Sunday, June 21, 2020

पिता की अंतिम इक्छा



 *पिता की अंतिम इच्छा।* 
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वालिद के रोने का सबब अभी बाकी है,
कहीं साहिल तो कहीं मझधार बाकी है।

 संतान की खातिर हंसदे और संतान की खातिर रो दें,
एक ऐसा भी सवाल, कमाल, धमाल बाकी है।

वो चलते रहे कर्तव्य- सफर में, कांटे भी थे और पत्थर भी थे।
उन्हें जहाँ मिल जाये आराम एक ऐसा मकाम बाकी है।

कहते हैं अंधेरे के बाद सुबहा होती है,
उस इंतजार मे चिडि़यो का चहचहाना बाकी है।

कद कर लेते हैं छोटा वो वक्त-बेवक्त, संतान की खातिर,
कामयाबी की पतंग का फिजाओं में लहराना बाकी है।

वो तपते, सिखाते, पढ़ाते,  हैं और आप पढ़ते जाते हैं,
आशाओं के काले बादलों का सम्हलकर बरसना बाकी है।

उनको आपकी तरक्की के अलावा कुछ नहीं चाहिये,
बूढ़ी आंखों के सामने बस आपका खिलखिलाना बाकी है।

 चेहरे मे सफर मे क्या क्या ना गुजरी, उनके
 एक दिन अपने बच्चों का मुस्कुराना बाकी है।

पंख लगें, परवाज बनें और  कामयाबी के फलक छुए मेरे बेटे,
फकत   यही  *उनकी अंतिम इच्छा"*  बाकी है।

*राजेश कुमार लखेरा, जबलपुर, म.प्र.।

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