Friday, April 10, 2020

गौरंया । तुम फिर से लौट आ जाओ गौरंया , तुम बिन दिल का आंगन सूना है , महका तो चहका दो गौरंया । रोज सुबह तुम चू चू करती, मीठे गीतों से मन बहलाती, सबेरा होने का एहसास कराती , फुदक फुदक कर आती थी । मुझे याद है माँ सकोरे , दाना पानी रखती थी , तुम संग सखी के झुम झुम कर खाती थी । आंगन मे पेड़ जाम का, छत की मुंडेर का कोना सूना सूना , रासायनिक खाद और कांकरेट के घर ने , तुम्हारा आशियाना तोड़ा , तभी से तुम रुठ कर चली गयीं , फिर से आशियानें को बसायगें , तुम फिर से लौट आओ गौरंया ,लौट आऔ । मनोरमा जोशी ।

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