गौरंया ।
तुम फिर से लौट आ जाओ गौरंया ,
तुम बिन दिल का आंगन सूना है ,
महका तो चहका दो गौरंया ।
रोज सुबह तुम चू चू करती,
मीठे गीतों से मन बहलाती,
सबेरा होने का एहसास कराती ,
फुदक फुदक कर आती थी ।
मुझे याद है माँ सकोरे ,
दाना पानी रखती थी ,
तुम संग सखी के झुम झुम कर खाती थी ।
आंगन मे पेड़ जाम का,
छत की मुंडेर का कोना सूना सूना ,
रासायनिक खाद और कांकरेट के घर ने ,
तुम्हारा आशियाना तोड़ा ,
तभी से तुम रुठ कर चली गयीं ,
फिर से आशियानें को बसायगें ,
तुम फिर से लौट आओ गौरंया ,लौट आऔ ।
मनोरमा जोशी ।
Friday, April 10, 2020
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