विष्व पर्यायवरण दिवस
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शुभसंकल्प समूह
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निर्देशक- डा सुनीता श्रीवास्तव
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लेखक/लेखिका
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1-मधुलिका सक्सेना
2-कविता सक्सेना
3-सीमा रानी मिश्रा
4-चारुमित्रा नागर
5-वंदना अर्गल
6-रश्मि सक्सेना
7-प्रभा जैन
8-नवनीत जैन
9-प्रतिभाचंद्र
10-मनोरमा जोशी
11-ज्योती श्रीवास्तव
12-ंंमधु टाक
13-शारदा मिश्रा
14-पूर्णिमा रानी
15-मनीष तिवारी
16-संजय जैन
17-रितु प्र ज्ञा
18-मंजू गुप्ता
19-प्रतिभा अंश
20-शलिनी खरे
21-अल्पना वाणी
22-स्वाति वाडगे
23-पूनम शर्मा
24-सविता ठाकुर
25-प्रणीता सेठिया
26-अर्पणा तिवारी
27-साधना श्रीवास्तव
28-हेमलता शर्मा
29- सुरेखा सिसोदिया
30-डा विजय चौरे
31-कुमुद दुबे
32-वसुंधरा पान्डे य
33-अचला गुप्ता
34-मीरा जैन
35-वंदना अर्गल
36-नीति अग्निहोत्री
37-सुषमा शुक्ला
38- सुनीता अग्रवाल
39-डा स्वाति सिंग
40-माया कौल
41- नंदनी जोशी
42-ज्योती प्रतिक श्रीवास्तव
43-अर्चना चौरे
44-सुधा चौहान
45-रश्मि लता मिश्र
46-प्रभा तिवारी
47- चेतना भाटी
49-सुरेन्द्र सिंग राजपुत
50- प्रेरणा सेन्द्रे
51माधुरी व्यास
52-शेलचंद्रा
53 संकल्प
54 अंजुल कंसल
55 रश्मि सक्सेना पचौर
56निर्मल सिंघल
57स्मिता जैन
58 सरला मेहता
59 शोभा रानी तिवारी
60माया नारायणि मानवेंद्र
61 सुषमा दुबे
62 जनार्दन शर्मा
63 आभा माथुर
64पायल परदेशी
5डा अमरजीत कोर
66 विजय पाण्डेय
67 मंजिरी पुणेतामबेकर
68 सुरेखा भारती
69 आशा जाकड़
70 शोभना नाईक
71साधना श्रीवास्तव
72 अलका जैन
73 विजिया त्रिवेदी
74 आशा जकड़
75 शोभना नाईक
76 डा अलका पाण्डेय
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बेबस प्रकृति
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मैं बेबस सी बेचारी सी
तिल तिल अपना मिटा रही हूँ
सर्वस्व अपना, बँटा रही हूँ।
¼ जंगल जमीन का वैभव
झरने नदियाँ सबका गौरव,
चुप चुप रहकर लुटा रही हूँ
सहमी, सहमी चली जा रही हूँ।
तुम ना समझे महता मेरी
सबसे कहते गल्ती तेरी,
बस दोहन में लगे हुए हो
पौधा एक न रोप रहे हो।
मेरे बरसों पाले पोसे
बरगद आम नीम सब काटे,
हुई खोखली इनको खोकर
देख रही हूँ बेबस होकर।
कौन मृदा मेरी बाँधेगा
मेरे अंतस का रस पीकर,
कौन जनेगा नभ के बादल
सूखा होगा मेरा आँचल।
ना पुरवा न बारिश होगी
अगली पीढ़ी रुसवा होगी,
आँखें खोलो *इंसाफ* करो
अब *संरक्षण* की बात करो।
*मधूलिका सकसेना
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पर्यावरण महोत्सव नहीं
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कुछ नही होगा
नारे लगाने से,
पर्यावरण बचेगा
पेड़ लगाने से।
क्या होगा फ़ोटो
खिंचे जाने से?
पौधा बचेगा
सींचे जाने से।
अपने स्वार्थ की खातिर
तूने चमन उजाड़ दिया,
अब क्या होगा
पछताने से।
सुंदर प्रकृति ने
हर रूप में उपकार किया,
बदले में मानव
डरा नही मिटाने से।
बिगड़ा नही सबकुछ
प्रयास कर बचा ले,
प्रण ले एक एक
पौधा सब मिल लगा ले।
प्रदूषण पर अंकुश
लगाना है,
हम सबको पर्यावरण
बचाना है।
*कविता सक्सेना शुजालपुर
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प्रकृति की शक्ति
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पर्यावरण दिवस
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दिल में कब से यही शोर है मचा हुआ ,
यह मानव -जाति किस ओर जा रहा ?
अपने ही हाथों खुद को बर्बाद कर रहा ,
गलती से खुद को खुदा समझ रहा ।
प्रकृति को दूषित करने पर तुला हुआ ,
शायद उस अदृश्य शक्ति को है़ भूला हुआ ।
पर जब भी मानव संतुलन बिगाड़ता है़ ,
प्रकृति किसी न किसी रूप में सुधार लेती है़ ।
हम उसका विनाश करते हैं जब भी ,
तो वो भी हमारी जान लेती है़ ।
पशुओं से जीने का हक़ मत छीनो ,
खाने के लिए अन्न-फल-सब्जियाँ हैं ,
उनसे ही अपना पोषण कर लो ।
जीने दो सबको और खुद भी जियो ,
कुदरत के हर संकेत को अब तो समझो ।
मानव हो मानवता के राह पर ही चलो ,
गलतियों से सीखो,
सताओ मत किसी जीव को ।
* सीमा रानी मिश्रा
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प्यारी धरती माँ
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कितनी प्यारी धरती माँ
सब को रखती बराबर से
कोई भेदभाव नही करती हैं
हरियाली इसको बहुत पंसद है
पेंड पौधो का रखती ध्यान
सब कुछ सहन कर जाती हैं
पर किसी को कुछ नहीं कहती
पर्यावरण को रखो साफ
तो रहोगे स्वस्थ तुम सभी
पर्यावरण बचाना है
देश को खुश हाल बनाना है
पेंड लगाओगे तभी तो शुध्द
हवा मे साँस ले पावोगे
बच्चे बुढे सभी को समझाना है
पेंड लगाकर सभी को स्वस्थ बनाना है
*चारूमित्रा नागर
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धरती की पुकार
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हरित वसुंधरा कह रही
ना मुझको तुम विरान करो।
छाया देते तरुवर की फूलती फलती
डालियों का ना तुम संहार करो।🌴
प्रकृति की अनुपम सौगात है🌴
यह उपवन,धरा के इस सौंदर्य
का हे मानव तुम ना उपहास करो।
🌴 पक्षियों का कलरव,भंवरों का गुंजन
फूलों की मुस्कान,बहती नदीयों की
लहरों से मुझको ना वंचित करो।🌴
🌴 जल ही जीवन है,पेडो़ से है सांसे बंधी
खेतो,खलिहानो में मुस्काती फसलें खडी़।
आओ हम सब मिलकर
इस पर्यावरण को सुधारें
हरे भरे पेड़ लगाकर इस
वसुंधरा को संवारें ।🌴
स्वरचित --- वन्दना अर्गल
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ग्लोबल वार्मिग
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पेड़ लगाओ तुम सदा , अपने चारों ओर ।
ग्लोबल वार्मिंग का तभी , कुछ कम होगा शोर ।।
जंगल को मत काटिये , ये प्रभु की सौगात ।
होता है जलवायु पर , इससे भी आघात ।।
ताल-तलैया जल बिना , पंछी खोते जान ।
किस विकास की है भला , बोलो ये पहचान ।।
पॉलीथिन उपयोग को , कर दो फौरन बंद ।
धरती की होने लगी , देखो साँसें मंद ।।
◆ रश्मि सक्सैना ◆
इंदौर
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प्रण
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इस धरती माँ को बंजर होने से बचाना होगा,,एक पेड़ तो जरूर लगाना होगा,,,
सांसे तो गिनती की दी है प्रभु ने,पर प्राणवायु के सिलिंडर पेड़ न हुए तो गिनती की सांसे लोगे कैसे,,एक पेड़ तो जरूर लगाना होगा,,,
समंदर में पानी तो है ,जो नदियों का लिया उधार,सोच इंसान तू नदियों का पानी भरा रहने के लिए,,,बरखा रानी को मनाना होगा,,एक पेड़ तो जरूर लगाना होगा,,,
बरखा रानी आ भी गई तो,खुशियां ही खुशियां धरती पर ,किन्तु उस जल को सहेजने को,,,,एक पेड़ तो लगाना होगा
एक पेड़ तो लगा लिया मैंने, सहेजने के लिए बागड़ तो लगाना होगा,पानी, सुरक्षा, देख भाल से हरियाली खुशाली लाना होगा,,,,एक पेड़ तो लगाना होगा,,
स्वस्थ रहें प्रत्येक जीव,मन रहे खुशाल, खान पीन भरपूर रहे,तो आजसे ही हम प्रण लें ,पर्यावरण के शुभ दिन
जीवन मे हम पेड़ लगाएंगे,शिशु जैसी देखभाल कर,जग को खुशाल बनाएंगे🌳🦜🦚🌳
*प्रभा जैन इंदौर,,स्वरचित
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प्रकृति है तो जीवन है
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प्रकृति का मत करो शोषण,
सब मिलकर बचाओ पर्यावरण,
पेड़ पौधे न करो नष्ट,
सांस लेने में होगा कष्ट,
आओ हम पर्यावरण बचाए,
सभी का जीवन बेहतर बनाए,
पर्यावरण है हम सबकी जान,
इसलिए करो इसका सम्मान,
आओ एक पेड़ लगाए,
सृष्टि को खुशहाल बनाए,,,,,
* नवनीत जैन
================================================================मनोरमा जोशी
🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳
*पर्यावरण गीत
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- चलो पेड़ लगायेंगे*
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बच्चों चलो हम पेड़ लगायेंगे
बच्चों चलो ।
पेड़ लगायेंगे बाग सजायेंगे
रंग बिरंगे फूल खिलायेंगे
फूलों की खुशबू से
जग को महकायेंगे
बच्चों चलो हम......
फर - फर बहेंगी हवायें प्यारी
मस्ती में झूमेंगी डारी - डारी
आमों की डाली पे झूले लगायेंगे
बच्चों चलो हम.....
तरह-तरह के पेड़ लगायेंगे
वृक्षों को और कटने से बचायेंगे
चिड़ियों को बुलायेंगे घोसलें सजायेंगे
बच्चों चलो हम.......
पेड़ों की जड़ों से मिट्टी थमेगी
धरती अब और ना बंजर बनेंगी
वातावरण को निर्मल बनायेंगे
बच्चों चलो हम......
वृक्षों की चोटियां अंबर को चूमेंगी
खुली हवाओं से बातें करेंगी
पर्वत की चोटी से बादल को लायेंगे
बच्चों चलो हम.......
ये वृक्ष हमारे सुख - दुख के साथी
ये ही हमारे जीवन के थाती
जंगल लगा शेर हाथी बसायेंगे
बच्चों चलो हम.....
सूरज की जब तेज गर्मी पड़ेगी
और तपती रहेगी दोपहरी
थके बटोही को छाया दिलायेंगे
बच्चों चलो हम.....
पौधे भी है छोटे - छोटे से बच्चे
फिर हम इनको भूलेंगे कैसे
उनको पढ़ाएंगे इनको बढ़ाएंगे
बच्चों चलो हम.....
एक एक बच्चा दो - दो पेड़
सूखे की नहीं रहेगी खैर
दुनिया को हरा भरा बनाएंगे
बच्चों चलो हम.....
सर्वाधिकार सुरक्षित
**श्रीमती प्रतिभा चन्द्र*
🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳
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🌳🌳🌳🌳🌳
पर्यायवरण घटक
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---हरे भरे उपवन का ,
बन जायें हर घटक ,
राष्ट्र का माली ।
क्लेश काल का बनें
ग्रास नित ,
काल निशा हो कभी
न काली ।
लेकर के संकल्प आज ,
हम एक एक पेड़ लगायें
अपना देश बचायें ,
पर्यावरण बचायें ।
पर्यावरण बिन सूना
जग सारा ,
इससें ही हैं सब गतिमान,
आओ रक्खे इसका ध्यान ।
* मनोरमा जोशी ।🌳🌳
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प्रश्न चिन्ह
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*नदी से* - पानी नही , रेत चाहिए
*पहाड़ से* - औषधि नहीं , पत्थर चाहिए
*पेड़ से* - छाया नहीं , लकड़ी चाहिए
*खेत से* - अन्न नहीं , नकद फसल चाहिए
*उलीच ली रेत , खोद लिए पत्थर*
*काट लिए पेड़ , तोड़ दी मेड़*
रेत से पक्की सड़क , पत्थर से मकान बनाकर लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे सजाकर
अब भटक रहे हैं
मृत कुओं में झाँकते, रीती नदियाँ ताकते झिरिया खोजते, लू के थपेड़ों में
बिना छाया के हो जाती सुबह से शाम
*फिर भी सब बर्तन खाली l सोने के अंडे के लालच में , मुर्गी मार डाली !!!,*
*सभी इस पर विचार अवश्य कीजिए।*
पर्यावरण दिवस की शुभकामनाए तो ले ही लीजिए। ।
*ज्योती प्रतिक श्रीवास्तव
🌳🌴🌱🌿🎋🍃🍁☘️🍀
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||अशोक का पेड़ ||
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जहाँ न हो काम शोक का
ऐसा हूँ मैं पेड़ अशोक का
सबका मंगल गाता हूँ
पात पात मुस्काता हूँ
ऊंचे गगन में बाह फैलाकर
सबकी खैर मनाता हूँ
ऐसा हूं मैं पेड़ अशोक का.........
