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मौलिक : प्रभा जैन इंदौर
प्रथम परम् पिता प्रभु,श्री महावीर को नमन
ऐसा कहते थे मेरे पिता,जो सजा गए घर गुलशन
पिता होते हैं,जीवन बगिया के माली
जिनके कोई भी वचन नहीँ होते थे खाली।
दिलके टुकड़े बच्चोंकी,हो कोई भी फरमाइश
कप्तान रूप आसमां से तारे तोड़,पूरी करते हर विश।
माज़ी सम खेवैय्या बन,जीवन पार लगाया
तूफ़ान जैसी मुश्किल में भी, हंसकर जीना सिखाया।
भीगी आंखों से बिदाकर,घूंट के आंसू पीकर के
मनही मन गुम हो,बच्चों की तरक्की से फक्र करते थे।
पाप और व्यसनों से दूर,स्वस्थ जीवन जीना सिखाया
योग साईकल सैर ज़िन्दगी बसर कर,सादा जीवन उच्च विचार बताया ।
उनकी हर बात,आज भी याद,देखो शास्त्री और गांधी को
आधी बाँह शर्ट पहन,पाव भर कपड़ा बचाते थे।
सप्ताह में एक उपवास कर,शास्त्री का सन्देश अन्न बचाने का
दे गए सन्देश वे सादा जीवन उच्च विचारों का।
ऐसे पूज्नीय बाबूजी को,मेरा शत शत प्रणाम
भावना भाऊँ मैं,उनके चरण पथ पर चल के,बनूँ मैं नेक इंसान🙏🏻🎊👨👩👦👦👨👩👦👫
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