच्चों के मन की बात के साथ


 *साधना श्रीवास्तव "🙏🏻


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परिचय 
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डा आशा गर्ग समाजसेवी लेखक इंदोर -
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लाडो -
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 1) हँसती गाती आयी लाडो, ठुमक ठुमक मटकती लाडो, आँखें झपकाकर मुँह बनाती, प्यारी प्यारी सबको लाडो || 
 2) राजा बेटा चुन चुन चुन चुन , कहती कहानी सुन सुन सुन , एक राजा की एक थी रानी , दोनों नाचें बस ख़त्म कहानी || 
 3) प्रेम से बोलो नन्हें - मुन्नों , झूठ बुरा है हीरे - पन्नों , गाँधीजी ने यही सिखाया , सच्चाई का पाठ पढ़ाया ||
 4) बच्चों आसमान में उड़ते जाओ , कभी हार से ना घबराओ , सबका हाथ पकड़कर चलते जाओ , मात - पिता का नाम चमकाओ ||
 5) मेरी नानी मेरे लाड़ लड़ाती , मिश्री मलाई मुझे खिलाती , नए - नए नित खेल सिखाती , जब - जब मैं नानी घर आती || 
 6) हवा में जैसे लहराए पतंग , उड़ते पंछी ऊँचे नील गगन , मैं सो जाता नैनों में लेकर , खूब बड़ा बनने के स्वपन || 
 7) कैसी दुनिया रेलमपेल , छुकछुक करती जाती रेल , हम दादी के घर जायँगे , खेतों में पतंग उड़ाएंगे ||



*डा आशा रानी गर्ग 


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 परिचय 
नाम-मनोरमा जोशी इंदौर रुचि ,गायन ,लेखन
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 बालगीत 
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दो भाई
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चुन्नु मुन्नु दोनों भाई , रसगुल्ले पर हुई लड़ाई । 
चुन्नु बोला ,मैं भी लूगा , मुन्नु बोला मे नी दूँगा । 
इतने में मम्मी आई , मम्मी ने दो चपत लगाई । 
ऐसा झगड़ा कभी न करना , दोनों मिलकर प्रेम से रहना । 
हाथी राजा कहां चले, सूंड़ हिलाते कहां चले । 
कान हिलाते कहां चले गन्ना खाते कहां चले ।
 मेरे घर आ जाओ ना । हलुआ पूरी खाओ ना । 
आओ बैठो कुर्सी पर , कुर्सी बोली चर चर चर ।

*मनोरमा जोशी 
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बाल गीत ______ 
चंदा मामा
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चंदा मामा चंदा मामा ,
धरती पर आ जाओ ,
चुन्नी मुन्नी तुम्हें बुलाते आसमान के तारे लाओ🌹 
 मिल जुल कर जुगनू सा खिल जाओ ,,
दूध मलाई हमें खिलाओ। रात की रानी
 चमके तारा झर झरमोती झरते जाओ🌹 
 चिंटू मिंटू तुम्हे बुलाए तुमसे मस्ती करती जाए ,, 
 फूलों की फुलवारी संग तुम झूम झूम कर नचो गाओ।🌹
🌹 चंदू चंदा जल्दी आना, आकर सप्त सुरो में गाना। 
 दूध मलाई हमें खिलाना और कभी ना हमें सताना🌷🌷

 *सुनीता अग्रवाल 

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 👼🥳हम भी अगर बच्चे होते
😀 =
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 हम भी अगर बच्चे होते,
नाम हमारा होता चुन्नू,मुन्नी खाने को मिलती
 टेड़ी जलेबी मीठी मीठी होती रस भरी टेढ़े मेढ़े रास्ते से चल,
पहुंच जाते डग डग भर,,हम भी अगर बच्चे होते,, 
डग डग भर रास्ते पर चलते, गोल गोल से पेड़ पर,चढ़ते जाते,,खट्टी मीठी रसभरी अध पकी कैरी गर्मीके दिनमे,केरी पन्ना पीते गर्मी को दूर भगाते,ठंडा ठंडा दिमाग पाते,,,हम भी अगर बच्चे होते,, छिपम छिपाई,दौड़ लगाई पवम्म पव्वा ,अंटी खिलाई कसरत कर मजबूत बन जाते, एक दूसरे की दोस्ती से,सहायक बन होड़ लगाते हम भी अगर बच्चे होते,, कोरोना के डर के मारे,छुपी हुई है बच्चा पार्टी सारी हरे हरे बाग बागीचे,सुन सपाट पड़े हैं सारे,,लाल गुलाब टांके नही दिखते कोई चाचा नेहरू🌹🌹🌹🙏🏻
 नही गूंज रही कोई किलकारी,नही कोई बच्चों के दादा दादी,, घर मे कैद हो गए सारे,खुली सांस को लेने ताक रहे सारे भाग कोरोना भाग,तू तेरे घर मे जा,मन करता उड़ने को आज़ाद पँछीसा,, 

*प्रभा जैन -

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-शीर्षक - 
"चाँद मामू " 
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 चाँद मामू कहाँ छुप गए हो 
गई घोर अंधेरी रात 


 आ जाओ ना अब आ भी जाओ करो 
हमसे प्यारी प्यारी बात ।। 
 चलो सुनाओ हमें कहानी 


 कैसे तुम घट बढ़ जाते हो 
 क्या तुमने भी माँ का कहना न माना 


इसीलिए ऐसी सजा पाते हो ।। 
 मैं तुमसे करता हूँ वादा माँ 

का कहना मानूँगा अच्छा बेटा
 राजा बेटा बनकर तुम 
जैसे गगन में चमकूँगा ।।

 *उषा गुप्ता 


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 बाल गीत🌹 
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मेरी चिड़िया
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 मेरी चिड़िया तेरी चिड़िया, 
चुन चुन दाना लाई चिड़ियाl 
 मुनिया डाले उसको दाना ,
चिड़िया चुग जाती माना🌹
 कौवा और कोयल आए दोनों आकर शोर मचाए ।
मुनिया रानी को खिजियाए दाना डाले
 धीरे-धीरे दोनों आकर चुगते जाए🌷🌷
 पायल पहन कर मुनिया आए 
सबके दिल को वो लुभाए छम छम करती 
मुनिया रानी सुनती कोयल की मीठी बानी
🌷🌷🌷 🌷🌷 
चिड़िया चुगती दाना पानी 
मुनिया रानी बड़ी सयानी
🌹🌹🌹 

 *सुषमा शुक्ला इंदौर 

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*चिड़िया का संदेश* :
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प्रातः काल की मधुर बेला
 में चिड़ियों ने जब अपना मुंह खोला
 मधुर मधुर चली पुरवाई 
इतराता मस्ताता पत्ता डोला 
 धन्यवाद मानो देते ये सब को 
सुबह-सुबह की बेला जो लाये कहती 
जाती सोते बच्चों से जो जागे वह सब
 पाय सोने से सोना नहीं मिलता काम 
से ही सूर्य निकलता चलो उठो ,
उठाओ बस्ता स्कूल का देखो रास्ता जल्दी 
उठकर कर्म जो करता मीठा फल वही 
है चखता फुदकती चिड़िया देती संदेश 
 उठो जागो बदला परिवेश परिचय 
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 *अर्चना चौरे* 
 सहायक शिक्षिका

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बाल गीत
 (गिल्लू गिलहरी) 
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गिल्लू गिलहरी रोज है,आती। 

कुटूर-कुटूर कर दाना खाती।

 इधर-उधर देख, फिर छुप जाती।

 डाल-डाल पर धूम मचाती। 

देख-देख आँखे मटकाती। 


आँगन में यह रौनक लाती। 

झबरीली ये पूछ नचाती। सुन्दर प्यारी गिल्लू इठलाती। 

बच्चे देख यह खुश हो जाती। दाना खाती, पानी पीती।

 दिन भर वह ना थक पाती। मेहनत करना हमे सिखाती। 


गिल्लू गिलहरी रोज है, आती। 


 * वन्दना पुणतांबेकर 
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पापा की आंखों का तारा...
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पापा की आंखों का तारा 
मैं हूं सबका प्यारा बच्चा 
मां के होठों की मुस्कुराहट 
बात का भोला मन का सच्चा 


मेहनत से हर काम करूंगा 
रोशन होगा परिवार का नाम 
सत्य वचन का पालन करूँगा 
जीवन बन जाएगा आसान


मां पिता और शिक्षक का 
हर क्षण करूंगा सम्मान 
उनके मार्गदर्शन में चलकर 
छू लूंगा विशाल आसमान 


ईश्वर की अनमोल कृति मैं
कभी ना आए मुझमें अहंकार
श्रद्धा व आस्था मन में रखकर 
मानता रहूंगा सदा उपकार 


डॉ चित्रा जैन उज्जैन×



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परिचय
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: नाम- मधु वैष्णव पति का नाम- श्री रमेश वैष्णव शिक्षा- एम.ए.(हिंदी) बीएड. संप्रति- एलआईसी अभिकर्ता साहित्य का क्षेत्र - सम्मान,,, नीरज शब्द शिल्पी सम्मान,, और ढेर सारे सम्मान विभिन्न संस्थाओं द्वारा गद्य (लेख,कहानियां,लघु कथा) पद्य (कविता, गीत गज़ल, मुक्तक,शायरी) कविताएं ,गजलें व लेख विभिन्न अखबारों पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित और रेडियो स्टेशन पर प्रसारित मोबाइल नंबर, 7597194287, पता- 487 A , श्रीराम नगर आरटीओ ऑफिस के पास भदवासिया, जोधपुर (राज.)
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 लॉक डाउन में हम खुशियां ढूंढ लेते हैं,
चलो बंदिशों में कुछ फसाने ढूंढ लेते हैं।
जिद हमारी बरगद सी हो गई,
चलो हकीकत की धरा पर ख्वाब ढूंढ लेते हैं।
ये घोंसले ये परिंदे ये तितलियां,
 चलो चिड़िया की चहचहाहट में गीत ढूंढ लेते हैं
 अंजुरी भर खुशियों का ठिकाना है जिंदगी,
चलो किस्से कहानियों में खुद को ढूंढ लेते हैं।
 उल्लास उमंगों का सावन भी लौटकर आएगा,0
 चलो घर के हर कोने में कुदरत को ढूंढ लेते हैं।
अवनी पर घर वास को सफल बनाएं,
मधु चलो शब्दों में कुछ खजाना ढूंढ लेते है।

 🌹 मधु वैष्णव मान्या 🌹

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परिचय
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नाम-मधु टाक
पूर्व अध्यक्ष -रोटरी क्लब
रुचि-लेखन
इंदौर
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"चन्दामामा"
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 नभ में चमचम चमके तारे
हमकोे लगते प्यारे प्यारे

 अब आ गये चन्दा मामा सब

तारों ने किया प्रणाम प्यारी प्यारी

लगे चाँदनी हम खेलेंगे आँख मिचौनी ढलने लगी

अब रात रानी आने लगी अब निंदिया

रानी भोर उठ भगवान भजेंगे अपने अपने काम

लगेंगे मन लगाकर करें

पढ़ाई करे नहीं हम कभी लड़ाई

 || मधु टाक ||

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नाम - श्रीमती अचला गुप्ता
 शिक्षा - एम. ए. (अर्थशास्त्र ) कार्य - विगत 21 वर्षों से नर्सरी स्कूल का संचालन ।
महिलाओं को न्यूनतम शुल्क में ऐरोबिक्स वर्कआउट का प्रशिक्षण। कोषाध्यक्ष - लॉयनेस इंदौर वेस्ट रुचि - गायन ,लेखन (लघुकथाएं ,कविताएं ) सम्पर्क - 18 / D /B/ S- 4, स्कीम -78 इंदौर मध्यप्रदेश ।
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खिलोनेवाला


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खिलौनेवाला आओ राजू ,

पिंकी ,चुन्नू , दौड़ो गुड़िया ,

गुड्डू ,बाला , लेकर अपने साथ खिलौने ,

आया हूँ मैं खिलौनेवाला।

देखो सिर हिलाती बुढ़िया ,

 दौड़ने को तैयार ये घोड़ा ,

अच्छा ले लो ये बन्दरिया ,

दाम सभी का बिल्कुल थोड़ा।

जाओ जल्दी मां ,दादी से अपनी बातें तुम मनवाओ ।

खत्म खिलौने हो जाएंगे ,

जाओ जल्दी पैसे लाओ। शाम हो रही ,

घर है जाना, मेरे घर है छोटी बिटिया ।

 एक खिलौना उसको दूंगा ,

खिल जाएगी मेरी गुड़िया।


 *अचला गुप्ता इंदौर

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परिचय
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नाम- पूनम शर्मा

अध्यक्ष-लायस वेस्ट क्लब इंदौर


रुचि-समाज सेवा ,लेखन


*एक था बचपन*
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बचपन
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 *बहुत याद आता है वो सुहाना सा बचपन*
*सोचती हूं काश वो बचपन वापिस मिल जाए*
 *शायद हर इंसा की चाहत ऐसी होती है*
*मां के आंचल में खुशियां ही खुशियां मिली बचपन में*
*बचपन में सभी अपनी जिद पापा से पूरी करवाना*
*आज भी याद आता है वो बेवजह घर को सिर पर उठाना*
*फूलों की चाह में नंगे पैर भागना और कांटे लगाना*
*बचपन में मिट्टी से खेलना और घरौंदे बनाना*
*बारिश के मौसम में कागज की नावें ब हाना*
 *बचपन में*दूध ना पीने के हजारों*
*बहाने बनाना*
*मां का भी सभी बहानों को दरकिनार करके पिलाना*
 *बहुत याद आता है वो गुजरा हुआ*बचपन
* *आज भी यादों के झरोखों से झांकता है बचपन*