सबसे पहले मुझे मनाते
द्वार द्वार पर मुझे लगाते
परिणय बेला हो या उत्सव
मंगल कलश में मुझे सजाते
ऐसा हूँ मैं पेड़ अशोक का.........
ईश्वर का वरदान हूँ मैं
ओषधिय गुणो की खान हूँ मैं
हर व्याधि का करू निवारण
प्रकृति का अभिमान हूँ
ऐसा हूँ मैं पेड़............
सीता की वाटिका बनकर
छत्र छाया में उनको रखकर
हर पल उनकी रक्षा करता
अपने को बड़भागी समझकर
ऐसा हूँ मैं पेड़............
घर घर में मुझे लगाओ
पर्यावरण का मान बढ़ाओ
हमको अपना प्राण समझकर
अपने कल को सफल बनाओ
ऐसा हूँ मैं पेड़............
फले फूले सबका परिवार
लेता हूँ सब बलाये वार
प्रतिपल दे आशीष सुहावन
"मधु"जीवन का इतना सार
||मधु टाक||
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दोह्ंन क्रिया
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जब हम करेंगे ,भू संरक्षण ।
दोहन प्रकृति का ,नहीं करेंगे ।
प्रकृति के सच्चे, मित्र बनेंगे ।।
💦🔥💥🌱🦜🦡🦢🌳
पर्यावरण दिवस पर स्लोगन
🌲🌺🦋🕷️🐠🐆🐄💧
श्रीमती शारदा मिश्रा
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पुकार
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देखो हम हो जाए ना प्रदुषित,
कहती हैं पुकार के नदियां,
मुझसे ही है जीवन तेरी
मैं ना रहीं तो तू नहीं रहेगा,
आज बचा ले मुझे तू ज्ञानी,
ना रहीं मैं तो ना मिलेगी बूंद भर भी पानी,
कल- कारख़ाने के सारे मल,
तू मुझमे प्रवाहित करता है,
मुझे दर्द देने में तू जरा भी नहीं कतराता है,
देखो हम हो जाए ना प्रदुषित,
कहती है पुकार के नदियां!
ये प्रदुषित हवा भी, सबके अंदर आग लगाता है,
कंठ, फेफड़े, धड़कन को बीमार बना झुलाता है,
वायु प्रदूषण का देख लो नतीज़ा,
जो साँस के अंदर जाता है,
देखो हम हो जाए ना प्रदुषित,
कहती है पुकार के स्वच्छ हवा!!
जगह - जगह तू मुझपर कुड़ा - कर्कट फेंकता है,
प्लास्टिक, रासायनिक दवाईयों का मुझपर छिड़काव करता है,
मुझे तो करता है प्रदुषित,
खुद को कहा बचा पता है,
साधारण खाद्य, गोबर के बजाय
तू मेरे उपयोगी जीव को मारता है,
क्षणिक धन लोभ के कारण,
अपने ही जीवन मे प्रलय लाता है,
मैं रूठी तो बताओं,
कैसे खेतों मे सोना उठाएगा?
देखो हम हो जाए ना प्रदुषित,
कहती है पुकार के धरती!!
ध्वनि प्रदुषण को तू खुद बढ़ावा देता है,
जहाँ भी बजता है गाना...
जोर - जोर से तू चिल्लाता है,
जब होती है तेरे घर शादी,
ढोल शहनाई के जगह,
लाउडस्पीकर बजाता है.....!!
सोनी कुमारी
**पूर्णिया, बिहार🌲🌲मनमोहक घनाक्षरी🌲🌲....*
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मन की बात
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🌲🌲🌲🌲🌲
पेड़ रोज कट रहा
दुनिया सिमट रहा
हाथ जोड़ विनती है
दुनिया बचाइए
🦚🦚🦚🦚
🌦️🌦️🌦️🌦️
तापमान बढ़ रहा
रोग भी उमड़ रहा
प्रलयकाल निकट है
देश को बचाइए
✍️✍️✍️✍️
🍁🍁🍁🍁
सभ्यता विनष्ट
हर मानव को कष्ट
गर मानव है तो
दैत्य रूप मत अपनाइए
😒😒😒😒😒
🐚🐚🐚🐚🐚
हर जीवन में ईश्वर है
पिता परमेश्वर है
यूँ ही हर जीव को भी
काट के न खाइए
🍖🍖🍖🍖🍖
👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
इतना सा काम करे
बड़ो का सम्मान करें
सदा अच्छी बातें निज
अनुज को सिखाइये
🥇🥇🥇🥇🥇
❤️❤️❤️❤️❤️
कहता मनीष गर
चाहिए आशीष तब
जीवन मे एक वृक्ष
स्वेक्षा से लगाइए
🔱🔱🔱🔱🔱
🕉️☪️✝️☸️✡️🔯
स्वर्ग से भी ज्यादा सुख
नही होगा कोई दुख
राम राम कहिये
प्रभु के पद पाइए ।।
🔱⚜️🔱⚜️🔱⚜️
**मनीष कुमार तिवारी*
*💐 मनी टैंगो💐*
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मेरा दिल और पर्यायवरण
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मेरे भी दिल मे अभी,
उम्मीदे बहुत बाकी है।
बस सभी का साथ चाहिए।
पर्यावरण को बचाने के लिए ।
इंसानों का साथ चाहिए।
जो हर मोड़ पर साथ दे,
इसे बचने के लिए।।
तप्ती हुई इस धूप में,
शीतल सी छाया चाहिए।
जो हाल गर्मी से हो रहा है ।
उसे शीतल करने एक,
ठंडी सी लहर चाहिए ।।
बिना वृक्षो के कारण ही,
यह हाल है गर्मी का।
उससे बचने के लिए,
वृक्षारोपन करना चाहिए।
तभी इन गर्म हवाओं को,
शीतल हम कर पाएंगे।
और अपने देश का,
पर्यवरण को बचा पाएंगे।।
इस लक्ष्य को पाने के लिए।
पर्यवरणको बचाने के लिए।
एक जूनून हर देशवासियो के,
दिलमें बस भरपूर चाहिए।
और सभी का साथ चाहिए।
जय जिनेन्द्र देव की
*संजय जैन ( मुम्बई)
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विधा:- मुक्तक
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शीर्षक:- हो हरा भरा संसार
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आओ मित्रों मिलकर करें शुभ विचार,
पर्यावरण संरक्षण करें हो हरा भरा संसार,
बरसेगी खुशहाली बारिश जीवन में हरपल
दृढप्रतिज्ञ हो हटाते चले पथ के अंगार।
गले मिलकर कर लें दोस्ती वृक्षों से
बना लेंअनुपम चादर सुखदायिनी तृणों से
सबकी होठों पर रहेगी सदा मीठी मुस्कान
कर लें बाहर स्वंय को लोभी वृत्तों से
* रीतु प्रज्ञा
दरभंगा, बिहार
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विविधता
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पर्यावरण दिन जग है , मनाता पाँच जून ।
जैव विविधता को बचा , न बहा पशु का खून ।
बिगड़े पर्यावरण से , सूरज उगले आग ।थल , जल नभ के जीव सब , रहे वनों से भाग ।
जंगल कटने से नहीं , होती अब बरसात ।
बदल गया मौसम सभी , करता जीवन मात ।
ना हो ग्लोबल वार्मिंग , पेड़ लगा इंसान.
होय शुद्ध परिवेश तब , कर वन का सम्मान.
वन्य जीव हैं प्रकृति की , जैव विविधता शान ।
बचा जीव ‘ मंजू ‘ सभी , भू के ये वरदान ।
बिगड गया पर्यावरण , मानव करे सवाल ।
मनमानी की होड़ से , प्रकृति हुई बेहाल
औद्योगिकरण क्रांति से , होता जगत विनाश ।
माँ गंगा मैली हुई , क्या यही नीर नाश ?
औद्योगिक अवशिष्ट बह , भरे नदी में गंद ।
जहरीला अब जल हुआ , साँस हुयी हैं मंद ।
*डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई
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भ्रम...
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दीवार के एक
कोने में,
उग आए पीपल को,
उखाड़ फेकती...
किसी ने कहा था...
पीपल का वास,
शुभ फलदायक नही...
नीम-बरगद बांस से,
आबद्ध प्रेम था,
इन्हें सजाकर रखती,
बोनसाई का रूप दे कर.....
छोटे से घर में,
माटी नही,
जहाँ लगा सकू...
आम, अमरूद, जामुन...
खुद को प्रकृति प्रेमी,
मानने के भ्रम में,
लगाने लगती हूँ,
गमलों में,
कुछ मौसमी फूल....
*प्रतिभा श्रीवास्तव अंश
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🌴"धरा हरियाएँ"🌴
जब जब धरा हरियाएँ
तो जीवन मुस्काएँ
लहराती जब हरी-भरी डालियाँ
मानव को मिलती अमृत की
प्यालियाँ
जब तक न सहेजोगें
यह ताल ,तलैय्या और नदियाँ
कैसे पाओगे जीवन की खुश-वारियाँ
खामोशी से भर गई ये वादियाँ
काँट दिये सभी दरख़्त
सीने पर अपनों ने ही
चला दी आरियाँ
चुप गवाही दे रहें परिंदे
इसी जगह पर हुआ करता था,
उनका आशियाँ
वे नूर सी हो गई ये फिजा़ये
मेरे इस खूबसूरत से
चमन को लग गई
अपनी ही नजरियाँ
क्या संदेशा दू सबको
जब खुद ही मारी,
पैरों पर कुल्हाडियाँ ।।
* शालिनी खरे
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मोहताज
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*पैसों की मोहताज*
*"""""नहीं होती"""""*
*""""""खुशियां""""""*
*"""जिस घर में"""""*
*सब मिलजुल कर*
*""""प्यार से रहें""'""*
*"""वो घर किसी"""*
*"""""""स्वर्ग से"""""*
*""""""कम नहीं"""""*
*""""""""होता""""""*
*अल्पना वाणी
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*🙏🙏🌹🌹🌹🌹🙏🙏*
[
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हरित अभियान
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सायली जब स्कूल से आई तो देखा अज्जी के कमरे में वाड़े के सभी बूजुर्ग बैठे हुए थे और किसी गंभीर विषय पर चर्चा कर रहें थे, उसने फटाफट से बस्ता रखा और हाथ मुंह धोकर रागी ताई के कमरे में गई और पूछा "क्या हूआ ताई आज सभी आजी आबा अपने यहां क्यों आए हैं"? रागी ताई ने कहा "अरे सायली बात ही ऐसी है, अपने घर के सामने जो बगीचे के बाहर आम और औदुम्बर का पेड़ है न वे कटने वाले हैं pwd के लोग आए थे उन्होंने वाडे के सभी लोगों को परस़ो से पेड़ के नीचे गाड़ियां लगाने से मना कर दिया है,कह रहा था रास्ते के चौड़ीकरण का काम शुरू होने वाला है पेड़ बीच में आ रहें हैं काटने पड़ेंगे,उसी को लेकर अज्जी और बाकी लोग परेशान हैं आखिर वे पेड़ उनके दुख-सुख के साथी रहे हैं,सुबह कि सैर के बाद वे लोग किसके नीचे बैठकर अपनी पुरानी यादें ताजा करेंगे उसी पर विचार विमर्श चल रहा था
सायली को भी सुनकर बहुत बुरा लगा आखिर वे पेड़ बच्चों के भी दोस्त थे कितनी बार बच्चों कि टोली ने उसपर झुले बनाए थे,आम तोड़कर खाएं थे, औदुम्बर कि कहानियां सुनी थी, पक्षियों के घोंसले बनते देखें थे
वह खाना खाकर अज्जी के कमरे में गई और उनके गले लग कर बोली"अब क्या होगा अज्जी क्या सच में पेड़ कट जाएंगे"अज्जी बोली "ऐसे कैसे कट जाएंगे, तुम देखना क्या होता है
तीसरे दिन जब वह स्कूल से आई तो देखा वाड़े के सभी बूजुर्ग पेड़ों के आसपास खड़े हैं कोई भी वहां से नहीं हील रहा pwd वाले उनसे बार-बार हटने को कह रहे हैं पर वे टस से मस नहीं हो रहे सायली समझ गई उसने तुरंत बस्ता रखा और वाड़े के सभी बच्चों को इकठ्ठा किया सबने मिलकर आधे घंटे में बड़े बड़े 'पेड़ बचाओ 'के पोस्टर बनाएं और वानर सेना निकल पड़ीं पेड़ों के पास , कुछ बच्चे तो पोस्टर लेकर पेड़ों पर ही चढ़ गये सबका एक ही कहना था कुछ भी हो जाएं पेड़ नहीं कटेंगे pwd वाले गुस्से से खिझ रहे थे उन्होंने बड़े अफसरों को फोन किया वे लोग आए, पुनः चौड़ीकरण के प्लान पर विचार किया गया पुनः नक्शा देखा गया फिर उन्होंने सभी कि तरफ देखकर तालीया बजाना शुरू कर दिया,पता चला नक्शा बनाते समय रास्ते के चौड़ीकरण को नापने में कुछ त्रुटी हो गई थी पेड़ वाला क्षेत्र उसमें नहीं आता इसलिए पेड़ नहीं कटेंगे सभी खुशी से चिल्लाने लगे आखिरकार अज्जी और उनके मित्रों की हरित क्रांति काम आ गई और बच्चों की सहायता सराहनीय रही सभी ने पेड़ों के चक्कर लगाएं और पेड़ों ने भी लहलहा के अपनी खुशी जाहिर की
