शीर्षक मन की पीर ।
विधा कविता ।
आज मे किसको सुनाऊँ ,
व्यथित मन की पीर ।
नयन अपलक जागते हैं,
बहुरि भरते नीर ।
वेदना के शूल चुभते ,
मन पटल पर भाव भरते ,
कोन जो आकुल हर्दय को,
आ बँधावे धीर ,बहुरि भरते नीर।
याद मुझको हैं सताती ,
विरह की ज्वाला जलाती ,
कब मिलन कैसे मिलन हो ,
श्वास श्वास अधीर ,
दूर बसते प्रिय हमारे,
मन पखेरु जारे जारे ,
सरस प्रिय के बिना ,
अब एक पल गंभीर ,
बहुरि भरते नीर ।
मनोरमा जोशी ।
Friday, April 10, 2020
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