 *पूनम शर्मा* *

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जीवन परिचय
 नाम डॉ सुधा चौहान राज अब तक 10 पुस्तकें प्रकाशित 50 राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मान। एक पुस्तक बच्चों के कोर्स में सम्मिलित । दो पुस्तकों का इंग्लिश अनुवाद अमेरिका में हुआ। बाल काउंसलर पता r44 महालक्ष्मी नगर 9826030993
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बाल कहानी
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 मित्रता की ताकत
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 शहर से कुछ दूर जंगल में एक पेड़ पर चुनमुन चिड़िया का घोंसला था वह बहुत लंबे समय से उस पेड़ पर रह रही थी उसी पेड़ की दूसरी डाल पर मधुमक्खियों का बसेरा था। रानी मधुमक्खी बहुत मधुर स्वभाव की थी वह अपनी सारी सेना को आदेश दिए रहती थी कि कभी किसी बच्चे को अकारण नुकसान नहीं पहुंचाना है। एक दिन की बात है उस जंगल में कुछ स्काउट के बच्चों ने 8 दिन का कैंप लगाया। उस कैंप में कुछ शैतान बच्चे थे जो जंगल के सौंदर्य खुला वातावरण को देखकर बहुत अधिक उत्साहित से थे वह अकारण ही इधर उधर पत्थर बरसाते, डालियां तोड़ते और पेड़ों पर चढ़कर पक्षियों को पकड़ने का प्रयास करते थे। यह देखकर चुनमुन चिड़िया बहुत परेशान हो गई उसने अभी 2 दिन पहले ही अंडे दिए थे उसे अपने बच्चों की चिंता थी। आज वह पूरे दिन से घोसले से बाहर नहीं निकली थी रानी मधुमक्खी ने उसे इस हाल में देखा तो वह उड़कर उसके पास आई और बहुत प्यार से पूछा__ बहन चुनमुन दीदी आप इतने उदास क्यों हो आज आप दाना चुगने भी नहीं गई हो कोई बात हो तो आप मुझे बताइए । चमोली चुनमुन बोली अरे पिंकी रानी बता कर भी क्या होगा? तुम नन्ही सी जान मेरी समस्या को क्या समझ सकोगी और इन शरारती बच्चों से कोई मेरे अंडे बच्चों की रक्षा नहीं कर सकता अब तो ईश्वर का ही सहारा है। अरे दीदी पूरी बात तो बताइए क्या हुआ रानी मधुमक्खी ने पास आते हुए कहा। चुनमुन बोली__मैं इन बच्चों की वजह से परेशान हूं यह अकारण पत्थर बरसाते हैं पेड़ों पर चढते हैं मुझे डर है कि यह मेरे अंडे तोड़ फोड़ कर फेंक देंगे अभी इनका फेंका एक पत्थर मेरे घोंसले वाली डाली से ही टकरा कर गया है । रानी मधुमक्खी ने कहा _चुनमुन दीदी दे,आप परेशान मत होइए मैं इसका कुछ ना कुछ उपाय करती हूं और वह चली गई। रानी मधुमक्खी ने जाकर अपनी सेना से कहा कि यहां पर जो बच्चों ने कैंप लगाया है उन बच्चों को काटना नहीं है केवल डराना है ताकि वह यहां से कैंप उखाड़ कर कुछ और दूर ले जाएं क्योंकि यहां पर चुनमुन के बच्चों की सुरक्षा का सवाल है इतना सुनकर रानी मधुमक्खी की सारी सेना एक साथ ही जाकर उन बच्चों के कैंप पर मंडराने लगी कभी ,बच्चों के कान के पास से गुजरती ,कभी उनके हाथ पर बैठती और उनके कैंप के अंदर भी घुसकर यहां वहां घूमने लगी। यह देखकर सभी बच्चे परेशान हो गए और डर कर इधर-उधर भागने लगे । तभी स्काउट सर ने कहा_ अरे यहां तो मधुमक्खियों का छत्ता लगा हुआ है ।लगता है हमारे यहां रहने से इन मधुमक्खियों को परेशानी हो रही है इसलिए हमें इस जगह को छोड़कर किसी दूसरी जगह अपना टेंट लगाना चाहिए चलो और यह कहकर वह अपना टेंट उखाड़ने लगे। रानी मधुमक्खी चुनमुन चिड़िया के पास बैठी यह सब देख रही थी। उनका टेंट उखाड़ते देख चुनमुन चिड़िया ने कहा_ धन्यवाद रानी मधुमक्खी तुमने कठिन समय पर मेरी मदद की है मैं तुम्हारा अहसान कभी नहीं भूलूंगी। रानी मधुमक्खी ने कहा_ हम सब आपस में मित्र हैं हम सब को एक दूसरे की मदद करना चाहिए और मिलकर रहना चाहिए तभी हम अचानक आई मुसीबत का सामना कर सकते हैं। मित्रता में बहुत ताकत होती है।


डॉ सुधा चौहान राज इंदौर
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परिचय
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नाम-माया  कौल
मैंने ट्यूशन केसाथ सामाजिक कार्य किया और एक महिला बैंक की प्रेजिडेंट रही 98तक महिला और बच्चों के लिए काम करती हूं हमारा तक्षशिला महिला स्वयं सहायता समूह है जो 1040 छोटे बच्चों के लिए काम करता है, दो आदिवासी गांव में बजी काम करते हूं मैं भूतपूर्व सैनिक मातृशक्ति की मालवा प्रान्त की अध्यक्ष हूं इंदौर रतलाम रेलवे मंडल की सलाहकार समितिकी सदस्य हूं
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कविता
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हविष्यान्न
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 एक दिन हमने अपनी कामवाली से कहा,,,,
एलोवेरा का सेवन और घूमना ,,,
ये तो तुम भी कर सकती हो,,
इसमें तो कोई पैसा भी नही लगता,,
 वो बोली मेडम जिसे आप घूमना कहते,,,,
हो न वो दरअसल भरे पेट का टहलना है,,,
घूमते तो हम है,
चीटियों की तरह इस घर से उस घर निरंतर,,
बिना थके,,,, और एक बात बताऊँ जो आप रूखा बासी फ्रिज
 में रखा हुआ,,, बासी भोजन देती हो
न वो हमारे पेट की जठराग्नि में,,,
हविष्यान्न बन हमारा पालन पोषण करता है,
आजकल आपके पैर बहुत दुखते है,,,
 दबा दूँ क्या,,,,,,?

*माया  कौल


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परिचय
 :- माधुरी व्यास"नवपमा"
2.पति का नाम :- श्री मनीष व्यास पद-
शिक्षिका(25 वर्षो से ) चोइथराम फाउंटेन स्कूल श्री राम तलावली धार रोड (इंदौर) शैक्षणिक योग्यता-डी.एड,बी.एड, एम.फिल(इतिहास),एम.ए.(हिंदी साहित्य) लेखन विधा- कविता,लघुकथा, लेख 🙏🏻💐🙏🏻💐🙏🏻💐🙏🏻💐



"बाल गीत"
👶🏻👧🏻👦🏻👩🏻‍🦰👧🏻👦🏻👶🏻 💐💐💐💐💐💐💐
 सोच के प्रसार से, तीव्रता की धार से,

परीक्षक की भी परीक्षा, लेते हैं ये न्यारे बच्चे।

 बड़े अनोखे प्यारे बच्चे.... नए सवाल के गढ़ने से,

अजीब-अनोखे जवाबों से, शिक्षक के भी शिक्षक,

 होते हैं ये सारे बच्चे। बड़े अनोखे प्यारे बच्चे.....

 अपने अदम्य साहस से, बिना विचारे बढ़ जाने से,

वक़्त को बदलते हैं ये, हालातों के मारे बच्चे।

 बड़े अनोखे प्यारे बच्चे.... गुरू की एक आज्ञा से,

स्वयं की दृढ़ प्रतिज्ञा से, पानी मे भी आग को,

लगा दे ये न्यारे बच्चे।

बड़े अनोखे प्यारे बच्चे....

 मित्रता की पवित्रता से, सद्भाव की शिक्षा से,

 आग में भी बाग को, लगा दे ये निराले बच्चे।

बड़े अनोखे प्यारे बच्चे.....

*माधुरी  व्यास
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परिचय
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 नाम -मंजिरी पुणताम्बेकर
पता -बड़ोदा
मन की बात शीर्षक -अंडडज जीवन में अपनी आजीविका के लिए आज के दौर का मानव अति व्यस्त हो गया है l वह मशीन की तरह काम करने लगा है l पूरा सप्ताह काम करके रविवार को उसे समय मिलता है पर उस दिन वह अपने निजी कामों में व्यस्त रहता है l इस इक्कीस दिन घर में कैद होने का मजा ही कुछ ओर था l मैंने कई बार "प्रकृति के संगीत " के बारे में पढ़ा पर उसे महसूस कभी नहीं किया था l
 इन इक्कीस दिनों में मुझे उसे महसूस करने का मौका मिला l रोज सुबह की तरह आज भी मैं सुबह उठकर अपना  क्यूकि चहुँओर सिर्फ हमारा चहचहाना और चहचहाना ही सुनाई दे रहा हैl
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शुभ  शीर्षक -
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हाथी दादा
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 धम्मक धम्मक हाथी दादा चलता
 धरती का तो दिल है हिलता
 जंगलों में है यह रहता
 देखो कितना विशाल है दिखता
 ज्यादा तर यह घुलमिल रहता
 कभी कभी शेर से डरता पर
जब इसको गुस्सा है आता
 सारा तहस नहस कर जाता
 देखो इसकी लम्बी सूंड जो करती
 मेहनत का काम देखो इसके
बड़े हैं कान जो करते पंखे का काम
 इसकी आँखे छोटी चमकीली
 और होते लम्बे दाँत इसकी होती
छोटी पूँछ देखो इसकी नहीं है मूछ

* मंजिरी पुणताम्बेकर बड़ोदा
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परिचय
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श्रीमती  ज्योती प्रतीक  श्रीवास्तव
 समाजसेवी
कायस्थ समाज- सक्रिय  कार्यकर्ता  अध्यक्ष
भाजपा - कार्यकर्ता
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सरल सरस् बातचीत --
एक सरदार स्कूल पहुंचा। प्रिंसिपल मैडम के सामने कुर्सी डालकर बैठ गया। प्रिंसिपल - क्या आप बच्चे का एडमीशन कराने आये हैं। सरदार - जी प्रिंसिपल - बच्चा कहां है? सरदार - जी बच्चा तो अभी हुआ ही नहीं। प्रिंसिपल - देखिये प्रेगनेंसी के दौरान किसी तरह के एडमीशन की बात नहीं हो सकती। पहले बच्चे को दुनियां में आ जाने दीजिये। सरदार - कैसी प्रेगनेंसी। अभी तो मेरी शादी भी नहीं हुई। प्रिंसिपल 😡 - अरे तो पहले शादी करिये जाकर। फिर आइये। सरदार - जी मैं तो आपके लिये स्कीम लेकर आया हूं। प्रिंसिपल - कैसी स्कीम? सरदार - जी आप मेरी शादी किसी लड़की से करा दें तो मेरे होने वाले हर बच्चे का एडमीशन आपके स्कूल में होगा। प्रिंसिपल 😡 - ये क्या बकवास कर रहे हो! सरदार - जी जब आपकी बतायी दुकान से किताबें मिलती है, ड्रेस मिलती है, जूते मिलते हैं, बैग मिलते है तो आपकी बताई लड़की से शादी क्यों नहीं हो सकती। स्कीम शुरू कीजिये कि हमारी बताई लड़की से शादी करने पर होने वाले बच्चे को शत-प्रतिशत एडमीशन मिलेगा। फिर देखिये शादी में भी कमीशन और सीटें भी house full. *अब प्रिंसिपल मैडम कशमकश में है, सरदार जी की बात सुनकर गुस्सा तो आ रहा है पर स्कीम भी बुरी नहीं लग रही है।*

*ज्योती प्रतीक  श्रीवास्तव

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परिचय
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कविता  सक्सेना
रुचि  लेखन ,गायन
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 इन प्यारी सी मुस्कुराहटों के कर्जदार हो गए,

सुकून देता साथ तुम्हारा तुम तो रब दा किरदार हो गए ।

 तुतलाती हुई शिकायतों पर वारे गए हम,

दादा दादी की आंखों के तारे चाचा के महकते गुलाब हो गए।

 माँ की सुबह दोपहर शाम तुम्ही से,

पापा के सजते संवरते सपने चहकते महकते खुशियो के अरमान हो गए।

 बड़े बन जाओगे बड़ा काम भी करोगे,

बढ़िया इंसान बनो यही दुआ है मेरी हर एक दुआ में

 तुम शामिल हो गए। कविता सक्सेना शुजालपुर


*कविता सक्सेना

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परिचय
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नाम -चारुमित्रा  नागर

इंदौर
वामा ,शुभसंकल्प  समूह  की सक्रिय कार्यकर्ता
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बाल कविता
 पढते जावो पढते जावो ।

 सबसे आगे बढते जावो ।

पढने से ही ज्ञान मिलेगा ।

 गुरु से विद्द्या दान मिलेगा ।

न ए इरादे गढते जावो ।

 सबसे आगे बढते जावो ।

विद्द्या तो बेकार न होती ।

पढे लिखे की हार न होती ।

 आसमान पर चढते जावो ।

 सबसे आगे बढतें जावो ।

 उस दिन जब तुम ज्ञानी होना ।

बच्चों मत अभिमानी होना ।

 अंधकार से लडते जावो ।

 सबसे आगे बढते जावो ।


* चारूमित्रा नागर
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परिचय
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नाम

 मीना दुष्यंत जैन
भोपाल में निवासरत हूँ*। 2)एम.ए.समाजशास्त्र ,हिंदी,संस्कृत,(एम. फ़िल भाषाविज्ञान)बी. एड.वैद्य विशारद 3)शिक्षिका, समाजसेविका,परिचय सम्मेलन आयोजिका,धर्म शिविर संचालिका
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बाल साहित्य

 *मेरे प्रश्न मेरे खिलौने*
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 बेटा खिलौने को न हाथ लगाओ।

 ज़मीन पर न इन्हें अभी गिराओ।

 खेल-खेल में सावधानी अपनाओ।

 लॉकडाउन में बाहर न ले जाओ।

 पापा अब हमें क्यों नहीं घुमाते?

खिलौने से भी क्यों नहीं खिलाते?

 स्कूल अब हम क्यों नहीं जाते?