स्वरचित-* स्वाति वाड़गे (वनकर)
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दूषित पर्यावरण
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*क्योंकि निज स्वार्थों का आवरण ओढ़ लिया है*
*हरियाली की जगह पथरीले शहर ने ली है जगह*
*फैसला तो हमको ही लेना होगा चाहिए कौनसी डगर*
*आज प्रदूषण का फैला चारों तरफ है जहर*
* *पर्यावरण पर नहीं दिया ध्यान जीना होगा मुहाल*
*आज हम ये लें प्रण जीवन लगाएंगे वृक्ष हरे भरे*
*तब ही प्रकृति की कर पाएंगे सुरक्षा*
*आने वाली नस्लों की रक्षा की जरूरत है ये*
*पर्यावरण की करें सुरक्षा जीवन की यही है सार्थकता*
***पूनम शर्मा*
*इंदौर*
===============================================================विश्व पर्यावरण दिवस और वट पूर्णिमा है ।*
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*दोनों का मकसद एक ही है, एक अंग्रेजी फैंसी नाम है*
*जिसे बुद्धिजीवी मनाना गर्व की बात समझते है,*
*भाषण लिखे जाते है ,*
*पुरस्कार ठुकरा दिए जाते है,*
*ट्वीटर ट्रेंड चलते है,करोड़ो की फंडिंग ली जाती है और हड़प कर दी जाती है*
*दूसरा एक शालीन तरीका हैं प्रकृति से रिश्ता जोड़ लेने का ,*
*मगर वो रूढिवादिता है,पैट्रिआर्क है और पता नही क्या क्या।*
*उसकी कोई चर्चा नही है, कोई ट्रेंड नही, स्टेटस नही , न भाषण में ना शासन में क्योंकि उससे पैसे नही बनाये जा सकते ।*
*उन सभी को सादर प्रणाम जिन्होंने ये परंपरा सदियों से ब बनाये रखी और आज भी पालन कर रही है ।*
*वट पूर्णिमा की शुभकामनाएं*
*सविता ठ।कुर
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धरा
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हमारी धरा थी कितनी सुंदर और पावन
हरे भरे वृक्षों से लदी हुई मनभावन
ये तो है सारी बीती सदी की प्यारी बातें
छा गई प्रकृति पर अब तो स्याह भरी रातें
बनाने घर, करने त्यौहार को जो मंगल
कभी लोहड़ी, होली, दशहरा और पोंगल
करने लगा है ये मानव प्रकृति से दंगल
स्वार्थ वश काटने लगा जंगल के जंगल
करता है वो नित्य चिकनी चुपड़ी बातें
कहता है मानव धरती को माते - माते
ये सब केवल झूठा दिखावा और छलावा है
धरतीमाता ने ये कैसा निर्दयी पुत्र पाया है
हरे भरे वृक्ष फल फूल खेत खलिहान नदियां
जैसे हो ये धरतीमाँ का आँचल और चुनरियां
पर वाह रे हे क्रूर मानव तू माँ माँ करता है
अपनी ही माँ की इज्ज़त से खिलवाड़ करता है
अपने ही माँ के आँचल को तू तार तार करता है
कैसे तू अपने संस्कारों को शर्मसार करता है
कैसे तू लकड़ी और पानी को बर्बाद करता है
माँ को लूटकर अपना घर आबाद करता है
रोने लगी अब धरा लिया रूप उसने भी रौद्र
करने लगी है अब वो भी तो मानव पर क्रोध
ओजोन में छेद, ग्लेशियर पिघलाने लगी है
नदी नाले को तेज़ से प्रकृति सुखाने लगी है
कभी सूखा कभी बाढ़ कभी महामारी फैलाने लगी
प्रकृति भी अपने वजूद का अहसास कराने लगी
अबोल जीवों का संहार करने लगा मानव
इंसानियत का कर खात्मा बन गया दानव
सुनामी भूकंप निसर्ग कॅरोना साइक्लोन
प्रकृति ने भी लिया फिर बदला होकर मौन
अब भी सुधर जा कुछ नही बिगड़ा है इंसान
कर वृक्षारोपण और प्रकृति का तू सम्मान
प्रकृति होगी सुरक्षित तो तू भी होगा सुरक्षित
*'परी'* हृदय से कर सुरक्षा उनकी तन मन कर अर्पित
*प्रणिता राकेश सेठिया *परी*
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रवि किरण
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रवि किरणों का स्पर्श मिला,
नवजीवन धरा के अंतर में अकुलाया है।
वसुधा के उर में निश्चिंत पड़ा,
दिनकर ने फिर स्नेहभाव से सहलाया है।
नभ में विचरण करती बदली ने,
ममत्व भाव से उस पर स्नेह नीर बरसाया है।
स्नेह सिक्त कोमल भाव है आधार,
धरणी के आंचल में जीवन पुलका इठलाया है।
कोंपल फूटी प्रस्फुटित हुआ वह
मानव का मित्र बना वृक्ष वही कहलाया है
*अर्पणा तिवारी
इंदौर मध्यप्रदेश
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प्रदूषण
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"प्रदूषण सहता रहा मै ,बूंद बूंद भता रहा मै ,सुनी न किसी ने मेरी आवाज ,आज बद से बदतर हो चले मेरे हालात ,सजा मिली है सभी को इसी की , अधर सभी के सूख चले ,ढूंढ़ते हो मेरे निशा ,जब मेरे निशा सूख चले ,आओ आओ धरा पर पेड़ लगाएंगे ,भरपूर हरियाली होगी ,जल बरसायेंगे ,अब ही समय है आओ शपथ ले धरा पर पेड़ लगाए ,आओ संकल्प ले व्यर्थ भी हम एक बूंद न बहायेगे , समझेंगे जल का महत्व औरों को समझाएंगे ,अब तक सुनते आए थे हम यही कहानी ,की एक था राजा ,एक थी रानी ,कल कही कहना न पड़ जाए दोस्तो की एक था पानी ,एक था पानी ,एक था पानी
* "प्रस्तुत कर्ता "साधना श्रीवास्तव "🙏🏻👆🏻
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: *पर्यावरण दिवस पर स्लोगन*
1.पेड़ लगाएं, पर्यावरण बचाएं
🌳🌳🌳🌳🌳
2.फल-फूल व जड़ी-बूटी के दाता, तुम्हारी महिमा सबसे न्यारी वृक्ष राजा ।
🌿🌿🌿🌿🌿
3.मत काटो कभी पेड़ को,
यह धरती की शान,
पेड़ प्यारी वर्षा को लाते,
जन जीवन को खुशहाल बनाते ।
🌴🌴🌴🌴🌴
4. पेड़ प्रकृति के हैं अंग,
कभी न करना इनको भंग ।
🍀🍀🌲🌳🌿
5. हम सब करें पेड़ों को प्यार,
पेड़ ही हैं जीवन का आधार ।
🌳🌿🍃🍃🍃🥀🥀🌷🌷🌺
6. पेड़ हमारे सच्चे साथी,
काट इन्हें विदिर्ण न करो वसुधा की छाती।
🌱🌿🌿🌹🌹🥀🥀🥀🌷🌷🌻🌻🌻🌿🌿🍃🌱🍂🍁🌱
स्वरचित
* सुश्री हेमलता शर्मा
'भोली बैन'
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पर्यावरण है शाश्वत
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प्रगति के तेरे पथ पर
प्रकृति को तू गया भूल,
सुविधा की दुविधा में आखिर
देगा कितने और शूल।
चीर हरण किया धरा का
लाज,शर्म सब गया भूल ।
रक्षक बनकर आया जिसका
भक्षक बन मद में हुआ चूर ।
संसाधन की लूट मचाई
मान लिया एकाधिकार
बुद्धि का कर दुरूपयोग
दंभ दिखाया बारंबार।
संकेत प्रकृति देती तुझको
रक्षक बन होजा जागृत
इसके समक्ष तू अंशमात्र है
पर्यावरण है शाश्वत।
स्वरचित
*सुरेखा सिसौदिया
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*कविता* :
*मन की चाह*
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चाह यही बन जाऊं वृक्ष कोमल
और बहाऊ वायु शीतल
फूलों से भरी हो मेरी डाली
फलों की बहार हो निराली
पत्तों में गूंजे कलरव पक्षियों का
छाया में डेरा हो पथिको का
दू आश्रय नन्हे नन्हे छोनों को
बांधू पृथ्वी मां की मिट्टी पानी दोनों को
झड़ते पत्ते मिट्टी में खाद बना लेंगे
मुझे व फसलों को भी लहलहा देंगे
डलेंगे झूले मुझ पर जब सावन में
मंगल गीत गूंजेंगे मेरे आंगन में
भोजन लकड़ी और ईंधन भी
मुझसे पा पाएंगे
औषधीय गुणों के उपयोग से
निरोगी हो जाएंगे
धूप ,चांदनी ,बूंद और बयार
सभी मेरी संगी साथी
हम सब से मिलकर प्रकृति
मंगल गीत है गाती
माना की धूप आंधी पानी में भी
मुझे रहना होगा
पत्थर और कुल्हाड़ियों के
वार भी सहना होगा
बूढ़ा होकर एक दिन
में गिर जाउंगा
पर अपने ही बीजों से
पुनर्जन्म भी में पाऊंगा
तय है दुर्भाग्य, भाग्य ,
सभी का अपना,
तय है मेरा भी ,
एक दिन गिरना कटना ।
फिर भी अवशेष मेरे ,
किसी काम तो आएंगे,
कभी जीवित था ,
यह पहचान बताएंगे।
चंदा यहां एक ,
सूरज यहां एक ,
मेरा अस्तित्व निरंतर ,
अनेकानेक- अनेकानेक।
अब यही एक चाहत
हो मेरी पूरी
वृक्ष बन प्रकृति में रहूं
प्रकृति सदा रहे मेरी
*डॉ विजय आर चौरे
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*एक आव्हान-*
"पर्यावरण और धरती"
धरती हमारी धमनी है
उसे यूं न सताओ
वृक्षारोपण करो
पर्यावरण को
दुषित होने से बचाओ
नदियों में न डालो कचरा
पानी में जहर ना फैलाओ
कारखानों का मेला
नालों में न बहाओ
धरती हमारी धमनी है
उसे यूं न सताओ
न काटो जंगल
उसमें रहते प्राणी
उन्हें घरों में घुसकर
भक्षक बनने को
न उकसाओ
प्रकृति का आवरण
उससे मत छीनो
जितना मिल रहा
उसमें ही सुकून पाओ
अतिवृष्टि अनावृष्टि
आकाल की मार से
निर्दोषों को बचाओ
धरती हमारी धमनी है
उसे यूं न सताओ
जलचर थलचर नभचर
सभी को जीने का
अधिकार बराबर
प्राकृतिक आपदा को
आमंत्रित न करो
उनका जीवन भी बचाओ
वृक्ष लगाओ
धरती हमारी धमनी है
उसे यूं न सताओ
जब सांसें ही नहीं
चल पायेंगी
जीवन कैसे बच पायेगा
धरती हमारी धमनी है
उसे न सताओ
वृक्ष लगा
धरा को सुशोभित
करने वसुन्धरा का
हाथ बटाओ
धरती हमारी प्राणाधार है
उसे यूं न सताओ
पर्यावरण बचाने में
धरती मां का हाथ बटाओ
* कुमुद दुबे
इन्दौर (म०प्र०)
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: तुमने पत्तो पर
शाखो पर नमी
देखी होगी
मैने रात भर
तुम्हारे दर्द पर
आकाश को रोते देखा है
तुम्हारे प्यार मे ऊपर बैठा
वह भी तो
तडपता होगा
सिसकता है
सीना उसका भी
थडकता होगा ओर
और तुम्हे लगता है
बादल गरजा
तुम्हे मनाने
तुम्हे समझाने
सुन्दर फूल खिलाता है
मीठे मीठे फल भी तो
वही भेजता है,
तुम्हे मनाने
*वसुंधरा पाण्डेय
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वसुंधरा
_____
हरी भरी वसुंधरा ,नीला नीला ये गगन.... इस सुमधुर गीत में पर्यावरण की सुंदरता और चित्रकार सृष्टि निर्माता का बेहतरीन वर्णन है। कल कल बहती नदियां ,ऊंचे पर्वत शिखर ,वन ,बाग बगीचे हमारी धरोहर हैं जो प्रकृति प्रदत्त हैं।लेकिन आधुनिकता और शहरीकरण की दौड़ में हम इनकी उपस्थिति को ही अनदेखा कर रहे हैं।छायादार वृक्षों की कटाई कर कांक्रीट की बस्तियां बढाई जा रही हैं।आगे बढ़ने की चाह ने हमे मानो विचारविहीन कर दिया है।
हमारा बचपन मे बारिश में भीगना ,कागज की नाव बना कर बहते पानी मे तैरना ,संगी साथियों को बारिश के पानी की तरफ धकेलना ये सब मानो अब कल्पनातीत हो गया है।हमारी वर्तमान और अगली पीढ़ी इन खूबसूरत अनुभवों से वंचित सी होती जा रही है।
अब समय आ गया है कि हम प्रकृति के संरक्षण का जिम्मा उठाएं।इसके लिए हमे ही पहल करनी होगी ,युवाओं और बच्चों के मन मे प्रकृति प्रेम का अलख जगाना होगा।वृक्षारोपण के लिए उन्हें प्रेरित करना होगा ।
लुप्त होते पक्षियों की रक्षा के लिए भी यह बेहद आवश्यक है।
यदि हम थोड़ा सा भी प्रयास इस दिशा में करें तो वो दिन दूर नही जब हमारी अगली पीढियां भी ये गीत गुनगुनाएँगी ,हरी भरी वसुंधरा ,नीला नीला ये गगन....
