Friday, April 10, 2020

शीर्षक मन की पीर । विधा कविता । आज मे किसको सुनाऊँ , व्यथित मन की पीर । नयन अपलक जागते हैं, बहुरि भरते नीर । वेदना के शूल चुभते , मन पटल पर भाव भरते , कोन जो आकुल हर्दय को, आ बँधावे धीर ,बहुरि भरते नीर। याद मुझको हैं सताती , विरह की ज्वाला जलाती , कब मिलन कैसे मिलन हो , श्वास श्वास अधीर , दूर बसते प्रिय हमारे, मन पखेरु जारे जारे , सरस प्रिय के बिना , अब एक पल गंभीर , बहुरि भरते नीर । मनोरमा जोशी ।

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