शिक्षक ऑनलाइन हमें पढ़ाते।

 नानी के घर हमें है जाना।

दादी को भी यहाँ बुलाना।

सारे काम हमसे क्यों छूटे।

 बचपन हमारा यूँ क्यों बीते।

 बेटा कुछ समय की बात है।

जीवन हमारा नहीं उदास है।

दादी-नानी के घर भी जाएंगे।

फिर से जीवन में हम मुस्कुरायेंगे।

* मीना जैन भोपाल
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परिचय
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नाम- शोभा  रानी  तिवारी
कवित्री
इंदौर

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बचपन
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 फूलों सा कोमल है बचपन , उस पर ना अत्याचार करो ,
कच्ची कलियों को खिलने दो , उस पर ना प्रहार करो ।
बच्चों के मुस्कुराहट के आगे, फीका है धन और दौलत ,
 घर की रौनक घर की खुशियां, बच्चों के बदौलत , मस्ती में मस्त रहने दो ,
बचपन का नाम व्यापार करो।
 प्यारी बहना का भाई , मां बाप का राज दुलारा है, मनमोहना ,
कृष्ण -कन्हैया , सबकी आंखों का तारा है, जीवन उनका उद्देश्य पूर्ण हो ,
इस पर सुविचार करो ।
बच्चे दिल की धड़कन है, बच्चे देश की शान है,
 जिस घर में बच्चे नहीं , वह घर रेगिस्तान है ,

धर्म जाति से ऊपर उठकर, जी भर कर उनको प्यार करो।
 बीत गया सुनहरा पल बचपन का, वह यादगार बन जाएगा ,
गी साथी छूट जाएंगे , बचपन लौट कर ना आएगा,
 बगिया को सींचो स्नेह जल से,
उनका तुम सत्कार करो।

* श्रीमती शोभा रानी तिवारी

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परिचय

नाम- डा  संगीता  पाठक

व्याख्याता 

अहमदाबाद

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सुबह हुई अब आँखे खोलो, कोयल तान सुनाती है,

चिडिया चूँ चूँ गाती है, दीदी तुम्हें जगाती हेै।

 दादी हरि नाम हैं जपती, दादू सैर से वापस लौटे,

माँ झटपट भोजन हैं बनाती उर्मि बूआ हाथ बँटाती

 भैया बॉल और बैट ले आया, छोटू ने सामान जमाया,

पिंटु नाहक दौड़ रहा है, गोलू तितली पकड़ रहा है।

 उठो लाल अब मूँह धोलो, आज के दिन का मारग खोलो

कुछ पढ़लो,कुछ सीखो,खेलो, आलस त्यागो ,खुशियॉ भर लो।

*डाॅ संगीता पाठक


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परिचय
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नाम-सुरेन्द्र सिह राजपूत


🌸 प्यारे बच्चे 🌸

नन्हें मुन्ने प्यारे बच्चे सबकी आँख के तारे बच्चे ।

डांट पड़े तो रूठ जाते प्यार मिले तो खुश हो जाते ।

होते दिल के बड़े ही सच्चे नन्हें मुन्ने प्यारे बच्चे ।

कल के भारत के निर्माता धरती माँ के भाग्य विधाता ।

आगे बढ़ते जायेंगे भारत की शान बढ़ाएंगे ।

होंगे इनके सपने सच्चे नन्हें मुन्ने प्यारे बच्चे ।

तूफानों से नहीं डरेंगे जुल्म के आगे नहीं झुकेंगे ।

वतन की ख़ातिर जिएँ मरेंगे आशीष मिलेंगे

 अच्छे - अच्छे नन्हें मुन्ने प्यारे बच्चे सबकी आँख के तारे बच्चे ।

-*- सुरेन्द्र सिंह राजपूत 'हमसफ़र' देवास मध्यप्रदेश

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परिचय
नाम -सरला मेहता
वामा ,शुभसंकल्प  समहू  सक्रिय  कार्यकर्ता
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भाषा चाहे मातृ भाषा ही या राष्ट्रभाषा,उसका विकास प्रचार प्रसार द्वारा ही किया जा सकता है।

 वैसे देश की सामान्य मातृभाषा को ही यदि राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिले तो उसका विकास सहज हो जाता है।


इस हेतु निम्न बिंदु विचारणीय हैं--- ,,जो भाषा जन्म से ही घर में बोली जाती वही बच्चे की ज़ुबानी हो जाती है।

 जिस भाषा को विकसित किया जाना है,उसे विद्यालय स्तर से ही प्रमुखता दी जाए। उसे प्रथम भाषा माना जाए।

सामान्यतः जो रोजमर्रा के जीवन में अधिक उपयोग आती है ,वह स्वतः ही विकासोन्मुख हो जाती है।
भाषा के प्रचार प्रसार हेतु सरकारी दफ्तरों में प्रमुखता से उपयोग की जाए।

सरकारी आदेशों का प्रसारण भी उसी एक भाषा में हो। ,

मीडिया सन्सथाओं का भी दायित्व है कि देश की प्रथम भाषा को ही प्रोत्साहन दे।

विदेशी भाषाएं ज्ञान वृद्धि हेतु ही सीखी जाए और प्रयोग में लाई जाए।

,,सामान्यतः जनसाधारण द्वारा उपयोग की गई भाषा ही विकास की गति पकड़ लेती है।


*सरला मेहता

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परिचय
नाम  शालिनी खरे

भोपाल

रुचि -लेखन
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"ट्रेन"

 दादी मैं तो ट्रेन बनाऊं

बैठ उसमें बुआ को ले आऊं

 डब्बे इसके नीले पीले और लाल

 नहीं करती बुआ मुझे कॉल

 इसे बना करूंगा मेल फिर खेलूंगा दूसरा खेल

 इसमें बैठ बुआ आ जाएं दादी

भी फिर खुश हो जाएं लॉकडाउन में बंद है

ट्रेन मैं बनाऊं अपनी ट्रेन ।।

* शालिनी खरे भोपाल

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परिचय

नाम  वंदना  दुबे
व्याख्याता
धार  कालेज

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 *विलोपित होता बचपन*

 कितना आनंदित था वो बचपन कैसा था

 वो इनका चुलबुलापन सादगी

के सौन्दर्य से सजा बचपन भोली-सी


मुस्कान लिए बचपन न कोई दिखावा,

न ही कोई बनावटीपन ऐसा न्यारा था

 इनका बचपन अब न खेलते दिखते

 बच्चे गली नुक्कड़ मैदानों में सूनापन-सा भर गया है घर,

 आंगन, चौबारों में पढाई का बोझ कंधों पर लेकर

 डूब गए वो मोबाइल टीवी चैनलों में

 कच्ची बुद्धि मन की सच्ची काश!

मैं होती बच्ची न जाने कहाँ वि,लोपित हो गया

 वो सुन्दर-सा बचपन अब मैं कैसे कहूँ ,काश! मैं भी होती बच्ची

 *वन्दना दुबे(संग्रह)

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बचपन उनींदी आँखों में ओढ़े

-- नाजुक ख़्वाब सा ,

नम हथेलियों से फिसलते रेशमी अहसासों सा ,

 पहली बारिश की बूंदों में नहाई

 सौंधी मिट्टी की महक सा वो उत्फुल्ल बचपन ,

 कभी तितलियों को मुट्ठी में बंद करने को आतुर मन ,

और कभी बुनते सतरंगी सपनें -----

 इंद्रधनुषी धनुकों पर कभी भागता ,
मचलता बादलों संग ,

कभी सवार कागज़ की कश्ती पर ,
गढ़ता महल रेतों के ,

रातों में जगते , चाँद - तारों से टंके

 आसमाँ की चंद्र किरणों में ढूंढना

अक्स अपने सपनों का सभी आशंकाओं ,

 चिंताओं और दुरूहों से परे ----- निर्मल , उज्ज्वल ,

 निःस्पृह अठखेलियां लेता ------

वह बचपन , सच , कितना सच्चा था कितना अपना सा था ।


*शालिनी रा यजादा
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*मेरा सपना*


 एक रात मुझे सपना आया ,

चाचा नेहरू ने मुझे जगाया ,

 बोले बेटा अच्छा पढ़ना ,

 माता पिता की सेवा करना ,

बड़ों के कहने में रहना नाम पिता का उज्जवल करना,

 समाज सेवा को अपनाना देश भक्ति कर नाम कमाना ,

 तुम दुश्मन से लड़ने जाना, कभी मात मत खा कर आना।

 बात मुझे समझ में आई मैं पढ़ने बैठ गया भाई ,

 यह बात मैंने सबको बताई पढ़ने लिखने में ही अच्छाई।।

 *अल्पना वाणी*
 "सुरम्य" 336 बीसी, स्कीम नंबर 140, पिपलियाहाना, इंदौर 452016

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 संजू
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संजू क्लास मे इसी साल आया था । पढ़ने में ठीक ठाक था । क्लास में टीचर के सवालों के जवाब बराबर देता था । बस थोड़ा लिखने में कमजोर था । उसके आने से विराट, अनय और चित्रांश को थोड़ी परेशानी हो गई थी क्यूकी ये तीनों क्लास के टापर्स थे और दिसंबर के क्लास टेस्ट में संजू थर्ड रैंक ले आया था । उसी दिन से इन तीनों ने संजू को गाहे – बगाहे परेशान करना शुरू कर दिया । कभी उसके बैग को देखकर तो कभी उसके बालों में लगे तेल को देखकर तीनों उसका मज़ाक उड़ाने लगे ।संजू क्लास खुद को अकेला महसूस करता था वह एक कोने में बैठकर अकेला ही लंच खाया करता था । एक दिन संजू ने अपना लंच बॉक्स खोल कर खाना खाना शुरू ही किया था कि चित्रांश ने संजू कि रोटी उठा ली और सबको दिखाने लगा वह बासी रोटी लाया था । उसको देखकर सभी बच्चे उसका मज़ाक उड़ाने लगे । संजू की आँखों से टपा टप आँसू गिरने लगे । दरअसल संजू पढ़ाई में बहुत होशियार था लेकिन उसके माता - पिता कि उसे अच्छे स्कूल मे पढ़ाने की हैसियत नहीं थी, लेकिन आर॰टी॰ ई॰ (राइट टू एडुकेशन) स्कीम के अंतर्गत उसका एडमिशन शहर के नामी स्कूल में हो गया था । उस स्कूल में ज़्यादातर बच्चे धनाढ्य वर्ग से आते थे , उन्हे देखकर संजू को खुद के गरीब होने पर शर्म आने लगी थी । उस दिन घर जाकर भी संजू खूब रोया । माँ से कहने लगा मुझे नहीं पढ़ना बड़े स्कूल में मेरा दाखिला पुराने स्कूल में ही करवा दो फिर से। माँ भी सोच में पड़ गई कि क्या किया जाए संजू कि इस समस्या का ?वह कहने लगी तेरे पिताजी को भेजूँगी प्रिन्सिपल से शिकायत करने । तभी संजू के पिता भी घर आ गए, वे ऑटो रिक्शा चला कर घर खर्च चलाते थे, संजू भी सुबह उठकर 2-3 बंगलों में कार धोया करता था ।  संजू के दो छोटे भाई बहन और थे । माँ बेटे कि बातें सुनकर उन्होने संजू को समझाया कि बेटा तू उन लोगो के लिए नया है और अपने पारिवारिक स्थिति को देखकर अन्य बच्चों का ऐसा व्यवहार होना स्वाभाविक है, शिकायत करने से मामला कहीं और न बिगड़ जाए। थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा, बस तू सबसे अच्छा व्यवहार रख । तू अपनी पढ़ाई में मन लगा , अच्छे अवसर जीवन में बार बार नहीं  मिलते । तू अच्छे स्कूल में पढ़ लिख जाएगा तो तेरा भविष्य संवर जाएगा और हमारा भी ।

संजू अगले दिन फिर स्कूल पहुंचा और चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गया । विराट उसे छेडने लगा आज बासी दाल लाया है कि पराठे ? तभी क्लास टीचर आ गए । उन्होने संजू कि तारीफ करते हुये कहा कि –“ तुम थोड़ी और मेहनत कर लो तो क्लास में फ़र्स्ट भी आ सकते हो । बस मन लगा कर मेहनत करते जाओ और कोई समस्या हो तो मुझसे पूछ सकते हो ।“ ये सुनकर विराट, चित्रांश और अनय ने बुरा सा मुंह बना लिया, वे पढ़ाई पर ध्यान न देकर संजू को अपमानित करने के मौके ज्यादा ढूँढने लगे । इधर संजू ने पढ़ाई में ज्यादा मेहनत करना शुरू कर दिया , नतीजतन हाफ इयरली एक्साम्स मे वो सेकंड रेंक पर आ गया । 

इस तरह दिन गुजरते गए वार्षिक परीक्षा का समय नजदीक आता जा रहा था । एक दिन उन तीनों ने संजू को घेर लिया और डराने कि कोशिश करने लगे तभी सामने से क्लास टीचर आ गए उन्हे इस मामले कि थोड़ी बहुत भनक तो थी उस दिन पक्का हो गया कि यये तीनों मिलकर संजू को परेशान करते है। उन्होने तीनों को जम कर डांटा और कहा कि मैं कल ही प्रिन्सिपल से इस बात कि शिकायत करूंगा । तीनों सहम गए कि पता नहीं प्रिन्सिपल सर क्या सजा दे और ये बात घर वालों तक पहुंची तो वहाँ अलग सजा मिलेगी । उन तीनों ने आपस में विचार किया और संजू का घर ढूंढते हुए उसके घर जा पहुंचे, वह एक छोटी सी बस्ती में रहता था । संजू तब अपनी यूनिफ़ार्म धो रहा था ,उन्हें देखकर वह बहुत घबरा गया । विराट ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा सुन दोस्त, ये ले 2000 रुपए और ध्यान रखना तू किसी भी तरह क्लास टीचर को समझा देना कि ये मेटर प्रिन्सिपल तक किसी भी हालत में नहीं जाना चाहिए ,बस इस बात को सम्हालना तेरा काम है । संजू ने 2000 रुपए उठाकर विराट को वापस पकड़ा दिये,और चुपचाप खड़ा हो गया ।  उन्होने उसे 5000 रुपए दिये संजू ने वो भी उसने वापस कर दिये । तीनों फिर घबराए । तभी संजू बोला तुम लोगो ने मुझे दोस्त कहा है , और एक दोस्त का फर्ज है कि अपने दोस्तों कि मुसीबत में मदद करे।तुम लोग निश्चिंत रहो ।तीनों आज खुद को संजू के सामने छोटा महसूस कर रहे थे । 

            प्यारे बच्चो आपकी परीक्षा भी नजदीक ही है । मेहनत और लगन से बड़े बड़े काम बनते है । इधर उधर कि बातों मे ध्यान न लगाकर कुछ दिन बस पढ़ाई पर ध्यान दो , देखो कैसे मेहनत का फल मीठा मिलता है । आपको पूरे नवचेतना परिवार कि ओर से ढेरों शुभकामनाए और आशीर्वाद ।