अचला गुप्ता
इंदौर
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लघुकथा
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वृक्षारोपण
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' अरे हरिया ! तू यह क्या कर रहा है कल ही नेता जी ने यहां ढेर सारे पौधे लगा वृक्षारोपण का नेक कार्य किया हैं ताकि हमारे गांव मे भी खूबसूरत हरियाली छा जाये और पर्यावरण शुद्ध रहे, देख अखबार में फोटो भी छपी है एक तू है कि इन पौधों को उखाड़ने में तुला हुआ है तेरी जगह और कोई होता तो मैं पुलिस के हवाले कर देता उन्होंने फोन कर मुझे इन पौधों की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा है समझा, चल भाग यहां से '
गांव के मुखिया की आवाज सुन हरिया ने सिर ऊपर उठाया और समझाइसी स्वर में जवाब दिया-
' मुखिया जी ! कल वृक्षारोपण के वक्त आप तो यहां थे नहीं, मैं ही था ये गढ्ढे भी मैंने खोदे हैं नेताजी ने तो केवल अखबार में छपने के लिए ही वृक्षारोपण किया है उसी काम को मैं अब अंजाम दे रहा हूं देखिए आपके पीछे आम, जाम, नीम, जामुन आदि के पौधे रखे हैं जिन्हें में यहां वहां से ढूंढ ढूंढ कर इन गड्ढों में लगाने के लिए लाया हूं और इन पौधों को देखिए जिन्हे उनके साथ आए लोग आनन-
फानन में पास वाले खेत से कुछ पौधे उखाड़ लाये और नेताजी के हाथों लगवाते हुए फोटो खींचा और चले गए '
मुखिया जी की नजर जब उन पौधों पर पड़ी तो उनका तमतमाया चेहरा लटक गया क्योंकि वे पौधे भिंडी ,टमाटर ग्वारफली ,मिर्ची आदि के थे.
* मीरा जैन
.
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बरगद का पेड़ (वटवृक्ष)-
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"🌴हमारा राष्टीय वृक्ष"🌴
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हरियाली से ही खुशहाली होती है। हमारे आसपास सड़को पर ,हमारे घरों में जब हम हरे भरे पेडो़ को देखते हैं तो बहुत अच्छा लगता है।कुछ वृक्ष वार्षिक होते है तो कुछ का जीवन काल एक या एक से ज्यादा साल तक होता है।
बरगद,पीपल और नीम यह वृक्ष हमारे चहु़और दिखाई देते है और हम घरों में भी इनको लगाते है ।इनका वैज्ञानिक और औषधीय महत्व भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
🌴 बरगद का पेड़ विशाल बहुवर्षीय होता है।इ सका तना सीधा और कठोर होता है।इसकी शाखाओं से जडे़ निकलकर हवा में लटकती हैंऔर बढ़ते हुए धरती के भीतर चली जाती हैं।इसके फल लालरंग के गोलाकार होते हैं।इसकी पत्ती चौडी़ अण्डाकार होती है।बरगद की शाखा और कलिकाओं को तोड़ने पर दूध जैसा रस निकलता है ,जिसे लेटेक्स अम्ल कहते है।सूखा और पतझड़में भी यह वृक्ष हराभरा रहता है।सदैव बढ़ता रहता है। यही कारण है कि
इसे "राष्टीय वृक्ष" घोषित किया
गया है।🌴
बरगद का धार्मिक और पौराणिक
महत्व -
🌴त्यौहारों पर वटवृक्ष की पूजा की जाती है। हिन्दु पौराणिक कथाओं में बरगद को पवित्र वृक्ष बताया गया है।भारत के क ई मंदिरों में इसे देखा जा सकता है।
इसकी आयु 500 से 1000 साल की होती है। यक्षो के राजा मणिभद्र से वट वृक्ष उत्पन्न हुआ।
यह वृक्ष "त्रिमूर्ति "का प्रतीक है।
इसकी छाल में विष्णु,जड़ मेंब्रहमा और शाखाओं में शिव का वास माना जाता है।जैसे पीपल
को विष्णु का प्रतीक माना जाता है। बरगद लंबे समय तक जीवित रहता है इसलिए इसे "अक्षयवट" भी कहते हैं।🌴
औषधीय महत्व --
इसका प्रयोग -
प्रतिरोधक क्षमता बढा़ने में,
दाँत एवंमसूडो़ कोस्वस्थ रखनेमें,
वजन कम करने में,डायबिटीजमें,
डिप्रेशन,जोडो़ के दर्द में भी सहायक होता है।इसमें बहुत से पौष्टीक तत्व भी पाये जाते है।
बरगद को "बोन्साई "के तौर पर भी लगाया जाता है।इस प्रकार वटवृक्ष की महिमा अपरंम्पार है।
हमारे जीवन मे वृक्षो का महत्वपूर्ण योगदान होता है।वृक्षो से आॅक्सीजन,फल,फूल,सब्जीयाँ
मिलती है। सभी को वृक्ष अवश्य ही लगाना चाहिए ये हमारे जीवन के पूरक होते है।🌴
* वन्दना अर्गल
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संकल्प का दिया
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संकल्प का दिया हम सबको जलाना है
प्रकृति को सहेजना और पर्यावरण को बचाना है।
प्रकृति हमें अनमोल उपहार
बड़े प्यार से देती है
हमारे जीवन को संवार देती है
प्रकृति का हमें कर्ज चुकाना है
एक पेड़ जन्मदिन पर जरूर लगाना है।
प्रकृति को सहेजना है पर्यावरण को बचाना है।
सोचो अगर पेड़ नहीं होंगे
तो जीवन कैसे होगा
संसार में जीना भी
फिर संभव नहीं होगा
हमें जीवन को बचाना है
प्रकृति को सहेजना है पर्यावरण को बचाना है।
खुदगर्जी के कारण हमने
कई पेड़ निर्ममता से काटे हैं
उसका परिणाम कभी ना कभी
हमको ही भुगतना है
इसलिए पहले से ही चेतना है।
ना समय पर बारिश होगी
ना मौसम अनुकूल होगा
ओजोन की परत में कई छेद होंगे
प्रचंड गर्मी से हाहाकार होगा
प्रकृति के कोप सेसंसार को बचाना है
प्रकृति को सहेजना है पर्यावरण को बचाना है।
*नीति अग्निहोत्री
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कविता
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प्रक्रति
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ही मानव,, प्रकृति की सौंदर्य ता से तूने की छेड़छाड़,, अभी करो ना से उबरे नहीं कि निसर्ग ने किया बवाल🌷
नदियां ,पहाड़ ,पेड़ पौधे ,जल ,सब हीरे मानिक मोती से अलंकार है 🌹इनकी होने से जीवन धन्य धान परिपूर्ण से
पूर्ण संचार है🌹
पर वही प्राकृतिक संसाधन के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती🌷 और इनका अंत कर के मानवीय संवेदनाएं और पीड़ाएं तूने ही तो बुलाई🌷
आज प्राकृतिक आपदा से घबरा गया! घूमता फिरता इंसान घर में ही समा गया🌷 नदियों के बहाव को रोका और बांध बना डाले।🌹 जगह-जगह बहती धाराएं बन गए गंदे नाले🌹
अभी भी संभल जा, प्राकृतिक आपदा से डर जा वही🌹 प्राकृतिक संसाधन स्थापित कर, नवजीवन की साधना स्व रचित कर🌹
नवसृजन ,नव दृष्टि नया सूरज, उगेगा🌹 नव प्रस्फुटित नवजीवन, नवांकुर प्रस्फुटित होगा🌷
इसलिए कहना चाहूंगी कि, पर्यावरण बचाओ मित्रों ,,पर्यावरण बचाओ,🌹 एक पेड़ यदि गिर जाए तो 11 पेड़ लगाओ🌷🌷
*सुषमा शुक्ला इंदौर🌷
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अग्रवाल: पेड़ लगाओ
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पेड़ लगाओ, पेड़ लगाओ, पेड़ लगाओ🌹
में देता तुम्हे छाया, फल फूल,
में तुम्हे जीवन देकर करता मालामाल🌹
मानव तुम मेरा ही खून कर रहे हो🌹
धरती मां को बंजर बना रहे हो,
संकट को बुला रहे हो🌹
बाढ , तूफान, महामारी को आमंत्रण दे रहे हो🌹
सुखमय जीवन जीना हो तो जितना तुम मुझसे ले रहे हो,🌹
उतना तुम मुझे वापस करते जाओ🌹
प्रत्येक मानव पांच पांच पेड़ लगाए उन पेड़ो की देख रेख करे तो जैविक विविधता के चक्र को
फिर से हरा भरा, मन भरा कर दूगी, धरती मां का वादा है।🌹
जन्मदिन शादी की सालगिरह, विभिन्न त्योहारों पर अधिक से अधिक पेड़ लगाए, दूसरों को भी प्रेरित करे।
हरियाली ही खुशहाली है।
* सुनीता अग्रवाल स्वरचित
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*किसको कहां जाना है*
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किसको कहां तक जाना है?
आखिर कहां आखिरी ठिकाना है?
ये कौन लोग हैं?
कहां जा रहे हैं?
कुछ आ रहे हैं
कुछ जा रहे हैं
सब अपनी जिंदगी दौड़ा रहे हैं
और भैया
विकास की नैया को आगे बढ़ा रहे हैं
धरती को छलनी कर
आसमान में छेद कर
नदियों को प्रदूषित कर
चांद के पार जाकर
पता है अब हम मंगल पर जा रहे हैं
मंगलगीत गा रहे हैं
तो भैया विकास की नैया को आगे बढ़ा रहे हैं
देखो अब दुनियां हमारी मुट्ठी में है
छोटे से मोबाइल से हम
पूरी दुनियां चला रहे हैं
विकास की नैया को आगे बढ़ा रहे हैं
अरे! तो फिर
तो फिर आज क्यों हम स्तब्ध हैं ?
क्यों स्तंभित हैं?
आज क्यों हम लाचार हैं?
क्यों आज प्रकृति का प्रहार है?
गर उन्नति है, उत्कर्ष है
तो कैसी ये अराजकता है?
आखिर! आखिर कौन गुनहगार है?
कौन इसका ज़िम्मेदार है?
मैं!
मैं तो एक लेखक हूं
वह इंजीनियर है
वह डॉक्टर है
वह शिक्षक है
वह वैज्ञानिक है
और वह मजदूर है
तो फिर किसका ये कसूर है
हम सब, हम सब हैं
बस महामानव की इस कहानी में
मानवता काफूूर है
देखो न
एक हथिनी को फटाखा खिलाकर
हम विकास का तिलक लगा रहे हैं
धरती मां के गौरव को छलनी कर
किस हक से
हम सर उठाते हैं
माता की बलि जो मांगता है
धरती माता की बलि जो मांगता है
इस भौतिक विकास की क्या मानता है
मानव विकास नहीं जब तक
प्रहार प्रकृति का निश्चित दूर दूर तक
प्रकृति बदलो मानवता की
प्रवृत्ति बदलो आदमियत की
फिर चलो विकास के पहले
पन्ने पर
लिखो नई परिभाषा विकास की
और फिर आगे बढ़े चलो
बढ़े चलो, आगे बढ़े चलो
*डॉ. स्वाति सिंह
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नीम
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नीम की शिकायत
तुम मुझे कड़वा क्यों कहते हो???
फिर फोड़े होंने पर मुझे ही तोड़ते हो,,,
उपमाएं देते हो कड़वा जैसे नीम
फिर प्यारे दादा आपके
खाट क्यों बिछाएं मेरे ही तले??
तेल हमारा क्यों तुम्हारे काम आए?
