Saturday, April 18, 2020

लघु कथा हमारे मित्र मम्मा मैं अभी आधे घंटे में दोस्त से मिलकर आता हूं


कहते राकेश ने पानी की बाॅटल उठाई और जाने लगा।अरे पानी क्यो ले जा रहा है।मम्मा गर्मी के दिन हैं ना पानी साथ हो



तो अच्छा कहते राकेश बाहर चला आया था।मां भी सोचने लगी उम्र में आये बेटे से भला कैसा विवाद करना आज पन्द्रह


दिन हो गये थे।राकेश ठीक समय पर पूरी बाॅटल भर बाहर चला जाता था।समय पर घर लौट आता था।मां अपने मन के

प्रश्नो के हल स्वयं पाने की सोच से जैसे राकेश घर के बाहर निकला चुपके से मां भी पीछे चल पड़ी ।घर से दस मिनट



दूरी पर शनि मंदिर था ।मां ने देखा राकेश वही रूक गया था।मंदिर के बाहर बूढे कुछ बच्चे महिलाऐ कतार से बैठे हुए थे।



राकेश उन्हें प्रेम से पानी दे रहा था।हंसते हुए उनसे बाते भी कर रहा था। थोडे समय बाद उसका एक मित्र वहाँ पहुँचा



उसके हाथ में भी पानी का पीप था।मैं कुछ हटकर खड़ी थी अब सामने आ गई थी।मुझे देखते ही राकेश ने सहज भाव से

कहा मम्मा आज आप इस समय दर्शन करने चली आई।देखो ये मेरा दोस्त प्रवीण है और ये सभी हमारे मित्र हैं।मां ने सुना


वहाँ बैठे सभी लोग इन बच्चो की प्रशंसा कर रहे थे। मम्मा एक दिन ये बाबा पानी की गुहार लगाते बेहोश हो गये थे मैंने


देखा दौड कर उन्हे जल पिलाया छाँव मे लिटाया।ठीक होते इन्होने बेटा कहा पता नहीं मन मे एक योजना बना ली हम


मित्रो ने गर्मी के मौसम तक हर घंटे एक एक दोस्त आकर इन्हे ठंडा शुध्द जल लाकर देगा।देखो मां ये सभी हमारे मित्र हो

गये है।इन्हें नव जीवन देने का भी इरादा हैं। अब मां राकेश के निर्विकार चेहरे को देख अपने सोच को धिक्कार रही थी।



 अमिता मराठे इन्दौर स्व सुखाय

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