आपकी दीदी

*सुषमा दुबे 


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बाल साहित्य

शीर्षक-
मातृभूमि
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मातृभूमि को  प्रणाम मैं छोटा सा बच्चा हूँ,
धुन का हरदम पक्का हूँ।
तन अभी है छोटा लेकिन मन का बिलकुल पक्का हूँ।
सपने मेरे बड़े बड़े, पूर्ण करूँगा बिना डरे।
 झटपट मैं बड़ा हो जाऊं सेना में भर्ती हो जाऊं।
रौबदार फिर वर्दी पहनू सीमा पर पहरा दे आऊँ।
दुश्मन के छक्के छुडवादूं पक्का उसको सबक सिखाऊं।
भारत मेरा देश महान इसमें बसते मेरे प्राण।
इस माटी का तिलक लगाकर, तन मन करदूं देश के नाम।
नहीं कहीं अब रुकना है, जग का लीडर बनना है।
प्रण मेरा है अटल महान मातृभूमि है तुझे प्रणाम।

 *सुरेखा सिसौदिया 18 एवरशाइन कालोनी बिचौलि

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आज के बालक
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बालक आज के बालक

तुम कल देश के कर्णधार

भाई चारे के नारे का बनना तुम सूत्रधार।

 यह भारत की माटी को सींचना तुम

पसीने से जय जवान जय किसान

सार्थक करना सलीके से देश के लिए

 देना पड़े बलिदान लहू से तो तुम

हटना नहीं पीछे सरहद पर कुर्बानी से।

 डगमगाना नहीं तुम जैसी परिस्थिति आए संवारना है

मां को मिलकर हाथ बढ़ाए



* मित्रा शर्मा महू

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 माँ  कि  चाह

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परिचय
मीता पंडित
व्याख्याता ,इंदोर
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प्रिय प्रणय मेरी उँगली पकड़कर चलने वाला
 मेरा सुपर कंप्यूटर अब मेरे कंधे पर हाथ रख मेरे संग चलने लगा है।
पैसों का हिसाब रखने लगा है। आज तुम पूरे 18 साल के हो गए हो ।
 एक समझदार जिम्मेदार नागरिक की कैटेगरी में आ गए हो। बड़े हो गए हो ,
 एक नए और कठिन जीवन की शुरुआत कर चुके हो।
 आज भी जब तुम्हारे स्कूल की बस घर के सामने से निकलती है
 तो मैं उसे देखने चली ही जाती हूँ।
 तो कभी एलबम खोलकर तुम्हारे बचपन की यादें समेट लेती हूँ।
 चाहती हूँ कि तुम भी अपने बचपन का एक सिरा कस कर थामे रखो।
 तुम्हारी मुस्कुराहट , खिलखिलाकर हँसना,
जिद्द करना इनको अपनी समझदारी के अंदर न छुपाना।
खुश रहना । जानते ही हो ये कि तुम और तुम्हारी खुशी
सब से ज़्यादा कीमती है तुम्हारी माँ लिए तुम्हारी माँ



*मीता  पंडित


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*🌸ये गुलशन फिर खिल खिलायेगा*🌸
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 बाल रचना ये जहाँ ये गुलशन फिर खिलखलायेगा,

 हर बच्चा बाग बगीचे ओर स्कूल जायेगा,
हर कली हर फूल मुस्करायेगा,
चहु ओर बुल बुलो सी खुश्बू फैलायेगा,
 तुम तो हो फूलों की नाजुक कली,
बनकर होंठो की हँसी खूब चह चहायेगा ।
 तुम्हे देखकर प्यारी सी गोरैया भी फुदक रही,
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान फूल सी खिल रही ,
जब नन्हे मुन्ने ख़ुशी से शोर करेगे,
एक दूसरे से मिलकर मौज मस्ती करेगे ।
 शिक्षक गण अपने बच्चो को देखने तरस रहे है,
पालक गण भी इस पल का इंतजार कर रहे है ,
आओ प्यारे नन्हे मुन्ने आओ,
तुम्हारा स्वागत करू वंदन करू,
ये दिन तुमने बड़े शाँति से घर में बिताए,
तुम्हारा ह्र्दय से अभिनन्दन करू , अभिनन्दन करू ।


🌹🌹🌹🌹🙏🌹🌹🌹🌹
*संजय कुमार मालवी(आदर्श)* 

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बा×××××ल ×××गीत
शेर और  चूहा
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 शेर और चूहा बच्चों सुन लो एक कहानी ,
यो हँस करके बोली नानी।
ताकत पर तुम गर्व न करना, काम सोच समझ कर करना।
सुई का काम सुई ही करती,
तलवारों को पीछे करती।
एक जंगल का राजा शेर, पशुओं को खाए करे न देर।
 छोटी सी चुहिया पंजे में आई, ची ची कर के जान बचाई।
 काम तुम्हारे आऊंगी, वचन कहा जो निभाऊंगी।
अहंकार ने ली अंगड़ाई, शेर ने चुहिया को डांट पिलाई।
शेर की शक्ति नहीं समझती, काम आओगी बात जो करती।
 एक दिन शिकारी जंगल में आया, सोए शेर पर जाल बिछाया।
 शेर दहाडा रोया चिल्लाया, काम उसके कोई ना आया।
तभी अचानक चुहिया आई, जाल काट शेर की जान बचाई।
कहानी देती शिक्षा है, बुद्धि से होती हल कठिन परीक्षा है।।


* शारदा मिश्रा 1601 डी सुदामा नगर इंदौर

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बाल-गीत

विषय-मेरा प्यारा खिलौना मेरी प्यारी गुडि़या
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हेलो डाक्टर अंकल जी, बोल रही में डिम्पल जी ।

मेरी गुडिया है बीमार, जल्दी आओ ले के कार ।

 कल वह ठंड़े पानी में, चार घंटे नहाई थी ।

मना किया था सौ बार , फिर भी बाज ना आई थी ।

 जल्दी-जल्दी चलाओ कार, दूर करो उस का बुखार ।

फिर वह ख़ुश हो जाएगी, ख़ुश हो के वह गाएगी ।

 गाएगी और नाचेगी, छ्म-छ्मा-छ्म-छ्म ।

छ्मा-छ्म-छ्म, छ्मा -छ्म-छ्म....।


 @डॉ. अमरजीत कौर दिल्ली


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चांद की अभिलाषा
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अकेले रहते रहते चांद हो रहा था बोर
वह चाहता था पृथ्वी सी हलचल भीड़ ॒
भाड और मनुष्यों का हो शोर।
इतने मे देखा कि पृथ्वी से कुछ यात्री अंतरिक्ष यान में बैठ कर चले हैं सैर ॒
सपाटा करने को चांद की ओर।
चांद बडा प्रसन्न हुआ कि बोरियत मिटेगी उसका नाच उठा मन का मोर।
यात्रियों से बतियाने का मौका ढूंढ कर चांद ने बताई मन की बात
 कि एकाकीपन से वह हो गया बोर। चांद अब चाहता है
पृथ्वी सी भीड़ बातों की आवाजें सुनाई पड़े कानों में और पृथ्वी सा मचे हर समय शोर।
तब यात्रियों ने बताया चांद को पृथ्वी पर तो प्रदूषण ही प्रदूषण है
 शांति से नहीं रहने का अब ठौर। वाहनों का धुआं ही धुआं है
 फैला जीवन वहां का अब आसान नही है कान बहरे कर रहा
 आवाजों का प्रदूषण यही वातावरण है चारों ओर।
अभी लाक डाउन में परिवर्तन हुआ हवा स्वच्छ हो चली है वाहनों का
 धुआं नहीं नदियां स्वच्छ बह रहीं निर्मल हो कर ।
 जब लाक डाउन खुला है तो फिर वही प्रदूषण का हो
जाएगा बोलबाला लौट आएंगे वही पुराने मंजर ।
यह सुन चांद का मन बुझ गया सोचा वह ऐसे ही बहुत मजे में है
मिट गया उसकी इच्छाओं का जोर। 

*नीति अग्निहोत्री

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 चिड़िया का श्रृंगार        
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      (बाल कवि××××××ता )

चिड़िया का मेकअप
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 चिड़िया ने लिपस्टिक लगाई

 सब चोंच लाल कर डाली साड़ी पहनी

चप्पल पहनी ऊँची एड़ी  वाली

घूमघाम मेले से लौटी थक कर हो गई चूर

 साड़ी फेंकी चप्पल पटकी

उड़ी गगन में दूर अंशु

*डा  आभा माथुर
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"बातों का स्वाद"*
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 तुम्हारी बातों का स्वाद, अच्छा लगता है।

 दुआओं में हों आप आबाद, अच्छा लगता है।

 आपके अहसास से संवरे हालात, अच्छा लगता है।

 लफ़्जों में कहे बिना, दिल से दिल तक पहुंचे जज़्बात,

अच्छा लगता है।


 आपकी ख़ुश्बुओ से महके ख़या

अच्छा लगता है।

 बारिशें और भींगी-भींगी ख़्वाहिशें, अच्छा लगता है।

 फिसलना, और आपके साथ संभलना ,अच्छा लगता है।

 हमेशा बने रहे ये हालात ,अच्छा लगता है

 धड़कन के साज़ पर ,नगमों की आवाज़,अच्छा लगता है।

 बनती रहे यूँ ही कुछ बात ,अच्छा लगता है।


*अनुपमा श्रीवास्तव अनुश्री


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सूरज चाचा से बतियाती रोज सुबह उठ ,
 बिटिया जब , सूरज से है ,खुलकर बतियाती ।
 चाचा ! नभ पर , जब आते , प्राची में है , लाली अति छाती ।
 गोल लाल मुख , सुंदूरी मेरे मन को , है खूब लुभाता ।
 उदित नवजात , शैशव तब , आसमान पर , कुछ पल रह पाता ।
 तभी तुम्हें मैं , बाँहों में , भर , चूम - चूम , फिर गले लगाती ।
 परियोंवाले , लोक घूम , धरा -चाँद की , कहानी सुनाती ।
 खुद तप जलकर, , किसान की , हरियाली बन , कभी न कुछ लेते।
 प्रकृति पाल के , नदी , पेड़ , संचालित कर , जगजीवन देते।
 तेज , शक्ति भर , कुदरत में , सब प्राणी का , आलस्य भगाते ।
 खगगण कलरव ,करते तब , नया जोश तुम , उनमें भर जाते ।
 मोबाइल पर , देर तलक , जो रहें और , देर रात जागें ।
 उदित सूर्य पर , जो न उठे , स्वास्थ उसी का , जीवन से भागे ।
 नयी आस का , नयी प्रात , बनकर जग में ,
 प्रकाश तुम लाते पाठ ताजगी , परिश्रम का , अनुशासन का , ' मंजू ' सिखलाते।

*डॉ मंजु गुप्ता वाशी , नवी मुंबई 

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 किताबे
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दो किताब बांच लो बचपन मे फिर उम्र भर चैन से रहो यारो चार किताब देख लो प्रवीण हो चार लोगों में इज्जत पाओ सदैव कठीन हालात में हिम्मत रहे सदा घबराकर कभी ना भागे मानव संघर्ष करें जीत कर लोटे हरदम डिग्री है साथ मानव का डर भागे दोलत लुट सकती मगर ज्ञान नही कुछ किताबें समझ हुनरमंद होता कुछ पढ़ मनोरंजन करते आलमी ओरत व्यजंन भी बना लेती ओलाद खा कर खुश रहते मां मां पुकारा करे अक्षर अखबार में छपे करें बुध्दी विकास किताब पढ़ बने हकीम इंजीनियरिंग विकास की राह पे दोडे सरपट देश मंदिर मस्जिद की भीड़ गर वाचनालय की ओर दिशा करें तो बेहतर जिंदगी हर नागरिक को मिले देश भारत में कह गये बाबा सिहेब अंबेडकर हमारे विधा पर सबसे अधिक समय पैसा लगाओ जिवन उजियारा बनाना दोस्त अंधकार दूर भगाएं ज्योति के साथ रहे अमर जो होना चाहे विधा आदत बनाये जो दो अक्षर पढ़ने की लत लगा लें यारो वो कभी अकेला नहीं कभी रहे जिवन में हालात ऐसे नहीं पढ़ सकें पोड शिक्षा कर वो उम्र ना देखे अक्षर सिखे सुनो जमीन जायदाद हो फिर भी किताब में मन लगे औलाद का माहौल ऐसा हो शिक्षा दान करूंगा मे वादा करें खुद से सरकार का नारा स्कूल चले हम सब सहयोग करें शिक्षा बड़े तभी देश बढ़ेगा आवाज उठ रिसर्च पे जादा पैसा खर्च करें सरकार बुलंद करो आवाज यारो सटीक जानकारी दैती किताब हम तुम को सेहत यातायात सफाई सब का हल किताब किताब किताब सबसे बेहतर किताब

 *अलका जैन 

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*बाल साहित्य*


        * कहानी का शीर्षक*-*उत्सव
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मां ने कहा बेटा जल्दी सो जाओ कल तुम्हारे दादाजी गांव से आने वाले हैं यह सुनते ही वो खुशी के मारे उछल पड़ा, 
वह हमारे साथ कितने दिनों तक रहेंगे मम्मी
बोली बेटा एक दो महीने के लगभग.....