गेहूं और चावल में
हमें ही सूखा के डालो,,,
फिर बोलो नीम की निबौली बड़ी कड़वी है,,,
डाल मेरे हाँथ है झूला तुमको झुलायें
माना हम मीठे नही
फिर भी हम रीते नही
अब तो मान जाओ हमें,,,
अब ना चिढाओ हमें
तुम हो अनमोल ,,,
और भी कुछ कम तो नही
आओ साथ साथ रहें
आओ संग संग बढ़ें
*माया कौल
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चिडिया
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मेरे कच्चे आँगन में
अंबिया की डाली पर
चहकती है
सुबह से चिडियों की टोली
गुनगुनी धूप में
यहां वहां फुदकती रहती है
नन्हे बच्चों की तरह
चिडियों का चहकना
अच्छा लगता है
मन को
सुकुन देती है
उसकी
सुंदर क्रीडाएँ
जिसको देख
भूल जाती हूँ
अपनी पीडा
खो जाती हूँ उनमें
पलभर के लिए
गृहस्थी के
जोड घटाव से दूर
पंख फैलाकर
उडते-उडते
दे जाती है वो
हौसला जिंदगी
जीने का
ऊँचे आसमान में
उडने का
अपने सपनो में
रंग भरने का
उन्हें साकार करने काl
*नंदनी जोशी
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*अनन्त*
---------
दूर क्षितिज में आकाश है अनन्त
आकाश की ओर निहारते हे पंछी
तेरे मन की सोच भी है अनन्त
मानव की भांति पंछी तेरी भी
भावनाएं होती होंगी अनन्त
सीमित आकांक्षाएं लिये
सूखे वृक्ष पर बैठा पंछी
सीमेंट की नगरी को देख
सोच रहा अनन्त
क्यों?
दूर छितिज में
आकाश के अनंत छोर तक
उसके अपने ठोर के लिए
नहीं है हरे वृक्ष अनन्त
वृक्षों की बीच की दूरी अनन्त
पंछी की यह सोच को क्यों
भुला बैठा है मानव
अपनी अनन्त आकांक्षाओं के पिछे
गर अनन्त आकांक्षाओं का
हो जाए अंत
फिर सब जो पाएंगे प्रकृति में
वह भी होगा अनन्त
मोहक सुंदर मधुर प्रकृति के
रंग मिलेंगे तब अनन्त
प्रकृति प्रदत्त सब अनन्त
लालसाओ में सब का अंत
**अर्चना चौरे ,सहायक शिक्षिका*
===============================================================
----लघुकथा
--- -- *सच्चा दोस्त इक माँ*
रोज मेरे टेरेस पर मेरे दोस्त कबूतर,चिड़िया,तोते, गिलहरियों की आवाजाही रहती है दाना चुगते.... हमारे तोते आम खाते मुझसे अपनी आवाज में बात करते उनकी आवाज मेरे दिल को समझ आती हैं। 1 दिन काली चिड़िया जोर जोर से चिल्ला रही पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया किन्तु जब उसकी चिल्लाहट बढ़ गई तो मुझे लगा कोई बात जरूर है। वह बार बार मेरे पास आकर फिर गमले पर बने घोंसले पर जा कर बैठ जाती जोर जोर से चिल्लाती। मैंने पास जाकर देखा तो घोंसले में उसका एक बच्चा बेहोश अवस्था पड़ा था। में डर गई अब क्या किया जाय मैंने जैसे ही उस बच्चे को उठाने की कोशिश की चिड़िया जोर जोर से चीखने लगी उसने जोर मेरे हाथ पर अपनी चोंच मारी मैं घबरा गया पानी का कटोरा पास ही था मेने चूजे पर डाला वो हलचल करने लगा ,जैसे तैसे मैंने उस चूजे को घोंसले से निकला। चिड़िया के लिए मन बहुत दुःखित हो रहा था। मेरी आँखों मे आंसू भर आये चिड़िया चुपचाप बैठी देखती रही मेने पुनः चूजे के मुख में पानी डाला उसने पीया वो तड़पने लगा फिर पानी पिलाने लगी पर ये क्या ??? वो तो चल बसा अब मेरी आँखों से अश्क अश्रूधारा बह निकली। माँ माँ शब्द सुनाई पड़ा ।मेने घर के आगे खाली प्लाट पर उस चूजे का अंतिम संस्कार करवाया। हमारे पीछे पीछे चिड़िया जोर जोर से चीखती हुई हमारे पीछे आई अंतिम संस्कार तक बहुत चीखी चिल्लाई जैसे अपने बच्चे के लिए माँ बिलखती तड़पती है। उसकी तड़प देख में ने उस दिन भोजन नही किया उदास मन..... दूसरे दिन जब में दाना डालने टेरेस पर गयी तो वो काली चिड़िया गमले से उड़ चुपचाप मेरे पास आकर बैठी मेरी तरफ एकटक देखती रही मेने कहा कुछ खा लो तो उसने ना में गर्दन हिलायी मेरी तो मानो जैसे जान निकल गयी में अपने कमरे में आयी प्रभु से प्रार्थना की है प्रभु शक्ति दे फिर में वापस टेरेस पर गयी अपने हाथ में ज्वार दाना ले उसकी तरफ बढ़ाया (मेरे अश्क थम नही रहे थे) वो दाना चुगने लगी पर आज केवल चुप्पी ,चहचहाना नही उसकी चुप्पी में आभार के भाव थे वो दाना खाने लगी तो मुझे तसल्ली हुई । आज भी वो रोज आती हैं।
*ज्योति अतुल"* (सत्य घटना)
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पर्यावरण और प्रकृति
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काले काले बादलों को देखकर
नन्हें पौधों का मन मयूर नाच उठा।
जेठ दुपहरी में हरियाली खो चुके
पेड़ों का दिल धक से धड़क उठा।।
अहा ! देखो वर्षा रानी आ गई
हमारी प्यास बुझाने आ गई।
हवा के हिंडोले पर झूलती बदली
पेड़ों के पास आकर यूं बोली ।।
प्यारे भाइयो मुझे पकड़ो रोको
मेरे शीतल जल से स्वंय को सींचो।
आप सभी को तृप्त करना चाहती हूं
बारिश का अमृत देना चाहती हूं।
अगर अभी आपने नहीं रोका तो
ये पुरवाई मुझे बहा ले जाएगी ।
और तुम सब यूंही ठूंठ की तरह
मुझे जाते देखते रह जाओगे।
अरे !तुम तो सचमुच के ठूंठ हो
मानव ने तुम्हें ठूंठ बना दिया ।
मुझे अब माफ करना दोस्तों
आस पूरी किए बिना जा रही हूं ।
अगले साल फिर से आऊंगी
फिर बरसूंगी अमृत छिड़कूंगी।।
*डॉ सुधा चौहान राज इंदौर
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-प्रकृति का दोहन
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आज चट्टानें भी सरक रहीं,
पिघले पहाड़ हिम भरे।
दोहन,दोहन केवल दोहन
सुरक्षा देखो कौन करे?
नदियां मैली सागर मैला,
आसमान है मटमैला।
धूल के कण भी समाए हैं,
पर्यावरण पर छाए हैं।
बादल भी हैं फटते जाते
देख सुन सभी मौन रहे।
दोहन,
करते विकास कहकर काटे,
वृक्ष सारे कटते जाते।
छाया पंछी कैसे पाएँ?
ये पथिक कहां सुस्ताये।
गरमी बैचैनी है बढ़ाये,
ध्यान कौन इस ओर धरे।
दोहन,
पर्यावरण दिवस है मनाओ,
पहले प्रकृति प्रेम बढ़ाओ।
रत्न गर्भा के रतन बचाओ,
प्रदूषण तुम न फैलाओ।
बंध्या धरा न अन्न उपजती
पहले गोद माँ की भरें।
दोहन,,
*रश्मि लता मिश्रा
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शुभ कार्य
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आज पर्यावरण पर एक शुभ कार्य करो। एक पोधा जरुर लगावो अपने आंगन में वह जिवन दान देगा। मेने भी एक पोधा आज लगाया हे। विगत साल आम का पोधा लगाया था। अपने आंगन में उसकी देखभाल करती रहीअब वो बडा हो गया। उसको देख देख के मन हर्षित होता हे। जब उसकी शितल छाव मे बेठती हू तो मानो मुझसे कहरहा हो मा में भी तुम्हारे बच्चे जेसा बडा हो गया हू तुम्हारे बुढापे का मे भी सहारा हो गया हू। तुम मेरे पास आती हो तो मे तुम्हें शितल छाव देता हू। धिरे धिरे तुम्हे हवा देता हू। स्वस्थ स्वच्छ वातावरण देता हूं। तुम्हें उपहार रूप में मिठा फल देता हू। जेसे कहरहा हो मेरा ध्यान रखना मा मुझे पानी खाद मेरा भोजन देते रहना। घर को आस पडोस मे शुध्द हवा देता रहूंगा। अगर पतझड़ में सुख भी गया तो फिर से हरा भरा हो जावुगा। सीता मा से मुझे आशीर्वाद मिला है की तुम हमेशा हरे भरे रहोगे। आज पर्यावरण दिवस पर घर बहार एक पोधा जरुर लगावो। मन को बडा सकुन मिलता हे। शुध्द हवा मिलती है। आप सबको पर्यावरण की बहुत शुभकामनाएं।
* प्रभा तिवारी
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लघुकथा - - -
पर्यावरण
जब मिल बैठे तो बहस चल पड़ी । सभी चिंतित थी बिगड़ते पर्यावरण को लेकर । वही घटते जंगल , बढ़ता प्रदूषण की जहां सांस लेने तक को शुद्ध हवा भी ना हो कि तभी उनका नौकर डलिया भर पत्ते लेकर आया ।
हम चौंके - " क्या बकरी वगैरह पाल रखी है? "
" नहीं , प्रतिदिन एक सौ एक बेलपत्र चढाती हूं मंदिर में । " - वे हंसते हुए बोली ।
" एक सौ एक ! " - हम हतप्रभ मन ही मन । हमें तो यही बहुत ज्यादा लग रहा रहे थे फिर भी पूछा - " लेकिन ये डलिया भर पत्ते तो उससे कहीं ज्यादा है । बहुत ज्यादा ।"
" वो क्या है न , इनमें से तीन - तीन पत्ती वाले छांतेंगे ना ।" - वे बोली ।
'" यानी शेष व्यर्थ ! हे भगवान क्या आप सचमुच प्रसन्न हो सकते हैं , इतने सारे गंजे होते वृक्षों कों देख कर ? " - हमारे सम्मुख प्रश्न ठीक वैसे ही खड़ा था जैसे नीलकंठ में लिपटा फ़न फैलाए सर्प ।
*चेतना भाटी
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🍀🌹गीत🌹☘
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🌸पर्यावरण बचाना है 🌸
सुनो भाइयों नारा ये जन - जन
तक पहुँचाना है ।
पर्यावरण बचाना हमको
पर्यावरण बचाना है ।
आओ लगायें पौधे हम, ख़ूब
बढायें हरियाली ।
करें वनों की पूर्ण सुरक्षा, वन
उपजों की रखबाली ।
स्वच्छता का ध्यान रखें हम, बात
ये सबको बताना है ।
पर्यावरण बचाना हमको .....
साफ़ स्वच्छ हो शहर हमारा,
निर्मल हो हर गाँव हमारा ।
दूषित जल नदियों में न जाये,
इसका हो उपयोग दोबारा ।
स्वास्थ्य हमारा सबसे बड़ा धन,
ये सबको समझना है ।
पर्यावरण बचाना हमको .....
यहाँ वहाँ कचरा न फेंके, डालें
कूड़ेदान में ।
कर्तव्यों से प्यार करें हम, जियें
स्वभिमान से ।
दीन दुखी की सेवा करके, स्वच्छ
समाज बनाना है ।
पर्यावरण बचाना हमको .....
