Thursday, April 9, 2020

प्रेम, एसा चाहिए। उपजे, चहु और। बाकि कुछ ना.मिले। तो भी, सुखी रहे संसार। एक ही पलता रहा, मन मे यह बीज। नेकी के फूल खिले, यही रहे चीज। पानी, अमृत धार है, रखना इसे संभाल। चाहे, लाज, का हो या पीने का ताल। ममता का मन भर गया, इस लोक जगत मे। शायद तब से ही आया, विष विषेला अहित मे। समझो तो समझ मति, ना समझो तो अल्प मति। बाकि समझ के समझा दो, बन जाती है। विशुद्ध मति सुना सुना सा जग लगे, कह ना सके मन की बात। भौर भ ई कोयल बोली, फिर भी सकुन की ना हुई जीत। । सदगुणी, संस्कार को लेकर जग मे चलता जो। लंका मे विभीषण जैसा दिखता जग मे वो। सीख वहां के दीजिए, जिसको यह प्यारी आना वरना मत माथा खपाना, उन पर ना वारी जाना। लंका मे रावण रहा, नेक लेकर कर्म। भूल से, कर बैठा पाप, हुआ वहां अधर्म। सीता तो सीता रही, चली ना ऊसकी एक। वरना वह.भी साथ मे रहती नही अनेक।। सौतन सौतन क्यो करे, यह रही यहां की रीत। संख्या नर की कम थी, लडकियो से प्रीत। बाजीगर तू आज बन जाए, थोडा करे मनन। पर मन तेरा भागता, मृग सा करे विचरण। बैठे बैठे देख रहा होता तमाशा यार। बुद्धिमान सब चुप हुए, मुरख करता वार। जाकी रही भावना जैसी ,वैसा हुआ संसार। छोडी पुरानी रीति नीति, रोता अब यहां नर। आओ आज मनाते है ,मेरा अवतरण दिवस। शायद फिर मिले ना मिले, कब निकले सांस श्रीमती ममता वैरागी तिरला धार

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