आज सुबह से उत्सव बहुत खुश था क्योंकि दादाजी के आने से उसको अच्छी अच्छी कहानी किस्से सुनने को जो मिलेंगे
पापा जैसे ही स्टेशन से दादाजी को घर लेकर आए उत्सव खुशी के मारे उनकी गोद में च ढ गया,ये देखकर उसकी मम्मी ने कहा बेटा पहले दादाजी को हाथ मुंह धोकर नाश्ता कर लेने दो......
यह सुनते ही वो रोने लगा जब उसके पापा ने समझाया तो कहने लगा मम्मी मुझको हमेशा डांटती रहती हैं...पापा ने कहा मम्मी ने सही बात कही है तुमको डांटा नहीं है यह सुनते ही वो और जोर से रोने लगा.....
जब दादाजी ने प्यार से समझाया तो वो चुप होकर उनके पास आकर कहने लगा दादाजी आज मेरे स्कूल में  अभिभावक बैठक है आप मेरे साथ चलिएगा.....
तभी बहू बोली पिताजी आप चले जाएगा क्योंकि हम दोनों में से किसी एक को ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ेगी.....
दादाजी उत्सव के साथ स्कूल जाने को तैयार हो गए,जब वो स्कूल पहुंचे तो उत्सव की शिक्षिका ने शिकायतों की झड़ी लगा दी....उत्सव स्कूल समय पर नहीं आता है और गृह कार्य नहीं करता है कक्षा में भी इसका ध्यान पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता है
यह सुनकर दादाजी को बहुत दुख और गुस्सा आया......पर वह उत्सव से कुछ नहीं बोले...
रात में जब खाना खाकर अपने कक्ष में सोने जा रहे थे तो उन्होंने देखा उत्सव टीवी पर कार्टून सीरीज देखने में व्यस्त है, रसोई के काम से निवृत होकर उसकी मां ने अपनी पसंद के नाटक लगा दिए ,उत्सव अपनी मम्मी के साथ वहीं सब देखने लगा...
थोड़ी देर बाद उसके पापा आए उन्होंने अपने पसंद के अनुसार लगा दिया.....
रात के बारह बजे तक उत्सव जगता रहा फिर बहुत कहने पर सोने के गया...
दूसरे दिन दादाजी सुबह जल्दी उठकर अपने नित्य कर्म से निवृत्त होकर सुबह घूमकर लौटे तो देखा...सभी लोग सोए हुए हैं..... जब वो लोग सोकर उठे तो दादाजी ने कहा आज रात को उत्सव मेरे पास सोएगा
रात में दादाजी के साथ  सोने के लिए उत्सव आया तो दादाजी ने कहा बेटा तुम  
स्कूल का होमवर्क क्यों नहीं  करते हो वह बोला दादू  मुझको को समय ही नहीं मिलता है,
सुबह जल्दी जल्दी उठकर स्कूल जाता हूं 
वहां से आते ही खाना खाकर ट्यूशन चले जाता हूं,रात में टीवी देखकर सो जाता हूं
अब आप बताओ में क्या करूं दादू....??
दादाजी ने रात में धुव्र, श्रवण कुमार की कहानी सुनाई ओर कहा अब जल्दी से 
सो जाओ सुबह मै तुमको बगीचे में घुमने चलेंगे.....यह सुनते ही वो बहुत खुश हुआ 
और जल्दी से सो गया,
जल्दी  से सोने के कारण नींद पूरी हो गई थी
वह एक आवाज में उठ गया ,नित्य कर्म से निवृत्त होकर वो दोनों घूमने के लिए चले गए,उत्सव ने बगीचे में सुंदर पक्षी ओर फूलों से लदे वृक्ष देखे और बतख ,चिड़िया देखकर वो बहुत खुश हुआ....इतना खुश उसको पहली बार देखा था
घर आते ही दोनों ने नाश्ता किया और उत्सव  होम वर्क करने के लिए बैठ गया..
दादाजी जब गांव जाने लगे तो उन्होंने बहू 
बेटे को अपने पास बुलाया  और कहा बच्चो को संस्कारित करने के लिए पहले खुद को संस्कारित होना पड़ता है,मा बाप ये बात भुल जाते हैं और बच्चों से  आशा करते हैं कि वो संस्कार वान बने, 


*पूनम शर्मा
इंदौर


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पापा की आंखों का तारा...
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पापा की आंखों का तारा 
मैं हूं सबका प्यारा बच्चा 
मां के होठों की मुस्कुराहट 
बात का भोला मन का सच्चा 


मेहनत से हर काम करूंगा 
रोशन होगा परिवार का नाम 
सत्य वचन का पालन करूँगा 
जीवन बन जाएगा आसान


मां पिता और शिक्षक का 
हर क्षण करूंगा सम्मान 
उनके मार्गदर्शन में चलकर 
छू लूंगा विशाल आसमान 


ईश्वर की अनमोल कृति मैं
कभी ना आए मुझमें अहंकार
श्रद्धा व आस्था मन में रखकर 
मानता रहूंगा सदा उपकार 

*डॉ चित्रा जैन उज्जैन


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   जल संरक्षण
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जल बिन है सब सून
अब तो मनवा गुन

जल की बूंदो से ही जीवन 
इसे बचाओ मेरे  प्रियजन

जल बिना कितना हो रहा हल्ला।
साथी नल को न छोडो़ खुल्ला।।

जल की वृध्दि तभी होगी ।
वृक्षों की जब समृध्दि होगी।।

    जल ही है जीवो का  त्राण।
     रखे सुरक्षित हमारे प्राण ।
 
सुनो साथियो हम सुरक्षित
      तभी रहेगें।
    जल का जब संग्रहण करेगें।।

         *    वन्दना अर्गल 
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*स्वीकार्य*
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प्रतीक के अलग व्यवहार के कारण कक्षा में उसे सब चिढ़ाते। खासतौर पर आयुष और उसके दोस्त। पर तब भी वह कक्षा में अपनी गलत-सलत अंग्रेज़ी के साथ प्रश्न करने से कभी नहीं झिझकता। और अपने काम में व्यस्त रहता।
कॉलेज में भी उसे इसी तरह की स्थिति का अक्सर सामना करना पड़ता। पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी बीच उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई और वह ट्रेनिंग के लिए चला गया। एक बार रेल में यात्रा करते वक़्त उसे एक लड़का मिला। हमउम्र होने के कारण दोनों में बातें शुरू हो गईं। काफी समय के बाद बातों बातों में प्रतीक ने बताया कि वह आर्मी ऑफिसर है। लड़के ने भी बहुत उत्साहित होकर प्रतीक को बताया कि वह भी दो बार साक्षात्कार में रह गया। उसने प्रतीक से कहा जाते-जाते मुझे कुछ सलाह दे दो कि मैं कैसे तैयारी करूं। प्रतीक ने कहा तीन बातें जरूर याद रखना - हमेशा केंद्रित रहो और अपनी बात रखने में कभी संकोच मत करो और हां अगर कोई हंसी उड़ाए, तो उसे मन ही मन धन्यवाद दो क्योंकि उसी के कारण तुम अपनी गलतियां सुधार पाओगे।आई9 ट्रेन से उतरते हुए उस लड़के से हांथ मिलाते हुए प्रतीक बोला ' तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद आयुष।'



*डॉ. स्वाति सिंह


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: नन्हे की पाठशाला
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सुबह के 5:00 बजते ही मम्मी उनको उठाती है,
क्योंकि ठीक 6:30 बजे उनके स्कूल की बस आ जाती है।
विडंबना देखिए जरा इन नन्हे नौनिहालों की,
रोते हुए यह जातीऔर सोते हुए घर आती है।
वह जब स्कूल को जाते हैं तो पापा सोए रहते हैं,
और पापा जब घर आते तो बच्चे सोए मिलते हैं।
बड़ी मुश्किल से संडे को एक छुट्टी का दिन आता है,
उसमें भी स्कूल का प्रोजेक्ट उनकी जान खाता है।
बच्चों के वजन से ज्यादा तो बस्ते का बोझ होता है,
इन भारी-भरकम किताबों में फिर उनका बचपन होता है।
कहां फुर्सत के सुन पाए दादी नानी के किस्से वो,
ड्राइंग पेंटिंग और सिंगिंग की क्लास में जाना होता है।
बच्चों से ज्यादा तो मां को पढ़ाई की चिंता होती है,
ना खुद चैन से जीती और ना बच्चों को जीने देती है।
99% से तो एक भी कम मंजूर नहीं,
क्या दे रहे हम बच्चों को यह हम को भी मालूम नहीं।
तो आइए हम इस प्रतियोगिता के इस भूत को भगाए ।
नई पीढ़ी को डिप्रेशन के राक्षस से बचाए।।




*स्मिता जैन रांची
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                                                  मेरा टफी     
                                                 ----------            

मेरा प्यारा टफी
छोटा - सा
नन्हा - सा
बच्चा है अभी

काले - सुनहले
बाल हैं उसके
ऊँचे - लंबे
कान हैं उसके
और झबरिली पूँछ
कौन ?

पूछ - पूछ - पूछ
मेरा प्यारा
पपी - पपी - पपी 
और कौन !

उछल - उछल कर 
तितली पकड़ता 
गिलहरियों के 
पीछे दौड़ाता कभी
पकड़ाई में आती
ना गिलहरी
ना ही तितली
एक भी

छोटा - सा नन्हा
बच्चा है अभी
कुत्ता ना कहना 
उसे कभी

ये तो है मेरा
प्यारा टफी
छोटा - सा
नन्हा बच्चा 
है अभी 

*चेतना भाटी


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बाल कविता
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मैं पौधों को देती पानी
===

फूलों पर थी तितली रानी

तितली से मैंने पूछा--

"रंग -बिरंगे पंख तुम्हारे

कोमल प्यारे पंख तुम्हारे

बोलो कहाँ से लाई हो?"

"नदिया से?रंगभरे हौज से

क्या नहाकर आयी हो?

पंखों पर सुंदर नक्काशी

क्या मेंहन्दी वाली से  बनवाई?

कोई माँडने या रंगोली में

सैर किसीने करवाई?"

तितली बोली-"सुन मेरी बहना

मेरे पंख मेरा गहना

फूलों की संगत में रहती

उनसे ही उपहार मिला है

जैसे पंखों में फूल खिला है

मेरी खुशियाँ मेरा उल्लास

पंखों पर नक्काशी खास।
        *********

*अरुणा खरगोनकर.
        इंदौर.

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ढेर सारी छुट्टियां
         बोरियत भरी पाएंगे !

 बाहर जाने वाले
         घर में बंद हो जाएंगे 

 मौज मस्ती का दोस्ताना
        कहीं बिछड़ा पाएंगे

 चेहरे की मुस्कुराहट
          मास्क से ढकी पाएंगे!

 शुद्ध हवा प्रकृति की
         पर सांस ले न  पाएंगे !

 आइसक्रीम कुल्फी उफ्फ ये गर्मी
               लेकिन खा नहींपायेगे

 पास जो है हमारे
        गले लगा ना पाएंगे

 सोचा ना था कभी
         ऐसी दिन भी आएंगे

 हर तरफ प्रदूषण मुक्त हवा
 पर कहीं घूमना पाएंगे

 केक मिठाई चॉकलेट
    सब को तरस जायेंगे

 हे ईश्वर ऐसा होगा
.      सोच ना पाएंगे

*रश्मि सक्सैना 👏👏

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आम ही आम
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आम का पेड़ झूम झूम जाए
उसमें  फल   लागे  ढे़र  सारे
चुन्नू मुन्नू  आम   को   ताकते
हैप्पी-लकी गिनती करते जाते।

टिब्बू बोला- एक  दो  तीन  चार
गब्बू बोला- पाँच छह सात आठ
मारा    पत्थर    गिर   गए    दस
मिनी  परी  चीखीं अब करो बस
चुनिया - मुनिया आईं  दौड़  कर
बराबर   आम    मिले    गिनकर।

दस    बच्चे    आए     दौड़    के
दस   आम   गिरे   पेड़   पर   से
बोलो  बच्चों ,कितने बच्चे  आए?
सबको  कितने  आम मिल पाए?
थोडा़ दिमाग लगाओ और बताओ
कितने  आम  सबको  मिल  पाए?

*डां अँजुल कंसल"कनुप्रिया"

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स्वच्छता
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इस धरती 
इस वातावरण को 
         शुद्ध बनाए….

    आओ मिलकर सब
स्वच्छता अभियान चलाएं... 

स्वच्छता है ज्वलंत समस्या 
 मिलकर संकल्प उठाना है
 इस गंदगी को 
       हमें जड़ से मिटाना है
 सपना यही है बस अपना 
    स्वच्छता को अपनाना है 
  भारत को स्वच्छ बनाना है…. 

साफ हो
 हर घर , गली , पार्क , चौराहा
 इन सब को हम सुंदर बनाएं 

कूड़ा फेंके कूड़ेदान में 
    इधर-उधर ना ढेर लगाएं… 
सुलभ शौचालय बनवाएं 
       और गंदगी दूर भगाएं 
प्लास्टिक का मोह त्याग  कर
      गंदगी मुक्त शहर बनाएं
 नदियों का सफाई अभियान चला
 विश्व पटल पर स्वच्छ भारत चमकाएं….

 जागृत करें हम सबको 
शपथ लें स्वच्छता की भाई
  फिर ना होगा कोई रोग
   ना ही चाहिए होगी दवाई... 

आओ नया परिवेश बनाएं 
  देश का पर्यावरण बचाएं…. 

सिर्फ... 
       स्वच्छ भारत पखवाड़ा ना मनाए 
                  सब मिलकर हाथ बटाएं 

सफाई अभियान को रखना 
            हर दिन बरकरार है 
स्वच्छता ही उन्नति का द्वार है... 

हमारे कंधों पर निर्भर है 
सफलता इस अभियान की 
         लेते हैं हम यह प्रण 
गांव शहर को रखेंगे स्वच्छ... 