सुनो भाइयों नारा ये, जन - जन
तक पहुँचाना है ।
पर्यावरण बचाना हमको ......।
------- 0 -------
-- सुरेन्द्र सिंह राजपूत 'हमसफ़र'
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" पर्यावरण सी बेटी"
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पर्यावरण बनता है जैसे पौधों से घर संसार बनता है वैसे बेटी से, बेटी बचाओ का प्रयास जैसे हो रहा
वैसे ही पर्यावरण का विकास मानव कर रहा।
ना काटो पौधा धरती सूख जाएगी ना मारो बेटी को ममता रूठ जाएगी,
तबाही दोनों से होगी यह समझ लो
वक्त अभी नहीं हुआ जरा संभल लो।
नन्ही सी कली शाखाओं की फ़ैल जाती है
वृक्षों की छांव जैसे आंचल फैलाती है,
फलों को खाकर आनंद जैसे होता है
वैसे बेटियों की ममता का एहसास होता है।
पौधों को जहां धूप छाओं से सींचा जाता है
वही नन्ही को संस्कार और पालन सिखाया जाता है,
क्यों हम इस फर्क को नहीं समझ पा रहे हैं
ना बेटी ना पर्यावरण को बचा पा रहे है।
तबाही दोनों से आएगी यह जानते हैं सभी
फिर भी स्वयं कि नादानियों से अनभिज्ञ है अभी,
लो संकल्प पर्यावरण दिवस पर सभी
बेटी और पौधे को बचाएंगे मिल सभी।।
* शीर्षक- " पर्यावरण सी बेटी"
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ना काटो पौधा
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पर्यावरण बनता है जैसे पौधों से घर संसार बनता है वैसे बेटी से, बेटी बचाओ का प्रयास जैसे हो रहा
वैसे ही पर्यावरण का विकास मानव कर रहा।
ना काटो पौधा धरती सूख जाएगी ना मारो बेटी को ममता रूठ जाएगी,
तबाही दोनों से होगी यह समझ लो
वक्त अभी नहीं हुआ जरा संभल लो।
नन्ही सी कली शाखाओं की फ़ैल जाती है
वृक्षों की छांव जैसे आंचल फैलाती है,
फलों को खाकर आनंद जैसे होता है
वैसे बेटियों की ममता का एहसास होता है।
पौधों को जहां धूप छाओं से सींचा जाता है
वही नन्ही को संस्कार और पालन सिखाया जाता है,
क्यों हम इस फर्क को नहीं समझ पा रहे हैं
ना बेटी ना पर्यावरण को बचा पा रहे है।
तबाही दोनों से आएगी यह जानते हैं सभी
फिर भी स्वयं कि नादानियों से अनभिज्ञ है अभी,
लो संकल्प पर्यावरण दिवस पर सभी
बेटी और पौधे को बचाएंगे मिल सभी।।
* प्रेरणा सेन्द्रे (म. प्र. )
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प्रकृति की पुकार "
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अवतार ले वराह का प्रभु,
रसातल से ले आये मुझे।
स्थापित नक्षत्र मंडल में कर,
गर्वित होकर ,हर्षाए मुझे।
समस्त स्थावर जंगम का,
मैने स्वयम में सृजन किया।
गोद मे फिर सजाकर अपनी,
पालित- पोषित,विस्तीर्ण किया।
यत्र-तत्र सर्वत्र मुझे यहाँ,
निर्मलता का साम्राज्य मिला।
उत्तरोत्तर मैने भी मानव हित,
सृष्टि-शक्ति का संचयन किया।
अपने अभिन्न उपागमों से,
खुशहाली का संचार किया।
जीवन के अनमोल खजाने से,
नवयुग का निर्माण किया।
पोषित हो मानव सभ्यता ने,
मुझ पर ऐसा फिर प्रहार किया।
संसाधनों का अपार दोहन कर,
मेरे समर्पण का ही आहार किया।
क्षमता से बढ़कर ये मानव,
मुझको लूटता और लूटता रहा।
हाय!मेरे समर्पण स्वभाव ने,
मुझको अब जर्जर किया।
मुझसे अनुकूलन कर मानव,
मुझको अब मृत बना रहा है।
कगार पर मृत्यु के लाकर,
प्रसन्नता के गीत गा रहा है।
मुझे पूरा प्रदूषित करके,
होश में जब तू आ जायेगा।
आने वाली पीढ़ी को तब तू,
त्राहि-त्राहि ही दे जायेगा।
आशाभरी नजरों से देखकर,
करबद्ध निवेदन मैं करती हूँ।
मुझको बचाकर ही मानव तू,
अस्तित्व अपना बचा पायेगा।
मुझको बचाकर ही मानव तू...
अस्तित्व अपना बचा पायेगा.😊
* माधुरी व्यास(नवपमा)☺️
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" पाँव"
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* शालिनी खरे
तडप उठी मानवता
नग्गें पाँव
निकल पड़े वो
अपने गांव
होगी वहां नीम पीपल
की निर्मल पवन
अपनो का साथ
और बरगद की छांव
अपने खून पसीने से दी
जिन्हे रौनकें
सजाया इनके सपनों को
उन्हीं शहरों ने हमें दिये घाव
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क्ष *जूझने वाले प्रत्येक योद्धाओं के नाम*
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आ गई हूं
गांव अपने
छोड़कर
झूठे सपने
सिक्त सिंचित
मैं करूंगी
मां बसुंधरा
क्यारियां
फुलवारियां
किलकारियां
सजते रहें
पैर अपने
हाथ अपने
ताल देते रहे
मनमानियां
गुमानियां
खैंचातानियां
चलने न दूं
समझेंगे बेटे
और
समझेंगी बेटियां
खींचकर
लकीर अपना
बदली तस्वीर
बदलेगी तकदीर
मेरी और तुम्हारी भी!
*लता प्रासर*
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ठूंठ हो जायेगा शहर
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कटते वृक्ष,ठूंठ होते जंगल।
चहुँ ओर हो रहा अमंगल।
बंजर धरा सिसकती रोती।
हरीतिमा का बाट जोहती।
हरे भरे सुन्दर वन ,महकाते थे जीवन।
बिखरा जाते थे पल भर में चंदन।
सौरभ सुगन्ध से पुलकित होती थी धरा।
हर किसी का जीवन था खुशियों भरा।
जल जंगल जमीन सिमट गई है आज।
जो मानव के थे सिर के ताज।
समय रहते हे मानव! इन्हें सहेज लो।
झूमते हरहराते वृक्षों को अनमोल समझ लो।
धरती के ये हैं अनमोल श्रृंगार।
करो इनका तुम सत्कार।
पेड़ लगाओ अनेक,हो कल्याण।
वृक्ष झूम-झूम गाये मंगल गान।
सरिता बहे कलकल ,मिटे धरती की प्यास।
आएगा स्वर्ग धरा पर है मुझे विश्वास।
बस पर्यावरण को स्वच्छ बनाना है।
जीवन को कठिन नहीं सरल बनाना है।
* डॉ.शैल चन्द्रा
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*"पर्यावरण"*
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आओ मिल के ,
पेड़ पौधे लगायें,
नवसंचार।
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
हरित पत्ते ,
नई नई कोपलें ,
मानसून से।
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
पावस बूंदे ,
हरियाली धरती ,
शुद्ध हवायें।
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
आम की डाली ,
कोयलिया कूकती ,
कोयल काली।
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
वृक्षारोपण ,
हरित क्रांति लाने,
पेड़ लगाओ।
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
शुद्ध हवायें ,
ऑक्सीजन मिलता ,
जीवन बचे ।
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
* *शशिकला व्यास*
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उमंग से सराबोर
----------------------
उमंग से सराबोर हम
नई ऊर्जा के संग,करें वृक्षारोपण।
उमंग उल्लास से संवारे,पर्यावरण।
घर घर जागरूकता फैलाएँ
प्रदूषण को दूर भगाएँ
जीवन को रोगों से मुक्त रखें
वातावरण को शुद्ध बनाएं
उमंग से- - -
नई ऊर्जा - - -
प्रकृति हमें देती अपार
धरा की है प्रवृत्ति उदार
किन्तु आज बनी दहकता अंगार
मानव ने किया शोषण औ खिलवाड़
उमंग - - -
नई ऊर्जा- - -
हरे भरे उपवन को सहेजें
राष्ट्र के स्वयं माली बनें
बाग बगीचे देखे,बागबानी करेँ
नई ऊर्जा से संकल्प लेँ आज
उमंग - -
नई ऊर्जा - --
एक वृक्ष सौ पुत्र समान
हम सब हैं सौभाग्य वान
परिवार बनाएँ समाज बचाएँ
पर्यावरण बचाएँ,देश बचाएँ
आओ पेड़ लगाएँ,पेड़ लगाएँ
उमँग - - -
नई ऊर्जा- - -
डाँ अँजुल कंसल"कनुप्रिया"
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पूर्वज और पौधे
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पुर्वज हमारे लगा गए कुछ पौधे ।
प्रकृति ने पाल कर बनाये पेड़ नवेले ।।
शुद्ध हवा और सुंदरता ये फैलाते ।
पीढ़ी दर पीढ़ी जंगल बनाकर पाले।।
2
भौतिकता की आई आंधी जंगल सारे उजाड़ डालें।
पेड़ काट काट कर घर के फर्नीचर बनवा डाले।।
विकास के नाम पर जंगल खाली करवा डाले।।।
काट काट कर पेड़ रोड बनवा डाले !!
3
समपर्ण थी कभी ये प्रकृति बेचारी ।
इंसानो ने लालच में जान इसकी ले डाली
सुकून पाने को कभी छुप जाते थे गोद मे इसकी
नज़र इसको लगा डाली ,लूट कर इसकी हरियाली।
4
अर्थी हो या डोली फूल बरसाते,सारा चमन उजाड़ जाते
ऐसा मरे को सजाते जिंदा को दफन कर आते ।
इंद्रा धनुष परिधान था ,कभी अब इसका भी हरण कर लेते ।
आज कागजो मे ही पर्यावरण दिवस मानते !!
5
काट काट कर पेड संकट कोरोना का बढ़ाये ,
शुद्ध ऑक्सिजन बची नही ,कृत्रिम ऑक्सिजन पाए !
आमंत्रण तूफान को कोरोना के साथ दे आये ,
मन से होकर अंधे पर्यावरण दिवस मनाये।
* रश्मि सक्सैना
पचोर जिला (राजगढ़)
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" पर्यावरण सी बेटी"
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पर्यावरण बनता है जैसे पौधों से घर संसार बनता है वैसे बेटी से, बेटी बचाओ का प्रयास जैसे हो रहा
वैसे ही पर्यावरण का विकास मानव कर रहा।
ना काटो पौधा धरती सूख जाएगी ना मारो बेटी को ममता रूठ जाएगी,
तबाही दोनों से होगी यह समझ लो
वक्त अभी नहीं हुआ जरा संभल लो।
नन्ही सी कली शाखाओं की फ़ैल जाती है
वृक्षों की छांव जैसे आंचल फैलाती है,
फलों को खाकर आनंद जैसे होता है
वैसे बेटियों की ममता का एहसास होता है।
पौधों को जहां धूप छाओं से सींचा जाता है
वही नन्ही को संस्कार और पालन सिखाया जाता है,
क्यों हम इस फर्क को नहीं समझ पा रहे हैं
ना बेटी ना पर्यावरण को बचा पा रहे है।
तबाही दोनों से आएगी यह जानते हैं सभी
फिर भी स्वयं कि नादानियों से अनभिज्ञ है अभी,
लो संकल्प पर्यावरण दिवस पर सभी
बेटी और पौधे को बचाएंगे मिल सभी।।
* प्रेरणा सेन्द्रे (म. प्र. )
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कच्चे आगंन में
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मेरे कच्चे आँगन में
अंमीया की डाली पर
चहकती है
सुबह से चिडियों की टोली
गुनगुनी धूप में
यहां वहां फुदकती रहती है
नन्हे बच्चों की तरह
चिडियों का चहकना
अच्छा लगता है
मन को
सुकुन देती है
उसकी
सुंदर क्रीडाएँ
जिसको देख
भूल जाती हूँ
अपनी पीडा
खो जाती हूँ उनमें
पलभर के लिए
गृहस्थी के
जोड घटाव से दूर
पंख फैलाकर
उडते-उडते
दे जाती है वो
हौसला जिंदगी
जीने का
ऊँचे आसमान में
उडने का
अपने सपनो में
रंग भरने का
उन्हें साकार करने काl*नंदिनी जोशी
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पौधे
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मे रा घर जहां लगे कुछ पौधे
कुछ गमले में कुछ है रोपे
मीठा नीम जानता घर-घर की बाते
इस घर में क्या पकता बीती कैसी रातें
चार अशोक के वृक्ष जो अपने यौवन पर
उनके साथ चांदनी सुंदर लगती खेलने पर
एलोवेरा मिटाता त्वचा रोग घिसने पर
तुलसी देती हमको ऑक्सीजन रात आने पर
रंग बिरंगी सेवंती सुंदरता बिखेर तीसर्दी आने पर
मेरा गुलमोहर सबको आसरा देता गर्मी आने पर
खग की चहचहाहट जगा देती भोर होने पर
सारे पेड़ पौधे बतियाते अक्सर रात आने पर
चलते राहगीर ठिठक जाते दो घड़ी धूप आने पर
वृक्ष अशोक मना करता गुलमोहर से लंबा होने पर
सूरज की रश्मि ओं में गुलमोहर परिवार खुद को पावन पाते
है बुजुर्ग गुलमोहर हमारा परिवार चाहता हूं उसकी छाया
सभी पेड़ पौधे आदर करते सानिध्य बुजुर्ग का चाहते
छत पर जाने पर उसके फूल देख मुझे मुस्काते
स्वागत करने को मेरा अक्सर बेचैन खुद को पाते
मैं और मेरा गुलमोहर अक्सर दो घड़ी बतियाते
मैं देख उसे सहज मुस्काती वह मुझे देख खिल जाता
इतना प्यार पाकर सोचती रश्मि खयाल जब बेजुबान इतना रखते हम पर्यावरण सुरक्षित क्यों नारख पाते
*श्रीमती रश्मि सक्सेना
पचोर जिला राजगढ़
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पहला प्यार
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🥦🥦🥦
मेरा पहला प्यार,प्रकृति,हरियाली
धानी अंचल धरा का,देता खुश हाली
पर्यावरण का प्रहरी,परमार्थ का पुजारी
आंगन का आम्र व्रक्छ,
निभाता जिम्मेदारी🥦
प्रभात में देवदर्शन,कराग्रे वास्ते लक्ष्मी::::::
दूसरा दीदार अम्रव्रक्ष प्रतिदिन।🥦
निहारकर कोमल,किसलय, कोपले
बोरो की भीनी भीनी खुशबू
🥦
प्यारे पंछी टूम कते है
इत उत शाखाओं पर
झूमता है,मदमस्त,शीतल बयार में
नीली काली चिड़िया कभी पीली छोटी छोटी
कभी गोराया,कभी तोता कभी गिलहरी की अटखेलियां
मोटे तने पर चिपकी है छोटी छोटी
सिपिया।🥦
बारिश की रिमझिम में नीखरा रूप
पुरवाई में पत्तो का मोहक नृत्य
छन छन झंकृत मधुर संगीत🥦
TT
ग्रीष्म में देता है अपनी ठंडी छाव
पथिको को छाया पल भर आराम
गाड़ियों का जंक्शन,रेहड़ी का स्टेशन
वह पेड़ नहीं जीवन है,bada bujurg he.
