Sunday, April 12, 2020

अभिशप्त जीवन..... शायद गरीबी से बड़ा, कोई अभिशाप नही..... वह गरीब भिखारन, पैबन्दों से अपने शरीर को,


निरंतर ढांकने का, असफल प्रयास करती... डर जाती वह सर्द रातों में, भेड़ियों की आंखों में, चमक देख ... अधनंगे बदन

को, कहां कैसे छुपाए..., वो तो पसर ही जाता, रात के सन्नाटों में, गली- मुहल्ले चौराहों पर, प्रशिक्षित शिकारी की तरह,


भेड़िए अतएव करते, वार पर वार उस वक्त तक, जब तक बुझ न जाती, उसके देह की आग... वो फिर से खड़ी हो


उठती, अपनी गरीबी के तमाशे पर, दो आँसू बहाकर, अपने बिखरे शरीर को, समेटने लगती जैसे, कुछ हुआ ही ना हो...


*प्रतिभा श्रीवास्तव अंश मौलिक स्वरचित भोपाल मध्यप्रदेश

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