स्वच्छ होगा भारत सारा 
   स्वस्थ होगा देश सारा 


* नीना महाजन ' नीर 


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*’’बच्चों के संग बच्चे बन जाएँ’’*
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हम भी थोड़ी मौज मनाएँ 
बच्चों के संग बच्चे बन जाएँ।

छुपा-छिपी और धूम धड़ाका, 
इसको खींचा उसको काटा। 
गुड़्ड़ा-गुड़िया रोटी-पानी 
बोलो भाई कितना कितना पानी।

रंग-बिरंगे कपडे पहने 
उल्टी-सीधी चप्पल पहने 
तुतला कर हम बात करें। 
दिन भर मां के साथ फिरें।

मुर्गा बन कर बाँग लगाएँ
घोड़ा बन कर दौड़ लगाएँ।
रंग-बिरंगी खट्टी-मीठी
ढेर-ढेर टॉफी ले आएँ। 

दादाजी का चश्मा लेकर  
दादी जी की बिन्दी लगाएँ ।
एक हाथ में चाक पकड़कर 
स्कूल की टीचर बन जाएँ।
 
थोड़ा रूठें, फिर मान जाएँ
बच्चों के संग बच्चे बन जाएँ।

* - श्रीमती प्रमिला सक्सेना, ब्यावरा*

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* कन्धे मजबूत बनाना है 
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खुद से खुद का वादा है 
अपनी ज़मीन बनाना है 
नन्ही बांहे फैलाकर अब 
आसमान को उठाना है
कंधे मजबूत बनाना है ।

माँ की सीख 
पिता का रस्ता 
हाथ में होगा 
अपना बस्ता 
लिए पद चिन्ह बनाना है 
कंधे मजबूत बनाना है ।

क्या ज़माना देगा हमको
हम सहारा देंगे सबको 
शिक्षा दीक्षा ले गुरूजन से
अपना व्यक्तित्व बनाना है 
कंधे मजबूत बनाना है ।

चीख चीख कर कहते हैं हम 
अपने संस्कार न छोड़ेगें हम 
जम जाएंगे पांव हमारे 
अपना जहान बनाना है 
कंधे मजबूत बनाना है ।

खुद से खुद का वादा है 
अपनी ज़मीन बनाना है ।


-**सीमा जोशी
उज्जैन म प्र 
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लघुकथा
                  वर्तमान की पीड़ा
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     श्याम बाबू जैसे ही दफ्तर जाने के लिए तैयार हुए कि उनके सामने उनका बेटा आकर खड़ा हो गया।
         बेटे को सामने देख श्याम बाबू ने सोचा ,या तो बेटा चेक में साइन कराने आया होगा या फिर ब्लेंक चेक की मांग करेगा,लेकिन आशा के विपरीत बेटे ने कहा,"पापा, अपनी सेहत का भी ध्यान रखा कीजिये। देखिये,आज आप सारी रात खांसते रहे।अच्छा होगा कि आप आज दफ्तर न जाएँ।"
        तभी बहु  पानी का बॉटल लिए हुए आई और ससुर को देते हुए बोली,"लीजिये बाबू जी आज गर्म पानी ही  पिएंगे ।खांसी  में राहत मिलेगी।हाँ,अब आप वी.आर.एस.( स्वेच्छिक सेवा  निवृति) क्यों नहीं ले लेते? 
        यह सुनकर श्याम बाबू ने कहा,"नहीं बेटा, जब तक हाँथ-पांव चलेंगे तब तक काम नहीं  छोडूंगा और फिर घर में बैठ कर तो और बीमार हो  जाऊंगा।अभी घर में पैसों की भी तो जरूरत है।"
        बहु ने अतिरिक्त प्रेम दिखाते हुए कहा, पैसे तो आपके रिटायरमेन्ट के बाद भी आ जायेंगे ।अभी तो आपको आराम की जरूरत है।"
        यह सुनकर श्याम बाबू खुश हो गए  कि बेटे-बहु को उनकी परवाह है।उन्होंने बहु से कहा,"ठीक है , तुम लोग कह रहे हो तो आज ही दफ्तर जाकर वी आर एस की कार्यवाही पूरी करवाता हूँ।" यह कहते हुए वे दफ्तर चले गए।
         शाम को वे दफ्तर से घर प्रसन्नचित लौटे तो क्या सुनते हैं - बहु किसी से मोबाईल पर कह रही थी ,"हाँ मंजू, बुढ़ऊ वी आर एस लेने को राजी हो गया है।बस अब तो हमारी चांदी ही चांदी है।प्रोविडेंट फण्ड का और ग्रेज्युटी का सारा पैसा हमारा ही  है मान लो।इंद्रप्रस्थ कालोनी में जो हमारा मकान बन रहा है अब उसकी पूरी किश्त चूका देंगे। इन्होंने तो यहां का मकान कब का बेच दिया है ।इसी पैसे से तो  हमने जमीन खरीदी थी।"
       आगे श्याम बाबू कुछ सुन न सके । वे उलटे पांव दफ्तर लौट गए ताकि समय रहते वी. आर.एस. की कार्यवाही रोकी जा सके।


                     *   डॉ.शैल चन्द्रा 
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चाँद खिलौना 
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🌛🌜🌛🌜🌛🌜🌛
मेरा प्यारा चाँद सलोना
है वो नादान और भोला
है वो तो तेजस्वी रूपवान
पहना शीतलता का चोला
मेरा प्यारा चाँद सलोना...…
देखो हरदम साथ निभाता
बच्चों का मामा बन जाता
जहाँ पर भी जाते है बच्चे
वहां पर ही वो नज़र आता
मेरा प्यारा चाँद सलोना.....
शुक्ल पक्ष में बढ़ता जाता
कृष्ण पक्ष में घटता जाता
तारों का साथ पाकर देखो
चाँद कैसे इठलाता जाता
मेरा प्यारा चाँद सलोना....
रजनी में बिखरती आभा
चाँद से निकलती है प्रभा
नूर से जमीं को रौशन कर
आसमां की बढ़ाता शोभा
मेरा प्यारा चाँद सलोना.....
नटखट नादान बन जाता
रवि के आते ही छुप जाता
दिखा अपना रूप सलोना
सबके जेहन में बस जाता
मेरा प्यारा चाँद सलोना.....


© प्रणिता राकेश सेठिया *परी*

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इंदिरा गांधी
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भारत भू की सारे जग में
कीर्ति जिसने बखानी थी
मर्दों में मर्दानी थी वो
वीर इंदिरा ग़ांधी थी

कश्मीरी कमला की कली थी
लाल जवाहर घर जन्मी थी
प्रिदर्शिनी नाम मिला
मोती की पोती दुलारी थी

दादी को आशंका थी
पर दादा को आकांक्षा थी
कई करोड़ बेटों से बढ़कर
नेहरू की नाज़ुक बेटी थी

लुकीछुपी दबीदबी वह
रहती थी खोई खोई
देशभक्ति की महत भावना
दिल में थी उसके सोई

आनँदभवन के वैभव में भी
देशभावना व्यापी थी
इंदु के बचपन की घड़ियां
संघर्ष क्रान्ति में बीती थी

गुमी हुई आज़ादी पाने
बापू ने मन में ठानी थी
नन्ही राजकुमारी ने भी
वानर सेना एक बनाई थी

गांधी का संदेश मिला
सुन कहानी रानी झांसी
फ्रॉक विदेशी प्यारी गुड़िया
होली में जला डाली

घर में नेताओं का जमघट
क्रान्ति का परिवेश मिला
गुपचुप खबरें भाषणबाजी
करती वह बाल सेनानी थी

रोगी माँ की सेवा करते
अनजाने में बचपन लांघा
बिछड़ गई अपनी प्रिय माँ से
ग़ांधी फ़िरोज का साथ मिला

संजय राजीव दो फूल खिले
देश की प्रधान मंत्राणी थी
विजय पताका थी लहराई
सारी दुनिया की महारानी थी

*सरला मेहता
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नन्हे की पाठशाला
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सुबह के 5:00 बजते ही मम्मी उनको उठाती है,
क्योंकि ठीक 6:30 बजे उनके स्कूल की बस आ जाती है।
विडंबना देखिए जरा इन नन्हे नौनिहालों की,
रोते हुए यह जातीऔर सोते हुए घर आती है।
वह जब स्कूल को जाते हैं तो पापा सोए रहते हैं,
और पापा जब घर आते तो बच्चे सोए मिलते हैं।
बड़ी मुश्किल से संडे को एक छुट्टी का दिन आता है,
उसमें भी स्कूल का प्रोजेक्ट उनकी जान खाता है।
बच्चों के वजन से ज्यादा तो बस्ते का बोझ होता है,
इन भारी-भरकम किताबों में फिर उनका बचपन होता है।
कहां फुर्सत के सुन पाए दादी नानी के किस्से वो,
ड्राइंग पेंटिंग और सिंगिंग की क्लास में जाना होता है।
बच्चों से ज्यादा तो मां को पढ़ाई की चिंता होती है,
ना खुद चैन से जीती और ना बच्चों को जीने देती है।
99% से तो एक भी कम मंजूर नहीं,
क्या दे रहे हम बच्चों को यह हम को भी मालूम नहीं।
तो आइए हम इस प्रतियोगिता के इस भूत को भगाए ।
नई पीढ़ी को डिप्रेशन के राक्षस से बचाए।।
स्वरचित द्वारा


* स्मिता जैन रांची
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नाम --सीमा शिवहरे सुमन


भोपाल

रुचि-लेखन
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बाल गीत
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 *मेरा मध्यप्रदेश*  
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आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊं मध्यप्रदेश की गाथा....!
राजधानी भोपाल हमारी और तालों से नाता....!!
 जय भारत माता..2 उज्जैन, औरछा, ओम्कारेश्वर के मंदिर अति निराले....!
 कान्हा , बांधवगढ़ पार्क में सिंह मिलें मतवाले...!
बुलबुल- तोता,गिद्धों का झुंड गीत 'पेंच ' में गाता...!
खजुराहो की मूर्ति कला का रहा प्रेम से नाता...!
 आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊं मध्यप्रदेश की गाथा....!! 
जहाज, हिंडोला, रूपमति ये महल माण्डु में साजे...!
माण्डवगढ़ दाखिल होने के हैं बारह दरवाजे....!
सांची, भोजपुर, उदयगिरी पर्यटक -सैलाव है आता..!
ग्वालियर -भूल-भुलैया का कोई भी पार न पाता...!
 राजधानी भोपाल हमारी और तालों से नाता....!!
 भेड़ाघाट रूपहला झरना पंचमढ़ी झरनों की रानी..!
पांचों पांडव रहे जहां पर पैरों की मिली निशानी..!
अमरकंटक से बही नर्मदा तीर्थ स्थल कहलाता..!
चंदेरी का किला डराए रात्रि कोई न जाता......!
 आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊं मध्यप्रदेश की गाथा....!!
 हिन्दी जो मिश्री सी मीठी यही है अपनी भाषा...!
प्रेम से मिलके रहें यहां पर सभी करें ये आशा....!
 महेश्वरी, चंदेरी- साड़ी रंग काला- लाल सुहाता..!
 आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊं मध्यप्रदेश की गाथा...!!
 एक नवंबर चलो मनाएं स्थापना दिवस हमारा..!


 *सीमा शिवहरे सुमन*

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*पिंजरा*
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श्वेता और नीरज का, आठ वर्षीय बेटा समीर, पड़ोस में रहने वाले फ्रेंड अमन के साथ खेलकर लौटा और श्वेता से लिपट गया।
 श्वेता बोली -सुम्मो बेटा, बाहर खेलकर आये हो ना! जाओ अच्छे बच्चे की तरह हाथ पैर धोलो। 
समीर श्वेता के कंधे पर झूलते हुये बोला मम्मा पहले प्रोमिस करो मुझे अमन के तोते जैसा एक तोता लाकर दोगी?  पास ही बैठे नीरज ने उसे समझाया 
बेटा.. पक्षियों को पिंजरे में बंद रखना बुरी बात है। 
समीर- क्यों पापा? 
नीरज-पक्षियों के पंख होते हैं, उनको खुले आसमान में उड़ना अच्छा लगता है। तुम पिंजरे में उसे बंद रखोगे तो वह उड़ेगा कैसे?  
बेटा! तुम रोज शाम को अमन के साथ खेलने जाते हो ना! वैसे ही तोते के भी फ़्रेण्ड्स तोते हैं, वे भी आपस में खेलते हैं। 
समीर बोला पापा! अमन का तोता तो उसका फास्ट फ्रेंड बन गया है, वह बातें भी करने लगा है।
 श्वेता-नीरज दोनों ही पक्षियों को पालने के खिलाफ थे। पर समीर का मन रखने के लिए हामी भर दी- अच्छा बाबा..., 
समर वेकेशन में ले आयेंगे। 
         *वेकेशन के पहले ही कोरोना की वजह से स्कूल बंद हो गये।* समीर को अपने दोस्त अमन के साथ खेलने, और एक-दूसरे के घर आने-जाने पर भी पाबंदी लग गई।
समीर सुबह शाम गलियारे में अकेले खेलता रहता और आसमान में उड़ते, तो कभी पेड़ों पर बैठे पक्षियों को कलरव करते देखता रहता। एक दिन वह पक्षियों को देखते हुए सोचने लगा मैं कोरोना के डर से बाहर जाकर अपने फ्रेंड्स के साथ खेल नहीं पा रहा हूं तो मुझे कितना बुरा लग रहा है। तोते को पिंजरे में कैद रखने से वह भी अपने फ्रेंड्स के बिना कितना दुखी होगा। वह श्वेता के पास दौड़ा-दौड़ा गया, मम्मा.. पक्षी आसमान में उड़ते हुये कितने प्यारे लगते हैं ना। 
पापा सही कह रहे थे, पक्षियों को पिंजरे में कैद करके नहीं रखना चाहिए। मम्मा! पापा से कहना मुझे तोता नहीं पालना।
यह सुनते ही श्वेता ने समीर को गले से लगा लिया। 
*इस लाकडाऊन ने बेटे को एक नई सीख दे दी।*


               कुमुद दुबे
           इन्दौर (म०प्र०)
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दोस्ती

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प्रतीक अपने घर की बालकनी में उदास खड़ा था । ५०दिन हो गए वो रामू दोस्त से मिलना तो दूर उसकी शक्ल भी नहीं देख पाया था। Lockdown  के कारण सभी अपने घर में थे। वह रामू को याद करते हुए सोचने लगा कि क्रिकेट खेलते समय मुझेजी भर के बैटिंग करने देता है,और मेरी निरंतर बैटिंग की इच्छा पूरी हो जाती है। मेरे इतने सहपाठी भी मेरे साथ खेलते है
परंतु कोई मेरी इस इच्छा को पूरी नहीं करता है ,रामू ही मेरा सबसे पसंदीदा दोस्त है। पर में उससे केसे मिलू। आखिरकार वह पिछली गली में दौड़ते हुए जाकर रामू को आवाज़ देता है। रामू के पिताजी बाहर आकर बताते है कि बेटा  रामू  तो पेट दर्द से परेशान  है डॉक्टर साहब  ने दवाई  दी है,परंतु  उसको आराम नहीं आ रहा है।  प्रतीक बेचैन हो गया,दौड़ते हुए घर गया उसने अपनी मम्मी से कहा,मम्मी ने पापा से बताया कि इसका स्कूल का फ्रेंड बीमार ओर सीरियस है,आप उसकी हेल्प करिये। प्रतीक के पापा ने अपने family डॉक्टर से चर्चा की ओर  रामू को हॉस्पिटल में भर्ती करवाया। डॉक्टर से कहा कि  बिल मै दूंगा ये मेरा ही बच्चा है ।प्रतीक पापा के गले लग गया,की पापा ने ये जानते हुए भी की रामू के पापा कारपेंटर है, बिना देर किए उसके दोस्त की सहायता की,ओर चुपचाप उसके पापा को दस हजार रपए भी जिद करके दिए।
 

निर्मल सिंघल,  अभिभाषक


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बाल कविता
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भोले भाले,प्यारे बच्चे,
लगते दिल को कितने अच्छे,