फल,पत्ते लेकर,सबका उस पर प्यार
लेता कुछ नहीं,देता ठंडी बयार
कोई त्योहार हो, या शुभ शगुन,
शादी विवाह हो या शुभ प्रसंया पत्तियांबनती है वंदनवार कलश मन में,मंडप मे, द्वार पर।
🥦
निर्देश है,खींचा तनी नहीं प्यार से तोड़ो,
जितनी जरूरत हो,कोमलता से
लो।
कुचलने, मसलने के लिए नहीं ,dev vruksh है, एहमियत तो तोलो ।🥦
सीचने पर मिट्टी की अनूठी सुगंध
मिलती है,
दीदार से नयनों को ठंडक मिलती है🥦
यू तो पेड़ किसी का भी हो
सारा मोहल्ला करताहै उससे प्यार
एक नहीं सब बनते है उसके हकदार ।🥦
आम आने पर घर घर पना,मुरेब्बा, आचार।।
🥦
जब सर्सरती हवा,पत्तो को झूलती है
हल्के हल्के जल तरंग की धुन
सुनाती है 🥦
ऐसा अद्भुत है प्रकृति का साया,
प्रभु कृपा से मिली छाया ।
डेट
मेरे अम्बुआ तुम डेट कर खड़े रहो ।
पत्थर खाकर भी डटे रहो
🥦
*निर्मल सिघल
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*हमारी जीवन रेखा*
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जल ही तन है , जल ही मन है , जल ही है जीवन।
जल बंद हो जाएगा सुना, हर घर हर आंगन।।
जल से बनते रिश्ते नाते, जल से सपने सजते ।
जल की खातिर युद्ध भी होते, जल से रूठे मनते।।
कल-कल जो बहता था वो अब, जल ना होगा कल।
क्योंकि पेड़ों को हम काट रहे और जला रहे जंगल।।
जल की हर एक बूंद की कीमत, तब हम पहचानेंगे
जब कंक्रीट के इस जंगल में पानी ना पाएंगे ।।
अगर अभी भी हम ना जागे, चेते नहीं जरा सा।
तब एक दिन ऐसा होगा, खुद जल भी होगा प्यासा।।
वर्षा से जल संरक्षण का, अलख जगाना होगा।
जल संवर्धन तकनीक सब को अपनाना होगा ।।
तभी बहेगा निर्मल जल का, प्यारा मीठा झरना।
वरना हरा भरा हो भारत अपना, रह जाएगा सपना।।
बूंद बूंद से घट भरता है, सबक रहे है याद।
पानी को बर्बाद करो ना इतनी है फरियाद।।
*स्मिता जैन रांची
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यह किसकी लगी नजर
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कहाँ मेरा सुंदर नगर
क्यों हो गया शापित शहर
ये कौन ढा रहा कहर
ये किसकी लग गई नजर
जो कभी थे हमसफ़र
साथ में गुज़र बसर
कहाँ गया खुसुर पुसुर
मुंबई बन गया शहर
ये,,,,,,
बेटियां मानो जिगर
प्यार पाती और कदर
लोलुप हुए सारे भ्रमर
हर कली गई सिहर
ये,,,,,,
वृक्षों के थे ऊँचे शिखर
चिड़ियों की वो चटर पटर
थम गया जंगल सफ़र
चहुँ ओर है खटर पटर
ये,,,,,,
झरनों ने ना छोड़ी कसर
जल भरे पोखर मुखर
नदी थी जो बनी नहर
रेतीले अब खंडहर
ये,,,,,,
पेड़ों से घिरे सारे घर
आँगन मिले डगर डगर
हवा में घुल गया ज़हर
हरियाली हुई दरबदर
ये,,,,,,
पवन बहे जैसे लहर
हर ज़िन्दगी थी बेखबर
निशा सदा नहीं सहर
बज गया अंतिम बजर
ये,,,,,,
क्यूँ कहे अगर मगर
जाना नहीं इधर उधर
सारे बहाने छोड़कर
दिल कहे कि कर गुज़र
ये,,,,,,
ना हो यहाँ कभी गदर
पर्यावरण का हो असर
रिश्ते रखें सहेजकर
बचाओ बेटी हर पहर
ये कौन ढा रहा कहर
ये किसकी लग गई नजर
*सरला मेहता
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हरियाली
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आओ हरियाली से
धरती का सम्मान करें
पौधों को लगाएं और
फूलों से प्यार करें।
यह धरती भारत माँ बनकर
सबको आश्रय देती है
अन्नपूर्णा बनकर हम सबका
लालन पालन करती है
फल फूलों से लदी डालियाँ
झुकना हमें सिखाती हैं,
पथ प्रदर्शक बनकर
प्रगति की राह दिखाती हैं
संकल्पों के वृक्ष लगाकर
कर्तव्यों का निर्वाह करें
आओ हरियाली से
धरती का सम्मान करें।
सावन की रिमझिम बूंदे
घुंघरू की तान सुनाती है
फूलों से महकती क्यारियां
हर दिशाओं को महकाती हैं
इन्द्रधनुष सप्तरंगी चूनर
धरती का सौंदर्य बढ़ाती है
केशरिया रंगों में रंगकर
दुल्हन सी शरमाती है,
स्वर्ण मंज़रियों में लिपटी
वसुन्धरा का गुणगान करें
आओ हरियाली से
धरती का सम्मान करें।
*शोभा रानी तिवारी
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सुरभि
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बहुत भीनी खुशबू आ रही है, मां आपने फिर क्यारी में कोई महकने वाले फूलों की कलम लगाई है।
घर की दहलीज पर कदम रखते ही बिटिया सुरभि ने अपनी मां की क्यारी में लगे पुष्पों को निहारा।
सुरभी आते ही बस दौड़ पड़ी तुम बगीचे में ।चलो आओ घर के अंदर।
मां बेटी बहुत दिनों के बाद मिली थी। पहले बेटे पढ़ने जाते थे,अब बेटियां भी पढ़ने के लिए की साल बाहर रहती है तो घर आना जाना कम होता है।
सुरभी अपनी पढ़ाई के दौरान छुट्टियों में आई थी। कुछ दिन रहकर सुरभि अपनी महक बिखकाकर फिर लौट गई।
मां हर पौधे को जतन से रखती,उसे हर पौधा अपने बच्चों सा लगता और पौधै भी जैसे मां को देख झूमते।
पढ़ाई पूरी हुई, सुरभि के लिए लड़का पसंद किया गया।आपसी रजामंदी पर शादी हो गई। लेकिन सांस, ससुर जेठानी,पति सभी का व्यवहार सुरभि के नाजुक मन सा कहां था वह तो सब जैसे कैक्टस।
कांटे चुभते गये,सुरभी लहूलुहान हुई, अनंत यात्रा पर चली गई।
माता पिता की लाडली सुरभि,यथानाम तथागुण। माता-पिता ने अपनी सम्पत्ति का आधा भाग वृक्षारोपण में लगा दिया।सुंदर फूलों से महकता हरियाली बिखराता "सुरभी उद्यान" शहर के लोगों को सुकून देता और माता-पिता को अपनी सुरभि की महक।
*माया मालवेन्द्र बदेका
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नन्हीं कोपल
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वहां कभी घने- हरे वृक्ष हुआ करते थे , धीरे आबादी बढ़ी और पेड़ लोगो की आवश्यकताओं की भेंट चढ़ने लगे। सड़के चौड़ी होने लगी ,मकान , दुकानें बढ़ने लगी। बड़ी बड़ी होटल्स, स्कूल ,कॉलेज खुलने लगे। अब वहां पेड़ो के जंगल की बजाय सीमेंट -कंक्रीट के जंगल ज्यादा दिखाई देने लगे। लोग बहुत खुश थे क्योंकि उस इलाके का तेजी से विकास हो रहा था ।
एक दिन ऐसा आया कि वहां केवल कांक्रीट की जंगल और पेड़ो के ठूंठ ही रह गए थे। मौसम बदला और झमाझम बारिश शुरू हो गई। 2-3 दिन की बारिश के पश्चात एक ठूंठ से एक नन्ही कोमल पत्ती ने झांका ,आंखे मलते हुए उसने आसपास का नजारा देखा तो सहसा उसकी रुलाई फूट पड़ी। उसका तो पूरा खानदान ही नष्ट हो चुका था।
उसने मन में फिर विचार किया कि वह भी मुरझा जाएगी उस निष्ठुर मानव के लिए वह क्यों जिए, जिसने खुद का भला बुरा सोचे बिना मेरे परिवार पर इतने कुठाराघात किये। उसी को ख़त्म कर डाला जो उनके भले के लिए जन्मे थे ! ये सोचकर वो नन्ही कोपल,इस स्वार्थी और नादान दुनिया को अपने हाल पर छोड़कर मुरझाने ही वाली थी की फिर उसे ध्यान आया कि हमें अपने अच्छे कर्म नहीं छोड़ना चाहिए सारे मानव बुरे थोड़ी है साथ ही पशु-पक्षियों को भी दो पेड़ों की आवश्यकता होती है। कुछ स्वार्थी लोगों के लिए मैं सब को सजा क्यों दूं?
थोड़ी देर रोने के बाद उसने हिम्मत बंटोरी और मन ही मन संकल्प लिया की वह बड़ी होकर विशाल वृक्ष बनेगी और दुनिया को फिर से ठंडी हवा ,छांव और ठंडक का उपहार देगी।
*सुषमा दुबे
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🌲सर्वे भवन्तु सुखिनः 🌳
---------
🌲🌳क्यों न फिर सब मिल जाए हम
देश को हरीयाली मे भी न1बनाएहम 🌳🌲
मंदिरों में बँटे अब य गही प्रसाद,
एक पौधा और थोड़ी सी खाद
हर मस्जिद से हो यही अजान,
एक दरख्त लगाए हर इंसान ।
अब गूंजे गुरूद्वारों में वानी,
हर बंदा पौधा लगाके दे पानी ।
सभी चर्च दें अब ये शिक्षा,
वृक्षारोपण यीशु की इच्छा ।
*नित हो रहीं हैं सांसें कम*
*आओ पेड़ लगाऐं हम*
*पेड़ लगाये*
*जीवन बचायें*
*जनार्दन शर्मा* ( आशुकवि हास्य व्यंग्य)
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*पॉलिथिन की थैलियाँ*
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काली ,सफ़ेद ,नीली ,पीली
छींटदार कुछ , और गुलाबी
उड़ती फिरतीं सभी ओर यह
फँसी नालियाँ ,बढ़ा प्रदूषण
पशु इनको खा रोगी होते
इनको खा मरता है पशुधन
*फेंको इनको गाँठ लगा के*
इनको रोक न सका प्रशासन
लाख बनायें नियम प्रशासन
कुछ दिन में ही पुन: चलन में
आ कर जीभ चिढ़ातीं सब को
इन से सारी दुनिया हारी
आओ एक उपाय करें हम,
*फेंको इन को गाँठ लगा के*
गाँठ लगे से भारी होंगी
इतना इधर उधर न उड़ेंगी
इनमें भर छिलके मत फेंको
गायों को मरने से रोको
*फेंको इनको गाँठ लगा के*
*डॉ.आभा माथुर*
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*निशदिन पर्यावरण पर काम होना चाहिए*
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करे एक दिन जतन फिर हो जाए मगन
निशदिन पर्यावरण पर काम होना चाहिए।
पर्यावरण दिवस मनाए क्यो विवश
जन जन का यह अभियान होना चाहिए।
करे एक दिन जतन फिर हो जाए मगन....
हो रहा प्रदूषित जल उस पर पॉलिथीन बल
अंतर्मन से इस पर काम होना चाहिए।
करें एक दिन जतन फिर हो जाए मगन....
आओ सब प्रण करें।
मिलकर वृक्षारोपण करें। पर्यावरण से सबको प्यार होना चाहिए।
करे एक दिन जतन फ़िर हो जाए मगन....
डिस्पोजल से मुक्ति पाए
ऐसी युक्ति अपनाएं।
इस और भी सब का ध्यान होना चाहिए।
करें एक दिन जतन फिर हो जाए मगन....
