Sunday, June 21, 2020

कविता

विषय मुक्त विषय के संदर्भ में कविता प्रस्तुत कर रही हूं।
योग
अभिन्नता आह्वान पर्व है
शरीर व्यायाम ही नहीं है
देह मन और आत्मा को
लाने का सार्थक प्रयास है

शरीर मन का एक लय है
नव सृजन का संकल्प है।
 शान्ति की सहज निधिको 
गहन समाधि से पाते हैं।।

 आत्मानुभूतिकाआनन्दहै 
मन बुध्दि संस्कार जुड़तेहै 
 विषय विकार उन्मत्त हो
नीज गुणों से संघर्षकरतेहै 

राजयोग की ही दृढ़ता है
प्रबल चित्त की शुद्धता है
विषयों पर विजय पाने को
मुक्त हो कदम बढ़ाते है।

योग जीवन का आधार है
ये कर्मयोग का उद्घोष है
योग के प्रयोग अपनाने से
मैं पन विसर्जित होता है।
विषय मुक्ति काविकल्प है

अमिता मराठे
इन्दौर
मौलिक

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