मन के होते कितने सच्चे,
जग के न्यारे न्यारे बच्चे,

हर दम नटखट अदा दिखाते,
मम्मी पापा को सताते,

ऊपर चढ़ते,नीचे गिरते,
फुदक फुदक कर दौड़ते रहते,

घर की रौनक होते है बच्चे,
आन बान शान होते है बच्चे,

एक मुस्कान से घायल करते,
सबका मन मोह लेते बच्चे,

भेद भाव नहीं रखते ये बच्चे,
आपस में मिल कर रहते बच्चे,

लड़ते झगड़ते,फिर एक हो जाते
मासूम लगते,प्यारे बच्चे,

मम्मी पापा के आखो के तारे,
दादा दादी के राज दुलारे,

नन्हे मुन्ने  फूल से बच्चे,,
भगवान को लगते प्यारे,,,,,,,,,,,,,


     * नवनीत  जैन

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बाल गीत
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नील गगन पर चमके तारे
देखो लगते कितने प्यारे
दादा जी अज्जब कहानी
सुनते सुनते ही सो जाते।
 
निंदिया रानी कब तू आये
कैसे नैनो में बस जाए 
कैसे ठंडी पवन चले है 
मन मेरा ये समझ न पाये।

भोर हुई जब चिड़िया चहकी
सूरज दादा तेज फैलाये
उठो लाल अब आँखे खोलो
माँ की मीठी आवाज उठाए ।

माँ धरती को करो प्रणाम
माँ हर दिन हमको ये समझाए
सुबह करो तुम प्राणायाम
स्वस्थ शरीर तभी बन पाए ।



स्वरचित
निशा"अतुल्य"
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चकोर  का  क्रोध
          ( बाल  कहानी )
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आजकल चकोर के पापा उसे छोटी छोटी बात पर डाँटने लगे हैं।उसे याद है कि जब वह छोटा था तब यही पापा
उसे ख़ूब प्यार करते थे ,जैसे आजकल 
उसके छोटे भाई को करते हैं । चकोर अब बारह वर्ष का हो गया है । 6th
स्टैन्डर्ड में भी आ गया है फिर भी पापा उसे ऐसे डाँटते हैं जैसे उसकी कोई इज़्ज़त ही न हो । खाना खाने बैठे तो डाँटते हैं " पहले हाथ धो कर आओ ,फिर खाना खाओ ।" अगर एक
 दिन खाने से पहले हाथ नहीं धोये तो क्या बिगड़ जायेगा ? शाम को जब वह
खेलने जाना चाहता है तो डाँटते हैं "पहले होमवर्क समाप्त करो फिर खेलने जाना ।" होमवर्क चकोर को करना है या पापा को ? वह क्यों हर बात में टाँग अड़ाते हैं ? आज तो हद ही हो गई । छोटू ने उसकी गणित की कॉपी पर A B C D लिख डाली ।उसने छोटू को एक थप्पड़ मार दिया तो क्या हो गया ? वह बड़ा भाई है कि 
नहीं ? बस इसी बात पर पापा ने उस को तीन चार थप्पड़ मार दिये । साथ ही नसीहत भी दे डाली " छोटों को मारना नहीं चाहिये ,प्यार से समझाना
चाहिये ।" चकोर का मन हुआ कि पापा से कहे " फिर आप क्यों मुझे मारते हैं ? मैं भी तो आप से छोटा हूँ ।
परन्तु उसने कुछ कहा नहीं ,भुनभुना
कर रह गया ,नहीं तो और मार पड़ती ।
             इस घटना के बाद चकोर ने पक्का निश्चय कर लिया कि वह इस घर में नहीं रहेगा। उसने अपने कमरे में घुस कर  अंदर से दरवाज़ा बन्द कर लिया ,बिना यह सोचे कि यह कमरा छोटू का भी है । होता रहे परेशान छोटू।वही तो चकोर की पिटाई का कारण था ।उसने सोच लिया कि वह 
खाना भी नहीं खायेगा ।वह कोई काम करेगा और अपनी कमाई से खाना 
ख़रीद कर खायेगा । पर वह काम क्या करेगा ? उसने देखा है कि उसके बराबर के बच्चे दूकानों पर काम करते हैं । वह भी किसी दूकान पर काम ढूँढ
लेगा । नहीं ,नहीं ,वह किसी चाय की दूकान या होटल पर काम नहीं करेगा ।
जूठे बर्तन नहीं धोयेगा । वह किसी पंसारी की दूकान पर काम करेगा ।
सामान उठा कर देने और सामान तौलने का काम �
: फिर भी साफ़ काम होता है।तभी उसके कानों में मम्मी की आवाज़ आई " चकोर , किवाड़ खोलो । खाना खा लो ।" चकोर ने न तो किवाड़ खोले न कोई उत्तर दिया। बुलाती रहें मम्मी । चकोर को नहीं  सुननी उनकी बात ।वह भी तो पापा की चमची हैं ।जब पापा ने थप्पड़ मारे थे तो उन्होने ही कौन सा बचाया था ? कहती हैं कि जब एक आदमी मारे तो तो दूसरे को बीच में नहीं बोलना चाहिये।इससे बच्चा बिगड़ जाता है । अब चकोर को थोड़ी थोड़ी भूख लगने लगी थी ।फिर भी उसने खाना न खाने के अपने निश्चय को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया ।रोते रोते उसके गाल गीले हो गये थे और हिचकी भरते भरते पेट में दर्द होने लगा था फिर भी तकिये में मुँह गड़ा कर वह रोता रहा ।तकिया भी गीला हो गया ।शाम के साढ़े सात बज गये थे । थोड़ी देर में रात हो जायेगी । रात में घर छोड़ना ठीक नहीं है ।बच्चा पकड़ने वाले पकड़ कर ले जा सकते हैं। उसने दो चार 
कपड़े ,जो खूँटी पर लटक रहे थे , अपने स्कूल बैग में भर लिये ।बैग में भरी हुई किताबें व कॉपियाँ निकाल कर  दूसरे बिस्तर पर डाल दीं । क्या करना है पढ़ लिख कर ? नौकरी ही ढूँढनी है तो अभी से क्यों न ढूँढ ले ? इतने साल बरबाद करने से क्या फ़ायदा ? पड़ोस वाले विश्वास भइया तो इतने बड़े हैं ,शेव भी बनाते हैं पर अभी भी नौकरी ढूँढ रहे हैं । इतने सारे क्लास पढ़ने से क्या फ़ायदा हुआ ? तभी चकोर के कानों में मम्मी की आवाज़ आई । वह पापा से कह रही थीं 
"छोटू ने खाना खा लिया । आप भी खा लीजिये । मैं चकोर को समझा बुझा कर खिला  दूँगी । उसके बाद मैं भी खा लूँगी। अरे ! पापा यह क्या कह रहे हैं ? " नहीं 
चकोर भूखा है तो मैं भी नहीं खा सकता । पहले उसे खिलाओ ।बाद में मैं खाऊँगा ।" क्या पापा उसे अभी भी प्यार करते हैं ? तभी किवाड़ ज़ोर ज़ोर से भड़भड़ाये जाने लगे , साथ ही पापा की आवाज़ आई " चकोर , चकोर बेटा , किवाड़ खोलो ।भूखे मत सोना । किवाड़ टूट जाने के डर से चकोर को किवाड़  खोलने पड़े पर खाना न खाने का उसका निश्चय  अभी भी पक्का था । किवाड़ खुलते ही पापा ने उसे लिपटा लिया । उसके आँसू अपने हाथों से पोंछते हुए कहा " खाने पर ग़ुस्सा क्यों उतारते हो ? भूखे रहने से ग़ुस्सा बढ़ता है । चलो खाना खा लो । चकोर का निश्चय कच्चा पड़ने लगा । मम्मी तुरन्त खाना ले आईं और पापा ने अपने हाथ से खिलाना शुरू किया। पहले तो चकोर ने मुख पर हाथ रख लिया पर जब पापा ने बार बार कहा " हाथ हटाओ " तो हाथ हटा लिया पर मुख फिर भी कस कर बन्द रखा। पापा के बार बार कहने पर भी चकोर ने मुख नहीं खोला पर जब छोटू ने उसके गले में बाँह डाल कर कहा " भइया खाना खा लो " तो चकोर को मुख भी खोलना पड़ा और खाना भी खाना पड़ा । आगे की कहानी बताना आवश्यक नहीं है । सवेरे  तक  किसी को याद भी नहीं रहा कि रात में कुछ हुआ था ।
आजकल चकोर के पापा उसे छोटी छोटी बात पर डाँटने लगे हैं।उसे याद है कि जब वह छोटा था तब यही पापा
उसे ख़ूब प्यार करते थे ,जैसे आजकल 
उसके छोटे भाई को करते हैं । चकोर अब बारह वर्ष का हो गया है । 6th
स्टैन्डर्ड में भी आ गया है फिर भी पापा उसे ऐसे डाँटते हैं जैसे उसकी कोई इज़्ज़त ही न हो । खाना खाने बैठे तो डाँटते हैं " पहले हाथ धो कर आओ ,फिर खाना खाओ ।" अगर एक
 दिन खाने से पहले हाथ नहीं धोये तो क्या बिगड़ जायेगा ? शाम को जब वह
खेलने जाना चाहता है तो डाँटते हैं "पहले होमवर्क समाप्त करो फिर खेलने जाना ।" होमवर्क चकोर को करना है या पापा को ? वह क्यों हर बात में टाँग अड़ाते हैं ? आज तो हद ही हो गई । छोटू ने उसकी गणित की कॉपी पर A B C D लिख डाली ।उसने छोटू को एक थप्पड़ मार दिया तो क्या हो गया ? वह बड़ा भाई है कि 
नहीं ? बस इसी बात पर पापा ने उस को तीन चार थप्पड़ मार दिये । साथ ही नसीहत भी दे डाली " छोटों को मारना नहीं चाहिये ,प्यार से समझाना
चाहिये ।" चकोर का मन हुआ कि पापा से कहे " फिर आप क्यों मुझे मारते हैं ? मैं भी तो आप से छोटा हूँ ।
परन्तु उसने कुछ कहा नहीं ,भुनभुना
कर रह गया ,नहीं तो और मार पड़ती ।
             इस घटना के बाद चकोर ने पक्का निश्चय कर लिया कि वह इस घर में नहीं रहेगा। उसने अपने कमरे में घुस कर  अंदर से दरवाज़ा बन्द कर लिया ,बिना यह सोचे कि यह कमरा छोटू का भी है । होता रहे परेशान छोटू।वही तो चकोर की पिटाई का कारण था ।उसने सोच लिया कि वह 
खाना भी नहीं खायेगा ।वह कोई काम करेगा और अपनी कमाई से खाना 
ख़रीद कर खायेगा । पर वह काम क्या करेगा ? उसने देखा है कि उसके बराबर के बच्चे दूकानों पर काम करते हैं । वह भी किसी दूकान पर काम ढूँढ
लेगा । नहीं ,नहीं ,वह किसी चाय की दूकान या होटल पर काम नहीं करेगा ।
जूठे बर्तन नहीं धोयेगा । वह किसी पंसारी की दूकान पर काम करेगा ।
सामान उठा कर देने और सामान तौलने का काम 



*डा आभा माथुर 


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बचपन का गुड्डा"
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🧸🧸🧸🧸🧸🧸
पापा मेरे एक  गुड्डा लाये,
मेरे मन को खूब है भाया।
छोटा सा मैं घर है बनाया,
गुड्डे को फिर वही सुलाया।
🧸🧸🧸🧸🧸🧸
आमुआ के डाली पर मैने,
सुंदर सा झूला है  लगाया।
गुड्डे को  बिठाकर झूले में,
उसको मैंने खूब  झुलाया।
🧸🧸🧸🧸🧸🧸
सूरज डूबा हुआ अंधेरा,
गुड्डे को फिर डर है घेरा।
मम्मी के संग मैंने सोया
गुड्डे को भी संग सुलाया।
🚲🚲🚲🚲🚲🚲
भोर हुई  मम्मी ने जगाया,
गुड्डे को मेरे साथ उठाया।
पहले मैं मुह धोकर आया,
मम्मी ने मुझे दूध पिलाया।
🧸🧸🧸🧸🧸🧸
गुड्डा लेकर मैं बाहर आया,
बच्चो को भी साथ बुलाया।
हम सब ने  बाग में जाकर,
गुड्डे गुड्डी का  ब्याह रचाया।
🧸🧸🧸🧸🧸🧸