थैली से नाता जोड़ो।
प्लास्टिक से नाता तोड़ो।
यह संदेश दूर-दूर तक पहुँचाना चाहिए।
करे एक दिन जतन फिर हो जाए मगन....
माता है धरा हमारी
सम्मान करे नर नारी
क्यों बिगड़ रहे हालात
इस पर भी ध्यान होना चाहिए।
करे एक दिन जतन फिर हो जाए मगन....
*पायल परदेशी*
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धन्य प्रकृति
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धरती,आकाश पहाड़ सहेर्जें,
चींटी, चिडिया,गैया पूर्जें,
सर्वे भवन्तु सुखिना गूँर्जें,
शाकाहार की रक्षा कीजे।
मनवा मेरे प्रेमरस पीजे,
बागों में कोयलिया कूँजे,
श्याम सलोने बादल भीगे,
लता,पेड़,उपवन सब सीचें।
झूमें,उड़ती तितली चिडिया,
गावें दादुर नाचे मोर पपीहा,
जन जन झूमे ता ता थैया,
सृष्टि पालनहार खैवया।
झरने,नदिया और ये ताल,
लहराते ये खेत खलिहान,
गुड़ ,धानी मीठी मनुहार,
धन्य प्रकृति,तेरी बलिहार।
*डाॅ संगीता पाठक 'सहज
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धरती और प्यारे वृक्ष
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हाय ! ओ सुन्दर धरती माँ,
तुम कौन से कर्म लिखवा के लाई ।
तुम हर दिन ही मर जाती,
क्यों तुम किरणों से करती आत्महत्या ।
कुछ वृक्ष जब मिल के छूमते,
तेज़ हवाएँ जब चलती ।
हरियाली बोली सब वृक्षों की,
दिल करता सब कुछ लिख दूँ।
मेरा भी यह मन करता है,
वृक्ष की काया में आहूं ।
अगर तुमने मेरे गीत है सुनने,
मैं वृक्षों के बीच गाऊ ।
वृक्ष तो मेरी माँ जैसे ,
जीयो तो वृक्षों की छांव में ।
वृक्ष बोल नही सकते फिर भी,
हर एक का दुखः पुछते ।
@डाँ. अमरजीत कौर
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"प्रकृति का खेल"
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यह जेठ की दोपहरी ,
क्या खूब कहर बरसाई है।
रिमझिम बारिश की फुहारे,
थोड़ी राहत लेकर आई है।
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सूरज के तपन को,
कैसे वसुधा सह पाई है।
रिमझिम बारिश की फुहारें,
धारा की तपन बुझाई है।
जलती राहे भी कहती,
जरा ठहर पथिक तू छाँव में
जब जल जायेगे पग तेरे,
फिर कैसे पहुँचेगा तू गाँव में।
यह खेल है प्रकृति का,
इसे कोई बदल नहीं पायेगा,
रिमझिम बारिश की फुहारें ,
थोड़ी राहत ही दे पायेगा।
* विजय पाण्डेय 'जीत'
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मै सजीव..
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मैं निर्जीव नहीं सजीव हूं स्वांस देता हूं।
जहर पी जिंदगी की नई आस देता हूं।
ह्रदय विदारक हर दृश्य इतना चहुं ओर ,
मनुज बढ़ रहा विनाश की राह की ओर।
जाग, मानव समय नहीं अब तेरे पास,
मलता रह जाएगा हाथ कुछ न होगा पास।
मत कर दोहन प्रकृति के इस उपहार को,
समझ ले, अर्थ सृष्टि के उदार भाव को।
बचा ले नदी, मत पी इसे, खुद मिट जाएगा,
सींच ले बचे पौधों को तो जीवन बचा जाएगा।
🌴
* मित्रा शर्मा
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।।प्रकृति।
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छलनी धरा का सीना
मुश्किल सभी का जीना,
कफस में है मानव,
अवनी बचाइए।
आया है विनाश द्वारे
पग न बहि पखारे,
जीवन का आधार है,
सांसों को बचाइए।
निशब्द हवा उदास,
सुनो कह रही खास,
ये दंभ को मिटाकर,
सृष्टि को बचाइए।
साक्षात हुआ प्रलय,
कैसा है मन अमय,
बिखरी है संवेदना ,
चिंतन बचाइए।
पूर्ण भूमंडल पर,
हुआ है प्रचंड वार,
है एकांत उपस्थित ,
सृजन बचाइए।=
🌹 मधु वैष्णव "मान्या"🌹जोधपुर
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समय की पुकार
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आज दुनिया ने जरा ठहरकर सांस ली, प्रकृति को नुकसान न पहुंचाने की ठान ली
पेड़ काट कर जंगल के, कांक्रीट सीमेंट के खड़े किये, क्षणिक लाभ के लिये, हमने ऐसे गंभीर कार्य किये
भारत में प्रकृति संतुलन कर चलने का संस्कार था, हिन्दू परम्पराओं में कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण था
वट पूर्णिमा और आँवला नवमी हमें मनाना है, तो हमें सारे वृक्षों को बचाना है
इसीलिये आज बिजली दाहघर में हो रहा संस्कार, जीने के लिये लगाओ कम से कम एक पेड़ एक बार
*मंजिरी पुणताम्बेकर
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तन्हाईयांँ यहाँ
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पेड़ों के झुरमुठों की अमराईयाँ यहाँ
मीठी महक उड़ाएं पुरवाइयाँ यहा।
इतिहास के अनेकों सन्दर्भ मूल में,
समझे ंतो कोई आकर गहराईयाँ यहाँ।
यादों के चित्र बनते इस धूप छाव में,
जीवित है आस्था की परछाईयाँ यहाँ।
अधरों पे बांसुरी के रस माधुरी क्षितिज,
कोई छेड़ के तो देखें चौपाइयाँ यहाँ ।
खुद चाँदनी यहा पर अटखेलियाँ करें,
सोई हैं दरख्तों में तन्हाइयाँ यहाँ।
*डाॅ सुरेखा भारती
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वृक्ष लगाओं वृक्ष बचाओ
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वर्षा चाहियें तो, सघन वन लगायें
पौधा रोपन की मुहिम चलायें
बन्जर खाली पढी धरती को हम
मिल जुल कर हरी भरी बनायें
अछ्छी वृक्षा के लिये हम
पहाडों का सवरक्षण करें
उनके अस्थित्व को बचायें
यदी हमें सच्ची खुशियाँ चाहियें
परिवार नियोजन को हम अपनायें
छोटा परिवार सुख का आधार
समझे ओर सब को हम समझायें
यदी हमें स्वस्थ तन चाहियें
शाकाहारी हम हो जायें
उत्तम स्वास्थ के साथ साथ
सुख समन्यता को घर लायें
यदी हस्ट पुस्ट शरीर हमें चाहियें
सुबह साम रोज योग हम करें आत्म शान्ती परम सुख चाहियें
एकान्त ध्यान हम लगायें
परमात्मा के पथ पर चल कर
हम प्रकृति के हम सफर बन जायें
*कुन्दन पाटिल देवास
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सकूँन
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पेड़ लगाओ
सुन्दरता बढ़ाओ
सुकून पाओ
झुकता पेड़
जिसपे होते फल
सहनशील
मौन से खड़े
गरमी में तपते
छाया भी देते
लाल कमल
तालाब में खिलते
खुशियाँ देते
वृक्ष लगाओ
हरियाली बढ़ाओ
जीवन पाओ
पेड़ों की छाँव
देती मन को सुख
विश्राम पाँव
बहे बयार
पेडों के झुनझुने
बजने. लगे
पेड़ों से हमें
आक्सीजन मिलेगी
चिंता मिटेगी
वनों की शोभा
लाल - लाल पलाश
रक्तिम आभा
पेड़ हमारे
जीवन के रक्षक
उन्हें संवारें
**आशा जाकड
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"हर्ष "
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बीज इक बो कर देखो,मिलता कितना चैन
जब वो अंकुरित होता,खिल जाते हैं नैन
खिल जाते हैं नैन,हृदय भी हर्षित होता
बड़ा सृजन का हर्ष,जगत भर में है होता
वन हरने पर रोक, देखो तो आज़मा कर
पाओगे सुख सदा, भू पर बीज इक बो कर
*शोभना नाईक
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* ज़रूरत हूँ तुम्हारी *
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कुछ अपनी सुनाओ कुछ मेंरी भी सुनों
जैसे उजड़ी हूँ मैं एसे तुम ना उजड़ो
अनजान बनकर खिलवाड़ कर गए
मंज़र वो खूबसूरत पल में उजड़ गए
जीवन हरा-भरा खुशहाल ना रहा
वीरान हो गया ना बागबां रहा
पर्यावरण का ये उपहास हो गया
परिंदे भटक रहे हैं आशियाना खो गया
===
हो सके तो लता विटप गुलशन को लगाओ
सुरभित करो जीवन फूलों को महकाओ
ज़रूरत हूँ तुम्हारी मुझे यूं ना बहलाओ
कुछ मेंरी भी सुनते रहो और अपनी भी सुनाओ
*- सीमा जोशी
उज्जैन म प्र
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आवाज़
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"प्रदूषण सहता रहा मै ,बूंद बूंद बहता रहा में !
सुनी न किसी ने मेरी आवाज ,
आज बद से बदतर ही चले मेरे हालात !
सजा मिली है सभी को इसी की ,
अधर सभी के सूख चले ,ढूंढ़ते हो मेरे निशा ,
जब मेरे निशा सूख चले !
आओ शपथ ले व्यर्थ न एक बूंद भी बहायेगे ,
समझेंगे जल का महत्व ओर ,
औरो को समझाएंगे !
बचपन से सुनते आए थे हम यही कहानी ,
की एक था राजा ,एक थी रानी ,
कल कही कहना न पड़ जाए लोगो ,
की एक था पानी ,एक था पानी ,एक था पानी "
* "साधना श्रीवास्तव"
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जिला जन्तु का महत्व
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प्रकृति ने समस्त जिव जन्तु को बनाया
एक एक मकसद दे कर भैजा धरती पर
चीन में एक मर्तबा सोचा चिड़िया मुफ्त में फसल खा जाया करती
मार गिराओ इस चिड़िया सब लोग
लाखों चिड़िया मारी गई बेचारी सारी
फसल जब उगाई फसल बर्बाद हुई
चिड़िया फसल के साथ किडे मकोड़े खाती
फसल बर्बाद हुई तब जानै चीन चिड़िया का महत्व छोटी सी चिड़िया
एक संस्कृति में बिल्ली से नफरत की
बिल्ली की बलि चढ़ी खूब गांव गांव
सारी बिल्ली खत्म कर डाली नफरत नै
गांव गांव चुहे फैले फ्लेग फैला लाखों मरे
प्रकृति ने समस्त जिव जन्तू को बनाया
एक एक मकसद दे भेजा धरती पर
प्रकृति से छेड़खानी मत करना यार
ना वृक्ष काट ना भूरण हत्या कर समझा
चिड़िया को दाना पानी दे मानव यार दोस्तों
जानवरों पर दया भाव रखा करो रिश्तेदार दोस्त
प्रकृति से छेड़खानी मत कर मत कर
जिव जन्तू को जिने दो और खुद भी जी
*अलका जैन
===========================================================================सत्य
------ सत्य
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यही सत्य है
वो भी एक वक्त था जब पर्वतों की
गोद में वास था
बादलों से बात करती और हरे भरे जंगलों में बेफिक्र टहलती थी |
पंछियों की चहचाहट थी और पत्तों कि सर-सराहट
बादलों से रिसती टिप-टिप सी मन तर जाता था |
फिर वक्त बदला और डेरा नदी तट पर लगा
कल-कल बेहता वो दरया पल-पल नए रूप मे दिखा |
कभी जीवन दायी लगा तो कभी घोर विनाशक
उस निर्झर्णी मे झांका तो मैंने खुद के कई प्रतिबिंब पाये |
फिर यह समय भी गया
आज न पर्वतों का आंचल है, न दरिया का सैलाब
चारो ओर है तो है बस मानवो का उफान
शुद्ध हवा का एक झोंका पाने को बहुत दूर जाती हूँ |
वहाँ भी सांसों को बेताब कई उम्मीद्वार खड़े मिलते है
पर जाने क्यों ये अखड़ता नहीं, कोई शिकवा नहीं होता
प्रक्रती ने शायद यही तो सिखाया है
नदी भी तो रूकती नहीं बस बहती है |
वापस जाने की जिद्द नहीं करती, पहाड़ो पर हक नहीं जताती
और पर्वत भी तो कभी धाराओ से शिकायत नहीं करते |
उन्हे बांधते नहीं
शायद यही सत्य है यही परम नियम है |
*डॉ विजया त्रिवेदी
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गहन तम
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पड़े हैं छाले
हिम्मत नहीं हारे
ये मज़दूर
गहन तम
प्यार पाने की आस
दिखे न भोर
श्रमिकगण
भाग रहे है भूखे
गाँव ही छांव
ये मज़दूर
बने है फुटबॉल
बाप न माई
सड़क पर
क़ाफ़िले पे क़ाफ़िले
आत्मनिर्भर
ये सरकार
अमीरों की सुनती
दीन मरता
गिरी है लाशे
आँखों में गाँव बसा
दिल में है माँ
*डॉ अलका पाण्डेय
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