जिधर देखती हूँ वो ही दिखे ये मेरी निगाहों का कुसुर हुआ ।
जब से मिली मोहब्बत की पनाहें हर लम्हा खुशी से शायराना हुआ ।
मन के सुरूर का क्या कहें दुनिया का हर नजारा रंगीन हुआ।
दिल में ऐसे मचलने लगी तरंगें हर कतरा बस एक समुंदर हुआ।
ऐसा कमाल इस मोहब्बत ने किया मन खुद से ही बेगाना हुआ।
तरसते हैं नयन उन्हें देखने को हर जर्रा जर्रा उनका अक्स हुआ।
जब से दिल को मिली सौगात हर जाम जाने कैसे मयखाना हुआ। |||||
नीति अग्निहोत्री इन्दौर म मप्र

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