*- विजय पाण्डेय 'जीत'
    ब्यौहारी, शहडोल


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जुड़वां स्नान
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दोपहर का समय था वाड़े के सभी लोग अपने अपने काम में व्यस्त थे, बच्चे स्कूल गए थे,कमाई करने वाले लोग घर पर नहीं थे,वाड़े के आजी आबा आराम कर रहे थे कि तभी जोशी काकू के यहां से उनकी और उनकी बहू की जोर जोर से आवाजें आने लगी"राम्या दरवाजा खोल,श्यामा दरवाजा खोलो बेटा ऐसे पानी से नहीं खेलते'खोलो बेटा" शोर सुनकर अज्जी ,आई और वाड़े के कुछ लोग उनके यहां पहुंचे पता चला जोशी काकू के दोनों पोते जो कि जुड़वां थे और उनकी उम्र ४ से ५ साल थी साथ ही गजब के उधमी थे उन्होंने २रीं मंजिल के बाथरूम में घुस कर अंदर से कड़ी लगा ली है और नल भी चालू कर दिया है अब शायद उन्हें नल बंद करते नहीं आ रहा है साथ ही चिटकनी भी टाईट हो गई है अंदर वो दोनों कभी हंसते तो कभी ज़ोर ज़ोर से रोते बच्चों कि ऐसी हालत देखकर जोशी काकू और उनकी बहू का बूरा हाल था कूछ लोगों ने दरवाजा तोड़ने कि सलाह दी पर अज्जी ने मना कर दिया बोली कहीं  दोनों ने दरवाजे या चिटकनी में ही हाथ न अड़ा दिया हो कुछ भी दुर्घटना हो सकती है ,क्या किया जाए किसी को कुछ सुझ नहीं रहा था,सायली जो कि ८वीं कक्षा में थी और उसके दोस्त भी अभी अभी स्कूल से आए थे किसी को भी घर में न पाकर वे लोग भी ढूंढते हूए जोशी काकू के यहां पहुंचे सारी बातें जानकर वे भी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे तभी अज्जी ने सायली और सब बच्चों के कान में कुछ बात कही सब बच्चें तुरंत तैयार हो गए कुछ ही देर में बच्चों ने स्कूल ड्रेस बदली और वे फटाफट एक-दूसरे का हाथ पकड़कर जोशी काकू की किचन की बालकनी  के पीछे जो रेलिंग बनी थी उसपर चढ़ गये सायली सबसे आगे थी, हूआ यु कि रेंलिग के वहीं से बाथरूम का वेंटिलेशन भी था अज्जी ने बच्चों को सुझाव दिया कि वे रेलिंग पर चढ़ कर वेंटिलेशन तक पहुंचे वहां उसके कांच खोलकर बाथरूम के अंदर जाकर दरवाजा खोल दे, खैर सायली वेंटिलेशन तक पहुंची और उसने सावधानी से कांच भी खोल दिए २,३कांच खोलने के बाद उसने जब अंदर देखा तो जोर जोर से हंसने लगी एक-एक करके सब बच्चों ने भी देखा वे भी हंसने लगे इधर से जब बड़े लोगों को पता चला तो वे बालकनी तक आए उन्हें कुछ समझ में ही नहीं आया ये बच्चों को हो क्या गया है, हंस क्यों रहे हैं और बच्चे रेलिंग पर क्यों चढ़े हुए हैं? खैर सायली कांच निकालकर बाथरूम के अंदर पहुंची और उसने सबसे पहले दरवाजा खोला , अंदर का नजारा देखकर कोई भी हंसे बिना न रह सका जोशी काकू और उनकी बहू आंखें फाड़े एक-दूसरे को देख रहीं थीं हमारे राम,श्याम ने बाथरूम कि काया ही पलट दी थी सभी वस्तुओं को अपने शरीर पर मसल दिया था, टुथपेस्ट पिचककर मुंह चिढ़ा रही थी, काका की शेविंग क्रीम तो उनके सर का ताज बनी हुई थी कपड़ों के साबुन से तो पूरा बाथरूम नहा गया था खोपरे का तेल तो बाल्टी में उपर उपर तैर रहा था,और नहाने का साबुन तो अभी भी एक दूसरे को लगाया जा रहा था पूरा बाथरूम झाग वाला बाथरूम बन चुका था यह नजारा देखकर अज्जी बोली "वाह! जोशी ताई आपके पोतों का यह जुड़वां स्नान तो जिंदगी भर याद रहेगा"यह सुनकर सब हंसने लगे,काकू ने दोनों बच्चों को गले लगाया तब जाकर उन्हें शांति मिली , सभी ने हम बच्चों कि पीठ ठोंकी की आज हमारे कारण एक अनहोनी होने बच गई।


*स्वाति वाड़गे (वनकर)

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*बाल रचना* 
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कक्का भक्का 
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कक्का भक्का कक्का भक्का 
लेने जा रहे हैं बाजार में मक्का
खाने को नहीं था टिक्का
निकाला अपना पुराना एक्का
देखा उसका जाम है चक्का
रोके पे ना रुके कक्का 
पैदल चल दिए लेने मक्का
 लाइन में जाकर लग गए कक्का 
पीछे से आया भीड़ का धक्का
पड़ा नाक पर  जमकर मुक्का
निकला खून  जम गया थक्का
चारों खाने चित पड़ गए कक्का
देख रहे हैं हक्का-बक्का 
जेब से लुड़का एक का सिक्का
उल्टे पांव घर पहुंचे कक्का
कक्का ने अब कर लिया पक्का
अब न जाए कभी लेने मक्का


 *डॉ विजय आर चौरे ,* 

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"मम्मी ब्रेक जरा तुम ले लो ना"
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मम्मी मैंने हाथ धो लिए,अब तो खाना दे दो ना
पापा के भी झटपट से,तुम ही हाथ धुला दो ना

अब घर में बैठे बैठे ही, बोर हो गया मैं कितना
अकड़ा पकड़ी, छुप्पा छाई,साथ संग तुम खेलो ना

सभी काम घर से ही पापा ,देर रात तक करते हैं
थोड़ा समय मुझे भी दें,ये तुम उनको बोलो ना

मालूम मुझे घर पर रहना,बाहर तो है कोरोना
ये बात पड़ोसी अंकल को,जा कर तुम ही कह दो ना

तुम भी,कितना थक जाती हो,काम सभी करते करते
कुछ पल बैठो पास हमारे,ब्रेक जरा तुम ले लो


*शोभना नाईक

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बालगीत विधा _कविता।           


      
      "मै बचपन बन जाऊं तुम टीचर बनकर आ जाना ,फिर से अ, आ ,इ, ई का मुझको पाठ पड़ा जाना ,फिर से वो आंख मिचौली ,वो पिट्ठू ,वो दौड़ के कहना आ छू ले का वो छुपा छुपायी  का खेल खिला जाना ,वो मिट्टी के नन्हे नन्हे खिलौने बनाना ओर अपनी गुड़िया के ब्याह रचाना  बता जाना वो पल भर में रूठ कर अगले पल मना जाना बस ऐसे दोस्त दिला जाना ,नहीं चाहिए बड़े पन के वो झूठे रिश्ते ,जो स्वार्थ के संग चलते हैं ,जब तक मतलब होता है तब तक ये रिश्ते पलते है ,नहीं भाता मुझे ये ईर्ष्या का करना जहां सब एक  दूसरे की सफलताओं पर जलते है ,नहीं चाहिए छलावे का बड़प्पन जहां दिखावे की दोस्ती कर छलते है ,जब तक मतलब हो तो सब साथ निभाते हैं ,ओर फिर वक़्त के साथ बदलते है ,करती हूं अनुरोध यही मेरा वो बचपन लौटा देना ,क्योंकि बच्चे मन के सच्चे होते हैं ,मुझको मेरा ऐसा वो बचपना वापस देना ,"बचपन की याद में स्वरचित मन के भावों के साथ 


"साधना श्रीवास्तव "🙏🏻


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छाले
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पड़े हैं छाले 
हिम्मत नहीं हारे 
ये मज़दर
गहन तम 
प्यार पाने की आस 
दिखे न भोर 

श्रमिकगण 
भाग रहे है भूखे 
गाँव ही छांव 

ये मज़दूर 
बने है फुटबॉल 
बाप न माई 

सड़क पर 
क़ाफ़िले पे क़ाफ़िले 
आत्मनिर्भर 

ये सरकार 
अमीरों की सुनती 
दीन मरता 
 
गिरी है लाशे 
आँखों में गाँव बसा 
दिल में है माँ 

*डॉ अलका पाण्डेय
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बाल साहित्य
"मम्मी ब्रेक जरा तुम ले लो ना"

मम्मी मैंने हाथ धो लिए,अब तो खाना दे दो ना
पापा के भी झटपट से,तुम ही हाथ धुला दो ना

अब घर में बैठे बैठे ही, बोर हो गया मैं कितना
अकड़ा पकड़ी, छुप्पा छाई,साथ संग तुम खेलो ना

सभी काम घर से ही पापा ,देर रात तक करते हैं
थोड़ा समय मुझे भी दें,ये तुम उनको बोलो ना

मालूम मुझे घर पर रहना,बाहर तो है कोरोना
ये बात पड़ोसी अंकल को,जा कर तुम ही कह दो ना

तुम भी,कितना थक जाती हो,काम सभी करते करते
कुछ पल बैठो पास हमारे,ब्रेक जरा तुम ले लो ना
******

*शोभना नाईक

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मदद
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जो तकदीर के भरोसे रहेगा उसे रोज की रोटी भी नसीब नहीं होगी।बस कुछ ही देर में आ रहा हूं कहते राहुल ने मोबाइल बंद कर पाॅकेट के हवाले किया और कहा सुनती हो जरा ध्यान रखना दरवाज़े के अन्दर कोई आये नहीं बच्चों को भी अन्दर रखना हैं।
रिना ने इतनी सारी हिदायतें सुनकर पूछा आज़ क्या बात हैं बहुत सतर्क रहने के लिए कहा जा रहा है।
जुतें पहनते हुए राहुल ने कहा आये दिनों मांगने वालें अन्दर तक आ जाते हैं।बेचारे मजबूर हैं कुछ दे ही देना चाहिए।रिना ने कहते हुए मास्क एवं सनेटाईजर की बाॅटल राहुल को दे दी थी।देखो जी हाई वे पर जा रहें हो सम्भल कर रहना।
        राहुल ने गेट खोलते ही देखा सामने कल वाली महिला खड़ी थीं साथ में दस साल का बालक भी था।भला करनें निकलें राहुल सोच नहीं पाया इस भागवान को क्या बोलूं।
कल ही इसे पचास रुपए और कुछ राशन दिया था।वह मेरे बदलें हुए चेहरे को देख रही थी।
बालक ने कहा बाबुजी आपसे काम हैं। मैंने कुछ खींज कर बोला कल मदद कर दी ना तुम्हारे जैसें और भी वहां बैठें हैं।अभी जाओ बालक ने हाथ जोड़कर कहा बाबु जी हम मांगने नहीं आयें हैं ।
       अब महिला ने आगे आकर विनम्र शब्दों में कहा मेरे बेटे को आपके भले कामो मे जोड़ लो और कल के पैसे मिलाकर कुछ राशी आपकों देना चाहतीं हूं।ये उन्हें देवें  जिनके बच्चे भूखें हैं बिलख रहें हैं।
मुझे रोज आपको देखने से विश्वास जगा हैं ।हम थोड़े में सुखी हैं बाबुजी हमें और कुछ नहीं चाहिए। बस मेरे बच्चे को सही रास्ता दिखा दो।
मैं अब तक आश्चर्य से देख रहा था।
सोचा ग्रुप में सेवाधारी की जरुरत तों हैं ही सवाल हैं इन पैसों का, कल्याण का काम करने निकले राहुल ने उसे भी रख लिए ।बालक को  साथ में ले जाते राहुल ने देखा भगवान् को हाथ जोड़कर खड़ी महिला का संतुष्ट चेहरा जो मदद से खिला हुआ था।


*अमिता मराठे
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दोस्ती
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प्रतीक- घर की बालकनी में उदास खड़ा था । ५०दिन हो गए वो रामू दोस्त से मिलना तो दूर उसकी शक्ल भी नहीं देख पाया था। Lockdown  के कारण सभी अपने घर में थे। वह रामू को याद करते हुए सोचने लगा कि क्रिकेट खेलते समय मुझेजी भर के बैटिंग करने देता है,और मेरी निरंतर बैटिंग की इच्छा पूरी हो जाती है। मेरे इतने सहपाठी भी मेरे साथ खेलते है
परंतु कोई मेरी इस इच्छा को पूरी नहीं करता है ,रामू ही मेरा सबसे पसंदीदा दोस्त है। पर में उससे केसे मिलू। आखिरकार वह पिछली गली में दौड़ते हुए जाकर रामू को आवाज़ देता है। रामू के पिताजी बाहर आकर बताते है कि बेटा  रामू  तो पेट दर्द से परेशान  है डॉक्टर साहब  ने दवाई  दी है,परंतु  उसको आराम नहीं आ रहा है।  प्रतीक बेचैन हो गया,दौड़ते हुए घर गया उसने अपनी मम्मी से कहा,मम्मी ने पापा से बताया कि इसका स्कूल का फ्रेंड बीमार ओर सीरियस है,आप उसकी हेल्प करिये। प्रतीक के पापा ने अपने family डॉक्टर से चर्चा की ओर  रामू को हॉस्पिटल में भर्ती करवाया। डॉक्टर से कहा कि  बिल मै दूंगा ये मेरा ही बच्चा है ।प्रतीक पापा के गले लग गया,की पापा ने ये जानते हुए भी की रामू के पापा कारपेंटर है, बिना देर किए उसके दोस्त की सहायता की,ओर चुपचाप उसके पापा को दस हजार रपए भी जिद करके दिए।
 

*निर्मल सिंघल,  अभिभाषक
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*गुल्लू गिलहरी*
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भोली, गुल्लू निकल पड़े थे 
मामा के घर जाने को 
भेजा था संदेसा माँ ने
सबको गाँव बुलाने को

बारिश की टपटप बूंदों ने
सबके मन को हर्षाया 
गर्मी से व्याकुल थे अब तक 
काले बादल का दल छाया

नुक्कड़ के बूढ़े बरगद की
घनी जटाएँ  पात-पात पर
पावस का उत्सव छाएगा 
कुलमा होगा शाख-शाख पर

उछल-उछल बच्चे खेलेंगे 
चुकुर-चुकुर सब गाएंगे 
ऊब चुके हैं शहरों से जो
बच्चे मौज मनाएंगे

गुल्लू भोली चलते-चलते 
काफी दूर निकल आए
माँ ने जो खाना बांधा था
उसे भूल घर पर आए

एक पेड़ पर लटका टायर
देख उसे गुल्लू सब भूला 
जा बैठा घुस उसके भीतर
खूब मजे से झूला झूला 

हाथ अचानक छूट गया 
और नीचे गुल्लू गिरा धड़ाम 
भोली दीदी घबराई !
ये क्या हो गया , हाय राम 

हिम्मत करके भोली ने जब
नजर दूर तक दौड़ाई 
पास कुँआ है देख खुशी से
पानी लेकर फौरन आई

गुल्लू का सर गोद में रखकर 
मुख पर पानी  छिटकाया
बड़े प्यार से धीरे-धीरे 
गुल्लू का सिर सहलाया 

भोली के प्यारे स्पर्श से  
गुल्लू थोड़ा हुआ सचेत
उछल पड़ा ,देखो दीदी !
कितने भुट्टे खेत ही खेत

चलो चलें अब भूख मिटाएं 
लपक पड़े दोनों उस ओर
भुट्टे ही भुट्टे दिखते थे 
जिनका था कोई ओर न छोर

छील छील कर भुट्टे सारे 
मक्का दाने छक कर खाए 
शाम घिरी है देख अचानक 
चिंता से वे घबराए

भुट्टे-वुट्टे छोड़ वहीं पर 
सरपट दोनों भाग-भाग कर
रात हुए जाने से पहले
पहुँच गए थे नानी के घर  

*- वंदना दुबे



🌛🌜🌛🌜🌛🌜🌛
  संंपादक डा सुनीता श्रीवास्तव 

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बाल--साहित्य 
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शुभसंकल्प  समूह
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